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फिर निकल आया कार्टून जिन्न : तुर्की की पत्रिका ने बनाया मोहम्मद वाला कार्टून, भड़क गए इस्लामी कट्टरपंथी: कहा- पैगम्बर का किया अपमान, 3 कार्टूनिस्ट गिरफ्तार

                      तुर्की में लेमन पत्रिका के कार्टून को लेकर बवाल ( फोटो साभार-turkiyetoday.com/ )
2015 में फ्रांस गैर-मुस्लिम देश में व्यंग्य पत्रिका ‘चार्ली हेब्दो’ द्वारा विवादित कार्टून प्रकाशित होने खूब दंगे हुए, दंगों का अखाडा भारत कैसे पीछे रहता। लेकिन अब इतने सालों बाद कार्टून का जिन्न मुस्लिम देश तुर्की में निकल आया है। देखना यह है कि अब कितने दंगाई निकल कर आते हैं?     

तुर्की की साप्ताहिक व्यंग्य पत्रिका लेमन इन दिनों सुर्खियों में है। वजह है इसमें छपा कार्टून। दरअसल कार्टून में ‘मुहम्मद’ और ‘मूसा’ नाम के दो व्यक्तियों को आसमान में हाथ मिलाते दिखाया गया है और नीचे जमीन जल रही है। मुस्लिम कट्टरपंथियों का आरोप है कि ये पैगंबर मुहम्मद और पैगंबर मूसा हैं।

इसके बाद मुस्लिम बहुल देश की भावनाएँ भड़क गई और देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन होने लगे। इस मामले में पुलिस ने तीन कार्टूनिस्टों को गिरफ्तार कर लिया है। इनमें कार्टूनिस्ट डोगन पेहलवान और पत्रिका के प्रबंध संपादक और प्रमुख संपादक शामिल हैं।

तुर्की के कानून मंत्री यिलमाज तुनक ने जून 30 को कहा कि तुर्की के अधिकारियों ने पत्रिका लेमन के खिलाफ़ आपराधिक जाँच शुरू कर दी है। तुनक ने अपने बयान में कहा कि इस्तांबुल के पुलिस कार्यालय ने तुर्की दंड संहिता की धारा 216 के तहत जाँच शुरू की है, जो “सार्वजनिक रूप से मजहबी मूल्यों का अपमान करने” से संबंधित है।

क्या है मामला?

पत्रिका के 26 जून के अंक में छपे कार्टून में इज़राइल और ईरान के बीच हाल ही में हुए संघर्ष का संदर्भ दिया गया था और इसमें पैगंबर मुहम्मद और पैगंबर मूसा को बमबारी से तबाह हुए शहर के ऊपर हाथ मिलाते हुए दिखाया गया था। कार्टून में नीचे जमीन पर जलता शहर और मिसाइलें दिखाई गई हैं।

पत्रिका का कहना है कि इस कार्टून का मकसद इजरायली हमले के दौरान ईरान में मारे गए एक मुस्लिम व्यक्ति की पीड़ा उजागर करना है। उसका नाम कार्टून में ‘मुहम्मद’ रख दिया गया है।

पत्रिका के प्रमुख संपादक तुन्के अकगुन ने एएफपी से बात करते हुए कहा है, “इस कार्टून में दिये गए नाम मुहम्मद का पैगंबर मुहम्मद से कोई लेना देना नहीं है। मुहम्मद नाम से करोड़ों लोग दुनियाभर में रहते हैं। ” पत्रिका ने कहा कि कार्टून का उद्देश्य धार्मिक मूल्यों का मजाक उड़ाना नहीं था।

इस्तांबुल में लेमन के कार्यालय के सामने विरोध प्रदर्शन

कार्टून को तुर्की में धार्मिक भावनाओं का अपमान माना गया और कट्टरपंथी संगठन सड़कों पर उतर आए। इस्तांबुल के इस्तिकलाल स्ट्रीट पर लेमन की इमारत के सामने कई प्रदर्शनकारी एकत्र हुए। कुछ लोग लेमन के कार्यालय में घुसने की कोशिश करते देखे गए।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि लेमन पत्रिका ने पैगंबर मुहम्मद का खुलेआम अपमान किया है। इस अपमान को कभी भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं माना जा सकता।

ऐसा ही एक मामला 2015 में फ्रांस में सामने आया था। उस वक्त भी मामला पैगंबर मुहम्मद के कार्टून का ही था। जब व्यंग्य पत्रिका ‘चार्ली हेब्दो’ के कार्यालय में घुस कर मुस्लिम कट्टरपंथियों ने फायरिंग की थी। इसमें संपादक समेत 12 लोगों की मौत हो गयी थी।

तुर्की में हुई खोज में मिली अपना लिंग हाथ में लिए हुए पुरुष, 11000 साल पुरानी मूर्ति: पुरातत्व वैज्ञानिक भी हैरान

तुर्की में अपना लिंग पकड़े व्यक्ति की तस्वीर मिली (फोटो साभार: Oppenheimer Ranch Project)
तुर्की में पुरातत्वविज्ञानियों को एक ऐसी मूर्ति मिली है, जिसमें एक पुरुष अपना लिंग पकड़ कर खड़ा दिख रहा है। बताया जा रहा है कि ये मूर्ति 11,000 वर्ष पुरानी है। इतिहासकारों ने कहा है कि इस मूर्ति से कृषि के विकास से पहले के काल को समझने में मदद मिलेगी। साथ में एक जंगली सूअर की मूर्ति भी मिली है। इसे एक अभूतपूर्व आर्कियोलॉजिकल खोज बताया जा रहा है। इससे उस समय के समाज को समझने में भी मदद मिलेगी। गोबेली टेपे और कराहन टेपे के आसपास के इलाकों में ये मूर्तियाँ मिलीं।

इन्हें दुनिया के सबसे बड़े टेम्पल परिसरों में से गिना जाता है। गोबेली टेपे महापाषाण काल के T आकार के स्तंभों के लिए विख्यात है। साथ ही यहाँ कई ऐसी मूर्तियाँ मिली हैं जिनमें काफी पेचीदा काम किया हुआ है। बताया जा रहा है कि अंतिम संस्कार के कार्यों में इनका इस्तेमाल किया जाता था। UNESCO ने भी इसे अंतरराष्ट्रीय धरोहर की मान्यता दी हुई है। प्रागैतिहासिक काल को समझने के लिए ये महत्वपूर्ण है। जंगली सूअर वाली आकृति को लाइमस्टोन से बनाया गया है।

गोबेली टेपे में में मिली ये मूर्ति 8700 BC से लेकर 8200 BC तक के बीच की है। जहाँ इसकी लंबाई 4.4 फ़ीट है, वहीं ऊँचाई 2.3 फ़ीट है। इसमें लाल, काला और सफ़ेद रंगों का इस्तेमाल किया गया है। इससे पता चलता है कि इसे पेण्ट भी किया गया था। वहीं इससे 22 मील की दूरी पर स्थित कराहन टेपे में पुरातत्वविदों को 7 फ़ीट लंबे एक पुरुष की मूर्ति मिली है। इसकी पसलियों, रीढ़ की हड्डी और और कंधों की बनावट स्पष्ट दिख रही है। इतिहासकारों का मानना है कि ये वहाँ स्थित इमारत से जुड़े किसी पूर्वज की मूर्ति हो सकती है।

इस मूर्ति की खासियत ये है कि ये व्यक्ति अपना लिंग अपने हाथ में पकड़ा हुआ दिख रहा है, जिसे इशारा मिलता है कि ये किसी समुदाय का प्रजनक रहा होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस इलाके में हर एक इमारत से जुड़ा कोई न कोई पूर्वज रहा होगा। इस व्यक्ति का चित्रण मृतक के रूप में किया गया होगा, ये कयास भी लगाए जा रहे हैं। कुछ ही दूर पर एक गिद्ध की मूर्ति भी मिली है। हालाँकि, इस पर और शोध और अध्ययन के बाद ही वैज्ञानिक अधिक जानकारी दे पाएँगे।


बकरीद पर स्वीडन में मस्जिद के सामने कुरान को हवा में उछाला, लात मारी, पन्ने फाड़े और लगा दी आग : इराक का है प्रदर्शनकारी

स्वीडन में कुरान जलाकर प्रदर्शन (साभार: trtworld
यूरोपीय देश स्वीडन में कोर्ट से आदेश मिलने के बाद बकरीद के दिन यानी 28 जून 2023 को प्रदर्शनकारियों ने मस्जिद के सामने मुस्लिमों के धार्मिक ग्रंथ कुरान को फाड़ा और जलाया। दरअसल, स्वीडिश पुलिस ने इसके लिए अनुमति नहीं दी थी, लेकिन प्रदर्शनकारी नहीं माने। उन्होंने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और आखिरकार इसकी इजाजत मिली।

 ईद उल अजहा के दिन कुरान जलाने का वीडियो भी सामने आया है। इस वीडियो में दिख रहा है कि स्टॉकहोम की एक मस्जिद के सामने दो लोग कुरान को फुटबॉल की तरह पैरों से मार रहे हैं। उसे जमीन पर फेंकते हैं और फिर पैरों के कुचलते हैं। आखिर उसे फाड़कर आग के हवाले कर देते हैं। प्रदर्शनकारी ईराक के बताए जा रहे हैं।

जिस समय यह प्रदर्शन किया जा रहा था, उस वक्त लगभग 200 लोग वहाँ दर्शक के तौर पर खड़े थे। इसी दौरान कुछ लोगों ने अल्लाह-हू-अकबर के नारे लगाए और प्रदर्शनकारियों को पत्थर फेंकने की कोशिश की। पत्थर फेंकने वाले को पुलिस ने हिरासत में ले लिया है। वहीं, बाद में पुलिस ने प्रदर्शन करने वालों पर एक जातीय या राष्ट्रीय समूह को भड़काने का मामला दर्ज कर जाँच शुरू की है।

खल्फी ने कहा, “मस्जिद ने पुलिस को कम-से-कम प्रदर्शन को किसी अन्य स्थान पर लेने का सुझाव दिया था, जो कि कानून द्वारा संभव है, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं करने का फैसला किया।” खल्फी के अनुसार, हर साल ईद समारोह के लिए स्टॉकहोम की मस्जिद में 10,000 से अधिक आगंतुक आते हैं।

तुर्किये के विदेश मंत्री हाकन फ़िदान ने एक ट्वीट में इस घटना की निंदा की और कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इस्लाम विरोधी प्रदर्शन की अनुमति देना स्वीकार्य नहीं है। वहीं, अमेरिकी विदेश विभाग के उप प्रवक्ता ने वेदांत पटेल ने कहा कि धार्मिक ग्रंथों को जलाना अपमानजनक और दुखद है। उन्होंने कहा, “जो कानूनी हो सकता है, वह जरूरी नहीं कि निश्चित रूप से उचित हो।”

इस घटना को लेकर स्वीडन के प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टरसन ने कहा कि अब वह इस बारे में अटकलें नहीं लगाएँगे कि कुरान का विरोध स्वीडन को नाटो (NATO) में शामिल होने की प्रक्रिया में कैसे रोड़ा बन सकता है। उन्होंने कहा, “यह कानूनी है, लेकिन उचित नहीं है।” प्रधानमंत्री ने कहा कि कुरान जलाने पर निर्णय लेना पुलिस का काम है।

दरअसल, स्वीडन NATO का सदस्य बनने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उसका इकलौता मुस्लिम सदस्य देश तुर्किये इसमें बाधा डालते रहता है। NATO का नियम है कि इसमें कोई भी नया सदस्य तभी शामिल किया जा सकता है, जब उसमें सभी सदस्य देशों की सहमति हो।

इस साल जनवरी के अंत में तुर्किये ने नाटो आवेदन पर स्वीडन के साथ बातचीत को निलंबित कर दिया था, क्योंकि एक दक्षिणपंथी डेनिश ने स्टॉकहोम में तुर्किये दूतावास के पास कुरान की प्रति जला दी थी। इसके कारण मुस्लिम देशों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। इस्लामी मुल्क स्वीडन के झंडे जलाए गए थे।

कुरान जलाने की घटनाएँ सिर्फ स्वीडेन में ही नहीं, बल्कि यूरोपीय देश डेनमार्क और नीदरलैंड में भी कुरान जलाने की कई घटनाएँ सामने आ चुकी हैं। इस साल जनवरी में स्वीडन के बाद नीदरलैंड में कुरान जलाया गया था। इसके बाद डेनमार्क में भी इसे दोहराया गया।

स्वीडन उत्तरी यूरोप में स्थित एक देश है, जो स्कैन्डिनेवियाई प्रायद्वीप में स्थित है। इसकी सीमाएँ नॉर्वे, फ़िनलैंड और डेनमार्क से लगती हैं। 1.1 करोड़ की जनसंख्या वाले इस देश के 52% लोग ‘चर्च ऑफ स्वीडन’ में आस्था रखते हैं। वहीं 8% जनसंख्या मुस्लिम है।

दरअसल, तुर्किये स्वीडन पर कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी (PKK) से संबंध होने का आरोप लगाता है। इसके साथ ही वह स्वीडन से इस संगठन के नेता मौलवी फतुल्लाह गुलेन के प्रत्यर्पण की माँग कर रहा है। कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी तुर्किये से अलग कुर्दों के लिए मुल्क की माँग करती है।

अलग देश के लिए कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी के सशस्त्र आंदोलन को तुर्किये आतंकवादी गतिविधि कहता है। तुर्किये ने इस संगठन को आतंकवादी संगठन के रूप में नामित किया है। तुर्किये के अलावा, यूरोपीय संघ और अमेरिका ने भी उसे आतंकी संगठन घोषित कर रखा है।

अवलोकन करें:-

स्वीडन : फाड़ी और जलाई जाएगी कुरान, वो भी मस्जिद के सामने: कोर्ट और पुलिस ने दे दी है अनुमति

तुर्किये का कहना है कि PKK के खिलाफ स्वीडन संतोषजनक कार्रवाई नहीं कर रहा है। वहीं, स्वीडन में लोग कुर्द और PKK के समर्थन में हैं। इसको लेकर दोनों देशों के बीच रिश्ते तल्ख रहते हैं और तुर्किये यूरोपीय देश स्वीडन को NATO का सदस्य बनने से रोकता है। इनमें कुरान जलाने की घटनाएँ और तल्खी पैदा करती हैं।

डेनमार्क : रमजान में फिर जलाई गई कुरान, तुर्की के झंडे में आग भी लगाई: इस्लामी देश भड़के

                                                                                                                       फोटो साभारः CBC
यूरोपीय देश डेनमार्क में एक बार फिर कुरान जलाने की घटना सामने आई है। इससे पहले इसी साल जनवरी में भी यहाँ कुरान जलाई गई थी। कुरान जलाने वाले लोगों ने तुर्की का झंडा भी जलाया। तुर्की, सऊदी अरब, पाकिस्तान, जॉर्डन समेत कई इस्लामिक देशों ने इस घटना की निंदा की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ‘पैट्रियटर्न गेर’ नामक संगठन ने शुक्रवार (24 मार्च 2023) को डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन में तुर्की दूतावास के सामने कुरान जलाने की इस घटना को अंजाम दिया। यही नहीं इन लोगों ने तुर्की के झंडे को भी जलाया है। संगठन ने इस पूरी घटना को अपने फेसबुक पेज पर भी लाइव किया।

कुरान जलाने की घटना सामने आने के बाद से इस्लामिक देश बौखलाए हुए हैं। इसको लेकर तुर्की के विदेश मंत्रालय ने कहा है, “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में इस तरह की घटना को स्वीकार नहीं किया जाएगा। रमजान के पवित्र इस्लामी महीने में किए गए इस कृत्य से एक बार फिर स्पष्ट रूप से पता चला है कि यूरोप में इस्लामोफोबिया, भेदभाव और जेनोफोबिया खतरनाक स्तर पर पहुँच गया है। पहले की घटनाओं से इन लोगों ने कोई सीख नहीं ली।”

वहीं, सऊदी अरब के विदेश मंत्रालय ने कहा है, “कोपेनहेगन में तुर्की के दूतावास के सामने एक संगठन द्वारा पवित्र कुरान को जलाने की हम कड़ी निंदा करते हैं। सऊदी अरब बातचीत, सहिष्णुता और सम्मान के मूल्यों को मजबूत करने की जरूरत पर बल देता है। नफरत और उग्रवाद को हम अस्वीकार करते हैं।”

जॉर्डन के विदेश मंत्रालय ने कहा है, “यह घटना किसी भी तरह से स्वीकार नहीं किया जाएगा। रमजान के पवित्र महीने में यह नस्लवादी और मुस्लिमों को भड़काने वाला काम है। इस घटना ने न केवल हिंसा को उकसाया है बल्कि महजब का भी अपमान किया है।”

कतर ने भी इस घटना की निंदा करते हुए कहा है कि रमजान के महीने में कुरान को जलाने की इस घटना ने पूरी दुनिया के दो अरब से भी अधिक मुस्लिमों को उकसा दिया है।

वहीं, पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मुमताज जाहरा बलोच ने एक बयान में कहा है, “इस तरह की घटनाएँ जानबूझकर की जा रही हैं। बार-बार हो रही ऐसी घटना मुस्लिमों और उनकी आस्था के खिलाफ बढ़ती नफरत, नस्लवाद और इस्लामोफोबिया का उदाहरण है। इसके अलावा, संयुक्त अरब अमीरात, मोरक्को, बहरीन समेत कुछ अन्य इस्लामिक देशों ने इसकी निंदा की है।

जनवरी में भी जलाई गई थी कुरान

इससे पहले डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन और स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में स्थित तुर्की दूतावास के सामने इसी साल जनवरी में कुरान जलाने की घटना सामने आई थी। कुरान जलाने वाले व्यक्ति की पहचान रासमस पलुदान के रूप में हुई थी। पलुदान के पास डेनमार्क और स्वीडन दोनों देशों की नागरिकता है। दोनों ही देश पड़ोसी हैं। इसलिए वह आसानी से दोनों में जाकर इस घटना को अंजाम दिया था।

भूकंप के बाद तुर्की के लोगों में आक्रोश : ‘सीरिया वाले शरणार्थियों को बाहर निकालो, ये लूट रहे हमारी घरें-दुकानें’

                           तुर्कों ने सीरियाई लोगों पर भूकंप के बाद दुकानों को लूटने का आरोप लगाया
तुर्की (Turkey) और सीरिया (Syria) में हाल ही में आए भूकंप से हजारों लोगों की मौत हो गई है और मृतकों का आँकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। दूसरी ओर तुर्की में लाखों सीरियाई शरणार्थियों के प्रति तुर्कों के बीच नाराजगी भी बढ़ती जा रही है। कुछ लोग सीरियाई शरणार्थियों पर अराजकता और तबाही के बीच लूटपाट का आरोप लगा रहे हैं।

यही वजह है कि एक मुस्लिम-बहुसंख्यक देश तुर्की में सीरियाई लोगों के खिलाफ घृणा के मामले बढ़ रहे हैं। समाचार एजेंसी रॉयटर्स में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, भूकंप प्रभावित कस्बों और शहरों में, कुछ तुर्कों ने सीरियाई लोगों पर क्षतिग्रस्त दुकानों और घरों से चोरी करने का आरोप लगाया है। ट्विटर पर सीरियाई विरोधी स्लोगन ट्रेंड कर रहा है। तुर्क लोग ‘हम सीरियाई नहीं चाहते हैं’, ‘अप्रवासियों को वापस भेजो’, ‘अब कोई स्वागत नहीं’ जैसे स्लोगन को ट्रेड करवा रहे हैं। 

रिपोर्ट के मुताबिक आपातकालीन शिविरों में शरण लिए हुए सीरियाई भूकंप पीड़ितों को कथित तौर पर आश्रय शिविरों से बाहर निकाल दिया गया है। एक सीरियाई व्यक्ति ने मेर्सिन शहर में अपने हमवतन लोगों के लिए विशेष रूप से आश्रय स्थापित किया था, उसे भी तुर्को द्वारा नस्लवादी टिप्पणी का सामना करना पड़ा। 

नाम न बताने की शर्त पर एक सीरियाई व्यक्ति ने अफसोस जताते हुए कहा कि अरबी बोले जाने पर लोग उनपर चिल्लाने लगते हैं। इसलिए, उन्होंने बचाव स्थलों पर जाना बंद कर दिया है। उन्होंने आगे कहा कि लोग कलह पैदा करने के लिए लगातार उन पर लूटपाट का आरोप लगाते हैं।

तुर्की और सीरिया में भूकंप के कारण मरने वालों की आधिकारिक संख्या 37,000 से अधिक हो गई है। मृतकों की संख्या बढ़ने की आशँका है। स्थानीय निवासियों और सहायता सहायता कर्मियों के अनुसार हजारों विस्थापितों को भोजन और आपातकालीन आश्रय प्रदान करने में कई क्षेत्रों में कई दिनों की देरी हुई है। इसके अलावा, लूटपाट की खबरें आई हैं। कुछ विदेशी सहायता टीमों ने बिगड़ती सुरक्षा स्थिति के कारण अस्थायी रूप से अपने काम को रोक दिया है।

तुर्की के न्याय मंत्री ने घोषणा कर कहा है कि कानून प्रवर्तन अधिकारियों ने लूटपाट के आरोप में 48 लोगों को बिना पहचान के आधार पर गिरफ्तार किया है। राष्ट्रपति तैयप एर्दोगन (Recep Tayyip Erdoğan) ने लुटेरों से सख्ती से निपटने का संकल्प लिया है।

2011 में सीरिया में गृहयुद्ध छिड़ने के बाद से तुर्की ने लगभग 40 लाख सीरियाई शरणार्थियों को अपने यहाँ शरण दी और उन्हें घर उपलब्ध कराया है। इनमें से अधिकांश शरणार्थी देश के दक्षिण में सीरियाई सीमा के पास रहते हैं। गज़ियान्तेप (Gaziantep) शहर भूकंप से बुरी तरह प्रभावित हुआ है और यहाँ लगभग 500,000 सीरियाई लोग रहते हैं, जो आबादी का 25% है।

हालाँकि, सीरियाई लोगों के प्रति आक्रोश कोई नई घटना नहीं है, वो बात अलग है कि भूकंप ने मौजूदा तनाव को बढ़ा दिया है। ताजा मामले अरब दुनिया के देशों के बीच मौजूद मतभेदों को रेखांकित करते हैं, भले ही वे इस्लाम के बैनर तले एकता का दिखावा करते रहे हों।

यहाँ तक कि तुर्की गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा है, इसने सीरियाई शरणार्थियों पर पिछले एक दशक में 40 अरब डॉलर से अधिक खर्च किया है। कुछ तुर्की लोग सीरियाई लोगों को सस्ते मजदूर मानते हैं जिन्होंने नौकरियों पर कब्जा कर लिया है और सेवाओं का इस्तेमाल किया है।

स्वीडन : रहने के लिए कोई और जगह देखें मुस्लिम… तुर्की दूतावास के सामने खुलेआम जलाया गया कुरान

                                    स्वीडन के दक्षिणपंथी नेता पलुदान (साभार: EPA/Guardian)
एक दूसरे के धूर विरोधी तुर्की और स्वीडन के बीच इस बार कुरान को लेकर विवाद गहरा गया है। NATO में स्वीडन को शामिल करने के बीच तुर्की बाधा बना हुआ है। इस बीच स्वीडन में कुरान जलाने के बाद तुर्की और स्वीडन के रिश्ते में और कड़वाहट आ गई है। तुर्की ने स्वीडन के रक्षा मंत्री की यात्रा को रद्द कर दिया है।

स्वीडन के धुर दक्षिणपंथी पार्टी ‘हार्ड लाइन’ के नेता रासमस पलुदान (Hard Line Leader Rasmus Paludan) ने  21 जनवरी 2023 तो स्टॉहोम में तुर्की के दूतावास के सामने मुस्लिमों की दीनी किताब कुरान को सार्वजनिक तौर पर जलाया। इतना ही नहीं, इस दौरान पलुदान ने इस्लाम और आव्रजन को लेकर एक घंटे तक भाषण भी दिया।

लगभग 100 लोगों की भीड़ को संबोधित करते हुए पलुदान ने कहा, “अगर आपको (मुस्लिमों को) लगता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं होनी चाहिए तो आप रहने के लिए कोई और जगह देखिए।” उन्होंने इस्लाम से स्थानीय लोगों को होने वाली दिक्कत के बारे में बात की।

दरअसल, तुर्की के दूतावास के सामने इस प्रदर्शन के लिए पलुदान ने बकायदा पुलिस से परमीशन ली थी। पुलिस ने ना सिर्फ अनुमति दी, बल्कि प्रदर्शन स्थल पर पलुदान और अन्य प्रदर्शनकारियों को सुरक्षा भी दी थी। प्रदर्शन के दौरान पलुदान ने लाइटर से कुरान को जलाया।

प्रदर्शन से एक दिन पहले पुलिस द्वारा अनुमति देने के कारण तुर्की बिफर गया था। उसने स्वीडन के राजदूत को समन भेज कर तलब कर लिया था। तुर्की ने राजदूत से कहा कि पलुदान को प्रदर्शन की अनुमति क्यों दी गई। इस महीने में तुर्की ने दो बार तलब किया। इसके पहले 12 जनवरी को स्वीडन में तुर्की के राष्ट्रपति रेचप तैयब आर्दोआन का पुतला जलाने पर स्वीडन के राजदूत को समन भेजा गया था।

बता दें कि पलुदान पिछले साल मई में कुरान जलाओ यात्रा शुरू की थी। इस दौरान उन्होंने स्वीडिश लोगों से इसे जलाने का आग्रह किया था। इसके बाद पूरे स्वीडन में दंगे फैल गए थे। इस दंगे में कई लोगों की मौत हो गई थी। इतना ही नहीं तुर्की और पाकिस्तान स्वीडन से नाराज हो गए थे।

21 जनवरी को पलुदान द्वारा तुर्की के दूतावास के सामने कुरान जलाने के बाद तुर्की ने स्वीडन के रक्षा मंत्री की प्रस्तावित तुर्की यात्रा को रद्द कर दिया। स्वीडन के रक्षामंत्री पाल जॉनसन 27 जनवरी 2023 को तुर्की आने वाले थे।

इस यात्रा के दौरान जॉनसन स्वीडन के NATO में प्रवेश पर तुर्की द्वारा रोक लगाने को लेकर चर्चा करने वाले थे। दरअसल, स्वीडन अमेरिका और पश्चिमी देशों के सैन्य संगठन NATO में शामिल होना चाहता है, लेकिन तुर्की बार-बार इसमें बाधा डाल देता है। NATO का नियम है कि इसमें कोई भी नया सदस्य तभी शामिल किया जा सकता है, जब उसमें सभी सदस्य देशों की सहमति शामिल हो।

कुरान जलाने की हालिया घटना के बाद तुर्की के रक्षामंत्री हुलुसी अकार ने कहा कि इस बैठक को इसलिए रद्द कर दिया गया, क्योंकि इसने अपना महत्व और अर्थ खो दिया था। तुर्की ने इसे हेट क्राइम और इस्लामोफोबिया बताया। तुर्की के अलावा कुरान जलाने की घटना की पाकिस्तान, सऊदी अरब, जॉर्डन और कुवैत ने भी निंदा की।

वहीं, स्वीडन की सरकार ने इस प्रदर्शन से खुद को अलग रखा है। स्वीडिश सरकार का कहना है कि देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विशेष महत्व है। स्वीडन के रक्षामंत्री जॉनसन ने उम्मीद जताई है कि दोनों देशों के बीच फिर से एक बार बातचीत होगी दोनों देश सामरिक मसले पर चर्चा कर सकेंगे।

तुर्की ना सिर्फ स्वीडन को NATO सदस्य बनने से रोक रहा है, बल्कि फिनलैंड को भी वह संगठन की सदस्यता नहीं लेने दे रहा है। 30 सदस्यों वाले NATO के 28 सदस्यों का इन्हें समर्थन मिल चुका है। सिर्फ हंगारी और तुर्की ही दोनों देशों को समर्थन नहीं दे रहे हैं। हालाँकि, हंगरी ने स्पष्ट कर दिया है कि वह दोनों को समर्थन देगा। हालाँकि, तुर्की ऐसा कोई वादा नहीं कर रहा है।

दरअसल, तुर्की स्वीडन पर कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी (PKK) से संबंध होने का आरोप लगाता है। इसके साथ ही वह स्वीडन से इस संगठन के नेता मौलवी फतुल्लाह गुलेन के प्रत्यर्पण की माँग कर रहा है। कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी तुर्की से अलग कुर्दों के लिए मुल्क की माँग करती है।

अलग देश के लिए कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी के सशस्त्र आंदोलन को तुर्की आतंकवादी गतिविधि कहता है। तुर्की ने इस संगठन को आतंकवादी संगठन के रूप में नामित किया है। तुर्की के अलावा, यूरोपीय संघ और अमेरिका ने भी उसे आतंकी संगठन घोषित कर रखा है।

तुर्की का कहना है कि PKK के खिलाफ स्वीडन संतोषजनक कार्रवाई नहीं कर रहा है। वहीं, स्वीडन में कुर्द और PKK के समर्थन में लोग सड़कों पर निकल आए, जबकि तुर्की में लोग स्वीडन में कुरान जलाने की घटना के बाद सड़कों पर हैं।

तुर्की : शाकाहारी बनो, मांस कम खाओ: आर्थिक संकट पर सांसद

“हर महीने 1-2 किलो मांस खाने के बजाय, आधा किलो खाओ। हम 2 किलो टमाटर खरीदते हैं, उनमें से आधे कूड़ेदान में चले जाते हैं। अब से सिर्फ 2 टमाटर खरीदो।”

तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआँ (Erdogan) की पार्टी के सांसद ज़ुल्फ़ु डेमिरबाग (Zülfü Demirbağ) ने यह बात कही है। कारण है – तुर्की की मुद्रा लीरा के मूल्यांकन का अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में पतन और पूरे देश पर छाए घरघोर आर्थिक संकट के बादल।

सत्ता पार्टी का एक सांसद जब 2 टमाटर खरीदने की बात कह रहा है तो यह जानना भी उतना ही जरूरी है कि वहाँ के विपक्षी सांसद क्या कह रहे हैं। मुख्य विपक्षी रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी के प्रवक्ता फैक ओज़्ट्रैक (Faik Öztrak) ने पूरे देश के लोगों पर लादे गए आर्थिक संकट का मजाक उड़ाने के लिए सांसद ज़ुल्फ़ु डेमिरबाग को लताड़ते हुए कहा:

“कुछ तो शर्म कीजिए! लोग रोटी नहीं खरीद पा रहे और आप सब्जियों की बात कर रहे। सत्ता में बैठे लोगों के पास अब शर्म भी नहीं बची है, लोगों का मजाक उड़ा रहे हैं।”

तुर्की की सरकार ने अपने देश की मुद्रा के पतन और उसके कारण खाद्य सामग्रियों की कीमतों में हो रही बेतहाशा वृद्धि का सामना करने के लिए अपने नागरिकों को शाकाहार का सेवन करने का अनुरोध किया है। साथ ही मांसाहार के कम से कम सेवन करने का भी मैसेज सरकार की ओर से दिया जा रहा है।

तुर्की में आई आर्थिक मंदी की बात करें तो वहाँ की मुद्रा लीरा अपने ऐतिहासिक निम्न स्तर पर पहुँच गई है। CNBC की रिपोर्ट के अनुसार, तुर्की में मँहगाई दर 20% के करीब है। इस वजह से वहाँ जरूरी वस्तुओं की कीमतें आसमान छू रही हैं।

तुर्की में आर्थिक मंदी की शुरुआत

इस साल नवंबर की शुरुआत से लेकर अब तक डॉलर के मुकाबले वहाँ की मुद्रा लीरा में 20% से ज्यादा की गिरावट आई है। इस सब की शुरुआत राष्ट्रपति एर्दोआँ (Erdogan) द्वारा “स्वतंत्रता के लिए आर्थिक युद्ध (economic war of independence)” की घोषणा के बाद से हुई। तेजी से गिरती अर्थव्यवस्था से निपटने के बजाय राष्ट्रपति एर्दोआँ ने आगे भी दरों में कटौती करने के संकेत दिए हैं।
भयंकर आर्थिक मंदी के बीच अंतरराष्ट्रीय कंपनी ऐपल ने इसी सप्ताह तुर्की में ऑनलाइन बिक्री रोक दी। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि वहाँ की मुद्रा 11, 12 और फिर 13 डॉलर की सीमा से गिर गई, जिससे उत्पादकों के लिए अपने उत्पादों की कीमत तय करना असंभव हो गया।

तुर्की में मुस्लिम बहुसंख्यक

तुर्की बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी वाला देश है। हालाँकि यह खुद को धर्मनिरपेक्ष देश मानता/कहता है। एक तथ्य यहाँ के लिए आश्चर्यजनक है। यहाँ जन्म लिया कोई भी बच्चा पैदा होते ही ‘मुस्लिम’ के रूप में सूचीबद्ध कर लिया जाता है। मुस्लिम ही उस बच्चे की राष्ट्रीय पहचान पत्र पर अंकित किया जाता है एक नागरिक के तौर पर। अगर किसी के माता-पिता ने अपने बच्चे के लिए उन्हें संवैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त अल्पसंख्यक धर्म में पंजीकृत नहीं किया हो तो तुर्की में पैदा हुआ हर बच्चा मुस्लिम है।

तुर्की : बलात्कारी मुस्लिम उपदेशक अदनान ओकतार को हुई 1075 साल की जेल

                                       तुर्की के इस्लामी नेता अदनान ओकतार को 1075 साल की जेल
तुर्की में अदनान ओकतार नामक एक मुस्लिम नेता को इस्ताम्बुल की अदालत ने 1075 वर्षों के कड़े कारावास की सज़ा सुनाई है। मजहबी उपदेशक अदनान अपनी 1000 गर्लफ्रेंड्स के साथ ज़िंदगी बिता रहा था। हालाँकि, उनमें से अधिकतर महिलाओं ने उस पर बलात्कार और जबरन सम्बन्ध बनाने के आरोप लगाए हैं। वो तुर्की में मुस्लिमों के एक पंथ का मजहबी मुखिया है। यौन शोषण से लेकर देशविरोधी जासूसी तक, पिछले 1.5 वर्ष से उस पर ये मामले चल रहे थे।

अदनान ओकतार महिलाओं का सार्वजनिक रूप से भी सम्मान नहीं करता था और उनके लिए ‘बिल्लियाँ’ शब्द का इस्तेमाल करता था। अब तक उसके 236 अनुयायियों को भी गिरफ्तार किया जा चुका है और उसके संगठन को भी प्रतिबंधित कर दिया गया है। उसके खिलाफ सैन्य जासूसी, प्रताड़ना, अपहरण, फोन टैपिंग, धोखाधड़ी, धमकी, हत्या का प्रयास, जालसाजी और यौन शोषण के आरोप भरे पड़े हैं।

अदनान ओकतार को प्लास्टिक सर्जरी कराई हुई महिलाओं के साथ टीवी शोज में डांस करना भी खासा पसंद था। सुनवाई के दौरान उसके खिलाफ एक के बाद एक कई शॉकिंग डिटेल्स सामने आए। छापेमारी के दौरान उसके घर से 69,000 गर्भ-निरोधक गोलियाँ निकलीं। उसने खुद ही जज को बताया था कि उसकी 1000 गर्लफ्रेंड्स हैं। उसने अदालत को यह भी बताया था कि महिलाओं के दिल में उसके दिल में लगातार प्यार उमड़ता रहता है और एक मुस्लिम की यही तो खूबी है।

उसने इसे ‘प्यार’ नाम देते हुए कहा था कि मनुष्य के लिए ये सबसे खास होता है। वो कहता था कि उसके पास बाप बनने की असाधारण क्षमता है। अदनान का ‘N9’ नाम का टीवी चैनल भी चलता है और वह कई सेक्स स्कैंडल्स में भी लिप्त रहा है। महिलाओं ने बताया कि अदनान ओकतार ने कई महिलाओं का यौन शोषण कर के जबरन गर्भ-निरोधक गोलियाँ खिलाई हैं। तुर्की के कई अन्य मजहबी नेताओं ने उसकी निंदा की थी।

नाबालिगों के साथ भी अदनान ने बलात्कार किया था। तुर्की में इसके गैंग के लोग सबसे पहले किसी सुन्दर युवती को फाँसते थे और फिर उसके साथ रेप कर के उसे कहते थे कि इसका वीडियो रिकॉर्ड कर लिया गया है। फिर ब्लैकमेल कर के इस्लाम को लेकर उन महिलाओं को उलटी-सीधी शिक्षाएँ दी जाती थीं। 1980 के दशक में कुछ अमीर अनुयायियों को उसने लुभाया था। वो यूनिवर्सिटी ड्रॉपआउट भी है। प्रासीक्यूटर ने बताया कि भारी मेकअप वाली महिलाओं को लेकर वो पागल था। 

तुर्की : 1500 साल से था कैथेड्रल, 2020 में बना ​दी मस्जिद में बुर्के में न्यूड फोटो शूट पर मॉडल को हो सकती है जेल

                मारिसा पापेन को हो सकती है 7 साल की जेल (साभार: Jesse Walker for ENKI Eyewear)
तुर्की की हागिया सोफिया (Hagia Sophia) हाल में काफी चर्चा में रही है। इस्तांबुल में स्थित 1500 साल पुराने ऑर्थोडॉक्स क्रिश्चियन कैथेड्रल को इसी साल 
मस्जिद में बदल दिया गया था। कुछ जानकारों का मानना है कि इसकी वजह से ही केरल के हालिया स्थानीय चुनावों में वामपंथी पार्टियों को जीत भी मिली है। अब खबर आ रही है कि हागिया सोफिया के सामने न्यूड फोटो शूट कराने वाली प्लेबॉय मॉडल मारिसा पापेन को सात साल जेल की सजा हो सकती है।

मारिसा पापेन ने हागिया सोफिया के दरवाजे पर खड़े होकर न्यूड फोटो शूट कराया था। इसके अलावा उसने तुर्की के झंडे पर नग्न लेटकर फोटशूट करवाया था। इसकी बहुत से लोगों ने निंदा की थी। यह वाकया साल 2018 का है।

‘द सन’ के अनुसार, उन पर तुर्की के अभियोजकों द्वारा ‘राज्य की संप्रभुता के संकेतों का अपमान करने’ का आरोप लगाया गया है, जिन्होंने ‘भड़कीले कृत्यों’ और ‘अश्लील’ तस्वीरों की ब्रांडिंग की है। मारिसा पापेन कथित तौर पर हैरान हैं कि तुर्की के अधिकारी तस्वीरों के लिए उनके पीछे पड़े हैं।

मारिसा ने हाल ही में  ‘नेक्ड एटलस’ नाम की अपनी वेबसाइट लॉन्च की। जिसके बाद ये मामला गरमा गया है। वेबसाइट में वे सभी देश शामिल हैं जहाँ मारिसा पापेन ने नग्न तस्वीरें खींची हैं। उसने दुनिया भर में प्रतिष्ठित संरचनाओं के सामने नग्न होकर फोटोशूट करवाया। 

मारिसा ने इस्तानबुल की मशहूर हागिया सोफाया मस्जिद के दरवाजे पर खड़े होकर भी एक न्यूड फोटो लिया था। यह उल्लेख करना उचित है कि जब हागिया सोफिया ने यह किया था वह एक मस्जिद नहीं थी

इस फोटो पर सोशल मीडिया में काफी हंगामा हुआ। इसके बाद तुर्की प्रशासन ने मारिसा को एक नोटिस भेजकर सफाई माँगी थी। मारिसा ने सिर्फ मस्जिद ही नहीं कैपाडोशिया वैली और अन्य कई जगहों पर भी ऐसी तस्वीरें लीं थीं।

बेल्जियम की मॉडल को 2018 में वेटिकन के सामने न्यूड पोज देने के लिए भी गिरफ्तार किया गया था। मिस्र में कुक्सर के कर्णक मंदिर में उसे इसी कारण से गिरफ्तार किया गया था। इसके अलावा उसने यरुशलम की सेलिंग वॉल के पास नग्न पोज दिया, जिसकी वजह से वहाँ के लोगों में नाराजगी देखने को मिली।

लेकिन इसने उसके दुनिया भर में न्यूड पोज़ देने के उसके उत्साह को कम नहीं किया। द सन ऑनलाइन के साथ एक साक्षात्कार में उसने कहा, “यह स्वतंत्रता के लिए एक चीख है। मैं ऐसे समय में वापस जाना चाहती हूँ जब महिलाएँ रानियाँ थीं। इसलिए मैं उन सभी देशों में जाना चाहती हूँ जहाँ महिलाओं का दमन होता है। जैसा कि मैंने कहा कि यह स्वतंत्रता के लिए एक चीख है और मैं चाहती हूँ कि वे मेरा मैसेज देखें।”

‘मैं एर्दोआँ को सबक सिखाऊँगा, तुर्की को कीमत चुकानी पड़ेगी’ – जो बायडेन

जो बायडेन ने की थी एर्दोआँ को सबक सिखाने की बात

द एसोसिएटेड प्रेस, एनबीसी न्यूज़ और अन्य समाचार आउटलेट्स के अनुमानों के अनुसार डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जो बिडेन ने 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में राष्ट्रपति ट्रम्प को हराया है, उन्हें 270 इलेक्टोरल कॉलेज वोट हासिल हुए है। शनिवार को एक जीत भाषण में बिडेन ने कहा: “मैं एक राष्ट्रपति बनने की प्रतिज्ञा करता हूं जो विभाजन नहीं करना चाहता है, लेकिन एकीकरण करता है। जो लाल राज्यों और नीले राज्यों को नहीं देखता है, वह केवल संयुक्त राज्य को देखता है।” ट्रम्प ने एक बयान भी जारी किया: “साधारण तथ्य यह है कि यह चुनाव खत्म हो गया है। द न्यू यॉर्क टाइम्स के अनुसार, चुनाव के दिन से ट्रम्प अभियान ने युद्ध के मैदानों में “लगभग एक दर्जन” मुकदमे दायर किए हैं।

कमला हैरिस इतिहास में पहली महिला, अश्वेत और एशियाई अमेरिकी उपराष्ट्रपति का चुनाव करती हैं। 56 वर्षीय हैरिस, भारत और जमैका के प्रवासियों की बेटी हैं।राष्ट्रपति-चुनाव जो बिडेन ने शनिवार को काले मतदाताओं को धन्यवाद दिया, जो व्हाइट हाउस में उनके नामांकन और चुनाव की कुंजी थे।डेमोक्रेटिक नामांकन के लिए बिडेन के ठोकर अभियान को दक्षिण कैरोलिना में मुख्य रूप से काले मतदाताओं द्वारा जीत के साथ पुनर्जीवित किया गया था। और फिर अफ़्रीकी-अमेरिकी समर्थन इस सप्ताह विस्कॉन्सिन, मिशिगन और पेंसिल्वेनिया में संकीर्ण जीत में महत्वपूर्ण थे। पूरे देश में कई दिनों के तनावपूर्ण मतदान के बाद, राष्ट्रपति-चुनाव जो बिडेन और उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस दोनों ने शनिवार रात अपने भाषणों में मतदान कर्मियों को धन्यवाद दिया।

जहाँ एक तरफ लिबरल जमात जो बायडेन के अमेरिकी राष्ट्रपति चुने जाने से खुश है, वहीं दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का कहना है कि इससे आतंकवाद को लेकर अमेरिका के रुख में शायद ही कोई बदलाव आएगा। इसका कारण है दुनिया में नया खलीफा बनने चले तुर्की को लेकर उनका रुख। जो बायडेन ने तुर्की को लेकर कहा था कि वो एक ‘असली समस्या’ है और इसे लेकर वो उसे सख्त हिदायत जारी करते।

जो बायडेन ने कहा था कि वो तुर्की को सबक सिखाते, भले ही इसके लिए उन्हें ‘सिचुएशन रूम’ में हजारों घंटे ही क्यों न व्यतीत करना पड़े या फिर सीरिया या ईराक में स्थिति सुधारने के लिए क्यों न कुछ भी करना पड़े। चुनाव प्रचार के समय ही उन्होंने साफ़ कर दिया था कि वो तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआँ (Erdogan) से बात कर उन्हें चेता देते कि उन्होंने जो कुछ भी किया है, इसके लिए उन्हें बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।

इधर आर्मेनियन असेंबली ऑफ अमेरिका ने भी जो बायडेन को बधाई देते हुए माँग की है कि अमेरिका में अजरबैजान और तुर्की के प्रभाव को लेकर जाँच बिठाई जाए। उसने ISIS के साथ तुर्की के गठबंधन के इतिहास का जिक्र करते हुए कहा कि क्षेत्र में अशांति के लिए तुर्की ही जिम्मेदार है और उस पर कार्रवाई होनी चाहिए। अमेरिका में आर्मेनिया के नागरिकों ने भी तुर्की पर शिकंजा कसने की माँग की है।

जो बायडेन के इस ट्वीट पर लोगों की प्रक्रियाएं :

वहीं अब तुर्की की राजधानी अंकारा में भी जो बायडेन को लेकर हलचल तेज हो गई है और तुर्की के नेता कह रहे हैं कि वो नए अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ संबंधों को ठीक करने के लिए सारी कोशिशें करेंगे। ‘ग्रीक सिटी टाइम्स’ ने अनुमान लगाया है कि ट्रम्प के साथ तो एर्दोआँ के मित्रता भरे थोड़े-बहुत रिश्ते भी थे, लेकिन अब तुर्की को आशंका है कि नए राष्ट्रपति नई शर्तें लेकर आएँगे, जिससे उसे खासी परेशानी होने वाली है।

तुर्की के विदेश मंत्री का भी कहना है कि डोनाल्ड ट्रम्प के साथ उनके मुल्क के गंभीर रिश्ते थे और अब आगे चुनौती भरा समय होने वाला है। डोनाल्ड ट्रम्प ने तुर्की के खिलाफ लगे कुछ प्रतिबंधों को ढीला कर दिया था, जिन्हें फिर से वापस लाया जा सकता है। साथ ही मध्य-पूर्व में तुर्की के हस्तक्षेप को कम किया जाएगा। तुर्की के ही एक पत्रकार ने स्वीकार किया है कि अब अमेरिकी कॉन्ग्रेस उसके मुल्क के खिलाफ कार्रवाई करेगा।

तुर्की दक्षिण एशियाई देशों में अपना विस्तार करना चाहता है। लेकिन, दूसरी तरफ इस इलाके में सऊदी अरब का प्रभाव किसी से छुपा नहीं है। इसके लिए तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआँ और उनकी सरकार की तरफ से तमाम प्रयास जारी हैं। उसका नतीजा है कि तुर्की ने अपनी छवि बतौर एक रेडिकल इस्लामिक देश स्थापित कर ली है। जुलाई 2020 में तुर्की की सरकार ने बाईज़ानटाईन कैथेद्रल हगिया सोफिया संग्रहालय को मस्जिद में तब्दील कर दिया था। 

FATF में पाकिस्तान के साथ 39 में से मात्र 1 देश तुर्की

भारत में तुष्टिकरण के चलते अपने वोट बैंक की खातिर पाकिस्तान का गुणगान करने वाले नेताओं और पार्टियों को अपनी आंखें खोलनी चाहिए। मोदी सरकार से पूर्व तक भारतीयों को पाकिस्तान का हौवा दिखाया जाता था। पाकिस्तान द्वारा पोषित इस्लामिक आतंकवाद को बचाने हिन्दुओं को "हिन्दू आतंकवाद" और "भगवा आतंकवाद" के नाम से बदनाम करने के ही कारण विश्व इन छद्दम नेताओं की बात नहीं सुनता था, समय बदला, वही मुद्दा आतंकवाद, नई सरकार के नए नेता ने उसी मुद्दे को विश्व पटल पर रखा, दुनिया ने सुनी, मंथन करने को मजबूर हुए, परिणाम आज पाकिस्तान में विश्व में अलग-थलग हो गया।   
‘फायनेंसियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF)’ में 39 में से मात्र एक देश ने पाकिस्तान का समर्थन किया है और वो है तुर्की, जो इस्लामी एकजुटता की बातें करते हुए नया खलीफा बनना चाहता है। एक तुर्की ने ही पाकिस्तान को ‘ग्रे लिस्ट’ से हटाए जाने के लिए वोट किया, बाकी सब ने विरोध किया। हालाँकि, पाकिस्तान ग्रे लिस्ट में बना रहेगा। ये एक नया ‘इस्लामी कट्टरपंथी नेक्सस’ की ओर इशारा कर रहा है, जिसका मसीहा तुर्की होगा।

रेसेप तैयप एर्दोगान के नेतृत्व वाला तुर्की अब पाकिस्तान के साथ मिल कर इस्लामी मुल्कों का एक नया समूह बनाने का प्रयास कर रहा है, जो सऊदी अरब पर निर्भर नहीं होगा। ओटोमन साम्राज्य की तर्ज पर नई इस्लामी धुरी बनाने में जुटे एर्दोगान ने अजरबैजान की भी युद्ध में मदद की और उसके पुराने दुश्मन अर्मेनिया के खिलाफ हथियार उठाने के लिए उसे भड़काया। हालाँकि, रूस ने बीच में पड़ के एक बड़े युद्ध को फ़िलहाल के लिए रोक लिया।

तुर्की के अलावा बाकी सारे देश चाहते थे कि पाकिस्तान ग्रे लिस्ट में बना रहे, क्योंकि वो कई मानकों पर खड़ा नहीं उतरा था और न ही उसने तय मानकों को पूरा करने के लिए कोई प्रयास किया। अब फ़रवरी 2021 में इसकी समीक्षा होनी है। उसने कुल 27 में से 21 मानकों में ही किसी तरह खुद को सही साबित किया। पेरिस में अक्टूबर 21-23 को ये बैठक हुई। हालाँकि, इससे पहले ‘इंटरनेशनल कोऑपरेशन रिव्यू ग्रुप (ICRG)’ की भी बैठक हुई थी।

इस बैठक में तकनीकी रूप से पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट से बाहर करने के लिए सिर्फ सऊदी अरब, तुर्की और चीन ने उसका समर्थन किया था। लेकिन, इसके बाद हुई FATF की पूर्ण बैठक में पाकिस्तान का एक ही साथी रह गया और वो है तुर्की। अंतरराष्ट्रीय मीडिया को आशंका है कि तुर्की दुनिया के कई हिस्सों में हिंसा, तनाव और अस्थिरता को बढ़ावा दे रहा है और इसमें पाकिस्तान उसका साथ दे रहा है।

पाकिस्तान को ISI के जरिए भारत और अफगानिस्तान में आतंकवाद फैलाने का अनुभव है, जिसका सहारा तुर्की ले रहा है। साथ ही वो ईरान और सीरिया से लेकर लीबिया और अजरबैजान में भी अशांति फैलाने के लिए जी-जान से लगा हुआ है। वो पूरे मध्य-पूर्व में अपना दबदबा चाहता है। तुर्की सबसे झगड़ा भी मोल ले रहा है। सीरिया और अजरबैजान के मुद्दे पर वो रूस से भिड़ा हुआ है। शरणार्थियों के मुद्दे पर यूरोप से उसकी नहीं बनती।

अब जम्मू कश्मीर के मामलों पर उलटे-सीधे बयान देकर वो भारत के साथ दुश्मनी बढ़ा रहा है। यहाँ तक कि उसे अमेरिका से भी अपने सम्बन्ध खराब कर लिए हैं, क्योंकि वो भी रूस से हथियार व तकनीक ख़रीदता है। चीन आज दुनिया में बड़ी व्यापारिक शक्ति है लेकिन उसके बीजिंग से भी रिश्ते अच्छे नहीं हैं। पाकिस्तान रक्षा सहयोग के लिए अब तुर्की पर निर्भर होता जा रहा है। साथ ही वो जम्मू कश्मीर व इस्लाम के मामले में समान राग अलापते हैं।

FATF ने इस बात को माना कि पाकिस्तान लश्कर-ए तैयबा के संस्थापक आतंकी हाफिज सईद और जैश-ए-मोहम्मद के सबसे बड़े सरगना मसूद अजहर के खिलाफ कार्रवाई करने में नाकाम रहा।साथ ही आतंकी जकीउर रहमान लखवी के संगठन पर भी उसने कोई कार्रवाई नहीं की। इन तीनों को यूएन ने आतंकी घोषित कर रखा है। भारत ने भी क्रॉस-बॉर्डर आतंकवाद पर पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर घेरना शुरू कर दिया है।

 हाल ही में अभिनेता आमिर खान भी अपने तुर्की दौरे को लेकर चर्चे में आए थे। भारत विरोध का गढ़ बन रहे तुर्की में वे अपनी फिल्म ‘लाल सिंह चड्ढा’ की शूटिंग कर रहे थे। तुर्की की प्रथम महिला एमिनी एर्दोगन से उन्होंने मुलाकात भी की थी। तुर्की की मीडिया का कहना था कि आमिर खान वहाँ की तकनीकी इंफ्रास्ट्रक्चर, सिनेमा के लिए एडवांस फ़ैसिलिटी और वर्कफोर्स कैपेसिटी से खुश हैं। इसे लेकर भारत में उनका विरोध भी हुआ था।

तुर्की : अब चौथी सदी के चर्च को बना दिया मस्जिद

चोरा म्यूजियम
                                                                                                             साभार ट्विटर 
तुर्की में जो कुछ हो रहा है, भारत में धर्म-निरपेक्षता और गंगा-जमुना तहजीब का राग अलापने वालों के लिए आंखें खोलने वाला है। इतिहास कभी लिखा नहीं जाता, दोहराया जाता है, यही हाल मुगलों ने हिन्दू मंदिरों को मस्जिद और दरगाहों में परिवर्तित किया था। 
हागिया सोफिया (Hagia Sophia) के बाद तुर्की सरकार ने अब इस्तांबुल के चोरा म्यूजियम (Chora museum) को मस्जिद में तब्दील करने का आदेश दिया है। राष्ट्रपति का यह फरमान 21 अगस्त को आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित किया गया।
हालिया फरमान के मुताबिक इस साइट को अब धार्मिक मामलों के निदेशालय को स्थांतरित कर दिया गया है और अब इसे एस्टैबिलशमेंट ऐंड ड्यूटीस ऑफ द प्रेसीडेंसी रिलीजियस अफेयर्स कानून के आर्टिकल 35 के अनुसार मुस्लिमों की नमाज के लिए खोला जाएगा।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, म्यूजियम को मस्जिद बनाने का निर्णय साल 2019 में ही ले लिया गया था। लेकिन तुर्की की स्टेट काउंसिल ने इसे कार्यान्वित नहीं किया था। पर, आज वहाँ की सरकार ने यह फरमान निकाल दिया कि चौथी सदी में बनी इस इमारत को मस्जिद बनाया जा रहा है।
चोरा म्यूजियम की पहचान इंटरनेट पर एक चर्च के तौर पर मिलती है। इसे चौथी सदी में बाइजेंटाइन शासकों ने बनवाया था। इस्तांबुल पर ओटोमेन्स ने 1453 पर कब्जा किया और इसे 1511 में मस्जिद बनाया। 434 वर्ष तक इसे मस्जिद माना गया। फिर 1945 में तुर्की सरकार ने इसे म्यूजियम बना दिया।


11 नवंबर, 2019 के अपने निर्णय में, राज्य की परिषद ने निष्कर्ष निकाला कि राष्ट्रीय शिक्षा मंत्रालय को संग्रहालय और संग्रहालय के गोदाम के रूप में उपयोग किए जाने के लिए भवन का आवंटन “कानून के विपरीत है।” वास्तविकता में तो 22 जून, 1965 के चोरा संग्रहालय प्रशासन के एस्टैबिलशमेंट ऐंड ड्यूटीस ऑफ द प्रेसीडेंसी रिलीजियस अफेयर्स कानून के आर्टिकल 35 के अनुसार, इसे नमाज अता करने के लिए खोलने का निर्णय लिया गया था।
इससे पहले पिछले महीने हागिया सोफिया चर्च को तुर्की में मस्जिद में तब्दील करने का फैसला हुआ था। इसके बाद कैथलिक समाज के प्रमुख पोप ने इस फैसले पर अफसोस जताया था और यूनेस्को ने भी इसकी आलोचना की थी।
स्वयं तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तईप एर्दोगन 10 जुलाई को इस्तांबुल में 1500 साल पुराने ऑर्थोडॉक्स क्रिश्चियन कैथेड्रल हागिया सोफिया को मस्जिद में बदलने की घोषणा की थी। उससे पहले तुर्की के एक अदालत ने यह निर्देश दिया था।
इसका इतिहास भी बाइजेंटाइन काल से जुड़ा है। जब इसे सम्राट जस्टिनियन I के आदेश से 537 में एक भव्य चर्च के रूप निर्मित किया गया था। इसे दुनिया का सबसे बड़ा चर्च माना जाता था। 1453 में ओटोमन शासन के दौरान इसे मस्जिद में परिवर्तित कर दिया गया। उससे पहले बाइजेंटाइनों ने इसे सदियों तक संभाला था।
सुल्तान मेहमेद II के कब्जा करने से पहले इस्तांबुल को कॉन्स्टेंटिनोपोल के नाम से जाना जाता था। उसने ही तब गिरजाघर के भीतर जुमे की नमाज शुरू की थी। इसके बाद चार मीनारों को मूल संरचना के साथ में जोड़ा गया था। इतना ही नहीं ईसाई मोज़ेक को इस्लामी चित्रकला के साथ ढक दिया गया था।
इसे 1453 में मॉडर्न तुर्की के संस्थापक केमल अतातुर्क द्वारा एक संग्रहालय का दर्जा दिया गया था। लेकिन, अब यहाँ के सभी चीजों को बदलने की तैयारी की जा रही है। हालाँकि, हागिया सोफिया लंबे समय से मुस्लिम-ईसाई प्रतिद्वंद्विता का प्रतीक रही है।
लगभग 900 वर्षों तक, हागिया सोफिया को पूर्वी ईसाइयों के लिए का तीर्थस्थल माना जाता था। तीर्थ स्थल पर रखे गए कलाकृतियों में ईसा मसीह का मूल क्रॉस भी शामिल था। सदियों से, ईसाई तीर्थयात्री इन सभी वस्तुओं से आत्मिक शांति प्राप्त करते आ रहे हैं।

तुर्की : 1500 साल पुराने चर्च को मस्जिद में बदलने की तैयारी

चर्च तुर्की मस्जिद पहला नमाज
हागिया सोफिया कैथेड्रल (साभार:अरब न्यूज़)
तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तईप एर्दोगन (Recep Tayyip Erdogan) ने 10 जुलाई, 2020 को इस्तांबुल में 1500 साल पुराने ऑर्थोडॉक्स क्रिश्चियन कैथेड्रल हागिया सोफिया को मस्जिद में बदलने की घोषणा की है। तुर्की के एक अदालत ने पहले यह निर्देश दिया था। इससे पहले कैथेड्रल को म्यूजियम में बदलने का निर्देश दिया गया था।
शीर्ष अदालत ने पुराने आदेश को ख़त्म करते हुए चर्च को मस्जिद के रूप में आवंटित करने का निर्देश दे दिया। अदालत ने कहा 1934 में कैबिनेट के फैसले के अनुसार मस्जिद के रूप में इसे उपयोग को समाप्त कर दिया गया था। साथ ही इसे एक संग्रहालय के रूप में परिभाषित किया था। उस समय लिया गया निर्णय कानूनों का अनुपालन नहीं करता था।
रिपोर्ट के अनुसार, एर्दोगन ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा है कि यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल का रूपांतरण तुर्की के ‘संप्रभु अधिकार’ के भीतर ही था। उन्होंने बताया कि हागिया के परिसर के अंदर 24 जुलाई को पहला नमाज पढ़ा जाएगा। इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा कि यह ऐतिहासिक इमारत स्थानीय लोगों और गैर-मुस्लिमों सहित विदेशियों के लिए भी खुला रहेगा। अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया को देखते हुए एर्दोगन ने दावा किया कि जो लोग उसके फैसले से सहमत नहीं हैं, वे तुर्की की संप्रभुता की आलोचना कर रहे है।
कथित तौर पर, हागिया सोफिया में प्रार्थना करने के लिए आह्वान किया गया था। इसके साथ इसे न्यूज़ चैनलों पर प्रसारित किया गया था। वहीं तुर्की के अधिकारियों ने इस बात को स्पष्ट किया कि चर्च के सुनहरे गुंबद पर वर्जिन मैरी के मोज़ाइक को नहीं हटाया जाएगा। यह ऐतिहासिक इमारत हर साल 37 लाख विजिटर्स को आकर्षित करता है।
कंज़र्वेटिव मुस्लिम बैकग्राउंड से आने वाले एर्दोगन का हाथ इस फैसले के पीछे बताया जा रहा है। उन्होंने हाल ही में तुर्की की धर्मनिरपेक्ष परंपराओं को तोड़ने की अध्यक्षता की थी। लोगों का मानना है कि एर्दोगन ने तेजी से बढ़ते इस्लामीकरण के चलते अपने अनुयायियों के कट्टरपंथी विचारों को पूरा करने के लिए राजनीति का फायदा उठाते हुए, इस पूरे घटनाक्रम को अंजाम दिया है।
इस इमारत को बाइजेंटाइन सम्राट जस्टिनियन I के आदेश से 537 में एक भव्य चर्च के रूप निर्मित किया गया था। इसे दुनिया का सबसे बड़ा चर्च माना जाता था। 1453 में ओटोमन शासन के दौरान इसे मस्जिद में परिवर्तित कर दिया गया। उससे पहले बाइजेंटाइनों ने इसे सदियों तक संभाला था।
सुल्तान मेहमेद II के कब्जा करने से पहले इसे इस्ताम्बुल शहर को कॉन्स्टेंटिनोपोल के नाम से जाना जाता था। उसने ही तब गिरजाघर के भीतर जुमे की नमाज शुरू की थी। जिसके बाद चार मीनारों को मूल संरचना के साथ में जोड़ा गया था। इतना ही नहीं ईसाई मोज़ेक को इस्लामी चित्रकला के साथ ढक दिया गया था।
Imageहागिया सोफिया का इतिहास 
इसे 1453 में मॉडर्न तुर्की के संस्थापक केमल अतातुर्क द्वारा एक संग्रहालय का दर्जा दिया गया था। लेकिन, अब यहाँ के सभी चीजों को बदलने की तैयारी की जा रही है। हालाँकि, हागिया सोफिया लंबे समय से मुस्लिम-ईसाई प्रतिद्वंद्विता का प्रतीक रही है।
लगभग 900 वर्षों तक, हागिया सोफिया को पूर्वी ईसाइयों के लिए का तीर्थस्थल माना जाता था। तीर्थ स्थल पर रखे गए कलाकृतियों में ईसा मसीह का मूल क्रॉस भी शामिल था। सदियों से, ईसाई तीर्थयात्री इन सभी वस्तुओं से आत्मिक शांति प्राप्त करते आ रहे हैं।
यूनेस्को ने की भर्त्सना 
1500 साल पुराने चर्च को मस्जिद में बदलने के फैसले को लेकर संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) ने दुख व्यक्त किया है। इसके साथ ही उन्होंने तुर्की से इस मुद्दे पर बातचीत करने का फैसला लिया गया है। उन्होंने तुर्की से विश्व विरासत को संरक्षित करने और परिवर्तन न करने का आग्रह किया। कथित तौर पर, तुर्की के इस फैसले की पूर्वी रूढ़िवादी चर्च, ग्रीस और रूस के चर्च ने भी आलोचना की थी।
गौरतलब है कि केगल अतातुर्क ने जब हागिया सोफिया को संग्रहालय की स्थिति के साथ उसकी धर्मनिरपेक्ष विरासत का पता लगाने की कोशिश की थी, तब एर्दोगन ने उसे इसके लिए धमकी दी थी। खबरों के अनुसार, राष्ट्रपति एर्दोगन ने देश में मुस्लिम कट्टरपंथियों को खुश करने और देश में कोरोनावायरस महामारी के गंभीर स्थिति से सबका ध्यान भटकाने के लिए यह फैसला लिया है।

कश्मीर पर पाक का समर्थन करने वाले तुर्की में कांग्रेस ने खोला दफ्तर

तुर्की में कॉन्ग्रेस
हाल ही में पश्चिमी एशिया में स्थित तुर्की ने जम्मू-कश्मीर मुद्दे पर न सिर्फ़ पाकिस्तान का साथ दिया था, बल्कि भारत के ख़िलाफ़ ज़हर उगला था। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने यूएन में अपने सम्बोधन के दौरान जम्मू-कश्मीर, इस्लाम और पैगम्बर मुहम्मद के बारे में बातें की थी। इसके बाद तुर्की ने पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाया था। 
अब भारत की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने तुर्की में अपना नया दफ्तर खोला है। कांग्रेस की ओवरसीज शाखा ने तुर्की में अपना दफ़्तर खोला है। ऐसे समय में जब तुर्की लगातार भारत की आलोचना कर रहा है, कांग्रेस का वहाँ पर ऑफिस स्थापित करना बहुतों की समझ में नहीं आया।
तुर्की ने जब जम्मू-कश्मीर पर बयान दिया, उसके बाद भारतीय विदेश मंत्रालय भी उसके काट में लग गया। विदेश मंत्रालय ने एक एडवाइजरी जारी कर तुर्की की यात्रा पर जा रहे भारतीयों को सावधानी बरतने की सलाह दी। भारत ने अपने नागरिकों को तुर्की न जाने की सलाह दी। इससे पहले भारत ने रक्षा क्षेत्र में तुर्की के साथ समझौतों में कटौती की, क्योंकि उसने पाकिस्तान का साथ देते हुए भारत के आंतरिक मसले में दखल दिया था। तुर्की ने साइप्रस के एक भू-भाग पर अवैध कब्ज़ा कर रखा है। प्रधानमंत्री मोदी ने साइप्रस की अखंडता और सम्प्रभुता का समर्थन कर तुर्की की काट निकाली।

अनादोलू की एक ख़बर के अनुसार, कांग्रेस पार्टी ने तुर्की में अपना दफ़्तर खोला है। ‘इंडियन ओवरसीज कांग्रेस’ ने एक प्रेस स्टेटमेंट जारी कर इस बात की जानकारी दी। इस्ताम्बुल में स्थापित किए गए इस दफ़्तर में मोहम्मद युसूफ ख़ान नामक व्यक्ति के नेतृत्व में कार्य किया जाएगा। कांग्रेस ने कहा है कि युसूफ ख़ान के नेतृत्व में पार्टी भारत और तुर्की के बीच संबंधों को प्रगाढ़ करते हुए राजनीति, संस्कृति, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यटन के क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच परस्पर सहयोग को बढ़ावा दिया जाएगा।
तुर्की के राष्ट्रपति तैय्यप एर्दोगन ने कहा था कि जम्मू-कश्मीर मसले को तनाव नहीं, बल्कि बातचीत के द्वारा हल किया जाना चाहिए। उन्होंने यह दिखाने की कोशिश की थी कि भारत ने ही जम्मू-कश्मीर में संघर्ष की स्थिति पैदा की है। उन्होंने पूरे दक्षिण एशिया की शांति और समृद्धि को जम्मू-कश्मीर मसले से जोड़ते हुए कहा था कि इस क्षेत्र के शांत हुए बिना शांति मुश्किल है। एर्दोगन बाद में भी अपने बयान से बाज नहीं आए और उन्होंने कहा कि वो कश्मीर मुद्दे को उठाते रहेंगे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तुर्की को घेरने के लिए ग्रीस, साइप्रस और अर्मेनिया के साथ संबंधों को और प्रगाढ़ करना शुरू कर दिया है। ये तीनों ही देश तुर्की के प्रतिद्वंद्वी माने जाते हैं। मोदी ने तुर्की को उसी की भाषा में जवाब देने के लिए इन देशों के राष्ट्राध्यक्षों से भी बात की। ऐसे में कांग्रेस का इस समय वहाँ ऑफिस खोलना सोशल मीडिया में आलोचना का विषय भी बन गया है।

सऊदी अरब, यूएई और तुर्की समेत 134 देशों से बाहर किए गए 519000 पाकिस्तानी

पाकिस्तानी निष्कासितआतंकवाद के पनाहगाह पाकिस्तान को शर्मसार करने वाली एक और खबर सामने आई है। बीते पॉंच साल में 134 मुल्कों से उसके पॉंच लाख से ज्यादा नागरिक बाहर किए गए है। फर्जी दस्तावेजों और आपराधिक मामलों के कारण इनलोगों को बाहर निकाला गया।
पाकिस्तानी गृह मंत्रालय की हालिया रिपोर्ट से यह खुलासा हुआ है। इसके मुताबिक 2014 के बाद से 519,000 पाकिस्तानी नागरिक विभिन्न मुल्कों से निर्वासित किए गए हैं। दिलचस्प यह है कि मुसलमानों का मसीहा बनने की कोशिश कर रहे पाकिस्तान के नागरिक सबसे ज्यादा इस्लामिक मुल्कों से ही निकाले गए। पाकिस्तानियों को बाहर निकालने के मामले में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, ओमान और तुर्की अव्वल हैं।
रिपोर्ट से यह भी पता चला है कि तुर्की और सऊदी अरब के निर्वासित शिविरों में अभी भी कम से कम 65,000 पाकिस्तानी रह रहे हैं। सऊदी पाकिस्तानियों को निकालने में सबसे आगे है। 2014 के बाद से उसने 3,25,000 से अधिक पाकिस्तानियों को निष्कासित किया है। इसी दौरान 52,000 से अधिक पाकिस्तानियों को निष्कासित करके यूएई सूची में दूसरे स्थान पर है। ओमान और तुर्की में अवैध रूप से रह रहे 47,000 पाकिस्तानी पाँच साल के भीतर घर लौटाए गए हैं।
इसी तरह, 2014 से 2019 के बीच 18,312 पाकिस्तानी मलेशिया से, 15,320 ब्रिटेन से, 17,534 ग्रीस से,
15,413 ईरान से, 936 अमेरिका से, 275 चीन से, 445 कनाडा से और 920 जर्मनी से निकाले गए हैं। यूरोपीय देशों ने भी अच्छी-खासी तादाद में अवैध रूप से बस गए पाकिस्तानियों को बाहर किया है। इटली ने 945, फ्रांस ने 845, स्पेन ने 494, बेल्जियम ने 375, नॉर्वे ने 301, ऑस्ट्रिया ने 270, स्वीडन ने 112, नीदरलैंड ने 145, रोमानिया ने 165, स्विटजरलैंड ने 65 और बुल्गारिया ने 175 अप्रवासियों को वापस पाकिस्तान भेजा है।

कथित तौर पर, पाकिस्तानी निर्वासितों की यह बड़ी संख्या, पाकिस्तान में सक्रिय रूप से काम करने वाले मानव तस्करी समूहों का शिकार होती हैं। अब तक, आंतरिक मंत्रालय ने देश में ऐसे 1000 से अधिक समूहों की पहचान की है। मानव तस्कर अक्सर ऐसे लोगों का शिकार करते हैं जो बेहतर जीवन और बेहतर रोज़गार के अवसरों की तलाश में विदेश जाना चाहते हैं।