कर्नाटक में प्रस्तावित ग्रेटर बेंगलुरु इंटीग्रेटेड टाउनशिप (GBIT) यानी बिदादी टाउनशिप परियोजना को लेकर सियासी विवाद तेज हो गया है। राज्य की कांग्रेस सरकार की इस महत्वाकांक्षी परियोजना के खिलाफ भाजपा और जेडी(एस) ने मोर्चा खोल दिया है और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी से हस्तक्षेप करने की माँग की है।
भाजपा और जेडी(एस) का आरोप है कि किसानों की सहमति के बिना हजारों एकड़ उपजाऊ कृषि भूमि अधिग्रहित की जा रही है।
क्या है पूरा मामला और कितना बड़ा है प्रोजेक्ट?
कर्नाटक सरकार के अनुसार, बेंगलुरु पर बढ़ते दबाव को कम करने और शहर के विस्तार के लिए बिदादी और हरोहल्ली के बीच लगभग 18 हजार करोड़ रुपए की लागत से ग्रेटर बेंगलुरु इंटीग्रेटेड टाउनशिप (GBIT) विकसित करने की योजना पर काम कर रही है। सरकार इसे भविष्य के शहरी विकास और नई टाउनशिप मॉडल के तौर पर पेश कर रही है।
🚨 दरबारी पत्रकार आपको यह सच नहीं बताएंगे...
दिन-रात "संविधान बदलने" का भ्रम फैलाने वाले कांग्रेसियों का यह सच आखिर क्यों छिपाया जाता रहा? 🤔
जिस विषय पर वर्षों तक पर्दा डाला गया, उसे वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ अग्निहोत्री ने तथ्यों के साथ सबके सामने रख दिया। 🔥
— banwari Maheshwari (@banwariMaheshw1) June 15, 2026
विपक्ष का दावा है कि इसके लिए हजारों एकड़ उपजाऊ कृषि भूमि अधिग्रहित की जा रही है। दावों के मुताबिक, करीब 7,481 एकड़ से लेकर 9,600 एकड़ तक जमीन अधिग्रहण की योजना बताई जा रही है। सरकार ने संकेत दिया है कि जून के अंत तक भूमि अधिग्रहण से जुड़ी अधिसूचनाएँ पूरी की जाएँगी और प्रभावित किसानों को मुआवजा दिया जाएगा।
BJP ने बताया- किसान कर रहे विरोध, नहीं हो रही सुनवाई
भाजपा और जेडी(एस) ने इस परियोजना को लेकर कई गंभीर आरोप लगाए हैं। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र ने राहुल गाँधी को लिखे पत्र में दावा किया कि 25 गाँवों के 3,500 से ज्यादा किसान पिछले करीब 470 दिनों से विरोध कर रहे हैं, लेकिन उनकी आपत्तियों पर सार्वजनिक सुनवाई तक नहीं की गई।
जेडी(एस) नेता निखिल कुमारस्वामी ने आरोप लगाया कि सरकार ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 के पारदर्शिता और सहमति संबंधी प्रावधानों को नजरअंदाज किया। उन्होंने दावा किया कि अंतिम भूमि अधिग्रहण अधिसूचना जारी करने से पहले पर्याप्त जनसहमति नहीं ली गई।
इसी बीच जेडी(एस) ने वित्त विभाग के दस्तावेज भी सार्वजनिक किए, जिनमें परियोजना के पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल, फंडिंग व्यवस्था और एक साथ बड़ी मात्रा में जमीन अधिग्रहण पर सवाल उठाए जाने का दावा किया गया। विपक्ष आरोप लगा रहा है कि परियोजना के लिए HUDCO से लगभग 12 हजार करोड़ रुपए जुटाने की योजना बनाई जा रही है।
भाजपा ने कहा- यह राज्य प्रायोजित भूमि कब्जा
केंद्रीय मंत्री और जेडी(एस) नेता एचडी कुमारस्वामी ने मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार पर हमला करते हुए आरोप लगाया कि यह विकास परियोजना नहीं बल्कि रियल एस्टेट हितों को फायदा पहुँचाने वाला मॉडल बनती जा रही है। उन्होंने कहा कि किसानों की इच्छा के खिलाफ उपजाऊ जमीन ली जा रही है और विरोध करने वालों पर प्रशासनिक दबाव डाला जा रहा है।
— Dr. Bharath Shetty Y. (@bharathshetty_y) June 15, 2026
वहीं भाजपा ने इसे ‘राज्य प्रायोजित भूमि कब्जा’ बताते हुए राहुल गाँधी से मुख्यमंत्री को हस्तक्षेप कर जमीन अधिग्रहण रोकने का निर्देश देने की माँग की है। दूसरी ओर मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि परियोजना पहले से चली आ रही शहरी योजना का हिस्सा है और इसे रोका नहीं जाएगा।
कर्नाटक कैबिनेट मंत्री रामलिंगा रेड्डी का इस्तीफा (फोटो साभार: DH/Telangana Today) जिस बात की आशंका थी उसकी शुरुआत हो गयी है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा थी कि सिद्धारमैया अगर मुख्यमंत्री पद छोड़ रहे हैं तो नए मुख्यमंत्री को भी चैन से नहीं बैठने देंगे। खेल खिलेगा और खिलना शुरू हो गया। मनपसंद मंत्रालय नहीं मिलने पर कैबिनेट से इस्तीफा। मामूली बात नहीं। मुख्यमंत्री शिवकुमार गर्म खीर को फूंक मार-मार कर खाना होगा। इशारा आ चुका है।
कर्नाटक में नई सरकार के गठन और विभागों के बंटवारे के तुरंत बाद कांग्रेस के भीतर का आंतरिक असंतोष एक बड़े राजनीतिक संकट में बदल गया है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता और नवनियुक्त कैबिनेट मंत्री रामलिंगा रेड्डी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। रेड्डी ने खुलेआम अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा है कि उनसे किया गया वादा पूरा नहीं किया गया, जिसके चलते वे यह बड़ा कदम उठा रहे हैं। हालाँकि उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे कैबिनेट छोड़ रहे हैं, लेकिन विधायक (MLA) और कांग्रेस कार्यकर्ता के रूप में काम करते रहेंगे।
शुक्रवार (5 जून 2026) को बेंगलुरु में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान रामलिंगा रेड्डी ने मुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार पर सीधा निशाना साधा। रेड्डी ने दावा किया, “डीके शिवकुमार खुद मेरे घर आए थे और कहा था कि जब मैं सीएम बनूँगा, तो मैं इस मंत्रालय (बेंगलुरु विकास) को छोड़ दूँगा और आप इसे संभाल लेना।” रेड्डी के मुताबिक, शपथ ग्रहण समारोह से ठीक एक दिन पहले भी जब वे शिवकुमार से मिले, तो उन्हें दोबारा आश्वस्त किया गया था कि बेंगलुरु से जुड़ा पोर्टफोलियो उन्हीं को मिलेगा।
रेड्डी ने भावुक होते हुए कहा, “मैंने कभी इस विभाग की माँग खुद से नहीं की थी, लेकिन मुझे बार-बार इसका भरोसा दिया गया था। दो बार वादा करने के बाद अब मुझे जल संसाधन विभाग दे दिया गया। मैं इस फैसले से बेहद निराश हूँ और इसीलिए इस्तीफा दे रहा हूँ।”
रामलिंगा रेड्डी ने अपना इस्तीफा सीधे मुख्यमंत्री को सौंपने के बजाय अपने एक समर्थक के जरिए मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव को भिजवाया है। अपने त्यागपत्र में उन्होंने लिखा, “मैं कैबिनेट में मंत्री पद देने के लिए आपका और कॉन्ग्रेस पार्टी का आभार व्यक्त करता हूँ। चूँकि मैं अपनी अंतरात्मा के खिलाफ काम करने में असमर्थ हूँ, इसलिए मैं मंत्री पद से अपना इस्तीफा सौंप रहा हूँ। कृपया इसे स्वीकार करें।”
हालाँकि रेड्डी ने मीडिया से कहा कि वे व्यक्तिगत रूप से न तो शिवकुमार से नाराज हैं और ना ही सिद्धारमैया से।
प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: ChatGPT) कांग्रेस हिन्दू-मुस्लिम कर ध्रुवीकरण खुद करती है फिर कहती है वोट चोरी हो गया। शाहबानो केस पार्लियामेंट से पलट तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी का मिला "हार", दुनिया कहां जा रही है लेकिन कांग्रेस मुस्लिम महिलाओं को रूढ़िवाद में फंसा अपनी रोटियां सेंकने में लगी रहती है। और कट्टरपंथी इनकी रौ में बहने लगती है। उसका अंजाम क्या होता है यह टीवी पर जमने वाली चौपालों के अच्छी तरह देखा जा सकता है। यानि जब बुर्का/हिजाब के हक़ में बोलने वालों से पूछा जाता है कि "तुम्हारे घरों में कितनी महिलाएं बुर्का/हिजाब जवाब नहीं में मिलता है। यानि मुद्दे को उछालो और खुद मालपुए खाओ और जनता को हिन्दू-मुस्लिम झगडे में लड़ने दो। इतना ही नहीं वो बातें सामने आती है जिन्हे आज तक कट्टरपंथी मौलानाओं से जनता से छिपाया। अगर ये बातें सनातन में होती सनातन विरोधी खूब शोर मचाते, लेकिन एक मुसलमान है जो चुपचाप उन कुरीतियों को झेल रहा है।
कर्नाटक में सिद्धारमैया सरकार अब खुलकर इस्लामी तुष्टिकरण पर उतर आई है। इसके लिए कांग्रेस सरकार ने साल 2022 के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें शिक्षण संस्थानों में हिजाब-बुर्का जैसे इस्लामी मजहबी पहनावे पर बैन लगा दिया गया था। इसकी जगह कांग्रेस सरकार ने चुपचाप वो फैसला लागू किया है, जिसमें कलावा, जनेऊ, माला, रुद्राक्ष पहनने की भी अनुमति देने की आड़ ली गई है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने साल 2022 के उस ऐतिहासिक फैसले को पलट दिया है, जिसने राज्य के शिक्षण संस्थानों में अनुशासन और एकरूपता लाने के लिए हिजाब और बुर्के जैसे मजहबी पहनावे पर प्रतिबंध लगाया था। सरकार ने बुधवार (13 मई 2026) को जारी अपने नए आदेश के जरिए ‘सीमित पारंपरिक और आस्था-आधारित पहचान चिह्नों’ के नाम पर स्कूलों और कॉलेजों में हिजाब की राह फिर से खोल दी है।
इस रिपोर्ट के माध्यम से हम आपको बताने की कोशिश कर रहे हैं कि कैसे यह फैसला केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि गिरते हुए वोटबैंक को बचाने के लिए की गई ‘राजनीतिक सौदेबाजी’ है। यह फैसला केवल एक प्रशासनिक फेरबदल नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा राजनीतिक गणित, गिरता हुआ वोटबैंक और तुष्टीकरण की वह पराकाष्ठा है, जिसने कर्नाटक के शैक्षणिक माहौल को एक बार फिर वैचारिक प्रयोगशाला बना दिया है।
साल 2022 का आदेश क्या था और क्यों जरूरी था?
दरअसल, फरवरी 2022 में बसवराज बोम्मई सरकार ने कर्नाटक शिक्षा अधिनियम के तहत स्पष्ट आदेश दिया था कि जहाँ यूनिफॉर्म निर्धारित है, वहाँ छात्रों को वही (यूनिफॉर्म) पहनना अनिवार्य है। कोई धार्मिक प्रतीक यूनिफॉर्म को बदल या प्रभावित नहीं कर सकता। उडुपी के सरकारी प्री-यूनिवर्सिटी गर्ल्स कॉलेज से शुरू हुआ हिजाब विवाद पूरे राज्य में फैल गया था। मुस्लिम छात्राएँ हिजाब पहनकर क्लास में घुसने की जिद पर अड़ी रहीं। विरोध प्रदर्शन हुए, स्कूल बंद हुए।
कर्नाटक हाई कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने भी साल 2022 में साफ कहा था कि हिजाब कोई जरूरी मजहबी प्रथा नहीं है। यह व्यक्तिगत विश्वास का मुद्दा है, लेकिन स्कूल-कॉलेज जैसे सार्वजनिक संस्थानों में यूनिफॉर्म और अनुशासन पहले आते हैं। कोर्ट ने कहा, शिक्षा संस्थान वैज्ञानिक सोच, समानता और जॉतिवाद-निरपेक्षता सिखाने का केंद्र हैं, धार्मिक पहचान का नहीं। मामला अब भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। फिर भी सिद्धारमैया सरकार ने बिना कोर्ट का इंतजार किए, चुपके से 2022 का आदेश वापस ले लिया। यह न्यायपालिका का मजाक है।
सीमित प्रतीकों की आड़ में कट्टरपंथ को न्योता
कांग्रेस सरकार द्वारा जारी नए सर्कुलर के बिंदु संख्या 3 और 4 को अगर ध्यान से पढ़ा जाए, तो सिद्धारमैया सरकार की मंशा साफ हो जाती है। आदेश में कहा गया है कि छात्र ‘सीमित पारंपरिक और आस्था-आधारित प्रतीकों’ को निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ पहन सकते हैं। इसमें पेटा (पगड़ी), जनेऊ, शिवदारा, रुद्राक्ष और ‘सिर का कपड़ा’ (हिजाब) शामिल हैं।
पहली नजर में यह आदेश सर्वधर्म समभाव जैसा लग सकता है, लेकिन इसके पीछे की चालाकी को समझना जरूरी है। जनेऊ, रुद्राक्ष या कलावा जैसे प्रतीक सदियों से हिंदू छात्र पहनते आए हैं और ये कभी भी ‘यूनिफॉर्म’ के लिए बाधा नहीं बने। लेकिन इनकी आड़ लेकर हिजाब को स्कूलों में प्रवेश दिलाना सीधे तौर पर उस कट्टरपंथी एजेंडे को खाद-पानी देना है, जिसे 2022 में कोर्ट और तत्कालीन सरकार ने खारिज कर दिया था। यह सशक्तिकरण नहीं है, बल्कि कक्षाओं के भीतर धार्मिक पहचान का संस्थानीकरण (Institutionalization) है। स्कूल वह स्थान हैं जहाँ बच्चों के दिमाग मुक्त, जिज्ञासु और समान होने चाहिए, न कि ऐसी जगह जहाँ राजनीतिक दल वोटबैंक की खातिर अलगाववाद को बढ़ावा दें।
पहचान का संकट, जनेऊ बनाम हिजाब का तर्क
कांग्रेस सरकार ने इस आदेश को लागू करने के लिए जिस तर्क का सहारा लिया है, वह बेहद चालाकी भरा है। सरकार ने कहा है कि छात्रों को जनेऊ, कलावा, माला और रुद्राक्ष जैसे पारंपरिक चिह्न पहनने की अनुमति दी जाएगी और इसी की आड़ में हिजाब को भी शामिल कर लिया गया। लेकिन यहाँ एक बुनियादी फर्क है जिसे कांग्रेस सरकार ने जानबूझकर नजरअंदाज किया है।
जनेऊ, कलावा और रुद्राक्ष ऐसे धार्मिक प्रतीक हैं जो व्यक्ति की पहचान को कभी नहीं छिपाते। जनेऊ वस्त्रों के भीतर पहना जाता है, कलावा कलाई पर बंधा एक साधारण धागा होता है और रुद्राक्ष भी गले में कमीज के नीचे रहता है। इनसे न तो छात्र की पहचान संदिग्ध होती है और न ही कक्षा के अनुशासन में कोई बाधा आती है। इसके विपरीत, हिजाब और बुर्का सीधे तौर पर छात्र की पहचान को ढक लेते हैं।
दुनिया के कई विकसित और धर्मनिरपेक्ष देशों जैसे फ्रांस, बेल्जियम और ऑस्ट्रिया में सार्वजनिक स्थानों और स्कूलों में चेहरे को ढकने वाले पहनावे पर प्रतिबंध है। इसका कारण धार्मिक घृणा नहीं, बल्कि ‘सार्वजनिक सुरक्षा’ (Public Security) और ‘समानता’ है। लेकिन कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने इन वैश्विक मानकों और सुरक्षा चिंताओं को ताक पर रखकर केवल इस्लामी वोटबैंक को खुश करने के लिए यह कदम उठाया है।
जनेऊ और कलावा की आड़ में हिजाब का खेल
इस आदेश के बैकग्राउंड में अप्रैल 2026 की एक घटना के बारे में बताना जरूरी है। दरअसल, कांग्रेस सरकार ने अप्रैल 2026 में हुई उस घटना का हवाला दिया जिसमें एक हिंदू छात्र का जनेऊ उतरवा लिया गया था। असल में वह घटना ‘हिंदू घृणा’ का सीधा उदाहरण थी, क्योंकि जनेऊ एक पवित्र धागा है जो कपड़ों के नीचे रहता है।
लेकिन कांग्रेस सरकार ने इस जन-आक्रोश का समाधान करने के बजाय, इसे एक अवसर की तरह इस्तेमाल किया। सरकार ने जनेऊ उतरवाने की घटना पर दिखावे का दुख जताया और फिर ‘समानता’ का ढोंग करते हुए हिजाब को भी अनुमति दे दी। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी की उंगली कटने पर मरहम लगाने के बहाने आप उसके दूसरे हाथ को ही काट दें। जनेऊ की आड़ में हिजाब को वैध करना कांग्रेस की उस ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ का सबसे बड़ा प्रमाण है, जिसमें हिंदुओं की भावनाओं को केवल तुष्टीकरण के मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
उस विवाद को ढाल बनाकर सरकार ने हिजाब को स्कूलों में प्रवेश दिला दिया, जो कि विशुद्ध रूप से इस्लामी कट्टरपंथियों को खुश करने की एक कोशिश है।
न्यायपालिका की अवमानना और वैधानिक संकट
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि हिजाब का मामला वर्तमान में भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के समक्ष लंबित है। इससे पहले, कर्नाटक उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से अपने फैसले में कहा था कि ‘हिजाब पहनना इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा (Essential Religious Practice) नहीं है’। जब मामला देश की सबसे बड़ी अदालत में विचाराधीन है, तो आखिर ऐसी क्या जल्दी थी कि सिद्धारमैया सरकार को मई 2026 में ही यह आदेश जारी करना पड़ा?
यह फैसला न केवल न्यायिक प्रक्रिया का मजाक उड़ाता है, बल्कि उस संवैधानिक गरिमा पर भी प्रहार करता है जिसका गुणगान राहुल गाँधी और कांग्रेस के नेता हर मंच से करते हैं। मुख्यमंत्री ने अदालती प्रक्रिया का इंतजार करने के बजाय अपनी कार्यकारी शक्तियों का दुरुपयोग कर ध्रुवीकरण का रास्ता चुना है। यह पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) द्वारा अपनाए गए उसी खतरनाक रास्ते की तरह है, जहाँ वोट के लिए संस्थानों की शुचिता को दाँव पर लगा दिया जाता है।
चुनावी हार का डर और तुष्टीकरण का सहारा
इस फैसले की टाइमिंग पर गौर करना बेहद जरूरी है। आगामी शनिवार, यानी 16 मई 2026 को बेंगलुरु में मुस्लिम संगठनों और एसडीपीआई (SDPI) की एक बहुत बड़ी रैली होने वाली है। यह रैली किसी और के खिलाफ नहीं, बल्कि कांग्रेस सरकार के ही खिलाफ आयोजित की गई है। दावणगेरे विधानसभा उपचुनाव में कॉन्ग्रेस की जो दुर्गति हुई, उसने पार्टी आलाकमान की नींद उड़ा दी है।
दरअसल, इस फैसले के पीछे का असली खेल ‘नंबर गेम’ है। दावणगेरे विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस को जो झटका लगा, उसने सिद्धारमैया और डी.के. शिवकुमार की रातों की नींद हराम कर दी है। मुस्लिम बहुल क्षेत्र होने के बावजूद कांग्रेस उम्मीदवार समर्थ शमनूर मल्लिकार्जुन को मुस्लिम समुदाय का वह समर्थन नहीं मिला जिसकी पार्टी को उम्मीद थी।
वहाँ एसडीपीआई (SDPI) ने भारी सेंधमारी की, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि मुस्लिम मतदाता अब कांग्रेस को अपनी जागीर नहीं मान रहे हैं। मुस्लिम बहुल सीट होने के बावजूद कांग्रेस उम्मीदवार की मुश्किल से हुई जीत और एसडीपीआई को मिले भारी वोटों ने यह साफ कर दिया है कि कांग्रेस का पारंपरिक मुस्लिम वोटबैंक अब उसके हाथ से खिसक रहा है।
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा डर शनिवार (16 मई 2026) को होने वाली बेंगलुरु की विशाल रैली है। चूँकि अब कांग्रेस को डर है कि अगर यह रैली सफल हो गई, तो आगामी विधानसभा चुनाव में उसका ‘मुस्लिम वोटबैंक’ पूरी तरह बिखर जाएगा। इसी रैली की हवा निकालने के लिए और कट्टरपंथियों को यह संदेश देने के लिए कि ‘कांग्रेस उनकी सबसे बड़ी हितैषी है’, यह हिजाब वाला आदेश चुपचाप लागू किया गया। यह एक राजनीतिक ‘रिश्वत’ (Political Bribe) है जो छात्रों के भविष्य की कीमत पर दी गई है।
टीएमसी के बंगाल फॉर्मूले की राह पर कर्नाटक की कांग्रेस सरकार
कांग्रेस कर्नाटक को उसी रास्ते पर ले जा रही है जिस पर ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल को पहुँचाया है। तुष्टीकरण की यह राजनीति शुरू में तो फायदे का सौदा लगती है, लेकिन अंत में यह राज्य के सामाजिक ताने-बाने को नष्ट कर देती है। स्कूलों को धार्मिक पहचान का प्रदर्शन स्थल बनाकर कांग्रेस आने वाली पीढ़ी के मन में ‘हम’ और ‘वे’ की भावना पैदा कर रही है।
हिंदू छात्रों के प्रतीकों (जनेऊ, कलावा) का उपयोग केवल एक ‘शील्ड’ के रूप में किया जा रहा है ताकि कोई उन पर सीधा आरोप न लगा सके। लेकिन सच्चाई यह है कि हिंदू प्रतीकों को तो स्कूलों में हमेशा से हतोत्साहित किया गया है। सीईटी (CET) परीक्षा के दौरान जिस तरह जनेऊ उतरवाए गए, वह कांग्रेस की असली मानसिकता को दर्शाता है। एक तरफ हिंदू प्रतीकों के प्रति ‘असहिष्णुता’ और दूसरी तरफ हिजाब के लिए ‘असीम प्रेम’ यह विषमता कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि कांग्रेस की राजनीतिक वास्तुकला (Architecture) है।
क्या 2028 में उलट जाएगा दाँव?
कांग्रेस को उम्मीद है कि हिजाब की वापसी से वह 16 मई की रैली के प्रभाव को कम कर देगी और मुस्लिम मतदाताओं को फिर से रिझा लेगी। लेकिन यह दाँव उल्टा भी पड़ सकता है। कर्नाटक की जनता देख रही है कि किस तरह एक खास समुदाय को खुश करने के लिए शिक्षा के स्तर और स्कूलों के अनुशासन से समझौता किया जा रहा है।
अगर इस फैसले के खिलाफ राज्य का हिंदू समाज एकजुट होता है, तो 2028 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के हाथ से कर्नाटक भी निकल जाएगा। जनता यह समझ रही है कि जो सरकार बच्चों की शिक्षा को राजनीति का मोहरा बना सकती है, वह राज्य का भला कभी नहीं कर सकती। ‘इव नम्मव’ (यह हमारा है) का नारा देने वाली सरकार ने असल में ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपना ली है।
कर्नाटक सरकार का यह आदेश समावेशिता के नाम पर समाज को बाँटने वाला कदम है। शिक्षा के अधिकार और धार्मिक पहचान के बीच संतुलन बनाने का दावा करने वाली कॉन्ग्रेस ने असल में तुष्टीकरण की वेदी पर ‘संवैधानिक समानता’ की बलि चढ़ा दी है। स्कूलों में हिजाब की वापसी केवल एक वस्त्र की वापसी नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता की वापसी है जो आधुनिक शिक्षा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बजाय मध्यकालीन पहचान को प्राथमिकता देती है। अब देखना यह है कि क्या कर्नाटक की जनता तुष्टीकरण की इस राजनीति को स्वीकार करेगी या 2028 में इसका निर्णायक जवाब देगी।
सरकारी कर्मचारियों का वेतन लटका (AI फोटो साभार: Dall-E) एक तरफ राज्यों में होने वाले चुनावों में सत्ता पाने के लिए बीजेपी महिला सशक्तिकरण बिल से महिलाओं को लुभाने में लगी है तो कर्नाटक में सरकारी कर्मचारी अपने वेतन के लिए तरस रहे हैं। ये फ्री की रेवड़ियों से कितना नुकसान हो रहा है जिसे विपक्ष की राज्य सरकारों में साफ-साफ देखा जा सकता है। ये वही मुफ्त की रेवड़ियां है जिनके लिए अरविन्द केजरीवाल का सभी पार्टियों ने विरोध जिन दुष्परिणामों को बता किया था, लेकिन सत्ता पाने की लालसा में उसी मकड़जाल में सभी पार्टियां फंस गयीं। बीजेपी शासित राज्यों में दुष्प्रभाव इसलिए नहीं दिख रहा कि केंद्र में भी बीजेपी सरकार है। दूसरे, बीजेपी जानती थी कि महिला बिल पास नहीं होगा उसके बावजूद बिल पेश करना क्या महिला वोट लेने का लालच नहीं? वर्तमान में आरक्षित करने में क्यों दर्द हो रहा है? जिस चुनाव में जिस पार्टी ने फ्री की रेवड़ियों को बंद करने की बात कही उसी पार्टी का सूपड़ा साफ होना तय है, चाहे बीजेपी ही क्यों न हो।
कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने मुफ्त रेवड़ियों के वादे किए, लेकिन सत्ता में आने के दो साल बाद भी यह बोझ आम आदमी की झेल रहा है। सरकारी कर्मचारियों का वेतन लटका हुआ है। हालात यह है कि लाखों कर्मचारी अप्रैल का आधा महीना गुजरने के बाद भी मार्च 2026 के वेतन का इंतजार कर रहे हैं।
मामला सीधे तौर पर राज्य के करीब 6 लाख कर्मचारियों से जुड़ा है, जिन्हें हर महीने की तरह अप्रैल के पहले हफ्ते में वेतन मिल जाना चाहिए था। लेकिन इस बार 10 अप्रैल तक भी बड़ी संख्या में कर्मचारियों को सैलरी नहीं मिली।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह समस्या एक-दो विभाग तक सीमित नहीं है। शिक्षा, राजस्व, पुलिस, स्वास्थ्य और अन्य विभागों के कर्मचारी इस देरी से प्रभावित हुए हैं। यानी पूरा प्रशासनिक ढाँचा ही इसकी चपेट में आ गया है।
सरकारी कर्मचारियों को वेतन न मिलने की वजह?
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, इस देरी की दो बड़ी वजहें सामने आ रही हैं। पहली- फंड की कमी और दूसरी- ट्रेजरी और प्रोसेसिंग सिस्टम से जुड़ी तकनीकी दिक्कतें। अधिकारियों का कहना है कि वित्तीय वर्ष खत्म होने के समय भुगतान का दबाव बढ़ जाता है, जिससे देरी हो जाती है।
लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं होता। राज्य की कांग्रेस सरकार पर पर आरोप सामने आए हैं कि सरकार ने करीब 6000 करोड़ रूपए की रकम अपनी गारंटी स्कीम्स, खासकर ‘गृहलक्ष्मी योजना’ की ओर डायवर्ट की है, जिससे वेतन भुगतान पर असर पड़ा।
वहीं राज्य के वित्तीय विभाग के अधिकारियों से एक और अहम बात सामने आई है। कई जगह ड्रॉइंग एंड डिस्बर्सिंग ऑफिसर (DDOs) ने समय पर बिल प्रोसेस नहीं किए, जिसकी वजह से भुगतान और अटक गया। यानी समस्या सिर्फ पैसे की नहीं, बल्कि प्रशासनिक ढिलाई की भी है।
वेतन में देरी का असर?
हालाँकि, कर्मचारी संगठनों का कहना है कि हर साल मार्च-अप्रैल के दौरान 2-3 दिन की देरी सामान्य मानी जाती है, लेकिन इस बार 10 दिन से ज्यादा देरी हो चुकी है, जो असामान्य है। यही वजह है कि कर्मचारियों में नाराजगी बढ़ रही है।
जमीनी स्तर पर इसका सीधा असर दिख रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि सैलरी न मिलने से EMI, बच्चों की फीस, किराया और रोजमर्रा के खर्च प्रभावित हो रहे हैं। कई लोगों को उधार लेने की नौबत आ गई है।
कुल मिलाकर, यह सिर्फ वेतन में देरी का मामला नहीं है, बल्कि राज्य की वित्तीय स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। एक तरफ सरकार की गारंटी योजनाओं पर हजारों करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं, दूसरी तरफ 6 लाख कर्मचारियों की सैलरी समय पर नहीं देना प्रशासनिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर चिंता बढ़ाने वाला संकेत है।
राज्य में जीत को कांग्रेस ने किए थे ‘रेवड़ी’ वादे
2023 में विधानसभा चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस ने पाँच गारंटी दी थी। इन्हें ‘रेवड़ी’ कहा गया था। कांग्रेस ने 2023 विधानसभा चुनाव में वादा किया था कि सत्ता में आने पर वह हर घर को 200 यूनिट मुफ्त बिजली देगी। इसे गृह ज्योति योजना का नाम दिया गया था। इसके अलावा गृह लक्ष्मी नाम की योजना का भी एक वादा किया गया था। इसके अंतर्गत कांग्रेस ने वादा किया था कि वह राज्य की महिलाओं को 2000 रूपए प्रतिमाह देगी।
कांग्रेस ने कर्नाटक की आर्थिक स्थिति और मुफ्त सुविधाओं के वादों से अर्थव्यस्था पर पड़ने वाले बोझ को दरकिनार करते हुए हर परिवार को 10 किलो अनाज देने का भी वादा किया था, इसे अन्न भाग्य योजना का नाम दिया गया था। कांग्रेस ने राज्य में महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा का भी वादा किया था। इसके अलावा राज्य के बेरोजगार युवाओं को भी 1500 रूपए देने की बात कही गई थी। इनमें से कुछ योजनाएँ पूरी तरह से लागू कर दी गई हैं तो कुछ को आंशिक रूप से लागू किया गया है।
कांग्रेस के इन ‘रेवड़ी’ वादों का असर अब राज्य के खजाने पर दिख रहा है और वह राजस्व बढ़ाने के लिए नई-नई जुगत भिड़ा रही है। वह राज्य की आम जनता को अब नए कर और बढ़े करों से लादना चाह रही है। साथ ही वह कमाई के नए जुगाड़ भी लगा रही है। सरकारी कर्मचारियों का लटका वेतन भी इसी का असर है।
डीजल-पेट्रोल के बाद पानी और बसों के किराए बढ़ाने की तैयारी
इससे पहले भी कांग्रेस सरकार ने अपना खजाना भरने के लिए जनता पर बोझ डाला है। राज्य सरकार ने पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाए थे। कांग्रेस सरकार ने राज्य में पेट्रोल और डीजल पर सेल्स टैक्स बढ़ाया था। इसके अंतर्गत पेट्रोल और डीजल के दाम राज्य क्रमशः 3 रूपए और 3.50 रूपए बढ़ गए थे। इसको लेकर कॉन्ग्रेस सरकार की खूब आलोचना हुई थी। यह निर्णय लोकसभा चुनाव के आने के तुरंत बाद लिया गया था।
पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ाने से भी कांग्रेस सरकार का खजाना पूरा नहीं पड़ा कि फिर कांग्रेस सरकार में उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने बेंगलुरु में पानी आपूर्ति के दाम बढ़ाने का ऐलान कर दिया था। उपमुख्यमंत्री शिवकुमार का दावा है कि बेंगलुरु का जल आपूर्ति विभाग अपना बिजली का बिल और कर्मचारियों की तन्ख्वाह तक नहीं दे पा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया कि कावेरी नदी से पानी लेने वाले बाशिंदों के लिए पानी की कीमतें 40% बढ़ाए जाने की तैयारी की।
कर्नाटक की सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी और सरकार ने आईपीएल के सामने अपनी हनक दिखाई है। एम. चिन्नास्वामी स्टेडियम में होने वाले आईपीएल मैचों के लिए कॉम्प्लिमेंटरी टिकट की माँग ने विवाद खड़ा कर दिया है। विधानसभा स्पीकर यू.टी. खादेर ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि हर विधायक को कम से कम चार प्रीमियम टिकट सुनिश्चित किए जाएँ।
यह मुद्दा तब सामने आया जब कांग्रेस विधायक विजयनंद काशप्पनावर ने कर्नाटक स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन (केएससीए) की आलोचना की। उन्होंने कहा कि आईपीएल 2026 सीजन के शुरूआती मैच 28 मार्च को बेंगलुरु में होने वाले हैं लेकिन केएससीए ने विधायकों और मंत्रियों को टिकट नहीं दिए।
हुंगुंड विधानसभा क्षेत्र से विधायक विजयनंद काशप्पनावर ने संवाददाताओं से बात करते हुए कहा, “28 मार्च को आईपीएल मैच है लेकिन केएससीए ने विधायकों, मंत्रियों या उनके परिवारों को टिकट नहीं दिए हैं। वे सरकार से सभी सुविधाएँ लेते हैं लेकिन विधायकों का सम्मान नहीं करते। हम वीआईपी हैं, हम लाइन में लगकर थोड़े न टिकट लेंगे। पिछली बार हम लाइन में खड़े हुए थे और फिर आम जनता के साथ सामान्य गैलरी में बैठना पड़ा। यह फिर नहीं होना चाहिए।”
उन्होंने आगे आरोप लगाया कि ऑनलाइन टिकट बिक्री से ब्लैक मार्केटिंग बढ़ गई है। उन्होंने कहा, “टिकट ₹5000 में बिक रहे हैं लेकिन उन्हें ₹35000 में बेचा जा रहा है। वे विधायकों, मंत्रियों या उनके परिवारों को टिकट नहीं दे रहे बल्कि ऑनलाइन बुकिंग करने को कह रहे हैं। हम जानते हैं कि ऑनलाइन बुकिंग कैसे ब्लैक मार्केटिंग को बढ़ावा देती है।”
काशप्पनावर ने माँग की कि केएससीए हर विधायक को कम से कम पाँच कॉम्प्लिमेंटरी टिकट, अलग सीटिंग व्यवस्था और डेडिकेटेड लाउंज उपलब्ध कराए। उन्होंने बताया कि यह मुद्दा पहले विपक्षी नेता आर. अशोक ने विधानसभा में उठाया था।
इस माँग पर स्पीकर यू.टी. खादेर ने उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार को निर्देश दिया कि वे केएससीए से सीधे बात करें और हर विधायक को कम से कम चार वीआईपी टिकट सुनिश्चित करें। शिवकुमार ने कहा कि वे केएससीए अध्यक्ष वेंकटेश प्रसाद से बात करेंगे और विधायकों द्वारा ऐसी सुविधाएँ माँगने में कुछ गलत नहीं है।
“We are VIPs, We Cannot Stand in Queues: KSCA Should Give 5 Tickets to Each MLA and Minister of Karnataka,” says Congress MLA Vijayananda Kashappanavar
Bengaluru
Congress MLA Vijayananda Kashappanavar has strongly criticized the Karnataka State Cricket Association (#KSCA) for… pic.twitter.com/hkG3UEhPb0
इस बीच भाजपा नेता और सांसद तेजस्वी सूर्या ने कांग्रेस विधायक पर हमला बोला। उन्होंने कहा, “विधायक का बयान गलत है और सच कहें यह आश्चर्यजनक भी नहीं है। सबसे पहले यह उनकी प्राथमिकताओं को उजागर करता है। जब राज्य के असली मुद्दों पर ध्यान देने की जरूरत है तब विधानसभा में इस तरह का मुद्दा उठाना खुद ही बहुत कुछ बताता है। अगर स्पीकर इस पर कार्रवाई करते हैं तो इससे विधान सौधा की गरिमा कम होती है।”
तेजस्वी सूर्या ने आगे कहा, “मूल सवाल यह है कि केएससीए या कोई भी खेल संगठन विधायकों को फ्री टिकट क्यों दे? उन्हें ऐसा क्या देना चाहिए? यह साफ तौर पर उत्पीड़न है, सामंती सोच है। एक विधायक जो फ्री टिकट, अलग गैलरी माँगता है और आम जनता के साथ बैठने से इनकार करता है वह यह मानता है कि वह उन लोगों से ऊपर है जिनका वह प्रतिनिधित्व करता है। यही समस्या है। अगर आम नागरिकों को टिकट खरीदना पड़ता है तो विधायकों को भी खरीदना चाहिए। सरल बात है। जब तक हम इसे स्पष्ट रूप से नहीं चुनौती देंगे तब तक उत्पीड़न की संस्कृति को बढ़ावा मिलता रहेगा जो आधुनिक, समान और लोकतांत्रिक समाज के बिल्कुल विपरीत है। यह गलत है और इसका विरोध किया जाना चाहिए।”
The MLA’s statement is wrong. And frankly, not surprising.
First, it exposes their priorities. At a time when real issues of the state demand attention, raising something like this in the Assembly is itself telling. And if the Speaker chooses to act on it, it diminishes the… https://t.co/DY4FemIyjw
बता दें कि चिन्नास्वामी स्टेडियम में बीते साल हुई भगदड़ में 11 लोगों की मौत हो गई थी। इसके बाद चिन्नास्वामी स्टेडियम में क्रिकेट मैचों के आयोजन पर रोक लगा दी गई थी। हालाँकि इस सत्र के लिए चिन्नास्वामी स्टेडियम को न सिर्फ आईपीएल की मेजबानी मिली है, बल्कि 2 इंटरनेशनल क्रिकेट मैचों का आयोजन भी यहाँ होगा।
चुनाव के समय मंचों से गूंजता वो ‘खटाखट-खटाखट’ का नारा आपको याद है? राहुल गांधी से लेकर कांग्रेस के तमाम दिग्गजों ने वादा किया था कि सरकार बनते ही महिलाओं और युवाओं के खातों में ‘खटाखट’ पैसे आएंगे। लेकिन चुनाव बीतते ही तस्वीर 180 डिग्री बदल गई है। अब पैसे जनता के खाते में आ नहीं रहे, बल्कि टैक्स, सेस और कमीशन के नाम पर जनता की जेब से ‘खटाखट’ काटे जा रहे हैं। राहुल गांधी के उन चुनावी वादों का बोझ अब आम आदमी की कमर तोड़ रहा है। हिमाचल की वादियों से लेकर कर्नाटक के गलियारों तक, कांग्रेस सरकारों का यह पैटर्न बेनकाब हो चुका है: पहले लोकलुभावन वादों से वोट बटोरना, और फिर सत्ता मिलते ही ‘वसूली अभियान’ चलाना!
कांग्रेस ने हिमाचल प्रदेश में गारंटियों की ऐसी झड़ी लगाई थी कि लगा था राज्य में विकास की नदियां बहेंगी। लेकिन हुआ क्या? 1 अप्रैल 2026 से एंट्री परमिट की दरों में ऐसी खटाखट बढ़ोतरी की गई कि पर्यटकों के साथ-साथ स्थानीय लोगों के भी होश उड़ गए। अब पर्यटकों को अपनी गाड़ियों के लिए 170 रुपये तक का मोटा शुल्क देना होगा। स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि इस फैसले से हिमाचल के पर्यटन उद्योग की कमर टूट जाएगी। हैरानी की बात यह है कि जो सरकार चुनाव से पहले रेवड़ियां बांट रही थी, वो अब ‘खजाना खाली है’ का राग अलाप रही है। विपक्ष का सवाल सीधा है- क्या चुनावी रैलियों में गारंटियां बांटते वक्त खजाने का आकलन करना भूल गए थे, या जनता को ठगने की यह सोची-समझी रणनीति थी?
TRAVEL TO HIMACHAL JUST GOT COSTLIER!
Cash-strapped Congress govt in Himachal Pradesh doubles entry permit rates — private cars now to pay ₹170. A steep 40–50% hike in charges!
After losing Revenue Deficit Grant support recommended by the Finance Commission, instead of fixing… pic.twitter.com/vgCHWGDfx0
हिमाचल में तो सिर्फ टैक्स बढ़ा है, लेकिन कर्नाटक में तो भ्रष्टाचार का ‘रेट कार्ड’ ही सार्वजनिक हो गया है। राज्य के मंत्री सतीश जारकीहोली के एक शर्मनाक बयान ने पूरी सियासत में आग लगा दी है। उन्होंने सरेआम स्वीकार किया कि ‘सरकारी कामों में कमीशन पहले भी था, अब भी है और आगे भी रहेगा।’ जब मंत्री खुद भ्रष्टाचार को सिस्टम का हिस्सा मान लें, तो समझ लीजिए कि विकास की फाइलें बिना सेवा-शुल्क के नहीं हिलेंगी। कर्नाटक के ठेकेदार अब हजारों करोड़ के बकाया भुगतान के लिए सड़कों पर हैं। आरोप है कि बिना 40 प्रतिशत कमीशन दिए सरकारी बिल पास ही नहीं होते।
'Corruption' Showdown in Karnataka
'Graft in government contracts to continue': Karnataka Minister Satish Jarkiholi stokes controversy
BJP cites Jarkiholi's statement to attack Congress @crkesavan tweets, "Shocking statement by Karnataka Congress Minister normalizing… pic.twitter.com/sUa6xIdHC3
विपक्ष अब इसे राहुल गांधी का असली डेवलपमेंट मॉडल बता रहा है, जहां राज्य के विकास के लिए पैसे नहीं हैं, लेकिन गारंटी के नाम पर वसूली और कमीशन का खेल जोरों पर है। पेट्रोल, डीजल और बिजली के बढ़ते दाम इस खटाखट मॉडल की कड़वी सच्चाई हैं।
Shocker shocker
It’s not INC it’s JFC Justification for corruption
Karnataka State Contractors Association has threatened to hold a strike on 6th March and stop work due to huge non-payment of pending bills worth ₹37.370cr where they allege Karnataka Congress govt is… pic.twitter.com/iQ1o40CrwL
— Shehzad Jai Hind (Modi Ka Parivar) (@Shehzad_Ind) February 20, 2026
कांग्रेस इसे राजस्व जुटाना कह सकती है, लेकिन जनता इसे चुनावी ठगी मान रही है। ऐसे में आज बहस सिर्फ टैक्स या कमीशन की नहीं, बल्कि उस भरोसे की है जो चुनावी विज्ञापनों में बेचा गया था। जब जेब से पेट्रोल, बिजली और एंट्री टैक्स के नाम पर पैसे कट रहे हैं, तब आम आदमी को समझ आ रहा है कि राजनीति में मुफ्त का खाना सबसे महंगा पड़ता है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश के सबसे लोकप्रिय नेता हैं और उनका जादू देश के लोगों सर चढ़कर बोल रहा है। ये मोदी लहर का नतीजा है कि विरोधियों के सारे समीकरण ध्वस्त हो गए हैं। अब कर्नाटक के स्थानीय निकाय चुनावों ने कांग्रेस के तमाम दावों की पोल खोल दी है और यह साफ कर दिया है कि जनता का भरोसा अब उनके नारों से उठ चुका है। जिन चार टाउन पंचायतों और दो वार्ड उपचुनावों के नतीजे आए हैं, वहां कांग्रेस को करारी हार मिली है।
The resounding @BJP4Karnataka victories in the 4 Urban Local Body (Town Panchayat) elections in Bajape, Kinnigoli, Manki and Bashettihalli across the Bhatkal, Moodbidre and Doddaballapura Assembly constituencies, along with the two ward by-elections in Doddaballapura and… pic.twitter.com/6IFcTuu6Ed
कर्नाटक स्थानीय निकाय चुनावों में भी कांग्रेस की करारी हार कर्नाटक स्थानीय निकाय चुनावों में बीजेपी ने कांग्रेस का सूपड़ा साफ करते हुए ‘क्लीन स्वीप’ किया है। दिलचस्प बात यह है कि ये चुनाव कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के गृह राज्य में हुए, जहां सत्ता भी कांग्रेस की है और मतदान भी बैलेट पेपर से हुआ। ऐसे में अब कांग्रेस के पास न तो ‘ईवीएम’ को दोष देने का बहाना बचा है और न ही ‘सरकारी मशीनरी’ के दुरुपयोग का विलाप करने का अवसर। बीजेपी की यह प्रचंड जीत दर्शाती है कि जनता कांग्रेस के कुप्रबंधन और झूठे वादों से तंग आ चुकी है। लोकसभा चुनाव की हार से सबक लेने के बजाय केवल बहानों की राजनीति करने वाली कांग्रेस के लिए यह नतीजे एक बड़ा आईना हैं कि संगठन अब जमीन से गायब हो चुका है और नेतृत्व केवल आत्ममुग्धता में जी रहा है। बीजेपी ने 4 टाउन पंचायतों की कुल 76 सीटों में से 48 सीटों पर जीत दर्ज की है, जबकि सत्ताधारी कांग्रेस महज 23 सीटों पर सिमट गई। इतना ही नहीं, बीजेपी ने 2 वार्ड उपचुनावों में भी शानदार जीत हासिल कर अपनी पकड़ साबित कर दी है।
राहुल गाँधी "वोट चोरी नौटंकी" की मस्ती में कर्नाटक में अपनी सरकार को बचाने से बेखबर है। फिर शोर मचाया जाएगा "सरकार चोरी हो गयी"। हकीकत यह है कि राहुल ने अपनी इमेज "पार्ट टाइमर" और अराजकता फ़ैलाने वाले नेता की बनाए जाने की वजह से कांग्रेस को slow poision दिया जा रहा है। इसकी जिम्मेदार बीजेपी नहीं बल्कि गाँधी परिवार है। जब अध्यक्ष खड़के स्वयं कोई फैसला नहीं ले सकते फिर क्योंअध्यक्ष बनने की नौटंकी मचा रखी है? जब किसी विवाद का फैसला परिवार ने ही करना है फिर तुम्हारा क्या काम? क्या उनका आत्मविश्वास मर चुका है? आखिर गुलामी की भी एक सीमा होती है। जितना यह परिवार सक्रीय रहेगा बीजेपी उतनी तेजी से आगे बढ़ती रहेगी। राहुल की इन हरकतों को देख INDI गठबंधन ने भी कांग्रेस से दूरी बनानी शुरू कर दी है।
कर्नाटक जनता भी शिवकुमार की ओर टकटकी लगाए देख रही है कि "अपनी बात पर टिके रहकर मुख्यमंत्री बनेंगे या फिर परिवार के आगे चारों खाने चित होंगे?" उनके लिए आगे कुआं पीछे खाई वाली स्थिति है।
कर्नाटक में कांग्रेस की सिद्धारैमया सरकार 20 नवंबर को ढाई साल का कार्यकाल पूरा कर चुकी है। इसके साथ ही सत्ता-संघर्ष का तापमान इतना बढ़ गया है कि मंत्रालयों से ज्यादा गर्मी अब मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के बीच के सियासी लड़ाई सीएम की कुर्सी पर काबिज होने को लेकर हो रही है। कर्नाटक में कांग्रेस की राजनीति के नाटक में अब वही स्क्रिप्ट खुलकर सामने आने लगी है जो राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच खुलेआम चली थी। ढाई साल का फार्मूला, कुर्सी को लेकर अविश्वास, समर्थकों का ध्रुवीकरण और दिल्ली दरबार में लॉबिंग…वही सब अब कर्नाटक से लेकर दिल्ली तक नजर आने लगा है। फर्क बस इतना है कि कर्नाटक में यह सब और भी ज्यादा सार्वजनिक, ज्यादा तेज और ज्यादा विषाक्त रूप ले रहा है। दरअसल, यह राहुल गांधी की वही कांग्रेस है जो हर चुनाव में स्थिरता का नारा तो लगाती है और सत्ता मिलते ही खुद को अस्थिर करने में लग जाती है। इसका सबसे बड़ा नुकसान राज्य की जनता को उठाना पड़ता है। राजस्थान यह भुगत चुका है और अब कर्नाटक की बारी है।
खतरे में राहुल-सोनिया और प्रियंका की तिकड़ी की विश्वसनीयता
कर्नाटक में आने वाले महीनों में सत्ता परिवर्तन हो या न हो, एक बात स्पष्ट है कि कांग्रेस की केंद्रीय नेतृत्व क्षमता आज सबसे कमजोर स्थिति में है। राहुल-सोनिया और प्रियंका की तिकड़ी की विश्वसनीयता राज्यों के अपनी पार्टी के नेताओं पर ही असर डालने में असफल हो चुकी है। बिहार की हार ने यह और स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस न तो गठबंधन खड़ा कर सकती है, न जनादेश को प्रभावित कर सकती है, और न ही आंतरिक कलह को रोक सकती है। कर्नाटक का यह ढाई साल वाला नाटक, दिल्ली में डीके समर्थकों की लामबंदी, और बिहार में चुनावी हार तीनों मिलकर एक ही बात साबित करते हैं कि कांग्रेस आज भी उसी पुरानी बीमारी से ग्रस्त है— नेतृत्व की अस्पष्टता, निर्णय लेने की अयोग्यता और सत्ता की अंदरूनी लड़ाई।
दिल्ली दरबार में लगातार अपना दबाब बढ़ा रहे हैं डीके समर्थक कर्नाटक की राजनीति एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ी है, जहाँ सत्ता ही नहीं, बल्कि कांग्रेस नेतृत्व की क्षमता भी कठघरे में है। राजस्थान में जो ढाई साल का नाटक मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच हुआ था, वही दृश्य अब दक्षिण भारत के सबसे महत्वपूर्ण राज्य कर्नाटक में रिपीट हो रहा है। फर्क बस इतना है कि यहां स्क्रिप्ट वही है, बस कलाकार अलग हैं, लेकिन सत्ता की कुर्सी के लिए संघर्ष उतना ही तीखा और खुला है। सत्ता संतुलन अब स्पष्ट रूप से बदल रहा है। डीके शिवकुमार समर्थक दिल्ली में सक्रिय हैं और पार्टी हाईकमान पर दबाव बढ़ा रहे हैं कि “ढाई साल बाद सत्ता हस्तांतरण” का वादा निभाया जाए। सिद्धारमैया इसे अनुभव बनाम युवाशक्ति का संघर्ष बताते हैं, तो डीके गुट का मानना है कि हाईकमान अपने वादे पर खरा उतरे। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि डीके कैंप लगातार दिल्ली में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। क्योंकि उसे पता है कि कर्नाटक की सत्ता की चाबी बेंगलुरु में नहीं, बल्कि तुगलक रोड, दिल्ली में रखी हुई है।
राहुल-सोनिया के दफ्तरों के बाहर डीके के सैकड़ों समर्थक जुटे दिल्ली में हाल ही में राहुल गांधी और सोनिया गांधी के दफ्तरों के बाहर जिस तरह डीके के सैकड़ों समर्थक जुटे, वह सिर्फ शक्ति-प्रदर्शन नहीं बल्कि हाईकमान की कमजोरी को दुनिया के सामने रखने जैसा है। कांग्रेस के कार्यकर्ता तक मानने लगे हैं कि लगातार हार और बिहार में शर्मनाक हार के बाद हाईकमान अब निर्णय लेने की क्षमता खो चुका है। भाजपा के खिलाफ लड़ाई तो दूर, अपनी ही सरकार को स्थिर रखने का जज़्बा कांग्रेस के दिल्ली दरबार के बड़े नेताओं के पास नहीं बचा है। राहुल गांधी सिर्फ अपने कुछ चुनिंदा सलाहकारों के बीच घिरे हुए हैं। वे इसलिए भी निर्णय नहीं ले पा रहे हैं, क्योंकि राहुल गांधी की स्थिति पहले जैसी नहीं रही। 96 हार के बाद किसी भी नेता का और उस नेता पर से कार्यकर्ताओं का विश्वास डगमगाना लाजिमी है। कर्नाटक में जो स्क्रिप्ट लिखी जा रही है, वह कोई नया नाटक नहीं है। कांग्रेस की यही स्क्रिप्ट है, उसमें बस राजनीति के अभिनेता बदलते रहते हैं।
सिद्धारमैया ने शुरू से ही डीके को सीमित रखने की कोशिश की इधर जहां तक कर्नाटक के नाटक का सवाल है तो सिद्धारमैया ने शुरू से ही डीके को सीमित रखने की कोशिश की है। चुनाव परिणामों के बाद कांग्रेस हाईकमान यानि राहुल गांधी ने जो समझौता कराया था। ढाई साल बाद सत्ता परिवर्तन सिद्धारमैया ने तब तो अंदरखाते सत्ता के लिए इसे स्वीकार कर लिया, लेकिन अशोक गहलोत की तरह कभी भी खुले तौर इसे नहीं माना। ठीक सचिन पायलट की तरह ही अब डीके शिवकुमार ने इसे अपनी सार्वजनिक प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया है। अब जब ढाई साल का समय पूरा हो चुका है, डीके के समर्थक दिल्ली पहुंच चुके हैं। ये वही समर्थक हैं जो पिछले छह महीनों से कहते आए हैं कि “शक्ति हम पर है, सरकार उनकी वजह से है, और बिना डीके कर्नाटक में कोई कांग्रेस नहीं।” यह संदेश अब स्पष्ट है कि ढाई साल में मुख्यमंत्री बदले, वरना कर्नाटक में पार्टी टूट का खतरा वास्तविक है।
कर्नाटक को राहुल गांधी ने नहीं, स्थानीय नेतृत्व की शक्ति ने जीता कर्नाटक का संकट राहुल गांधी की उसी राजनीतिक कमजोरी का परिणाम है। कांग्रेस कर्नाटक में जीत गई, लेकिन वह जीत किसी रणनीति की नहीं, बल्कि स्थानीय नेतृत्व डीके शिवकुमार की संगठन क्षमता और सिद्धारमैया की लोकप्रियता की देन थी। यह कोई राष्ट्रीय रणनीति का चमत्कार नहीं था। यह जमीन पर बनाए गए स्थानीय समीकरणों का खेल था। राहुल गांधी ने न तो कैडर को प्रेरित किया, न चुनाव की रणनीति को दिशा दी। यही कारण है कि विजय के बाद सत्ता वितरण में भी वे निर्णायक भूमिका निभाने में असफल रहे। इसी शून्य का लाभ लेकर सिद्धारमैया और डीके दोनों अपनी-अपनी परछाई बढ़ाने में लगे हैं।
सिद्धारमैया बनाम डी.के. शिवकुमार: शीत युद्ध अब सतह पर कर्नाटक में सत्ता का यह संघर्ष अब खुलकर सामने आ गया है। यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि कर्नाटक कौन चलाएगा? अनुभवी सिद्धारमैया या संसाधन-संपन्न और युवा शक्ति पर पकड़ रखने वाले डीके शिवकुमार? कांग्रेस के भीतर यह धारणा फैलती जा रही है कि सिद्धारमैया अपने पद से हटने के पक्ष में नहीं और डीके का अस्तित्व पद मिलने पर ही टिकेगा। यह द्वंद्व उस समय और खतरनाक हो जाता है जब हाईकमान कमजोर हो और उसके पास समाधान का कोई फार्मूला न बचे। दिल्ली में डीके समर्थकों की पुरजोर आवाजें बताती हैं कि यह मेहनत सिर्फ राजभवन तक सीमित नहीं रहेगी। यह आने वाले दिनों में संगठन और सत्ता को पूरी तरह दो फाड़ कर सकती है।
बिहार हार का सीधा संदेश- राहुल का नेतृत्व जनता को स्वीकार्य नहीं कर्नाटक में सत्ता संघर्ष का यह नाटक कांग्रेस हाईकमान की अव्यवस्था का दर्पण है। राहुल गांधी बिहार में बुरी तरह से हारकर पहले ही निशाने पर हैं। राजनीतिक विश्लेषकों की राय साफ है कि बिहार हार का सीधा संदेश है कि राहुल नेतृत्व जनता को स्वीकार्य नहीं हो रहा। विपक्षी गठबंधन में वे विश्वसनीय नेता के तौर पर उभरने का दावा खो चुके हैं। जब राष्ट्रीय स्तर पर ही नेतृत्व कमजोर दिखे, तब राज्यों में मुख्यमंत्री बदलने जैसे निर्णय और भी कठिन हो जाते हैं। कांग्रेस में सत्ता हस्तांतरण कभी सुगमता से नहीं हुआ। हर बार बगावत, नाराजगी या टूट का खतरा साथ लेकर आता है। यही स्थिति अब कर्नाटक में है। डीके शिवकुमार कई बार कह चुके हैं कि वे मुख्यमंत्री बनने के योग्य हैं और सिद्धारमैया को वादा निभाना होगा। दूसरी ओर सिद्धारमैया अपनी छवि, कद और अपनी जातीय-पैठ के दम पर डीके को सीमित करने का हर प्रयास करते दिखते हैं।
हाईकमान कमजोर, राज्य नेताओं के भिड़ने से मिली जनता से हार सत्ता का यह संघर्ष व्यक्तिगत अहंकार की टक्कर से कहीं अधिक जातीय राजनीति, क्षेत्रीय प्रभाव और संगठन के नियंत्रण की लड़ाई बन चुका है। इसकी गूंज दिल्ली तक इसलिए पहुंची है, क्योंकि राहुल गांधी किसी भी पक्ष का सामना करने की स्थिति में नहीं हैं। सालों से कांग्रेस की राजनीति में यही कहानी दोहराई जाती रही है। हाईकमान कमजोर, राज्य नेता आपस में भिड़े, और अंत में जनता से हार। राजस्थान में यह कहानी लंबे समय तक चली, पंजाब में यह कहानी सरकार गिराकर खत्म हुई और अब कर्नाटक में यह कहानी तेज हो चुकी है। कर्नाटक कांग्रेस एक ऐसी सरकार चला रही है जो अपने ही दो शीर्ष नेताओं की रस्साकशी में उलझी है। इस संघर्ष का सबसे बड़ा नुकसान जनता और प्रशासन दोनों को होता है, लेकिन कांग्रेस इस नुकसान को भी हजम करने की आदत डाल चुकी है।
आखिर कांग्रेस कब तक भेदभाव कर जनता को गुमराह करती रहेगी? क्या कांग्रेस को मिट्टी में मिलाने का समय आ गया है? बाप मल्लिकार्जुन सनातन के विरुद्ध बोलता है तो बेटा प्रियांक राज्यों के विरुद्ध। क्या इस तरह की जहरीली मानसिकता से कांग्रेस को एकजुट रख सकती है या देश को तोड़ने का षड़यंत्र कर रही है? क्या इस तरह की जहरीली विभाजनकारी बोली बोलकर गाँधी परिवार के प्रति अपनी अंधभक्ति दिखाई जा रही है? गुजरात और असम में स्थापित सेमीकंडक्टर संयंत्र इस साल के अंत तक सेमीकंडक्टर चिप्स का उत्पादन शुरू कर देंगे। कांग्रेस इसे नहीं पचा पा रही है। कर्नाटक के ग्रामीण विकास मंत्री और कांग्रेस नेता प्रियांक खड़गे ने एक बार फिर इन संयंत्रों पर निशाना साधा और आरोप लगाया कि भाजपा ने कर्नाटक से ये संयंत्र ‘छीन’ लिए हैं। इन संयंत्रों का वे पहले भी विरोध कर चुके हैं। रविवार(अक्टूबर 26) को उन्होंने नस्लवादी टिप्पणी की और कहा कि गुजरात और असम में सेमीकंडक्टर उद्योग के लिए कोई ‘प्रतिभा’ नहीं है।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के पुत्र प्रियांक खड़गे ने सवाल उठाया कि क्या इन राज्यों में प्रतिभाओं का भंडार है? उन्होंने मोदी सरकार पर कर्नाटक से सेमीकंडक्टर निवेश हटाने का आरोप लगाया। शनिवार(अक्टूबर 25) को बेंगलुरु में पत्रकारों को संबोधित करते हुए, खड़गे ने केंद्र से उद्योगों को गुजरात और असम की ओर कथित तौर पर ‘ठेलने’ को लेकर स्पष्टीकरण माँगा। उन्होंने दावा किया कि कर्नाटक या तमिलनाडु को प्राथमिकता देने के बावजूद उद्योगपतियों को वहाँ भेजा जा रहा है।
खड़गे ने कहा, “सेमीकंडक्टर उद्योग जब बेंगलुरु आना चाहते हैं, तो असम और गुजरात क्यों जा रहे हैं? मैंने यह मुद्दा पहले भी उठाया है। कर्नाटक में आने वाला सारा निवेश केंद्र सरकार गुजरात जाने के लिए मजबूर कर रही है। गुजरात में क्या है? क्या वहाँ प्रतिभा है? असम में क्या है? क्या वहाँ प्रतिभा है?” उन्होंने आगे कहा, “जब उद्योगपति आवेदन दे रहे हैं कि वे कर्नाटक या तमिलनाडु आना चाहते हैं, तो उन्हें गुजरात क्यों भेजा जा रहा है?”
Congress has always hated Assam’s progress. Every time the state takes a step forward, Congress tries to pull it back!
खड़गे की टिप्पणियों को अपमानजनक और विभाजनकारी करार देते हुए निंदा की गई है। असम के मंत्री जयंत मल्लाबरुआ ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कांग्रेस पर असम से नफरत करने का आरोप लगाया। उन्होंने एक्स पर लिखा, “कांग्रेस हमेशा से असम की प्रगति से नफरत करती रही है। जब भी राज्य एक कदम आगे बढ़ता है, कांग्रेस उसे पीछे खींचने की कोशिश करती है!” उन्होंने इसे हर मेहनती असमिया युवा का घोर अपमान बताया।
असम बीजेपी के एक अन्य नेता और मंत्री पीयूष हजारिका ने कहा कि खड़गे की टिप्पणी आश्चर्यजनक नहीं है, और यही कांग्रेस का असली चेहरा है। उन्होंने कहा, “एक ऐसी पार्टी जिसने हमेशा असम और पूर्वोत्तर को हीन माना है, हमारी क्षमता को नजरअंदाज किया है और हमारे विकास में बाधा डाली है। इस क्षेत्र के प्रति उनका तिरस्कार इतिहास में गहराई तक समाया हुआ है और आज उनके शब्द इसकी पुष्टि ही करते हैं।”
Earlier, we saw how @INCIndia President Shri @kharge Ji opposed conferring Bharat Ratna on Sudhakantha Dr Bhupen Hazarika, one of Assam’s greatest icons.
हजारिका ने यह भी याद दिलाया कि खड़गे के पिता मल्लिकार्जुन खड़गे ने असम के महानतम नेताओं में से एक डॉ. भूपेन हजारिका को भारत रत्न दिए जाने का विरोध किया था। इससे पता चलता है कि खरगे परिवार में असम विरोधी भावनाएँ अंदर तक समाई हुई हैं।
यह पहली बार नहीं है जब खड़गे ने भारत के उभरते सेमीकंडक्टर उद्योग को कुछ राज्यों स्थापित करने के बजाए, देशभर में लगाए जाने का विरोध किया हो। पिछले साल सितंबर में, उन्होंने कहा कि स्किल का कोई इकोसिस्टम नहीं होने के बावजूद गुजरात को 4 और असम को 1 सेमीकंडक्टर इकाइयाँ मिलीं।
उन्होंने ट्वीट किया था, “पाँच सेमीकंडक्टर निर्माण इकाइयाँ, जिनमें से चार गुजरात में और एक असम में हैं, लेकिन वहाँ स्किल का कोई इकोसिस्टम नहीं है। उनके पास अनुसंधान का कोई परिस्थिति की तंत्र नहीं है। उनके पास इनक्यूबेशन का कोई पारिस्थितिकी तंत्र नहीं है। उनके पास नवाचारों का कोई पारिस्थितिकी तंत्र नहीं है…जब चिप डिज़ाइनिंग की 70% प्रतिभा कर्नाटक में है, तो मुझे समझ नहीं आता कि सरकार राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल करके उन्हें दूसरे राज्य में क्यों धकेलना चाहती है। यह अनुचित है।”
इस पोस्ट पर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कॉन्ग्रेस पर असम के विकास का विरोध करने का आरोप लगाया।
Once again, Congress shows its true colors by opposing Assam’s development. A Karnataka minister, who is also the son of the Congress national president, claims that Assam has no right to host a semiconductor industry! I urge Assam Congress leaders to reject this divisive… https://t.co/YBxcBTgVeW
सरमा ने X पर लिखा, “एक बार फिर, कांग्रेस असम के विकास का विरोध करके अपना असली रंग दिखा रही है। कर्नाटक के मंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष के बेटे प्रियांक खरगे ने दावा किया है कि असम को सेमीकंडक्टर उद्योग स्थापित करने का कोई अधिकार नहीं है! मैं असम के कांग्रेस नेताओं से आग्रह करता हूँ कि वे इस विभाजनकारी सोच को खारिज करें और असम के उचित विकास और प्रगति के लिए खड़े हों।”
गौरतलब है कि देश में कई कंपनियाँ अपने सेमीकंडक्टर संयंत्र विकसित कर रही हैं। टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स गुजरात के धोलेरा में एक चिप निर्माण इकाई स्थापित कर रही है। कंपनी असम के जगीरोड में एक सेमीकंडक्टर असेंबली और परीक्षण सुविधा भी स्थापित कर रही है।
इसके अलावा, माइक्रोन टेक्नोलॉजी गुजरात के साणंद में एक सेमीकंडक्टर इकाई स्थापित कर रही है, सीजी पावर गुजरात के साणंद में एक इकाई स्थापित कर रही है, केन्स सेमीकॉन भी साणंद में एक संयंत्र स्थापित कर रही है, और एचसीएल, फॉक्सकॉन के साथ साझेदारी कर उत्तर प्रदेश के जेवर में एक सेमीकंडक्टर संयंत्र स्थापित करने की योजना बना रही है।
सेमीकंडटर संयंत्र केवल गुजरात और असम में स्थापित नहीं किए जा रहे हैं, बल्कि ये महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, पंजाब और आंध्र प्रदेश जैसे अन्य राज्यों में भी स्थापित किए जा रहे हैं। लेकिन कांग्रेस नेता असम और गुजरात को ही टारगेट क्यों कर रहे हैं, ये ध्यान देने वाली बात है।
(साभार: Deccan Herald, एक्स @Siddaramiah) कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने मंगलवार (16 अक्टूबर 2025) को घोषणा की कि उनकी सरकार की ‘शक्ति योजना’, जो राज्य की महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा की सुविधा देती है, को लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स (LBWR) ने दुनिया में सबसे अधिक महिलाओं द्वारा ली गई मुफ्त बस यात्राओं के लिए प्रमाणित किया है। इसके साथ ही, कर्नाटक राज्य सड़क परिवहन निगम (KSRTC) को भी LBWR ने मान्यता दी है।
हालाँकि, इस घोषणा के बाद लोगों में यह चर्चा शुरू हो गई कि क्या यह ‘वर्ल्ड रिकॉर्ड’ वास्तव में किसी विश्वसनीय संस्था द्वारा दिया गया है या सिर्फ एक प्रचार अभियान है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने X पर लिखा, “कर्नाटक ने दो ऐतिहासिक विश्व रिकॉर्ड के साथ वैश्विक मंच पर प्रवेश किया है, जिन्हें लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स द्वारा प्रमाणित किया गया है। शक्ति योजना: महिलाओं द्वारा सबसे ज्यादा मुफ्त बस यात्राओं का लाभ उठाया गया, 564.10 करोड़ यात्राएँ, रोजमर्रा की गतिशीलता को सशक्त बनाया।”
उन्होंने आगे कहा, “KSRTC: दुनिया का सबसे अधिक पुरस्कार विजेता सड़क परिवहन निगम, 1997 से अब तक 464 राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त कर चुका है। हमारी शासन दृष्टि सामाजिक न्याय, महिला सशक्तिकरण और विश्वस्तरीय जनसेवा पर आधारित है। ये मान्यताएँ इस बात का प्रतिबिंब हैं कि समावेशी और संवेदनशील नीति-निर्माण से क्या हासिल किया जा सकता है।”
मुख्यमंत्री द्वारा जारी एक्स पोस्ट में शक्ति योजना और केएसआरटीसी के लिए जारी किए गए ‘प्रमाण-पत्र’ भी शामिल हैं।
LBWR के प्रमाण-पत्र के अनुसार, “कर्नाटक में 11 जून 2023 को शुरू हुई ‘शक्ति योजना’ के तहत 30 सितंबर 2025 तक महिलाओं ने कुल 564.10 करोड़ मुफ्त बस यात्राएँ कीं। महिलाओं को मुफ्त सार्वजनिक परिवहन की सुविधा देकर सशक्त बनाने की इस पहल को लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स सामाजिक कल्याण और लैंगिक समानता में एक महत्वपूर्ण योगदान के रूप में मान्यता देती है।”
दूसरे प्रमाण-पत्र में कहा गया, “कर्नाटक राज्य सड़क परिवहन निगम (KSRTC) ने 1997 से लेकर 3 अक्टूबर 2025 तक कुल 464 राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार हासिल किए हैं। सार्वजनिक सड़क परिवहन सेवा में उत्कृष्टता और नवाचार के लिए यह उपलब्धि वैश्विक मानक स्थापित करती है।”
दोनों प्रमाणपत्रों पर डॉ अविनाश डी सकुंडे (LBWR के इंटरनेशनल चेयरमैन, भारत) और डॉ इवान गाचीना (यूरोपीय संघ प्रमुख, क्रोएशिया) के हस्ताक्षर हैं। हालाँकि, मुख्यमंत्री की इस घोषणा पर विपक्ष ने आलोचना की है।
विपक्ष का कहना है कि कॉन्ग्रेस सरकार मुफ्त योजनाओं जैसे ‘शक्ति योजना’ पर अधिक खर्च कर रही है, जबकि राज्य की परिवहन कंपनियाँ गंभीर वित्तीय संकट झेल रही हैं। कर्नाटक की चार परिवहन कंपनियाँ — KSRTC, BMTC, NWKRTC और KKRTC पर कुल 6,330.25 करोड़ रुपए का कर्ज है।
कौन है अविनाश सकुंडे और बाल्कनोफैंटास्टिका के अध्यक्ष इवान गैसीना?
मुख्यधारा की मीडिया ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के उस ऐलान को खूब कवर किया जिसमें उन्होंने बताया कि उन्हें लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स (London Book of World Records – LBWR) से प्रमाणपत्र मिला है। लेकिन किसी ने यह नहीं देखा कि यह संस्था असल में है क्या और इसे चलाता कौन है।
OpIndia की जाँच में पता चला कि लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स वास्तव में एक निजी कंपनी थी, जिसे 15 जुलाई 2025 को यूके सरकार के रिकॉर्ड्स में भंग (dissolved) दिखाया गया है। कंपनी के कामकाज में इवेंट कैटरिंग, न्यूज एजेंसी गतिविधियाँ, किताबें प्रकाशित करना और मीडिया प्रतिनिधित्व सेवाएँ शामिल थीं।
दस्तावेजों के अनुसार, अविनाश धनंजय सकुंडे को 28 जून 2024 को इस कंपनी का डायरेक्टर नियुक्त किया गया था।
जब उनकी सोशल मीडिया इंस्टाग्राम और लिंक्डइन पर प्रोफाइल देखी गईं, तो पता चला कि अविनाश खुद को दिल्ली सरकार के Delhi Minorities Commission (DMC) की एक एडवाइजरी कमेटी के सदस्य बताते हैं। लेकिन DMC की आधिकारिक वेबसाइट पर उनका नाम कहीं दर्ज नहीं है।
अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर सकुंडे ने कई वीडियो पोस्ट किए हैं, जिनमें वे अलग-अलग लोगों को ‘लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ के सर्टिफिकेट देते हुए दिखते हैं। एक वीडियो में वे अभिनेता सोनू सूद को भी ऐसा सर्टिफिकेट देते नजर आए हैं और यह कार्यक्रम जयपुर (राजस्थान) में हुआ था।
अब बात करते हैं डॉ इवान गाचीना (Ivan Gacina) की, गाचीना का नाम मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के प्रमाणपत्र पर ‘European Union Head’ के रूप में लिखा था।
जाँच में पता चला कि उनके इंस्टाग्राम प्रोफाइल पर वे खुद को ‘HRHHE Pangeran Prince Love YM Dato Rdo Sri Academician Amb Prof Dr Kt Exp LM GM Genius’ बताते हैं। उनके एक पोस्ट के अनुसार, वे ‘President of Balkanofantastika’ भी हैं।
दिलचस्प बात यह है कि ‘Pangeran’ शब्द मलेशिया और इंडोनेशिया की भाषा में राजा और रानी के पुत्र के लिए प्रयोग होता है। उनका लिंक्डइन रिज्यूमे बताता है कि वे जादार (Zadar), क्रोएशिया के रहने वाले हैं।
उनके कामकाजी अनुभव में कंप्यूटर इंजीनियरिंग टीचर, फिजिक्स टीचर, एडल्ट एजुकेशन में गणित शिक्षक, कैशियर, और वेटर जैसी भूमिकाएँ शामिल हैं। वे खुद को कवि भी बताते हैं। उनकी ऑनलाइन मौजूदगी काफी अजीब है। ढेरों उपाधियाँ और सर्टिफिकेट्स लेकिन इंटरनेट पर उनकी कुछ ही असली तस्वीरें मिलती हैं।
इन संदिग्ध व्यक्तियों के अलावा, लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के बारे में एक और बात ध्यान देने योग्य है। यह खुद को ‘UK-based’ बताता है, लेकिन इसका मुख्य कार्यालय (Head Office) दिल्ली के पहाड़ गंज में स्थित है।
इसकी वेबसाइट पर पता लिखा है: Hotel Superb, तिलक गली, चूना मंडी, पहाड़गंज, नई दिल्ली। इसके अलावा वेबसाइट पर यह भी लिखा है कि इसका ‘International Office (UK Branch)’ — 71–75 Shelton Street, London, United Kingdom, और ‘Registered Office (USA)’ — 30 N Gould St Ste R, Sheridan, WY 82801 बताया गया है।
अविनाश सकुंडे ने ऑपइंडिया को बताया: कर्नाटक सरकार ने प्रमाणपत्र के लिए किया आवेदन
OpIndia ने ‘London Book of World Records’ (LBWR) से संपर्क किया और इसके कामकाज को लेकर कई सवाल पूछे। वेबसाइट पर दिए संपर्क नंबर से बात करते हुए अविनाश सकुंडे ने बताया कि LBWR अलग-अलग क्षेत्रों, जैसे खेल, कला और मनोरंजन, सामाजिक सेवा आदि में काम करने वाले व्यक्तियों, समूहों या संस्थानों को उनके कार्यों के आधार पर सर्टिफिकेट देता है।
जब उनसे पूछा गया कि कर्नाटक सरकार और KRSTC को यह ‘वर्ल्ड रिकॉर्ड’ सर्टिफिकेट कैसे मिला, तो उन्होंने कहा कि सरकार ने खुद आवेदन किया था। सकुंदे ने बताया, “हमने कर्नाटक सरकार द्वारा भेजे गए दस्तावेज़ों के विश्लेषण के आधार पर उन्हें प्रशंसा पत्र दिया। यह उनके अच्छे कार्य की सराहना के रूप में था। हाल ही में हमने अभिनेता सोनू सूद को भी ऐसा सर्टिफिकेट दिया है।”
OpIndia ने उनसे इवान गाचिना (Ivan Gacina) की भूमिका के बारे में भी पूछा। इस पर सकुंदे ने कहा, “वो सिर्फ नाम के लिए हैं। असल में मैं ही सब कुछ सँभालता हूँ, प्रशासन मेरे नाम से चलता है।”
जब उनसे पूछा गया कि LBWR भारत में किस रूप में पंजीकृत है, NGO या निजी कंपनी और यूके में इसकी स्थिति क्या है, तो उन्होंने कहा, “हम भारत में NGO के रूप में रजिस्टर्ड हैं और यूके में यह एक प्राइवेट बुक पब्लिशिंग कंपनी के रूप में पंजीकृत है।”
यह जानना दिलचस्प है कि एक ‘बुक पब्लिशिंग’ कंपनी, जो भारत में NGO होने का दावा करती है, ‘वर्ल्ड रिकॉर्ड’ जैसे प्रमाणपत्र बाँट रही है। सबसे अहम बात, बातचीत के दौरान अविनाश सकुंडे ने एक बार भी यह नहीं बताया कि उनकी कंपनी लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स यूके में इस साल जुलाई में आधिकारिक रूप से बंद (dissolved) हो चुकी है।
OpIndia की जाँच कई सवाल खड़े करती है। जैसे- आखिर कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने एक यूके-आधारित निजी कंपनी से ‘वर्ल्ड रिकॉर्ड’ सर्टिफिकेट के लिए आवेदन क्यों किया? (साभार)