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उत्तर प्रदेश : किस ‘शर्त’ पर चुनावों में सपा के समर्थन को तैयार हैं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद, क्यों हिंदू विरोधी अतीत को दे रहे हैं ‘क्लीनचिट’?

      स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की आरती करतीं डिंपल यादव और अखिलेश यादव (फोटो साभार: X/Dimple Yadav)
जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव निकट आ रहे हैं, सनातन को अपमानित करने वाली समाजवादी पार्टी ने कालनेमि बन हिन्दुओं को गुमराह करने साधु-संतों की शरण में जाना शुरू कर दिया है। हिन्दू यह भी नहीं भुला कि किस तरह समाजवादी नेता रामायण के पृष्ठ फाड़ रहे थे, सनातन के विरुद्ध बयानबाज़ी कर रहे थे और आज सत्ता पाने उसी सनातन की शरण में जा रही है। लेकिन हिन्दुओं को इन सनातन विरोधियों से बंगाल की तरह दूरी बनानी होगी।       
गाय को ‘राष्ट्रमाता’ का दर्जा दिलाने और गौहत्या पर प्रतिबंध की माँग को लेकर निकाली जा रही स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की ‘गविष्ठी यात्रा’ लगातार चर्चाओं में है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की यात्रा को लेकर यह सवाल उठ रहे थे कि इसे समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस ने हाईजैक तो नहीं कर लिया है। अब अखिलेश यादव के एक बयान के बाद विवाद और बढ़ गया है।

दरअसल, अखिलेश यादव ने शुक्रवार (12 जून 2026) को एटा में कहा कि शंकराचार्य भी PDA हो गए हैं। विधानसभा चुनाव 2026 में टिकट बँटवारे को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, “पूजनीय शंकराचार्य जी भी पीड़ित, दुखी, अपमानित हो रहे हैं इस सरकार में। वह भी PDA हो गए हैं, इसलिए हम उनके साथ हैं।” अखिलेश यादव के इस बयान और यात्रा में सपा नेताओं के शामिल होने पर उठ रहे सवालों को लेकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के मीडिया प्रभारी संजय पांडेय ने ऑपइंडिया से बात की है।

गलफहमी ना पालें अखिलेश: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पक्ष

3 मई 2026 से शुरू हुई इस 81 दिवसीय यात्रा को लेकर संजय पांडेय ने कहा कि यात्रा को लेकर जनता का रुख सकारात्मक है और यात्रा के बाद से मुस्लिम और ईसाई भी समर्थन में आ गए हैं। वहीं, अखिलेश यादव के बयान पर उन्होंने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा, “अगर ऐसा कुछ भी अखिलेश जी ने बयान दिया है कि महाराज जी PDA का हिस्सा हो गए हैं, तो ये उनकी गलतफहमी है। महाराज जी सिर्फ सनातन धर्म के हैं। वो किसी राजनीतिक दल के नहीं हैं।”

हालाँकि, उन्होंने कहा, “अगर PDA अभी यह घोषणा कर दे कि सरकार बनने पर गाय को ‘राज्य माता’ घोषित किया जाएगा और गौकशी पर पूरी तरह रोक लगाई जाएगी, तो उन्हें शंकराचार्य जी का समर्थन और आशीर्वाद मिलेगा। वे और उनके समर्थक PDA के साथ खड़े होंगे। लेकिन अगर ऐसा नहीं किया गया तो शंकराचार्य जी का समर्थन उन्हें नहीं मिलेगा।”

संजय पांडेय ने कहा, “यह किसी विशेष दल का समर्थन करने का मामला नहीं है। अगर बीजेपी, कॉन्ग्रेस या PDA कोई भी दल अपने घोषणा पत्र में गाय को राज्य माता घोषित करने और गोकशी बंद कराने का लिखित व सार्वजनिक वादा करेगा तो उन्हें समर्थन दिया जाएगा। यह मुद्दा किसी पार्टी का नहीं बल्कि गौ माता के प्राणों की रक्षा का है।”

सपा-कांग्रेस के नेताओं के यात्रा में शामिल होने पर क्या बोले अविमुक्तेश्वरानंद के मीडिया प्रभारी?

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की यात्रा को लेकर यह सवाल पूछा जा रहा है कि कहीं उनकी यात्रा को उत्तर प्रदेश में विपक्षी दलों ने हाईजैक तो नहीं कर लिया है। दरअसल, उनकी यात्रा के मंचों पर सपा और कांग्रेस के नेता खूब नजर आ रहे हैं और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का रुख सरकार को लेकर गोरक्षा के विषय से आगे बढ़कर आक्रामक नजर आ रहा है।

कुछ दिनों पहले उनकी यात्रा जब इटावा के सैफई पहुँची तो उनके मंच पर अखिलेश यादव की सांसद पत्नी डिंपल यादव और उनके चाचा शिवपाल यादव नजर आए थे। इस दौरान उन्होंने मुलायम सिंह यादव के परिवार की न सिर्फ जमकर तारीफ की बल्कि मुलायम सिंह को ‘संतों का सम्मान करने वाला’ और ‘दशकों पुराना सच्चा हितैषी’ तक करार दे दिया।

उन्होंने अखिलेश यादव और डिंपल यादव को ‘बड़े दिल वाला’ बताते हुए मुलायम सिंह यादव द्वारा पूर्व में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की गिरफ्तारी का भी एक तरह से बचाव कर डाला था। इस बारे में भी संजय पांडेय ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का रुख स्पष्ट किया है।

संजय पांडेय ने कहा, “किसी भी राजनीतिक दल वाले आ रहे हैं तो वो सनातनी ही हैं। जब मुस्लिम समर्थन कर रहे हैं, गौ माता को राष्ट्र माता बोल रहे हैं जबकि उनके धर्म में पशु माना जाता है। तो जब वो तैयार हो गए हैं, किसी भी राजनीतिक पार्टी का हिंदू अगर आ रहा है, तो उसका स्वागत है। उसमें भाजपा के भी लोग आएँ, उनके लिए भी कोई रोक नहीं है।”

‘सपा के हिंदू विरोधी अतीत’ से जुड़े सवालों पर उन्होंने कहा, “शंकराचार्य जी महाराज, परंपरा से जुड़े हुए हैं और सपा की सच्चाई भी इनको मालूम है। सपा जहाँ गड़बड़ है, सपा जो गलत कर रही है धर्म विरोधी, तो सपा का भी विरोध रहेगा। अभी जब राजकुमार भाटी ने बयान दिया था ब्राह्मणों और धर्म के खिलाफ तो महाराज श्री ने उनकी भी निंदा की थी और कहा था कि समाजवादी पार्टी को जनता ठीक कर देगी।”

उन्होंने कहा, “जितना धर्म के अंश में वह काम करेंगे, उतना ही शंकराचार्य जी का उनके साथ समर्थन रहेगा, आशीर्वाद रहेगा। जो भी अधर्म करेगा, यहाँ तक कि हम शिष्य भी अगर अधर्म करेंगे तो हम लोग को वह मार के भगा देंगे। शंकराचार्य जी को केवल शास्त्र और धर्म से मतलब है और किसी से कोई उनका और मतलब नहीं है। अगर कोई ऐसा सोचता है तो उसकी मूर्खता है।”

वहीं, मजहबी आधार पर आरक्षण की माँग करने वाली पार्टियों को लेकर सवाल पूछे जाने पर उन्होंने हर तरह के आरक्षण का विरोध करने की बात कही हैं। उन्होंने कहा, “हम लोग तो किसी आधार पर आरक्षण नहीं चाहते हैं। किसी भी मजहब या किसी भी तरह से, आरक्षण से हम लोग का देश नष्ट ही हो जाएगा। शंकराचार्य जी का मानना है कि आरक्षण नहीं होना चाहिए।”

धर्म बदलने वाले SC-ST नहीं ले सकते आरक्षण: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने धर्मांतरण के बाद लाभ को बताया ‘संविधान के साथ धोखा’

                               आरक्षण पर इलाहाबाद हाई कोर्ट का अहम फैसला (साभार: AI ChatGPT/Canva)
भारत की आरक्षण व्यवस्था को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला ‘क्रिप्टो क्रिश्चियन्स’ के लिए बड़ा झटका है। अपने फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ-साफ कहा है कि अगर कोई व्यक्ति हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई, इस्लाम या किसी अन्य गैर-हिंदू धर्म को अपना लेता है, तो वह अनुसूचित जाति (SC) या अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण लाभों का हकदार नहीं रहता।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इसे ‘संविधान के साथ धोखाधड़ी’ करार दिया है। यह फैसला जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि की सिंगल बेंच ने 21 नवंबर 2025 को सुनाया, जो जितेंद्र साहनी नाम के एक व्यक्ति की याचिका पर आधारित है। यह फैसला न सिर्फ उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव के विवाद से निकला है, बल्कि पूरे देश की आरक्षण नीति, धर्मांतरण के मुद्दे और सामाजिक न्याय की बहस को नई दिशा दे सकता है। आइए, जानते हैं क्यों महत्वपूर्ण है इलाहाबाद हाई कोर्ट का ये फैसला…

कैसे शुरू हुआ ये मामला, जो राष्ट्रीय स्तर पर बना महत्वपूर्ण

ये मामला उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले के सिंदुरिया थाने के अंतर्गत आने वाले ग्राम मथानिया लक्ष्मीपुर एकड़ंगा का है। यहाँ के निवासी जितेंद्र साहनी मूल रूप से केवट समुदाय से ताल्लुक रखते थे।

जितेंद्र साहनी ने अप्रैल 2023 में हाई कोर्ट में अर्जी देकर स्थानीय सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (SDM) से अपनी निजी जमीन पर रविवार और बुधवार को ‘यीशु मसीह के वचनों’ पर आधारित प्रार्थना सभाओं के आयोजन की अनुमति माँगी थी। SDM ने इसे मंजूरी दे भी दी थी, लेकिन स्थानीय हिंदुओं के विरोध के बाद 3 मई 2023 को यह अनुमति रद्द कर दी गई।

                                                         साहनी की याचिका

                                   याचिका का पूरा हिस्सा

हिंदू देवी-देवताओं पर विवादित टिप्पणी कर उनका मजाक उड़ाता था साहनी

ग्रामीणों का आरोप था कि साहनी ने इन सभाओं का इस्तेमाल गरीब हिंदू परिवारों को लालच देकर ईसाई मजहब अपनाने के लिए उकसाने के लिए किया। एक गवाह लक्षन विश्वकर्मा ने पुलिस जाँच में बयान दिया कि साहनी ने ग्रामीणों को इकट्ठा कर हिंदू देवी-देवताओं का मजाक उड़ाया।
लक्षन ने अपने लिखित बयान में कहा, “साहनी ने बताया कि हिंदू धर्म में हजारों देवी-देवता हैं। किसी के आठ हाथ, किसी के चार, किसी के चेहरे पर सूंड है। कोई चूहे की सवारी करता है, कोई मोर की। कोई भाँग पीता है, कोई गाँजा।” गवाह ने आगे आरोप लगाया कि साहनी ने कहा, “हिंदू धर्म में जाति के भेदभाव से कोई इज्जत नहीं मिलती, लेकिन ईसाई बनने से नौकरी, बिजनेस और मिशनरी से पैसे का फायदा होगा।”
                                                            गवाह का बयान रहा अहम
                                                       गवाह लक्षन के बयान की कॉपी

इन आरोपों पर पुलिस ने जितेंद्र साहनी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A (धर्म, जाति या जन्मस्थान के आधार पर शत्रुता फैलाना) और 295A (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना) के तहत मुकदमा दर्ज किया। 11 मार्च 2024 को चार्जशीट दाखिल हुई और 24 जुलाई 2024 को ACJM कोर्ट ने संज्ञान ले लिया।
साहनी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर इस मुकदमे को रद्द करने की गुहार लगाई। उनका दावा था कि सभाओं में कोई विवादास्पद भाषण नहीं हुआ और उन्हें झूठा फँसाया जा रहा है। लेकिन कोर्ट पहुँचते ही एक बड़ा राज खुल गया, वो ये था कि साहनी ने अपनी याचिका के साथ दाखिल हलफनामे में खुद को ‘हिंदू’ बताया, जबकि गवाह बयानों से साफ था कि वह ईसाई पादरी बन चुका था।
यह खुलासा कोर्ट के लिए आश्चर्यजनक था। अतिरिक्त सरकारी वकील पंकज त्रिपाठी ने CrPC की धारा 161 के तहत दर्ज गवाह बयानों का हवाला दिया। एक अन्य गवाह बुद्धि राम यादव ने भी पुष्टि की कि साहनी ने गरीबों को लालच देकर धर्मांतरण कराया। कोर्ट ने इसे गंभीरता से लिया और याचिका खारिज कर दी। जस्टिस गिरि ने कहा, “ट्रायल कोर्ट ही साक्ष्यों की जाँच करेगा। साहनी ट्रायल कोर्ट में डिस्चार्ज अर्जी दे सकते हैं, जहाँ वे दावा कर सकते हैं कि IPC की इन धाराओं के तत्व मौजूद नहीं हैं।”

धर्मांतरण के बाद SC वर्ग का लाभ लेना क्यों है संविधान के ‘धोखाधड़ी’?

अब सवाल यह है कि एक आपराधिक मुकदमे की याचिका से आरक्षण का मुद्दा कैसे जुड़ गया? कोर्ट ने साहनी के हलफनामे को ‘गुमराह करने वाला’ बताते हुए इसे संविधान के साथ धोखे का उदाहरण माना। जस्टिस गिरि ने स्पष्ट किया कि SC/ST लाभ केवल उन लोगों के लिए हैं जो हिंदू, सिख, बौद्ध या जैन परंपरा का पालन करते हैं। संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के पैराग्राफ 3 में साफ लिखा है- “कोई व्यक्ति जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म से अलग कोई अन्य धर्म मानता है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा।”
कोर्ट ने ‘हिंदू’ की परिभाषा पर भी रोशनी डाली। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 2 के अनुसार, हिंदू में सिख, बौद्ध, जैन और आर्य समाजी शामिल हैं। जो व्यक्ति मुस्लिम, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं है, वह हिंदू माना जाता है। SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 2(c) भी इसी पर आधारित है। अनुच्छेद 341 और 342 के तहत SC/ST की सूची में केवल हिंदू, सिख या बौद्ध ही आ सकते हैं।
कोर्ट ने जोर दिया कि ईसाई या इस्लाम जैसे मजहबों में जाति व्यवस्था मान्य नहीं है। इसलिए इन मजहबों को अपनाने वाले व्यक्ति ऐतिहासिक जातिगत भेदभाव का शिकार नहीं रहते। SC/ST अधिनियम का मकसद ऐसी समुदायों की रक्षा करना है जो सदियों से जाति-आधारित उत्पीड़न झेलते आए हैं। अगर कोई व्यक्ति धर्म बदल लेता है, तो वह इस संरक्षण का हकदार नहीं रहता।
जस्टिस गिरि ने कहा, “धर्मांतरण के बाद SC दर्जा बनाए रखना संविधान के साथ धोखा है। यह आरक्षण नीति के मूल सिद्धांतों – सामाजिक न्याय और समानता के खिलाफ है।”

सुप्रीम कोर्ट और अन्य फैसलों का जिक्र, कानूनी इतिहास के फैसलों का रेफरेंस

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुप्रीम कोर्ट के पुराने और नए फैसलों को ध्यान में रखकर सुनाया। इन फैसले में सबसे प्रमुख है 2024 का C. Selvarani vs. Special Secretary-District Collector मामला। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सिर्फ लाभ के लिए धर्मांतरण करना ‘संविधान के साथ धोखाधड़ी’ है। तमिलनाडु की एक महिला ने ईसाई बनने के बाद भी SC प्रमाणपत्र का दावा किया था, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया था। इस मामले में जज ने चेतावनी दी थी कि अगर धर्मांतरण सिर्फ आरक्षण का लाभ लेने के लिए छिपाया जा रहा है, तो यह इस नीति के खिलाफ है।
                                           तमिलनाडु के मामले का हाई कोर्ट ने किया जिक्र
इसके अलावा इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साल 1986 के Soosai vs. Union of India मामले को भी अपने फैसले के रेफरेंस में शामिल किया। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि SC नियम केवल हिंदू या सिख मानने वालों पर लागू होते हैं। साल 2015 के K.P. Manu vs. Chairman, Scrutiny Committee में तीन शर्तें बताई गईं: (1) जाति की मान्यता, (2) मूल धर्म में वापसी और (3) समुदाय की स्वीकृति। इसके बिना किसी तरह के आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता है।
                                                            सूसई केस का रेफरेंस
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2025 के आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के Akkala Rami Reddy vs. State of A.P. का भी हवाला दिया। इसमें ईसाई बन चुके व्यक्ति को SC/ST अधिनियम के तहत सुरक्षा से वंचित कर दिया गया, क्योंकि ईसाई धर्म में जाति भेदभाव नहीं है। आंध्र प्रदेश के हाई कोर्ट ने कहा था कि ऐसे (कन्वर्टेड) व्यक्ति को अब उत्पीड़न का शिकार नहीं माना जा सकता।”
ये फैसले दिखाते हैं कि धर्मांतरण और आरक्षण का मुद्दा नया नहीं। 1950 के संविधान आदेश से ही यह स्पष्ट था, लेकिन हाल के वर्षों में मिशनरी गतिविधियों और आरक्षण दुरुपयोग के आरोपों से यह बहस तेज हो चुकी है।

हाई कोर्ट ने जाँच और कार्रवाई के लिए दिए सख्त निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वो निर्देश हैं, जिसमें कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों (DM) को 4 महीने (मार्च 2026 तक) का समय दिया कि वे राज्य में ऐसे मामलों की जाँच करें, जहाँ धर्म बदल चुके लोग SC/ST लाभ ले रहे हैं। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने जाँच के बाद कानूनी कार्रवाई को भी जरूरी बताया है, साथ ही सभी DM को मुख्य सचिव को रिपोर्ट देने को भी कहा है।
                                  इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले की कॉपी का स्क्रीनशॉट
इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महाराजगंज के DM को विशेष निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि महाराजगंज के डएम को साहनी के धर्म की 3 महीने में जाँच करनी होगी। अगर साहनी का हलफनामा फर्जी साबित होता है, तो उसके खिलाफ फर्जीवाड़े के मामले में सख्त कार्रवाई के लिए कहा है। ताकि भविष्य में इस तरह के फर्जी हलफनामे दाखिल न किए जा सकें और फर्जीवाड़ों पर रोक लग सके।
                                                            हाई कोर्ट के फैसले का हिस्सा

अल्पसंख्यक और एससी-एसटी दर्जे के बीच के अंतर को स्पष्ट करे सरकार

इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले से केंद्र और राज्य स्तर पर भी हलचल मचनी तय है। क्योंकि हाई कोर्ट ने भारत सरकार के कैबिनेट सचिव, UP के मुख्य सचिव, समाज कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव, अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव को निर्देश दिए हैं कि वो अल्पसंख्यक दर्जा (ईसाई/मुस्लिम) और SC दर्जे के बीच सख्त अंतर सुनिश्चित करें। कोर्ट ने एडिशनल गवर्नमेंट एडवोकेट को ये आदेश सभी अधिकारियों तक पहुँचाने का जिम्मा भी सौंपा है।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “प्रिंसिपल सेक्रेटरी/एडिशनल चीफ सेक्रेटरी, माइनॉरिटीज वेलफेयर डिपार्टमेंट, गवर्नमेंट ऑफ यूपी को भी मामले को देखने और सही कार्रवाई करने या अधिकारियों को निर्देश देने के लिए उचित आदेश पारित करने का निर्देश दिया जाता है ताकि कानून को असलियत/सही मायने में लागू किया जा सके। एडिशनल चीफ सेक्रेटरी, सोशल वेलफेयर डिपार्टमेंट को भी कानून के अनुसार काम करने का निर्देश दिया जाता है।”

सरकारों की बढ़ी जिम्मेदारी

इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद अब UP सरकार के लिए चुनौती बढ़ गई है। यूपी सरकार की जाँच में 4 महीने में फर्जीवाड़ों के हजारों मामले सामने आ सकते हैं। ऐसे में अल्पसंख्यक कल्याण विभाग को SC और माइनॉरिटी लाभों के बीच बैलेंस भी बनाना पड़ेगा। वहीं, आने वाले समय के लिए सरकारों को भी SC/ST प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया कड़ी करनी पड़ सकती है। खासकर क्रिप्टो क्रिश्चियन जैसे मामलो में।

क्रिप्टो क्रिश्चियन कौन होते हैं?

ऑपइंडिया अपनी रिपोर्ट्स में पहले भी क्रिप्टो क्रिश्चियन को लेकर साफ तौर पर बता चुका है कि अपने धर्म को छिपाकर खुद को मूल धर्म का दिखाना और संवैधानिक फायदों को उठाते रहने वाले लोग क्रिप्टो क्रिश्चियन की श्रेणी में आते हैं। जितेंद्र साहनी का भी मामला ऐसा ही है।
जितेंद्र साहनी मूल रूप से हिंदू धर्म के केवट जाति से आते हैं। लेकिन उन्होंने धर्मांतरण कर खुद को ईसाई होना स्वीकार किया। इसके साथ ही कथित तौर पर वो एससी-एसटी वर्ग के लिए दिए जाने वाले सारे फायदे भी प्राप्त करते रहे। उनकी हिम्मत देखिए, कि उन्होंने खुद को हाई कोर्ट में भी हिंदू बताया, जबकि पूरे मामले में साफ है कि वो न सिर्फ ईसाई बन चुका है, बल्कि वो पादरी जैसा पद भी अपने पास रखता है।
क्रिप्टो क्रिश्चियन का एक सबसे अलग और अनोखा रूप ये है कि एक तरफ जहाँ जितेंद्र खुलेआम ईसाइयत का पालन करता है, तो कई ऐसे लोगों को उसने ईसाई बनाया, जिन्होंने न तो सार्वजनिक तौर पर खुद को ईसाई बताया और न ही अपना नाम और धर्म और न ही पहचान बदली। यानि ऐसे लोग कागजों पर हिंदू-दलित बनकर मलाई भी चाट रहे और प्रैक्टिस ईसाई मजहब की करते हैं।

आरक्षण नीति पर नया सवाल, सामाजिक बहस की शुरुआत

भारत संविधानिक रूप से धर्मनिरपेक्ष है। अनुच्छेद 25 हर नागरिक को धर्म चुनने की आजादी देता है। लेकिन कोर्ट ने कहा, “धर्म बदलना व्यक्तिगत विश्वास से होना चाहिए, न कि लाभ के लिए।” ऐसे में कोर्ट का यह फैसला आरक्षण व्यवस्था की नींव को मजबूत करता है। SC/ST कोटा शिक्षा, नौकरी और राजनीति में 22.5% आरक्षण देता है, जो राज्यों के स्तर पर अलग-अलग होता है। लेकिन इसके दुरुपयोग के आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं। कुछ लोग इस वर्ग को मिलने वाले लाभ के लिए धर्म बदलकर भी योजनाओं का लाभ लेते रहते हैं। ऐसे में कोर्ट के फैसले ने इस तरह के फर्जीवाड़े को रोकने का रास्ता दिखा दिया है।

इस पूरे मुद्दे पर ऑपइंडिया ने सीनियर एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय से बातचीत की। उन्होंने कहा, “इलाहाबाद हाई कोर्ट का जो रिजर्वेशन के ऊपर फैसला है, बिल्कुल ठीक फैसला है। हमारे संविधान निर्माता भी यही कह रहे थे कि जो हिंदू दलित है, जो हिंदू में पिछड़े हैं, ट्राइबल है, उनको ही रिजर्वेशन का फायदा मिलेगा। जो हिंदू कन्वर्ट हो जाएगा, चाहे वह इस्लाम में चला जाए या ईसाइयत में चला जाए, उसको रिजर्वेशन का फायदा नहीं मिलेगा। यह संविधान निर्माताओं की भी मंशा थी। यही संविधान भी कहता है और यही हाई कोर्ट का फैसला भी है।”

अपनी बात आगे बढ़ाते हुए अश्विनी उपाध्याय ने कहा, “आप एक तरफ रिजर्वेशन का फायदा लो। यह कहते हुए हम तो ऐसी हैं और फिर दूसरी तरफ आप कन्वर्ट भी हो जाओ। अगर इसकी इजाजत दी गई तो कन्वर्जन बढ़ेगा और यह हमारे संविधान निर्माता बिल्कुल नहीं चाहते थे। रिजर्वेशन का सिस्टम लाया गया था। वह बहुत लिमिटेड समय के लिए लाया गया था। वह गरीबों के लिए लाया गया था। वो केवल और केवल हिंदुओं के लिए लाया गया था।”
एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय ने कहा, “कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट आए हुए यह कहने के लिए एक नई नई दलितों की स्थिति तो वैसे ही रहती है। भले वह क्रिश्चियन बन जाए या इस्लाम कबूल कर लें। उस पर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सवाल पूछा ता कि अगर कन्वर्जन के बाद भी वही स्थिति रहनी है, तो फिर कन्वर्जन क्यों करना? फिर तो हिंदू बने रह सकते हैं। हालाँकि इसका जवाब अभी तक नहीं आया है। ये मामला सुप्रीम कोर्ट में भी पेंडिंग है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में माँग की गई थी कि इस्लाम-ईसाई मजहब अपनाने वालों को भी SC-ST का फायदा मिलना चाहिए, लेकिन अभी तक इस पर कोई फैसला नहीं आया है।
ऑपइंडिया से बातचीत में अश्विनी उपाध्याय ने आगे कहा, “इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला यूपी के लिए है लेकिन हाईकोर्ट का फैसला यह अपने आप में एक तरीके से बिल्कुल परफेक्ट फैसला है। इसलिए मध्य प्रदेश की सरकार, महाराष्ट्र की सरकार, देश के सभी अन्य राज्य सरकारों को भी इस फैसले को अपने स्तर पर लागू करना चाहिए और जो लोग कन्वर्ट हो गए हैं, चाहे वो इस्लाम में चले गए हों या ईसाई में, उनका एससी-एसटी का दर्जा खत्म करना चाहिए। उनको एससी-एसटी के मिलने वाले लाभ बंद होने चाहिए। जो लोग केवल हिंदू में रहते हैं और दलित हैं, उनको ही इसका फायदा मिलना चाहिए।”

न्याय की राह में अहम कदम है इलाहाबाद हाई कोर्ट का ये फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला जितेंद्र साहनी के व्यक्तिगत मामले से कहीं आगे जाता है। यह संविधान की भावना को बचाने की कोशिश है, जिसमें आरक्षण उत्पीड़ितों के उत्थान के लिए, न कि धोखे के लिए। जस्टिस गिरि की बेंच ने साफ कहा, “भारत सेक्युलर है, लेकिन कानून अंधा नहीं है।”
हालाँकि अब गेंद प्रशासन के पाले में आ गई है। ऐसे में क्या हाई कोर्ट के आदेश के मुताबिक, हाई कोर्ट के इस फैसले पर यूपी सरकार सख्ती से अमल करती है या फिर वो सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगी, ये तो आने वाला समय ही बताएगा। वैसे, एक बात अब साफ हो चुकी है कि सामाजिक न्याय की यह लड़ाई के नाम चल रहे धर्मांतरण रैकेटों और फर्जीवाड़ा करने वाले लोगों के लिए आगे की राह कठिन हो चली है।

राहुल गाँधी के अमेरिका में आरक्षण पर दिए बयान पर मचा बवाल; दिल्ली के बाद कर्नाटक में भी केस दर्ज, BJP नेताओं ने कराई FIR

लोकसभा में विपक्ष नेता का क्या महत्व होता है, कांग्रेस को शायद नहीं मालूम फिर राहुल गाँधी को कैसे मालूम होगा? विपक्षी नेता को हर शब्द बहुत सोंच समझकर बोलना पड़ता है नाकि जो मुंह में आया बोल दिया। विपक्ष नेता के मुंह से निकल एक-एक शब्द की गरिमा होती है। लेकिन राहुल विपक्ष नेता पद की गरिमा नितरोज गिराने में लगे हैं। जिसमें समस्त INDI गठबंधन शामिल हुआ लगता है। मुस्लिम वोट की खातिर जितना हिन्दुओं को अपमानित कर सकते हो करो, जितना हिन्दुओं को बाँट सकते हो, तुष्टिकरण कर ने पर पलट वार होने पर साम्प्रदायिता का आरोप कर सामने वाले को बदनाम किया जाता है, क्यों? क्या विपक्ष सनातन को अपमानित करने के लिए संगठित हुआ है? पहले हिंदुओं का, फिर मंदिरों का, 
फिर
देवी देवताओं का, शिव का अपमान,
साभार सोशल मीडिया 

और अब सीधे सीधे भारत माता का अपमान! कांग्रेस मुस्लिम लीग बन चुकी है? भारत विरोधी कांग्रेस को सबक सिखाना शुरू हो चुका है। पप्पू बनकर जनता को पप्पू बनाने का  खेल अब ज्यादा नहीं खेला जा सकता। 
कांग्रेस नेता राहुल गाँधी के खिलाफ भाजपा नेताओं द्वारा बेंगलुरु के हाई ग्राउंड्स पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई गई है। यह मामला उनके हालिया अमेरिका दौरे के दौरान दिए गए आरक्षण संबंधी बयान से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने कहा था कि कांग्रेस पार्टी समानता स्थापित होने के बाद आरक्षण व्यवस्था को खत्म करने पर विचार करेगी। इस बयान के बाद भाजपा नेताओं ने उनके खिलाफ कार्रवाई की माँग की है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, भाजपा नेताओं ने राहुल गाँधी पर संविधान विरोधी मानसिकता का आरोप लगाया है। विधान परिषद में विपक्ष के नेता चलावादी नारायणस्वामी और भाजपा कानूनी समिति के समन्वयक वसंत कुमार समेत कई नेताओं ने उनके बयान की निंदा की और एफआईआर दर्ज कराई। भाजपा का कहना है कि राहुल गाँधी का यह बयान न केवल आरक्षण के खिलाफ है बल्कि यह समाज में विभाजन पैदा करने वाला भी है।

भाजपा आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने भी राहुल गाँधी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने की जानकारी दी। उनका आरोप है कि राहुल गाँधी ने अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान सिख समुदाय के खिलाफ ‘घृणित’ टिप्पणी की, जिससे समाज में वैमनस्य बढ़ सकता है। इसके साथ ही, राहुल गाँधी की ‘हम आरक्षण हटा देंगे’ टिप्पणी को लेकर भाजपा ने उन्हें विभाजनकारी और उत्तेजक बयानबाजी का दोषी ठहराया है।

राहुल गाँधी ने कहा था कि भारत में समानता स्थापित होने के बाद कांग्रेस पार्टी आरक्षण व्यवस्था को खत्म करने के बारे में सोचेगी। हालाँकि बाद में मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि मेरे बयान का गलत मतलब निकाला गया जैसे कि मैं आरक्षण के खिलाफ हूँ। उन्होंने स्पष्ट किया कि हम आरक्षण की सीमा को 50% से अधिक बढ़ाने जा रहे हैं।

इससे पहले, भारतीय जनता पार्टी ने गुरुवार (19 सितंबर 2024) को राहुल गाँधी की हाल की अमेरिकी यात्रा के दौरान आरक्षण पर की गई टिप्पणी को लेकर उनके खिलाफ दिल्ली में पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत पंजाबी बाग, तिलक नगर, पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशनों में दर्ज की गई थी। इसके अलावा एक शिकायत बीजेपी ने राहुल गाँधी के खिलाफ मध्य प्रदेश में दर्ज कराई है।

सुप्रीम कोर्ट ने 6-1 से दिया फैसला, कहा- जिनको फायदा मिला, उनको करो बाहर; सारे दलित-आदिवासी एक जैसे पिछड़े नहीं, SC/ST आरक्षण में लागू हो सकता है कोटा

                                                                     सुप्रीम कोर्ट 
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दलित और आदिवासियों को मिलने वाले आरक्षण के भीतर अधिक पिछड़े SC-ST जातियों के लिए कोटा लागू किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दलितों और आदिवासियों में पिछड़ी जातियों को राज्य आरक्षण के भीतर अधिक आरक्षण दे सकते हैं। यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान बेंच ने किया है।

 1 अगस्त, 2024 को CJI डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली 7 सदस्यीय संविधान बेंच ने यह निर्णय दिया। इस निर्णय में 6 जज एकमत थे जबकि जस्टिस बेला त्रिवेदी ने इस पर अपनी असहमति जताई। कोर्ट ने कहा कि राज्य SC-ST को दिए जाने वाले आरक्षण के भीतर ऐसी जातियों को ज्यादा तरजीह दे सकते हैं, जो आर्थिक-सामाजिक रूप से अधिक पिछड़ गई हैं।

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि SC-ST कोई एक एक सजातीय समूह नहीं है और इस बात के सबूत भी हैं। उन्होंने कहा कि आरक्षण के भीतर आरक्षण देने से संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं होता। उन्होंने कहा कि इस मामले में 6 निर्णय पहले भी आ चुके हैं और सभी में इस बात को माना गया है कि आरक्षण के भीतर आरक्षण देना सही है।

कोर्ट ने यह निर्णय सुनाने के साथ ही साफ़ कर दिया कि किसी एक जाति को 100% आरक्षण ना दिया जाए। साथ ही कोर्ट ने यह साफ किया आरक्षण के भीतर आरक्षण देने के दौरान जातियों को सूची से अंदर-बाहर करने का निर्णय तुष्टिकरण के लिए ना लिया जाए। कोर्ट ने कहा कि किसी भी जाति को तरजीह देने से पहले आँकड़े और ऐतिहासिक तथ्य जुटाए जाएँ।

मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस BR गवई ने कहा कि यह राज्य सरकार का कर्तव्य है कि वह अधिक पिछड़ी जातियों को तरजीह दे। उन्होंने कहा कि SC-ST समुदाय में भी केवल कुछ ही लोग आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं। उन्होंने कहा कि SC-ST आरक्षण में भी क्रीमी लेयर पहचानी जाए और जिन जातियों को लाभ मिल चुका है, उन्हें इससे बाहर कर दिया जाए।

कोर्ट का यह निर्णय पंजाब राज्य के बनाए गए एक कानून के मामले में आया है। पंजाब ने 2006 में यह कानून बनाया था कि वह राज्य में SC-ST को दिए जाने वाले आरक्षण में भी वर्गीकरण करेगा। इस कानून को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था। इसके बाद पंजाब सरकार सुप्रीम कोर्ट के पास पहुँची थी।

पंजाब सरकार के कानून को आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के एक निर्णय के आधार पर चुनौती दी गई थी। इस निर्णय में आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा था कि सारे SC-ST एक सजातीय समूह हैं और उनके आरक्षण का वर्गीकरण नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को हुई सुनवाई में इस निर्णय को सही नहीं माना।

यह मामला 2020 में संविधान बेंच के पास पहुँचा था। इस मामले में केंद्र सरकार भी पंजाब के पक्ष में थी। इस निर्णय से पंजाब और तमिलनाडु जैसे राज्यों को फायदा होगा। इन राज्यों में आरक्षण के भीतर कोटा दिए जाने का प्रावधान किया गया है।

यह माँग लम्बे समय उठ रही है कि अब उन जातियों को आरक्षण में अधिक तरजीह दी जाए जो पिछड़ी हुई हैं। वहीं उन जातियों को अब आरक्षण में कम हिस्सा दिया जाए जो इस सुविधा का लाभ उठा चुके हैं। ऐसे में कोर्ट का यह निर्णय इसका रास्ता प्रशस्त करेगा।

सचिव पदों पर OBC को लेकर समाज में जहर घोल रहा राहुल, एक बार मामला उठा कर फिर से उठाना साबित करता है कि घटिया राजनीति खेल रहा है

सुभाष चन्द्र

आज़ादी के 75 साल भी राहुल गांधी जातिवाद के नाम पर समाज में जहर घोलने का काम कर रहा है। पिछले वर्ष 20 सितंबर को राहुल ने हल्ला मचाया था कि सरकार के 90 सचिवों में केवल 3 OBC के हैं और भारत के बजट का केवल 5% वो कंट्रोल करते हैं। मुझे तो उसकी बात का मतलब ही नहीं समझ आया कि 3 सचिव बजट का 5% कंट्रोल करते है। क्या वित्त मंत्री का कोई रोल नहीं है बजट में?

उस दिन भी भाजपा अध्यक्ष ने राहुल को जवाब दिया था कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार 1992 से सिविल सर्विसेज में रिजर्वेशन के लिए कहा गया परन्तु वर्तमान में जो सचिव हैं वे सभी 1992 के पहले के हैं तो उसमें OBC कैसे हो सकती है? लेकिन उसकी समझ कुछ नहीं आया और कल फिर वो ही राग अलाप दिया जिसका नड्डा जी ने पहले की तरह ठोक कर वही जवाब देते हुए कहा कि लीडर में लीडरशिप होने के लिए लीडर बनना पड़ता है ट्यूशन से काम नहीं चलता। उन्होंने पूछा 2004 से 2014 तक आपकी सरकार में कितने सचिव OBC थे?

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अब उस 2004 से 2014 के कालखंड की बात करते है। वर्ष 2011 में Department of Personnel की एक रिपोर्ट के मुताबिक 149 सचिवों में SC कोई नहीं था और ST केवल 4 थे यानी मात्र 2.68%। अन्य जूनियर सचिवों के लिए भी सूचना दी गई थी लेकिन OBC की संख्या के बारे में कहा गया था कि 1994 के पहले अधिकारियों की नियुक्ति के समय उनका OBC status नहीं पूछा जाता था और इसलिए OBC का डाटा उपलब्ध नहीं है। किसी ने इस पर एतराज़ नहीं किया क्योंकि बात तर्कसंगत थी लेकिन अब यह बात राहुल की मूढ़ मति में नहीं घुस रही।

राहुल कहता/चाहता है कि OBC की आबादी 41% है तो उतनी प्रतिशत संख्या में सचिव क्यों नहीं है, तो राहुल “गंदगी” ये बताओ कि 2011 में आपकी सरकार में 149 सचिवों में कोई SC क्यों नहीं था जबकि SC की जनसंख्या 16% है और ST केवल 4 (2.68%) क्यों थे जबकि ST जनसंख्या 8.6 % है? कोई जवाब नहीं है तो बकबक करना बंद कर दो।

जितनी जनसंख्या SC/ST की है उतनी संख्या उनकी नौकरी में भी होने चाहिए, इसका भ्रम ये सांसद राजनीति करने के लिए बहुत समय से फैलाते रहे हैं। बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ 1969 में जबकि बैंक तो बहुत पहले से चल रहे थे और तब उनमें SC/ST नाममात्र को थे। राष्ट्रीयकरण के बाद ही बैंकों में SC/ST का आरक्षण शुरू हुआ यानी 1969 के बाद।

मैं जब बैंक में रहते हुए Corporate level पर SC/ST का आरक्षण लागू करना देखता था तब मेरे कार्यकाल में 30 सांसदों की 7 संसदीय समितियां आरक्षण लागू हो रहा है या नहीं इसकी जांच के आई थी (1985 से 1990 के बीच) - हर समिति के सदस्यों को फितूर रहता था कि बैंक में SC/ST की संख्या कम क्यों है जबकि उनकी आबादी ज्यादा है। लेकिन उन्हें समझ नहीं आता था कि बैंकों में आरक्षण 1969 में शुरू होकर SC/ST की संख्या उनकी आबादी के अनुपात में नहीं हो सकती। वे इसलिए नहीं समझते थे कि उन्हें अपने क्षेत्र में जाकर ढोल पीटना होता था कि उन्होंने SC/ST के लिए क्या आवाज़ उठाई।

यह काम अब राहुल गांधी कर रहा है और करता रहेगा क्योंकि भेजे में तो कुछ घुसने नहीं देता।

कर्नाटक : ठेके वाली नौकरियों में भी अब आरक्षण, कांग्रेस सरकार ने बिना चर्चा पास किया बिल


कांग्रेस शुरू से ही विवाद खड़े करने वाली पार्टी है। कर्नाटक की कांग्रेस सरकार अब ठेके वाली नौकरियों में भी आरक्षण लागू करेगी। कांग्रेस  सरकार ने इसके लिए कर्नाटक विधानसभा में बिल भी पास कर दिया है। सरकार में ठेके पर रखे जाने वाले लोगों को अब आरक्षण के आधार पर रखा जाएगा।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कांग्रेस सरकार ने गुरुवार (25 जुलाई, 2024) को राज्य विधानसभा में 6 बिल बिना चर्चा पास करवाए। इस दौरान भाजपा और जेडीएस ने विधानसभा में चर्चा की माँग की। इन 6 बिल में एक राज्य की ठेके वाली नौकरियों में SC/ST और OBC को आरक्षण का प्रावधान करने वाला बिल भी था।

यानी अब जो भी लोग सरकार के लिए ठेके पर काम करेंगे, उनको भी आरक्षण के आधार पर भर्ती किया जाएगा। कर्नाटक में वर्तमान में लगभग 55,000 लोग सरकार के लिए ठेके पर काम करते हैं। इनकी भर्ती निजी रोजगार एजेंसियाँ करती हैं।

अब इन एजेंसियों को लोगों की भर्ती में आरक्षण लागू करना पड़ेगा। हालाँकि, इन भर्तियों के जरिए जिन लोगों को नौकरियाँ दी जाएँगी, उनको स्थायी ना करने की बात भी बिल में कही गई है। इसी के साथ इन नौकरियों की सँख्या विभाग के 10% से अधिक ना होने की बात भी बिल में कही गई है।

कर्नाटक सरकार के इस बिल के पास किए जाने से पहले मई, 2024 में इसको लेकर कुछ दिशानिर्देश भी जारी किए थे। इसमें कहा गया था कि जो नौकरियाँ 45 दिनों से कम के लिए दी जाएंगी, उन पर यह नियम लागू नहीं होगा। इसके अलावा आरक्षण वाली भर्तियों में कम से कम 33% महिलाएँ भर्ती की जानी चाहिए।

कर्नाटक विधानसभा में इस बिल के पास होने के दौरान JDS और भाजपा चर्चा की माँग करते रहे। JDS और भाजपा ने इस दौरान कर्नाटक सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए। भाजपा ने MUDA, वाल्मीकि और अन्य मामलों की जाँच की माँग भी की।

कर्नाटक की कांग्रेस सरकार का आरक्षण को लेकर एक महीने के भीतर यह दूसरा निर्णय है। इससे पहले कर्नाटक कैबिनेट ने निर्णय लिया था कि राज्य की प्राइवेट नौकरियों में कर्नाटक के लोगों को 50-75% आरक्षण मिलेगा। मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने ऐलान किया था कि कनिष्ठ नौकरियों में 75% जबकि वरिष्ठ नौकरियों में 50% आरक्षण कन्नड़ भाषियों को मिलेगा।

हालाँकि, IT समेत अन्य उद्योगों के भारी विरोध और राज्य से बाहर जाने की चेतावनी के बाद इस निर्णय को स्थगित कर दिया गया था। कर्नाटक सरकार ने कहा था कि वह इस बिल को लेकर सबकी आशंकाओं का समाधान करेंगे।

आंध्र प्रदेश : कर्नाटक की कांग्रेस सरकार के 75% आरक्षण वाले बिल से डरा IT कंपनियों का सबसे बड़ा समूह को CM नायडू के मंत्री बेटे ने कहा – आंध्र में स्वागत है, हम देंगे सारी सुविधाएँ

                          आंध्र प्रदेश के मंत्री नारा लोकेश ने कंपनियों को अपने राज्य में आमंत्रित किया
प्रारम्भ से कांग्रेस विवादों को खड़ा कर जनता को उनमें उलझा कर राज करना चाहती है। इसको विकास से ज्यादा सरोकार नहीं। जनता को इस कटु सच्चाई को समझना होगा। अब वर्तमान में कर्नाटक में कांग्रेस सरकार ने IT कंपनियों के सामने जो आरक्षण की गंभीर समस्या खड़ी की है, जिसे आंध्र प्रदेश सरकार ने हाथों-हाथ लेने का प्रयास कर रही है। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू आंध्र प्रदेश को जिस तरह विकसित किया, उसे भुलाया नहीं जा सकता। आंध्र के विभाजित होने से पहले नायडू को आंध्र को एक विकसित राज्य बना दिया था। दुर्भाग्य से विभाजन होने पर प्रदेश का विकसित हिस्सा तेलंगाना में चला गया। NDA को समर्थन देने में नायडू ने नरेंद्र मोदी से सौदेबाजी नहीं करने का मुख्य कारण आंध्र के विकास में मोदी का सहयोग। अब नायडू सरकार राज्य को विकसित की राह पर चल दी है। 

कर्नाटक में कांग्रेस सरकार ने मैनेजमेंट से जुड़ी 50% और नॉन-मैनेजमेंट से जुड़ी 75% नौकरियों को स्थानीय लोगों के लिए आरक्षित कर दिया है। इसके बाद IT कंपनियों के सबसे बड़े समूह ने इस कदम की आलोचना की है। ‘कर्नाटक स्टेट एम्प्लॉयमेंट ऑफ लोकल इंडस्ट्रीज फैक्ट्रीज इस्टैब्लिशमेंट एक्ट बिल, 2024’ का विरोध करते हुए ‘नेशनल एसोसिएशन ऑफ सॉफ्टवेयर एन्ड सर्विस कंपनीज’ (NASSCOM) ने कहा है कि वो फैसले को लेकर हताश एवं चिंतित है। उसने याद दिलाया कि तक कंपनियाँ कर्नाटक की GDP में 25% का योगदान देती हैं।

IT कंपनियों के सबसे बड़े संघ ने कहा कि स्थानीय प्रतिभाओं की कमी होने के कारण कंपंनियों को किसी अन्य राज्य का रुख करने को मजबूर होना पड़ सकता है। NASSCOM ने कहा है कि आज की प्रतियोगी दुनिया में ज्ञान पर आधारित कारोबार वहीं स्थापित होंगे जहाँ प्रतिभाएँ होंगी, क्योंकि दक्ष कर्मचारी सफलता के लिए ज़रूरी हैं। नैसकॉम ने कहा कि दुनिया भर में प्रतिभाओं की कमी है और कर्नाटक कोई अपवाद नहीं है। संस्था ने कहा कि किसी भी राज्य को तकनीक का हब बनने के लिए उसे दुनिया भर की प्रतिभाओं को आकर्षित करना होगा, साथ ही उसे स्थानीय प्रतिभाओं को भी तैयार करना होगा।

संगठन ने याद दिलाया कि बेंगलुरु देश का ‘सिलिकन वैली’ माना जाता है, यहाँ सामाजिक-आर्थिक विकास में इसका खासा योगदान है, इसी कारण यहाँ राष्ट्रीय औसत से अधिक प्रतिव्यक्ति आय है। संगठन ने याद दिलाया कि राज्य में 11,000 स्टार्टअप हैं। NASSCOM ने कहा कि नए बिल से न सिर्फ इंडस्ट्री के विकास को बाधित करेगा, बल्कि बल्कि नौकरियों और राज्य की वैश्विक छवि पर भी दुष्प्रभाव डालेगा। संगठन ने कहा कि इस फैसले से कंपनियाँ बाहर जाएँगी।

उधर आंध्र प्रदेश सरकार ने NASSCOM की चिंताओं को जायज बताते हुए कंपनियों को आमंत्रित किया है। उन्होंने नैस्कॉम के सदस्यों से कहा कि हम आपकी निराशा समझते हैं, हम आपकी IT सेवाओं का विस्तार करने के लिए स्वागत करते हैं। उन्होंने बताया कि विशाखापत्तनम में AI एन्ड डेटा क्लस्टर सेंटर बनाया जा रहा है। राज्य के IT, इलेक्ट्रॉनिक्स, संचार और मानव संसाधन मंत्री ने कहा कि उनके पिता चंद्रबाबू नायडू के नेतृत्व वाली सरकार कंपनियों को सर्वश्रेष्ठ सुविधाएँ, निर्बाध पॉवर सप्लाई और इंफ्रास्ट्रक्चर के अलावा दक्ष प्रतिभाएँ भी देंगी।

कर्नाटक : कांग्रेस सरकार के ‘लोकल कोटा’ पर उठे सवाल, उद्योगपति बोले- प्राइवेट सेक्टर में कन्नड़ भाषियों को रिजर्वेशन भेदभावपूर्ण, बिल रद्द करें

कर्नाटक में निजी नौकरियों में कन्नड़ भाषाई लोगों को 50-75% आरक्षण देने का निर्णय कारोबारी समुदाय को रास नहीं आया है। इस संबंध में बिल कैबिनेट से पास होने के बाद कई कारोबारियों ने अपनी राय इस संबंध में रखी है। उन्होंने इसकी आलोचना करते हुए इसे भेदभावपूर्ण बताया है। कारोबारियों ने कहा है कि इसमें कुछ छूट दी जानी चाहिए।

कर्नाटक सरकार के निर्णय पर कन्नड़ उद्योगपति और मनिपाल ग्लोबल सर्विसेस के चेयरमैन TV मोहनदास पाई ने एक्स पर लिखा, ”इस बिल को रद्द कर देना चाहिए। यह भेदभावपूर्ण, रूढ़िवादी और संविधान के विरुद्ध है। क्या सरकार को यह प्रमाणित करना है कि हम कौन हैं? यह एनिमल फार्म जैसा एक फासीवादी बिल है, अविश्वसनीय बात है कि कांग्रेस इस तरह का बिल ला सकती है। क्या अब एक सरकारी अधिकारी निजी क्षेत्र के इंटरव्यू में बैठेगा? क्या लोगों को भाषा की परीक्षा देनी पड़ेगी?”

उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा, “यह बिल अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक है। कर्नाटक सरकार का यह कदम अनुच्छेद 19 के विरुद्ध है। इससे पहले हरियाणा सरकार ने यही करने की कोशिश की थी, लेकिन हाई कोर्ट ने उस पर रोक लगा दी थी। अगर आपको लोगों को नौकरी देनी है तो उन्हें कौशल का प्रशिक्षण दें। उनको इंटर्नशिप करवाएँ।”

TV मोहनदास पाई के अलावा दवाइयों के लिए कच्चा माल उपलब्ध करवाने वाली देश की सबसे बड़ी कम्पनी बायोकॉन लिमिटेड की मुखिया किरण मजुमदार शॉ ने भी इस बिल को लेकर अपनी चिंताएँ प्रकट कीं। उन्होंने लिखा, “टेक हब के रूप में हमें स्किल्ड लोगों की आवश्यकता है। भले ही हमारा उद्देश्य स्थानीय लोगों को रोजगार देना हो, हमें इस कदम से टेक्नोलॉजी में अपनी अच्छी स्थिति को प्रभावित नहीं करना चाहिए। ऐसी कुछ नीतियाँ होनी चाहिए जो विशेष भर्तियों में इस नीति से छूट दें।”

बाइक टैक्सी कम्पनी युलू के को फाउंडर और कर्नाटक ASSOCHAM के सह चेयरमैन RK मिश्रा ने इसे अदूरदर्शी कदम बताया। उन्होंने लिखा, “कर्नाटक सरकार का एक और विचित्र कदम। स्थानीय लोगों के आरक्षण को जरूरी कर दिया और हर कम्पनी में एक सरकारी आदमी बिठाना। इससे भारतीय IT कम्पनियाँ और जीसीसी डरेंगे। अदूरदर्शी।”

15 जुलाई, 2024 को बेंगलुरु में हुई राज्य कैबिनेट बैठक में इस बिल को मंजूरी दे दी गई है। इस बिल के अनुसार, राज्य में स्थित सभी फैक्ट्रियों और दफ्तरों में नौकरी पर रखे जाने वाले लोग अब कन्नड़ ही होने चाहिए। इस बिल के अनुसार, राज्य में स्थित सभी दफ्तरों और फैक्ट्रियों में काम पर रखे जाने वाले ग्रुप सी और ग्रुप डी (सामान्यतः क्लर्क और चपरासी या फैक्ट्री के कामगार) के 75% लोग कन्नड़ होने चाहिए। इसके अलावा, बिल के अनुसार इससे ऊँची नौकरियों में 50% नौकरियाँ कन्नड़ लोगों को मिलनी चाहिए।

बिल के अनुसार कर्नाटक में जन्मा या कर्नाटक में पिछले 15 वर्षों से रह रहा कोई भी व्यक्ति कन्नड़ माना जाएगा और इसे इस आरक्षण का लाभ मिलेगा। कन्नड़ आरक्षण का लाभ लेने के लिए व्यक्ति को 12वीं पास होना चाहिए और इस दौरान उसके पास कन्नड़ एक विषय के तौर पर होनी जरूरी है। यदि उसके पास यह नहीं है तो उसे कन्नड़ सीखनी होगी।

कितनी पीढ़ियों तक जारी रहेगा शिक्षा और नौकरी में आरक्षण? सुप्रीम कोर्ट मराठा रिजर्वेशन पर

अक्सर चुनावों में संविधान की दुहाई देने वाले आरक्षण की बोली लगाते नज़र आते हैं, जो इस बात को साबित करता है कि संविधान संविधान न होकर जनता को बहलाने का कोई छुनछुना हो। डॉ भीमराव आंबेडकर की दुहाई देने वाले आरक्षण की किस मुंह से बात करते हैं? 

इन छद्दम अम्बेदकारियों को यह भी मालूम होना चाहिए कि केवल 10 वर्ष के लिए आरक्षण मांगने वाले आंबेडकर ने इसका दुरूपयोग होता देख इसे समाप्त करने की मांग की थी, जो आज तक किसी भी सरकार ने पूरी नहीं की और न ही कर सकती है, क्योकि पार्टी कोई भी हो आरक्षण को सबने वोट-हथियार बना रखा है। दूसरे, जब संविधान समान अधिकार की बात करता है, फिर आरक्षण के नाम पर नौटंकी करना क्या संविधान का अपमान नहीं?
शिक्षा और नौकरी में कितनी पीढ़ियों तक आरक्षण जारी रहेगा? इस सवाल का जवाब सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने मराठा रिजर्वेशन से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान जानना चाहा। 5 जजों की संवैधानिक पीठ ने मार्च 19, 2021 को इस पर सुनवाई की।

जस्टिस अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि आरक्षण पर कैपिंग रखने के मंडल कमेटी के फैसले पर दोबारा विचार करने की ज़रूरत है। इस दौरान कोर्ट ने सवाल उठाया कि कितनी पीढ़ियों तक शिक्षा और नौकरी में ये आरक्षण जारी रहेगा। कोर्ट ने यह भी जानना चाहा कि यदि 50% आरक्षण हटा दिया जाए तो संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत मिलने वाला समानता का अधिकार तो प्रभावित नहीं होगा।

5 जजों की संवैधानिक पीठ में न्यायाधीश अशोक भूषण, एल नागेश्वर राव, एस अब्दुल नजीर, हेमंत गुप्ता और एस.रवीन्द्र भट्ट शामिल हैं। ये पीठ महाराष्ट्र राज्य आरक्षण अधिनियम की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही है। इसके तहत मराठा के लिए 16% आरक्षण किया गया था।

मंडल फैसले पर दोबारा विचार हो: मुकुल रोहतगी

अदालत में आरक्षण कानून के पक्ष में बहस करते हुए रोहतगी ने मंडल जजमेंट के कई आयामों पर बात की। उन्होंने कहा कि 10% आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को आरक्षण देने वाले केंद्र सरकार के फैसले ने 50% कैप को भंग कर दिया। उन्होंने कहा कि कई कारणों से मंडल कमेटी के फैसले पर दोबारा से गौर करने की जरूरत है, जिसे 1931 की जनगणना पर आधारित तैयार किया गया था, लेकिन आज जनसंख्या 135 करोड़ पहुँच गई है।

कोर्ट ने रोहतगी की दलीलों पर सवाल पूछा, “अगर आरक्षण पर कोई कैप नहीं रहेगी, तो समानता की कोई बात ही नहीं रह जाएगी। घूम-फिरकर फिर उसी चीज से निपटना होगा। इससे जो नई असमानता पैदा होगी, उस पर आपका क्या कहना है? हम इसे (आरक्षण को) आखिर कितनी पीढ़ियों तक जारी रखने वाले हैं?”

पीठ ने यह भी कहा कि आजादी के 70 साल बीत चुके हैं, और राज्यों को कई लाभकारी योजनाएँ चल रही हैं, और ‘क्या हम स्वीकार कर सकते हैं कि कोई विकास नहीं हुआ है, कोई भी पिछड़ी जाति आगे नहीं बढ़ी है?’

इस पर रोहतगी ने कहा, “हम बिल्कुल आगे बढ़े हैं। लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि देश में आज पिछड़ी श्रेणियों की संख्या 50 से घटकर 20 फीसदी हो गई है। मैं ये नहीं कह रहा कि पिछले नियम ख़राब थे। मैं बस ये कह रहा कि देश की आबादी काफी बढ़ चुकी है और मुमकिन है कि पिछड़े वर्ग की आबादी भी बढ़ गई। इसलिए आरक्षण के नियमों पर दोबारा विचार की ज़रूरत है।”

इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय ने 8 मार्च को भी सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी करके पूछा था कि क्या आरक्षण की सीमा को 50 फीसदी से ज़्यादा बढ़ाया जाना चाहिए? इसका मकसद दो सवालों के जवाब तलाशने हैं। पहला, क्या इंद्रा साहनी जजमेंट (मंडल कमीशन केस) पर पुनर्विचार की जरूरत है? 1992 के इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की सीमा 50% तय की थी। दूसरा, क्या 102वाँ संवैधानिक संशोधन राज्यों की विधायी क्षमता को प्रभावित करता है। यानी, क्या राज्य अपनी तरफ से किसी वर्ग को पिछड़ा घोषित कर आरक्षण दे सकते हैं या 102वें संशोधन के तहत अब यह अधिकार केवल संसद को है?

क्या है मराठा आरक्षण ?

साल 2018 में महाराष्ट्र सरकार ने पढ़ाई और नौकरी में मराठा आरक्षण को 16% कर दिया था। 2019 में बॉम्बे उच्च-न्यायालय ने मराठा आरक्षण को बरकरार रखा, लेकिन आरक्षण को घटा कर नौकरी में 13 प्रतिशत और उच्च शिक्षा में 12 प्रतिशत कर दिया।बॉम्बे हाईकोर्ट की याचिका को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने वाले याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि यह आरक्षण सुप्रीम कोर्ट के इंद्रा साहनी मामले में दिए गए फैसले का उल्लंघन करता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने अंतरिम आदेश में कहा है कि मराठा आरक्षण 2020-21 में लागू नहीं होगा। 

नहीं चाहिए आरक्षण की बैसाखी, सब्सिडी दे कर हमें लाचार बनाना बंद करो: मधु पासवान

                          मधु पासवान से ऑपइंडिया के संपादक अजीत भारती की बातचीत
आरक्षण किसी भी देश के विकास एवं सौहार्द का सबसे बड़ा शत्रु है, यह कोई आरोप नहीं कटु सत्य है और इस कटु सच्चाई पर हर नागरिक को ठंठे दिमाग से विचार करना होगा। हालांकि पूर्व में अपने इसी ब्लॉग पर आरक्षण के हो रहे दुरूपयोग के बारे में अपने व्यक्तिगत अनुभव के साथ लिख भी चूका हूँ। वास्तव में आरक्षण विकास और सौहार्द का सबसे दुश्मन है। आज कई अनुसूचित जाति के लोग अपनी वास्तविक जाति को छुपाकर सुवर्ण जाति के उपनामों का प्रयोग कर रहे हैं। 

कहीं कोई नौकरी आदि न कर सकने वालों ने जाति के नाम नाम पर राजनीतिक दुकान खोल अपना और अपने परिचित लोगों का उत्थान किया है, अपनी जाति के लोगों को पागल बनाकर अपनी तिजोरियां ही नहीं, बल्कि अपनी भावी पीडियों तक के लिए इंतजाम कर दिया है। प्रत्यक्ष को प्रमाण की जरुरत नहीं, किसी भी मायावती, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, चंद्रशेखर रावण, रामविलास पासवान आदि किसी भी नेता की चल और अचल संपत्ति को देखा जा सकता है।    

ऑपइंडिया ने मधु पासवान से बातचीत की, जो सोशल मीडिया में खासे सक्रिय रहते हैं और वीडियो बना कर लोगों को जागरूक करते रहते हैं। सीतामढ़ी के रहने वाले मधु पासवान ऑटो चलाते हैं, लेकिन उनका कहना है कि आरक्षण के खिलाफ अभियान चलाने के कारण उनकी जान को खतरा है। वो चार भाइयों में सबसे छोटे हैं और उनकी माँ मुखिया भी रह चुकी हैं। मधु पासवान ने संपादक अजीत भारती से जातिवाद और आरक्षण पर बात की।

जातिवाद का उदाहरण देते हुए मधु पासवान ने कहा कि उनके गाँव में एक मुखिया के निधन के बाद श्राद्धकर्म में निमंत्रण मिलने पर वो खाने गए थे। उन्होंने कहा कि गाँव में चमार और मुशहर सहित इन जातियों को सबसे अंत में खिलाया जाता है। वहाँ उन्होंने एक व्यक्ति को ये कहते हुए सुना कि दलित जातियों को अंत में खिलाया जाए, जिसके बाद वो पूरे पासवान समुदाय को लेकर वहाँ से चले गए। साथ ही उन्होंने कहा कि यहाँ के सवर्ण समुदाय के अधिकतर लोग ‘निम्न जाति’ के उम्र में बड़े लोगों को भी सम्मान नहीं देते।

मधु पासवान ने याद दिलाया कि रामायण में भगवान श्रीराम ने निषादराज को जो सम्मान दिया था, वैसे ही वो सनातन से जुड़े हुए हैं। हालाँकि, मधु पासवान ने ये भी कहा कि आज सवर्ण समाज में ऐसे कई लोग हैं, जो उनके साथ नाश्ता-पानी करते हैं। उन्होंने कहा कि अब बदलाव आ गया है और वो राजपूतों के यहाँ पानी पीते हैं, उनके कार्यक्रमों में जाते हैं। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी के साथ ऐसी कोई समस्या नहीं है।

उन्होंने कहा कि पहले ऐसा नहीं था, लेकिन अब 5-10 उनसे उम्र में छोटे लोग हैं, जो उन्हें ‘भैया’ कह कर पुकारते हैं, जबकि अधिकतर ‘भाई’, ‘जी’ या नाम के साथ ही सम्बोधित करते हैं। उन्होंने पूछा कि क्या 12 वर्ष का एक बच्चा 60 साल के बुजुर्ग को ‘भाई’ बोल सकता है? उन्होंने बताया कि उनके पंचायत के पकड़ी गाँव में मुशहर समाज से ईसाई मिशनरी जुड़ गए हैं। लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके पिता के जो संस्कार हैं, इस कारण वो वीडियो बना कर लोगों को जागरूक करते हैं।

उन्होंने JNU में लगे देशविरोधी नारों की भी बात की। आरक्षण का विरोध करते हुए उन्होंने कहा कि कोई अधिक अंक पाकर भी किसी परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो पाता, वहीं कोई कम अंक लाकर भी पद पा जाता है। उन्होंने पूछा, “ये भारत बैसाखी के सहारे चलना चाहता है? क्या पीछे जाना चाहता है?” उन्होंने कहा कि अगर ऐसी हालत रही तो भारत बर्बाद हो जाएगा, हम इस देश की मिट्टी से बँधे हैं, अगर इस पर तांडव करने वाला उनका भाई भी होगा, तो वो तलवार लेकर खड़े हो जाएँगे।

उन्होंने कहा कि दलितों को धर्म परिवर्तन के लिए लाखों में कैश दिए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि मिशनरियों के प्रयासों को विफल करने के लिए वो मुशहर समाज के बच्चों को पढ़ाते हैं, उनकी मदद करते हैं। उन्होंने बताया कि इसके लिए आम जनता ही उनकी मदद कर देती है। मधु पासवान ने कहा कि मनुष्य शिक्षा के सहारे आगे बढ़ता है, बैसाखी नहीं। उन्होंने कहा कि गरीबों को भूमि व स्वास्थ्य सुविधाएँ मुहैया कराई जानी चाहिए।

अपनी बात जारी रखते हुए उन्होंने बताया कि आरक्षण की जगह ये चीजें (भूमि, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएँ मुहैया कराना) होनी चाहिए थी। ऐसा नहीं कि कोई कहीं से भी 5% लेकर आ जाए तो उसे शिक्षक की नौकरी मिल जाएगी। उन्होंने कहा कि जब उनकी बहन शिक्षक बनी तो भी उन्होंने उसे टोका कि वो गरीबों को क्या पढ़ाएँगी? उन्होंने आरक्षण से आए शिक्षकों को ‘बैसाखी वाला’ बताते हुए कहा कि वो गरीबों के बच्चों का जीवन बर्बाद कर रहे हैं और वो उनका बहिष्कार करते हैं। बकौल मधु, अधिक सब्सिडी से लाचारी आती है।

जातिवाद और आरक्षण पर बोलते हुए मधु पासवान ने कहा, “भारत में शिक्षा में संविधान के हिसाब से समानता का अधिकार होना चाहिए। झूठ बोल कर अपनी ही जाति के लोगों को जनेऊधारी लोगों के प्रति भड़काया जाता है। गरीबी दूर करने के लिए मूलभूत सुविधाएँ ऐसे परिवारों को मुहैरा कराई जाए और पद उसी को दिए जाएँ, जो इसके योग्य हों।” इसके अलावा मधु पासवान ने कहा कि किसी के वस्त्र बदलने से गुण नहीं बदलते। उन्होंने संस्कृति बचाने पर जोर दिया।(साभार)