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‘FCRA बिल वापस लें या JPC को भेजें’: अमित शाह से मिले ईसाई प्रतिनिधियों ने की माँग, गृह मंत्री से मिलकर मिजोरम के CM बोले- 12 अगस्त से संसद में इस पर होगी चर्चा


विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक (FCRA Bill) को लेकर फैलाए जा रहे प्रोपेगेंडा के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गुरुवार (6 अगस्त 2026) को ईसाई समुदाय के कुछ प्रतिनिधियों से मुलाकात की। IANS की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रतिनिधियों ने गृह मंत्री के साथ बैठक के दौरान विधेयक से जुड़े अपने मुद्दों और आशंकाओं पर चर्चा की।

सूत्रों के अनुसार, अमित शाह ने प्रतिनिधियों की बात ध्यान से सुनी और उनकी चिंताओं को नोट किया। गृह मंत्री ने उन्हें भरोसा दिलाया कि वह उठाए गए मुद्दों को देखेंगे और इस मामले पर सरकार के अन्य सदस्यों के साथ भी चर्चा करेंगे।

वहीं, CNN News18 की एक पत्रकार ने X पर इस मुलाकात को लेकर लिखा कि शाह से मुलाकात करने वाले ईसाई समुदाय के प्रतिनिधियों ने FCRA संशोधन विधेयक को लेकर अपनी आपत्ति जताई। उन्होंने लिखा, “प्रतिनिधियों ने माँग की कि विधेयक को या तो वापस लिया जाए या फिर आगे की संसदीय जाँच के लिए संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजा जाए।”

FCRA बिल को लेकर मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने अमित शाह से मुलाकात की। बैठक के बाद उन्होंने बताया कि उन्होंने गृह मंत्री के सामने विधेयक से जुड़े 6 मुद्दे उठाए थे।

लालदुहोमा के मुताबिक, इन छह मुद्दों में से एक पर अमित शाह ने उन्हें स्पष्ट आश्वासन दिया कि FCRA संशोधन विधेयक पिछली तारीख से लागू नहीं किया जाएगा। यानी कानून बनने से पहले की अवधि पर इसके प्रावधान लागू नहीं होंगे।

मिजोरम के मुख्यमंत्री ने बताया कि बाकी मुद्दों पर गृह मंत्री ने लिखित जवाब देने की बात कही है। अमित शाह की ओर से इन बिंदुओं पर लिखित प्रतिक्रिया मिलने के बाद ही विधेयक को लेकर पूरी स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। लालदुहोमा ने यह भी बताया कि अमित शाह 12 अगस्त से संसद में FCRA संशोधन विधेयक पर चर्चा शुरू करने वाले हैं।

क्या है बिल के संशोधन और क्यों परेशान हैं मिशनरी

मार्च 2026 में पेश किया गया FCRA संशोधन विधेयक मुख्य रूप से उन संस्थाओं से जुड़ा है, जिनका FCRA पंजीकरण रद्द हो चुका है, जिन्होंने अपना लाइसेंस खुद सरेंडर कर दिया है या जिनका लाइसेंस रीन्यू नहीं हुआ है। इस विधेयक के तहत केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त प्राधिकारी को ऐसी संस्थाओं की विदेशी फंडिंग और उस पैसे से बनाई गई संपत्तियों के प्रबंधन का अधिकार दिया गया है। इसका उद्देश्य विदेशी फंड के दुरुपयोग और उसके अवैध तरीके से किसी दूसरे को हस्तांतरित किए जाने पर रोक लगाना है।

इसके अलावा, गृह मंत्रालय ने 22 जून 2026 को एक अधिसूचना जारी कर विदेशी अंशदान (विनियमन) नियम, 2011 में भी बदलाव किया। इसके तहत धार्मिक समुदायों के कई वर्गों के लिए धर्मांतरण यानी Proselytisation को इन नियमों के दायरे से बाहर रखा गया है।

सरकार की शक्तियाँ केवल उन्हीं संपत्तियों तक सीमित रहेंगी, जो विदेशी फंड से बनाई गई हैं और जिन पर FCRA लाइसेंस खत्म होने जैसी निर्धारित परिस्थितियाँ लागू होती हैं। साथ ही, ऐसे मामलों में सरकार के आदेश की समीक्षा और उसके खिलाफ अपील करने का अधिकार भी मौजूद रहेगा।

पिछले कई दशकों से अमेरिका स्थित कई ईसाई प्रचारक और मिशनरी नेटवर्क भारत में चर्च स्थापित करने, गरीबों, खासकर जनजातीय और दलित समुदायों के बीच धर्मांतरण अभियान चलाने और उससे जुड़ी गतिविधियों के लिए फंडिंग करते रहे हैं। Compassion International, World Vision India और Joshua Project जैसे कई विदेशी ईसाई संगठन भारत में सक्रिय रहे हैं। इन संगठनों की गतिविधियों को धार्मिक कामों के साथ-साथ उनके मूल देशों के रणनीतिक हितों से भी जोड़ा जाता रहा है।

अब यही विदेशी और भारतीय मिशनरी संगठन FCRA संशोधन विधेयक का विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि इस कानून से उन संस्थाओं तक विदेशी फंड पहुंचाना मुश्किल हो जाएगा, जिन पर भारत की धार्मिक जनसांख्यिकी बदलने और राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करने वाले एजेंडे पर काम करने के आरोप लगते रहे हैं।

‘5 वक्त की नमाज पढ़ते थे कृष्णजी’: मौलाना जर्जिस अंसारी ने भगवान राम-कृष्ण को बताया- ‘मुसलमान’, CM योगी पर भी की विवादित टिप्पणी

                                                मौलाना जर्जिस अंसारी (फोटो साभार: आज तक)
मौलाना जर्जिस अंसारी ने भगवान श्री कृष्ण को लेकर विवादित बयान दिया है जिसके बाद हंगामा मच गया है। दरअसल, मौलना ने एक मजहबी तकरीर के दौरान भगवान श्री कृष्ण को मुसलमान बताया है और कहा है कि भगवान कृष्ण पाँचों वक्त की नमाज पढ़ा करते थे। इस बयान का वीडियो सामने के बाद संतों और धार्मिक और सामाजिक संगठनों का गुस्सा फूट पड़ा है।

अंसारी को फिर इतना भी मालूम होगा कि भगवान श्रीकृष्ण ने भागवत गीता में कहा "विनाश काले विपरीत बुद्धि", यानि अंसारी जो अपने आपको मौलाना कहता है साबित कर रहा है कि उसने अपने धर्म परिवर्तन कर रखा है।  

मौलाना जर्जिस अंसारी ने कहा, “हमारे भाई, अगर बुरा न मानें, तो कृष्ण जी भी पाँचों वक्त की नमाज पढ़ा करते थे। यकीन न आए तो श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय का 10वाँ श्लोक देख लीजिए…जिसमें कृष्ण जी अर्जुन से कह रहे हैं कि हे अर्जुन, ईश्वर की पूजा करो तो पूरे शरीर का योग करो। योगी, उत्तर प्रदेश वाला नहीं। पूरे शरीर का योग करो यानी पूजा सिर्फ खड़े होकर नहीं बल्कि पूरे शरीर के साथ होनी चाहिए।”

जर्जिस ने हिंदुओं का मजाक उड़ाते हुए आगे कहा, “आज हिंदू धर्म में चले जाइए, लोग सिर्फ ऐसे हाथ उठाएँगे- ओम नमः शिवाय, बस हो गई पूजा। योगी जी बड़े भक्त बनते हैं राम के और अगर अपनी किताबें पढ़ लें, तो यकीन मानिए इस्लाम से मोहब्बत करने लगेंगे।” उन्होंने कहा, “इसी दीन और इसी धर्म को रामचंद्र जी ने भी पेश किया है, कृष्ण जी ने भी पेश किया है। ये सिर्फ मुसलमानों का नहीं है।”

मौलाना के इस बयान पर साधु-संत भड़क गए हैं। महंत विष्णु दास ने कहा, “मौलाना कहता है कि भगवान श्री कृष्ण मुसलमान हैं। ऐसे मौलाना की जो जीभ काटकर लाएगा उसे 10 लाख रुपए का इनाम दिया जाएगा।”

मौलाना जर्जिस अंसारी का यह वीडियो झारखंड की एक मजहबी जलसे का बताया जा रहा है। यह वीडियो 23 जून 2026 का बताया जा रहा है लेकिन यह वायरल अब हुआ है। मौलाना जार्जिस उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के रहने वाले हैं और पहले भी कई विवादित बयान दे चुके हैं।

7 पीढ़ियाँ भुगतेंगी अंजाम… अब बंगाल में सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वालों की खैर नहीं, दंगाइयों और गुंडों के लिए शुभेंदु सरकार का नया कानून

योगी आदित्यनाथ या हिमंता सरमा से नहीं तो शुभेंदु अधिकारी से दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को सीखना चाहिए। दिल्ली में आए दिन हो रहे क़त्ल और अधिक्रमण पर श्रीमती रेखा गुप्ता को इन मुख्यमंत्रियों की तरह काम करना चाहिए। क्या हुआ CAG रिपोर्ट्स, शराब घोटाला, मनी लॉन्डरिंग आदि का? क्या इन सबको चुनाव आने तक ठंठे बस्ते में डाल दिया गया है? मुस्लिम तुष्टिकरण को छोड़ काम करना होगा। अब तक जो अधिक्रमण हटाए जा रहे हैं सभी हिन्दू क्षेत्रों में लेकिन मुस्लिम क्षेत्रों पर आंखें मूंदे हुए हैं। बंगाल मुख्यमंत्री शुभेंदु ने मुख्यमंत्री बनते ही विरोधियों के साथ-साथ दंगाइयों में और बांग्लादेश तक में खलबली मची हुई है। 

ममता की पार्टी TMC  ऐसे ही नहीं बिखरी, अधिकारी की कार्यशैली से बिखरी है। अगर अधिकारी ने बिना भेदभाव के काम किया ममता से अलग हुए कई विधायक और सांसद भी लपेटे में आएंगे। क्योकि ममता राज में जितना भी उपद्रव हुआ इन लोगों का भी प्रत्यक्ष नहीं तो अप्रत्यक्ष समर्थन था। यदि नहीं, फिर क्यों नहीं ममता का विरोध कर पार्टी छोड़ी? तब ये ही सब बड़े आनंद के साथ मलाई खा रहे था।       

पश्चिम बंगाल में अपराधियों और दंगाइयों पर लगाम कसने के लिए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी एक बेहद सख्त नया कानून ला रहे हैं। सोमवार(29 जून) को विधानसभा में पेश होने जा रहा यह बिल यूपी के ‘बुलडोजर मॉडल’ से भी ज्यादा घातक माना जा रहा है।

इस नए कानून के तहत सार्वजनिक या निजी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वाले दंगाइयों से भारी वसूली की जाएगी। इसके कड़े प्रावधानों को देखकर अभी से विपक्ष और अपराधियों के बीच खलबली मच गई है।

54 साल पुराना ढर्रा होगा खत्म

बंगाल सरकार साल 1972 के पुराने कानून ‘द वेस्ट बंगाल मेंटेनेंस ऑफ पब्लिक ऑर्डर एक्ट’ में बड़ा बदलाव करने जा रही है। इसकी जगह अब विधानसभा में ‘पश्चिम बंगाल लोक सुरक्षा और असामाजिक गतिविधि नियंत्रण विधेयक, 2026’ पेश किया जाएगा।

सरकार का मानना है कि पुराना कानून आज के आधुनिक और संगठित अपराधों से निपटने के लिए काफी नहीं था। शुभेंदु अधिकारी सरकार ने साफ कर दिया है कि अब बंगाल में सिंडिकेट का नहीं बल्कि सिर्फ कानून का राज चलेगा।

दंगाइयों का होगा आर्थिक खात्मा

इस नए कानून का सबसे बड़ा डर इसका रिकवरी मैकेनिज्म यानी नुकसान की वसूली का नियम है। अगर किसी दंगे या बवाल में सरकारी या किसी की निजी संपत्ति को नुकसान पहुँचता है, तो उसकी पूरी भरपाई अपराधी की संपत्ति बेचकर की जाएगी।

कानूनी जानकारों के मुताबिक यह कानून इतना कड़ा है कि नुकसान की भरपाई करते-करते दंगाइयों की आने वाली 7 पीढ़ियाँ तक कंगाल हो जाएँगी। यह अपराधियों को पूरी तरह आर्थिक रूप से खत्म करने वाला कदम है।

UP के मॉडल से भी दो कदम आगे

यह नया बिल उत्तर प्रदेश के योगी मॉडल से भी ज्यादा सख्त बताया जा रहा है। इसमें पुलिस को बिना मुकदमे के हिरासत में लेने और अपराधियों को जिले से बाहर निकालने की असीमित शक्तियाँ दी गई हैं। इतना ही नहीं, दंगाइयों और गुंडों को शरण देने वालों के खिलाफ भी इसमें सख्त नियम हैं। अब किसी भी अपराधी को छिपाने या पनाह देने पर सीधे दो साल की जेल की सजा काटनी होगी।

पंजाब सरकार ने फोरेंसिक एक्सपर्ट को 10 लाख रूपए देकर भगवंत मान के बेअदबी वाले असली वीडियो को फर्जी बताया, पुलिस ने खुद बनवाई नकली रिपोर्ट: हरियाणा पुलिस ने 2 को किया गिरफ्तार

        भगवंत मान की विवादित वीडियो को फर्जी बताने के लिए पंजाब सरकार ने फोरेंसिक एक्सपर्ट को दी गई घूस
विवादों से जन्मी अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी लगता है विवादों से ही ख़त्म हो जाएगी। दिल्ली में सत्ता में रहते नितरोज कोई नया विवाद चलता रहता था लेकिन जनता मुफ्त की रेवड़ियों में केजरीवाल पार्टी को वोट देती रही। अब जिस तरह पंजाब में बेअदबी के असली वीडियो को राज्य सरकार फर्जी बताने में शामिल बताई जा रही है, बंगाल में ममता की सरकार और पंजाब में केजरीवाल सरकार की कार्यशैली में कोई फर्क नहीं। 

अगर अकाल तख़्त इस मुद्दे को गंभीरता से लेती है भगवंत सिंह मान ऐसी मुसीबत में फंस जायेंगे जहाँ से इनका निकलना बहुत मुश्किल हो सकता है।

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान इन दिनों सिख गुरुओं की बेअदबी वाले वीडियो को लेकर विवादों में घिरे हुए हैं। वीडियो में सिख गुरुओं और भिंडरावाले की तस्वीरों के साथ आपत्तिजनक हरकतें करते दिख रहे हैं। इस वीडियो को फर्जी साबित करने के लिए अब पूरी पंजाब पुलिस विवादों में है। हरियाणा के एक फोरेंसिक एक्सपर्ट ने दावा किया है कि पंजाब पुलिस के एक अधिकारी ने ₹10 लाख का लालच देकर वीडियो को फर्जी साबित करने को कहा था।

 मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हरियाणा के एक साइबर-फ़ोरेंसिक एक्सपर्ट जसप्रीत ने दावा कि 15 जून 2026 को पंजाब पुलिस के अधिकारी बनकर कुछ लोग उनके पास आए और उनसे ऐसी रिपोर्ट बनवाने को कहा जो साबित करे कि सीएम भगवंत मान का यह वीडियो AI से बना हुआ फर्जी वीडियो है। जसप्रीत ने आरोप लगाया कि उन्हें फाइव स्टार क्राउन प्लाजा होटल में बुलाया गया और उनकी गाड़ी में जबरदस्ती ₹10 लाख नकद रखे गए। होटल का सीसीटीवी फुटेज भी सामने आया है।

जसप्रीत ने विरोध किया तो उन्हें सिरसा के अरुण महेंद्रा और जींद के अंकित से मिलवाया गया, जिन्हें अधिकारियों ने पेन ड्राइव सौंपी थी।

हरियाणा पुलिस ने जसप्रीत की शिकायत के आधार पर इन दोनों को 23 जून 2026 को गुड़गाँव के सेक्टर 29 से गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस ने बताया कि अरुण हरियाणा सरकार का ही एक कर्मचारी है और अंकित दिल्ली सरकार में कॉन्ट्रैक्ट बेस्ड कर्मचारी है।

वहीं शिरोमणि अकाली दल के महासचिव विक्रम सिंह मजीठिया ने भी कहा कि पंजाब पुलिस के कर्मचारी सीएम भगवंत मान की फर्जी वीडियो तैयार करने में शामिल थे। उन्होंने एक व्हाट्सऐप चैट भी शेयर की है, जिसमें फर्जी रिपोर्ट तैयार करने का दावा किया गया है। उन्होंने फॉरेंसिक एक्सपर्ट जसप्रीत की वीडियो शेयर करते हुए बताया कि पंजाब पुलिस लगातार उसे धमकियाँ दे रही है।

इसके अलावा दिल्ली के मंत्री मंजिंदर सिंह सिरसा ने भी इस विवाद को लेकर आम आदमी पार्टी पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा, “…भगवंत मान चुप रहे, अरविंद केजरीवाल भी चुप रहे, और आज उन लोगों को गिरफ़्तार किया गया और उनके ख़िलाफ़ केस दर्ज किया गया जिन्होंने यह फ़ोरेंसिक रिपोर्ट दी थी… जिस तरह से इतना बड़ा गुनाह किया गया है और पैसे व पुलिस की मदद से इसे दबाने की कोशिश की गई है, उसे चुनौती दी गई है।” उन्होंने पंजाब के सीएम भगवंत मान के खिलाफ केस दर्ज करने की भी माँग की है।

कुछ समय पहले एक वीडियो वायरल हुआ था। वीडियो को लेकर दावा किया गया कि इसमें दिख रहा शख्स सिख गुरुओं और भिंडारवाले की तस्वीरों के साथ कुछ आपत्तिजनक हरकतें करता दिखाई दे रहा है। इस पर सिख संगठनों और अकाल तख्त ने सीएम मान को खालसा पंथ विरोधी करार दिया था।

उत्तर प्रदेश : अब जब्त अफीम से बनेगी जीवनरक्षक दवा, योगी सरकार का अपराध से जनकल्याण तक का सफर

            जब्त अफीम से बनेगी दवा, योगी सरकार ने अपराध को बदला जनकल्याण में (फोटो साभार : ChatGPT)
योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से पहले जिस उत्तर प्रदेश में माफियाओं का डंका बजता था, पुलिस मंत्रियों की भैंस ढूंढने में लगी रहती थी, आज स्थिति एकदम बदल चुकी है।   

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने जिस तरह अपराधियों के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति बनाई है, उसी तरह अब उनसे जब्त की गई सामग्री को भी प्रयोग में लाया जाएगा। दरअसल गाजियाबाद पुलिस ने अलग-अलग थानों के मालखानों में सालों से बंद पड़े 16,378 किलोग्राम से ज्यादा के नशीले पदार्थ जब्त कर उसे पूरी तरफ नष्ट किया है।

इसी के साथ, अपराधियों से पकड़ी गई 4.206 किलोग्राम शुद्ध अफीम को नष्ट करने के बजाय सरकारी अफीम कारखाने (गाजीपुर) भेजा गया है। इस अफीम का इस्तेमाल अब नशे के लिए नहीं, बल्कि गंभीर बीमारियों की दवाएँ बनाने में किया जाएगा। योगी सरकार का यह कदम दिखाता है कि कैसे अपराध की सामग्री का इस्तेमाल अब जन-कल्याण के लिए हो रहा है।

थानों में जमा ड्रग्स को ऐसे किया गया नष्ट

गाजियाबाद पुलिस कमिश्नरेट के थानों में सालों से भारी मात्रा में नशीले पदार्थ जमा थे। इन मादक पदार्थों की वजह से थानों के मालखानों में जगह कम पड़ रही थी और इनके दुरुपयोग का खतरा भी बना हुआ था। इसी समस्या को देखते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर एक उच्च स्तरीय ड्रग डिस्पोजल कमेटी का गठन किया गया। इस कमेटी में अपर पुलिस आयुक्त अपराध और अपर पुलिस उपायुक्त यातायात जैसे वरिष्ठ अधिकारियों को शामिल किया गया था।

इस विशेष कमेटी ने कोर्ट, संबंधित विभागाध्यक्षों और मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) से सभी जरूरी कानूनी अनुमतियाँ और अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) प्राप्त किए। इसके बाद बुधवार (10 जून) को धौलाना स्थित एक अधिकृत बायो मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट एंड डिस्पोजल केंद्र में कुल 63 मुकदमों से जुड़े मादक पदार्थों को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया। नष्ट किए गए सामान में सबसे अधिक मात्रा नंदग्राम थाने से बरामद हुई 15,735 लीटर कोडीन युक्त नशीली कफ सिरप की थी। नियमों के मुताबिक इस पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग भी कराई गई।

जब्त अफीम से दवा बनने की पूरी प्रक्रिया

अफीम एक खास पौधे से मिलती है। इस पौधे का नाम ‘अफीम पोस्त‘ है। इसे वैज्ञानिक भाषा में पैपावर सोम्रिफेरस कहते हैं। इस पौधे पर हरे रंग के कच्चे फल लगते हैं। इन कच्चे फलों को ‘डोडा’ कहा जाता है। जब इन डोडों पर हल्का सा चीरा लगाया जाता है, तो उनमें से सफेद रंग का गाढ़ा दूध जैसा रस निकलता है। यही रस हवा के संपर्क में आकर सूख जाता है और गोंद जैसा काला-भूरा बन जाता है। इसी सूखे रस को हम अफीम कहते हैं।

अफीम के अंदर कई तरह के प्राकृतिक तत्व होते हैं। विज्ञान की भाषा में इन तत्वों को ‘एल्कलॉइड्स’ कहते हैं। अफीम में ऐसे 25 से ज्यादा अलग-अलग तत्व पाए जाते हैं। जब पुलिस अपराधियों से यह अफीम पकड़ती है, तो उसे गाजीपुर के सरकारी कारखाने में भेजा जाता है। इस कारखाने को ‘सरकारी अफीम और अल्कलॉइड वर्क्स’ (GOAW) कहते हैं। यहाँ वैज्ञानिक सबसे पहले लैब में अफीम की पूरी जाँच करते हैं। वह देखते हैं कि अफीम कितनी असली है। इसके बाद मशीनों की मदद से अफीम को अच्छी तरह साफ किया जाता है।

अफीम से कैसे निकाली जाती है दवा?

साफ करने की इस प्रक्रिया को ‘प्रोसेसिंग’ कहते हैं। प्रोसेसिंग के दौरान वैज्ञानिक अफीम के अंदर से दो सबसे जरूरी तत्व अलग करते हैं। पहले तत्व का नाम ‘मॉर्फीन’ है। दूसरे तत्व का नाम ‘कोडीन’ है। ये दोनों तत्व बहुत काम के होते हैं। जब ये तत्व अफीम से अलग हो जाते हैं, तो सरकार इन्हें दवा बनाने वाली बड़ी कंपनियों को बेच देती है। ये कंपनियाँ इन तत्वों की मदद से बहुत ही असरदार और तेज दर्द को ठीक करने वाली दवाएँ तैयार करती हैं।

इन दोनों तत्वों का काम अलग-अलग बीमारियों में होता है। उदाहरण के लिए, ‘कोडीन’ नाम के तत्व का इस्तेमाल सूखी खांसी को ठीक करने के लिए किया जाता है। इससे खांसी के कफ सिरप बनाए जाते हैं। वहीं दूसरी तरफ, ‘मॉर्फीन’ नाम का तत्व बहुत तेज दर्द को रोकने के काम आता है। डॉक्टर इसका इस्तेमाल गंभीर मरीजों के लिए करते हैं। मॉर्फीन की मदद से दर्द को दबाने वाले इंजेक्शन और गोलियाँ (टैबलेट) बनाई जाती हैं। इस तरह यह अफीम मरीजों का जीवन बचाने के काम आती है।

क्या हर पकड़ी गई अफीम से दवा बन सकती है?

यहाँ एक बात समझना बहुत जरूरी है। पुलिस जो भी अफीम पकड़ती है, उस हर अफीम से दवा नहीं बनाई जा सकती। असल में, नशा बेचने वाले तस्कर बहुत चालाक होते हैं। वे ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए अफीम में मिलावट कर देते हैं। वे अफीम का वजन बढ़ाने के लिए उसमें स्टार्च, पाउडर या खराब केमिकल मिला देते हैं। कभी-कभी तो इसमें आर्सेनिक और लेड जैसी जहरीली चीजें भी मिला दी जाती हैं। ऐसी मिलावटी अफीम इंसानी शरीर के लिए बहुत ज्यादा खतरनाक और जानलेवा हो जाती है।

जब पुलिस इस अफीम को गाजीपुर या नीमच के सरकारी कारखाने में भेजती है, तो वहाँ सबसे पहले उसकी शुद्धता जाँची जाती है। इसके लिए लैब में एक खास टेस्ट होता है। अगर टेस्ट में अफीम मिलावटी निकलती है, तो कारखाना उसे लेने से मना कर देता है। यही नहीं, अगर अफीम में सीलन (नमी) या फंगस लगी हो, तो भी वह रिजेक्ट हो जाती है। ऐसी खराब अफीम को दवा बनाने के लायक नहीं माना जाता। बाद में, इस खराब अफीम को भी बाकी नशीले पदार्थों की तरह आग में जलाकर या केमिकल डालकर पूरी तरह नष्ट कर दिया जाता है। कारखाने में सिर्फ और सिर्फ एकदम शुद्ध अफीम का ही इस्तेमाल दवा बनाने के लिए होता है।

योगी सरकार: अपराध खत्म कर लोगों की भलाई का नया सफर

उत्तर प्रदेश में जब से योगी आदित्यनाथ की सरकार आई है, कामकाज का तरीका बिल्कुल बदल गया है। पहले के समय में पुलिस जो करोड़ों रुपए की अफीम पकड़ती थी, वह थानों के मालखानों में सालों तक बंद रहती थी। वह रखी-रखी सड़ जाती थी या फिर कई बार चोरी भी हो जाती थी। लेकिन अब योगी सरकार ने इस पूरे सिस्टम को साफ-सुथरा और बेहतर बना दिया है। अब पकड़ी गई चीजों का सही इस्तेमाल हो रहा है।

सरकार की इस नई नीति से एक साथ दो बड़े फायदे हो रहे हैं। पहला फायदा यह है कि पुलिस नशे का काला कारोबार करने वाले अपराधियों को पकड़कर उनका पूरा नेटवर्क तोड़ रही है। दूसरा फायदा यह है कि उनसे जो अफीम मिल रही है, उसका इस्तेमाल बीमार और लाचार लोगों के इलाज के लिए किया जा रहा है। सरकार एक तरफ अपराधियों पर कड़ा एक्शन ले रही है, तो दूसरी तरफ उनकी जब्त की गई चीजों को जनता की भलाई में लगा रही है। यह सरकार की एक बहुत अच्छी और दूर की सोच को दिखाता है।

पुलिस और कानून के लिए क्यों जरूरी है यह कदम?

कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए यह कार्रवाई बहुत जरूरी है। थानों के मालखानों में बहुत ज्यादा नशा जमा रखना खतरे से खाली नहीं होता। हमेशा डर रहता है कि कहीं यह नशीले पदार्थ चोरी न हो जाएँ। यह भी डर रहता है कि कोई इन्हें दोबारा चोरी-छिपे बाजार में न बेच दे। इसलिए समय-समय पर अभियान चलाकर इन्हें नष्ट करना बहुत जरूरी है। इससे थानों का रिकॉर्ड एकदम साफ हो जाता है और पुलिस के कामकाज में ईमानदारी बनी रहती है।

गाजियाबाद पुलिस ने इन नशीले पदार्थों को खुले में नहीं जलाया। खुले में जलाने से हवा जहरीली हो जाती है। इसके बजाय पुलिस इन्हें धौलाना के एक विशेष वेस्ट ट्रीटमेंट प्लांट में लेकर गई। वहाँ पूरी सावधानी और नियमों के साथ इन्हें नष्ट किया गया। इससे पर्यावरण को बिल्कुल भी नुकसान नहीं पहुँचा। उत्तर प्रदेश पुलिस का यह कदम देश के बाकी राज्यों के लिए भी एक मिसाल है। यह दिखाता है कि कैसे कड़े नियमों का पालन करके जनता की भलाई और सुरक्षा की जा सकती है।

TMC हो रही हवा-हवाई, ममता बनर्जी की करीबी सांसद सुष्मिता देव ने भी दिया इस्तीफा: असम मुख्यमंत्री से की मुलाकात

                मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा से राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव की मुलाकात (साभार : Indiatoday)
कहते है कि बुरे वक़्त में साया भी साथ छोड़ देता है। जिस तरह अखाड़े में दो पहलवानों की कुश्ती में एक हारता है और एक जीतता है ठीक उसी तरह चुनावों में उम्मीदवार बहुत होते हैं लेकिन जीतता सिर्फ एक ही है। लेकिन बंगाल का चुनाव तो एकदम अनोखा जान दिखाई पड़ता है जहाँ 
TMC के हारने पर पूरी पार्टी ताश के पत्तों की तरह ढह रही है। पार्टी छोड़ने वालों का यही सिलसिला जारी रहा तो शायद दो महीने से पहले ही ममता बनर्जी और उसकी पार्टी TMC इतिहास के गर्द में ऐसी दबेगी जहाँ से निकलना बहुत मुश्किल होगा। जितनी दुर्दशा ममता और उसकी पार्टी TMC की हो रही है किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। यही एक चुनाव ऐसा था जब चुनाव अभियान में ममता चोटिल होने का ड्रामा भी नहीं कर पायी। वरना हर चुनाव में हार सामने देख चोटिल होने का ड्रामा कर सहानुभूति वोट लेकर सत्ता में आ जाती थी। चोट भी ऐसी जो वोटिंग होते ही ठीक जो जाती थी। 

जितना तानाशाह का आतंक ममता के मुख्यमंत्री रहते बंगाल में देखने को मिला शायद ही भारत के इतिहास में ऐसा हुआ हो। INDI गठबंधन के शामिल किसी भी पार्टी में ममता के अत्याचारों के खिलाफ बोलने की हिम्मत कर सकी। किसी INDI गठबंधन को घास नहीं डालने वाली ममता उसी INDI गठबंधन की चौखट पर माथा टेक रही है। घुसपैठियों को दामाद की तरह पाला-पोसा जा रहा था और ममता की सत्ता जाते ही वो भी बंगाल छोड़ भागने शुरू हो गए। वैसे जितनी भी पार्टियां हैं बंगाल चुनाव से सीखते हुए घुसपैठियों को पालना बंद करे। जिन रोहिंग्यों को कोई मुस्लिम मुल्क रखने को तैयार नहीं तुम उनको दामाद बना संरक्षण दे रहे हो। उनके आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर कार्ड बनवा रहे हो।     

पश्चिम बंगाल में सत्ता से बाहर होते ही ममता बनर्जी की पार्टी TMC बिखरने लगी है। बुधवार (10 जून) को ममता की बेहद करीबी राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। सुखेंदु शेखर के बाद इस्तीफा देने वाली वह दूसरी बड़ी नेता हैं।

इस्तीफे के बाद सांसद सुष्मिता देव ने असम मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा से मुलाकात की है। इससे पहले TMC के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसदों ने बागी रुख अपनाया था और लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को चिट्ठी लिखकर संसद में अलग बैठने की व्यवस्था माँगी थी। यह गुट बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए को समर्थन दे सकता है।

पार्टी के अंदर मचे इस घमासान से ममता बनर्जी अब बिल्कुल अकेली पड़ती जा रही हैं। इससे पहले TMC के विधायक दल भी दोफाड़ हो चुका है। बागी गुट का नेतृत्व कर रही सांसद काकोली घोष के साथ फिलहाल 14 सांसदों के नाम साफ हो चुके हैं।

इनमें शताब्दी रॉय, सुपरस्टार देव (दीपक अधिकारी) और जून मालिया जैसे बड़े चेहरे शामिल हैं। सुष्मिता देव के इस्तीफे की असली वजह अभी सामने नहीं आई है, लेकिन इसे TMC के लिए बहुत बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है।

मुख्यमंत्री हिमंता के राज में असम में 480 से 84 पर आई मातृ मृत्यु दर(MMR)

                                हिमंता बिस्वा की सरकार में घटा मातृ मृत्यु दर (फोटो साभार : ChatGPT)
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने सोशल मीडिया पर राज्य की एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक कामयाबी की जानकारी दी है। असम में मातृ मृत्यु दर (MMR) अब तेजी से घटकर महज 84 पर आ गई है। राज्य के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब असम का यह आँकड़ा देश के राष्ट्रीय औसत यानी 88 से भी नीचे चला गया है।

मुख्यमंत्री ने इस पल को अपने सार्वजनिक जीवन का सबसे भावुक करने वाला क्षण बताया है। उन्होंने इस सफलता का पूरा श्रेय असम के हजारों डॉक्टरों, नर्सों, आशा बहुओं और स्वास्थ्य कर्मियों को दिया है। CM हिमंता ने बताया कि साल 2006 में जब उन्होंने स्वास्थ्य विभाग संभाला था, तब राज्य में मातृ मृत्यु दर 480 थी। उस समय इस स्थिति को सुधारना बिल्कुल नामुमकिन लगता था, लेकिन स्वास्थ्य कर्मियों के लगातार काम और त्याग से आज यह सच हो चुका है।

क्या है मातृ मृत्यु दर?

अगर हम आम लोगों की बिल्कुल सरल भाषा में समझें तो जब कोई महिला गर्भवती होती है या बच्चे को जन्म देती है, तब सही इलाज न मिलने या स्वास्थ्य की अन्य जटिलताओं के कारण यदि उसकी मृत्यु हो जाती है, तो उसे मातृ मृत्यु माना जाता है। इस पूरी व्यवस्था में बच्चे के जन्म के बाद के 42 दिनों का नाजुक समय भी शामिल किया जाता है।

स्वास्थ्य विज्ञान की दुनिया में इसे ठीक से मापने के लिए एक पैमाना बनाया गया है जिसे मातृ मृत्यु अनुपात कहा जाता है। इसका मतलब यह होता है कि समाज में हर एक लाख जीवित बच्चों के जन्म लेने पर कितनी माताओं को अपनी जान गँवानी पड़ी है। यह विशेष आँकड़ा किसी भी राज्य या देश की अस्पताल व्यवस्था, डॉक्टरों की उपलब्धता और इलाज की असली मजबूती को दुनिया के सामने साफ-साफ दिखाता है।

असम में पहले और अब के आँकड़ों में अंतर

असम राज्य ने पिछले दो दशकों के भीतर गर्भवती माताओं की देखभाल को लेकर स्वास्थ्य व्यवस्था को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। अगर हम साल 2006 के पुराने आँकड़ों को देखें तो असम की स्थिति पूरे देश में सबसे ज्यादा चिंताजनक और डरावनी मानी जाती थी। उस समय असम में हर एक लाख बच्चों के जन्म पर 480 माताओं की मौत प्रसव के दौरान हो जाती थी।

इसके बाद सरकार, अस्पतालों और जमीनी स्वास्थ्य कर्मियों ने मिलकर एक लंबा और कठिन सफर तय किया। इसी लगातार की गई मेहनत का नतीजा है कि साल 2026 में यह आँकड़ा बहुत तेजी से नीचे गिरकर केवल 84 पर टिक गया है। भारत सरकार के ताजा आँकड़ों के अनुसार इस समय पूरे देश की मातृ मृत्यु दर का औसत आँकड़ा 88 बना हुआ है। इसका सीधा और साफ मतलब यह है कि असम अब देश के सबसे पिछड़े राज्यों की सूची से बाहर निकलकर राष्ट्रीय औसत से भी कहीं ज्यादा बेहतर और शानदार काम कर रहा है।

आखिर किन वजहों से होती है गर्भवती माताओं की मौत

गर्भावस्था और बच्चे के जन्म के समय महिलाओं की अचानक जान जाने के पीछे मुख्य रूप से कुछ बड़ी स्वास्थ्य समस्याएँ जिम्मेदार होती हैं। डॉक्टरों के अनुसार इनमें सबसे बड़ी और जानलेवा समस्या डिलीवरी के तुरंत बाद महिला के शरीर से बहुत ज्यादा खून बह जाना है। अगर इस खून के बहाव को समय पर नहीं रोका जाए तो महिला की कुछ ही घंटों में मौत हो सकती है। इसके अलावा प्रसव के समय या उसके बाद अस्पतालों या घरों में पूरी तरह साफ-सफाई न होने से महिला के शरीर में बहुत तेजी से इंफेक्शन यानी संक्रमण फैल जाता है।

गर्भावस्था के दिनों में अचानक ब्लड प्रेशर यानी रक्तचाप का बहुत ज्यादा बढ़ जाना भी दिमाग और दिल पर गहरा असर डालता है जिसे चिकित्सा की भाषा में एक्लेम्पसिया कहा जाता है। कई बार समाज में बिना डॉक्टरी सलाह के या दाइयों के जरिए गलत तरीके से कराया गया असुरक्षित गर्भपात भी सीधे मौत का कारण बन जाता है। इन सभी समस्याओं के साथ ग्रामीण इलाकों की महिलाओं के शरीर में पहले से पोषण की कमी और खून की भारी कमी यानी एनीमिया का होना स्थिति को प्रसव के समय और ज्यादा नाजुक बना देता है।

माताओं की जान बचाने के सबसे सरल उपाय

चिकित्सा विशेषज्ञों का साफ कहना है कि गर्भवती माताओं की होने वाली इन अधिकांश मौतों को बहुत ही आसान उपायों से पूरी तरह रोका जा सकता है। इसके लिए सबसे जरूरी और प्राथमिक उपाय यह है कि बच्चे का जन्म हमेशा किसी अच्छे और मान्यता प्राप्त अस्पताल में डॉक्टरों और प्रशिक्षित नर्सों की देखरेख में ही होना चाहिए। पुराने तौर-तरीकों से घरों पर प्रसव कराने से अचानक पैदा होने वाले खतरों को संभालना नामुमकिन हो जाता है।

इसके अलावा गर्भावस्था के शुरुआती दिनों से ही महिला की कम से कम चार बार नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र में मुफ्त जाँच होनी चाहिए और समय पर सभी जरूरी टीके लगने चाहिए। गर्भवती महिला के रोज के खान-पीने का विशेष ध्यान रखना बेहद जरूरी है, जिसमें हरी पत्तेदार सब्जियाँ, फल, दूध और सरकार द्वारा दी जाने वाली आयरन की गोलियाँ नियमित रूप से शामिल हों। इसके साथ ही किसी भी अचानक पैदा होने वाली आपातकालीन स्थिति के लिए एम्बुलेंस या गाड़ी की व्यवस्था पहले से तैयार रखनी चाहिए ताकि बिना समय गँवाए मरीज को बड़े अस्पताल पहुँचाया जा सके।

सुरक्षा के लिए देश और राज्य में चलाई जा रही योजनाएँ

गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं की सुरक्षा के लिए भारत सरकार और असम सरकार मिलकर कई बेहतरीन और बेहद मजबूत योजनाएँ चला रही हैं। इन योजनाओं का मुख्य लक्ष्य गरीब से गरीब परिवार की महिला को भी बिना किसी खर्च के बड़े अस्पतालों में इलाज की सुविधा देना है।

जननी सुरक्षा योजना– इस दिशा में एक बहुत बड़ा और क्रांतिकारी कदम साबित हुई है। इस योजना के तहत सरकार ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की गर्भवती महिलाओं को सीधे नकद पैसे की मदद देती है ताकि वे पैसों की तंगी छोड़कर अस्पताल में आकर ही सुरक्षित डिलीवरी करवाएँ। इसी तरह जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम को शुरू किया गया है, जिसका पूरा उद्देश्य गर्भवती महिलाओं और बीमार शिशुओं के इलाज में जेब से होने वाले हर एक पैसे के खर्च को पूरी तरह खत्म करना है।

इस योजना के तहत किसी भी सरकारी अस्पताल में महिला का सीजेरियन ऑपरेशन, प्रसव, सभी जरूरी दवाइयाँ, जाँच, खून की जरूरत और डॉक्टर द्वारा बताया गया भोजन पूरी तरह मुफ्त मिलता है। इतना ही नहीं, महिला को घर से अस्पताल लाने और डिलीवरी के बाद वापस घर सुरक्षित छोड़ने के लिए एम्बुलेंस की गाड़ी भी पूरी तरह बिना किसी पैसे के सरकारी स्तर पर उपलब्ध कराई जाती है।

प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत पूरे देश में हर महीने की 9 तारीख को एक विशेष दिन तय किया गया है। इस दिन सभी सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों पर प्रसूति विशेषज्ञों द्वारा हर एक गर्भवती महिला की व्यापक और बिल्कुल मुफ्त जाँच की जाती है। इस अभियान के तहत जिन महिलाओं की गर्भावस्था में ज्यादा खतरा दिखाई देता है, उनकी पहचान करके सुरक्षित प्रसव होने तक आशा वर्कर्स के जरिए लगातार उनकी व्यक्तिगत ट्रैकिंग की जाती है।

माताओं के स्वास्थ्य को और ज्यादा सम्मानजनक बनाने के लिए सरकार ने सुरक्षित मातृत्व आश्वासन यानी ‘सुमन’ योजना भी शुरू की है, जिसमें अस्पताल आने वाली हर महिला को बिना किसी कोताही के गुणवत्तापूर्ण और सुरक्षित इलाज की गारंटी दी जाती है। लेबर रूम की कमियों को दूर करने के लिए ‘लक्ष्य’ नाम का एक विशेष कार्यक्रम चलाया जा रहा है, जिससे अस्पतालों के प्रसव कक्षों को आधुनिक और पूरी तरह साफ-सुथरा बनाया जा सके।

पहली बार माँ बनने वाली महिलाओं के अच्छे खान-पान के लिए प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के तहत सीधे बैंक खाते में 5,000 रुपए भेजे जाते हैं, और मिशन शक्ति के तहत दूसरा बच्चा लड़की होने पर परिवार को 6,000 रुपए की मातृत्व सहायता दी जाती है। ग्रामीण इलाकों में खून की कमी को खत्म करने के लिए एनीमिया मुक्त भारत रणनीति के तहत स्कूलों और गाँवों में आयरन की दवाइयाँ मुफ्त बाँटी जा रही हैं और RCH पोर्टल के जरिए हर गर्भवती महिला का नाम लिखकर ऑनलाइन कंप्यूटर पर उसकी हर जाँच का हिसाब रखा जा रहा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन का वैश्विक नजरिया और 2030 का बड़ा संकल्प

विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO पूरी दुनिया के स्तर पर मातृ मृत्यु दर को एक बेहद गंभीर और संवेदनशील स्वास्थ्य समस्या मानता है। इस वैश्विक संगठन के अनुसार साल 2023 के आँकड़ों को देखें तो दुनिया भर में हर दिन गर्भावस्था और प्रसव से जुड़ी रोकी जा सकने वाली कमियों के कारण 700 से अधिक महिलाओं को अपनी जान गँवानी पड़ती थी, जिसका मतलब है कि हर दो मिनट में एक माँ दुनिया छोड़ देती थी।

WHO ने दुनिया के सभी देशों के साथ मिलकर सतत विकास लक्ष्य के तहत एक बड़ा संकल्प लिया है कि साल 2030 तक पूरी दुनिया में मातृ मृत्यु दर को घटाकर प्रति एक लाख जन्म पर 70 से भी नीचे लेकर आना है। WHO की रिपोर्ट साफ बताती है कि दुनिया भर में होने वाली कुल मातृ मौतों में से लगभग 92% मौतें सिर्फ कम आय वाले और पिछड़े देशों में होती हैं, जहाँ अमीर और गरीब के बीच स्वास्थ्य सुविधाओं का बहुत बड़ा अंतर है।

संगठन का मानना है कि इन मौतों के पीछे अस्पताल प्रणालियों की खराब जवाबदेही, आवश्यक चिकित्सा उपकरणों की कमी, दूरदराज के इलाकों में डॉक्टरों की अनुपलब्धता और महिलाओं के अधिकारों को कम प्राथमिकता देना जैसे बड़े सामाजिक कारण शामिल हैं। WHO लगातार अनुसंधान और तकनीकी दिशा-निर्देशों के जरिए भारत सहित दुनिया के तमाम विकासशील देशों की स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत कर रहा है।

संगठन का स्पष्ट संदेश है कि यदि गर्भावस्था और प्रसव के समय हर एक महिला को प्रशिक्षित डॉक्टर या दाई की सही देखरेख मिल जाए, तो दुनिया की अधिकांश माताओं को एक नया और सुरक्षित जीवन दिया जा सकता है।

बंगाल : BJP के डर से भागने लगे बांग्लादेशी, उत्तर 24 परगना जिले में 100+ घुसपैठिए परिवारों की भीड़ जमा दिखी

जिस बंगाल-बांग्लादेश बॉर्डर पर बांग्लादेशी घुसपैठियों की भीड़ लगने उन सभी सनातन विरोधियों के मुंह में जम गया है। अब नहीं कह पा रहे कि घुसपैठियों के नाम पर बीजेपी हिन्दू-मुस्लिम कर मुसलमानों को डरा रही है। प्रत्यक्ष को प्रमाण की जरुरत नहीं होती। ये CAA विरोध में बने शाहीन बागों से लेकर तथाकथित किसान आंदोलन आदि जितने भी धरने और प्रदर्शन हुए उन सब में  अधिकतर जमावड़ा पाकिस्तानी, बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों का होता था। धीरे-धीरे जितने भी आन्दोलनजीवी हैं सब घरों में छुपकर बैठ जाएंगे। 
सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि घुसपैठियों के निकलने पर भारत में उपद्रवों पर लगने वाली लगाम से परेशान होकर विदेशों में बैठे भारत विरोधी ताकतों ने क्रॉकरोच जनता पार्टी बनाई है।      
पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार बनते ही बांग्लादेशी घुसपैठियों को डर सताने लगा है, इसीलिए ये लोग वापस अपने देश लौट रहे हैं। ताजा नजारा उत्तर 24 परगना जिले के हाकिमपुर चेक पोस्ट का है, जहाँ 100 से ज्यादा बांग्लादेशी घुसपैठी अपने परिवारों के साथ बांग्लादेश लौटने के लिए इकट्ठे हुए।

दरअसल, यह नजारा मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का हालिया आदेश के बाद सामने आया है। 21 मई 2026 को सीएम शुभेंदु अधिकारी ने पुलिस और रेलवे सुरक्षा बल (RPF) को आदेश दिया कि कहीं भी कोई बांग्लादेशी घुसपैठी पकड़ा जाए, तो सीधा सीमा सुरक्षा दल (BSF) को सौंप दो। उन्होंने कहा कि अब इन्हें अदालत नहीं ले जाया जाएगा बल्कि सीधे वापस बांग्लादेश भेजा जाएगा।

सीएम शुभेंदु अधिकारी ने यह आदेश पिछले साल अप्रैल में संसद में पारित आव्रजन और विदेशी अधिनियम 2025 के तहत दिया। इस कानून के तहत विदेशियों के भारत में प्रवेश, प्रवास और निकास को नियंत्रित किया जा सकता है। इस आदेश के बाद बंगाल सरकार ने बांग्लादेशी घुसपैठियों के लिए ‘होल्डिंग सेंटर‘ बना रही है, जिसमें ‘डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट’ के तहत देश से निकाला जाएगा।

‘अजय राय ने मोदी की #$% फाड़ दी’: उत्तर प्रदेश कांग्रेस चीफ राय ने मोदी पर की घटिया टिप्पणी

                                         उत्तर प्रदेश कांग्रेस चीफ ने मोदी पर की अभद्र टिप्पणी
लगता मोदी विरोध में राहुल गाँधी ही नहीं शायद पूरी कांग्रेस अपना दिमागी संतुलन खो चुकी है। जिसे देख यह कहने में संकोच नहीं कि कांग्रेस को वोट देना मतदाता द्वारा भी अपने दिमागी दिवालियेपन का सबूत देगा।  

उत्तर प्रदेश की कांग्रेस इकाई के मुखिया अजय राय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर बेहद घटिया टिप्पणी की है। इसके बाद सोशल मीडिया पर जमकर बवाल मचा हुआ है। बीजेपी की IT सेल के मुखिया अमित मालवीय ने X पर राय का यह वीडियो शेयर किया है। यह वीडियो उत्तर प्रदेश के महोबा का है, जहाँ शुक्रवार (22 मई 2026) को राय एक दुष्कर्म पीड़िता से मिलने पहुँचे थे।

राय इस वीडियो में कह रहे हैं, “कह देना कि अजय राय ने मोदी की #$% फाड़ दी है।” मालवीय ने इस वीडियो को शेयर करते हुए लिखा, “कुछ दिन पहले जब यूपीपीसीसी चीफ अजय राय अस्वस्थ थे, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने सार्वजनिक रूप से उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की थी।”

उन्होंने आगे लिखा, “आज वही अजय राय प्रधानमंत्री के खिलाफ अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करते कैमरे में कैद हुए। यही कांग्रेस की राजनीति का स्तर है- शिष्टाचार का जवाब अभद्रता से।”

वहीं, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इस पर गंभीर नाराजगी जताई है। सीएम योगी ने X पर लिखा, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के विषय में उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा की गई अभद्र, असंसदीय और अक्षम्य टिप्पणी कांग्रेस के राजनीतिक कुसंस्कारों को प्रकट करती है।”

उन्होंने आगे लिखा, “पूर्व में कांग्रेस के ‘युवराज’ भी अपने कुसंस्कार का परिचय दे चुके हैं। कॉन्ग्रेस अब हताशा, निराशा, कुंठा और मानसिक दिवालियेपन के शीर्ष स्तर पर पहुँच चुकी है। अब देश वासियों से क्षमा माँगने लायक भी स्थिति उनकी नहीं रही है।”

बंगाल में योगी मॉडल लागू करेगी BJP सरकार, उपद्रवियों से वसूला जाएगा नुकसान: डायमंड हार्बर से बोले मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी


पश्चिम बंगाल में बीजेपी की सरकार बनने के बाद कानून-व्यवस्था को लेकर सख्त रुख अपनाया जा रहा है। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने शनिवार (16 मई 2026) को डायमंड हार्बर क्षेत्र में एक अहम प्रशासनिक बैठक कर पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की।

यह इलाका लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस (TMC) का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। बैठक के बाद मुख्यमंत्री ने साफ संकेत दिए कि अब राज्य में सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी और हिंसा या तोड़फोड़ की कीमत सीधे आरोपियों को चुकानी पड़ेगी।

आसनसोल में हुई हिंसा का जिक्र करते हुए सुवेंदु ने कहा, “आसनसोल में जो अप्रिय घटना हुई थी, उस पर हमारी सरकार ने त्वरित कार्रवाई की है। पुलिस ने अब तक इस मामले में संलिप्त 15 उपद्रवियों को गिरफ्तार कर लिया है। तोड़-फोड़ और हिंसा के लिए जिम्मेदार इन सभी आरोपियों को पुलिस हिरासत, रिमांड और कड़ी पूछताछ का सामना करना पड़ेगा।”

उन्होंने कहा कि राज्य में किसी भी स्थिति में अराजकता फैलाने की अनुमति नहीं दी जाएगी और पुलिस को पूरी सख्ती के साथ कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।

‘योगी मॉडल’ की तर्ज पर भरपाई की नीति, सीएम ने कहा- एजेंसियों को दी जाएगी खुली छूट

मुख्यमंत्री ने उत्तर प्रदेश की तर्ज पर नई नीति लागू करने का संकेत देते हुए कहा कि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वालों से पूरी क्षतिपूर्ति वसूली जाएगी। उन्होंने कहा, “किसी को भी बंगाल में सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने की इजाजत नहीं दी जाएगी।”

उन्होंने आगे कहा, “आसनसोल घटना या भविष्य में होने वाली किसी भी ऐसी तोड़फोड़ के नुकसान की शत-प्रतिशत भरपाई सीधे आरोपियों के निजी फंड और संपत्तियों से कराई जाएगी। यह कदम राज्य में कानून का राज स्थापित करने के लिए बेहद जरूरी है।”

अंत में सुवेंदु कहा, “पूर्ववर्ती व्यवस्था के दौरान CID और अन्य राज्य स्तरीय जाँच एजेंसियों का कानून-व्यवस्था सुधारने में पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं किया गया था। हमारी सरकार अब इन पेशेवर एजेंसियों को खुली छूट देगी ताकि वे बिना किसी राजनीतिक दबाव के अपराधियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई कर सकें।”

वाह शुभेंदु अधिकारी वाह ! दिल जीत लिया

कांग्रेस के हटते ही धीरे धीरे नर्क में बदले जा रहे बंगाल में 50 बरस बाद लागू कर दिया योगी मॉडल! सोमवार से सभी स्कूलों में वन्देमातरम अनिवार्य। धर्मस्थलों से हटेंगे लाउडस्पीकर। गौ हत्या और गौ कटान पर पूरी तरह प्रतिबंध। गरीबों और मजदूरों के लिए 5 रूपए में माछ भात । सीमावर्ती तमाम जिलों में बॉर्डर पर फैंसिंग के लिए 6 महीनों के भीतर लैंड ट्रान्सफर। मदरसों की गतिविधियों की पड़ताल, राष्ट्र विरोधी गतिविधियों पर सख्त एक्शन। गुंडा माफियाओं के खिलाफ ऑपरेशन लंगड़ा। घुसपैठियों को चुनचुनकर निकालने की तैयारी।

80 साल बाद बंगाल में खुशियों की बहार। छह दिनों में ही शुभेंदु के ताबड़तोड़ फैसलों से ममता बनर्जी इतनी बौखलाई कि वकीलों की ड्रेस और काला कोट पहनकर हाईकोर्ट पहुंच गई। छह ही दिनों में सरकार पर आरोपों की बौछार कर दी। अरी दीदी सब्र करो थोड़ा धीरज धरो। अभी शुभेंदु के पास 5 साल ही नहीं हैं, लंबा भविष्य भी है। बंगाल की जनता ममता से इसकदर ऊब चुकी है कि उनकी सूरत नहीं देखनी चाहते। तभी तो ममता जैसे ही कोर्ट से बाहर निकलीं, लोगों ने चोर चोर के नारे लगाने शुरू कर दिए। याद कीजिए ऐसे ही नारे अभी हाल ही में महुआ मोइत्रा के विरुद्ध भी लगे जब वे प्लेन में कोलकाता से दिल्ली पहुंची। बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने बंगाल बार से ममता के लाइसेंस की बाबत रिकॉर्ड तलब किया है।
तृणमूल को अभी यह झेलना होगा, ममता समझ लें। थोड़ा रुकिए ममता दीदी, आपके भतीजे अभिषेक को अभी काफी भुगतना है। अपने भ्रष्टाचार, कटमनी, तोलाबाजी और धमकियों के लिए अभिषेक को अभी जेलें भी काटनी हैं। यही नहीं घुसपैठियों की बदौलत बंगाल की डेमोग्राफी बदलने वाली ममता को राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और केंद्रीय जांच एजेंसियों को बंधक बनाने लेने के लिए काफी कुछ झेलना है। अभिषेक को मुख्यमंत्री पद देकर दिल्ली की राजनीति करते हुए प्रधानमंत्री बनने का स्वप्न तो चकनाचूर हुआ। हां सब ठीक चला तो वे राज्यसभा के रास्ते दिल्ली पहुंचकर दिल्ली में इंडी का नेतृत्व संभाल सकती हैं। बशर्ते कि ममता से मुंह फेर चुके राहुल गांधी अपना सपना वापस ले लें।
तो ममता बनर्जी, आपका खेल खत्म हो चुका है। वामपंथियों ने 35 साल और अपने 15 साल बड़े जुल्म ढहाए। इस बॉर्डर स्टेट को भारत से अलग करने का षड्यंत्र किया, राज्यपाल को कुछ नहीं समझा। आपकी तमन्ना थी कि केन्द्र सरकार बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगा दे ताकि आप सहानुभूति का वोट हासिल कर लें। लेकिन दीदी आप शाह मोदी को अब तक गलत पहचानती रही। आ जाएगा, जल्द समझ आ जाएगा कि देश के सिस्टम के ख़िलाफ़ जाना भी देशद्रोह के समान है। बंगाल के साथ साथ पूरे देश की जनता समझ गई है कि आपके समर्थन में बांग्लादेश और पाकिस्तान में प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं? समझ जाओ दीदी वक्त बदल गया है।

बड़बोले राहुल का केरलम में मुस्लिम-ईसाई वोटबैंक के आगे surrender; नहीं चुन पा रहे मुख्यमंत्री; हिंदू समीकरण और बीजेपी के बढ़ते असर ने बढ़ाया दबाव

                                                                                                         प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार - AI)
केरल विधानसभा चुनाव के नतीजे आए आज 11 दिन बीत चुके हैं लेकिन राज्य में सरकार गठन को लेकर तस्वीर अब तक साफ नहीं हो पाई है। चुनाव जीतने वाला कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) अभी तक मुख्यमंत्री के चेहरे पर अंतिम फैसला नहीं कर सका है। जबकि सारा विपक्ष INDI गठबंधन के एकजुट होने का ढोल पीटता नज़र आता है, लेकिन केरलम में सब एक दूसरे के दुश्मन। कोई राहुल प्रियंका की बात तक सुनने को तैयार नहीं। क्योकि राहुल की सुई के सी वेणुगोपालन पर अटकी है। स्थानीय कांग्रेस वेणुगोपालन को नहीं चाहती। इस लड़ाई में राहुल और प्रियंका के खिलाफ आवाज़ बुलंद हो गयी है। इस हिसाब से लगता है अगर मुख्यमंत्री चुन भी लिया तो सरकार का अपना कार्यकाल पूरा करना मुश्किल होगा और वामपंथी भी कांग्रेस की हर चाल पर गिद्ध की नज़र रखे हुए है।  

आमतौर पर स्पष्ट जनादेश मिलने के बाद राजनीतिक दल तेजी से नेतृत्व तय कर लेते हैं ताकि जनता के बीच स्थिरता और आत्मविश्वास का संदेश जाए। लेकिन केरल में कांग्रेस की स्थिति अलग दिखाई दे रही है।

यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में लगातार यह सवाल उठ रहा है कि आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी है जिसके कारण कांग्रेस मुख्यमंत्री के नाम पर सहमति नहीं बना पा रही। 

केरल की राजनीति में सामाजिक संतुलन और कांग्रेस की चुनौती

केरलम उन राज्यों में है जहाँ राजनीति सीधे सामाजिक समीकरणों से जुड़ी हुई है। यही सामाजिक समीकरण कांग्रेस का सिर दर्द बने हुए हैं। कॉन्ग्रेस और मुस्लिम लीग ने जो केरल चुनाव जीती है वो मुस्लिमों और ईसाइयों के दम पर जीता है। इसे आँकड़ों से भी समझने की कोशिश करते हैं।

अगर आँकड़ों की बात करें तो 140 सदस्यीय केरलम विधानसभा में इस बार कुल 35 मुस्लिम विधायक चुने गए हैं, जो लगभग 25 प्रतिशत है। इनमें सबसे ज्यादा हिस्सा UDF गठबंधन के पास है, जिसमें कांग्रेस और IUML मिलाकर कुल 30 मुस्लिम विधायक हैं, यानी करीब 85.7 प्रतिशत।

अकेले IUML के 22 और कांग्रेस के 8 विधायक इस आँकड़े में शामिल हैं। दूसरी तरफ LDF गठबंधन के पास कुल 5 मुस्लिम विधायक हैं, जिनमें CPI(M) के 4 और CPI का 1 विधायक शामिल है, यानी करीब 14.3 प्रतिशत।

अगर पार्टीवार देखें तो कॉन्ग्रेस के कुल 63 विधायकों में 8 मुस्लिम विधायक हैं, जो लगभग 12.7 प्रतिशत है। IUML के सभी 22 विधायक मुस्लिम हैं, जबकि CPI(M) के 4 और CPI का 1 विधायक मुस्लिम समुदाय से आते हैं।

यहाँ हिंदू आबादी लगभग 54 प्रतिशत, मुस्लिम आबादी करीब 26 प्रतिशत और ईसाई आबादी लगभग 18 प्रतिशत मानी जाती है। ये आँकड़े जनगणना और विभिन्न आधिकारिक रिपोर्ट्स के आधार पर सामने आते रहे हैं।

अब कांग्रेस के सामने इसी समीकरण को साधना सबसे बड़ी चुनौती है। यानी वो चुनाव मुस्लिम और ईसाइयों के दम पर जीती है तो ऐसे में ये गुट अपने समुदाय का मुख्यमंत्री होने को लेकर जोर लगा रहे हैं और कांग्रेस भी इनसे दबाव में है। लेकिन वो अंतिम फैसला नहीं ले पा रही है। क्योंकि अगर वो मुस्लिम या ईसाई को मुख्यमंत्री चुनती है तो उसके लिए राज्य के सबसे बड़े समुदाय यानी हिंदुओं को साधना मुश्किल हो जाएगा।

वहीं, अगर वो हिंदू मुख्यमंत्री चुनती है, जो शायद वो चुने भी तो फिर अल्पसंख्यकों का भरोसा कांग्रेस से एक बार फिर उठता दिखेगा और वो भी फिर CPM की और जा सकते हैं। वोटों की इस लड़ाई में बीजेपी का एक अहम खिलाड़ी बनते जाना कांग्रेस की चुनौतियों को और बढ़ा रहा है।

बीजेपी की बढ़ती मौजूदगी ने कांग्रेस की चिंता बढ़ाई

कई सालों तक केरलम को ऐसा राज्य माना जाता रहा जहाँ बीजेपी चुनावी तौर पर सीमित प्रभाव वाली पार्टी थी। लेकिन पिछले एक दशक में तस्वीर धीरे-धीरे बदली है। बीजेपी का वोट शेयर लगातार बढ़ा है।
2019 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद के चुनावों में पार्टी ने कई सीटों पर अपनी मौजूदगी मजबूत की। भले ही सीटों के हिसाब से बीजेपी को बड़ी सफलता नहीं मिली हो, लेकिन वोट प्रतिशत और संगठनात्मक विस्तार ने बाकी दलों को सतर्क जरूर किया है।
इसके पीछे RSS की लंबे समय से चली आ रही जमीनी मौजूदगी को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। केरलम उन राज्यों में रहा है जहाँ RSS ने दशकों तक कैडर आधारित नेटवर्क तैयार किया।
यही नेटवर्क अब बीजेपी के राजनीतिक विस्तार में मददगार माना जाता है। बीजेपी फिलहाल सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं लड़ रही बल्कि वह खुद को कांग्रेस और वाम दलों के बीच तीसरे विकल्प से मुख्य विपक्षी ताकत में बदलने की कोशिश कर रही है।
यही कारण है कि कांग्रेस कोई ऐसा राजनीतिक संदेश नहीं देना चाहती जिससे बीजेपी को नए वोटरों के बीच जगह बनाने का मौका मिले। और ऐसे वक्त में कांग्रेस अगर किसी ईसाई या मुस्लिम चेहरे को आगे बढ़ाती है तो BJP का यह नैरेटिव और मजबूत होगा कि कांग्रेस हिंदुओं को प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व से ज्यादा कुछ नहीं देना चाहती। ये बीजेपी के विस्तार से लिए एक फर्टाइल जमीन तैयार करना होगा।

पश्चिम बंगाल का उदाहरण कांग्रेस को क्यों परेशान करता है

पश्चिम बंगाल में बीजेपी की बंपर विजय भी कांग्रेस को परेशान कर रही हैं। इसे पीछे एक खास वजह भी है, वो है 3 का आँकड़ा। इस चुनाव में बीजेपी ने केरल में 3 सीटें जीते हैं, ये उतनी ही सीटें हैं जितनी BJP ने 2016 के बंगाल चुनाव में जीती थीं। 10 सालों में BJP में अपनी तस्वीर पूरी तरह बदल दी है। इस बार बीजेपी ने बंगाल में 293 में से 207 सीटें जीती हैं।
कांग्रेस का मुख्यमंत्री चुनने का कन्फ्यूजन बीजेपी की बढ़ती ताकत से और अधिक गंभीर हो रहा है। कांग्रेस ऐसा कोई मौका BJP या वामपंथियों को नहीं देना चाहती है जिससे उसके लिए संकट आए लेकिन मौजूदा हालात में ऐसा होना लगभग असंभव है।
अब केरल में कांग्रेस के सामने एक तरफ पारंपरिक अल्पसंख्यक समर्थन को बनाए रखने की चुनौती है, दूसरी तरफ हिंदू वोटरों के बीच अपनी स्वीकार्यता मजबूत रखने की जरूरत है। इसके साथ बीजेपी का बढ़ता राजनीतिक विस्तार और बदलता चुनावी माहौल कांग्रेस की मुश्किल को और बढ़ा रहा है।
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आने वाले समय में कांग्रेस किस चेहरे पर भरोसा करती है, यह सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन का फैसला नहीं होगा। यह तय करेगा कि पार्टी अपने पुराने सामाजिक गठबंधन को कितनी मजबूती से बचा पाती है और बदलती भारतीय राजनीति में खुद को किस तरह ढालती है। अगर देखा जाए तो कांग्रेस के सामने असली परीक्षा सिर्फ मुख्यमंत्री चुनने की नहीं बल्कि अपने पूरे सामाजिक गठबंधन को एकजुट बनाए रखने की है।

बंगाल : मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी को बॉर्डर पर दफन करने की धमकी, बांग्लादेश का मौलाना बोला- मुस्लिम हुए असुरक्षित तो हिंदुओं को नहीं छोड़ेंगे; बंगाल ही नहीं पूरे भारत से बांग्लादेशियों का सफाया होना चाहिए

                        बांग्लादेश के मौलाना ने हिंदुओं और शुभेंदु अधिकारी को दी धमकी (फोटो साभार: NBT)
जब से पश्चिमी बंगाल में बीजेपी सरकार बनी है, मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने प्रदेश से बांग्लादेशियों को बाहर करने की बात कही है मुस्लिम कट्टरपंथियों की जुबान बहुत ज्यादा खुलने लगी है। क्या इन कट्टरपंथियों को भी सबक सिखाने का अध्याय बंगाल से ही लिखा जाएगा? जिस तरह चुनाव में हिन्दुओं ने एकजुटता दिखाई है वही इन कट्टरपंथियों और इनके समर्थकों को सबक सिखाने के लिए दिखानी होगी। बहुत हो गया हिन्दू मुसलमान। ये वही कट्टरपंथी हैं जिन्होंने हिन्दू -मुसलमानों के बीच नफरत के बीज बोये हैं। दूसरे, बांग्लादेशियों को बाहर करने के बंगाल सरकार के फैसले से कट्टरपंथियों की बौखलाहट जाहिर कर रही है कि बंगाल में कितने ज्यादा बांग्लादेशियों को पिछली सरकारों ने दामाद बनाकर रखा हुआ था। 

हुमायूँ कबीर साथ-साथ बांग्लादेशी मौलाना भी बंगाल मुख्यमंत्री को धमकी देने मैदान में आ गए हैं यानि ये इस बात को साबित करता है कि यदि बंगाल से ही बांग्लादेशियों को वापस भेजना शुरू होते ही बांग्लादेश पाकिस्तान की तरह भुखमरी के रस्ते पर आ जाएगा। बंगाल से बाहर भी जितने बांग्लादेशी घुसे हुए है सभी को बाहर करना होगा। भारत सरकार को इन धमकियों को गंभीरता से लेते हुए बांग्लादेश सरकार से सख्ती के साथ जवाब तलब करना होगा। और बांग्लादेश को दी जाने वाली आर्थिक मदद बंद करनी होगी। जिस तरह पाकिस्तान को सबक सिखाया जा रहा है वही बांग्लादेश के साथ होना चाहिए। 

जब पाकिस्तानी आतंकियों द्वारा हिन्दू महिलाओं का उजाड़ने पर Operation Sindoor हो सकता है फिर बांग्लादेश में सैकड़ों हिन्दुओं के मारे जाने पर भारत सरकार खामोश क्यों? बांग्लादेश को कब सबक सिखाया जाएगा?   

 

पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार बनने के बाद से पड़ोसी देश बांग्लादेश में खलबली मची हुई है। आए दिन बांग्लादेशी मौलाना भारत के खिलाफ जहर उगल रहे हैं। ताजा बयान बांग्लादेश के कट्टरपंथी मौलाना इनायतुल्लाह अब्बासी का है, जिसने कहा कि बंगाल में मुस्लिम सुरक्षित नहीं है, तो बांग्लादेश में भी हिंदुओं को सुरक्षित नहीं रहने दिया जाएगा। उधर, शुभेंदु अधिकारी को जान से मारने की धमकी देने का भी एक वीडियो सामने आया है।

मौलाना अब्बासी कहता है, “भारत में हिंदुओं के लिए यहूदी मॉडल की तरह एक हिंदू-केंद्रित व्यवस्था बनाना नामुमकिन हो जाएगा। बीजेपी, जिसने अब बंगाल में सत्ता संभाल ली है, पहले से ही इसी दिशा में आगे बढ़ रही है। गोमांस बेचने वाली दुकानों को तोड़ा जा रहा है और मुस्लिमों पर जुल्म और अत्याचार किए जा रहे हैं। इसका हर हाल में विरोध किया जाना चाहिए।”

अब्बासी ने बंगाल में मुस्लिमों पर कथित शोषण का बदला बांग्लादेश में हिंदुओं से लेने की बात कही। उसने कहा, “इस स्थिति में बांग्लादेश की तारिक रहमान सरकार का भी एक बहुत ही अहम फर्ज है। भारत को एक सख्त चेतावनी दी जानी चाहिए कि हम उनके साथ अपने व्यापारिक संबंध तोड़ देंगे। इसके अलावा, यह भी साफ कर दिया जाना चाहिए कि अगर बंगाल में मुस्लिम सुरक्षित नहीं है, तो बांग्लादेश में भी हिंदुओं को सुरक्षित रहने की इजाजत नहीं दी जाएगी।”

ये वही मौलाना अब्बासी है, जो भारत विरोधी, भड़काऊ भाषणों और नफरती बयानों के लिए जाना जाता है। अब्बासी ने पहले भी भारत-विरोधी बयान दिया था कि बांग्लादेश के मुस्लिम दिल्ली में इस्लाम का झंडा फहराएँगे और मदरसों को हथियारों से लैस छावनी में बदल देंगे। वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी भी कर चुका है।

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बंगाल में बाबरी की नींव रखने वाले हुमायूँ कबीर ने CM शुभेंदु अधिकारी को दी धमकी, MLA ने बांग्लादेशी
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शुभेंदु अधिकारी को जान से मारने की धमकी

ऐसी ही एक और भारत-विरोधी बयान सामने आया है, जिसमें बांग्लादेशी मुस्लिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी को जान से मारने की धमकी देता है। द इंकलाब नाम से फेसबुक पेज से प्रसारित वीडियो में बांग्लादेशी का एक मुस्लिम व्यक्ति शुभेंदु अधिकारी को सीमा पर ही दफनाने और उन पर हमला करने की धमकी दे रहा है। हालाँकि, इस वीडियो की पुष्टि नहीं हो पाई है, पुलिस इसकी जाँच कर रही है।