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जिन UGC नियमों को SC ने रोका उनमें शामिल ‘वामपंथी’ इंदिरा जयसिंह की सिफारिशें


सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए नियम UGC इक्विटी नियम 2026 पर स्टे लगा दिया है। हाल ही में उच्च शिक्षण संस्थानों को लेकर किए गए नोटिफिकेशन को लेकर बवाल मचा हुआ है। प्रमोशन ऑफ इक्विटी 2026 के विरोध में लोग सड़कों पर उतर आए हैं। इस पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने 27 जनवरी 2026 को छात्रों को भरोसा दिलाया कि इस नियम का गलत इस्तेमाल नहीं होने दिया जाएगा। लेकिन छात्रों का डर खत्म नहीं हुआ और विरोध प्रदर्शन जारी रहा।

दरअसल ये तर्क दिया जा रहा है कि जनरल कटेगरी के लोग जाति के आधार पर भेदभाव का शिकार नहीं हो सकते इसलिए उनकी शिकायत को सिस्टम से बाहर रखा जा रहा है। UGC इक्विटी नियम 2026 को उच्च शिक्षण संस्थानों में इक्विटी को बढ़ावा देने के लिए एक ‘सुधार’ के तौर पर पेश किया जा रहा है।

स्वराज्य के अनुसार, 2026 के नियमों के बजाए 2025 का नियम एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन्स में भेदभाव को दूर करने के लिए ज्यादा कारगर है। यह एक संतुलित नजरिया पेश करता है और ज्यादा व्यावहारिक है।

बराबरी पर UGC रेगुलेशन की शुरुआत

2019 में छात्र रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं ने दो पीआईएल दायर की थी, जिसके आधार पर 2025 के ड्राफ्ट तैयार किए गए थे। इन छात्रों में एक की मौत 2016 में और दूसरे की 2019 में हुई थी। उनके परिवारों ने आरोप लगाया था कि इनके साथ जाति के आधार पर भेदभाव किया गया, जिसकी वजह से इनदोनों ने आत्महत्या कर ली थी।

दोनों याचिकाकर्ताओं की वकील सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह थी। उन्होंने एडवोकेट प्रसन्ना और दिशा वाडेकर के साथ मिलकर एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन में भेदभाव को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाने की माँग की। सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी को निर्देश दिया था कि शैक्षणिक संस्थानों में भेदभाव रोकने के लिए गाइडलाइंस तैयार की जाए, उसी के आधार पर यूजीसी के नए नियम बनाए गए।

कहा जाता है कि PIL में पूरी तरह से नए नियम की माँग नहीं की गई थी, बल्कि मौजूदा यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (हायर एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन में बराबरी को बढ़ावा देना) रेगुलेशन, 2012 को सख्ती से लागू करने की माँग की गई थी। 2012 के नियमों के तहत यूनिवर्सिटी को भेदभाव, खासकर अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के छात्रों को समानता दिलाने पर जोर दिया गया था।

PIL में याचिकाकर्ताओं ने एडमिशन, मूल्यांकन, हॉस्टल अलॉटमेंट और कैंपस लाइफ में जातिगत भेदभाव का आरोप लगाया था। उन्होंने संस्थानों पर 2012 के नियम को लागू करने में पूरी तरह विफल रहने का भी आरोप लगाया। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि कोई मॉनिटरिंग नहीं की जाती थी। समान अवसर वाली जगह काफी कम थी। NAAC का कोई अता-पता नहीं था।
जनवरी 2025 में जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुयान ने यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) को नियमों का पालन न करने के लिए फटकार लगाई। जजों ने UGC को सेल, शिकायतों और एक्शन पर डेटा पेश करने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट UGC ने बताया कि वह रेगुलेशन के नियम का ड्राफ्ट बना रही है।

2025 के रेगुलेशन ने एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन में जाति के आधार पर भेदभाव को दूर करने के लिए एक नियम बनाया।

UGC ने फरवरी 2025 में (हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन में प्रमोशन ऑफ इक्विटी) रेगुलेशन जारी किए थे। 2025 के ड्राफ्ट रेगुलेशन का उद्देश्य सुरक्षा, निष्पक्षता और स्वायत्तता के बीच एक संतुलित ढाँचा तैयार करना था। PIL की माँग के मुताबिक, ‘इक्विटी कमेटी’ और 24/7 हेल्पलाइन जैसे उपाय सुझाए गए, ताकि सभी शामिल पार्टियों (विशेषकर SC/ST छात्रों) के लिए सुरक्षा बढ़ाई जा सके।

इन नियमों में संस्थानों को अपनी स्थितियों के अनुसार, नियमों को लागू करने का अधिकार दिया गया। इक्विटी कमेटी का नेतृत्व संस्था के प्रमुख द्वारा किए जाने का प्रावधान है, ताकि संस्था की जवाबदेही को सुनिश्चित किया जा सके।

कमेटी में कम से कम एक सदस्य SC ​​या ST समुदाय से होना जरूरी था। ड्राफ्ट रेगुलेशन ने सामूहिक जिम्मेदारी को बढ़ावा देने के लिए फैकल्टी, छात्र-छात्राओं और संस्थान के प्रशासनिक स्टाफ की भागीदारी को प्रोत्साहित किया गया है।

2026 के रेगुलेशन में इंदिरा जयसिंह की सिफारिशों को शामिल किया गया

हालाँकि याचिकाकर्ता 2025 के ड्राफ्ट रेगुलेशन से खुश नहीं थे। सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने ड्राफ्ट में दस मुख्य बदलावों का प्रस्ताव दिया। सुप्रीम कोर्ट ने रेगुलेशन को फाइनल करने के लिए 8 हफ्ते की डेडलाइन तय की। इसको देखते हुए नए रेगुलेशन 2026 को उच्च शिक्षण संस्थानों में इक्विटी को बढ़ावा देने के लिए 13 जनवरी 2026 को नोटिफाई किया गया।

इस रेगुलेशन में 2025 के रेगुलेशन में किए गए ‘संतुलन’ का अभाव था, और इसमें जयसिंह की कई सिफारिशें शामिल थीं।

2026 के रेगुलेशन ने पीड़ितों की कैटेगरी को SC, ST और OBC तक सीमित करके जनरल कटेगरी को जाति-आधारित हिंसा का शिकार मानने से मना कर दिया। जनरल कैटेगरी के छात्रों के लिए जाति-आधारित भेदभाव की शिकायत करने का कोई प्रावधान नहीं है। 2026 के रेगुलेशन न सिर्फ यह मानते हैं कि जाति के आधार पर भेदभाव सिर्फ SC, ST और OBC के लोगों के साथ होता है। इसमें जनरल कटेगरी के लोगों की सुरक्षा का कोई प्रावधान नहीं है, क्योंकि नया नियम मानता है कि इनके साथ कोई भेदभाव नहीं होता।

नया फ्रेमवर्क जनरल कटेगरी के स्टूडेंट्स के खिलाफ है, जिनके पास नियमों का गलत इस्तेमाल होने पर संस्थान का सहारा नहीं होगा। यही वजह है कि 2026 के रेगुलेशन का जनरल कटेगरी के छात्र विरोध कर रहे हैं, जिन पर इसका सीधा असर पड़ेगा।

धर्म बदलने वाले SC-ST नहीं ले सकते आरक्षण: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने धर्मांतरण के बाद लाभ को बताया ‘संविधान के साथ धोखा’

                               आरक्षण पर इलाहाबाद हाई कोर्ट का अहम फैसला (साभार: AI ChatGPT/Canva)
भारत की आरक्षण व्यवस्था को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला ‘क्रिप्टो क्रिश्चियन्स’ के लिए बड़ा झटका है। अपने फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ-साफ कहा है कि अगर कोई व्यक्ति हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई, इस्लाम या किसी अन्य गैर-हिंदू धर्म को अपना लेता है, तो वह अनुसूचित जाति (SC) या अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण लाभों का हकदार नहीं रहता।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इसे ‘संविधान के साथ धोखाधड़ी’ करार दिया है। यह फैसला जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि की सिंगल बेंच ने 21 नवंबर 2025 को सुनाया, जो जितेंद्र साहनी नाम के एक व्यक्ति की याचिका पर आधारित है। यह फैसला न सिर्फ उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव के विवाद से निकला है, बल्कि पूरे देश की आरक्षण नीति, धर्मांतरण के मुद्दे और सामाजिक न्याय की बहस को नई दिशा दे सकता है। आइए, जानते हैं क्यों महत्वपूर्ण है इलाहाबाद हाई कोर्ट का ये फैसला…

कैसे शुरू हुआ ये मामला, जो राष्ट्रीय स्तर पर बना महत्वपूर्ण

ये मामला उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले के सिंदुरिया थाने के अंतर्गत आने वाले ग्राम मथानिया लक्ष्मीपुर एकड़ंगा का है। यहाँ के निवासी जितेंद्र साहनी मूल रूप से केवट समुदाय से ताल्लुक रखते थे।

जितेंद्र साहनी ने अप्रैल 2023 में हाई कोर्ट में अर्जी देकर स्थानीय सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (SDM) से अपनी निजी जमीन पर रविवार और बुधवार को ‘यीशु मसीह के वचनों’ पर आधारित प्रार्थना सभाओं के आयोजन की अनुमति माँगी थी। SDM ने इसे मंजूरी दे भी दी थी, लेकिन स्थानीय हिंदुओं के विरोध के बाद 3 मई 2023 को यह अनुमति रद्द कर दी गई।

                                                         साहनी की याचिका

                                   याचिका का पूरा हिस्सा

हिंदू देवी-देवताओं पर विवादित टिप्पणी कर उनका मजाक उड़ाता था साहनी

ग्रामीणों का आरोप था कि साहनी ने इन सभाओं का इस्तेमाल गरीब हिंदू परिवारों को लालच देकर ईसाई मजहब अपनाने के लिए उकसाने के लिए किया। एक गवाह लक्षन विश्वकर्मा ने पुलिस जाँच में बयान दिया कि साहनी ने ग्रामीणों को इकट्ठा कर हिंदू देवी-देवताओं का मजाक उड़ाया।
लक्षन ने अपने लिखित बयान में कहा, “साहनी ने बताया कि हिंदू धर्म में हजारों देवी-देवता हैं। किसी के आठ हाथ, किसी के चार, किसी के चेहरे पर सूंड है। कोई चूहे की सवारी करता है, कोई मोर की। कोई भाँग पीता है, कोई गाँजा।” गवाह ने आगे आरोप लगाया कि साहनी ने कहा, “हिंदू धर्म में जाति के भेदभाव से कोई इज्जत नहीं मिलती, लेकिन ईसाई बनने से नौकरी, बिजनेस और मिशनरी से पैसे का फायदा होगा।”
                                                            गवाह का बयान रहा अहम
                                                       गवाह लक्षन के बयान की कॉपी

इन आरोपों पर पुलिस ने जितेंद्र साहनी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A (धर्म, जाति या जन्मस्थान के आधार पर शत्रुता फैलाना) और 295A (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना) के तहत मुकदमा दर्ज किया। 11 मार्च 2024 को चार्जशीट दाखिल हुई और 24 जुलाई 2024 को ACJM कोर्ट ने संज्ञान ले लिया।
साहनी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर इस मुकदमे को रद्द करने की गुहार लगाई। उनका दावा था कि सभाओं में कोई विवादास्पद भाषण नहीं हुआ और उन्हें झूठा फँसाया जा रहा है। लेकिन कोर्ट पहुँचते ही एक बड़ा राज खुल गया, वो ये था कि साहनी ने अपनी याचिका के साथ दाखिल हलफनामे में खुद को ‘हिंदू’ बताया, जबकि गवाह बयानों से साफ था कि वह ईसाई पादरी बन चुका था।
यह खुलासा कोर्ट के लिए आश्चर्यजनक था। अतिरिक्त सरकारी वकील पंकज त्रिपाठी ने CrPC की धारा 161 के तहत दर्ज गवाह बयानों का हवाला दिया। एक अन्य गवाह बुद्धि राम यादव ने भी पुष्टि की कि साहनी ने गरीबों को लालच देकर धर्मांतरण कराया। कोर्ट ने इसे गंभीरता से लिया और याचिका खारिज कर दी। जस्टिस गिरि ने कहा, “ट्रायल कोर्ट ही साक्ष्यों की जाँच करेगा। साहनी ट्रायल कोर्ट में डिस्चार्ज अर्जी दे सकते हैं, जहाँ वे दावा कर सकते हैं कि IPC की इन धाराओं के तत्व मौजूद नहीं हैं।”

धर्मांतरण के बाद SC वर्ग का लाभ लेना क्यों है संविधान के ‘धोखाधड़ी’?

अब सवाल यह है कि एक आपराधिक मुकदमे की याचिका से आरक्षण का मुद्दा कैसे जुड़ गया? कोर्ट ने साहनी के हलफनामे को ‘गुमराह करने वाला’ बताते हुए इसे संविधान के साथ धोखे का उदाहरण माना। जस्टिस गिरि ने स्पष्ट किया कि SC/ST लाभ केवल उन लोगों के लिए हैं जो हिंदू, सिख, बौद्ध या जैन परंपरा का पालन करते हैं। संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के पैराग्राफ 3 में साफ लिखा है- “कोई व्यक्ति जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म से अलग कोई अन्य धर्म मानता है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा।”
कोर्ट ने ‘हिंदू’ की परिभाषा पर भी रोशनी डाली। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 2 के अनुसार, हिंदू में सिख, बौद्ध, जैन और आर्य समाजी शामिल हैं। जो व्यक्ति मुस्लिम, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं है, वह हिंदू माना जाता है। SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 2(c) भी इसी पर आधारित है। अनुच्छेद 341 और 342 के तहत SC/ST की सूची में केवल हिंदू, सिख या बौद्ध ही आ सकते हैं।
कोर्ट ने जोर दिया कि ईसाई या इस्लाम जैसे मजहबों में जाति व्यवस्था मान्य नहीं है। इसलिए इन मजहबों को अपनाने वाले व्यक्ति ऐतिहासिक जातिगत भेदभाव का शिकार नहीं रहते। SC/ST अधिनियम का मकसद ऐसी समुदायों की रक्षा करना है जो सदियों से जाति-आधारित उत्पीड़न झेलते आए हैं। अगर कोई व्यक्ति धर्म बदल लेता है, तो वह इस संरक्षण का हकदार नहीं रहता।
जस्टिस गिरि ने कहा, “धर्मांतरण के बाद SC दर्जा बनाए रखना संविधान के साथ धोखा है। यह आरक्षण नीति के मूल सिद्धांतों – सामाजिक न्याय और समानता के खिलाफ है।”

सुप्रीम कोर्ट और अन्य फैसलों का जिक्र, कानूनी इतिहास के फैसलों का रेफरेंस

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुप्रीम कोर्ट के पुराने और नए फैसलों को ध्यान में रखकर सुनाया। इन फैसले में सबसे प्रमुख है 2024 का C. Selvarani vs. Special Secretary-District Collector मामला। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सिर्फ लाभ के लिए धर्मांतरण करना ‘संविधान के साथ धोखाधड़ी’ है। तमिलनाडु की एक महिला ने ईसाई बनने के बाद भी SC प्रमाणपत्र का दावा किया था, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया था। इस मामले में जज ने चेतावनी दी थी कि अगर धर्मांतरण सिर्फ आरक्षण का लाभ लेने के लिए छिपाया जा रहा है, तो यह इस नीति के खिलाफ है।
                                           तमिलनाडु के मामले का हाई कोर्ट ने किया जिक्र
इसके अलावा इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साल 1986 के Soosai vs. Union of India मामले को भी अपने फैसले के रेफरेंस में शामिल किया। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि SC नियम केवल हिंदू या सिख मानने वालों पर लागू होते हैं। साल 2015 के K.P. Manu vs. Chairman, Scrutiny Committee में तीन शर्तें बताई गईं: (1) जाति की मान्यता, (2) मूल धर्म में वापसी और (3) समुदाय की स्वीकृति। इसके बिना किसी तरह के आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता है।
                                                            सूसई केस का रेफरेंस
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2025 के आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के Akkala Rami Reddy vs. State of A.P. का भी हवाला दिया। इसमें ईसाई बन चुके व्यक्ति को SC/ST अधिनियम के तहत सुरक्षा से वंचित कर दिया गया, क्योंकि ईसाई धर्म में जाति भेदभाव नहीं है। आंध्र प्रदेश के हाई कोर्ट ने कहा था कि ऐसे (कन्वर्टेड) व्यक्ति को अब उत्पीड़न का शिकार नहीं माना जा सकता।”
ये फैसले दिखाते हैं कि धर्मांतरण और आरक्षण का मुद्दा नया नहीं। 1950 के संविधान आदेश से ही यह स्पष्ट था, लेकिन हाल के वर्षों में मिशनरी गतिविधियों और आरक्षण दुरुपयोग के आरोपों से यह बहस तेज हो चुकी है।

हाई कोर्ट ने जाँच और कार्रवाई के लिए दिए सख्त निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वो निर्देश हैं, जिसमें कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों (DM) को 4 महीने (मार्च 2026 तक) का समय दिया कि वे राज्य में ऐसे मामलों की जाँच करें, जहाँ धर्म बदल चुके लोग SC/ST लाभ ले रहे हैं। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने जाँच के बाद कानूनी कार्रवाई को भी जरूरी बताया है, साथ ही सभी DM को मुख्य सचिव को रिपोर्ट देने को भी कहा है।
                                  इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले की कॉपी का स्क्रीनशॉट
इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महाराजगंज के DM को विशेष निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि महाराजगंज के डएम को साहनी के धर्म की 3 महीने में जाँच करनी होगी। अगर साहनी का हलफनामा फर्जी साबित होता है, तो उसके खिलाफ फर्जीवाड़े के मामले में सख्त कार्रवाई के लिए कहा है। ताकि भविष्य में इस तरह के फर्जी हलफनामे दाखिल न किए जा सकें और फर्जीवाड़ों पर रोक लग सके।
                                                            हाई कोर्ट के फैसले का हिस्सा

अल्पसंख्यक और एससी-एसटी दर्जे के बीच के अंतर को स्पष्ट करे सरकार

इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले से केंद्र और राज्य स्तर पर भी हलचल मचनी तय है। क्योंकि हाई कोर्ट ने भारत सरकार के कैबिनेट सचिव, UP के मुख्य सचिव, समाज कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव, अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव को निर्देश दिए हैं कि वो अल्पसंख्यक दर्जा (ईसाई/मुस्लिम) और SC दर्जे के बीच सख्त अंतर सुनिश्चित करें। कोर्ट ने एडिशनल गवर्नमेंट एडवोकेट को ये आदेश सभी अधिकारियों तक पहुँचाने का जिम्मा भी सौंपा है।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “प्रिंसिपल सेक्रेटरी/एडिशनल चीफ सेक्रेटरी, माइनॉरिटीज वेलफेयर डिपार्टमेंट, गवर्नमेंट ऑफ यूपी को भी मामले को देखने और सही कार्रवाई करने या अधिकारियों को निर्देश देने के लिए उचित आदेश पारित करने का निर्देश दिया जाता है ताकि कानून को असलियत/सही मायने में लागू किया जा सके। एडिशनल चीफ सेक्रेटरी, सोशल वेलफेयर डिपार्टमेंट को भी कानून के अनुसार काम करने का निर्देश दिया जाता है।”

सरकारों की बढ़ी जिम्मेदारी

इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद अब UP सरकार के लिए चुनौती बढ़ गई है। यूपी सरकार की जाँच में 4 महीने में फर्जीवाड़ों के हजारों मामले सामने आ सकते हैं। ऐसे में अल्पसंख्यक कल्याण विभाग को SC और माइनॉरिटी लाभों के बीच बैलेंस भी बनाना पड़ेगा। वहीं, आने वाले समय के लिए सरकारों को भी SC/ST प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया कड़ी करनी पड़ सकती है। खासकर क्रिप्टो क्रिश्चियन जैसे मामलो में।

क्रिप्टो क्रिश्चियन कौन होते हैं?

ऑपइंडिया अपनी रिपोर्ट्स में पहले भी क्रिप्टो क्रिश्चियन को लेकर साफ तौर पर बता चुका है कि अपने धर्म को छिपाकर खुद को मूल धर्म का दिखाना और संवैधानिक फायदों को उठाते रहने वाले लोग क्रिप्टो क्रिश्चियन की श्रेणी में आते हैं। जितेंद्र साहनी का भी मामला ऐसा ही है।
जितेंद्र साहनी मूल रूप से हिंदू धर्म के केवट जाति से आते हैं। लेकिन उन्होंने धर्मांतरण कर खुद को ईसाई होना स्वीकार किया। इसके साथ ही कथित तौर पर वो एससी-एसटी वर्ग के लिए दिए जाने वाले सारे फायदे भी प्राप्त करते रहे। उनकी हिम्मत देखिए, कि उन्होंने खुद को हाई कोर्ट में भी हिंदू बताया, जबकि पूरे मामले में साफ है कि वो न सिर्फ ईसाई बन चुका है, बल्कि वो पादरी जैसा पद भी अपने पास रखता है।
क्रिप्टो क्रिश्चियन का एक सबसे अलग और अनोखा रूप ये है कि एक तरफ जहाँ जितेंद्र खुलेआम ईसाइयत का पालन करता है, तो कई ऐसे लोगों को उसने ईसाई बनाया, जिन्होंने न तो सार्वजनिक तौर पर खुद को ईसाई बताया और न ही अपना नाम और धर्म और न ही पहचान बदली। यानि ऐसे लोग कागजों पर हिंदू-दलित बनकर मलाई भी चाट रहे और प्रैक्टिस ईसाई मजहब की करते हैं।

आरक्षण नीति पर नया सवाल, सामाजिक बहस की शुरुआत

भारत संविधानिक रूप से धर्मनिरपेक्ष है। अनुच्छेद 25 हर नागरिक को धर्म चुनने की आजादी देता है। लेकिन कोर्ट ने कहा, “धर्म बदलना व्यक्तिगत विश्वास से होना चाहिए, न कि लाभ के लिए।” ऐसे में कोर्ट का यह फैसला आरक्षण व्यवस्था की नींव को मजबूत करता है। SC/ST कोटा शिक्षा, नौकरी और राजनीति में 22.5% आरक्षण देता है, जो राज्यों के स्तर पर अलग-अलग होता है। लेकिन इसके दुरुपयोग के आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं। कुछ लोग इस वर्ग को मिलने वाले लाभ के लिए धर्म बदलकर भी योजनाओं का लाभ लेते रहते हैं। ऐसे में कोर्ट के फैसले ने इस तरह के फर्जीवाड़े को रोकने का रास्ता दिखा दिया है।

इस पूरे मुद्दे पर ऑपइंडिया ने सीनियर एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय से बातचीत की। उन्होंने कहा, “इलाहाबाद हाई कोर्ट का जो रिजर्वेशन के ऊपर फैसला है, बिल्कुल ठीक फैसला है। हमारे संविधान निर्माता भी यही कह रहे थे कि जो हिंदू दलित है, जो हिंदू में पिछड़े हैं, ट्राइबल है, उनको ही रिजर्वेशन का फायदा मिलेगा। जो हिंदू कन्वर्ट हो जाएगा, चाहे वह इस्लाम में चला जाए या ईसाइयत में चला जाए, उसको रिजर्वेशन का फायदा नहीं मिलेगा। यह संविधान निर्माताओं की भी मंशा थी। यही संविधान भी कहता है और यही हाई कोर्ट का फैसला भी है।”

अपनी बात आगे बढ़ाते हुए अश्विनी उपाध्याय ने कहा, “आप एक तरफ रिजर्वेशन का फायदा लो। यह कहते हुए हम तो ऐसी हैं और फिर दूसरी तरफ आप कन्वर्ट भी हो जाओ। अगर इसकी इजाजत दी गई तो कन्वर्जन बढ़ेगा और यह हमारे संविधान निर्माता बिल्कुल नहीं चाहते थे। रिजर्वेशन का सिस्टम लाया गया था। वह बहुत लिमिटेड समय के लिए लाया गया था। वह गरीबों के लिए लाया गया था। वो केवल और केवल हिंदुओं के लिए लाया गया था।”
एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय ने कहा, “कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट आए हुए यह कहने के लिए एक नई नई दलितों की स्थिति तो वैसे ही रहती है। भले वह क्रिश्चियन बन जाए या इस्लाम कबूल कर लें। उस पर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सवाल पूछा ता कि अगर कन्वर्जन के बाद भी वही स्थिति रहनी है, तो फिर कन्वर्जन क्यों करना? फिर तो हिंदू बने रह सकते हैं। हालाँकि इसका जवाब अभी तक नहीं आया है। ये मामला सुप्रीम कोर्ट में भी पेंडिंग है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में माँग की गई थी कि इस्लाम-ईसाई मजहब अपनाने वालों को भी SC-ST का फायदा मिलना चाहिए, लेकिन अभी तक इस पर कोई फैसला नहीं आया है।
ऑपइंडिया से बातचीत में अश्विनी उपाध्याय ने आगे कहा, “इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला यूपी के लिए है लेकिन हाईकोर्ट का फैसला यह अपने आप में एक तरीके से बिल्कुल परफेक्ट फैसला है। इसलिए मध्य प्रदेश की सरकार, महाराष्ट्र की सरकार, देश के सभी अन्य राज्य सरकारों को भी इस फैसले को अपने स्तर पर लागू करना चाहिए और जो लोग कन्वर्ट हो गए हैं, चाहे वो इस्लाम में चले गए हों या ईसाई में, उनका एससी-एसटी का दर्जा खत्म करना चाहिए। उनको एससी-एसटी के मिलने वाले लाभ बंद होने चाहिए। जो लोग केवल हिंदू में रहते हैं और दलित हैं, उनको ही इसका फायदा मिलना चाहिए।”

न्याय की राह में अहम कदम है इलाहाबाद हाई कोर्ट का ये फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला जितेंद्र साहनी के व्यक्तिगत मामले से कहीं आगे जाता है। यह संविधान की भावना को बचाने की कोशिश है, जिसमें आरक्षण उत्पीड़ितों के उत्थान के लिए, न कि धोखे के लिए। जस्टिस गिरि की बेंच ने साफ कहा, “भारत सेक्युलर है, लेकिन कानून अंधा नहीं है।”
हालाँकि अब गेंद प्रशासन के पाले में आ गई है। ऐसे में क्या हाई कोर्ट के आदेश के मुताबिक, हाई कोर्ट के इस फैसले पर यूपी सरकार सख्ती से अमल करती है या फिर वो सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगी, ये तो आने वाला समय ही बताएगा। वैसे, एक बात अब साफ हो चुकी है कि सामाजिक न्याय की यह लड़ाई के नाम चल रहे धर्मांतरण रैकेटों और फर्जीवाड़ा करने वाले लोगों के लिए आगे की राह कठिन हो चली है।

दिल्ली :जामिया में सफाईकर्मियों को वाल्मीकि जयंती मनाने की नहीं मिली अनुमति: रजिस्ट्रार नसीम पर जातिसूचक गाली देने का भी मामला; सनातन विरोधी विपक्ष के मजबूत होते ही हिन्दू त्योहारों पर मुस्लिम कट्टरपंथियों का कहर

                                                 जामिया वाल्मीकि जयंती (साभार: X/subhi_karma)
2024 चुनावों में सनातन पर होते हमलों से हिन्दुओं ने आंखें नहीं खोली, जिस कारण सनातन विरोधियों को वोट अपने ही त्योहारों पर अंकुश का सामना करना पड़ रहा है। मुसलमान बीजेपी को हराने एकजुट वोट कर सकता है, लेकिन बेशर्म हिन्दू महंगाई, बेरोजगारी और जातपात के मकड़जाल में फंसा रहता है। अभी भी समय है हिन्दुओं एकजुट हो जाओ वरना वह दिन अब ज्यादा दूर नहीं जब तुम्हे घरों में पूजा करने पर भी किसी अनहोनी सामना करना पड़ सकता है। अगर मुसलमानों के त्योहारों पर हिन्दुओं ने ऐसा उपद्रव किया होता जितने भी गंगा-जमुनी तहजीब जैसा भ्रमित नारा लगाने वालों ने आसमान सिर पर उठा लिया होता।     

दिल्ली स्थित जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय ने वाल्मीकि जयंती मनाने वाले सफाई कर्मचारियों को परिसर में घुसने से रोक दिया। इससे विवाद गहरा गया है। इससे पहले विश्वविद्यालय प्रशासन ने हिंदू विद्यार्थियों को दीवाली मनाने से रोक दिया था। इसके बाद पुलिस ने बुधवार (23 अक्टूबर 2024) को करीब आधा दर्ज छात्रों को हिरासत में लिया था।

दरअसल, बुधवार (23 अक्टूबर 2024) की सुबह सफाई कर्मचारी वाल्मीकि जयंती मनाने जा रहे थे, लेकिन यूनिवर्सिटी के गार्ड ने उन्हें अंदर नहीं जाने दिया। उन्होंने बताया कि महर्षि वाल्मीकि जयंती पिछले 6 साल से विश्वविद्यालय परिसर में मनाई जा रही है, लेकिन इस बार इजाजत नहीं दी गई। उन्होंने पूछा कि इस बार विश्वविद्यालय प्रशासन ने ऐसा क्यों किया।

 सफाई कर्मचारियों का कहना है कि कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति विश्वविद्यालय प्रशासन और दिल्ली पुलिस से ली गई थी। सफाई कर्मचारी जब महर्षि वाल्मीकि की प्रतिमा लेकर विश्वविद्यालय परिसर में जाने लगे तो गेट पर गार्ड ने उन्हें रोक दिया। सफाई कर्मियों का आरोप है कि उनसे कहा गया कि मूर्ति यूनिवर्सिटी के अंदर ले जाने की इजाजत नहीं है।

दूसरी तरफ, विश्वविद्यालय के गार्ड ने कहा कि मूर्ति काफी बड़ी थी। इस वजह से वह परिसर में नहीं जा सकती थी। इसके बाद सरिता विहार से भाजपा पार्षद के पति मनीष चौधरी ने जामिया यूनिवर्सिटी पहुँचकर उसके मुख्य गेट के सामने महर्षि वाल्मीकि की मूर्ति की पूजा की और जयंती मनाई। इस दौरान जामिया यूनिवर्सिटी के सफाई कर्मी भी मौजूद रहे।

एक सफाई कर्मचारी ने रिपब्लिक भारत को बताया, “गार्ड ने कहा कि विश्वविद्यालय परिसर में मूर्ति में ला सकते। फोटो लेकर आओ और जयंती मनाओ।” उस व्यक्ति ने कहा कि उसने हर जरूरी विभाग से इस आयोजन के लिए अनुमति ले रखी थी। इसके बावजूद उन्हें अंदर नहीं जाने दिया गया। वहीं, एक अन्य व्यक्ति ने कहा कि रजिस्ट्रार नसीम हैदर ने मना किया था कि मूर्ति नहीं जाएगी।

उस व्यक्ति ने गाली देने का भी आरोप लगाया। उस व्यक्ति ने कहा, “जब हम वाल्मीकि के रूप में उनके (विश्वविद्यालय के अधिकारियों) घर जाकर काम करें, तब तो कई दिक्कत नहीं है। जीते-जागते आदमी से उन्हें दिक्कत नहीं है, लेकिन एक मूर्ति से उन्हें दिक्कत है।” वाल्मीकि समाज के लोगों ने कहा कि यह पूजा सिर्फ एक घंटे के लिए होना था, फिर भी उन्हें रोक दिया गया।

विश्वविद्यालय में ऐडहॉक के तौर पर काम करने वाले राजेश वाल्मीकि ने न्यूज नेशन को बताया कि विश्वविद्यालय में उनके समाज के करीब 200-250 कर्मचारी हैं। उन्होंने बताया कि वे जामिया में लगभग 20 साल से काम कर रहे हैं। राजेश का कहना है कि परिसर में काम करने वाले वे तीसरी पीढ़ी के लोग हैं, फिर भी गेट पर एक व्यक्ति ने उनसे आई कार्ड दिखाने की माँग की।

वाल्मीकि समाज के लोगों ने कहा कि उनकी मूर्ति को बाहर रखवा करके उनकी आस्था पर चोट की गई है। उन्होंने कहा कि इस तरह का बर्ताव उनके साथ पहले कभी नहीं किया गया था। पिछले 6 साल में यह पहली बार है, जब उनकी आस्था को चोट पहुँचाई गई। विश्वविद्यालय प्रशासन के इस कट्टरपंथी रूख से वाल्मीकि समाज के लोग काफी आक्रोशित नजर आए।

ST-SC समाज के लोगों के साथ यहाँ होता है भेदभाव

ये पहली बार नहीं है कि दलित समाज के इन सफाई कर्मियों के साथ जामिया विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस तरह का दुर्व्यवहार किया है। इससे पहले जामिया के प्रोफेसर एवं तत्कालीन रजिस्ट्रार नाज़िम हुसैन अल जाफ़री, तत्कालीन डिप्टी रजिस्ट्रार (अब रजिस्ट्रार) मोहम्मद नसीम हैदर और प्रोफेसर शाहिद तसलीम के खिलाफ़ दलित कर्मचारी को जातिसूचक गाली देने पर एससी/एसटी एक्ट में दर्ज किया गया था।
जुलाई 2024 में एक मीटिंग के दौरान अल जाफरी ने सहायक रामनिवास सेकहा था, “तुम निचली जाति के हो, तुम भंगी हो और तुम्हें ऐसे ही रहना चाहिए। तुम्हारे जैसे लोगों को आरक्षण के आधार पर नौकरी मिलती है, लेकिन फिर भी उन्हें अपनी जगह का पता नहीं होता। यह मत भूलो कि जामिया एक मुस्लिम विश्वविद्यालय है और तुम्हारी नौकरी हमारी दया पर निर्भर है।”
रामनिवास ने तत्कालीन रजिस्ट्रार नाजिम हुसैन अल जाफरी पर इस्लाम में धर्मांतरण करने का दबाव डालने का भी आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था, डॉक्टर नाजिम हुसैन अल जाफरी ने मुझसे कहा था- ईमान ले आओ, सब ठीक कर दूँगा। तेरे बच्चों का भी करियर बना दूंगा। क्या पाखंड में घुसा है।” यहाँ ईमान लाने से मतलब मुस्लिम बनने से है। इस तरह उन्होंने हिंदू धर्म को पाखंडी बता दिया था।
इसी तरह दलित समाज से आने वाले हरेंद्र कुमार जामिया यूनिवर्सिटी के अधीन आने वाली जामिया मिडिल स्कूल में गेस्ट टीचर थे। उन्होंने आरोप लगाया था कि दलित होने की वजह से स्कूल के हेडमास्टर मोहम्मद मुर्सलीन उन्हें हमेशा अपमानित और प्रताड़ित करते रहते थे। इसके बाद साल 2018 में उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया।

जामिया के नए VC मजहर आसिफ पर भी दलित महिला को प्रताड़ित करने का आरोप

जामिया मिलिया इस्लामिया के नए कुलपति के रूप में प्रोफेसर मज़हर आसिफ को नियुक्त किया गया है। इससे पहले वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में प्रोफेसर के पद पर नियुक्त थे। आसिफ पर अनुसूचित जनजाति (ST) समुदाय की महिला कर्मचारी रीना के साथ क्रूर जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न का आरोप है। इस मामले की दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई भी हुई। 
मज़हर आसिफ़ को जामिया नया कुलपति बनाए जाने से आहत होकर महिला कर्मचारी रीना ने 14 अक्टूबर 2024 को विरोध में एक पत्र लिखा। उन्होंने कहा कि आसिफ पर जातिवादी रवैया अपनाकर एक महिला का करियर तबाह करने का आरोप है। ऐसे लोगों को कुलपति नहीं बनाया जाना चाहिए।
दरअसल, 2019-2020 के दौरान JNU में Associate Dean के रूप में मज़हर आसिफ़ ने ST समाज की रीना के करियर को तबाह करने की कोशिश की थी। आरोप है कि आसिफ़ ने रीना को जानबूझकर कम ग्रेड दिए, उनकी पदोन्नति को अवरुद्ध किया और उनकी जगह अयोग्य जूनियर उम्मीदवारों को तरजीह दी। 
इसके बाद रीना ने दिल्ली हाई कोर्ट और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का दरवाजा खटखटाया। उनकी शिकायत के बाद उनके प्रदर्शन के मूल्यांकन की स्वतंत्र रूप से समीक्षा की गई। पहले उन्हें सिर्फ 5.5 ग्रेड दिए गए थे। स्वतंत्र समीक्षा के बाद यह ग्रेड बढ़कर 8.66 हो गया। इस तरह प्रोफेसर मज़हर आसिफ़ पर रीना के लगाए आरोप हद तक सही साबित हुए।

दीवाली मनाने पर भी किया गया था बवाल

इससे पहले 22 अक्टूबर 2024 की रात को जामिया में दीपोत्सव मना रहे छात्रों के साथ बुरा बर्ताव किया गया था। उनकी बनाई रंगोली को मिटा दिया गया था और दीपों को तोड़ दिया गया था। इस्लामी कट्टरपंथियों वाली सोच रखने वाले मुस्लिम छात्रों के एक गुट ने ‘अल्लाह-हू-अकबर’ और ‘नारा-ए-तकबीर’ के नारे लगाकर माहौल बिगाड़ दिया था।
पैरों से दीये तोड़ने और रंगोलियों को मिटाने के बाद दोनों गुटों में झड़प हो गई थी। बताया जा रहा था कि इस झड़प में कई लोग घायल भी हो गए थे और उन्हें अस्पताल ले जाया गया था। इसके बाद अगले दिन यानी 23 अक्टूबर को हिंदू छात्र दोबारा से दीवाली मनाने के लिए इकट्ठा हुए, लेकिन पुलिस ने उन्हें गेट पर ही रोक दिया था और कुछ छात्रों को हिरासत में ले लिया था।
दरअसल, यह पहली बार नहीं है कि विश्वविद्यालय का इस तरह का कट्टरपंथी रूख सामने आया है। वाल्मीकि जयंती मनाने से रोकने और दीपवाली पर दीये तोड़ने एवं रंगोली मिटाने से पहले भी जामिया का कट्टरपंथी सोच सामने आ चुका है। यहाँ CAA और NRC के विरोध में व्यापक विरोध प्रदर्शन किए गए थे। दिल्ली दंगों में यहाँ के कई कट्टरपंथी छात्रों का भी नाम आया था।

सुप्रीम कोर्ट ने 6-1 से दिया फैसला, कहा- जिनको फायदा मिला, उनको करो बाहर; सारे दलित-आदिवासी एक जैसे पिछड़े नहीं, SC/ST आरक्षण में लागू हो सकता है कोटा

                                                                     सुप्रीम कोर्ट 
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दलित और आदिवासियों को मिलने वाले आरक्षण के भीतर अधिक पिछड़े SC-ST जातियों के लिए कोटा लागू किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दलितों और आदिवासियों में पिछड़ी जातियों को राज्य आरक्षण के भीतर अधिक आरक्षण दे सकते हैं। यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान बेंच ने किया है।

 1 अगस्त, 2024 को CJI डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली 7 सदस्यीय संविधान बेंच ने यह निर्णय दिया। इस निर्णय में 6 जज एकमत थे जबकि जस्टिस बेला त्रिवेदी ने इस पर अपनी असहमति जताई। कोर्ट ने कहा कि राज्य SC-ST को दिए जाने वाले आरक्षण के भीतर ऐसी जातियों को ज्यादा तरजीह दे सकते हैं, जो आर्थिक-सामाजिक रूप से अधिक पिछड़ गई हैं।

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि SC-ST कोई एक एक सजातीय समूह नहीं है और इस बात के सबूत भी हैं। उन्होंने कहा कि आरक्षण के भीतर आरक्षण देने से संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं होता। उन्होंने कहा कि इस मामले में 6 निर्णय पहले भी आ चुके हैं और सभी में इस बात को माना गया है कि आरक्षण के भीतर आरक्षण देना सही है।

कोर्ट ने यह निर्णय सुनाने के साथ ही साफ़ कर दिया कि किसी एक जाति को 100% आरक्षण ना दिया जाए। साथ ही कोर्ट ने यह साफ किया आरक्षण के भीतर आरक्षण देने के दौरान जातियों को सूची से अंदर-बाहर करने का निर्णय तुष्टिकरण के लिए ना लिया जाए। कोर्ट ने कहा कि किसी भी जाति को तरजीह देने से पहले आँकड़े और ऐतिहासिक तथ्य जुटाए जाएँ।

मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस BR गवई ने कहा कि यह राज्य सरकार का कर्तव्य है कि वह अधिक पिछड़ी जातियों को तरजीह दे। उन्होंने कहा कि SC-ST समुदाय में भी केवल कुछ ही लोग आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं। उन्होंने कहा कि SC-ST आरक्षण में भी क्रीमी लेयर पहचानी जाए और जिन जातियों को लाभ मिल चुका है, उन्हें इससे बाहर कर दिया जाए।

कोर्ट का यह निर्णय पंजाब राज्य के बनाए गए एक कानून के मामले में आया है। पंजाब ने 2006 में यह कानून बनाया था कि वह राज्य में SC-ST को दिए जाने वाले आरक्षण में भी वर्गीकरण करेगा। इस कानून को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था। इसके बाद पंजाब सरकार सुप्रीम कोर्ट के पास पहुँची थी।

पंजाब सरकार के कानून को आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के एक निर्णय के आधार पर चुनौती दी गई थी। इस निर्णय में आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा था कि सारे SC-ST एक सजातीय समूह हैं और उनके आरक्षण का वर्गीकरण नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को हुई सुनवाई में इस निर्णय को सही नहीं माना।

यह मामला 2020 में संविधान बेंच के पास पहुँचा था। इस मामले में केंद्र सरकार भी पंजाब के पक्ष में थी। इस निर्णय से पंजाब और तमिलनाडु जैसे राज्यों को फायदा होगा। इन राज्यों में आरक्षण के भीतर कोटा दिए जाने का प्रावधान किया गया है।

यह माँग लम्बे समय उठ रही है कि अब उन जातियों को आरक्षण में अधिक तरजीह दी जाए जो पिछड़ी हुई हैं। वहीं उन जातियों को अब आरक्षण में कम हिस्सा दिया जाए जो इस सुविधा का लाभ उठा चुके हैं। ऐसे में कोर्ट का यह निर्णय इसका रास्ता प्रशस्त करेगा।