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नवजोत कौर ने आग लगा दी "त्याग की देवी" की कांग्रेस में; अब पंजाब पार्टी प्रधान को बताया भ्रष्ट, उधर डीके शिवकुमार भी भड़के

एक कहावत है "दिल के फफोले जल उठे सीने की आग से, इस घर को आग लग गयी घर के चिराग से" नवजोत सिंह सिद्धू की धर्मपत्नी नवजोत कौर ने मुख्यमंत्री की कुर्सी की कीमत बता "त्याग की देवी" की कांग्रेस में आग लगा दी। जिस आग को बुझाने की कोशिश कर मामले को ख़त्म करने की बजाए निलंबित पार्टी नेता नवजोत कौर सिद्धू को मंगलवार (9 दिसंबर) को कानूनी नोटिस भेजा है। उनसे अपमानजनक टिप्पणी के लिए माफी मांगने या कानूनी कार्रवाई का सामना करने को कहा। मामला कोर्ट में जाने पर नवजोत अगर गाँधी परिवार के बैंक खातों की CBI, ED या IncomeTax से जांच करवाने की मांग करने पर National Herald से ज्यादा मुसीबत खड़ी हो सकती है। 

जिस सोनिया गाँधी को कांग्रेस और इसके अंधभक्त "त्याग की देवी" कहकर खुद गुमराह होने के साथ-साथ देश को भी गुमराह करने वालों को नहीं मालूम की इसी "त्याग की देवी" को अध्यक्ष बनाने के चक्कर दलित अध्यक्ष सीताराम केसरी को पार्टी ऑफिस से बाहर पटक देने के बाद से कांग्रेस चुनाव दर चुनाव नीचे जा रही है। अंजाम ये हो गया है कि आज अपनी पहचान बनाए रखने के लिए क्षेत्रीय पार्टियों के आगे नाक रगड़नी पड़ रही है।        

आखिरकार कांग्रेस के भीतर उस सच्चाई का ज्वालामुखी फूट ही गया, जिसे वर्षों से पार्टी राजसी कालीन के नीचे दबाती चली आ रही है। कांग्रेस नेत्री नवजोत कौर सिद्धू ने यह चौंकाने वाला खुलासा कर दिया कि कांग्रेस में “500 करोड़ लगाने वाले को मुख्यमंत्री बना दिया जाता है।” यह केवल एक आरोपित टिप्पणी-मात्र नहीं है, बल्कि यह कांग्रेस के भीतर की उस सड़ी हुई राजनीति का एक्स-रे है, जिसे सुनते ही पार्टी नेतृत्व बौखला गया। नवजोत कौर सिद्धू का निलंबन दिखाता है कि कांग्रेस का आलाकमान यह समझने में विफल है कि समस्या सजा देकर या आवाज़ दबाकर हल नहीं होगी। सच को दबाने का परिणाम सिर्फ विवाद को और हवा देना मात्र होता है। पार्टी ने जो कदम उठाया, उसने यह संदेश दिया कि भीतर की गंदगी को सार्वजनिक करने वाले किसी भी सदस्य को खामोश कर दिया जाएगा। इसी से जनता में यह धारणा और मजबूत हुई कि सोनिया-राहुल और अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे के लिए पार्टी के भीतर पारदर्शिता और नैतिकता केवल नारे ही हैं।

‘500 करोड़ में मुख्यमंत्री बनाओ’ ने कांग्रेस पार्टी के परखच्चे उड़ाए
पंजाब कांग्रेस से अध्यक्ष रहे नवजोत सिंह सिद्धू की पत्नी ने “500 करोड़ में मुख्यमंत्री बनाओ” जैसा विस्फोटक बयान दबे-छुपे अंदाज में नहीं दिया है, बल्कि मीडिया से बातचीत में खुलेआम कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति को नंगा कर दिया है। नवजोत कौर का खुला आरोप केवल एक गुस्से भरी टिप्पणी नहीं, बल्कि लम्बे समय से चल रही उस अंदरूनी संस्कृति का खुला प्रदर्शन है, जिसमें पदों की बेंचिंग, लॉबिंग और पैसों-पैसों की राजनीति ने नैतिकता और सार्वजनिक जवाबदेही को निगल लिया है। जब पार्टी ने जवाब देने के बजाय सच बोलने वाली नेता को निलंबित कर दिया, तो उसने साफ कर दिया कि वह दोष क्यों छुपाना चाहती है। क्योंकि खुली जांच और सार्वजनिक बहस से जो परदा टूटेगा वह पार्टी की रही-सही इज्जत के परखच्चे उखाड़कर रख देगा।

असंवेदनशील, गैरजिम्मेदार, नैतिक रूप से बेईमान और भ्रष्ट प्रधान हैं वड़िंग
पंजाब कांग्रेस से सस्पेंड किए जाने के बावजूद नवजोत कौर सिद्धू के तेवर और तीखे हो गए हैं। मंगलवार को अमृतसर में नवजोत कौर ने सस्पेंड किए जाने पर प्रदेश अध्यक्ष राजा वड़िंग के लिए कहा- यह कार्रवाई उस प्रधान ने की, जिसे कोई नहीं मानता। राणा गुरजीत भी इसी नोटिस से चल रहे हैं। मेरी हाईकमान से बात हो रही है। हम चोरों का साथ नहीं देंगे। अगर 4-5 लोगों को हटा दें तो फिर देखेंगे। नवजोत कौर ने कहा कि मैं एक असंवेदनशील, गैरजिम्मेदार, नैतिक रूप से बेईमान और भ्रष्ट प्रधान के साथ खड़े होने से इनकार करती हूं। मैं उन सभी भाइयों और बहनों के साथ खड़ी हूं, जिन्हें उसकी अक्षमता और गैरजिम्मेदार व्यवहार से चोट पहुंची है। मैं उसे प्रधान मानने से इनकार करती हूं। मुझे हैरानी है कि मुख्यमंत्री उसे क्यों बचा रहे हैं।

सांसद सुखजिंदर रंधावा ने नवजोत कौर सिद्धू को कानूनी नोटिस भेजा
कांग्रेस की पंजाब इकाई के वरिष्ठ नेता और गुरदासपुर से सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा ने निलंबित पार्टी नेता नवजोत कौर सिद्धू को मंगलवार (9 दिसंबर) को कानूनी नोटिस भेजा है। उनसे अपमानजनक टिप्पणी के लिए माफी मांगने या कानूनी कार्रवाई का सामना करने को कहा। पार्टी के राजस्थान प्रभारी रंधावा ने नोटिस में कौर द्वारा मीडिया में उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जाने संबंधी बयानों पर आपत्ति जताई। कौर कांग्रेस की पंजाब इकाई के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू की पत्नी हैं। कांग्रेस ने नवजोत कौर को मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए 500 करोड़ रुपये वाले उनके बयान के लिए सोमवार (8 दिसंबर) को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया। रंधावा के वकील ने नवजोत कौर को भेजे गए कानूनी नोटिस में कहा कि झूठे, निराधार और मानहानिकारक बयान दिए, जिनका इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रिंट मीडिया और सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से प्रसारण और रिपोर्टिंग की गई।

प्रदेश अध्यक्ष पर लगे आरोप का मानवीय और राजनीतिक भार
कांग्रेस के राजस्थान प्रभारी के रूप में रंधावा ने कार्य करते हुए भ्रष्टाचार किया, जिसमें रुपये के बदले पार्टी के टिकट बांटना भी शामिल है। नवजोत ने कहा कि रंधावा के स्मगलरों से संबंध हैं। रंधावा के पास इतनी फार्म लैंड कहां से आई? अपनी पत्नी को तो जिता नहीं सके। रंधावा ने सिद्धू की पीठ में छुरा घोंपा। नवजोत कौर द्वारा सीधे पार्टी अध्यक्ष पर ‘भ्रष्ट’ कहे जाने का अर्थ सिर्फ व्यक्तिगत आरोप नहीं है। यह संगठनात्मक विफलता की गम्भीर चेतावनी है। यदि पार्टी के शीर्ष पर बैठा व्यक्ति ऐसे आरोपों से मुक्त नहीं है, तो छोटे स्तर पर अनुशासन और जवाबदेही की क्या बात की जाए? ऐसे आरोप पार्टी की छवि के साथ-साथ उसकी विचारधारा की भी जड़ों से हिला देते हैं। 

कौर के क्रोध से कर्नाटक के डीके की नाराजगी को मिली आग
पंजाब का मामला अकेला ही खतरनाक नहीं है। कर्नाटक में डीके शिवाकुमार की नाराजगी ने इस आग को राष्ट्रीय आकार दे दिया है। शिवाकुमार का आक्रोश यह संकेत देता है कि सत्ता के भीतर निर्णय-प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी केवल पंजाब तक सीमित नहीं, बल्कि कई राज्यों में गहरे स्तर पर मौजूद है। जब एक अनुभवी और प्रभावशाली नेता यह महसूस करे कि उसे किनारे कर दिया गया या उसके हितानुसार निर्णय नहीं लिये गये, तो वह सार्वजनिक संघर्ष की राह पकड़ लेता है। कांग्रेस के भीतर यह विभाजन जल्दी ही संगठनात्मक टूट में बदल सकता है। सबसे चिंताजनक पहलू पार्टी हाईकमान की मौन नीति है। पत्रकारों और सार्वजनिक मंचों पर जहां विपक्ष पर तीखे बोल फटते हैं, वहीं अपने घर की पोल खुलते ही गूंगी चुप्पी दिखाई देती है। यह चुप्पी नेतृत्व की विफलता की निशानी है।

नैतिकता का पतन, टूटती एकता और बढ़ता आंतरिक असंतोष
यदि कांग्रेस के स्वयंभू आलाकमान ने इस समय भी मजबूती से सुधार नहीं किये, तो यह संकट केवल रिपोर्ट-लाइन तक सीमित रहेगा। विविध राज्यों में इसका गंभीर असर दिखेगा। उसके कार्यकर्ताओं का मनोबल और ज्यादा गिरेगा और आगामी चुनावों में उम्मीदवारों को संगठनात्मक कमजोरी का बोझ उठाना कठिन होगा। कांग्रेस का आंतरिक असंतोष बाहर निकलकर सार्वजनिक हो चुका है और यह प्रवाह तेज होने वाला है। कांग्रेस के पास अब दो रास्ते हैं। या तो यह संकट खुली ईमानदारी से स्वीकार कर पार्टी व्यवस्था का पुनर्निर्माण करे, या फिर चुप्पी और दबाव से इसे ठप कर, गिरती साख को और खो दे। नवजोत कौर के आरोपों ने सिर्फ एक बयान नहीं दिया, बल्कि उन्होंने कांग्रेस के भीतर की विषैली हवा को सार्वजनिक कर दिया है। यदि पार्टी ने तुरंत, पारदर्शी और निर्णायक प्रतिक्रिया नहीं दी तो आने वाले वर्षों में कांग्रेस का किरदार और भी घटिया और हाशिये पर चला जाएगा।

राहुल "वोट चोरी नौटंकी" में मस्त उधर कर्नाटक में राजस्थान वाला ढाई साल का सियासी नाटक विस्फोट के ढेर पर

राहुल गाँधी "वोट चोरी नौटंकी" की मस्ती में कर्नाटक में अपनी सरकार को बचाने से बेखबर है। फिर शोर मचाया जाएगा "सरकार चोरी हो गयी"। हकीकत यह है कि राहुल ने अपनी इमेज "पार्ट टाइमर" और अराजकता फ़ैलाने वाले नेता की बनाए जाने की वजह से कांग्रेस को slow poision दिया जा रहा है। इसकी जिम्मेदार बीजेपी नहीं बल्कि गाँधी परिवार है। जब अध्यक्ष खड़के स्वयं कोई फैसला नहीं ले सकते फिर क्यों अध्यक्ष बनने की नौटंकी मचा रखी है? जब किसी विवाद का फैसला परिवार ने ही करना है फिर तुम्हारा क्या काम? क्या उनका आत्मविश्वास मर चुका है? आखिर गुलामी की भी एक सीमा होती है। जितना यह परिवार सक्रीय रहेगा बीजेपी उतनी तेजी से आगे बढ़ती रहेगी। राहुल की इन हरकतों को देख INDI गठबंधन ने भी कांग्रेस से दूरी बनानी शुरू कर दी है।     

कर्नाटक जनता भी शिवकुमार की ओर टकटकी लगाए देख रही है कि "अपनी बात पर टिके रहकर मुख्यमंत्री बनेंगे या फिर परिवार के आगे चारों खाने चित होंगे?" उनके लिए आगे कुआं पीछे खाई वाली स्थिति है।   

कर्नाटक में कांग्रेस की सिद्धारैमया सरकार 20 नवंबर को ढाई साल का कार्यकाल पूरा कर चुकी है। इसके साथ ही सत्ता-संघर्ष का तापमान इतना बढ़ गया है कि मंत्रालयों से ज्यादा गर्मी अब मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के बीच के सियासी लड़ाई सीएम की कुर्सी पर काबिज होने को लेकर हो रही है। कर्नाटक में कांग्रेस की राजनीति के नाटक में अब वही स्क्रिप्ट खुलकर सामने आने लगी है जो राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच खुलेआम चली थी। ढाई साल का फार्मूला, कुर्सी को लेकर अविश्वास, समर्थकों का ध्रुवीकरण और दिल्ली दरबार में लॉबिंग…वही सब अब कर्नाटक से लेकर दिल्ली तक नजर आने लगा है। फर्क बस इतना है कि कर्नाटक में यह सब और भी ज्यादा सार्वजनिक, ज्यादा तेज और ज्यादा विषाक्त रूप ले रहा है। दरअसल, यह राहुल गांधी की वही कांग्रेस है जो हर चुनाव में स्थिरता का नारा तो लगाती है और सत्ता मिलते ही खुद को अस्थिर करने में लग जाती है। इसका सबसे बड़ा नुकसान राज्य की जनता को उठाना पड़ता है। राजस्थान यह भुगत चुका है और अब कर्नाटक की बारी है।

खतरे में राहुल-सोनिया और प्रियंका की तिकड़ी की विश्वसनीयता

कर्नाटक में आने वाले महीनों में सत्ता परिवर्तन हो या न हो, एक बात स्पष्ट है कि कांग्रेस की केंद्रीय नेतृत्व क्षमता आज सबसे कमजोर स्थिति में है। राहुल-सोनिया और प्रियंका की तिकड़ी की विश्वसनीयता राज्यों के अपनी पार्टी के नेताओं पर ही असर डालने में असफल हो चुकी है। बिहार की हार ने यह और स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस न तो गठबंधन खड़ा कर सकती है, न जनादेश को प्रभावित कर सकती है, और न ही आंतरिक कलह को रोक सकती है। कर्नाटक का यह ढाई साल वाला नाटक, दिल्ली में डीके समर्थकों की लामबंदी, और बिहार में चुनावी हार तीनों मिलकर एक ही बात साबित करते हैं कि कांग्रेस आज भी उसी पुरानी बीमारी से ग्रस्त है— नेतृत्व की अस्पष्टता, निर्णय लेने की अयोग्यता और सत्ता की अंदरूनी लड़ाई।
दिल्ली दरबार में लगातार अपना दबाब बढ़ा रहे हैं डीके समर्थक
कर्नाटक की राजनीति एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ी है, जहाँ सत्ता ही नहीं, बल्कि कांग्रेस नेतृत्व की क्षमता भी कठघरे में है। राजस्थान में जो ढाई साल का नाटक मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच हुआ था, वही दृश्य अब दक्षिण भारत के सबसे महत्वपूर्ण राज्य कर्नाटक में रिपीट हो रहा है। फर्क बस इतना है कि यहां स्क्रिप्ट वही है, बस कलाकार अलग हैं, लेकिन सत्ता की कुर्सी के लिए संघर्ष उतना ही तीखा और खुला है। सत्ता संतुलन अब स्पष्ट रूप से बदल रहा है। डीके शिवकुमार समर्थक दिल्ली में सक्रिय हैं और पार्टी हाईकमान पर दबाव बढ़ा रहे हैं कि “ढाई साल बाद सत्ता हस्तांतरण” का वादा निभाया जाए। सिद्धारमैया इसे अनुभव बनाम युवाशक्ति का संघर्ष बताते हैं, तो डीके गुट का मानना है कि हाईकमान अपने वादे पर खरा उतरे। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि डीके कैंप लगातार दिल्ली में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। क्योंकि उसे पता है कि कर्नाटक की सत्ता की चाबी बेंगलुरु में नहीं, बल्कि तुगलक रोड, दिल्ली में रखी हुई है।

राहुल-सोनिया के दफ्तरों के बाहर डीके के सैकड़ों समर्थक जुटे
दिल्ली में हाल ही में राहुल गांधी और सोनिया गांधी के दफ्तरों के बाहर जिस तरह डीके के सैकड़ों समर्थक जुटे, वह सिर्फ शक्ति-प्रदर्शन नहीं बल्कि हाईकमान की कमजोरी को दुनिया के सामने रखने जैसा है। कांग्रेस के कार्यकर्ता तक मानने लगे हैं कि लगातार हार और बिहार में शर्मनाक हार के बाद हाईकमान अब निर्णय लेने की क्षमता खो चुका है। भाजपा के खिलाफ लड़ाई तो दूर, अपनी ही सरकार को स्थिर रखने का जज़्बा कांग्रेस के दिल्ली दरबार के बड़े नेताओं के पास नहीं बचा है। राहुल गांधी सिर्फ अपने कुछ चुनिंदा सलाहकारों के बीच घिरे हुए हैं। वे इसलिए भी निर्णय नहीं ले पा रहे हैं, क्योंकि राहुल गांधी की स्थिति पहले जैसी नहीं रही। 96 हार के बाद किसी भी नेता का और उस नेता पर से कार्यकर्ताओं का विश्वास डगमगाना लाजिमी है। कर्नाटक में जो स्क्रिप्ट लिखी जा रही है, वह कोई नया नाटक नहीं है। कांग्रेस की यही स्क्रिप्ट है, उसमें बस राजनीति के अभिनेता बदलते रहते हैं।

सिद्धारमैया ने शुरू से ही डीके को सीमित रखने की कोशिश की
इधर जहां तक कर्नाटक के नाटक का सवाल है तो सिद्धारमैया ने शुरू से ही डीके को सीमित रखने की कोशिश की है। चुनाव परिणामों के बाद कांग्रेस हाईकमान यानि राहुल गांधी ने जो समझौता कराया था। ढाई साल बाद सत्ता परिवर्तन सिद्धारमैया ने तब तो अंदरखाते सत्ता के लिए इसे स्वीकार कर लिया, लेकिन अशोक गहलोत की तरह कभी भी खुले तौर इसे नहीं माना। ठीक सचिन पायलट की तरह ही अब डीके शिवकुमार ने इसे अपनी सार्वजनिक प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया है। अब जब ढाई साल का समय पूरा हो चुका है, डीके के समर्थक दिल्ली पहुंच चुके हैं। ये वही समर्थक हैं जो पिछले छह महीनों से कहते आए हैं कि “शक्ति हम पर है, सरकार उनकी वजह से है, और बिना डीके कर्नाटक में कोई कांग्रेस नहीं।” यह संदेश अब स्पष्ट है कि ढाई साल में मुख्यमंत्री बदले, वरना कर्नाटक में पार्टी टूट का खतरा वास्तविक है।

कर्नाटक को राहुल गांधी ने नहीं, स्थानीय नेतृत्व की शक्ति ने जीता
कर्नाटक का संकट राहुल गांधी की उसी राजनीतिक कमजोरी का परिणाम है। कांग्रेस कर्नाटक में जीत गई, लेकिन वह जीत किसी रणनीति की नहीं, बल्कि स्थानीय नेतृत्व डीके शिवकुमार की संगठन क्षमता और सिद्धारमैया की लोकप्रियता की देन थी। यह कोई राष्ट्रीय रणनीति का चमत्कार नहीं था। यह जमीन पर बनाए गए स्थानीय समीकरणों का खेल था। राहुल गांधी ने न तो कैडर को प्रेरित किया, न चुनाव की रणनीति को दिशा दी। यही कारण है कि विजय के बाद सत्ता वितरण में भी वे निर्णायक भूमिका निभाने में असफल रहे। इसी शून्य का लाभ लेकर सिद्धारमैया और डीके दोनों अपनी-अपनी परछाई बढ़ाने में लगे हैं।

सिद्धारमैया बनाम डी.के. शिवकुमार: शीत युद्ध अब सतह पर
कर्नाटक में सत्ता का यह संघर्ष अब खुलकर सामने आ गया है। यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि कर्नाटक कौन चलाएगा? अनुभवी सिद्धारमैया या संसाधन-संपन्न और युवा शक्ति पर पकड़ रखने वाले डीके शिवकुमार? कांग्रेस के भीतर यह धारणा फैलती जा रही है कि सिद्धारमैया अपने पद से हटने के पक्ष में नहीं और डीके का अस्तित्व पद मिलने पर ही टिकेगा। यह द्वंद्व उस समय और खतरनाक हो जाता है जब हाईकमान कमजोर हो और उसके पास समाधान का कोई फार्मूला न बचे। दिल्ली में डीके समर्थकों की पुरजोर आवाजें बताती हैं कि यह मेहनत सिर्फ राजभवन तक सीमित नहीं रहेगी। यह आने वाले दिनों में संगठन और सत्ता को पूरी तरह दो फाड़ कर सकती है।

बिहार हार का सीधा संदेश- राहुल का नेतृत्व जनता को स्वीकार्य नहीं
कर्नाटक में सत्ता संघर्ष का यह नाटक कांग्रेस हाईकमान की अव्यवस्था का दर्पण है। राहुल गांधी बिहार में बुरी तरह से हारकर पहले ही निशाने पर हैं। राजनीतिक विश्लेषकों की राय साफ है कि बिहार हार का सीधा संदेश है कि राहुल नेतृत्व जनता को स्वीकार्य नहीं हो रहा। विपक्षी गठबंधन में वे विश्वसनीय नेता के तौर पर उभरने का दावा खो चुके हैं। जब राष्ट्रीय स्तर पर ही नेतृत्व कमजोर दिखे, तब राज्यों में मुख्यमंत्री बदलने जैसे निर्णय और भी कठिन हो जाते हैं। कांग्रेस में सत्ता हस्तांतरण कभी सुगमता से नहीं हुआ। हर बार बगावत, नाराजगी या टूट का खतरा साथ लेकर आता है। यही स्थिति अब कर्नाटक में है। डीके शिवकुमार कई बार कह चुके हैं कि वे मुख्यमंत्री बनने के योग्य हैं और सिद्धारमैया को वादा निभाना होगा। दूसरी ओर सिद्धारमैया अपनी छवि, कद और अपनी जातीय-पैठ के दम पर डीके को सीमित करने का हर प्रयास करते दिखते हैं।

हाईकमान कमजोर, राज्य नेताओं के भिड़ने से मिली जनता से हार
सत्ता का यह संघर्ष व्यक्तिगत अहंकार की टक्कर से कहीं अधिक जातीय राजनीति, क्षेत्रीय प्रभाव और संगठन के नियंत्रण की लड़ाई बन चुका है। इसकी गूंज दिल्ली तक इसलिए पहुंची है, क्योंकि राहुल गांधी किसी भी पक्ष का सामना करने की स्थिति में नहीं हैं। सालों से कांग्रेस की राजनीति में यही कहानी दोहराई जाती रही है। हाईकमान कमजोर, राज्य नेता आपस में भिड़े, और अंत में जनता से हार। राजस्थान में यह कहानी लंबे समय तक चली, पंजाब में यह कहानी सरकार गिराकर खत्म हुई और अब कर्नाटक में यह कहानी तेज हो चुकी है। कर्नाटक कांग्रेस एक ऐसी सरकार चला रही है जो अपने ही दो शीर्ष नेताओं की रस्साकशी में उलझी है। इस संघर्ष का सबसे बड़ा नुकसान जनता और प्रशासन दोनों को होता है, लेकिन कांग्रेस इस नुकसान को भी हजम करने की आदत डाल चुकी है।


कर्नाटक कांग्रेस में नाटक: ढाई साल के फॉर्मूले पर सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार आमने-सामने, उधर बेटे को मुख्यमंत्री बनाने को खरगे का ‘मास्टर प्लान’


कर्नाटक में कांग्रेस का नाटक राजस्थान की राह पर चल निकला है। सरकार के खिलाफ कांग्रेस के विधायकों में ही असंतोष लगातार बढ़ रहा है। विधायक दो धड़ों में बंट गए हैं और इसके चलते जनता के काम नहीं हो पा रहे हैं। दरअसल, गहलोत-पायलट की तरह कर्नाटक में भी ढाई साल के फार्मूले को लेकर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डिप्टी 
मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार आमने-सामने आ गए हैं। इस राजनीतिक संग्राम का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि राजस्थान में जहां मल्लिकार्जुन खरगे लड़ाई को खत्म कराने के लिए हाईकमान के दूत बनकर आए थे, वहीं कर्नाटक में उनकी तमन्ना है कि कांग्रेसियों के बीच की यह लड़ाई और तेज हो जाए। सियासत की यह अदावत इतनी बढ़ जाए कि उसमें खरगे के पुत्र को मुख्यमंत्री बनाने का रास्ता निकल आए। पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स मानते हैं कि खरगे अपने बेटे प्रियांक खरगे को मुख्यमंत्री पद की दौड़ में लाना चाहते हैं, इसलिए वो सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच लड़ाई को अपरोक्ष रूप से बढ़ाए रखना चाहते हैं।

विवाद की जड़ कांग्रेस हाईकमान का ढाई-ढाई साल का फॉर्मूला

बेंगलुरु के नंदी हिल्स में कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने जुलाई के शुरू में बयान देकर सरकार के अंदर चल रहे तूफान को शांत करने की असफल कोशिश थी। सीएम को सार्वजनिक तौर पर सफाई इसलिए देनी पड़ी, क्योंकि कर्नाटक की सियासत में पिछले कई दिनों से चर्चा है कि प्रदेश कांग्रेस दो खेमों में बंट गई है। इस बंटवारे का सेंटर पॉइंट कोई और नहीं, बल्कि खुद मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डिप्टी मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ही हैं। दोनों पार्टी लीडर्स के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर खींचतान चल रही है। विवाद की जड़ ढाई-ढाई साल का फॉर्मूला बताया जा रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने ये कहकर दोनों खेमों को शांत कर दिया है कि फैसला हाईकमान करेंगे। 

बिहार में चुनाव का डर, मुख्यंमंत्री बदला तो पार्टी में कलह बढ़ेगी
कर्नाटक के सियासी हलकों में इसकी भी पुरजोर चर्चा है कि ढाई साल नवंबर में पूरे हो रहे हैं। उसी वक्त बिहार में विधानसभा चुनाव है। कांग्रेस को डर है कि मुख्यमंत्री बदलने से पार्टी में कलह बढ़ सकती है। ऐसे में कांग्रेस आलाकमान शायद ही इतना बड़ा फैसला ले। लेकिन अगर मुख्यमंत्री नहीं बदला गया तो भी पार्टी में मतभेद सड़क पर आ सकते हैं। शिवकुमार का गुट दबाव बना रहा है, इसलिए कांग्रेस की स्थिति इधर गिरे तो कुआं, उधर गिरे से खाई वाली हो रही है। दरअसल, काफी समय से कई नेता सिद्धारमैया के खिलाफ बयान दे रहे हैं। ये बयानबाजी नवंबर में होने वाले कैबिनेट फेरबदल को लेकर है। नाराज विधायकों को मंत्रिमंडल में शामिल करने की कोशिश हो रही है। कई विधायक आखिरी चुनाव लड़ रहे हैं। वे मंत्री बनना चाहते हैं। इसलिए बयानबाजी कर मंत्रियों को निशाना बना रहे हैं।‘

चुनाव के बाद भी हुई थी सिद्धारमैया और डीके के बीच मुख्यमंत्री बनने की जंग

ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या कर्नाटक की राजनीति में सब कुछ ठीक चल रहा है? पार्टी के बड़े लीडर अलग-अलग राह पर हैं? क्या ढाई साल का फॉर्मूला असल में लागू होगा? इन सवालों का जवाब जानने के लिए सबसे पहले समझते हैं कि विवाद कहां से शुरू हुआ। दरअसल, जो ढाई साल का फॉर्मूला कभी समाधान बना था, वही अब कांग्रेस हाईकमान के लिए चुनौती बनता जा रहा है। मई 2023 में हुए कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 224 में से 135 सीटें जीतकर सत्ता में वापसी की थी। इससे देशभर में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही कांग्रेस को कुछ ऑक्सीजन मिली थी। जीत के बाद सरकार बनाने की बारी आई तो स्थिति राजस्थान जैसी बन गई। यहां भी दो प्रमुख नेता मुख्यमंत्री पद के रूप में सामने आए। सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच मुख्यमंत्री बनने की जंग चली। लेकिन राहुल गांधी ने सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री बना दिया। वे पहले भी 5 साल तक मुख्यमंत्री रह चुके थे। डीके शिवकुमार डिप्टी सीएम बनाए गए। वे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भी हैं। संगठन में उनकी पकड़ और चुनाव प्रचार में भूमिका को जीत की बड़ी वजह माना गया।

अशोक गहलोत की तरह सिद्धारमैया के भी अड़ने से पेंच फंसा

यह माना जाता है कि 2023 में सरकार बनने के वक्त कांग्रेस आलाकमान, सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच ढाई-ढाई साल के फॉर्मूले पर सहमति बनी थी। पहले ढाई साल मुख्यमंत्री सिद्धारमैया रहेंगे। इसके बाद ये कुर्सी डीके शिवकुमार संभालेंगे। शुरुआत में सब कुछ ठीक रहा, लेकिन कुछ ही महीनों बाद सरकार में मतभेद उभरने लगे। अब दोनों के समर्थक खुलकर सामने आने लगे हैं, क्योंकि अब ये ढाई साल की समय सीमा नजदीक है। लिहाज दोनों नेताओं के बीच शीत-युद्ध के साथ -साथ समर्थक विधायक के आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो चुके हैं। हालांकि, इस फॉर्मूले को लेकर कभी कोई ऑफिशियल ऐलान नहीं हुआ। लेकिन कांग्रेस पार्टी ने कभी भी इसे पूरी तरह नकारा भी नहीं। माना गया कि यह फार्मूला राजस्थान का है, वहां लागू नहीं हुआ, लेकिन कर्नाटक में कराएंगे। लेकिन गहलोत की तरह सिद्धारमैया के अड़ने से पेंच फंस गया है।

सीएम बदलने के वादे से मुकरने के लिए मशहूर है कांग्रेस हाईकमान

अब डिप्टी मुख्यमंत्री शिवकुमार का खेमा इस फॉर्मूले को पक्का वादा मान रहा है। उनका कहना है कि अब नेतृत्व परिवर्तन होना ही चाहिए। दरअसल, कांग्रेस ने जब कर्नाटक में सरकार बनाई, तब सिद्धारमैया ने उम्र का हवाला देकर पहले दो साल की मांग की थी। शिवकुमार ने इसे ठुकरा दिया। उन्होंने राजस्थान और छत्तीसगढ़ का उदाहरण दिया, जहां ऐसे वादे पूरे नहीं हुए। शिवकुमार चाहते थे कि उन्हें पहला कार्यकाल मिले, चाहे वो दो साल का हो या तीन साल का। वहीं सिद्धारमैया के समर्थक इसे तब की सिर्फ एक राजनीतिक जरूरत बताते हैं, जो अब बदल चुकी है। दूसरी ओर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद को लेकर फैसले जटिल होते हैं। राहुल गांधी की लीडरशिप में केंद्रीय नेतृत्व की भूमिका अहम होती है। सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे नेताओं को ही देख लीजिए। इन्हें वादा तो मिला, लेकिन पद नहीं। अब ये फॉर्मूला सिर्फ समझौता नहीं, बल्कि राजनीतिक नैरेटिव बन गया है। वे कहते हैं, ‘शिवकुमार के समर्थक इसे वादे की पूर्ति मानते हैं, न कि बगावत। इससे आलाकमान पर दबाव बढ़ गया है। एक पक्ष का समर्थन करने पर दूसरा नाराज हो सकता है। 

कांग्रेस के विधायकों ने अपनी ही सरकार में बताया भ्रष्टाचार-कुशासन
कर्नाटक के रामनगर से विधायक इकबाल हुसैन ने सबसे पहले नेतृत्व परिवर्तन की मांग उठाई। उन्होंने कहा कि अगले दो-तीन महीने में डीके शिवकुमार मुख्यमंत्री बन सकते हैं। उन्होंने ये भी दावा किया कि 138 में से 100 से ज्यादा विधायक शिवकुमार के साथ हैं। ये मांग किसी की निजी महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि कांग्रेस के भविष्य और संगठन की मजबूती के लिए है। हुसैन ने कहा कि 2023 की जीत शिवकुमार की मेहनत और रणनीति का नतीजा थी। अब उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस बयान से सिद्धारमैया खेमे में हलचल मच गई। इसी बीच कांग्रेस विधायक बीआर पाटिल का एक ऑडियो क्लिप वायरल हुआ। वे मुख्यमंत्री सिद्धारमैया पर तीखा हमला करते हुए कहते हैं, सिद्धारमैया किस्मत से मुख्यमंत्री बने हैं। मैंने ही उन्हें सोनिया गांधी से मिलवाया था। उनके ग्रह अच्छे थे, इसलिए सीएम बन गए। पार्टी में उनका कोई गॉडफादर नहीं है। इतना ही नहीं पाटिल ने कांग्रेस सरकार के आवास विभाग पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि सरकारी आवास उन्हीं को मिले, जिन्होंने मोटी घूस दी।

सिद्धारमैया की लकी लॉटरी निकली, शिवकुमार की सेफ स्ट्रैटजी
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कांग्रेस विधायक बीआर पाटिल ने कांग्रेस के कर्नाटक प्रभारी रणदीप सुरजेवाला से मिलकर सिद्धारमैया के खिलाफ सबूत भी सौंपे हैं। कई अन्य विधायकों ने भी सरकार के कामकाज पर सवाल उठाए हैं। कागवाड के विधायक राजू कागे ने विकास कार्यों में देरी और फंड न मिलने पर नाराजगी जताई। उन्होंने यहां तक आरोप लगाए कि कुछ मंत्रियों में इतना घमंड है कि वो मिलने तक को तैयार नहीं होते। वोटर्स को जवाब देना मुश्किल हो रहा है। उन्होंने विधायक पद से इस्तीफे की चेतावनी भी दी है। सिद्धारमैया ने इन आरोपों पर बोलती बंद है। उन्होंने डिफेंसिव रुख अपनाया है। बीआर पाटिल के ‘लकी लॉटरी’ वाले बयान पर तंज कसते हुए बोले- हां, मैं मुख्यमंत्री हूं, इसलिए भाग्यशाली हूं। अगर उन्होंने ऐसा कहा है, तो मैं क्या करूं? उधर डी.के. शिवकुमार ने सेफ स्ट्रैटजी अपनाई। नेतृत्व परिवर्तन की मांग कर रहे विधायकों से शिवकुमार ने अनुशासन की बात कही। दरअसल, शिवकुमार का ये रुख कांग्रेस आलाकमान को संदेश देने की कोशिश है कि वो अनुशासित नेता हैं। वहीं, उनके समर्थक पर्दे के पीछे से उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की तैयारी में जुटे हैं।