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धर्म बदलने वाले SC-ST नहीं ले सकते आरक्षण: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने धर्मांतरण के बाद लाभ को बताया ‘संविधान के साथ धोखा’

                               आरक्षण पर इलाहाबाद हाई कोर्ट का अहम फैसला (साभार: AI ChatGPT/Canva)
भारत की आरक्षण व्यवस्था को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला ‘क्रिप्टो क्रिश्चियन्स’ के लिए बड़ा झटका है। अपने फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ-साफ कहा है कि अगर कोई व्यक्ति हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई, इस्लाम या किसी अन्य गैर-हिंदू धर्म को अपना लेता है, तो वह अनुसूचित जाति (SC) या अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण लाभों का हकदार नहीं रहता।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इसे ‘संविधान के साथ धोखाधड़ी’ करार दिया है। यह फैसला जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि की सिंगल बेंच ने 21 नवंबर 2025 को सुनाया, जो जितेंद्र साहनी नाम के एक व्यक्ति की याचिका पर आधारित है। यह फैसला न सिर्फ उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव के विवाद से निकला है, बल्कि पूरे देश की आरक्षण नीति, धर्मांतरण के मुद्दे और सामाजिक न्याय की बहस को नई दिशा दे सकता है। आइए, जानते हैं क्यों महत्वपूर्ण है इलाहाबाद हाई कोर्ट का ये फैसला…

कैसे शुरू हुआ ये मामला, जो राष्ट्रीय स्तर पर बना महत्वपूर्ण

ये मामला उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले के सिंदुरिया थाने के अंतर्गत आने वाले ग्राम मथानिया लक्ष्मीपुर एकड़ंगा का है। यहाँ के निवासी जितेंद्र साहनी मूल रूप से केवट समुदाय से ताल्लुक रखते थे।

जितेंद्र साहनी ने अप्रैल 2023 में हाई कोर्ट में अर्जी देकर स्थानीय सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (SDM) से अपनी निजी जमीन पर रविवार और बुधवार को ‘यीशु मसीह के वचनों’ पर आधारित प्रार्थना सभाओं के आयोजन की अनुमति माँगी थी। SDM ने इसे मंजूरी दे भी दी थी, लेकिन स्थानीय हिंदुओं के विरोध के बाद 3 मई 2023 को यह अनुमति रद्द कर दी गई।

                                                         साहनी की याचिका

                                   याचिका का पूरा हिस्सा

हिंदू देवी-देवताओं पर विवादित टिप्पणी कर उनका मजाक उड़ाता था साहनी

ग्रामीणों का आरोप था कि साहनी ने इन सभाओं का इस्तेमाल गरीब हिंदू परिवारों को लालच देकर ईसाई मजहब अपनाने के लिए उकसाने के लिए किया। एक गवाह लक्षन विश्वकर्मा ने पुलिस जाँच में बयान दिया कि साहनी ने ग्रामीणों को इकट्ठा कर हिंदू देवी-देवताओं का मजाक उड़ाया।
लक्षन ने अपने लिखित बयान में कहा, “साहनी ने बताया कि हिंदू धर्म में हजारों देवी-देवता हैं। किसी के आठ हाथ, किसी के चार, किसी के चेहरे पर सूंड है। कोई चूहे की सवारी करता है, कोई मोर की। कोई भाँग पीता है, कोई गाँजा।” गवाह ने आगे आरोप लगाया कि साहनी ने कहा, “हिंदू धर्म में जाति के भेदभाव से कोई इज्जत नहीं मिलती, लेकिन ईसाई बनने से नौकरी, बिजनेस और मिशनरी से पैसे का फायदा होगा।”
                                                            गवाह का बयान रहा अहम
                                                       गवाह लक्षन के बयान की कॉपी

इन आरोपों पर पुलिस ने जितेंद्र साहनी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A (धर्म, जाति या जन्मस्थान के आधार पर शत्रुता फैलाना) और 295A (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना) के तहत मुकदमा दर्ज किया। 11 मार्च 2024 को चार्जशीट दाखिल हुई और 24 जुलाई 2024 को ACJM कोर्ट ने संज्ञान ले लिया।
साहनी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर इस मुकदमे को रद्द करने की गुहार लगाई। उनका दावा था कि सभाओं में कोई विवादास्पद भाषण नहीं हुआ और उन्हें झूठा फँसाया जा रहा है। लेकिन कोर्ट पहुँचते ही एक बड़ा राज खुल गया, वो ये था कि साहनी ने अपनी याचिका के साथ दाखिल हलफनामे में खुद को ‘हिंदू’ बताया, जबकि गवाह बयानों से साफ था कि वह ईसाई पादरी बन चुका था।
यह खुलासा कोर्ट के लिए आश्चर्यजनक था। अतिरिक्त सरकारी वकील पंकज त्रिपाठी ने CrPC की धारा 161 के तहत दर्ज गवाह बयानों का हवाला दिया। एक अन्य गवाह बुद्धि राम यादव ने भी पुष्टि की कि साहनी ने गरीबों को लालच देकर धर्मांतरण कराया। कोर्ट ने इसे गंभीरता से लिया और याचिका खारिज कर दी। जस्टिस गिरि ने कहा, “ट्रायल कोर्ट ही साक्ष्यों की जाँच करेगा। साहनी ट्रायल कोर्ट में डिस्चार्ज अर्जी दे सकते हैं, जहाँ वे दावा कर सकते हैं कि IPC की इन धाराओं के तत्व मौजूद नहीं हैं।”

धर्मांतरण के बाद SC वर्ग का लाभ लेना क्यों है संविधान के ‘धोखाधड़ी’?

अब सवाल यह है कि एक आपराधिक मुकदमे की याचिका से आरक्षण का मुद्दा कैसे जुड़ गया? कोर्ट ने साहनी के हलफनामे को ‘गुमराह करने वाला’ बताते हुए इसे संविधान के साथ धोखे का उदाहरण माना। जस्टिस गिरि ने स्पष्ट किया कि SC/ST लाभ केवल उन लोगों के लिए हैं जो हिंदू, सिख, बौद्ध या जैन परंपरा का पालन करते हैं। संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के पैराग्राफ 3 में साफ लिखा है- “कोई व्यक्ति जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म से अलग कोई अन्य धर्म मानता है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा।”
कोर्ट ने ‘हिंदू’ की परिभाषा पर भी रोशनी डाली। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 2 के अनुसार, हिंदू में सिख, बौद्ध, जैन और आर्य समाजी शामिल हैं। जो व्यक्ति मुस्लिम, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं है, वह हिंदू माना जाता है। SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 2(c) भी इसी पर आधारित है। अनुच्छेद 341 और 342 के तहत SC/ST की सूची में केवल हिंदू, सिख या बौद्ध ही आ सकते हैं।
कोर्ट ने जोर दिया कि ईसाई या इस्लाम जैसे मजहबों में जाति व्यवस्था मान्य नहीं है। इसलिए इन मजहबों को अपनाने वाले व्यक्ति ऐतिहासिक जातिगत भेदभाव का शिकार नहीं रहते। SC/ST अधिनियम का मकसद ऐसी समुदायों की रक्षा करना है जो सदियों से जाति-आधारित उत्पीड़न झेलते आए हैं। अगर कोई व्यक्ति धर्म बदल लेता है, तो वह इस संरक्षण का हकदार नहीं रहता।
जस्टिस गिरि ने कहा, “धर्मांतरण के बाद SC दर्जा बनाए रखना संविधान के साथ धोखा है। यह आरक्षण नीति के मूल सिद्धांतों – सामाजिक न्याय और समानता के खिलाफ है।”

सुप्रीम कोर्ट और अन्य फैसलों का जिक्र, कानूनी इतिहास के फैसलों का रेफरेंस

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुप्रीम कोर्ट के पुराने और नए फैसलों को ध्यान में रखकर सुनाया। इन फैसले में सबसे प्रमुख है 2024 का C. Selvarani vs. Special Secretary-District Collector मामला। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सिर्फ लाभ के लिए धर्मांतरण करना ‘संविधान के साथ धोखाधड़ी’ है। तमिलनाडु की एक महिला ने ईसाई बनने के बाद भी SC प्रमाणपत्र का दावा किया था, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया था। इस मामले में जज ने चेतावनी दी थी कि अगर धर्मांतरण सिर्फ आरक्षण का लाभ लेने के लिए छिपाया जा रहा है, तो यह इस नीति के खिलाफ है।
                                           तमिलनाडु के मामले का हाई कोर्ट ने किया जिक्र
इसके अलावा इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साल 1986 के Soosai vs. Union of India मामले को भी अपने फैसले के रेफरेंस में शामिल किया। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि SC नियम केवल हिंदू या सिख मानने वालों पर लागू होते हैं। साल 2015 के K.P. Manu vs. Chairman, Scrutiny Committee में तीन शर्तें बताई गईं: (1) जाति की मान्यता, (2) मूल धर्म में वापसी और (3) समुदाय की स्वीकृति। इसके बिना किसी तरह के आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता है।
                                                            सूसई केस का रेफरेंस
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2025 के आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के Akkala Rami Reddy vs. State of A.P. का भी हवाला दिया। इसमें ईसाई बन चुके व्यक्ति को SC/ST अधिनियम के तहत सुरक्षा से वंचित कर दिया गया, क्योंकि ईसाई धर्म में जाति भेदभाव नहीं है। आंध्र प्रदेश के हाई कोर्ट ने कहा था कि ऐसे (कन्वर्टेड) व्यक्ति को अब उत्पीड़न का शिकार नहीं माना जा सकता।”
ये फैसले दिखाते हैं कि धर्मांतरण और आरक्षण का मुद्दा नया नहीं। 1950 के संविधान आदेश से ही यह स्पष्ट था, लेकिन हाल के वर्षों में मिशनरी गतिविधियों और आरक्षण दुरुपयोग के आरोपों से यह बहस तेज हो चुकी है।

हाई कोर्ट ने जाँच और कार्रवाई के लिए दिए सख्त निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वो निर्देश हैं, जिसमें कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों (DM) को 4 महीने (मार्च 2026 तक) का समय दिया कि वे राज्य में ऐसे मामलों की जाँच करें, जहाँ धर्म बदल चुके लोग SC/ST लाभ ले रहे हैं। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने जाँच के बाद कानूनी कार्रवाई को भी जरूरी बताया है, साथ ही सभी DM को मुख्य सचिव को रिपोर्ट देने को भी कहा है।
                                  इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले की कॉपी का स्क्रीनशॉट
इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महाराजगंज के DM को विशेष निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि महाराजगंज के डएम को साहनी के धर्म की 3 महीने में जाँच करनी होगी। अगर साहनी का हलफनामा फर्जी साबित होता है, तो उसके खिलाफ फर्जीवाड़े के मामले में सख्त कार्रवाई के लिए कहा है। ताकि भविष्य में इस तरह के फर्जी हलफनामे दाखिल न किए जा सकें और फर्जीवाड़ों पर रोक लग सके।
                                                            हाई कोर्ट के फैसले का हिस्सा

अल्पसंख्यक और एससी-एसटी दर्जे के बीच के अंतर को स्पष्ट करे सरकार

इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले से केंद्र और राज्य स्तर पर भी हलचल मचनी तय है। क्योंकि हाई कोर्ट ने भारत सरकार के कैबिनेट सचिव, UP के मुख्य सचिव, समाज कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव, अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव को निर्देश दिए हैं कि वो अल्पसंख्यक दर्जा (ईसाई/मुस्लिम) और SC दर्जे के बीच सख्त अंतर सुनिश्चित करें। कोर्ट ने एडिशनल गवर्नमेंट एडवोकेट को ये आदेश सभी अधिकारियों तक पहुँचाने का जिम्मा भी सौंपा है।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “प्रिंसिपल सेक्रेटरी/एडिशनल चीफ सेक्रेटरी, माइनॉरिटीज वेलफेयर डिपार्टमेंट, गवर्नमेंट ऑफ यूपी को भी मामले को देखने और सही कार्रवाई करने या अधिकारियों को निर्देश देने के लिए उचित आदेश पारित करने का निर्देश दिया जाता है ताकि कानून को असलियत/सही मायने में लागू किया जा सके। एडिशनल चीफ सेक्रेटरी, सोशल वेलफेयर डिपार्टमेंट को भी कानून के अनुसार काम करने का निर्देश दिया जाता है।”

सरकारों की बढ़ी जिम्मेदारी

इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद अब UP सरकार के लिए चुनौती बढ़ गई है। यूपी सरकार की जाँच में 4 महीने में फर्जीवाड़ों के हजारों मामले सामने आ सकते हैं। ऐसे में अल्पसंख्यक कल्याण विभाग को SC और माइनॉरिटी लाभों के बीच बैलेंस भी बनाना पड़ेगा। वहीं, आने वाले समय के लिए सरकारों को भी SC/ST प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया कड़ी करनी पड़ सकती है। खासकर क्रिप्टो क्रिश्चियन जैसे मामलो में।

क्रिप्टो क्रिश्चियन कौन होते हैं?

ऑपइंडिया अपनी रिपोर्ट्स में पहले भी क्रिप्टो क्रिश्चियन को लेकर साफ तौर पर बता चुका है कि अपने धर्म को छिपाकर खुद को मूल धर्म का दिखाना और संवैधानिक फायदों को उठाते रहने वाले लोग क्रिप्टो क्रिश्चियन की श्रेणी में आते हैं। जितेंद्र साहनी का भी मामला ऐसा ही है।
जितेंद्र साहनी मूल रूप से हिंदू धर्म के केवट जाति से आते हैं। लेकिन उन्होंने धर्मांतरण कर खुद को ईसाई होना स्वीकार किया। इसके साथ ही कथित तौर पर वो एससी-एसटी वर्ग के लिए दिए जाने वाले सारे फायदे भी प्राप्त करते रहे। उनकी हिम्मत देखिए, कि उन्होंने खुद को हाई कोर्ट में भी हिंदू बताया, जबकि पूरे मामले में साफ है कि वो न सिर्फ ईसाई बन चुका है, बल्कि वो पादरी जैसा पद भी अपने पास रखता है।
क्रिप्टो क्रिश्चियन का एक सबसे अलग और अनोखा रूप ये है कि एक तरफ जहाँ जितेंद्र खुलेआम ईसाइयत का पालन करता है, तो कई ऐसे लोगों को उसने ईसाई बनाया, जिन्होंने न तो सार्वजनिक तौर पर खुद को ईसाई बताया और न ही अपना नाम और धर्म और न ही पहचान बदली। यानि ऐसे लोग कागजों पर हिंदू-दलित बनकर मलाई भी चाट रहे और प्रैक्टिस ईसाई मजहब की करते हैं।

आरक्षण नीति पर नया सवाल, सामाजिक बहस की शुरुआत

भारत संविधानिक रूप से धर्मनिरपेक्ष है। अनुच्छेद 25 हर नागरिक को धर्म चुनने की आजादी देता है। लेकिन कोर्ट ने कहा, “धर्म बदलना व्यक्तिगत विश्वास से होना चाहिए, न कि लाभ के लिए।” ऐसे में कोर्ट का यह फैसला आरक्षण व्यवस्था की नींव को मजबूत करता है। SC/ST कोटा शिक्षा, नौकरी और राजनीति में 22.5% आरक्षण देता है, जो राज्यों के स्तर पर अलग-अलग होता है। लेकिन इसके दुरुपयोग के आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं। कुछ लोग इस वर्ग को मिलने वाले लाभ के लिए धर्म बदलकर भी योजनाओं का लाभ लेते रहते हैं। ऐसे में कोर्ट के फैसले ने इस तरह के फर्जीवाड़े को रोकने का रास्ता दिखा दिया है।

इस पूरे मुद्दे पर ऑपइंडिया ने सीनियर एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय से बातचीत की। उन्होंने कहा, “इलाहाबाद हाई कोर्ट का जो रिजर्वेशन के ऊपर फैसला है, बिल्कुल ठीक फैसला है। हमारे संविधान निर्माता भी यही कह रहे थे कि जो हिंदू दलित है, जो हिंदू में पिछड़े हैं, ट्राइबल है, उनको ही रिजर्वेशन का फायदा मिलेगा। जो हिंदू कन्वर्ट हो जाएगा, चाहे वह इस्लाम में चला जाए या ईसाइयत में चला जाए, उसको रिजर्वेशन का फायदा नहीं मिलेगा। यह संविधान निर्माताओं की भी मंशा थी। यही संविधान भी कहता है और यही हाई कोर्ट का फैसला भी है।”

अपनी बात आगे बढ़ाते हुए अश्विनी उपाध्याय ने कहा, “आप एक तरफ रिजर्वेशन का फायदा लो। यह कहते हुए हम तो ऐसी हैं और फिर दूसरी तरफ आप कन्वर्ट भी हो जाओ। अगर इसकी इजाजत दी गई तो कन्वर्जन बढ़ेगा और यह हमारे संविधान निर्माता बिल्कुल नहीं चाहते थे। रिजर्वेशन का सिस्टम लाया गया था। वह बहुत लिमिटेड समय के लिए लाया गया था। वह गरीबों के लिए लाया गया था। वो केवल और केवल हिंदुओं के लिए लाया गया था।”
एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय ने कहा, “कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट आए हुए यह कहने के लिए एक नई नई दलितों की स्थिति तो वैसे ही रहती है। भले वह क्रिश्चियन बन जाए या इस्लाम कबूल कर लें। उस पर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सवाल पूछा ता कि अगर कन्वर्जन के बाद भी वही स्थिति रहनी है, तो फिर कन्वर्जन क्यों करना? फिर तो हिंदू बने रह सकते हैं। हालाँकि इसका जवाब अभी तक नहीं आया है। ये मामला सुप्रीम कोर्ट में भी पेंडिंग है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में माँग की गई थी कि इस्लाम-ईसाई मजहब अपनाने वालों को भी SC-ST का फायदा मिलना चाहिए, लेकिन अभी तक इस पर कोई फैसला नहीं आया है।
ऑपइंडिया से बातचीत में अश्विनी उपाध्याय ने आगे कहा, “इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला यूपी के लिए है लेकिन हाईकोर्ट का फैसला यह अपने आप में एक तरीके से बिल्कुल परफेक्ट फैसला है। इसलिए मध्य प्रदेश की सरकार, महाराष्ट्र की सरकार, देश के सभी अन्य राज्य सरकारों को भी इस फैसले को अपने स्तर पर लागू करना चाहिए और जो लोग कन्वर्ट हो गए हैं, चाहे वो इस्लाम में चले गए हों या ईसाई में, उनका एससी-एसटी का दर्जा खत्म करना चाहिए। उनको एससी-एसटी के मिलने वाले लाभ बंद होने चाहिए। जो लोग केवल हिंदू में रहते हैं और दलित हैं, उनको ही इसका फायदा मिलना चाहिए।”

न्याय की राह में अहम कदम है इलाहाबाद हाई कोर्ट का ये फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला जितेंद्र साहनी के व्यक्तिगत मामले से कहीं आगे जाता है। यह संविधान की भावना को बचाने की कोशिश है, जिसमें आरक्षण उत्पीड़ितों के उत्थान के लिए, न कि धोखे के लिए। जस्टिस गिरि की बेंच ने साफ कहा, “भारत सेक्युलर है, लेकिन कानून अंधा नहीं है।”
हालाँकि अब गेंद प्रशासन के पाले में आ गई है। ऐसे में क्या हाई कोर्ट के आदेश के मुताबिक, हाई कोर्ट के इस फैसले पर यूपी सरकार सख्ती से अमल करती है या फिर वो सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगी, ये तो आने वाला समय ही बताएगा। वैसे, एक बात अब साफ हो चुकी है कि सामाजिक न्याय की यह लड़ाई के नाम चल रहे धर्मांतरण रैकेटों और फर्जीवाड़ा करने वाले लोगों के लिए आगे की राह कठिन हो चली है।

मिर्जापुर : क्रिसमस पर बड़े पैमाने पर 2000+ को ईसाई बनाने का खेल धर्मांतरण कराने वाला मिशनरी गिरोह का खेल फेल हुआ, 8 महिला-पादरी समेत 11 गिरफ्तार

ईसाई धर्मांतरण रैकेट का भंडाफोड़ (फोटो साभार: AI GROK)
उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के देहात इलाके में दो साल से चल रहा एक सीक्रेट गेम का खुलासा हो गया। यहाँ के खरहरा गाँव के छोटे से चर्च में हिंदू परिवारों को ईसाई बनाने का काम चल रहा था। लेकिन स्थानीय युवक की समझदारी के चलते मिशनरी गैंग का पर्दाफाश हो गया।

मिर्जापुर में रविवार (14 दिसंबर 2025) को हुई पुलिस छापेमारी में चर्च के पादरी भोलानाथ पटेल समेत 11 लोग गिरफ्तार हुए हैं। ऑपइंडिया के पास इस पूरे मामले की FIR की कॉपी मौजूद है। जिसमें इस गंदे खेल के बारे में विस्तार से जानकारी दर्ज है।

सूत्रों के मुताबिक, 25 दिसंबर को क्रिसमस पर बड़े पैमाने पर धर्मांतरण की साजिश रची जा रही थी। लेकिन सवाल यह है कि आखिर यह सब कैसे शुरू हुआ? दो सालों में सैकड़ों परिवार क्यों फँसते चले गए? इस ग्राउंड रिपोर्ट में मिशनरी गिरोह के कारनामों को उजागर किया गया है।

किसान की सतर्कता से खुला धर्मांतरण का गंदा खेल

मिर्जापुर के इस इलाके में गंगा की लहरें विंध्याचल की पहाड़ियों से टकराती हैं। इलाके में गरीबी और बेरोजगारी फैली है। छोटे-छोटे गांवों में किसान, मजदूर और दिहाड़ी मजूर दिन-रात गुजारते हैं। यहीं के कुरकुठिया गाँव के रहने वाले आनंद दुबे (35 वर्ष) एक साधारण किसान हैं। उनके दो बच्चे हैं और पत्नी लंबे समय से बीमार है, जिसकी वजह से घर का खर्चा मुश्किल से चलता है।

आनंद ने मिशनरियों के खेल को बताते हुए कहा, “साहब, एक हफ्ते पहले एक आदमी आया था। नाम था भोलानाथ पटेल, खुद को पादरी बताता था। बोला, ‘भाई, तुम्हारी परेशानियाँ खत्म हो जाएँगी। जीसस भगवान के आश्रय में आ जाओ। पैसे देंगे, बच्चों की फ्री पढ़ाई कराएँगे, बीवी का इलाज मुफ्त में होगा। शादी-ब्याह में भी मदद करेंगे।’ मैंने सोचा, गरीब आदमी हूँ, क्या बिगड़ जाएगा। लेकिन जब रविवार को चर्च बुलाया, तो वहाँ का नजारा देखकर रोंगटे खड़े हो गए।”

2023 से जारी है खरहरा चर्च में धर्मांतरण का खेल

आनंद की यह कहानी कोई पहली नहीं है। दो साल पहले साल 2023 के आखिर से खरहरा चर्च में अनगिनत लोगों का धर्मांतरण कराया जा चुका है। बहुत सारे लोग लल्लू से जोसेफ जैसे नाम वाले हो चुके हैं। दिखने में खरहरा गाँव का चर्च पुराना लगता है, लेकिन अंदर से काफी सजा-धजा है। यहाँ आसपास के गाँवों कुरकुठिया, बढ़ौली, लेढ़ू, जसोहर पहाड़ी से लोग आते रहते हैं। किसी की तबियत ठीक नहीं रहती, तो कोई आर्थिक रूप से टूटा हुआ है और इन सबका फायदा उठाते हैं धर्मांतरण गिरोह, जो लोगों को छल-कपट से ईसाई बनाते हैं।
एक व्यक्ति ने नाम न छापने की शर्त पर ऑपइंडिया से कहा, “बहू की तबीयत खराब थी। डॉक्टरों ने कहा-ऑपरेशन के 50 हजार लगेंगे। पादरी साहब आए, बोले ‘चिंता मत करो, जीसस सब ठीक कर देंगे। बस, प्रार्थना में शामिल हो जाओ।’ हम गए, पानी छिड़क दिया, नाम बदल दिया। पैसा मिला भी लेकिन अब लगता है धोखा हुआ है।” उन्होंने कहा कि बेटे ने बताया कि वो घर वापसी भी नहीं कर सकते, क्योंकि पादरी और उनके लोगों ने ईसाई बनाते समय उनका वीडियो-फोटो लिया हुआ है।

पादरी भोलानाथ पटेल संभालता है धर्मांतरण का खेल

मिर्जापुर के इस छोटे से गाँव में धर्मांतरण का पूरा खेल संभालता है पादरी भोलानाथ पटेल। खुद मूल रूप से गाजीपुर जिले के रेवतीपुर थाना इलाके में आने वाले तिवला गाँव का है। वो रहता भी पहले लखनऊ में था, जहाँ वो सेंट जीसस स्कूल में पढ़ाता था। टीचर थे।
पुलिस ने जब भोलानाथ पटेल और उसकी पत्नी को गिरफ्तार किया, तो उसने खुद के ईसाई बनने की कहानी बताई। भोलानाथ ने बताया, “साल 2008 में मुझे किडनी की गंभीर बीमारी हुई थी। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था, लेकिन ईसाई प्रार्थना सभा में शामिल होने के बाद वे ‘चमत्कारिक’ तरीके से ठीक हो गए।”
भोलानाथ (पुलिस पूछताछ के दौरान) ने बताया, “मैंने जीसस का शुक्रिया अदा किया। उसी ने मुझे नई जिंदगी दी। तब से मैंने फैसला किया, दूसरों को भी यह रास्ता दिखाऊँगा।” इसके बाद भोलानाथ को लखनऊ के मिशनरी कार्यालय से खरहरा चर्च भेजा गया। यहाँ वो अपनी पत्नी माया पटेल के साथ रहने लगा। बीवी माया महिलाओं को धर्मांतरण के जाल में फँसाती, तो खुद भोला पुरुषों को।

सामाजिक बहिष्कार के शिकार हो चुके हैं ईसाई बने लोग

भोलानाथ के मुताबिक, “हम कोई जबरदस्ती नहीं करते। लोग खुद आते हैं। जीसस की कृपा से उनकी जिंदगी बदल जाती है।” लेकिन ग्रामीणों का कहना अलग है। विजय (नाम-परिवर्तित) ने कहा, “मैंने पहले धर्मांतरण किया था। शुरु में ये अच्छा लगता था। पैसे भी मिले, नौकरी भी लगी। लेकिन अब लगता है, हमारी पहचान ही छीन ली गई। गाँव वाले ताने मारते हैं।”
14 दिसंबर 2025 को दोपहर करीब 12:45 बजे आनंद दुबे को चर्च बुलाया गया। वहाँ 35-40 ग्रामीण थे, ज्यादातर आर्थिक रूप से कमजोर। पादरी भोलानाथ ने कहा, “आज तुम जीसस भगवान के आश्रय में आओगे। सारी तकलीफें खत्म हो जाएँगी। जो ना मानेगा, उसके साथ बुरा होगा।”
पादरी ने आनंद पर पवित्र पानी छिड़का, नाम बदलकर ‘जोसेफ आनंद’ कर दिया। फिर ‘पवित्र डुबकी’ की रस्म शुरू की, लेकिन आनंद हल्ला मचाकर भाग निकले। सीधे थाने पहुँचे और तहरीर दी।
शिकायत पाने के बाद सक्रिय हुई पुलिस ने तुरंत छापेमारी की और भोलानाथ, माया, कृष्णकांत तिवारी, अंगनू प्रसाद, फूलपत्ती, निशा देवी, सुशीला देवी, हीरावती देवी, रेनू, लक्ष्मी और साधना समेत को 11 को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस को मौके से चार बाइबल, 10 कॉपी-किताबें, तीन स्मार्टफोन और एक की-पैड फोन मिले। लोगों के वीडियो और फोटो थे, जो धर्मांतरण की रस्मों के थे। इस मामले में पुलिस ने उत्तर प्रदेश धार्मिक विधि (संशोधन) अधिनियम 2021 की धारा 3 और 5(1) के तहत मामला दर्ज किया है।
ऑपइंडिया के पास उपलब्ध एफआईआर की कॉपी के मुताबिक, तहरीर में आनंद दुबे ने लिखा,”मेरी पत्नी को पुरानी बीमारी है। एक सप्ताह पूर्व आरोपी भोलानाथ पटेल उर्फ पादरी जीसस चर्च खरहरा आकर मेरे घर पर आया और बोला कि यदि आप ईसाई धर्म अपना लेंगे तो आर्थिक लाभ, बच्चों की फ्री शिक्षा, मेडिकल सुविधा आदि प्रदान की जाएगी। मैंने सहमति जताई। आज (14 दिसंबर 2025) को दोपहर लगभग 12:45 बजे मुझे चर्च बुलाया। वहाँ 35-40 ग्रामीण उपस्थित थे।”
                                                                 एफआईआर की कॉपी
आनंद ने आगे लिखा है, “आरोपित भोलानाथ पटेल, माया पटेल, कृष्णकांत तिवारी, अंगनू प्रसाद, निशा देवी, सुशीला देवी, हीरावती देवी, रेनू, लक्ष्मी, साधना और फूलपत्ती मौजूद थे। उन्होंने कहा कि जीसस भगवान के आश्रय में आ जाओ, सारी पीड़ाएँ समाप्त हो जाएँगी। ना मानने पर दुर्भाग्य आएगा। उन्होंने मेरे ऊपर पवित्र जल छिड़का, नाम ‘जोसेफ आनंद’ रखा और पवित्र स्नान कराने का प्रयास किया। मैंने विरोध किया और भाग आया। यह अवैध धर्मांतरण है।”
                                                                    एफआईआर की कॉपी

प्रशासन कर रहा कार्रवाई, पूछताछ जारी

वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक सोमेन बर्मा ने बताया, “धर्म परिवर्तन के काम में लगे 11 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। आरोपी लोगों को प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन करा रहे थे। उनके पास से मजहबी पुस्तकें और मोबाइल फोन बरामद किए गए हैं। खुफिया सूचना थी कि 25 दिसंबर को बड़े स्तर पर धर्मांतरण होने वाला था। जाँच जारी है।”
देहात कोतवाल अमित मिश्रा ने खुलासा किया, “खरहरा चर्च में लगभग दो हजार लोगों का धर्मांतरण कराने की साजिश थी। स्थानीय और आसपास के गाँवों के भोले-भाले लोग निशाना बनाए जा रहे थे। पादरी भोलानाथ लखनऊ से फंडिंग लेता था। हम सख्ती से कार्रवाई करेंगे।”

साल 2023 से धर्मांतरण के 15 केस आ चुके हैं सामने

बीते 2 सालों में मिर्जापुर में ईसाई मिशनरी की सक्रियता ने स्थानीय प्रशासन को हिलाकर रख दिया है। 2023 से अब तक कम से कम 15 मामले दर्ज हो चुके हैं, जिनमें अवैध धर्मांतरण के आरोप लगे हैं। इनमें से 11 मामले युवतियों को बहला-फुसलाकर भगाने, फिर धर्म परिवर्तन कर शादी कराने के हैं। बाकी चार बड़े रैकेट से जुड़े हैं।
उदाहरण के तौर पर, विंध्याचल थाने में एक केस दर्ज हुआ, जिसमें भुजवा चौकी के विजय एम को गिरफ्तार किया गया। अहरौरा थाने में 30 सितंबर 2025 को देव सहायम डेनियर समेत पाँच गिरफ्तार हुए। लालगंज पुलिस ने जेम्स उर्फ रामदीन उर्फ राजू और उनकी पत्नी सरिता देवी को पकड़ा। इन मामलों में प्रलोभन का पैटर्न एक जैसा रहा- पैसे, नौकरी, शिक्षा।
इन 15 मामलों ने न सिर्फ परिवारों को तोड़ा है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी प्रभावित किया है। ग्रामीणों में डर का माहौल है। एक सामाजिक कार्यकर्ता, बजरंग दल के शांतनु तिवारी ने कहा, “ये मिशनरी गरीबी का फायदा उठाते हैं। हिंदू समाज जागे, तो ये रुकेंगे।” खरहरा की यह घटना एक चेतावनी है। गरीबों के सपनों पर डाका डालने वाले इस खेल को रोकना होगा, वरना और कितने आनंद दुबे फँसेंगे?

‘अकेले में लगाता था जबरन गले, गंदे ढंग से छूता था’: 22 साल की महिला ने पादरी बजिंदर पर लगाया यौन उत्पीड़न का आरोप

                                            पादरी बजिंदर सिंह (साभार: X/AskAnshul)
पंजाब के कपूरथला में 22 साल की एक महिला ने पादरी बजिंदर सिंह पर उसकी किशोरावस्था में यौन उत्पीड़न करने का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई है। पंजाब पुलिस ने शुक्रवार (28 फरवरी) को ईसाई प्रचारक बजिंदर के खिलाफ यौन उत्पीड़न, आपराधिक धमकी देने और पीछा करने का मामला दर्ज कर लिया है। पीड़िता दिसंबर 2017 से पादरी बजिंदर सिंह की मंडली में शामिल हो रही थी।

पीड़िता 2020 तक पादरी की ‘वर्शिप टीम’ का हिस्सा गई। बकौल पीड़िता, उसका फ़ोन नंबर लेकर पीड़िता उसे अश्लील मैसेज भेजना शुरू कर दिया। उस समय वह 17 की साल थी। FIR में लिखा है, “मैं उससे डरने लगी, लेकिन माता-पिता से बताने में कतराती थी। 2022 में उसने मुझे रविवार को अपने केबिन में बैठाने लगा। जब मैं अकेली होती तो वह मुझे जबरन गले लगाता और गंदे तरीके से छूता था।”

पीड़ित महिला ने बताया, “जब मैं कॉलेज जाती थी तो वह अपनी कार से मेरा पीछा करने लगा। वह मुझे धमकी देता था कि अगर मैंने उससे शादी नहीं की या इस बारे में अपने माता-पिता को बताया तो वह मेरे माता-पिता और भाई को मरवा देगा। इसके बाद मुझे घबराहट के दौरे पड़ने लगे।” पीड़िता ने बताया कि पादरी बजिंदर सिंह ने उससे शादी करना चाहता था, जबकि वह पहले से ही शादीशुदा था।

पीड़िता का कहना है कि पादरी की धमकियों और उत्पीड़न से उसे पैनिक अटैक आने लगे। इसके कारण उसे 3 अलग-अलग अस्पतालों में इलाज करवाना पड़ा। पीड़िता ने पुलिस को यह भी बताया कि मार्च 2023 में एक अन्य ईसाई प्रचारक राजा सिंह से शादी से पहले पादरी बजिंदर ने उसे धमकाया था। उसने अपने चर्च के अध्यक्ष से उसकी माँ से बात करवाकर चुप रहने के लिए धमकाया था।

पादरी बजिंदर सिंह ‘चर्च ऑफ ग्लोरी एंड विजडम’ चलाता है। इस पादरी को लोग ‘चमत्कारी उपचार’ के लिए भी जानते हैं, जो लोगों को ईसाई धर्म में लुभाने के लिए यह पादरी आजमाता है। पादरी बजिंदर को इससे पहले जुलाई 2018 में पंजाब के जीरकपुर में एक महिला से बलात्कार करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। उससे भी पहले वह हत्या के एक मामले में जेल में बंद था।

पंजाब का हो रहा ईसाईकरण; पगड़ी-कड़ा वाले ईसाई चारों तरफ; कहाँ है अकाल तख़्त? क्या कर रही है सिख संगत? क्या पंजाब सरकार और शिरोमणि प्रबंधक कमेटी सो रही है?

             पंजाब में ईसाइयत स्थानीय रूप ले चुकी है (फोटो साभार : Ankur Narula Ministries/YT)
किसी सिख द्वारा जाने-अनजाने कोई गलत काम होने पर अकाल तख़्त उसे तनखैया घोषित कर देता और जितने भी सिख संगठन है सभी अकाल तख़्त का समर्थन करते हैं, लेकिन अकाल तख़्त की नाक के नीचे सिख धर्म को कुचला जा रहा है, सिखों का ईसाईकरण हो रहा है अकाल तख़्त और अन्य सिख संगठन खामोश क्यों? क्या कर रही है भगवंत सिंह मान सरकार? क्या पंजाब सरकार के साथ प्रशासन भी सो रहा है? क्या सिखों को ईसाइयत बनाने का काम उनके इशारे पर हो रहा है? यदि समय रहते अकाल तख़्त और अन्य सिख संगठनों ने कार्यवाही नहीं की, फिर वो दिन भी अधिक दूर नहीं जब गुरुद्वारा गोल्डन टेम्पल चर्च न बन जाए?      

पंजाब में ईसाइयत तेजी से पैर पसार रही है। इस बार ईसाई बनाने वालों ने नई तरकीब अपनाई है। नए ईसाइयों का नाम पीटर, जॉन या रिचर्ड नहीं है। नए ईसाई गुरविंदर, प्रीतिंदर या जसप्रीत जैसे ही नाम वाले हैं। उनके सिरों पर सिक्खी की पहचान पगड़ी भी है। कई के हाथ में पंच ककार की पहचान बताने वाला कड़ा भी है। लेकिन उनकी जबान पर नाम नानक जी का नहीं बल्कि यीशु मसीह का है। ईसाइयत का यह स्थानीय वर्जन हर तरीके की समस्या हल करने का दावा करता है। कोट पैंट पहनने वाले पास्टर चमत्कार दिखाते हैं।

ईसाइयत का हो गया लोकलाइजेशन

 विज्ञान में एक थ्योरी है, अगर आप एक मेंढक को उबलते पानी में डाल देंगे, तो वह उछल कर भाग जाएगा। लेकिन आप ठन्डे पानी में मेंढक को डाल दें और धीमे-धीमे पानी गरमाएँ, तो अपनी ऊर्जा नए तापमान पर एडाप्ट होना में लगाएगा और जबतक तापमान उसे जलाने के स्तर तक पहुँचेगा, वह अपनी शक्ति खो चुका होगा। पंजाब और ईसाइयत का यही नाता है। पंजाब में ईसाइयत को फ़ैलाने वालों ने लोगों को धीमे-धीमे तरबियत देना चालू किया है। नई मिशनरियाँ ना किसी को नाम बदलने को कहती हैं, ना ही अपनी पहचान।

                                       किताबों का बदला स्वरुप (साभार: आजतक)

आजतक की एक ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि पंजाब के सीमाई इलाकों में बड़ी संख्या में चर्च और मिनिस्ट्री (जहाँ पास्टर रहते हैं और ईसाइयत से जुड़े काम होते हैं) फैली हुई हैं। रिपोर्ट बताती है कि यहाँ चर्च का नाम बदल कर ‘यहोवा दा मंदिर’ हो गया है। पास्टर यानी पादरी को ‘पापा जी’ कहा जाता है। बाइबल और बाकी किताबों को ‘पवित्र शास्त्र’ या ‘नीतिवचन’ जैसे नामों से चलाया जाता है। यहाँ तक कि यीशु की प्रार्थना में गाए जाने वाले ईसाई भजन भी पंजाब में आकर टप्पे (स्थानीय संगीत) और भजन का रूप ले लिया है।

अगर आप भजन के बोल पर ध्यान ना दें, तो शायद बता भी ना पाएँ कि कोई यीशु की शान में कसीदे पढ़ रहा है। पंजाब में ईसाइयत का नया ढाँचा आपकी पहचान नहीं बदलता, आपके विचार जरूर बदल देता है। आपको अपने मूल धर्म से दूर कर देता है। यह काफी सोच समझ कर किया गया है। ईसाइयत में लाए जा रहे लोगों को लगता है कि कुछ भी ऐसा नहीं बदल रहा जो उनको बाहर से दिखे, ऐसे में क्या बुराई है। इन्हीं को ‘क्रिप्टो क्रिश्चियन’ कहते हैं।

चमत्कार की कहानी, पवित्र तेल और गवाहियाँ

आजतक की ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, ईसाइयत को फैलाने के लिए बनाई गई मिनिस्ट्री का रकबा एकड़ों में है। ऐसी ही एक मिनिस्ट्री में आजतक की एक पत्रकार पहुँची थी। यह पास्टर अंकुर नरूला की थी। यहाँ विश्व का चौथा सबसे बड़ा चर्च बन रहा है। रिपोर्ट बताती है कि इस संस्थान के भीतर हर कदम पर वो लोग खड़े हैं, जो अपनी चमत्कार की कहानी सुनाते हैं। सारी कहानियों में ईसाइयत या फिर ‘पापा जी’ की शरण में आने से पहले की दुखभरी कहानी होती है, जबकि शरण के बाद सारी समस्याएँ खत्म हो चुकी होती हैं।

आजतक की रिपोर्ट के अनुसार, यहाँ मिले हुए लोग नए आए लोगों को दिल का दौरा सही होने से लेकर कैंसर ठीक करने तक के चमत्कार बताते हैं। आजतक की एक रिपोर्टर को एक महिला अपनी माँ के दिल का दौरा सही करने की कहानी सुनाती है। वह यहाँ मिलने वाले एक पवित्र तेल का प्रताप इसमें बताती है। रिपोर्ट बताती है कि इस मिनिस्ट्री के भीतर कई काउंसिलर तक बैठे हैं। वह यहाँ आने वालों की समस्या सुनते हैं। उनकी विदेश जाने जैसी इच्छाएँ भी सुनते हैं। हर तरह की समस्या के लिए एक अलग काउन्टर बनाया गया है।

इन चर्च में हर चीज के लिए दुआ करवाई जाती है। सास-बहू का झगड़ा हो या भूत-प्रेत का साया, कोई अगर अपने पैर पर नहीं चल पाता तो उसके लिए भी प्रार्थनाएँ भी हैं। हेल्पलाइन नम्बर भी है। यूट्यूब पर अंकुर नरूला के चैनल पर ऑटिज्म वाले बच्चे को सही करने से लेकर विदेश यात्रा तक के किस्से पड़े हैं। इन्हें अंकुर नरूला के लोग गवाहियां कहते हैं। इसी चैनल पर एक वीडियो पड़ी है, जिसमें पश्चिम बंगाल में किसी जगह पर लोग अजीब तरह से अपने शरीर को झूंकते दिखते हैं। इसमें भी ना जाने कितने लोगों का चमत्कार दिखाया गया है।

लगातार पॉपुलर होते पास्टर

पंजाब में ईसाइयत फ़ैलाने के मिशन के केंद्र में कुछ पास्टर हैं। इनकी पूरी व्यवस्थाएँ हैं। बड़े बड़े चर्च हैं। इनमें सबसे चर्चित नाम ‘तेरी बहन बोल नहीं सकती थी’ से फेमस हुए बजिंदर सिंह का है। उनके अलावा अंकुर नरूला एक दूसरा बड़ा नाम हैं। तीसरा बड़ा नाम गुरनाम सिंह खेड़ा हैं। गुरनाम पहले पंजाब पुलिस में इंस्पेक्टर थे। एक और नाम अमृत संधू का है। सुखपाल राणा भी ईसाइयत फैलाने वाले एक बड़े किरदार हैं। इन सबके अलावा एक महिला पास्टर कंचन मित्तल भी पंजाब में काफी सक्रिय हैं।

                                                     अंकुर नरूला और कंचन मित्तल

इन सबके बीच एक चीज कॉमन हैं। इनमें से अधिकांश पेंटाकोस्टल खेमे से जुड़े हैं। यह ईसाइयत का ही एक रूप है। ईसाइयत को बढ़ावा दे रहे यह लोग सालों पहले अपना पूर्व धर्म छोड़ चुके हैं, लेकिन नाम वैसा ही है, ताकि स्थानीय लोगों से जुड़ने में मदद मिले। सबको यूट्यूब पर लाखों फॉलोअर हैं। सबके यूट्यूब पर चमत्कार के किस्से हैं। कहीं कोई किसी महिला के माँ बनने का किसा बताता है तो कोई जन्म से अपाहिजों को चलाने का।

                                                      अंकुर नरूला के एक प्रोग्राम की भीड़

निशाने पर कौन?

पंजाब में लगातार ईसाइयत को बढ़ावा दे रहे इन लोगों का पहला निशाना वो लोग हैं, जो किसी समस्या से परेशान हैं। दूसरे वो हैं जिनके मन में विदेश जाने जैसी अभिलाषाएँ हैं। यह सभी पास्टर इन सारी समस्याओं का हल देने की बात कहते हैं। दैनिक जागरण की हाल ही में आई एक रिपोर्ट बताती है कि बीते 2 वर्षों में यहाँ 3.50 लाख लोग ईसाई बनाए गए हैं। तरनतारन जैसे जिलों में यह संख्या तेजी से बढ़ी है। इसको रोकने के लिए सिख धर्मगुरु ज्ञानी हरप्रीत सिंह धर्मांतरण कानून की माँग कर चुके हैं।

मुस्लिम बना लें उर्दूस्तान, तमिल बनाएँ द्रविड़स्तान: खालिस्तानी आतंकी पन्नू मणिपुर को अलग-थलग करने की रच रहा था साजिश, भारत सरकार ने SFJ पर 5 साल बैन और बढ़ाया

भारत से मणिपुर को अलग करने के लिए खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू का संगठन सिख फॉर जस्टिस मणिपुर के तमिलों, मुस्लिमों और ईसाइयों को भड़काने में जुटा था। ये जानकारी गृह मंत्रालय द्वारा जारी एक आदेश के बाद सामने आई है। गृह मंत्रालय ने पन्नू के खालिस्तानी संगठन पर 5 साल के लिए बैन को बढ़ा दिया है। इससे पहले SFJ कोल आतंकी संगठन घोषित करते हुए बैन साल 2020 में लगा था।

रिपोर्ट्स के अनुसार, खुफिया नोट में कहा गया है कि सिख फॉर जस्टिस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी , गृह मंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के खिलाफ धमकियों सहित आतंकी कृत्यों की योजना बनाई थी। इसके अलावा इसमें ये भी कहा गया कि ये संगठन अल्पसंख्यक समुदायों को दूसरे समुदायों के खिलाफ भड़काकर सांप्रदायिक आधार पर लोगों को बाँटकर अपने भारत विरोधी एजेंडे को आगे बढ़ाता है।

आगे नोट में कहा गया कि आतंकी संगठन ईसाइयों को भड़काकर कहता है कि उनको अपना अलग देश बनाना चाहिए। इसी तरह मुस्लिमों को भड़काकर उर्दूस्तान बनाने को कहता है और तमिलों को उकसाकर द्रविड़स्तान बनाने को कहता है।

रिपोर्ट में ये भी जानकारी दी गई है कि कैसे सिख फॉर जस्टिस संगठन भारत में किसानों को भड़काने में शामिल था और कैसे वो दलित समुदायों को भड़काता है। SFJ दलितों को कहता था कि भारत सरकार ने उनका उत्पीड़न किया है इसलिए उन्हें अपना अलगाववादी अभियान शुरू करना चाहिए।

सिख फॉर जस्टिस का उद्देश्य भारत के अल्पसंख्यकों को भड़काने और भारत में हिंसा कराना रहता है। संगठन को पाकिस्तान से समर्थन प्राप्त है और वह आतंकवादियों, गैंगस्टरों तथा कश्मीरी अलगाववादियों के साथ संपर्क में रहता है। यह संगठन विदेशों में रह रहे सिखों को भी अपने उद्देश्यों के लिए प्रेरित करने का प्रयास करता है। इन्हीं सब बिंदुओं को देखते हुए सरकार ने इस संगठन पर एक्शन लेते हुए इस पर पाँच साल तक प्रतिबंध बनाए रखने का निर्णय लिया।

आंध्र प्रदेश : जिस चर्च में हर महीने होता था 3000 हिंदुओं का धर्मांतरण, उस पर चलेगा बुलडोजर: एशिया के दूसरे सबसे बड़े चर्च को लेकर सरकार का फैसला

                         सतीश कुमार और कैल्वरी टेंपल चर्च (साभार: calvary temple/Tripadvisor)
आज हर प्रदेश में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मांग होती है उसका कारण है। योगी की तरह सख्त निर्णय लेना। योगी के बुलडोज़र से परेशान मुस्लिम कट्टरपंथी और सेकुलरिज्म के नाम पर गुमराह करने वाला गैंग सुप्रीम कोर्ट तक दौड़ लगाता है। लेकिन बाबा का बुलडोज़र हर प्रदेश में पहुँच रहा है।  

आंध्र प्रदेश के अल्पसंख्यक कल्याण विभाग ने गुंटूर जिले में स्थित कैल्वरी टेम्पल चर्च को गिराने के आदेश जारी किया है। यह चर्च पेडकाकनी मंडल के नम्बुरु गाँव में स्थित है। इस चर्च को अवैध रूप से संचालन किया जा रहा था। एक जाँच के बाद इसका खुलासा हुआ था। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, केवल उन संरचनाओं को ध्वस्त किया जाएगा जो बिना कानूनी अनुमति के चल रही हैं।

दरअसल, नवंबर 2024 में इस चर्च के खिलाफ प्रधानमंत्री कार्यालय को एक शिकायत दी गई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि इसका संचालन पंचायती राज, राजस्व, पुलिस और ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जैसे सरकारी विभागों से कानूनी अनुमति के बिना किया जा रहा है। इसमें ये भी कहा गया था कि पादरी डॉक्टर सतीश कुमार ने टैक्स का भुगतान किए बिना दान के जरिए लोगों को लूटा।

 शिकायत के बाद जाँच में पाया गया कि यह चर्च अवैध रूप से संचालित हो रहा था और गरीबों को किराने का सामान देकर तथा फर्जी दावे करके हिंदुओं को ईसाई धर्म में परिवर्तित कर रहा था। अक्टूबर में बताया गया था कि हैदराबाद के पादरी डॉक्टर सतीश कुमार के नेतृत्व में कैल्वरी चर्च ने हर महीने लगभग 3,000 हिंदुओं को ईसाई धर्म में धर्मांतरित किया है।

पादरी सतीश कुमार ने विशेष रूप से दावा किया कि उन्होंने अब तक 3.5 लाख से अधिक हिंदुओं को ईसाई धर्म में परिवर्तित किया है। सतीश कुमार ने अगले 10 वर्षों में पूरे भारत में 40 ऐसे चर्च स्थापित करने की योजना बताई थी। CBN न्यूज़ (द क्रिश्चियन ब्रॉडकास्टिंग नेटवर्क इंक) का एक वीडियो 26 अक्टूबर 2024 को सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म X पर वायरल हुआ।

इस वीडियो में कैल्वरी टेम्पल चर्च की धर्मांतरण गतिविधियों के बारे में बात की गई थी। बाद में 28 अक्टूबर 2024 को लीगल राइट्स प्रोटेक्शन फ़ोरम (LRPF) ने X पर साझा किया कि काकीनाडा के जिला कलेक्टर के आदेश के बाद राजस्व अधिकारियों ने कैल्वरी टेम्पल चर्च को ज़ब्त कर लिया है। चर्च पर भूमि कब्जाने, संदिग्ध समझौतों के ज़रिए नए चर्च बनाने, कानून का उल्लंघन सहित कई आरोप हैं।

कैल्वरी टेंपल चर्च एशिया के सबसे बड़े चर्चों में से एक है, जिसके सदस्यों की संख्या 4 लाख से अधिक है। वहीं, साप्ताहिक उपस्थिति 20,000 से अधिक होती है। चर्च के अलावा, सतीश कुमार का संगठन कैल्वरी बाइबल कॉलेज, कैल्वरी अस्पताल और कैल्वरी स्कूल चलाता है। पादरी सतीश कुमार का आंध्र प्रदेश और उसके बाहर राजनीति से लेकर हर क्षेत्र में काफी प्रभाव माना जाता है।

इसके साथ ही राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय ईसाई समुदायों में भी सतीश कुमार की तगड़ी पहुँच है। वह मिशनरी गतिविधियों के लिए अक्सर अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, कोरिया सहित विभिन्न देशों में आते-जाते रहते हैं। अमेरिका के तत्कालीन उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने साल 2018 में सतीश कुमार से मुलाकात की तस्वीरें सोशल मीडिया साइट X पर शेयर की थी और मुलाकात को प्रेरणादायक बताया था।

चर्च की स्थापना

कैल्वरी टेम्पल इंडिया की स्थापना 2005 में सतीश कुमार ने की थी। उन्हें अक्सर एक सम्मानित पादरी, लेखक और अंतरराष्ट्रीय वक्ता बताया जाता है। उन्हें दूरदर्शी नेतृत्व और ईमानदार बताया जाता है। हालाँकि, जाँच में उनके मिशनरी कामों का पता चला। पादरी सतीश ‘बाइबिल के मानकों’ पर जोर देते हैं, जो रणनीतिक रूप से उनके अनुयायियों को बढ़ाने के लिए तैयार किया गया लगता है।
यह भारत में आक्रामक तरीके से धर्मांतरण को बढ़ावा देने के उनके लक्ष्य को दिखाता है। चर्च की वेबसाइट पर कैल्वरी के बारे में खूब प्रशंसा की गई है। इसमें चर्च के 400,000 सदस्य होने का दावा किया गया है। ये सब कुछ हिंदुओं को लक्षित करने के लिए धन जुटाने की रणनीति के तहत किया गया लगता है। कैल्वरी चर्च का यह भी दावा है कि चर्च का निर्माण केवल 52 दिनों में किया गया था।
जब कैल्वरी बाइबिल कॉलेज और कैल्वरी अस्पताल जैसी पहलों के साथ-साथ प्रदान किए जाने वाले मुफ़्त भोजन पर विचार किया जाता है, तो यह परोपकार के बारे में कम और धार्मिक साम्राज्य के निर्माण के बारे में अधिक प्रतीत होता है। पादरी सतीश कुमार अपनी कई गतिविधियों के कारण कुख्यात हो चुके हैं। हालाँकि, ईसाई उनकी गतिविधियों को समुदाय के लिए एक बड़ी सेवा मानते हैं।

अरुणाचल प्रदेश : जबरन या लालच देकर धर्मांतरण करने वालों की अब खैर नहीं: लगभग 47 साल बाद राज्य सरकार लागू करेगी धार्मिक स्वतंत्रता कानून

                                                अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू 
अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने एक कार्यक्रम में बोलते हुए राज्य में धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम को बहाल करने के संकेत दिए हैं। यह एक्ट साल 1978 में बना था, जो अब तक लागू नहीं किया गया था। यह कानून जबरन या लालच आदि देकर किए जाने वाले किसी भी तरह के धर्मान्तरण पर प्रभावी कार्रवाई के लिए बनाया गया था। उन्होंने कहा कि इस कानून को लागू करने से अरुणाचल प्रदेश की संस्कृति को सहेजने में मदद मिलेगी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पेमा खांडू शुक्रवार (27 दिसंबर 2024) को ईटानगर में स्वदेशी आस्था और सांस्कृतिक समाज (IFCSAP) द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम को सम्बोधित कर रहे थे। अपने सम्बोधन में उन्होंने अरुणाचल प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री पीके थुंगन को धन्यवाद किया, जिन्होंने साल 1978 में विधानसभा में धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम को पारित करवाया था।

जब अरुणाचल प्रदेश में यह कानून बना था, तब वहाँ ईसाई मिशनरियाँ काफी सक्रिय थीं। वहाँ बड़े पैमाने पर लोगों को ईसाई बनाने का षड्यंत्र चलता था। हालाँकि, विधानसभा में पारित होने के बावजूद इसे 47 सालों से लागू नहीं किया गया। साल 2018 में तो प्रेमा खांडू ने कैथोलिक एसोसिएशन के एक कार्यक्रम में यहाँ तक कह दिया था कि उनकी सरकार इस अधिनियम को निरस्त करने पर विचार कर रही है।

तब पेमा खांडू ने इस कानून को प्रदेश में भाईचारा कमजोर करने वाला और ईसाईयों को परेशान करने वाला करार दिया था। तब IFCSAP के पूर्व महासचिव ताम्बो तामिन ने इस कानून को लागू करने के लिए गुवाहाटी हाईकोर्ट की ईटानगर पीठ में याचिका दाखिल की थी। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने सितंबर 2024 में राज्य सरकार को 6 महीने के अंदर नियमों को अंतिम रूप देने का आदेश दिया था।

आंध्र प्रदेश : नन बनने की ट्रेनिंग ले रही किशोरी ने सेंट जोसेफ कॉन्वेंट हॉस्टल में बच्चे को दिया जन्म, खिड़की से बाहर फेंक मार डाला

ट्रेनी नन ने पैदा होते ही अपने बच्चे को फेंका, मौत (फोटो साभार: arisebharat.com)
आंध्र प्रदेश के एलुरु में स्थित सेंट जोसेफ कॉन्वेंट हॉस्टल में चौंकाने वाली 
घटना सामने आई है। यहाँ एक किशोरी ने बच्चे को जन्म देने के तुरंत बाद उसे खिड़की से फेंक दिया, जिससे उसकी मौत हो गई। यह हॉस्टल डायोसिस ऑफ एलुरु द्वारा संचालित है और घटना ने चर्च-प्रशासित संस्थानों की निगरानी और जिम्मेदारी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस मामले में एक ट्रेनी पादरी को हिरासत में लिया है, जिसके कथित तौर पर ट्रेनी नन से संबंध थे।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, नन बनने की ट्रेनिंग ले रही किशोरी आंध्र प्रदेश के नंदयाल जिले की रहने वाली है और सेंट जोसेफ कॉन्वेंट में दूसरे वर्ष की इंटरमीडिएट छात्रा है। रविवार (8 दिसंबर 2024) को उसने हॉस्टल में बच्चे को जन्म दिया और तुरंत खिड़की से बाहर फेंक दिया। घटना की जानकारी मिलने पर पुलिस और महिला एवं बाल कल्याण विभाग के अधिकारी मौके पर पहुँचे। 2-टाउन सर्कल इंस्पेक्टर रामना के नेतृत्व में पुलिस ने जाँच शुरू की।

डीएसपी श्रवण कुमार ने बताया कि किशोरी का स्वास्थ्य बिगड़ने के बाद उसे सरवजना अस्पताल में भर्ती कराया गया। मृत बच्चे के शव को भी जाँच के लिए अस्पताल भेजा गया। इस मामले में एक ट्रेनी ईसाई पादरी को मुख्य संदिग्ध के रूप में हिरासत में लिया गया है।

शुरुआती जाँच में सामने आया कि किशोरी और पादरी के बीच संबंध थे। हॉस्टल की अन्य छात्राओं और प्रशासन से भी पूछताछ की जा रही है। इस मामले में महिला एवँ बाल कल्याण विभाग ने भी अपनी रिपोर्ट तैयार करनी शुरू कर दी है। यह मामला न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि महिलाओं की सुरक्षा और संस्थागत जिम्मेदारी पर भी बहस छेड़ता है।

घटना ने कॉन्वेंट हॉस्टल की कार्यप्रणाली और प्रशासन की लापरवाही को उजागर किया है। माना जा रहा है कि किशोरी की गर्भावस्था के बावजूद उसके सहपाठियों और हॉस्टल प्रशासन ने न तो उसकी स्वास्थ्य स्थिति को गंभीरता से लिया और न ही अधिकारियों को सूचित किया।

सेंट जोसेफ कॉन्वेंट एलुरु के डायोसिस (एलुरु के बिशप के नियंत्रण) में आता है और इसका उद्देश्य शिक्षा और मजहबी ट्रेनिंग देना है। इस संस्था का मकसद नैतिक और धार्मिक मूल्यों को बढ़ावा देना है, लेकिन इस घटना ने प्रशासनिक विफलता और महिलाओं की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

52 साल में IAS बनने वाली शैलबाला मार्टिन: मंदिर के भजन से दिक्कत, स्कूल में ईसाई प्रार्थना से प्यार, मिशनरियों के धर्मांतरण का करती हैं बचाव

                  शैलबाला मार्टिन (बाएँ) को मंदिर के लाउडस्पीकरों से दिक्कत (फोटो साभार: न्यूज18/जागरण)
शैलबाला मार्टिन, मध्य प्रदेश की एक प्रमोटी आईएएस अधिकारी, पिछले कुछ समय से अपने ट्वीट्स और बयानों के कारण चर्चा में रही हैं। उन्हें मंदिर पर लगे लाउडस्पीकर ध्वनि प्रदूषण की वजह लगते हैं। मंदिर पर आवाज उठाने वाली शैलबाला मार्टिन ने क्या कभी मस्जिद के लाउडस्पीकर या चर्च में होने वाली गतिविधियों पर सवाल उठाए हैं? आइए, इस रिपोर्ट में हम उनके बयानों और सार्वजनिक जीवन पर एक नजर डालते हैं।

शैलबाला मार्टिन के हिंदू विरोधी बयान

शैलबाला मार्टिन अपने ट्वीट्स और सार्वजनिक बयानों के कारण कई बार विवादों में आ चुकी हैं। विशेषकर, हिंदू त्योहारों और मंदिरों के खिलाफ उनके ट्वीट्स पर लोगों में गुस्सा भर रहा है। हाल ही में उन्होंने मंदिरों पर लगे लाउडस्पीकरों को ध्वनि प्रदूषण फैलाने वाला बता दिया। शैलबाला ने लिखा, “मंदिरों पर लगे लाउडस्पीकर, जो कई कई गलियों में दूर तक स्पीकर्स के माध्यम से ध्वनि प्रदूषण फैलाते हैं, जो आधी-आधी रात तक बजते हैं, उनसे किसी को डिस्टर्बेंस नहीं होता?”
धार्मिक संवेदनशीलता के इस मुद्दे को लेकर कई लोग मानते हैं कि शैलबाला ने हिंदू मंदिरों में लाउडस्पीकर के उपयोग को निशाना बनाया, जबकि उन्होंने ईसाई प्रार्थनाओं और धार्मिक अनुष्ठानों पर कभी सवाल नहीं उठाया।
शैलबाला के इस ट्वीट पर लोगों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। विष्णु झा ने लिखा, “ईसाई मिशनरियों के टुकड़े पे पली बढ़ी औरत से क्या उम्मीद की जानी चाहिए। क्या ये औरत इस्लाम की कुरीतियों पे बोल सकती है। हिंदू धर्म को टारगेट करना सबसे आसान काम लगता है। इस मिशनरी औरत से हिजाब, हलाला, मुस्लिम बहुविवाह, ट्रिपल तलाक पे तो आज तक बोलते नहीं दिखा। ऐसी मिशनरी औरत तो…”
विष्णु झा के तीखे हमले को शैलबाला बर्दाश्त नहीं कर पाई और तुरंत ही मिशनरियों के बचाव में उतर गई। उसे अपनी परवरिश से जोड़ते हुए शैलबाला ने लिखा, “कम से कम मेरे माता पिता और मिशनरियों ने मुझे सभ्य भाषा का इस्तेमाल करना और निष्पक्ष रूप से बोलना तो सिखाया है। इसका मुझे गर्व है। अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने वालों के लिए यहाँ कोई जगह नहीं है। इसलिए आपको बाइज़्ज़त यहाँ से रवाना किया जा रहा है।”
यही नहीं, ईसाई मिशनरियों का गुणगान करने वाली शैलबाला मौका मिलते ही हिंदुओं पर हमला बोलना शुरू कर देती है, संदर्भ चाहे कितना भी अलग क्यों न हो। राजस्थान के सीकर में बलात्कार के मामले को सदफ अफरीन नाम की मुस्लिम आईडी से एक्स पर शेयर किया गया, तुरंत ही शैलबाला ने उस पर तंज कस दिया। शैलबाला ने तंज कसते हुए लिखा, “भेष देख मत भूलये, बुझि लीजिये ज्ञान। बिना कसौटी होत नहिं, कंचन की पहिचान।।” उनका तंज सीधे-सीधे भगवा वस्त्रों और हिंदू संतों की तरफ था।
हालाँकि बाबा बालकनाथ गिरफ्तार हो चुका है और उसका हिंदुओं ने जमकर विरोध किया है, लेकिन शैलबाला को सिर्फ हिंदुओं पर उंगली उठानी थी, तो उठा लिया और ईसाई मिशनरियों के कुकृत्यों पर चुप्पी साध ली। वो अलग बात है कि शैलबाला हिंदुओं पर तंज कसती हैं, तो उन्हीं के राज्य एमपी में कुछ समय पहले ही क्रिश्चियन मिशनरी के खेल बेनकाब हो रहे थे। ये मामला डिंडोरी जिले के समनापुर थाना क्षेत्र के जुनवानी गाँव का था, जहाँ रोमन कैथोलिक समुदाय के एक स्कूल की 8 छात्राओं से स्कूल के प्रिंसिपल, गेस्ट टीचर समेत कई लोगों पर छेड़छाड़ व अश्लीलता का आरोप लगा था।
स्कूल जबलपुर डायोकेसन एजुकेशन सोसाइटी (जेडीईएस) द्वारा चलाया जाता है। इस पूरे मामले का राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग ने भी संज्ञान लिया था, लेकिन शैलबाला मार्टिन के मुँह से एक शब्द भी नहीं निकला था। भले ही वो अप्रैल 2022 से एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर सक्रिय हैं, लेकिन ईसाई स्कूलों में रेप, धर्मांतरण जैसे मामलों पर वो खामोशी की चादर ओढ़ लेती हैं।

ईसाई मिशनरियों के मतांतरण का करती हैं बचाव

शैलबाला मार्टिन अपने ईसाई धर्म पर गर्व व्यक्त करती रही हैं और इस संबंध में उन्होंने कई विवादित बयान दिए हैं। उनका मानना है कि ईसाई मिशनरियाँ केवल शिक्षा और सेवा कार्यों के लिए जानी जाती हैं और उनके ऊपर लगे धर्मांतरण के आरोप निराधार हैं।
उन्होंने एक ट्वीट में लिखा, “अगर क्रिश्चियन स्कूलों में धर्मांतरण करवाया जाता तो आज हमारी आबादी का एक बड़ा हिस्सा क्रिश्चियन होता। क्रिश्चियन आबादी की यह वृद्धि आँकड़ों में परिलक्षित नहीं होती है।”
यह बयान मिशनरियों के बारे में फैले मिथकों और पूर्वाग्रहों का विरोध करने का उनका प्रयास था। ये अलग बात है कि क्रिश्चियर मिशनरी स्कूलों में शिक्षा देने के नाम पर मतांतरण की साजिशों के जाल गहरे तक फैले हैं। अभी हाल ही में मथुरा से एक मामला सामने आया, जिसमें मिशनरी स्कूल के लोग बड़े पैमाने पर मतांतरण करा रहे थे, खासकर स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के परिजनों और परिवार के। ऐसे अनगिनत मामले खंडवा से लेकर जबलपुर तक सामने आते रहे हैं।
ऑपइंडिया ने अपनी स्पेशल रिपोर्ट में बताया था कि किस तरह से मध्य प्रदेश के कोरबा में क्रिश्चियन मिशनरी और कॉन्ग्रेसी नेताओं की मिलीभगत से पूरा इलाका ही लैंड जिहाद का शिकार हो गया।
मतांतरण का बचाव करने वाली शैलबाला ने यूपी की एक घटना को लेकर फिर से मिशनरी स्कूलों को सही ठहराने की कोशिश की। ये घटना स्कूल के प्रिंसिपल द्वारा बच्ची के यौन शोषण से जुड़ी थी, जिस पर शैलबाला ने लिखा, “यही घटना अगर किसी कॉन्वेंट में हो गई होती तो नंगा नाच शुरू हो जाता।”

शैलबाला मार्टिन ने मिशनरी स्कूलों को क्लीनचिट तो दे दी, साथ ही हिंदुओं पर निशाना भी साध लिया। लेकिन वो इस बात पर चुप्पी साधे रखी कि मिशनरी स्कूलों में खुलेआम यौन शोषण, पैसों का लालच देकर मतांतरण जैसे अनेकों मामले सामने आ चुके हैं। ऑपइंडिया ने अपनी रिपोर्ट में साल 2022 में 15 ऐसे मामलों को सामने रखा था, जहाँ बच्चों को दबाव में ईसाई बनाया गया और उनका यौन शोषण भी किया गया।
ऐसा ही मामला दमोह से भी सामने आया, जहाँ क्रिश्चियन मिशनरी द्वारा संचालित स्कूल में मतांतरण के लिए दबाव डाले जाने की रिपोर्ट्स आई।
ये वही आईएएस हैं, जिन्हें मंदिर के लाउडस्पीकर से ध्वनि प्रदूषण की समस्या होती है, लेकिन शैक्षणिक संस्थान में जहाँ बच्चे पढ़ाई करते हैं, उसे शैलबाला मार्टिन जायज मानती हैं। उन्हें इसाई मिशनरियों की गाथा गाने से ही शायद फुरसत नहीं मिली, इसलिए इतनी बड़ी घटनाओं का ये कहकर बचाव करती रही, कि क्रिश्चियन प्रार्थना अपराध नहीं है। हालाँकि दोनों ही मामलों का संदर्भ अलग था, लेकिन ये शैलबाला की हिप्पोक्रेसी को जानने के लिए काफी है।

सरकारी सेवा में रहकर राजनीतिक बयानबाजी की भी आदत

यही नहीं, सरकारी सेवा में रहते हुए भी शैलबाला मार्टिन न सिर्फ सरकार की, बल्कि देश के बलिदानी अमर जवानों के बलिदान का भी मजाक उड़ाती रही हैं। पूर्व सीडीएस जनरल बिपिन रावत के बलिदान को लेकर किए गए ट्वीट पर जवाब देते हुए शैलबाला ने लिखा, “वैसे भी आदरणीय मिश्राजी शहीद तो अरबी भाषा का शब्द है। ये लोग इसे कैसे इस्तेमाल कर रहे हैं?” यह टिप्पणी एक ऐसे संदर्भ में आई थी जब सीडीएस बिपिन रावत के बलिदान पर चर्चा हो रही थी।
शैलबाला मार्टिन के ट्वीट्स और उनके विचारों ने उन्हें एक विशेष धार्मिक विचारधारा का समर्थक दिखाया है। खासकर सोशल मीडिया पर उनके कुछ पोस्ट्स को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि वे एक सरकारी अधिकारी होते हुए भी अपने धर्म के प्रति अत्यधिक लगाव और अन्य धर्मों के प्रति विरोधाभासी दृष्टिकोण रखती हैं। यह स्थिति तब और जटिल हो जाती है जब वे अपने ईसाई धर्म का बचाव करती हैं और ईशू के विचारों को एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर शेयर भी करती हैं।

कौन हैं शैलबाला मार्टिन?

शैलबाला मार्टिन का जन्म 9 अप्रैल 1965 को मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले में एक ईसाई परिवार में हुआ था। उनके माता-पिता धार्मिक और सामाजिक सेवाओं से जुड़े रहे, जिससे उनकी परवरिश में धार्मिक शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान रहा। शैलबाला ने अपनी शिक्षा इंदौर के होल्कर साइंस कॉलेज से प्राप्त की, जहाँ उन्होंने मास्टर ऑफ आर्ट्स (एम.ए.) की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने 2009 में मध्य प्रदेश राज्य सेवा में प्रवेश किया, जहाँ से 2017 में वे प्रमोट होकर भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में शामिल हुईं। वर्तमान में वे मध्य प्रदेश सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग में कार्यरत हैं।
इस मुद्दे पर संस्कृति बचाव मंच के अध्यक्ष पंडित चंद्रशेखर तिवारी ने शैलबाला मार्टिन पर सवाल उठाते हुए कहा कि मंदिरों में सुरीली आवाज में आरती और मंत्रों का उच्चारण होता है ना कि दिन में 5 बार लाउडस्पीकर पर अजान की तरह बोला जाता है। मेरा शैलबाला मार्टिन जी से सवाल है कि उन्होंने कब किसी मोहर्रम के जुलूस पर पथराव होते हुए देखा? जबकि हिन्दुओं के जुलूस पर पथराव हो रहा है और इसलिए मार्टिन मैडम आपको हिंदू धर्म की भावनाओं को ठेस पहुँचाने का कोई अधिकार नहीं है।

बेटे की सरकार में तिरुपति की रसोई में ‘बीफ की घुसपैठ’, कॉन्ग्रेस पिता के शासन में इसी मंदिर में क्रॉस वाले स्तंभ पर हुआ विवाद: तब YSR, अब जगनमोहन

तिरुपति मंदिर में जगन मोहन और उनके पिता YSR के राज के दौरान ईसाई दखल को लेकर विवाद हुआ है (चित्र साभार: NDTV & DR.YSRAP/FB)
आंध्र प्रदेश के तिरुपति मंदिर में प्रसाद के लड्डू में पशुओं की चर्बी और मछली का तेल पाए जाने का विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। हिन्दुओं की आस्था को चोट पहुँचाने वाली यह मिलावट पूर्व मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी के राज में होने का आरोप लगाया गया है। लड्डू में पशु चर्बी और मछली का तेल मिलाए जाने की बात की पुष्टि लैब रिपोर्ट से भी हो गई है। इसके बाद जगन मोहन रेड्डी और उनके समय में तिरुपति मंदिर का प्रशासन करने वाले तिरुपति देवस्थानम बोर्ड से जुड़े लोग घेरे में हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी ने इस बीच इन सभी रिपोर्टों को खारिज करते हुए अपना बचाव किया है। उन्होंने ऐसी किसी भी गड़बड़ी से इनकार किया है। उन्होंने कहा, “लड्डुओं के घी के लिए टेंडर प्रक्रिया हर छह महीने में होती है, और मानदंड कई दशकों से नहीं बदले हैं। टेंडर डालने वालों को NBL प्रमाणपत्र और गुणवत्ता का प्रमाणपत्र देना होता है। TTD घी से नमूने लेकर प्रमाणित होने वालों को ही टेंडर देता है। TDP धार्मिक मामले का राजनीतिकरण कर रही है। हमने अपने शासनकाल में 18 बार कई चीजों को अस्वीकार किया था।”

जगन अब कुछ भी कहें, यह मामला थमता नहीं दिख रहा है। इससे पहले भी तिरुपति मंदिर के बारे में हुए विवादों ने हिन्दुओं को झकझोर कर रख दिया था। तब इस हिन्दू मंदिर में ईसाई परम्परा घुसाने का आरोप लगाया गया था। जब यह आरोप लगा था तब जगन मोहन रेड्डी के पिता YS राजशेखर रेड्डी राज्य के मुखिया थे।

यह विवाद 2007 में हुआ था। तब भाजपा समेत हिन्दू संगठनों ने आरोप लगाया था कि TTD ने मंदिर के एक उत्सव के लिए जिन स्तम्भ का ऑर्डर दिया है, वह ईसाइयों के लिए पवित्र क्रॉस जैसे दिखते हैं। 2007 में होने वाले वार्षिक ब्रम्होत्सव के लिए TTD ने 250 स्तम्भ बनाने का ऑर्डर दिया था।

यह ऑर्डर बेंगलुरु की एक कम्पनी का को दिया गया था। यह स्तम्भ महोत्सव के दौरान सौन्दर्य के काम में लगाए जाने थे। इनका निर्माण प्लास्टर ऑफ़ पेरिस से होना था और इन पर नक्काशी की की जानी थी। हालाँकि, जब इन स्तम्भों का एक नमूना बन कर तिरुपति पहुँचा तो लोगों के कान खड़े हो गए।

भाजपा समेत कई हिन्दू संगठनों ने आरोप लगाया कि इनकी बनावट ईसाई क्रॉस जैसी लगती है। हिन्दुओं ने कथित तौर पर क्रॉस जैसे दिखने वाले स्तम्भ को तोड़ भी दिया था। हालाँकि, TTD में YSR की सरकार द्वारा नियुक्त किए गए अधिकारी इस डिजाइन का बचाव करते रहे थे।

अधिकारियों ने इस दौरान दावा किया था कि यह स्तम्भ मंदिर की डिजाइन से मिलते हुए बनाए गए हैं। तत्कालीन मुख्यमंत्री YSR के ईसाई होने के कारण यह विरोध और तेज हो गया था। भाजपा के स्थानीय नेताओं ने आरोप लगाया था कि तिरुपति के आसपास लगातार ईसाई दखल बढ़ रहा है।

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YSR 2004 से 2009 के बीच राज्य के मुख्यमंत्री रहे थे और उनकी 2009 में एक विमान हादसे में मौत हो गई थी। उनके बेटे जगन ने इसके बाद उनकी राजनीति को आगे बढाते हुए अपनी पार्टी बनाई और 2019 में मुख्यमंत्री बने थे। उनके कायर्काल में भी तिरुपति में ईसाई को चेयरमैन बनाने का विवाद हुआ था।