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भारत-रूस-चीन गठजोड़ से हिला अमेरिकी वर्चस्व, ट्रम्प को दिख रही डी-डॉलराइजेशन की आहट

                                                                                                                   साभार: YT/OpIndiaTV
जब हॉलीवुड की किसी अगली सुपरहिट फिल्म में विलेन कोई इंडियन होगा? जैसे कभी रशियन हुआ करते थे… जैसे कभी नॉर्थ कोरियन या कॉमिक्स और फ़िल्मों में नेगेटिव कैरेक्टर में चायनीज विलेन तो आपने देखें ही होंगे।

आने वाले समय में यही होने वाला है। अमेरिका को जिस भी देश से समस्या होती है, सबसे पहले वो उसके चरित्र पर ही हमला कर माहौल बनाने का प्रयास करता है। और दुनिया के सामने साबित करने की कोशिश करता है कि ये देश या फिर ये नस्ल इतनी बुरी है। और हॉलीवुड के ज़रिए वो ये काम आसानी से करता रहा है।

जैसे जॉन रेम्बो फ़िल्म ही देख लीजिए कि वियतनाम युद्ध में हार के बावजूद, रेम्बो फिल्में अमेरिका को विक्टिम, लेकिन पावरफुल दिखाती है। जबकि वियतनामी, रूसी या अफगानी कैरेक्टर्स को हिंसक और बर्बर दिखाया जाता है। इस तरह की फिल्मों के ज़रिए अमेरिका न सिर्फ़ अपने Wars को या जेनोसाइड को नैतिक रूप से सही और जायज ठहराता है, बल्कि दुश्मन देशों या नस्लों को ‘असभ्य और खतरनाक’ भी साबित करने की कोशिश करता है।

रैम्बो फ़िल्म का थर्ड पार्ट, जब साल 1988 में रिलीज हुआ, तब हॉलीवुड ने अफगान मुजाहिदीन को सोवियत आर्मी के खिलाफ बहादुर और हीरो के रूप में पेश किया, क्योंकि उस समय अमेरिका, अफगान मुजाहिदीन का सोवियत संघ के खिलाफ समर्थन कर रहा था। लेकिन 9/11 के आतंकी हमले के बाद ओसामा बिन लादेन और अल-कायदा के लिए इन हॉलीवुड की कहानी में ट्विस्ट आ गया। इसी हॉलीवुड ने साल 2012 में Zero Dark Thirty जैसी फ़िल्में बनाईं, जहाँ उन्हीं मुजाहिदीनों को आतंकवादी और विलेन के रूप में दिखाया गया।

ये कहानी सिर्फ एक भू-राजनीतिक विश्लेषण नहीं है, ये कहानी उस गठजोड़ की है, जो रीगनॉमिक्स (Reaganomics) से शुरू हुआ और अब RIC यानी, रूस, इंडिया और चीन के एकजुट होने तक पहुँच रहा है। इसमें गलवान की चोट भी है, ‘चाइमेरिका’ का मोहभंग भी… और डी-डॉलराइजेशन (De-dollarization) की दस्तक भी। ये सभी मिलकर के पश्चिमी साम्राज्य को ख़त्म करने जा रहे हैं।

निक्सन का बीजिंग दौरा (1972)

इस पूरी जियो पॉलिटिक्स को समझने के लिए हमें 1949 में चलना होगा, जब माओत्से तुंग की कम्युनिस्ट क्रांति के बाद अमेरिका ने चीन की नई सत्ता को मान्यता देने से इनकार कर दिया और ताइवान का समर्थन शुरू किया। फिर कोरिया युद्ध में दोनों आमने-सामने आ गए, जिससे रिश्तों में गहरी खामोशी छा गई और ये खामोशी चली करीब 25 साल तक।

इस बीच 1960 के दशक में दुनिया कोल्ड वॉर की दो ध्रुवीय गुटों में बँटी हुई थी, जहाँ अमेरिका और USSR यानी, सोवियत संघ आमने-सामने थे। लेकिन यहाँ पर चीन के रूप में एक तीसरा खिलाड़ी भी जगह बना रहा था। 1970 के दशक की शुरुआत में समीकरण बदले। चीन और सोवियत संघ के बीच भी तनाव बढ़ने लगा और अमेरिका ने इस दूरी को अपने हित में भुनाने का फैसला किया।

इसी दौरान अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर अपनी ‘शटल डिप्लोमेसी’ के लिए बहुत चर्चित थे। उन्होंने पाकिस्तान के रास्ते गुप्त रूप से बीजिंग की यात्रा की। किसिंजर की शटल डिप्लोमेसी के बाद साल 1972 आया, शीत युद्ध की गर्मागर्मी के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन चीन पहुँचे। और इसी के साथ दोनों देशों की 25 साल पुरानी खामोशी टूटी। ‘निक्सन गोज़ टू चाइना’ केवल एक कूटनीतिक यात्रा नहीं थी, यह सोवियत संघ यानी USSR के खिलाफ एक रणनीतिक समीकरण की शुरुआत थी। इसका मकसद सिर्फ़ एक ही था, USSR के ख़िलाफ़ चीन के रूप में दूसरा धड़ा तैयार करना!

इसके बाद ‘शंघाई कम्युनिक‘ लाया गया। अमेरिका-चीन, दोनों देशों के रिश्तों की शुरुआत हुई, लेकिन कोई ठोस आर्थिक समझौता नहीं हुआ। असली फायदा कम्युनिस्ट राष्ट्र चीन को हुआ, जो अब तक बाजार में अलग-थलग पड़ा हुआ था लेकिन अब अमेरिका के पूंजीवादी सिस्टम का दोहन कर अपने आर्थिक ढाँचे की ज़मीन तैयार कर रहा था।

Deng Xiaoping (देंग शियाओपिंग) और चीन का चमत्कार

1978-80 की बात है- आधुनिक चीन का निर्माता कहे जाने वाले देंग शियाओपिंग ने सुधार और खुले मार्केट की ‘गैइग काइफांग’ (Gaige Kaifang) की पॉलिसी शुरू की। और इसका मतलब होता है ‘Reform and Opening-up’। देंग ने चीन की बंद इकॉनमी को मार्केट इकॉनमी में बदल दिया, जिसे समाजवाद का चोला पहनाया गया। पहली बार चीन में ‘स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन्स’ बने, विदेशी पूंजी का स्वागत किया गया। चीन में पश्चिमी निवेशकों की लाइन लगने लगी- जिसके परिणामस्वरूप IBM, HP और Motorola जैसी कंपनियाँ चीन में फैक्ट्रियाँ लगाने लगीं।

यहाँ से शुरुआत हुई Chimerica की, यानी अमेरिका की पूँजी और चीन का श्रम।

Reaganomics से Walmart तक

चीन को लुभाने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति रॉनल्ड रेगन ने चीन को ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का दर्जा दिया। इसके पीछे वजह ये भी थी कि 1980 के दशक में अमेरिका को सस्ते मैन्युफैक्चरिंग की जरुरत महसूस हुई, और चीन को डॉलर और तकनीक की। Reaganomics की नीतियों ने बाजार को और खोल दिया।

अमेरिकी कंपनियाँ चीन में सेटअप लगाने लगीं, Walmart, Apple, Nike (नाइकी) जैसी कंपनियों ने चीन को 21वीं सदी आते-आते ‘फैक्ट्री ऑफ द वर्ल्ड’ बना दिया। याद रहे, ये नई दोस्ती इसलिए शुरू हुई क्योंकि इस बीच साल 1991 आया, जब USSR पूरी तरह से टूट गया। सोवियत संघ (USSR) के बिखरने के बाद चीन और अमेरिका के बीच एक किस्म का “फ्रेंड्स विद बेनिफिट” का क्रम चलता रहा। लेकिन हर गठजोड़ की एक एक्सपायरी डेट होती है।

WTO में चीन, Chimerica ‘चाइमेरिका’ का Honeymoon (2001)

साल 2001 में चीन को WTO की सदस्यता मिली। यह अमेरिका का एक बड़ा दाँव था और उम्मीद थी कि ग्लोबल इकोनॉमी में आने से चीन उदारवादी बनेगा। लेकिन हुआ इसका उल्टा। चीन ने सस्ती वस्तुओं की बाढ़ अमेरिका में भेज दी, अमेरिका की घरेलू इंडस्ट्री चरमरा गई। Huawei, ZTE जैसी कंपनियाँ सामने आईं, Intellectual Property की धज्जियाँ उड़ाई गईं। ये कुछ वही था, जिसे आप आज आम भाषा में चायनीज माल कहते हैं।

चीनी कंपनियाँ अमेरिकी टेक्नोलॉजी की कॉपी करने लगीं। चीन से इम्पोर्ट तेजी से बढ़ा, लेकिन चीन ने अमेरिकी सामानों की खरीद कम की और यहीं से दोनों देशों के बीच ट्रेड डेफिसिट का घमासान शुरू हुआ। नतीजा ये हुआ कि साल 1993 में अमेरिका का चीन के साथ व्यापार घाटा करीब $22 अरब डॉलर था, जो बढ़कर 2005 तक $202 अरब डॉलर हो गया, यानी 12 साल में यह 9 गुना बढ़ गया। और यही असंतुलन आगे चलकर ट्रम्प और बायडेन, दोनों की ‘चाइना पॉलिसी’ पर हावी नजर आता है।

2008: अमेरिका की मंदी, चीन की बाजार पर आक्रामकता

फिर आया साल 2008… जब फाइनेंशियल क्राइसिस ने अमेरिका को तोड़कर रख दिया, लेकिन चीन ने इस मौके का इस्तेमाल बाजार पर अपनी ताकत दिखाने में किया। स्टेट-कैपिटलिज्म और सेंट्रल बैंकिंग मॉडल को ग्लोबल मंच पर रखा गया। यही समय था जब चीन को लगने लगा कि वो अमेरिका को टक्कर दे सकता है। अब चीन, डॉलर का सिर्फ़ ग्राहक नहीं, उसका विकल्प भी बनने निकला।

यही वो समय था, जब हॉलीवुड की फ़िल्मों में चायनीज विलेन दिखाई देने लगे। याद कीजिए साल 2008 की “The Dark Knight” फ़िल्म जिसमें Lau नाम का एक चीनी अकाउंटेंट और बिज़नेसमैन गौथम सिटी के माफिया डॉन और करप्ट बिज़नेस लॉबी का पैसा हांगकांग में छुपाकर रखता है। इसके बाद चीन ने हॉलीवुड फिल्मों पर सख़्त सेंसरशिप और कोटा सिस्टम लागू कर दिया।

फिल्म में Lau को एक चीनी बिज़नेसमैन, धोखेबाज़ और माफिया का सहयोगी दिखाया गया था। ये असल में चीन-विरोधी नैरेटिव था जिसमें चीन की छवि एक भ्रष्ट ठिकाने के रूप में सामने रखी गई।

2018–20: ट्रंप की ट्रेड वॉर, डि-कपलिंग की शुरुआत

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में 2016 में खुलकर घोषणा की कि ‘चीन दशकों से हमें लूट रहा है।’ ट्रंप के तेवरों से ये साफ़ दिखने लगा कि उसके भीतर चीन को लेकर कितना आक्रोश भरा था। कोरोना वायरस को लगातार ‘चायनीज वायरस’ कहना भी इसी गुस्से की झलक थी।

अमेरिका में फौरन Huawei, TikTok पर कुछ समय के लिए प्रतिबंध लगा दिए गए, सैकड़ों अरब डॉलर के चीनी उत्पादों पर टैरिफ, Currency Manipulation के आरोप लगे। अमेरिका ने चीन से रिश्ते सख्त कर दिए। और चीन पूरी दुनिया का दुश्मन नजर आने लगा।

COVID-19 के बाद अमेरिकी समाज और मीडिया में चीन के खिलाफ माहौल और गर्माया। जो बाइडन भी उसी राह पर चल पड़े और उन्होंने कहा कि “We will de-risk, not decouple.” बाइडेन ने शब्द बदला, नीति नहीं। लेकिन चीन अब ऐसी स्थिति में नहीं है कि अमेरिका की गुंडागर्दी को जवाब ना दे सके।

अमेरिकी घबराहट और Eurasian विकल्प

अमेरिका को अब डर सिर्फ चीन से नहीं है बल्कि उस संभावित गठजोड़ से भी है, जिसमें रूस और भारत जैसे देश शामिल हो सकते हैं। ये गठजोड़ सिर्फ सेना या व्यापार तक सीमित नहीं था, बल्कि ये एक सोच थी, जो पश्चिमी देशों के दबदबे और डॉलर की ताकत को चुनौती दे सकती थी। दुनिया धीरे-धीरे पूछने भी लगी कि, “हम सिर्फ़ डॉलर से क्यों बँधे रहें?”

अब बारी आई एक ऐतिहासिक पहल की – De-Dollarization

De-Dollarization: यानी डॉलर के साम्राज्य पर चोट

कोविड महामारी के बीच जब 2022 में रूस और यूक्रेन एक दूसरे के सामने आए, तब रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद उसने युआन और रूबल में व्यापार शुरू किया। चीन पहले से ही अपने डिजिटल युआन को बढ़ावा दे रहा है। ये वो समय है जब भारत भी रुपया-रूबल और अन्य द्विपक्षीय समझौतों की ओर बढ़ रहा है। इस प्रक्रिया को ही कहते हैं- De-dollarization, एक ऐसी मुहिम जो अमेरिकी आर्थिक प्रभुत्व की नींव हिला सकती है।

वो समय बहुत पीछे रह गया जब डॉलर के सामने किसी की नहीं चलती थी- अन्तरराष्ट्रीय व्यापार सिर्फ़ डॉलर पर ही होता था, जो अमेरिका की शर्तों से सहमत नहीं होता था उन पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए जाते थे; और कई देशों में तो अपनी मुद्रा के ऊपर डॉलर को ही तवज्जो दी जाती थी।

जैसे जिम्बाब्वे को ही देख लीजिए। 2008-2009 में ज़िम्बाब्वे ने दुनिया की सबसे बदहाल मुद्राओं में से एक का रिकॉर्ड बनाया, हाइपरइन्फ्लेशन इतना बढ़ गया कि 100 ट्रिलियन ज़िम्बाब्वे डॉलर का नोट छापना पड़ा। लोग अपनी ही करेंसी लेने को तैयार नहीं थे। दुकानदारों ने ज़िम्बाब्वे डॉलर में सामान बेचना बंद कर दिया और आम लोग लेनदेन के लिए अमेरिकी डॉलर की माँग करने लगे। सरकार को भी मजबूरन ज़िम्बाब्वे डॉलर को बंद कर अमेरिकी डॉलर को आधिकारिक मुद्रा बनाना पड़ा।

लेकिन अब वो दिन गए। अब अर्थव्यवस्थाओं का सोचना है कि आख़िर सभी देश एक ही करेंसी के अनुसार क्यों चलें? डॉलर का ही प्रभुत्व दुनिया पर क्यों रहे? इसलिए अब सभी देश अपनी ही करेंसी में व्यापार करने की पालिसी अपना रहे हैं। और इसका मतलब ये नहीं है कि वे डॉलर का बहिष्कार कर रहे हैं। इसका मतलब ये है कि जब डॉलर की जरूरत होगी तभी डॉलर का इस्तेमाल किया जाएगा। और बस उतना ही करेंगे जितनी जरूरत होगी।

डॉलर की दादागिरी से आज़ादी की सोच ने एक नया रास्ता निकाला- BRICS+, वही BRICS जिसके ख़िलाफ़ Trump लगातार बयान दे रहे हैं। और कह रहा है कि जो देश BRICS की ‘एंटी-अमेरिकन’ नीतियों का समर्थन करेगा, उस पर भारी मात्र में टैरिफ लगाया जाएगा।

साल 2023-24 में BRICS का विस्तार हुआ। सऊदी अरब, यूएई, ईरान, मिस्र जैसे देश शामिल हुए। ये सभी देश पश्चिमी दबाव से बाहर निकलकर एक नए पॉवर सेंटर की तलाश में हैं। BRICS बैंक, डिजिटल करेंसी और युआन में ट्रेड की चर्चाएं अमेरिका की चिंता का कारण बन चुकी हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने इसी बीच कई देशों पर टैरिफ़ और आर्थिक धमकियाँ फिर से शुरू कर दीं। और इसका सबसे ताजा निशाना भारत है। क्योंकि BRICS में जो RIC है, अमेरिका और ट्रंप को सबसे ज़्यादा समस्या उसी से है।

गलवान की चोट और R-I-C में खटपट

RIC यानी Russia-India-China, साल 1990s से सक्रिय यह ट्रायंगल 2002 में औपचारिक बना। इसके लिए कई बार आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन और महामारी जैसी साझा चुनौतियों पर चर्चा के ज़रिए छोटे-छोटे कदम उठाए जाते रहे। लेकिन 2020 में गलवान संघर्ष के बाद यह संबंध ठप हो गया।

भारत और चीन के बीच संबंधों में बर्फ जम गई, 20 भारतीय जवान बलिदान हुए और कई चीनी सैनिक मारे गए। जिसके बाद भारत ने चीन की आर्थिक रीढ़ को तोड़ने और उन पर बाजार की निर्भरता को कम करने के लिए कई किस्म की पहल भी की और कई चायनीज कंपनियों को बैन किया। रेलवे, टेलीकॉम, रोड और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी सरकारी परियोजनाओं से चीनी कंपनियों को बाहर कर दिया गया या कठोर जाँच की प्रक्रिया बना दी गई।

अमेरिका ने गलवान में हुई भिड़ंत के इस मौक़े को भाँपते हुए भारत के साथ रिश्ते और मजबूत किए। QUAD (अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, भारत) को नई दिशा मिली। भारत इस दौरान आत्मनिर्भर भारत नीति पर ज़ोर तो दे ही रहा था। लेकिन इस सबके बीच साल 2022 में रूस-यूक्रेन संकट शुरू हुआ और वैश्विक समीकरण फिर गड़बड़ाने लगे।

अमेरिका और पश्चिमी देश चाहते थे कि रूस एकदम अलग-थलग पड़ जाए, लेकिन बिना किसी गुट के साथ खड़े हुए भारत और चीन ने रूस से सस्ता तेल खरीदना जारी रखा और बौखलाहट अमेरिका के फैसलों में नजर आने लगी। अब अमेरिका सीधे तौर पर रूस के साथ खड़े देशों को खुली धमकी देने लगा। और टैरिफ के नाम पर धमकी इसी का परिणाम है।

RIC की वापसी की कोशिशें: रूस की मजबूरी

साल 2025 में रूस के विदेश मंत्री लावरोव ने RIC गुट को फिर से ज़िंदा करने की बात की। यूक्रेन युद्ध के कारण पश्चिम से पूरी तरह से कट चुके रूस को अब भारत और चीन की ज़रूरत महसूस होने लगी, एक नए ‘Multipolar World Order’ के लिए। चीन इस पर पूरी तरह से सहमत है, लेकिन भारत फ़िलहाल असमंजस की स्थिति में है और इसके लिए चीन की पाकिस्तान से यारी बहुत बड़ी वजह है।

RIC यानी रूस, भारत और चीन का एकसाथ आना कोई असंभव बात नहीं है और इसमें महत्वपूर्ण बात ये है कि ये तीनों ऐसे देश हैं जिनके पास अपनी सभ्यता और संस्कृत का इतिहास है जो कि अमेरिका के पास नहीं है।

  • रूस, चीन और भारत, ये तीनों देशों की सभ्यताएँ हजारों साल पुरानी हैं और इनकी सांस्कृतिक जड़ें गहरी हैं।
  • रूस खुद को ‘थर्ड रोम’ मानता है। बाइज़ंटाइन साम्राज्य के पतन के बाद उसने रूढ़िवादी ईसाई सभ्यता का झंडा उठाया।
  • चीन की आत्मा उसके राष्ट्रवाद में बसती है, जिसे ताओवाद, कन्फ्यूशियस और बौद्ध दर्शन से गहराई मिली है।
  • भारत एक बहुधार्मिक, बहुभाषी और वैदिक परंपराओं वाला देश है, जहाँ ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ यानी ‘पूरा संसार एक परिवार’ की भावना बसती है।
  • तीनों में अनुशासन, बलिदान और आत्म-संस्कृति की गहरी भावना है और यही उन्हें अमेरिका जैसे सांस्कृतिक रूप से खोखले देशों से अलग बनाती है।
RIC अगर अपनी सभ्यता की शक्ति के साथ आगे बढ़ना चाहते हैं तो इसमें कोई बुराई नहीं है लेकिन इस काम में सबसे बड़ी समस्या का नाम पाकिस्तान है। सभी लोग ये भी जानते हैं कि अमेरिका के पास पूरी दुनिया में इस वक्त सिर्फ़ पाकिस्तान ही आख़िरी फ़ुटहोल्ड है। इसके अलावा ज़्यादा से ज्यादा एक साउथ कोरिया ही अभी अमेरिका के हाथ में है। लेकिन चीन को समझना पड़ेगा कि गधों की सवारी करने से उसे RIC में कोई लाभ नहीं मिलने वाला है।
इसका उदाहरण आप इस बात से समझ सकते हैं कि पाकिस्तान में जब इमरान खान रूस जाकर चाय पानी की फोटो पोस्ट कर रहे थे, तब उसके फौरन बाद पाकिस्तान में उनकी सरकार का तख्तापलट अमेरिका ने करवा दिया था। पाकिस्तान की रूस से नजदीकी उसे पसंद नहीं आई। इमरान ख़ान की रूस यात्रा और उसके तख्तापलट के बीच मात्र डेढ़ महीने का अंतर था।
पाकिस्तान आतंकवाद के ज़रिए भारत को निरंतर परेशान करने की कोशिश करता है, यहाँ से बांग्लादेश में अमेरिका ने अपना आदमी बिठाकर रखा है, दोनों ही देश में जिहादी इस्लाम है, आतंकवाद है और भुखमरी भी, लेकिन चीन की पाकिस्तान से दोस्ती हर बार इस गठबंधन के बीच आती है। उसके पास आतंकवाद के सिवाय और कुछ विकल्प नहीं है, जो चीन को समझना होगा।

आटा-तेल बेचने के धंधे से हटेगा अडानी ग्रुप, Fortune वाली कम्पनी Adani Wilmar Limited में बेचेगा हिस्सेदारी:17000 करोड़ रूपए में डील, एनर्जी और ट्रांसपोर्ट जैसे बिजनेस में लगाएगा पैसा

        अडानी विल्मर देश में खाने के तेल का सबसे बड़ा ब्रांड है (साभार; Media4Growth & Khabar India)
अडानी समूह जल्द ही रोजमर्रा के सामान (FMCG) बेचने के धंधे से बाहर आ जाएगा। इसके लिए वह Wilmar कम्पनी के साथ चली आ रही अपनी साझेदारी कंपनी Adani Wilmar Limited (AWL) से हिस्सेदारी खत्म करेगा। अपने इस धंधे को Wilmar के हाथों बेचने से उसे 2 बिलियन डॉलर (17,000 करोड़ रूपए) मिलेंगे।

इस राशि का इस्तेमाल अडानी समूह अब बाकी एनर्जी और ट्रांसपोर्ट जैसे धंधों को बढ़ाने के लिए करेगा। अडानी समूह यह कार्रवाई लगभग 6 माह के भीतर पूरी करेगा। अडानी समूह लम्बे समय से खाने-पीने की वस्तुओं की व्यापार में है। अडानी समूह की Wilmar के साथ 1999 से ही साझेदारी है। Wilmar सिंगापुर की एक कम्पनी है।

दोनों कम्पनियाँ मिल कर भारत में खाने के तेल, आटा-चावल, रवा, मैदा समेत सोयाबीन जैसे कई सामान बेचती है। Adani Wilmar देश में खाने के तेल में मामले में नम्बर 1 कंपनी है। अडानी समूह की AWL में अभी 44% हिस्सेदारी है। अडानी समूह को इस बिक्री से जो पैसा मिलेगा, उसका इस्तेमाल दूसरे क्षेत्र में होगा।

वर्तमान में AWL लगभग 43000 करोड़ रूपए की कम्पनी है। इसका शेयर वर्तमान में 300 रूपए के ऊपर है। Wilmar और अडानी समूह यह डील मार्च, 2025 तक पूरी कर लेंगे। इस डील में 31% हिस्सा सीधे तौर पर Wilmar को बेच दिया जाएगा जबकि बाकी 13% हिस्सा शेयरधारकों को शेयर बाजार में बेचा जाएगा।

अडानी समूह डील से मिले पैसे को एयरपोर्ट, सोलर एनर्जी और बाकी प्रोजेक्ट में निवेश करेगा। वर्तमान में अडानी समूह देश में सबसे बड़ा एयरपोर्ट ऑपरेटर और सबसे बड़ी स्वच्छ ऊर्जा की कम्पनी है। अडानी समूह पर हाल ही में अमेरिका में न्याय विभाग ने रिश्वतखोरी और गड़बड़ी समेत कई आरोप जड़े थे।

इसके चलते उसे कई प्रोजेक्ट का नुकसान भी उठाना पड़ा था। उसे अमेरिकी बाजार से निवेश जुटाने में इसके बाद दिक्कत आई थी। हालाँकि, इस डील से उसे निवेश की समस्या भी नहीं रहेगी और उसकी साख में इजाफा होगा। अडानी समूह ने अक्टूबर, 2024 में ही 500 मिलियन डॉलर (लगभग 4250 करोड़ रूपए) जुटाए थे।

मार्च, 2025 में अडानी विलमर डील पूरी होने के बाद अडानी समूह के पास 20,000 करोड़ रूपए से अधिक धनराशि होगी। इसका इस्तेमाल अपने बाकी धंधों में निवेश और कर्ज चुकता करने में कर पाएँगे। अडानी समूह के निकलने के बाद Adani Wilmar लिमिटेड को नया नाम दिया जाएगा।

‘एक दशक में $10 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनेगा भारत’: सीखें दूसरे देश :मोदी सरकार के कायल हुए ‘वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम’ के अध्यक्ष, बोर्गे ब्रेंडे

                                                   WEM के अध्यक्ष बोर्गे ब्रेंडे ने मोदी सरकार की तारीफ़ की
जहाँ एक तरफ दिल्ली में G20 समिट का भव्य आयोजन हो रहा है, वहीं इसे लेकर ‘वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम’ के अध्यक्ष बोर्गे ब्रेंडे ने मोदी सरकार की खुल कर तारीफ़ की है। उन्होंने कहा कि G20 अध्यक्षता के दौरान भारत ने बहुत कुछ किया है। उन्होंने ध्यान दिलाया कि कैसे भारत ने 140 करोड़ लोगों को डिजिटल आईडी देने का रिकॉर्ड कायम किया और लोगों को जबरदस्त डिजिटल कनेक्टिविटी मिली है। उन्होंने कहा कि इससे दूसरे देश भी प्रेरित हुए हैं।

WEF के अध्यक्ष बोर्गे ब्रेंडे ने कहा कि इससे दुनिया के 350 करोड़ लोगों को डिजिटल रूप से जोड़ने का मौका मिलेगा, जो भारत की तरह कनेक्टेड नहीं हैं। उन्होंने कहा कि भारत ने सस्टेनेबिलिटी के क्षेत्र में भी नेतृत्व का प्रदर्शन किया है। उन्होंने बताया कि कैसे भारत एक लो-कार्बन इकोनॉमी बनने की ओर अग्रसर है। उन्होंने कहा कि खास बात ये है कि विकास और रोजगार के क्षेत्रों में आगे बढ़ते हुए भारत ऐसा कर रहा है। उन्होंने ये भी कहा कि भारत आज 8% विकास दर के साथ ग्रोथ के मामले में भी नेतृत्व कर रहा है।

‘विश्व आर्थिक मंच’ के अध्यक्ष ने दुनिया में विकास दर को उच्च स्तर पर ले जाने को एक बड़ी चुनौती करार दिया। उन्होंने कहा कि दूसरे देश भारत से इस मामले में सीख सकते हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत की आर्थिक प्रगति को बुलबुला नहीं है कि फूट जाए, वो अगले एक दशक में भारत को 10 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनते हुए देख रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत का घरेलू बाजार बहुत विशाल है और नए कंजम्प्शन पैटर्न के लिए भारत ज़्यादा तैयार है।

उन्होंने सेवाओं के एक्सपोर्ट के मामले में भी भारत को एक बड़ा देश करार दिया। ‘वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम’ के अध्यक्ष बोर्गे ब्रेंडे ने कहा कि ये धीमे विकास का दशक चल रहा है। उन्होंने कहा कि आर्थिक रूप से भारत का महत्व बढ़ता ही जा रहा है। उन्होंने कहा कि आने वाला दशक भारत का है, और G3 (अमेरिका, चीन, भारत) पर बहुत कुछ निर्भर करेगा। उन्होंने कहा कि भारत को वो आगे बढ़ते हुए देख रहे हैं। साथ ही उन्होंने G20 देशों के बीच आपसी विश्वास में बढ़ोतरी पर भी बल दिया।

‘दिवालिया हो गया है पाकिस्तान’: रक्षा मंत्री का ऐलान, कहा – 1500 एकड़ का गोल्फ क्लब बेच कर चुका सकते हैं 25% कर्ज

पाकिस्तान गहरे आर्थिक संकट से जुझ रहा है। उस पर कंगाल होने का खतरा बढ़ता जा रहा है। इस बीच पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कह दिया कि उनका मुल्क दिवालिया हो चुका है, वह एक दिवालिया देश के रहने वाले हैं। उन्होंने यह बयान शनिवार (18 फरवरी, 2023) को दिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान के सियालकोट में एक प्राइवेट कॉलेज के दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा, “आपने सुना होगा कि पाकिस्तान डिफ़ॉल्ट या दिवालिया होने वाला है। एक मेल्टडाउन होगा, लेकिन यह पहले ही दिवालिया हो चुका है। हम सब दिवालिया देश में रह रहे हैं।”

ख्वाजा आसिफ ने यह भी कहा है कि पाकिस्तान की समस्याओं का हल देश में ही है। लेकिन पाकिस्तान आईएमएफ (अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष) की ओर देख रहा है। वह इसमें कोई मदद नहीं कर सकता। उन्होंने कहा है कि देश 1500 एकड़ सरकारी जमीन पर गोल्फ क्लब बनाए गए। अब अगर पाकिस्तान अपने दो गोल्फ क्लब को भी बेच देता है तो एक चौथाई कर्ज उतर जाएगा।

इमरान खान सरकार पर आरोप मढ़ते हुए उन्होंने यह भी कहा है कि पाकिस्तान के संविधान को बार-बार नज़रअन्दाज़ किया गया है। डेढ़ साल पहले आतंकवादियों को देश में बसने दिया गया और खतरनाक खेल खेले गए। वहीं, आलोचकों को देश छोड़ने के लिए मजबूर किया गया। 

पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार खत्म होने की स्थिति में है। लगातार गिरावट के बाद पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार 300 करोड़ डॉलर ही बचा हुआ है। माना जा रहा है कि यदि स्थितियाँ ऐसी ही रहीं तो पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार आगामी 3 हफ़्तों में समाप्त हो जाएगा। ऐसे में पाकिस्तान की आखिरी उम्मीद IMF (विश्व मुद्रा कोष) पर टिकी हुई है। यदि समय रहते IMF ने पाकिस्तान को सहायता नहीं दी तो पाकिस्तान दिवालिया हो सकता है।

3 बार दिवालिया हो चुका है पाकिस्तान

पाकिस्तान अब तक कुल 3 बार दिवालिया हो चुका है। पाकिस्तान पहली बार दिवालिया साल 1971 में हुआ था। तब भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान उसकी हालत बेहद नाजुक हो गई थी। इसके बाद पाकिस्तान को मजबूरन खुद को दिवालिया घोषित करना पड़ा था। यही नहीं, साल 1998 में, परमाणु परीक्षण करने के बाद पाकिस्तान फिर से दिवालिया हो गया था। उस समय पाकिस्तान पर कई तरह के प्रतिबंध लगे थे। इससे उसे विदेशी सहायता मिलना बंद हो गई थी।
वहीं, साल 2002 में एक बार फिर पाकिस्तान अपने नेताओं की गलतियों यानी राजनीतिक और आर्थिक हालतों के चलते दिवालिया हुआ था।

क्या कंगाल पाकिस्तान में विदेशी ब्रांड की कॉफी पीने को लंबी लाइन?

                                    महँगी कॉफी पीने को उमड़े लोग (फोटो साभार: @TBajwa7)
पाकिस्तान के आर्थिक हालात बदतर हैं। देश दिवालिया होने की कगार पर है। फॉरेक्स रिजर्व (Forex Reserves) 9 फरवरी 2023 को नौ साल के निचले स्तर पर पहुँच गया। पाकिस्तानी रुपया भी रिकॉर्ड निचले स्तर पर है। एक तरफ लोग खाने की वस्तुओं के लिए मोहताज हैं। दूसरी ओर एक वर्ग ऐसा भी है जो कनाडा की वैश्विक ब्रांड टिम हॉर्टन्स (Tim Hortons) की कॉफी पीने के लिए कतार लगा रहे हैं।

महँगी काफी पीने की दीवानगी में पाकिस्तान के इस वर्ग ने रिकॉर्ड ही बना डाला है। 1964 में टिम हॉर्टन्स की ओपनिंग के बाद से अब तक की सबसे ज्यादा शुरुआती बिक्री पाकिस्तान में दर्ज की गई है। कनाडाई ब्रांड की पाकिस्तानी फ्रेंचाइजी ने दुनिया भर में कंपनी के सभी 5,352 आउटलेट्स को पहले दिन की बिक्री के मामले में पीछे छोड़ दिया है।

टिम हॉर्टन्स ने लाहौर में अपना पहला आउटलेट खोला है। वीकेंड में इस आउटलेट के बाहर लंबी कतार देखी गई। इस भीड़ को देखकर सोशल मीडिया में लोग आश्चर्य जता रहे हैं। एक यूजर ने इसे जिन्ना की ‘टू नेशन थ्योरी’ बताया है। यूजर ने कहा, “यह जिन्ना की ‘टू नेशन थ्योरी’ है। यही हकीकत है। ‘टू नेशन थ्योरी’ हिंदुओं और मुसलमानों के बारे में नहीं, बल्कि एलीट और गरीब, फौज और अवाम, शासक और प्रजा, राजा और रंक के बारे में था। भारत को सामंतवाद से छुटकारा मिला और पाकिस्तान में इसके 1000 जीवन और लाखों चेहरे हैं। आटा के लिए गरीब लाइनों में खड़े हैं और टिम हॉर्टन्स के लिए एलीट।”

पाकिस्तान के सिंगर, एक्टर फरहान सईद ने ट्वीट कर कहा है, “यह दो पाकिस्तान है। एक आटा और घी के लिए कतार में हैं और दूसरा टिम हॉर्टन्स के बाहर खड़ा है। यह मुझे डरा रहा है। यह मुझे डरा रहा है, क्योंकि मिडिल में कुछ भी नहीं है।”

एक यूजर ने स्टोर के बाहर लंबी कतार का वीडियो शेयर करते हुए कहा है, “टिम हॉर्टन्स ने आज (12 फरवरी 2023) लाहौर में अपना पहला स्टोर खोला। छोटा कॉफी कप की कीमत 650 पाकिस्तानी रुपए (2.40 डॉलर) है और स्टोर के बाहर लाइन देखें। फिर भी हम कहते हैं कि पैसा नहीं है और हम दुनिया से पैसा देने की भीख माँगते हैं। धिक्कार है निकम्मी सरकार और उसकी स्थापना पर। बहुत दुख की बात है।”

उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान नकदी की तंगी का सामना कर रहा है। दूध, चिकन, रेड मीट आदि जैसी दैनिक आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में पिछले कुछ दिनों में भारी वृद्धि देखी गई है। दूध 210 रुपए लीटर तो चिकन 700 रुपए पाकिस्तानी में मिल रहा है।

चीन के कर्ज में फँस कंगाली के कगार पर पहुँचा श्रीलंका: 500000 लोग गरीबी रेखा से नीचे, 200000 की गई नौकरी

श्रीलंका आज कंगाली की कगार पर खड़ा है। आर्थिक और मानवीय आपदा गहरा गई है। खाने-पीने की वस्तुओं की कीमत आसमान छू रही। रिकॉर्ड स्तर पर महँगाई है। आखिर श्रीलंका की यह हालत हुई कैसे?

दरअसल, श्रीलंका की अर्थव्यवस्था सबसे अधिक पर्यटन पर आश्रित है। इस पर कोरोना महामारी के कारण ग्रहण लग गया है। दूसरी ओर श्रीलंका को चीन से कर्ज लेना काफी महँगा पड़ रहा है। उसके कर्ज चुकाते-चुकाते श्रीलंका आज आर्थिक बदहाली की स्थिति में पहुँच गया है। बताया जा रहा है कि देश का खजाना खाली होने को है और वह जल्द ही दिवालिया हो सकता है।

विश्व बैंक का अनुमान है कि श्रीलंका में महामारी की शुरुआत के बाद से 5,00,000 लोग गरीबी रेखा से नीचे आ गए हैं। द गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार, नवंबर में महँगाई 11.1 प्रतिशत की रिकॉर्ड ऊँचाई पर पहुँच गया। बढ़ती महँगाई की वजह से लोगों की प्लेट से खाने के सामान दूर होने लगे हैं। वे अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए जूझ रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि राजपक्षे सरकार द्वारा श्रीलंका में आर्थिक आपातकाल घोषित करने के बाद सेना को चावल और चीनी सहित आवश्यक वस्तुओं को सुनिश्चित करने की शक्ति दी गई थी, हालाँकि इससे कुछ खास फायदा नहीं हुआ।

श्रीलंका के लिए सबसे अधिक दबाव वाली समस्याओं में से एक विशेष रूप से चीन के ऋण का भारी बोझ है। उस पर चीन का 5 अरब डॉलर से अधिक का कर्ज है और पिछले साल उसने अपने गंभीर वित्तीय संकट से निपटने में मदद के लिए बीजिंग से अतिरिक्त 1 अरब डॉलर का ऋण लिया था, जिसका भुगतान किस्तों में किया जा रहा है। अगले 12 महीनों में सरकारी और निजी क्षेत्र में श्रीलंका को घरेलू और विदेशी ऋणों में अनुमानित 7.3 बिलियन डॉलर चुकाने की आवश्यकता होगी, जिसमें जनवरी में 500 मिलियन डॉलर अंतर्राष्ट्रीय सॉवरेन बांड पुनर्भुगतान भी शामिल है। हालाँकि, नवंबर तक उपलब्ध विदेशी मुद्रा भंडार केवल 1.6 बिलियन डॉलर था।

विपक्षी सांसद और अर्थशास्त्री हर्षा डी सिल्वा ने हाल ही में संसद में कहा था कि अगले साल जनवरी तक विदेशी मुद्रा भंडार 437 मिलियन डॉलर होगा, जबकि फरवरी से अक्टूबर 2022 तक सेवा के लिए कुल विदेशी ऋण 4.8 बिलियन डॉलर होगा, जिससे राष्ट्र पूरी तरह से दिवालिया हो जाएगा। सेंट्रल बैंक के गवर्नर अजीत निवार्ड काबराल ने हालाँकि सार्वजनिक तौर पर कहा है कि श्रीलंका अपने ऋणों को चुका सकता है।

तुर्की : शाकाहारी बनो, मांस कम खाओ: आर्थिक संकट पर सांसद

“हर महीने 1-2 किलो मांस खाने के बजाय, आधा किलो खाओ। हम 2 किलो टमाटर खरीदते हैं, उनमें से आधे कूड़ेदान में चले जाते हैं। अब से सिर्फ 2 टमाटर खरीदो।”

तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआँ (Erdogan) की पार्टी के सांसद ज़ुल्फ़ु डेमिरबाग (Zülfü Demirbağ) ने यह बात कही है। कारण है – तुर्की की मुद्रा लीरा के मूल्यांकन का अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में पतन और पूरे देश पर छाए घरघोर आर्थिक संकट के बादल।

सत्ता पार्टी का एक सांसद जब 2 टमाटर खरीदने की बात कह रहा है तो यह जानना भी उतना ही जरूरी है कि वहाँ के विपक्षी सांसद क्या कह रहे हैं। मुख्य विपक्षी रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी के प्रवक्ता फैक ओज़्ट्रैक (Faik Öztrak) ने पूरे देश के लोगों पर लादे गए आर्थिक संकट का मजाक उड़ाने के लिए सांसद ज़ुल्फ़ु डेमिरबाग को लताड़ते हुए कहा:

“कुछ तो शर्म कीजिए! लोग रोटी नहीं खरीद पा रहे और आप सब्जियों की बात कर रहे। सत्ता में बैठे लोगों के पास अब शर्म भी नहीं बची है, लोगों का मजाक उड़ा रहे हैं।”

तुर्की की सरकार ने अपने देश की मुद्रा के पतन और उसके कारण खाद्य सामग्रियों की कीमतों में हो रही बेतहाशा वृद्धि का सामना करने के लिए अपने नागरिकों को शाकाहार का सेवन करने का अनुरोध किया है। साथ ही मांसाहार के कम से कम सेवन करने का भी मैसेज सरकार की ओर से दिया जा रहा है।

तुर्की में आई आर्थिक मंदी की बात करें तो वहाँ की मुद्रा लीरा अपने ऐतिहासिक निम्न स्तर पर पहुँच गई है। CNBC की रिपोर्ट के अनुसार, तुर्की में मँहगाई दर 20% के करीब है। इस वजह से वहाँ जरूरी वस्तुओं की कीमतें आसमान छू रही हैं।

तुर्की में आर्थिक मंदी की शुरुआत

इस साल नवंबर की शुरुआत से लेकर अब तक डॉलर के मुकाबले वहाँ की मुद्रा लीरा में 20% से ज्यादा की गिरावट आई है। इस सब की शुरुआत राष्ट्रपति एर्दोआँ (Erdogan) द्वारा “स्वतंत्रता के लिए आर्थिक युद्ध (economic war of independence)” की घोषणा के बाद से हुई। तेजी से गिरती अर्थव्यवस्था से निपटने के बजाय राष्ट्रपति एर्दोआँ ने आगे भी दरों में कटौती करने के संकेत दिए हैं।
भयंकर आर्थिक मंदी के बीच अंतरराष्ट्रीय कंपनी ऐपल ने इसी सप्ताह तुर्की में ऑनलाइन बिक्री रोक दी। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि वहाँ की मुद्रा 11, 12 और फिर 13 डॉलर की सीमा से गिर गई, जिससे उत्पादकों के लिए अपने उत्पादों की कीमत तय करना असंभव हो गया।

तुर्की में मुस्लिम बहुसंख्यक

तुर्की बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी वाला देश है। हालाँकि यह खुद को धर्मनिरपेक्ष देश मानता/कहता है। एक तथ्य यहाँ के लिए आश्चर्यजनक है। यहाँ जन्म लिया कोई भी बच्चा पैदा होते ही ‘मुस्लिम’ के रूप में सूचीबद्ध कर लिया जाता है। मुस्लिम ही उस बच्चे की राष्ट्रीय पहचान पत्र पर अंकित किया जाता है एक नागरिक के तौर पर। अगर किसी के माता-पिता ने अपने बच्चे के लिए उन्हें संवैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त अल्पसंख्यक धर्म में पंजीकृत नहीं किया हो तो तुर्की में पैदा हुआ हर बच्चा मुस्लिम है।