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बड़बोले राहुल का केरलम में मुस्लिम-ईसाई वोटबैंक के आगे surrender; नहीं चुन पा रहे मुख्यमंत्री; हिंदू समीकरण और बीजेपी के बढ़ते असर ने बढ़ाया दबाव

                                                                                                         प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार - AI)
केरल विधानसभा चुनाव के नतीजे आए आज 11 दिन बीत चुके हैं लेकिन राज्य में सरकार गठन को लेकर तस्वीर अब तक साफ नहीं हो पाई है। चुनाव जीतने वाला कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) अभी तक मुख्यमंत्री के चेहरे पर अंतिम फैसला नहीं कर सका है। जबकि सारा विपक्ष INDI गठबंधन के एकजुट होने का ढोल पीटता नज़र आता है, लेकिन केरलम में सब एक दूसरे के दुश्मन। कोई राहुल प्रियंका की बात तक सुनने को तैयार नहीं। क्योकि राहुल की सुई के सी वेणुगोपालन पर अटकी है। स्थानीय कांग्रेस वेणुगोपालन को नहीं चाहती। इस लड़ाई में राहुल और प्रियंका के खिलाफ आवाज़ बुलंद हो गयी है। इस हिसाब से लगता है अगर मुख्यमंत्री चुन भी लिया तो सरकार का अपना कार्यकाल पूरा करना मुश्किल होगा और वामपंथी भी कांग्रेस की हर चाल पर गिद्ध की नज़र रखे हुए है।  

आमतौर पर स्पष्ट जनादेश मिलने के बाद राजनीतिक दल तेजी से नेतृत्व तय कर लेते हैं ताकि जनता के बीच स्थिरता और आत्मविश्वास का संदेश जाए। लेकिन केरल में कांग्रेस की स्थिति अलग दिखाई दे रही है।

यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में लगातार यह सवाल उठ रहा है कि आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी है जिसके कारण कांग्रेस मुख्यमंत्री के नाम पर सहमति नहीं बना पा रही। 

केरल की राजनीति में सामाजिक संतुलन और कांग्रेस की चुनौती

केरलम उन राज्यों में है जहाँ राजनीति सीधे सामाजिक समीकरणों से जुड़ी हुई है। यही सामाजिक समीकरण कांग्रेस का सिर दर्द बने हुए हैं। कॉन्ग्रेस और मुस्लिम लीग ने जो केरल चुनाव जीती है वो मुस्लिमों और ईसाइयों के दम पर जीता है। इसे आँकड़ों से भी समझने की कोशिश करते हैं।

अगर आँकड़ों की बात करें तो 140 सदस्यीय केरलम विधानसभा में इस बार कुल 35 मुस्लिम विधायक चुने गए हैं, जो लगभग 25 प्रतिशत है। इनमें सबसे ज्यादा हिस्सा UDF गठबंधन के पास है, जिसमें कांग्रेस और IUML मिलाकर कुल 30 मुस्लिम विधायक हैं, यानी करीब 85.7 प्रतिशत।

अकेले IUML के 22 और कांग्रेस के 8 विधायक इस आँकड़े में शामिल हैं। दूसरी तरफ LDF गठबंधन के पास कुल 5 मुस्लिम विधायक हैं, जिनमें CPI(M) के 4 और CPI का 1 विधायक शामिल है, यानी करीब 14.3 प्रतिशत।

अगर पार्टीवार देखें तो कॉन्ग्रेस के कुल 63 विधायकों में 8 मुस्लिम विधायक हैं, जो लगभग 12.7 प्रतिशत है। IUML के सभी 22 विधायक मुस्लिम हैं, जबकि CPI(M) के 4 और CPI का 1 विधायक मुस्लिम समुदाय से आते हैं।

यहाँ हिंदू आबादी लगभग 54 प्रतिशत, मुस्लिम आबादी करीब 26 प्रतिशत और ईसाई आबादी लगभग 18 प्रतिशत मानी जाती है। ये आँकड़े जनगणना और विभिन्न आधिकारिक रिपोर्ट्स के आधार पर सामने आते रहे हैं।

अब कांग्रेस के सामने इसी समीकरण को साधना सबसे बड़ी चुनौती है। यानी वो चुनाव मुस्लिम और ईसाइयों के दम पर जीती है तो ऐसे में ये गुट अपने समुदाय का मुख्यमंत्री होने को लेकर जोर लगा रहे हैं और कांग्रेस भी इनसे दबाव में है। लेकिन वो अंतिम फैसला नहीं ले पा रही है। क्योंकि अगर वो मुस्लिम या ईसाई को मुख्यमंत्री चुनती है तो उसके लिए राज्य के सबसे बड़े समुदाय यानी हिंदुओं को साधना मुश्किल हो जाएगा।

वहीं, अगर वो हिंदू मुख्यमंत्री चुनती है, जो शायद वो चुने भी तो फिर अल्पसंख्यकों का भरोसा कांग्रेस से एक बार फिर उठता दिखेगा और वो भी फिर CPM की और जा सकते हैं। वोटों की इस लड़ाई में बीजेपी का एक अहम खिलाड़ी बनते जाना कांग्रेस की चुनौतियों को और बढ़ा रहा है।

बीजेपी की बढ़ती मौजूदगी ने कांग्रेस की चिंता बढ़ाई

कई सालों तक केरलम को ऐसा राज्य माना जाता रहा जहाँ बीजेपी चुनावी तौर पर सीमित प्रभाव वाली पार्टी थी। लेकिन पिछले एक दशक में तस्वीर धीरे-धीरे बदली है। बीजेपी का वोट शेयर लगातार बढ़ा है।
2019 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद के चुनावों में पार्टी ने कई सीटों पर अपनी मौजूदगी मजबूत की। भले ही सीटों के हिसाब से बीजेपी को बड़ी सफलता नहीं मिली हो, लेकिन वोट प्रतिशत और संगठनात्मक विस्तार ने बाकी दलों को सतर्क जरूर किया है।
इसके पीछे RSS की लंबे समय से चली आ रही जमीनी मौजूदगी को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। केरलम उन राज्यों में रहा है जहाँ RSS ने दशकों तक कैडर आधारित नेटवर्क तैयार किया।
यही नेटवर्क अब बीजेपी के राजनीतिक विस्तार में मददगार माना जाता है। बीजेपी फिलहाल सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं लड़ रही बल्कि वह खुद को कांग्रेस और वाम दलों के बीच तीसरे विकल्प से मुख्य विपक्षी ताकत में बदलने की कोशिश कर रही है।
यही कारण है कि कांग्रेस कोई ऐसा राजनीतिक संदेश नहीं देना चाहती जिससे बीजेपी को नए वोटरों के बीच जगह बनाने का मौका मिले। और ऐसे वक्त में कांग्रेस अगर किसी ईसाई या मुस्लिम चेहरे को आगे बढ़ाती है तो BJP का यह नैरेटिव और मजबूत होगा कि कांग्रेस हिंदुओं को प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व से ज्यादा कुछ नहीं देना चाहती। ये बीजेपी के विस्तार से लिए एक फर्टाइल जमीन तैयार करना होगा।

पश्चिम बंगाल का उदाहरण कांग्रेस को क्यों परेशान करता है

पश्चिम बंगाल में बीजेपी की बंपर विजय भी कांग्रेस को परेशान कर रही हैं। इसे पीछे एक खास वजह भी है, वो है 3 का आँकड़ा। इस चुनाव में बीजेपी ने केरल में 3 सीटें जीते हैं, ये उतनी ही सीटें हैं जितनी BJP ने 2016 के बंगाल चुनाव में जीती थीं। 10 सालों में BJP में अपनी तस्वीर पूरी तरह बदल दी है। इस बार बीजेपी ने बंगाल में 293 में से 207 सीटें जीती हैं।
कांग्रेस का मुख्यमंत्री चुनने का कन्फ्यूजन बीजेपी की बढ़ती ताकत से और अधिक गंभीर हो रहा है। कांग्रेस ऐसा कोई मौका BJP या वामपंथियों को नहीं देना चाहती है जिससे उसके लिए संकट आए लेकिन मौजूदा हालात में ऐसा होना लगभग असंभव है।
अब केरल में कांग्रेस के सामने एक तरफ पारंपरिक अल्पसंख्यक समर्थन को बनाए रखने की चुनौती है, दूसरी तरफ हिंदू वोटरों के बीच अपनी स्वीकार्यता मजबूत रखने की जरूरत है। इसके साथ बीजेपी का बढ़ता राजनीतिक विस्तार और बदलता चुनावी माहौल कांग्रेस की मुश्किल को और बढ़ा रहा है।
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आने वाले समय में कांग्रेस किस चेहरे पर भरोसा करती है, यह सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन का फैसला नहीं होगा। यह तय करेगा कि पार्टी अपने पुराने सामाजिक गठबंधन को कितनी मजबूती से बचा पाती है और बदलती भारतीय राजनीति में खुद को किस तरह ढालती है। अगर देखा जाए तो कांग्रेस के सामने असली परीक्षा सिर्फ मुख्यमंत्री चुनने की नहीं बल्कि अपने पूरे सामाजिक गठबंधन को एकजुट बनाए रखने की है।