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घुसपैठियों को ‘बेचारा’ दिखा BBC ने फैलाया बंगाल में SIR पर प्रोपेगेंडा, 90 लाख नाम हटने पर रोया ‘मुस्लिम प्रताड़ना’ का रोना

एक समय था जब भारतीय BBC द्वारा प्रसारित किसी समाचार पर आंख मीच कर विश्वास करते थे, लेकिन कालचक्र ऐसा घुमा वही BBC बन रहा है (बी)Bhramit (बी)Biased (सी)Campaigner, भारत विरोधी आज इसी BBC का इस्तेमाल कर रहे हैं और हमारा कहलाए जाने वाला राष्ट्रीय मीडिया खामोश रहता है। या यूँ समझा जाए कि "यार जो प्रकाशित/प्रसारित करना है करो हम चुप रहेंगे। तुम भी अपनी रोजी-रोटी कमाओ और हम भी।" यह आम नागरिक से लेकर राजनेताओं के चिंतन का विषय है।             

चुनावी राज्य पश्चिम बंगाल में किए गए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के तहत करीब 90 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए हैं। चुनाव आयोग ने भी पुष्टि की कि संशोधन प्रक्रिया के अंतिम चरण में 27,16,393 मतदाता अयोग्य पाए गए। इसके बाद इस मुद्दे को लेकर कुछ इस्लामी-वामपंथी झुकाव वाले राजनीतिक और मीडिया गुटों ने मुस्लिम-पीड़ित की कहानी को हवा देना शुरू कर दिया।

“Political turmoil in Indian border state as nine million lose voting rights” हेडलाइन के साथ इस आर्टिकल में स्निग्धेंदु भट्टाचार्य ने एक तरह का डर का माहौल बनाने की कोशिश की। उन्होंने नाम हटाए जाने को राजनीतिक साजिश के तौर पर पेश करते हुए इसे ‘वोटिंग अधिकार छिन जाने’ का मामला बताया, जो राज्य की नीतियों को प्रभावित कर सकता है। अपने इस एकतरफा लेख में कोलकाता के इस तथाकथित ‘स्वतंत्र पत्रकार’ ने खासतौर पर मुस्लिमों को निशाना बनाए जाने की एक काल्पनिक कहानी को ज्यादा उभारने की कोशिश की।

इस आर्टिकल में चालाकी से आँकड़े, भौगोलिक संदर्भ, राजनीतिक बयान और सहानुभूति जगाने वाली व्यक्तिगत कहानियों को इस तरह पेश किया गया है कि पाठक खुद ही इन बिंदुओं को जोड़कर एक कथित साजिश का अंदाजा लगाने लगें। मानो बंगाल के मुस्लिमों के वोटिंग अधिकार छीनने की कोशिश हो रही हो, जो आमतौर पर BJP के खिलाफ वोट करते हैं।

12 अप्रैल 2026 को प्रकाशित BBC के इस आर्टिकल में लिखा गया है, “भारत की बांग्लादेश के साथ 4,096 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है, जो काफी हद तक खुली और कुछ हिस्सों में नदी के किनारे-किनारे गुजरती है। इसका एक बड़ा हिस्सा बंगाल से होकर जाता है। यही वजह है कि राज्य में प्रवासन और मतदाता सूची को लेकर होने वाली बहस को एक संवेदनशील और राजनीतिक रूप दे दिया गया है।”

स्निगधेंदु भट्टाचार्य ने इशारों-इशारों में यह जताने की कोशिश की कि सुप्रीम कोर्ट ने सही फैसला नहीं लिया, जब उसने सभी ‘विवाद सुलझाए बिना ही इस अप्रैल में चुनाव कराने की अनुमति दे दी।’ उन्होंने यह भी लिखा की इस वजह से ‘करीब 27 लाख मतदाताओं का भविष्य अब भी अनिश्चित’ बना हुआ है।

बंगाल SIR में मतदाता हटाना पारदर्शी जाँच या मुस्लिमों का मत छीनने की कोशिश?

दिसंबर 2025 में चुनाव आयोग ने ड्राफ्ट मतदाता सूची से 58.25 लाख नाम हटाए थे। ये वे लोग थे जो या तो मृत पाए गए, कहीं और शिफ्ट हो चुके थे, लंबे समय से अनुपस्थित थे या जिनके नाम दोहराए गए थे। इसके बाद कुल मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 7.04 करोड़ रह गई। फिर 28 फरवरी को अंतिम सूची से करीब 5 लाख और नाम हटाए गए, जिससे कुल मिलाकर हटाए गए नामों की संख्या करीब 91 लाख के आसपास पहुँच गई।

शुरुआत में 60.06 लाख मतदाताओं को जाँच के दायरे में रखा गया था, जिनमें से लगभग आधे लोग अयोग्य पाए गए। सबसे ज्यादा नाम मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद जिले में हटाए गए, जहाँ 11 लाख संदिग्ध मतदाताओं में से 4.55 लाख से ज्यादा अयोग्य निकले। मुर्शिदाबाद की सीमा बांग्लादेश से लगती है। यहाँ बांग्लादेशियों की अवैध घुसपैठ और भीड़ जुटाकर हिंसा जैसे मुद्दे लंबे समय से चर्चा में रहे हैं। ऐसे में बड़ी संख्या में अयोग्य मतदाताओं का सामने आना इसी पृष्ठभूमि से जुड़ा माना जा रहा है। मालदा और अन्य सीमावर्ती जिलों में भी कुछ ऐसी ही स्थिति देखने को मिली।

सीमावर्ती इलाकों में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटना और बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ की बढ़ती संख्या जैसे संकेत इस बात की ओर इशारा करते हैं कि इन जिलों की धार्मिक जनसंख्या संरचना को बदलने की एक सुनियोजित कोशिश हो सकती है। हालाँकि, इस पूरे मामले पर पर्दा डालने के लिए कुछ इस्लामी-वामपंथी झुकाव वाले गुट यह कहानी गढ़ रहें है कि चुनाव आयोग और BJP मिलकर मुस्लिमों को मनमाने तरीके से वोटिंग अधिकार से वंचित कर रहे हैं।

चुनाव आयोग के आधिकारिक आँकड़े बताते हैं कि हटाए गए ज्यादातर नाम सामान्य श्रेणियों में आते हैं। जैसे मृतक, लंबे समय से अनुपस्थित, स्थायी रूप से कहीं और शिफ्ट हो चुके लोग, दिए गए पते पर न मिलने वाले या फर्जी एंट्रीज। मतदाता सूची में इस तरह की गड़बड़ियाँ आम होती हैं और SIR अभियान का मकसद ही इन्हें ठीक करना था। यह प्रक्रिया सिर्फ बंगाल में ही नहीं, बल्कि अब तक शामिल 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भी इसी उद्देश्य से चलाई गई। ताकि घोस्ट वोटर, पलायन और पुरानी एंट्रीज जैसी समस्याओं को दूर किया जा सके।

SIR में चुनाव आयोग ने तय प्रक्रिया का पालन किया, जबकि उसे राज्य की TMC सरकार के दबाव और विरोध का भी सामना करना पड़ा। लेकिन BBC के आर्टिकल में इस बात का जिक्र तक नहीं है कि चुनाव आयोग के अधिकारी लगातार दबाव में काम कर रहे थे और मालदा में तो न्यायिक अधिकारियों को अपने काम के दौरान इस्लामी भीड़ की हिंसा तक झेलनी पड़ी। जाहिर है, ये बातें उस ‘मुस्लिम पीड़ित’ वाली कहानी में फिट नहीं बैठतीं, जिसे पेश करने की कोशिश की गई है।

BBC के आर्टिकल में दावा किया गया है, “राजनीतिक दलों द्वारा जुटाए गए आँकड़ों के मुताबिक, जिन 27 लाख मामलों पर स्थिति स्पष्ट नहीं है, उनमें करीब 65 प्रतिशत मुस्लिम हैं। कुल मिलाकर हटाए गए 90 लाख नामों में से 31.1 लाख यानी लगभग 34 प्रतिशत मुस्लिम हैं, जो कि 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की 27 प्रतिशत मुस्लिम आबादी से ज्यादा है।”

हालाँकि, BBC की इस कहानी के उलट सच यह है कि जिन 27 लाख मामलों को ‘अभी तय नहीं’ बताया जा रहा है, या जिन 27,16,393 मतदाताओं के नाम हटाए गए। उन्हें बिना जाँच के बाहर नहीं किया गया। बल्कि हर मामले की न्यायिक समीक्षा हुई। इन नामों को कुछ गड़बड़ियों की वजह से चिन्हित किया गया था और करीब 705 न्यायिक अधिकारियों ने इनकी जाँच की। यह पूरी प्रक्रिया हाई कोर्ट की निगरानी में और सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में हुई। कुल 60.06 लाख मामलों में से 32.68 लाख लोगों को योग्य माना गया, जबकि 27.16 लाख को अयोग्य घोषित किया गया।

सबसे अहम बात यह है कि जिन लोगों को लगता है कि उनका नाम गलत तरीके से हटाया गया है, उनके लिए आपत्ति दर्ज कराने का रास्ता भी खुला है। इसके लिए 19 खास ट्रिब्यूनल बनाए गए हैं, जहा वे अपील कर सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने 23 और 29 अप्रैल 2026 को मतदान कराने की अनुमति जरूर दी है और यह भी कहा कि दूसरे राज्यों में SIR प्रक्रिया ‘सुचारू रूप’ से पूरी हुई, जबकि बंगाल में ‘कानूनी विवादों’ के चलते स्थिति अलग रही। साथ ही, शीर्ष अदालत ने लगातार इस बात पर जोर दिया है कि बिना SIR या चुनाव को रोके पूरी प्रक्रिया में सुरक्षा और तय समय सीमा का ध्यान रखा जाए।

वहीं BBC के आर्टिकल में ‘राजनीतिक दलों’ के आँकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया, “हटाए गए 90 लाख नामों में से 3.11 लाख यानी करीब 34 प्रतिशत मुस्लिम हैं, जो कि राज्य की आबादी में उनकी 27 प्रतिशत हिस्सेदारी से ज्यादा हैं।”

लेकिन BBC ने इस बात को नजरअंदाज किया कि कुल संख्या के हिसाब से सबसे ज्यादा नाम हिंदुओं के ही हटाए गए, जो करीब 63 प्रतिशत हैं। यहाँ तक कि कुछ हिंदू बहुल इलाकों जैसे पश्चिम बर्धमान और उत्तर 24 परगना के मतुआ समुदाय वाले क्षेत्रों में भी बड़ी संख्या में नाम हटाए गए। इसके बावजूद BBC का आर्टिकल SIR प्रक्रिया को इस तरह पेश करता है मानो यह बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठ और किसी ‘मुस्लिम-विरोधी साजिश’ से जुड़ा मामला हो, जिससे राज्य में डर और तनाव का माहौल बन सकता है।

चुनाव आयोग ने साफ कहा है कि नाम हटाने की प्रक्रिया पूरी जाँच के बाद की गई है, न कि किसी खास समुदाय को निशाना बनाने के लिए। मुस्लिम मतदाताओं को जानबूझकर बाहर करने का कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है। इसके बावजूद BBC ने कमजोर दलीलों और अस्पष्ट वजहों के सहारे अपनी साजिश वाली कहानी को सही ठहराने की कोशिश की है।

अगर एक पल के लिए मान भी लें कि चुनाव आयोग और BJP ने मिलकर चुनावी सूची को अपने पक्ष में करने की कोशिश की, तो फिर सवाल उठता है कि खुद को हिंदू समर्थक बताने वाली पार्टी ऐसी प्रक्रिया क्यों होने देंगी, जिसमें हटाए गए नामों में 63 प्रतिशत हिंदू हों? और बंगाल में पहली बार जीत हासिल करने की कोशिश कर रही BJP आखिर ऐसा खुद को नुकसान पहुँचाने वाला कदम क्यों उठाएगी?

इसके बावजूद द वायर, न्यूजलॉन्ड्री, द क्विंट और आर्टिकल-14 जैसे प्लैटफॉर्म्स के लिए लिखने वाले स्निग्धेंदु भट्टाचार्य ने आधिकारिक आँकड़ों या सुप्रीम कोर्ट की निगरानी को तवज्जो देने के बजाए कुछ चुनिंदा उदाहरणों और TMC जैसे दलों के सूत्रों पर ज्यादा भरोसा किया। यहाँ तक कि द क्विंट में अपने एक आर्टिकल में उन्होंने बंगाल के SIR अभियान को ‘घोषित किए बिना लागू किया NRC’ तक बता दिया।

वोटर लिस्ट फ्रीज होने के चलते हटाए गए मतदाता बंगाल चुनाव में नहीं कर सकते वोट

जिन मतदाताओं के नाम स्थायी रूप से हटा दिए गए हैं, उन्हें सिर्फ इस वजह से दोबारा वोट देने की इजाजत नहीं दी जा सकती कि उनमें बड़ी संख्या मुस्लिम हैं। चुनाव आयोग पहले ही बंगाल की मतदाता सूची को फ्रीज कर चुका है यानी जब तक सुप्रीम कोर्ट कोई निर्देश नहीं देता, तब तक इसमें नए नाम नहीं जोड़े जा सकते।

इस बात की पुष्टि 13 अप्रैल 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने भी कर दी। CJI सूर्यकांत और जस्टिस जोमल्या बागची की बेंच ने साफ कहा कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा चुके हैं और जिनकी दोबारा शामिल होने की अर्जी लंबित है, उन्हें आने वाले बंगाल विधानसभा चुनाव में वोट देने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

यह टिप्पणी कोर्ट ने उस समय की जब 13 लोगों की याचिका पर सुनवाई हो रही थी, जिन्होंने अपने नाम हटाए जाने के खिलाफ कोर्ट से दखल देने की माँग की थी। हालाँकि, कोर्ट ने उनकी याचिका को ‘समय से पहले’ बताया और उन्हें पहले अपील ट्रिब्यूनल के पास जाने की सलाह दी।

TMC नेता कल्याण बनर्जी ने कोर्ट से कहा था कि करीब 16 लाख लोगों ने अपील की है और उन्हें चुनाव में वोट देने की इजाजत दी जाए। इस पर CJI सूर्यकांत ने साफ शब्दों में कहा, “यह बिल्कुल संभव नहीं है। अगर ऐसा किया गया, तो इशसे जुड़े लोगों के वोटिंग अधिकारों को ही रोकना पड़ेगा।”

वहीं जस्टिस बागची ने बताया कि SIR प्रक्रिया के दौरान करीब 34 लाख अपीलें दायर की गई हैं। कोर्ट ने कहा, “याचिकाकर्ता (कुरैशा यासमीन और अन्य) पहले ही अपील ट्रिब्यूनल के पास जा चुके हैं… ऐसे में हमें लगता है कि उनकी चिंता अभी समय से पहले की है। अगर उनकी माँग मान ली जाती है, तो उसके जरूरी कानूनी परिणाम भी सामने आएँगे।”

कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अगर किसी व्यक्ति का नाम जोड़ने का आवेदन 9 अप्रैल 2026 या उसके कुछ दिन बाद मंजूर हो जाता है, तो उसका नाम मतदाता सूची में शामिल हो जाएगा और वह वोट दे सकेगा। लेकिन कोर्ट ने यह भी बिल्कुल स्पष्ट कर दिया कि जिन लोगों के मामले अभी लंबित हैं, उन्हें चुनाव में वोट देने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।

BBC आर्टिकल के लेखक की हिंदू-विरोधी, BJP-विरोधी और कभी प्रो-TMC आर्टिकल लिखने की आदत

हालाँकि, स्निधेंदु भट्टाचार्य का बार-बार ‘मुस्लिम-पीड़ित’ वाली कहानी को आगे बढ़ाना हैर करने वाला नहीं है, क्योंकि पहले भी वह हिंदू और हिंदुत्व के खिलाफ लिखे गए आर्टिकल को लेकर चर्चा में रहे हैं।

इतना ही नहीं चुनावों के दौरान उनके TMC के पक्ष में लिखे गए आर्टिकल का भी एक रिकॉर्ड रहा है, जिससे उनकी रिपोर्टिंग पर सवाल उठते रहे हैं।

जहाँ तक बंगाल का सवाल है, यह उन राज्यों में शामिल है जहाँ बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ के मामले ज्यादा सामने आते हैं। पिछले तीन साल में 2600 से ज्यादा बांग्लादेशी नागरिकों को पकड़ा गया और वापस भेजा गया है। राज्य के कुल 10 जिले ऐसे हैं जो बांग्लादेश की सीमा से जुड़े हुए हैं। जैसे उत्तर 24 परगना, नदिया, मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण दिनाजपुर, दार्जिलिंग, कूचबिहार और जलपाईगुड़ी। ऐसे सीमावर्ती इलाकों में घुसपैठ और उससे जुड़े मुद्दे लंबे समय से चिंता का विषय रहे हैं।

सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोगों की जातीय और भाषा की समानता की वजह से आवाजाही को पकड़ना हमेशा मुश्किल रहा है। इसी का फायदा उठाकर कई बांग्लादेशी घुसपैठिए, जिनमें ज्यादातर मुस्लिम बताए जाते हैं, यहाँ स्थानीय पहचान पत्र बनवाने और मतदाता सूची में अपने नाम जुड़वाने में सफल हो जाते हैं। ऐसे में SIR जैसे अभियान के जरिए उनकी पहचान करना और उन्हें मतदाता सूची से हटाना एक तरीका माना जा सकता है। लेकिन सवाल यह भी उठता है कि क्या कुछ राजनीतिक दल और उनके समर्थक मीडिया समूह ऐसे लोगों को वोटबैंक के रूप में बनाए रखना चाहते हैं।

पिछले साल भी ऐसा देखा गया था कि जैसे ही नवंबर 2025 में SIR के दूसरे चरण के तहत घर-घर जाकर जाँच की घोषणा हुई, कई अवैध घुसपैठियों में घबराहट फैल गई। कुछ लोगों ने तो यह भी माना कि वे बिना किसी वैध दस्तावेज के भारत में आए थे। इसके बाद अचानक कई लोगों का वहाँ से चले जाना इस बात का संकेत था कि उन्हें पकड़े जाने का डर था।

वहीं, यह भी हैरानी की बात नहीं मानी जा रही कि BBC ने स्निगधेंदु भट्टाचार्य जैसे पत्रकार को मंच दिया, जिन्होंने इस मुद्दे पर ‘मुस्लिम-पीड़ित’ वाली कहानी को आगे बढ़ाया। BBC पर पहले भी भारत और हिंदू समाज से जुड़े मामलों में एकतरफा रिपोर्टिंग के आरोप लगते रहे हैं। चाहे 2022 की लीसेस्टर हिंसा हो, 2020 के दिल्ली दंगे या फिर बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ घटनाों की कवरेज।

हैरानी की बात नहीं है कि BBC ने स्निगधेंदु भट्टाचार्य जैसे एक पक्षपाती ‘स्वतंत्र पत्रकार’ को मंच दिया, जिन्होंने बंगाल के SIR को लेकर मुस्लिम पीड़ित वाली कहानी पेश की। ब्रिटेन के इस मीडिया संस्थान पर पहले भी कई बार भारत और हिंदू समाज से जुड़े मामलों में एकतरफा रिपोर्टिंग के आरोप लग चुके हैं। चाहे 2022 में लीसेस्टर की हिंसा की कवरेज हो, 2020 के दिल्ली दंगों की रिपोर्टिंग या फिर हिंदू-घृणा वाले पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर जैसे लोगों को नरम छवि में दिखाना। इन सभी मामलों में उस पर सवाल उठे हैं।इसके अलावा ईरान युद्ध से पैदा हुए वैश्विक ऊर्जा संकट के दौरान भारत के तेल भंडार को लेकर डर फैलाने वाली खबरें हो या 2024 में बांग्लादेश में हिंदू-विरोधी नरसंहार को छिपाने का प्रयास करने जैसे उदाहरण हों।

बंगाल : BJP का समर्थन करने पर TMC नेता ने की पत्नी की हत्या, फाँसी पर लटकाया

पश्चिम बंगाल से राजनीतिक हिंसा का एक और चिंताजनक मामला सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के एक नेता ने अपनी पत्नी की हत्या इसलिए कर दी क्योंकि वह प्रतिद्वंदी भारतीय जनता पार्टी (BJP) का समर्थन करती थी।

द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, मृतका की पहचान अदिप्ता दास के रूप में हुई है। यह घटना रविवार(12 अप्रैल) को पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के मिनाखान इलाके में हुई। बताया जा रहा है कि महिला को उसके पति राहुल दास ने अपने पिता सुब्रत दास की मदद से पहले बेरहमी से पीटा और बाद में फाँसी पर लटका दिया। महिला का शव फाँसी पर लटका मिला जिसके बाद आरोप-प्रत्यारोपों का दौर शुरू हो गया।

ताजा टीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, महिला के माता-पिता ने बताया कि 2021 में शादी के बाद से ही उसे लगातार शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा था। मृतका के परिजन ने उसके ससुराल वालों पर बार-बार धमकी देने का आरोप भी लगाया है।

हालाँकि, मृतका के ससुराल वालों ने सभी आरोपों से इनकार किया है। उनका कहना है कि अदिप्ता ने आत्महत्या की थी और उसकी राहुल से शादी आपसी सहमति से हुई थी। स्थानीय तृणमूल नेताओं ने हत्या के आरोपों को खारिज करते हुए उन्हें ‘राजनीतिक रूप से प्रेरित’ बताया है। हरोआ थाने की पुलिस ने शव को बरामद कर बसीरहाट में पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया है।

पुलिस का कहना है कि पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट आने के बाद ही मामला और अधिक स्पष्ट हो सकेगा। फिलहाल, पुलिस दोनों पक्षों के लोगों से पूछताछ कर रही है।

TMC में दरार और विरोध से बंगाल की सियासत में निर्णायक मोड़

पश्चिम बंगाल की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी के लिए सबसे बड़ी बाधा कभी मुस्लिम वोट बैंक नहीं रहा, बल्कि उसका एकतरफा ध्रुवीकरण रहा है। जब तक यह वोट बैंक पूरी तरह तृणमूल कांग्रेस के साथ खड़ा था, तब तक मुकाबला असमान था। लेकिन जैसे ही इस ध्रुवीकरण में दरार पड़ती दिख रही हैं, भाजपा के लिए दूसरे राज्यों की तरह पश्चिम बंगाल में भी राजनीतिक स्पेस अपने-आप खुलने लगा है। आज बंगाल में वही स्थिति बनती दिख रही है, जहां भाजपा को जीत के लिए मुस्लिम वोटों की जरूरत नहीं, बल्कि ममता के वोट बैंक के बिखरने की दरकार है। राजनीति का सच यही है कि हर बार जीतने के लिए सबसे ज्यादा वोट पाना जरूरी नहीं होता, कई बार विरोधी के वोट का कटना ही अहम बन जाता है। नौशाद सिद्दीकी की इंडियन सेक्युलर फ्रंट और हुमायूं कबीर की जनता उन्नयन पार्टी इसी भूमिका में सामने आ रही हैं। इसके अलावा असदुद्दीन औवेसी भी अलग दम भर रहे हैं। ये दल भले ही सत्ता के दावेदार न हों, लेकिन मुस्लिम बहुल सीटों पर टीएमसी के परंपरागत वोटों में सेंध लगाकर भाजपा के लिए जीत का रास्ता आसान करने में पूरी तरह सक्षम हैं। 

आज पश्चिम बंगाल की सीएम बनर्जी की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर है, जहां सत्ता का संतुलन नहीं, बल्कि सत्ता की असहायता सबसे अधिक दिखाई दे रही है। उनकी अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के भीतर से उठती वह बेलगाम आवाज़ें हैं, जो सरकार की साख, संवैधानिक मर्यादा और कानून-व्यवस्था तीनों को एक साथ चुनौती दे रही हैं। एक के बाद एक टीएमसी नेताओं के विवादित कदम यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि क्या ममता बनर्जी अपनी पार्टी पर नियंत्रण खो चुकी हैं? क्या इस बार के विधानसभा चुनाव ममता बनर्जी के लिए भारी मुश्किलों को सबब बनने जा रहे हैं? पश्चिम बंगाल में छात्राओं और महिलाओं के यौन शोषण के मामले में पहले ही टीएमसी नेताओं के नाम आ चुके हैं। पिछले महीने टीएमसी के विधायक रहे हुमायूं कबीर ने ममता बनर्जी की राजनीति में बड़ा बवाल कर दिया। अब फरक्का से टीएमसी विधायक मोनिरुल इस्लाम द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त को खुलेआम दी गई धमकी केवल एक बयान नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा पर सीधा हमला है। चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक निकाय के खिलाफ ‘कब्र से बाहर खींच लाने’ जैसी भाषा का प्रयोग यह दर्शाता है कि सत्ताधारी दल के कुछ नेता खुद को कानून से ऊपर समझने लगे हैं।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में दीदी के नाम से मशहूर ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के पिछड़ने की पांच वजह…

एंटी-इंकम्बेंसी का बोझ और ममता की नीतियों से उपजा असंतोष
पश्चिम बंगाल में वर्षों से सत्ता में रहने के कारण ममता बनर्जी की सरकार अब प्रशासनिक थकान का शिकार दिखती है। एक ही नेतृत्व, वही चेहरे और वही शैली, जनता के भीतर असंतोष स्वाभाविक है। यह एंटी-इंकम्बेंसी भाजपा के लिए पहला और मजबूत आधार बनती जा रही है। आज ममता बनर्जी को सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष से नहीं, बल्कि अपनी ही पार्टी से मिल रही है। विधायक और नेता सार्वजनिक रूप से बयानबाज़ी कर रहे हैं, जिससे साफ है कि नेतृत्व की पकड़ ढीली पड़ चुकी है। यह आंतरिक बिखराव भाजपा को स्वाभाविक लाभ पहुंचा रहा है।

मोदी का विकास मॉडल बनाम ममता की तुष्टिकरण की राजनीति
ममता सरकार की एकतरफा तुष्टिकरण नीति ने बहुसंख्यक समाज के साथ-साथ स्वयं अल्पसंख्यक समुदाय के भीतर भी सवाल खड़े किए हैं। विकास के बजाय वोट-बैंक की राजनीति ने शासन की विश्वसनीयता को कमजोर किया है, जिसका सीधा फायदा भाजपा को मिलता दिख रहा है। जहां केंद्र में पीएम मोदी की सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर, उद्योग, गरीब कल्याण और डिजिटल गवर्नेंस की बात करती है, वहीं ममता सरकार अक्सर टकराव और विरोध की राजनीति में उलझी दिखती है। विकास बनाम अवरोध की यह लड़ाई भाजपा के पक्ष में जाती दिखाई दे रही है।

महिलाओं के साथ अपराध व कानून-व्यवस्था पर लगातार उठते सवाल
महिलाओं के खिलाफ अपराध, राजनीतिक हिंसा और प्रशासनिक पक्षपात के आरोपों ने राज्य की कानून-व्यवस्था को कटघरे में खड़ा किया है। संदेशखाली से लेकर मेडिकल कालेज में गैंगरेप तक कई ऐसे मामले हैं, जो महिला सुरक्षा में ममता सरकार की पूरी पोल खोलते हैं। बल्कि महिलाओं के खिलाफ अपराध में कई जगह तो टीएमसी नेताओं की मिलीभगत भी उजागर हुई है। जब सुरक्षा ही भरोसेमंद न रहे, तो जनता विकल्प तलाशती है। विकल्पों की बात करें तो कांग्रेस पूरी तरह बेदम है और वामपंथी सरकार की करतूतों को बंगाल की जनता पहले ही देख चुकी है। ऐसे में बंगाल की जनता मानने लगी है कि सही विकल्प भाजपा ही है।

भ्रष्टाचार के आकंठ लूट, अब युवा-मध्यम वर्ग का बीजेपी में झुकाव
शिक्षा, भर्ती और प्रशासन से जुड़े मामलों में भ्रष्टाचार के आरोपों ने टीएमसी की नैतिक जमीन हिला दी है। खास बात यह है कि भ्रष्टाचार में ममता सरकार के मंत्रियों की संलिप्तता भी उजागर हुई है। दूसरी ओर पीएम मोदी की ‘भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस’ की छवि बंगाल में भाजपा को नैतिक बढ़त दिला रही है। इस बीच रोजगार, स्टार्टअप और आधुनिक शिक्षा की आकांक्षा रखने वाला युवा वर्ग ममता सरकार से निराश है। पीएम मोदी के नेतृत्व में अवसरों की बात करने वाली भाजपा युवाओं और शहरी मतदाताओं के बीच तेज़ी से अपनी पकड़ बना रही है।

वैकल्पिक नेतृत्व का उभरता भरोसा, राष्ट्रीय विमर्श से कटता बंगाल
सीएम ममता बनर्जी की लगातार केंद्र से टकराव की नीति ने बंगाल को राष्ट्रीय विकास विमर्श से अलग-थलग कर दिया है। इसके उलट भाजपा ‘डबल इंजन सरकार’ का संदेश देकर यह विश्वास दिलाने में सफल हो रही है कि बंगाल भी देश की विकास यात्रा का हिस्सा बन सकता है। ममता बनर्जी की राजनीति अब ‘मैं ही विकल्प हूँ’ के दायरे में सिमटती दिखती है। इसके उलट भाजपा संगठन, नेतृत्व और स्पष्ट रोडमैप के साथ खुद को एक व्यवहारिक विकल्प के रूप में पेश कर रही है। इन सभी कारकों—एंटी-इंकम्बेंसी, आंतरिक विद्रोह, कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार और विकास की तुलना ने मिलकर ममता बनर्जी के सिंहासन को डगमगाया है। पीएम मोदी के नेतृत्व में भाजपा इस असंतोष को राजनीतिक परिवर्तन में बदलने की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ाती दिख रही है।

मुस्लिम वोट बैंक का औजार अब ममता बनर्जी के हाथ से फिसल रहा
दरअसल, पश्चिम बंगाल की राजनीति में यदि किसी एक स्तंभ ने ममता बनर्जी को पिछले डेढ़ दशक तक सत्ता में टिकाए रखा है, तो वह है मुस्लिम वोट बैंक। यह कोई छुपा हुआ तथ्य नहीं, बल्कि चुनावी गणित का सबसे स्थापित सच है। राज्य की कुल आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी लगभग तीस प्रतिशत है और मतदाता सूची में भी यह अनुपात लगभग उतना ही माना जाता है। यही वजह है कि बंगाल की राजनीति में मुस्लिम मतदाता केवल एक समुदाय नहीं, बल्कि सत्ता का निर्णायक औजार बनते रहे हैं। लेकिन यही औजार अब ममता बनर्जी के हाथ से फिसलता दिख रहा है। बल्कि यदि यह कहें कि यही औजार अगले विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी के खिलाफ इस्तेमाल होगा, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। टीएमसी को इस चुनाव में एंटी इन्कंबेंसी का डर तो सता ही रहा है। इसके साथ ही उसे मुस्लिम वोट बैंक के भी खिसकने का डर लगा रहा है। दरअसल, विधानसभा चुनाव के लिए मुस्लिम वोट बैंक की बाड़ेबंदी चारों ओर से हो रही है, जिसका इस्तेमाल ममता बनर्जी के खिलाफ होगा। इसमें दो मुस्लिम विधायकों और कुछ संगठनों के अलावा असदुद्दीन ओवैसी का पार्टी भी अहम किरदार निभा सकती है।

इतनी सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक, ममता की सबसे मजबूत किले में दरार
पश्चिम बंगाल की 294 विधानसभा सीटों में लगभग 90 से 100 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। इनमें से करीब 40 से 45 सीटें ऐसी मानी जाती हैं, जहां मुस्लिम वोट का रुख सीधे तौर पर हार-जीत तय करता है। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने अब तक इन्हीं सीटों को अपनी चुनावी रीढ़ बनाकर रखा है। 2011 से 2021 तक का हर चुनावी परिणाम इस बात की पुष्टि करता है कि मुस्लिम वोटों का लगभग एकतरफा झुकाव टीएमसी की ओर रहा है। लेकिन इस बार ममता बनर्जी अपनी तुष्टिकरण की राजनीति में फंस गई हैं। दरअसल, ममता बनर्जी की राजनीति ने मुस्लिम समाज को अधिकारों से अधिक प्रतीकों में उलझाए रखा। योजनाओं, नारों और बयानों का शोर बहुत रहा, लेकिन जमीनी स्तर पर मुस्लिमों के लिए शिक्षा, रोजगार और सुरक्षा जैसे मूल प्रश्न जस के तस बने रहे। नतीजा यह हुआ कि वही मुस्लिम समाज, जिसे ममता ने अपनी ढाल बनाया था, अब तृणमूल सरकार से सवाल पूछने लगा है।

हुमायूं से मोनिरुल तक बढ़ती मुसीबत, मुस्लिम राजनीति का नया बिखराव
टीएमसी के भीतर से उठती आवाज़ें इस टूटन की सबसे बड़ी गवाही हैं। पहले हुमायूं कबीर ने बाबरी मस्जिद के नाम पर शिलान्यास कर ममता को असहज स्थिति में डाला। फिर मोनिरुल इस्लाम ने चुनाव आयुक्त को खुलेआम धमकी देकर राज्य की कानून-व्यवस्था और राजनीतिक संस्कारों पर सवाल खड़े कर दिए। ये घटनाएं अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि उस अंदरूनी बेचैनी का संकेत हैं, जो अब खुलकर सामने आ रही है। इसके अलावा असदुद्दीन ओवैसी भी ममता के वोट बैंक में सेंध लगाने की तैयारी में हैं। यही वह जमीन है, जहां ममता बनर्जी का मुस्लिम वोट बैंक टूटता दिख रहा है। हुमायूं कबीर की जनता उन्नयन पार्टी, नौशाद सिद्दीकी की इंडियन सेक्युलर फ्रंट और औवेसी की एआईएमआईएम इसी बिखराव का राजनीतिक रूप हैं। ये दल मुस्लिम समाज के भीतर यह संदेश दे रहे हैं कि ममता बनर्जी ही एकमात्र विकल्प नहीं हैं। यह संदेश भले ही अभी सीमित दिखे, लेकिन चुनाव में सीमित संदेश भी भारी नुकसान कर जाता है।

ISF, AIMIM और JUP की तिकड़ी ममता के वोट बैंक में लगाएगी सैंध
नौशाद सिद्दीकी पहले ही विधानसभा में ममता की नीतियों को चुनौती दे चुके हैं। उनकी पार्टी ISF का प्रभाव दक्षिण बंगाल के कई मुस्लिम बहुल इलाकों में देखा जा रहा है। वहीं हुमायूं कबीर की JUP स्थानीय स्तर पर असंतोष को हवा दे रही है। ओवैसी की पार्टी भी इस बार ज्यादा सीटों पर लड़ने के मूट में है। ऐसे में ये तीनों ताकतें भले ही सत्ता के दावेदार न हों, लेकिन तृणमूल कांग्रेस का वोट काटने की भूमिका में बेहद खतरनाक साबित हो सकती हैं—खासकर उन सीटों पर जहां जीत का अंतर कम रहा है। भाजपा भले ही मुस्लिम वोटों की बड़ी हिस्सेदारी न पाए, लेकिन उसका सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि ममता का एकतरफा समर्थन टूटे। त्रिकोणीय या बहुकोणीय मुकाबले में टीएमसी को नुकसान होना तय है और अगले चुनाव में यही होने जा रहा है। इसी को देखते हुए राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि इस बार मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सबसे बड़ा झटका विपक्ष से नहीं, बल्कि अपने ही बनाए गए वोट बैंक के बिखराव से लगने वाला है।

ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम भी टीएमसी को मुश्किलें में डालेगी

ममता बनर्जी से मुस्लिम वोट बैंक के छीनने के एक और खिलाड़ी हैं- असदुद्दीन ओवैसी। औवेसी की पार्टी AIMIM पिछले पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में अपने सात उम्मीदवार उतारे थे। एआईएमआईएम के सातों उम्मीदवार ऐसी सीटों से थे, जो मुस्लिम बहुत मानी जाती हैं। ये विधानसभा सीट थीं, ईथर सीट, जलंगी, सागरदिघी, भरतपुर, मालतीपुर, रतुआ और आसनसोल उत्तर। इस बार के चुनाव में भी ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम, टीएमसी की वोट में सेंध लगा सकती है। दरअसल बंगाल में मुस्लिम वोटर्स की संख्या लगभग 30 फीसदी है और ऐसे में इनकी भूमिका अहम हो जाती है। सीटों का सियासी गणित ऐसा है कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की सरकार है। टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी राज्य की मुख्यमंत्री हैं। उन्होंने पिछले विधानसभा से पहले 2016 के विधानसभा चुनाव में भी जीत हासिल की थी। तब टीएमसी ने सबसे ज्यादा 211 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी।

भाजपा को बंगाल में ‘बाहरी’ और ‘असंवेदनशील’ बताने का नैरेटिव तोड़ा
ममता बनर्जी की सियासी मुश्किलें अब विपक्ष के हमलों से नहीं, अपनी ही पार्टी की ज़ुबान से बढ़ रही हैं। तृणमूल के विधायक मनोरंजन बापरी का भाजपा कार्यकर्ताओं की “विनम्रता और दरियादिली” की खुलेआम तारीफ करना कोई सामान्य शिष्टाचार नहीं, बल्कि सत्ता के गलियारों में गूंजने वाली चेतावनी है। इससे पहले हुमायूं कबीर और मोनिरुल इस्लाम जैसे विधायक अपने बयानों और कृत्यों से मुख्यमंत्री की किरकिरी करा चुके हैं। अब बापरी का यह सार्वजनिक बयान उस नैरेटिव को तोड़ता है, जिसमें भाजपा को बंगाल में ‘बाहरी’ और ‘असंवेदनशील’ बताया जाता रहा। जब सत्तारूढ़ दल के भीतर से ही विरोधी की छवि चमकने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि नेतृत्व की पकड़ ढीली पड़ रही है।

बंगाल में 50 लाख ‘फर्जी वोटर’ , ‘बाबरी’ का नींव रख हुमायूं बोले- अगले साल सीएम नहीं बनेगी ममता बनर्जी; कबीर को पार्टी से सस्पेंड कर बहुत तगड़ा खेला खेल दिया ममता ने

हरियाणा के बाद बिहार चुनावों ने मुस्लिम सियासत करने वाली सारी पार्टियों में भूचाल ला दिया है। मुसलमानों को खुश करने वाले लालू और तेजस्वी ने महाकुम्भ और राममन्दिर का विरोध करने की वजह से धरातल पर आ गए और कांग्रेस की तो लुटिया ही डूब गयी। खैर, अब बंगाल में भी वही होने के संकेत मिल रहे हैं। हुमायूँ कबीर ने बाबरी मस्जिद की नींव रख ममता बनर्जी के मुस्लिम वोटबैंक की सबके सामने वोट चोरी कर लिए। वो वोट बैंक जिसके दम पर ममता हिन्दुओं को ठोकर पर रखती थी। लेकिन बेशर्म हिन्दू इसके चोटिल होने के भ्रमजाल में फंस इसको वोट दे गए। जबकि ममता के मुख्यमंत्री बनने के बाद से जितना जानमाल का नुकसान हिन्दुओं का हुआ है किसी का नहीं हुआ। 

मुर्शिदाबाद में कबीर द्वारा बाबरी मस्जिद की नींव रख ममता को मुस्लिम वोट का सौदागर बन मझधार में डाल दिया है। तृणमूल के सूत्रों के अनुसार ममता कबीर को वापस पार्टी में लेकर उसके इशारे पर नाचेगी। जो कबीर कहेगा ममता मानने को तैयार हो जाएगी। लेकिन यह खेला कांग्रेस, ओवैसी और वामपंथियों को बहुत भारी पड़ने वाला है। खेला खेलने की माहिर ममता ने जो खेला खेला है सबकी नींद हराम कर दी है। ममता ने मस्जिद का विरोध करने की बजाए पूरा संरक्षण देने की चाल को समझना होगा। राजनीति शतरंज की चाल होती है यानि कबीर को पार्टी से सस्पेंड करना सिर्फ ड्रामा है। क्योकि कबीर मुसलमानों का ठेकेदार बन सकता है मुख्यमंत्री नहीं।  
पश्चिम बंगाल में चल रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया में करीब 50 लाख संदिग्ध नामों ने ममता बनर्जी सरकार पर सवालिया निसान खड़े कर दिए हैं। अब तक मिले 50 लाख हटाने योग्य नामों में से 23 लाख से ज्यादा लोगों के नाम ‘मृत मतदाता’ श्रेणी में आते हैं, जिनके मतदाता पहचान पत्र जारी हैं। इसके बाद दूसरे स्थान पर ‘स्थानांतरित’ मतदाता हैं, जिनकी संख्या 18 लाख से अधिक है। इसके अलावा 7 लाख से ज्यादा मतदाता ‘लापता’ हैं। जबकि शेष नाम ‘दोहराव’ या अन्य कारणों से ‘फर्जी’ पाए गए हैं। दूसरी ओर टीएमसी से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने शनिवार (6 दिसंबर) को मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की नींव रखकर ममता बनर्जी के लिए नया बखेड़ा खड़ा कर दिया है। ऐसे हालात में तृणमूल कांग्रेस की राजनीति इस समय एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर है, जहां हर कदम ममता बनर्जी के लिए खतरे की घंटी बनता जा रहा है। कभी खुद को अल्पसंख्यक वोट बैंक की निर्विवाद चैंपियन बताने वाली ममता आज उसी वोट बैंक के भीतर उठी बगावत की आग में घिर गई हैं। इस बीच हुमायूं कबीर ने दावा किया है कि जिस वोट बैंक के दम पर ममता इतने सालों से पश्चिम बंगाल में राज कर रही हैं, वह उससे बेहद नाराज है। इसलिए अगले साल के विधानसभा चुनाव में ममता किसी भी सूरत में मुख्यमंत्री नहीं बन पाएंगी।

ममता बनर्जी अपने ही विधायक के राजनीतिक चक्रव्यूह में फंसी
सीएम ममता बनर्जी की दिक्कत यह है कि वह कबीर को ना रोक सकती हैं और ना ही उनका समर्थन कर सकती हैं। रोकेंगी तो मुस्लिम समुदाय के भीतर नाराजगी की आग भड़केगी, और समर्थन करेंगी तो यह और साफ हो जाएगा कि ममता की राजनीति सिर्फ एकतरफा तुष्टिकरण पर टिकी है। यह ऐसी दुविधा है जिसने उन्हें एक ऐसे राजनीतिक चक्रव्यूह में घेर लिया है, जिसमें किसी भी दिशा में कदम उठाने पर नुकसान ही नुकसान है। दरअसल, हुमायूं कबीर जिस तरह बाबरी मुद्दे को बंगाल की राजनीति में उठा रहे हैं, वह साफ संकेत देता है कि वह सिर्फ एक विधायक की भूमिका में नहीं, बल्कि एक मुस्लिम नेता के तौर पर खुद को स्थापित करने की कोशिश में हैं। यही वह बिंदु है, जो ममता बनर्जी को सबसे अधिक अस्थिर कर रहा है। बंगाल का मुस्लिम वोट लंबे समय तक टीएमसी की सत्ता का ईंधन रहा है। पर आज वही वोट-बैंक भीतर से बिखरने को तैयार खड़ा है। कबीर का अभियान मुस्लिम समुदाय के बीच एक नया संदेश दे रहा है कि टीएमसी चाहे कितनी भी बड़ी पार्टी क्यों न हो, लेकिन उनकी आवाज कहने के लिए एक “नया चेहरा” अब मैदान में उतर चुका है।

दोहरे आक्रमण ने ममता सरकार में राजनीतिक तूफान खड़ा किया
राज्य में मतदाता सूची में 50 लाख संदिग्ध वोटरों का खुलासा, TMC से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर की खुली चुनौती, और मुर्शिदाबाद में नई ‘बाबरी मस्जिद’ की नींव रखे जाने का विवाद, इन तीनों ने मिलकर ममता सरकार के सामने एक ऐसा राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है, जिसकी पकड़ से निकल पाना फिलहाल तो उनके लिए संभव नजर नहीं आता। दरअसल, बंगाल की वोटर लिस्ट में 50 लाख संदिग्ध नामों की मौजूदगी कोई छोटी बात नहीं। विपक्ष का आरोप है कि TMC ने अपने चुनावी हितों को साधने के लिए मतदाताओं की सूची को ऐसे भर दिया है कि फर्क करना मुश्किल हो गया है कि वास्तविक वोटर कौन है और ‘राजनीतिक रूप से पोषित’ नाम कौन से हैं। यदि वोटर लिस्ट पर ही भरोसा टूट जाए तो चुनावी लोकतंत्र कागज की तरह बिखर जाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस अविश्वास का निशाना सीधा ममता बनर्जी की सरकार है, क्योंकि यह पूरा तंत्र राज्य प्रशासन के दायरे में आता है।

अगले साल चुनाव में ममता बनर्जी मुख्यमंत्री नहीं बन पाएंगी- कबीर
इस बीच TMC के लिए असली झटका मुर्शिबाद से आया है। मुर्शिदाबाद के विधायक हुमायूं कबीर, जिन्हें पार्टी ने निलंबित किया है, अब खुले तौर पर ममता बनर्जी के बड़े मुस्लिम वोट बैंक को चुनौती दे रहे हैं। शनिवार (6 दिसंबर) के दिन कबीर ने एक नई बाबरी मस्जिद की नींव रखी। इतिहास को देखते हुए जिसे स्थानीय लोग ‘बाबरी-स्टाइल’ मस्जिद कहने लगे हैं। यह कदम केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यह एक राजनीतिक ऐलान है कि बंगाल में मुस्लिम राजनीति अब TMC की मोनोपॉली में नहीं रहेगी। कबीर ने यह कहकर TMC नेतृत्व के होश उड़ा दिए हैं कि 2026 में ममता बनर्जी मुख्यमंत्री नहीं बन पाएंगी और वे स्वयं 90 मुस्लिम उम्मीदवार उतारकर धार्मिक राजनीति की नई धारा खड़ी करेंगे।

अयोध्या की तर्ज पर ‘बाबरी मस्जिद’ की नींव रखी, दो लाख लोग शामिल
पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के बेलडांगा में TMC से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने शनिवार को अयोध्या की बाबरी मस्जिद की तर्ज पर बनने वाली मस्जिद की आधारशिला रखी। कबीर ने मंच पर मौलवियों के साथ फीता काटा और आधारशिला रखने की औपचारिकता पूरी की। इस दौरान नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु अकबर के नारे लगाए गए। कार्यक्रम में 2 लाख से ज्यादा लोगों की भीड़ जुटने के दावे किए गए। बंगाल के अलग-अलग जिलों से आए लोगों में कोई अपने सिर, कोई ट्रैक्टर-ट्रॉली तो कोई रिक्शा या वैन से ईंट लेकर कार्यक्रम में पहुंचे। हुमायूं कबीर ने 25 नवंबर को कहा था कि वे 6 दिसंबर को अयोध्या में विवादित ढांचे के विध्वंस के 33 साल पूरे होने पर बाबरी मस्जिद की आधारशिला रखेंगे। TMC ने 4 दिसंबर को हुमायूं कबीर को पार्टी से सस्पेंड कर दिया था।

हाईकोर्ट ने मस्जिद निर्माण पर रोक से इनकार किया था
कोलकाता हाईकोर्ट ने शुक्रवार को मस्जिद निर्माण पर रोक लगाने से इनकार किया था। कोर्ट ने कहा कि कार्यक्रम के दौरान शांति बनाए रखने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी। हाईकोर्ट के इस निर्देश के बाद हुमायूं कबीर मस्जिद की नींव रख रहे हैं। बेलडांगा समेत आसपास का इलाका आज हाई अलर्ट पर रहा। बेलडांगा और रानीनगर थाने के इलाका और उसके आसपास सेंट्रल आर्म्ड फोर्स की 19 टीमें, रैपिड एक्शन फोर्स, बीएसएफ, स्थानीय पुलिस की कई टीमों समेत 3 हजार से ज्यादा जवान तैनात किए हैं। विधायक हुमायूं कबीर ने मस्जिद निर्माण को लेकर कहा कि अब बेलडांगा में बाबरी मस्जिद को बनने से कोई भी ताकत इसे रोक नहीं सकती। कबीर ने दावा किया कि हिंसा भड़काकर कार्यक्रम को बाधित करने की साजिशें रची जा रही हैं। बंगाल के विभिन्न जिलों से लाखों लोग ऐसी कोशिशों को नाकाम कर देंगे। हुमायूं ने बताया कार्यक्रम में सऊदी अरब से भी धार्मिक नेता आ रहे हैं।

ममता बनर्जी मुस्लिम हितों की वास्तविक संरक्षक नहीं रहीं
दरअसल, विधायक हुमायूं कबीर की यह चुनौती इसलिए मामूली नहीं है, क्योंकि पश्चिम बंगाल में मुस्लिम वोट करीब 25-27 प्रतिशत हैं और लंबे समय से इनका बड़ा हिस्सा TMC के साथ है। लेकिन घरेलू असंतोष, प्रशासनिक पक्षपात और स्थानीय स्तर पर TMC नेतृत्व की खामियों ने इस वोट बैंक को भीतर से खोखला कर दिया है। कबीर जैसे नेता इसी असंतोष को भुना रहे हैं। यह पहली बार है जब TMC के भीतर से ही कोई नेता मुस्लिम समुदाय को यह संदेश दे रहा है कि ममता बनर्जी उनके वास्तविक हितों की संरक्षक नहीं रहीं। दरअसल, ममता बनर्जी के सामने असली समस्या यह नहीं है कि कबीर ने मस्जिद की नींव रखी, बल्कि यह है कि उसने इसे बाबरी मस्जिद की यादों से जोड़कर भावनात्मक मुद्दा बना दिया है। यह वही मुर्शिदाबाद है जो TMC के लिए कभी एक सुरक्षित ‘राजनीतिक गढ़’ माना जाता था और अब वहीं से पार्टी की दीवार में गहरी दरार पड़ गई है।

नया मुस्लिम ध्रुवीकरण तैयार होने से ममता की मुश्किलें दोगुनी हुईं
हुमायूं कबीर की यह बगावत ममता बनर्जी के पूरे राजनीतिक कैलकुलेशन को झकझोर रही है। मुस्लिम वोट पहले ही AIMIM, ISF और छोटे स्थानीय समूहों के कारण खिसक रहे थे। अब TMC के ही विधायक ने एक नया मुस्लिम ध्रुवीकरण तैयार करने की कोशिश से ममता की मुश्किलें दोगुनी कर दी हैं। TMC ने जिसे निलंबित किया, वे अब खुद को ‘नई मुस्लिम राजनीति’ का चेहरा बनाने में जुटे हैं। वास्तविकता यह है कि ममता की राजनीति उन्हीं हथकंडों के वजन से दबने लगी है जिन्हें उन्होंने वर्षों तक सहारा बनाया था। मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति इतनी ज्यादा केंद्रीकृत थी कि अब उसी समुदाय के भीतर असंतोष पनप गया है। TMC के भीतर कई नेता शिकायत करते रहे हैं कि मुस्लिम समुदाय से जुड़े मुद्दों पर ठोस कदम नहीं उठाए जाते, केवल चुनावी भाषणों तक बात सीमित रहती है।

हिंदू वोटर भाजपा के साथ, मुस्लिम वोटर होने लगा विभाजित
बंगाल के राजनीतिक समीकरणों में एक नई हकीकत तेजी से उभर रही है। ममता बनर्जी चुनावी मैदान में अब दो तरफ से छिटकते वोटों से घिरी हैं। एक तरफ हिन्दू वोट जो पहले ही बीजेपी की ओर खिसक चुका है और दूसरी तरफ मुस्लिम वोट जो अब विभाजित होता दिख रहा है। बंगाल की सत्ता की चाबी इन्हीं दोनों समुदायों के संतुलन में छिपी हुई है। यदि यह संतुलन ही टूट जाए, तो TMC की राजनीति का पहिया चरमराना तय है। इसलिए 2026 का चुनाव अब TMC के लिए ‘रूटीन चुनाव’ नहीं रहेगा। यह ममता बनर्जी के राजनीतिक भविष्य का निर्णायक मोड़ बनेगा। यदि मुस्लिम वोट बैंक दो या तीन हिस्सों में टूट गया और मतदाता सूची विवाद उनकी सरकार पर अविश्वास को और गहरा कर गया तो ममता बनर्जी बंगाल की सत्ता में लौटना असंभव जैसा हो जाएगा। क्योंकि विपक्ष से लड़ना तो आसान है, लेकिन पार्टी में बगावत, अपने ही वोट बैंक का टूटना, और प्रशासनिक तंत्र पर अविश्वास यह तीनों मिलकर किसी भी सरकार की नींव हिला सकते हैं।

टीएमसी के भीतर वैकल्पिक मुस्लिम नेतृत्व उभरने के संकेत
दरअसल, मुर्शिदाबाद वह जिला है जहां से ममता को वर्षों से अपराजेय समर्थन मिलता आया है। लेकिन उसी किले की दीवारों के भीतर अब दरारें दिखने लगी हैं। कबीर की यह मुहिम न केवल टीएमसी के भीतर गुटबाजी को बढ़ा रही है, बल्कि यह भी संकेत दे रही है कि आने वाले दिनों में टीएमसी के भीतर एक वैकल्पिक मुस्लिम नेतृत्व उभर सकता है। ममता बनर्जी इसे अपने लिए राजनीतिक खतरा मानें या पार्टी के लिए संकट, लेकिन सच यही है कि बाबरी मस्जिद का यह विवाद अब एकतरफा नहीं रहेगा। यह पूरे राज्य के सत्ता समीकरणों में बदलाव की झनकार पैदा करेगा।

भाजपा नेता उमा भारती के बयान ने आग में घी का काम किया
इसी बीच भाजपा नेता उमा भारती के बयान ने आग में घी का काम किया है। साध्वी भारती ने साफ कहा है, “यदि बाबर के नाम वाली मस्जिद बनी तो उसका अयोध्या जैसा हाल होगा।” उन्होंने X पर लिखा, “खुदा, इबादत, इस्लाम के नाम पर मस्जिद बने हम सम्मान करेंगे। अगर बाबर के नाम से इमारत बनी तो उसका वही हाल होगा, जो 6 दिसंबर को अयोध्या में हुआ था। ईंटें तक नहीं बची थीं। मेरी ममता बनर्जी को सलाह है कि बाबर के नाम पर मस्जिद बनाने की बात कहने वालों पर कार्रवाई करें। पश्चिम बंगाल और देश में अस्मिता और सद्भाव के लिए उनकी जिम्मेवारी है।” उमा भारती के एक-एक ईंट गायब वाले बयान पर विधायक हुमायूं उन्हें मुर्शिदाबाद आने की चुनौती देते हैं। वे कहते हैं कि उमा भारती को ईंट खोलने के लिए मुर्शिदाबाद आना पड़ेगा। हिम्मत है तो आकर गिरा दें। अगर तोड़ दिया तो दोबारा बनाएंगे। उनके इस बयान ने मस्जिद के मुद्दे को बंगाल की सरहदों से निकालकर राष्ट्रीय विमर्श में ला खड़ा किया। भाजपा को यह मौका मिला कि वह ममता पर सीधे प्रहार कर सके और कह सके कि बंगाल सरकार एक पक्ष की धार्मिक राजनीति को बढ़ावा दे रही है। यह बयान टीएमसी के लिए सिर्फ राजनीतिक चुनौती नहीं, बल्कि उसकी छवि पर लगा एक गहरा राजनीतिक धब्बा भी बन गया है।

ममता बनर्जी ने हुमायूं कबीर को दूसरा औवेसी बनने का मौका दिया
हिंदू मतदाताओं के बीच यह पक्की धारणा पहले ही गहरी हो चुकी है कि ममता बनर्जी मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति से कभी बाहर नहीं निकलतीं। अब इस विवाद ने उस धारणा को और ठोस रूप दे दिया। टीएमसी का ढुलमुल रवैया, आधिकारिक प्रतिक्रिया का अभाव और कबीर जैसे नेताओं की स्वतंत्र बयानबाजी, इन सबने मिलकर बंगाल के हिंदू मतदाताओं को एक बार फिर यह महसूस कराया कि ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस की राजनीति में उनके लिए कोई जगह नहीं। दूसरी ओर मुस्लिम मतदाता भी अब एकमत नहीं रहे। AIMIM पहले से ही बंगाल में जमीन तलाश रही थी और अब कबीर का उभार उस जमीन को और उपजाऊ बना सकता है। राजनीति का यह समीकरण ममता बनर्जी के लिए सबसे घातक है। हिंदू वोट जा चुके हैं और अब मुस्लिम वोट भी बंटने की कगार पर खड़े हैं। ऐसे में हुमायूं कबीर पश्चिम बंगाल में दूसरे औवेसी बन कर उभर सकते हैं। क्योंकि इस पूरे विवाद के बीच हुमायूं को अब TMC से निलंबित कर दिया गया है।

क्रूज पर्यटन को दिया विस्तार, दुर्गा पूजा को दिलाई UNESCO में पहचान: मोदी सरकार ने बंगाल टूरिज्म को बढ़ाने के लिए क्या-क्या किया, सारा क्रेडिट ले रहीं ममता बनर्जी

                                          बंगाल बना तीसरा पसंदीदा पर्यटन स्थल (साभार-toi, nbt)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की टूरिज्म क्रांति ने विदेशी सैलानियों की संख्या में जबरदस्त इजाफा किया है, जिसने तमाम राज्यों को फायदा पहुँचाया है। इस कड़ी में बंगाल जो 2023-2024 में पर्यटन के मामले में तीसरे नंबर पर था वो 2025 में दूसरे नंबर पर आ गया है। भारत के लिए जाहिर है कि ये गर्व की बात है लेकिन इस ग्रोथ का सारा क्रेडिट अब अकेले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लेती दिख रही हैं।

जिस ममता के राज में हिन्दुओं को अपने त्यौहार(दुर्गा पूजा) मनाने के अदालतों के चक्कर काटने पड़ते हो, ममता बनर्जी को शर्म आनी चाहिए कि जिस दुर्गा पूजा के बंगाल के हिन्दुओं को तुम्हारे कट्टरपंथी गुंडों से झूझना पड़ता है उसी दुर्गा पूजा को UNESCO में पहचान दिलवाने का काम नरेंद्र मोदी ने किया। 

उन्होंने इस संबंध में ट्वीट कर खुद अपनी पीठ थपथपाई है। जबकि सच्चाई ये है कि 2011 से सत्तासीन ममता बनर्जी का प्रयास कहीं नजर नहीं आता है। वहीं मोदी सरकार आने के बाद शुरू किए गए प्रयास जैसे- इनक्रेडिबल इंडिया, ई वीजा, मेडिकल वीजा के साथ-साथ क्रूज से लेकर सड़क तक किए गए विकास का फायदा बंगाल को मिला है।

बंगाल बना तीसरा पसंदीदा स्पॉर्ट

 विदेशी पर्यटकों के लिए बंगाल पहले तीसरा और अब दूसरा सबसे पसंदीदा टूरिस्ट स्पॉट बन गया है। पूर्व में सबसे आगे महाराष्ट्र और उसके बाद गुजरात था। मगर, अब लिस्ट में बंगाल ने राजस्थान और दिल्ली को पीछे छोड़ते हुए जगह बनाई है।

बंगाल को लेकर इस साल के शुरुआत में ही खबरें आ रही थी कि इस वर्ष बंगाल में आने वाले टूरिस्टों की पहले के मुकाबले ज्यादा हो सकती हैं। अब ये रिपोर्ट देखकर लगता है कि इस वर्ष हुआ भी यही। बता दें कि केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय के ‘भारत पर्यटन डेटा संग्रह 2025’ ने राज्य को अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों की संख्या के मामले में देश भर में दूसरे स्थान पर रखा है। देख सकते हैं बंगाल विदेशी टूरिस्टों की लुभाने में नंबर 2 पर आया है। संख्या 3.12 मिलियन रही।

अब ये वृद्धि अचानक से बंगाल में कैसे देखने को मिली। इसके पीछे के कारण मोदी सरकार के अथक प्रयास हैं।

                                             भारत पर्यटन डेटा संग्रह 2025

दुर्गा पूजा को मिली वैश्विक पहचान

सांस्कृतिक समृद्धि और त्यौहारों ने विदेशी पर्यटकों को आकर्षित किया है। कोलकाता में होने वाले दुर्गापूजा को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल गई है। दुर्गा पूजा वह समय है जब बंगाल में बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक आते हैं। लेकिन, यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की मेहनत का नतीजा है कि दिसंबर 2021 में यूनेस्को ने कोलकाता में होने वाले दुर्गा पूजा को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल किया। इसे ‘धर्म और कला के समन्वय का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण’ माना। जाहिर है इससे शिल्पकारों, कलाकारों को भी प्रोत्साहन मिला, जो सालभर माँ दुर्गा की प्रतिमा बनाने में मशगूल रहते हैं।

ई वीजा और मेडिकल वीजा

बंगाल के प्राइवेट अस्पतालों में बांग्लादेशी मेडिकल विज़िटर्स बड़ी संख्या में आते हैं। इसकी वजह बंगाल का सीमा से सटा होना और आसानी से मेडिकल वीजा मिलना है। ये लोग ममता के गिरते हुए हेल्थ सिस्टम को भी नजरअंदाज कर यहाँ पहुँचते हैं।
पीएम मोदी की ‘हील इन इंडिया’ पहल निजी क्षेत्र के साथ मिलकर स्वास्थ्य सेवा को वैश्विक स्तर पर पहुँचाने का कार्यक्रम है। इसका फायदा बंगाल को भी हो रहा है। केन्द्र सरकार ने मेडिकल वीजा मिलना भी आसान कर दिया है। इसलिए बांग्लादेशी मेडिकल विजिटर्स रिकॉर्ड संख्या में बंगाल पहुँचे। ई वीजा की वजह से लोगों को वीजा मिलना भी सुलभ हो गया है। इसलिए पर्यटकों की संख्या में काफी बढोतरी हुई है।

इनक्रेडिबल इंडिया

भारत में रिकॉर्ड तोड़ विदेशी टूरिस्ट आने का कारण इनक्रेडिबल इंडिया है, जिसे अटल बिहारी वाजपेयी ने शुरू किया था और PM नरेंद्र मोदी ने ई-वीज़ा, मेडिकल वीज़ा, ग्लोबल कैंपेन और आसान एंट्री से इसे सुपरचार्ज किया है। अतिथि देवो भव: अवधारणा के साथ शुरू इस योजना को 2017 में नई जान आ गई। ‘इनक्रेडिबल इंडिया 2.0’ को डिजिटल और सोशल मीडिया पर काफी प्रोत्साहित किया गया। सरकार ने तो ‘वन स्टेट, वन ग्लोबल डेस्टिनेशन’ भी शुरू कर रही है। इसका लक्ष्य 2027 तक हर राज्य को फायदा पहुँचाना है।
अतुल्य भारत डिजिटल पोर्टल शुरू किया गया। इसे भारत में आने वाले पर्यटकों के लिए खास तौर पर बनाया गया। यह यात्रियों को पर्यटन स्थलों को ढूँढने और शोध से लेकर योजना बनाने, बुकिंग करने, यात्रा करने और वापस लौटने तक सभी जरूरी जानकारी और सेवाएँ देता है। ‘बुक योर ट्रैवल’ फीचर उड़ानों, होटलों, कैब की बुकिंग की सुविधा प्रदान करता है, जिससे यात्रियों की पहुँच बेहतर होती है। जाहिर से इसका फायदा भी बंगाल को मिला।

अतुल्य भारत होमस्टे योजना

पर्यटकों की सुविधा के लिए केन्द्र सरकार ने स्वैच्छिक होमस्टे योजना शुरू की, ताकि पर्यटकों को कहीं ठहरने में दिक्कत न हो और स्थानीय जनता को भी आमदनी हो। योजना के तहत 5 से 6 गाँव में 5 से 10 होम स्टे हो सकता है जिसके लिए 5 करोड़ रुपए तक की सहायता की जा रही है।

जनजातीय पर्यटन सर्किट का विकास

स्वदेश दर्शन योजना के तहत थीम आधारित सर्किट विकसित की जा रही है। रामायण सर्किट, बौद्ध सर्किट आदि। इस योजना के तहत जनजातीय होम स्टे परियोजना भी शुरू किया गया है। ताकि पर्यटकों के आने जाने वाली जगहों का विकास किया जा सके। इसके लिए केन्द्र सरकार धन मुहैया कराती है।

तीर्थयात्रा को बढ़ावा देने के लिए प्रशाद योजना

इसके तहत राज्य के अहम तीर्थस्थलों को संरक्षित करना और उन तक पहुँचने के लिए सुविधाएँ बढ़ाया गया है। जैसे त्रिपुरा संदुरी मंदिर, चामुंडेश्वरी देवी मंदिर, पटना साहिब की विकास योजनाएँ।
घरेलू पर्यटकों को अपने देश के पर्यटन स्थलों को देखने के लिए सरकार ने प्रोत्साहित किया। इसके लिए ‘देखो अपना देश’ पहल की गई
विशिष्ट पर्यटन उपक्षेत्रों को विकसित किया गया है जैसे उत्सव पर्यटन, साहसिक पर्यटन, विवाह पर्यटन और क्रूज पर्यटन। इसमें भारत के त्यौहारों, आयोजनों से लेकर पर्वतारोहण को बढ़ावा देने, ‘इंडिया सेज आई डू’ के तहत मैरिज डेस्टिनेशन सेंटर को बढ़ावा देना शामिल है।

क्रूज पर्यटन का विकास

क्रूज पर्यटन का फायदा भी कोलकाता को मिला है। बंगाल में कई तरह की क्रूज सेवाएं शुरू हो गई हैं, जिनमें ‘बंगाल गंगा क्रूज’ अहम है। इसके अतिरिक्त, भारत और आसियान देशों के बीच बंगाल की खाड़ी में एक नए क्रूज पर्यटन कॉरिडोर भी विकसित किया जा रहा है। कोलकाता से शुरू होने वाली एक लग्जरी क्रूज सेवा भी है, जो हुगली नदी के किनारे बंगाल की संस्कृति और वास्तुकला को दर्शाती है।
बीजेपी ने ममता बनर्जी के पर्यटकों की संख्या में इजाफे को लेकर सवाल किया है। बीजेपी नेता अमित मालवीय ने ट्वीट कर सीएम ममता बनर्जी से पूछा है कि आखिर किस काम का वे क्रेडिट ले रही हैं, जबकि पर्यटन को मोदी सरकार की प्राथमिकता में एक है।
जाहिर है विधानसभा चुनाव को देखते हुए ममता सरकार हर क्रेडिट लेना चाहेगी। पर्यटन से न सिर्फ राज्य की आय बढ़ती है बल्कि आम नागरिक को काफी फायदा होता है। करीब 15 सालों से ममता बनर्जी ने पर्यटन के विकास के लिए कुछ खास नहीं किया। सांस्कृतिक तौर पर समृद्ध बंगाल को इन सालों में काफी फायदा पहुँचाया जा सकता था।

‘बिस्मिल्लाह बोलूँगा और योगी की कुर्बानी दे दूँगा’: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को कैमरे पर दी धमकी

          बंगाली मुस्लिम मजदूर ने दी सीएम योगी की कुर्बानी की धमकी (फोटो साभार: Khabar India video)
दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 को लेकर खबर इंडिया नामक यूट्यूब चैनल पर 13 दिसंबर 2024 को पब्लिश किए गए एक वीडियो में पश्चिम बंगाल से आए मुस्लिम प्रवासी मजदूरों से बातचीत की गई। इस बातचीत में एक मजदूर ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर आपत्तिजनक बयान दिया और धमकी देते हुए कहा, “बिस्मिल्लाह बोलूँगा और योगी की कुर्बानी दे दूँगा।” यही नहीं, उसने उत्तर प्रदेश योगी पर लगातार अभद्र टिप्पणियाँ की।

योगी को दी कुर्बानी की धमकी

प्रवासी मजदूर ने अपनी नाराजगी योगी सरकार की नीतियों पर जाहिर की। उसने अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण, अवैध मस्जिदों और मजारों पर कार्रवाई, और लाउडस्पीकर व अवैध बूचड़खानों पर लगाम कसने को लेकर नाराजगी जताई। प्रवासी मजदूर ने कहा, “बिस्मिल्लाह बोलूँगा और कुर्बानी दे दूँगा योगी की” और यह कहते हुए उसने हाथों से कुर्बानी देने का इशारा भी किया।
उसने आगे कहा, “खुलेआम भैंस का गोश्त काट रहे हैं हम लोग। खुलेआम अजान चल रहा है। जाओ योगी… सु#$@र के जने के पास.. जो मस्जिद से माइक उतारता है। उसकी अम्मी ने शादी किया है, मुसलमान से… बोलता है मुसलमानों को भगाओ यहाँ से.. सामने आएगा तो बिल्मिल्लाह बोलके #$% दूँगा।”

ममता बनर्जी को प्रधानमंत्री बनाने की इच्छा

मजदूर ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की जमकर तारीफ की और कहा, “हमारी दीदी बंगाल में अच्छा काम कर रही हैं। हम चाहते हैं कि 2029 में वह प्रधानमंत्री बनें।” हालाँकि, कुछ मजदूरों ने ममता सरकार की आलोचना भी की। उन्होंने कहा, “अगर बंगाल में रोजगार होता, तो हम दिल्ली क्यों आते?” एक मजदूर ने आगे कहा, “बंगाल में 28 जिले हैं, लेकिन बड़ी कंपनियां नहीं हैं। रोजगार के लिए हमें 1400 किलोमीटर चलकर दिल्ली आना पड़ता है।”

आप से अधिक कांग्रेस को दी प्राथमिकता

मजदूरों ने कांग्रेस को आम आदमी पार्टी और बीजेपी से बेहतर बताया। उन्होंने कहा कि “राहुल गाँधी एक अच्छे नेता हैं, और कांग्रेस ही देश में शांति और एकता ला सकती है।” हालाँकि, अप्रवासी मजदूरों ने अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की दिल्ली सरकार की मुफ्त बिजली-पानी योजनाओं की तारीफ की, लेकिन उन्होंने राहुल गाँधी को बीजेपी के खिलाफ लड़ाई में अधिक मजबूत बताया।
यह बातचीत यह दिखाती है कि चुनाव से पहले राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ रहा है। योगी आदित्यनाथ को धमकी और ममता बनर्जी की प्रशंसा प्रवासी मजदूरों के राजनीतिक झुकाव को उजागर करती है।

ऐसे भारत में घुसकर बस जाते हैं बांग्लादेशी… जिस नजीबुल ‘टोपी वाला’ को ATS ने दबोचा उसे क्लीनचिट दे चुका था देवबंद का इंस्पेक्टर सिराजुद्दीन

    बंगाल के मदरसे का छात्र नजीबुल (दाएँ) देवबंद में कारोबार के नाम पर चलाने लगा था बांग्लादेशी घुसपैठियों का रैकेट
उत्तर प्रदेश पुलिस के आतंकवाद निरोधक दस्ते (ATS) ने 11 अक्टूबर, 2023 को भारत में बांग्लादेशी घुसपैठ करवाने में मदद कर रहे एक नेटवर्क का भंडाफोड़ किया था। इस दौरान पुलिस ने आदिल उर रहमान अशर्फी, नजीबुल शेख और अबू हुरैरा को गिरफ्तार किया था। इसमें आदिल उर रहमान बांग्लादेशी घुसपैठिया था जो फर्जी पहचान पत्र बनवा कर भारत में रह रहा था। नजीबुल शेख और अबू हुरैरा पश्चिम बंगाल के निवासी थी जो फिलहाल देवबंद में ही रह रहे थे। नजीबुल पर बांग्लादेशी घुसपैठियों को भारत में शरण देने, उनके पहचान पत्र बनवाने और उनके लिए पैसे जुटाने में मदद करने का आरोप है।

खास बात यह है कि इस गिरफ्तारी से पहले नजीबुल शेख का नाम पहले भी 2 बार प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से UP ATS ने अपनी कार्रवाई में लिया था लेकिन दोनों बार उसको सहारनपुर पुलिस ने गिरफ्तार नहीं किया था। ऑपइंडिया ने इस मामले की जमीनी पड़ताल की तो पता चला कि पूर्व में दर्ज जिन केसों में नजीबुल शेख गिरफ्तारी से बच गया था उसकी जाँच इंस्पेक्टर सिराजुद्दीन ने की थी। तब इंस्पेक्टर सिराजुद्दीन देवबंद थाना कोतवाली में इंस्पेक्टर क्राइम के पद पर तैनात थे।

क्या हैं नजीबुल पर आरोप

UP ATS की इस FIR में बताया गया था कि देवबंद दारुल उलूम के सामने परफ्यूम और टोपी बेचने वाला नजीबुल शेख भारत विरोधी कार्यों में फंडिंग कर रहा है। इन कार्यों में बांग्लादेशी घुसपैठियों का फर्जी भारतीय पहचान पत्र बनवाना प्रमुख था। नजीबुल शेख द्वारा भारत में बसाए गए लगभग आधे दर्जन घुसपैठियों का जिक्र ATS की FIR में है। देश विरोधी कार्यों को करने के लिए नजीबुल शेख को हवाला से पैसे भी मिले थे। किस रोहिंग्या या बांग्लादेशी को कौन से शहर में बसाना है यह भी नजीबुल अपने आकाओं के साथ मिल कर तय करता था।
तब ATS ने नजीबुल और उसके अन्य साथियों पर पर विदेशी अधिनियम के अलावा भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 370, 471, 467, 468, 419, 420 और 120 बी के तहत FIR दर्ज की थी। पिछले लगभग 10 महीनों से नजीबुल जेल में है। ATS द्वारा पेश किए गए सबूतों की वजह से उसकी जमानत अर्जी हाईकोर्ट से ख़ारिज हो चुकी है।

दारुल उलूम के मदरसे में पढ़ा, फिर शिफ्ट हुआ देवबंद

ऑपइंडिया ने नजीबुल के बारे में जानकारियाँ जुटाईं। वह मूल रूप से पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले का निवासी है। नजीबुल के अब्बा का नाम शेख अब्दुल कातिर है। नजीबुल की पढ़ाई पश्चिम बंगाल के हरोआ स्थित एक मदरसे से हुई थी। यह मदरसा देवबंद से कनेक्टेड है। इस मदरसे का संचालन अबू सालेह करता था जिसे UP ATS ने जनवरी 2024 में टेरर फंडिंग केस में गिरफ्तार किया है। सालेह पर आतंकी फंडिंग के लिए कुख्यात ब्रिटेन की उम्माह वेलफेयर ट्रस्ट से करोड़ों रुपए लेने का आरोप है।
अबू सालेह के मदरसे में पढ़ते हुए नजीबुल शेख देवबंद दारुल उलूम से जुड़े कई लोगों के सम्पर्क में आया। उसका देवबंद में आना-जाना भी हो गया। माना जाता है कि पूरी तरह से सोची-समझी साजिश के तहत शेख नजीबुल पश्चिम बंगाल के मदरसे की पढ़ाई कर के देवबंद में शिफ्ट हो गया था। यहाँ उसने दारुल उलूम के ठीक सामने सेंट और टोपी की दुकान खोल ली। इस दुकान पर दारुल उलूम देवबंद में पढ़ने वाले दुनिया भर के छात्र खरीदारी के लिए आने लगे। शेख नजीबुल इन सबमें अपने काम के लोग तलाशने लगा।

दुकान बस नाम की, असल धंधा हवाला का

ऑपइंडिया द्वारा जुटाई गई जानकारी के मुताबिक, नजीबुल शेख की सेंट और इस्लामी टोपी की दुकान केवल नाम भर के लिए थी। उसके पास विदेशों से हवाला का पैसा आने लगा। इसमें सबसे ज्यादा पैसे बांग्लादेश से आए। इन पैसों का उपयोग नजीबुल भारत में घुसपैठ कर के आए बांग्लादेशियों के पहचान पत्र और अन्य कागजात बनाने में करता था। नजीबुल ने कई घुसपैठियों को देवबंद व आसपास रहने की भी व्यवस्था करवाई थी। उसके खाते में कई संदिग्ध लेन-देन भी पाए गए हैं।
ATS का यह भी आरोप है कि हवाला से मिले पैसों से भारत में अवैध मस्जिदें बनवाने का भी काम हो रहा था। पैसों के इस लेन-देन में अब्दुल्ला गाजी, अब्दुल अव्वल और गफ्फार का नाम भी सामने आया था। साथ ही देवबंद के तार दिल्ली से भी जुड़े पाए गए थे। नजीबुल के साथ गिरफ्तार हुए आदिल उर रहमान ने भी पूछताछ में कई खुलासे किए थे। उसने बताया कि उसके भी फर्जी पहचान पत्र बनवाने में नजीबुल ने बड़ा रोल अदा किया था। नजीबुल का एक भाई सीमा सुरक्षा बल (BSF) में भी तैनात बताया जा रहा है।

इसकी टोपी उसके सर

यहाँ ये गौर करने योग्य है कि जो टोपियाँ नजीबुल अपनी दुकान में बेचता था वो ज्यादातर बांग्लादेश में बनी होती थी। इन्ही टोपियों को खरीदने के नाम पर नजीबुल बांग्लादेश में पैसे का लेन-देन करता था। बांग्लादेश में मौजूद घुसपैठियों के रिश्तेदार और परिजन टोपी के थोक विक्रेता को वहीं पर पैसे दे दिया करते थे। उन पैसों के बदले वहाँ से टोपियाँ देवबंद में नजीबुल की दुकान पर आ जाती थीं। इन्हीं टोपियों को फिक्स जगह बेच कर नजीबुल यहाँ मौजूद घुसपैठियों को पैसे बाँट देता था।

2022 में ही पकड़ा जाता नजीबुल, अगर इंस्पेक्टर सिराजुद्दीन ने न दी होती क्लीन चिट

जिस नजीबुल को UP ATS ने अक्टूबर 2023 में जेल भेजा उसे साल 2022 में ही गिरफ्तार कर लिया गया होता लेकिन तब सहारनपुर पुलिस के थाना देवबंद की जाँच में उसका नाम निकाल दिया गया था। ये बात है 28 अप्रैल, 2022 की। तब UP ATS के इंस्पेक्टर सुधीर कुमार उज्ज्वल ने सहारनपुर जिले के थाना देवबंद में एक FIR दर्ज करवाई थी। इस FIR में उन्होंने बांग्लादेशी घुसपैठ का एक बड़ा नेटवर्क ध्वस्त किया था। तब उन्होंने अपनी FIR में स्पष्ट रूप से दारुल उलूम देवबंद के आगे सेंट और टोपी बेचने वाले दुकानदार का जिक्र किया था।
FIR में दुकान का बाकायदा पता भी मेन रशीदिया मार्किट लिखा हुआ था। सुधीर कुमार उज्ज्वल की इस FIR में बताया गया था कि दारुल उलूम देवबंद के आगे सेंट टोपी बेचने वाला दुकानदार बांग्लादेशी घुसपैठियों से कनेक्टेड है। तब इसकी जाँच देवबंद में तैनात रहे इंस्पेक्टर सिराजुद्दीन ने की थी। सिराजुद्दीन ने अपनी जाँच रिपोर्ट में सेंट और टोपी वाले दुकानदार के खिलाफ सबूत नहीं पाने का जिक्र किया। उन्होंने कोर्ट में चार्जशीट भी लगा दी। इस चार्जशीट से नजीबुल का हौसला और बढ़ गया। हालाँकि, वो अपने आपराधिक कार्यों को और सतर्कता से करने लगा था।

दूसरी FIR में भी साफ़ बच गया था नजीबुल

इंस्पेक्टर सिराजुद्दीन की जाँच रिपोर्ट में पहली बार बच निकलने के बाद दूसरी बार नजीबुल फिर उसी देवबंद थाने से फँसते-फँसते बचा। तब 19 जुलाई 2024 को UP ATS के इंस्पेक्टर सुधीर कुमार उज्ज्वल ने एक और FIR दर्ज करवाई थी। इस FIR में उन्होंने 2 बांग्लादेशी घुसपैठियों को गिरफ्तार किया था जिनके नाम हबीबुल्लाह और अहमदुल्लाह हैं। इन दोनों के पास फर्जी कागजातों से बनवाए गए भारतीय पहचान पत्र और मोबाइल सिम बरामद हुए थे।
बताया जा रहा है कि हबीबुल्लाह नामक घुसपैठिए के सेंट और टोपी की दुकान लगाने वाले नजीबुल से संबंध थे। इस केस की भी जाँच देवबंद थाने में तैनात रहे इंस्पेक्टर सिराजुद्दीन को दी गई थी। हालाँकि इंस्पेक्टर सिराजुद्दीन लगातार दूसरी बार इस पूरे मामले में नजीबुल शेख की भूमिका तलाशने में असफल रहे थे। इसी वजह से एक ही विवेचक द्वारा की गई लगातार 2 जाँचों के बावजूद नजीबुल बचता रहा। ये तब का मामला है जब UP ATS का अपना खुद का थाना नहीं था। तब ATS को जाँच व अन्य कार्र्रवाई के लिए उस थानाक्षेत्र पर निर्भर रहना पड़ता था जहाँ घटनास्थल होता था।

ATS का खुला अपना थाना तो दबोच लिया गया नजीबुल शेख

देवबंद कोतवाली में दर्ज हुए 2 अलग-अलग मुकदमों में बच जाने के बाद नजीबुल काफी हद तक रिलेक्स हो गया था। इस बीच उत्तर प्रदेश ATS का अपना खुद का थाना लखनऊ में खुल गया। तब न सिर्फ FIR बल्कि जाँच का भी अधिकार ATS के पास आ गया। आखिरकार 11 अक्टूबर 2023 को UP ATS ने नजीबुल शेख को उसके साथी सहित दबोच लिया। नजीबुल शेख के खिलाफ ATS ने कोर्ट में कई सबूत पेश किए हैं। पिछले लगभग 10 महीनों से नजीबुल लखनऊ जेल में बंद है। उसकी जमानत अर्जी हाईकोर्ट से भी ख़ारिज हो चुकी है।

हिंदी पट्टी में बनी हुई है पकड़, दक्षिण में भी मिलेगी बढ़त, बंगाल-ओडिशा में सबसे बड़ी पार्टी होगी बीजेपी : प्रशांत किशोर

                    प्रशांत किशोर ने पीटीआई संपादकों के साथ की बातचीत (फोटो साभार : PTI)
बीजेपी को सत्ता में लाने का श्रेय बीजेपी को नहीं, विपक्ष को जाता है। जिस तरह सावन के अन्धे को हर तरफ हरा ही हरा दिखाई देता है, ठीक वही स्थिति विपक्ष की है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री मनोनीत होते ही विपक्ष मोदी को केवल गाली देता रहा, कभी गोधरा मुद्दे को उठाकर मुसलमानों में डर बैठा डराता रहा। मौत का सौदागर, नीच और चाय बेचने वाला कहकर अपमानित करता रहा, लेकिन ये सभी मिथ्या साबित होकर मोदी की राह में फूल बिछाते रहे। कोई अन्य नहीं, मुसलमान ही इनसे पूछे की 2002 से पहले गुजरात में कितने दंगे हुए और कितने हज़ार मुसलमान मारे गए? मलियाना(उत्तर प्रदेश) में कितने मुसलमान मारे गए? 

मोदी की डिग्री पर प्रश्न करने वालों ने कभी सोनिया गाँधी की डिग्री पूछने की हिम्मत नहीं की। मोदी को चाय बेचने वाला कहने वालों ने कभी यह पूछने का साहस नहीं किया कि राजीव गाँधी से शादी से सोनिया इटली में क्या करती थी। फिर उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने पर शोर मचाना शुरू कर दिया कि बीजेपी धर्म को राजनीति में लाकर जनता को गुमराह कर रही है। जबकि सच्चाई यह है कि सनातन शास्त्रों में राजनीति ज्ञान होने के कारण पहले अपने पुत्रों को गुरुकुलों में मुनियों से शिक्षा लेने भेजते थे। मुस्लिम तुष्टिकरण करने वाले पाखंडी सेक्युलरिस्ट्स को क्या मालूम जीवन में गुरुकुल का क्या महत्व है? 

जो पुरुषोत्तम श्रीराम को मिथ्या बता दे, उनसे सनातन का ढोंग रचने के अलावा कुछ नहीं अपेक्षा नहीं की जा सकती। सेकुलरिज्म के नाम पर केवल हिन्दुओं अधिकारों का हनन, जातियों में विभाजित करने की तुच्छ सोंच से आज तक बाहर आने की हिम्मत नहीं कर पा  रहे। इन पाखंडी सेक्युलरिस्टों से पूछो कि सेकुलरिज्म का मतलब क्या होता है, क्या परिभाषा है? हिन्दुओं को जातियों में विभाजित करने से पहले बताओ दूसरे धर्मों को जातियों में बाँटने की हिम्मत कर के दिखाने के लिए माँ का दूध पीकर आओ। हिन्दुओं में एक ही मंदिर है एक ही शमशान है, लेकिन अन्य धर्मों में हर जाति के अलग कब्रिस्तान, मस्जिद और चर्च क्यों हैं?  

राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने माना है कि बीजेपी लगातार तीसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आ रही है। प्रशांत किशोर का मानना है कि भारतीय जनता पार्टी दक्षिण और पूर्वी भारत में जोरदार पकड़ बना चुकी है और दोनों ही क्षेत्रों से अपनी सीटों को काफी बढ़ाने में सक्षम होगी, यहाँ तक कि तमिलनाडु में बीजेपी का मत प्रतिशत दहाई अंक में पहुँच सकता है। प्रशांत किशोर ने कहा कि कॉन्ग्रेस और विपक्षी दलों को बीजेपी और नरेंद्र मोदी को रोकने के लिए कम से कम 3 बड़े मौके मिले थे, लेकिन विपक्षी दल इन मौकों को भुनाने में असफल रहे।

पीटीआई के संपादकों के साथ विशेष चर्चा में प्रशांत किशोर ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी तेलंगाना में सबसे बड़ी या दूसरे नंबर की पार्टी हो सकती है, जबकि ओडिशा और पश्चिम बंगाल में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी। आप को भले ही ये बात अभी आश्चर्यजनक लग रही हो, लेकिन हकीकत में ऐसा होने जा रहा है। प्रशांत किशोर ने कहा कि दक्षिण के राज्यों में कर्नाटक में कॉन्ग्रेस मजबूत है, लेकिन बाकी राज्यों में बीजेपी अच्छा प्रदर्शन करने जा रही है।

प्रशांत किशोर ने एक आँकड़ा दिया। उन्होंने कहा कि तेलंगाना, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, बिहार और केरल में कुल मिलाकर 543 लोकसभा सीटों में 204 सीटें हैं। इन राज्यों में बीजेपी न ही साल 2014 में और न ही 2029 में अच्छा प्रदर्शन कर पाई। बीजेपी 2024 सीटों में से 50 सीटें भी नहीं जीत पाई थी। साल 2014 में ये आँकड़ा 29 सीटों का था, तो 2019 में 47 सीटों का, लेकिन इस बार ये आँकड़ा बढ़ेगा। उन्होंने बताया कि ओडिशा, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना में बीजेपी बेहतरीन प्रदर्शन करने जा रही है।

इस दौरान उन्होंने कहा कि बीजेपी ने भले ही 370 से ज्यादा सीटों का लक्ष्य रखा है, लेकिन वो इसे पार नहीं कर पाएगी। हालाँकि इस बार भी वो 300 से अधिक सीटों पर जोरदार जीत दर्ज कर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने चल रही है। उन्होंने कहा कि बीजेपी को परेशानी तब होती, जब विपक्षी दल खासकर कॉन्ग्रेस उसे उत्तर और पश्चिम भारत में 100 से अधिक सीटों पर हराने की स्थिति में होती, लेकिन ऐसा नहीं होता दिख रहा है। बीजेपी की इन इलाकों पर मजबूत पकड़ है।

बीजेपी करेगी अच्छा प्रदर्शन

प्रशांत किशोर ने कहा कि पिछले कुछ सालों में दक्षिण और पूर्वी भारत में बीजेपी ने काफी मेहनत की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने इन राज्यों का लगातार दौरा किया है, जबकि विपक्ष के नेता अपने घरों में रहे। उन्होंने एक तुलनात्मक बात जोड़ते हुए राहुल गाँधी पर कटाक्ष भी किया। उन्होंने कहा, “पिछले 5 सालों में राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी कितनी बार तमिलनाडु गए? आपकी लड़ाई यूपी, बिहार और एमपी में है, लेकिन आप मणिपुर और मेघालय का दौरा कर रहे हैं, तो सफलता कैसे मिलेगी?”
साल 2019 में अमेठी से हार के बाद राहुल गाँधी ने वायनाड पर ध्यान केंद्रित किया। वो अकेले केरल में पार्टी को जिता भी लेंगे, तो भी पूरे देश में उनकी हालत खराब रहेगी। अमेठी से भागने का मतलब है पूरे देश में गलत संदेश जाना, जबकि अभी तक कॉन्ग्रेस रायबरेली और अमेठी से अपने उम्मीदवार तक तय नहीं कर सकी है और न ही राहुल गाँधी अमेठी को लेकर बहुत ज्यादा इच्छाशक्ति ही रखते हैं।
प्रशांत किशोर ने कहा कि दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है, लेकिन राहुल गाँधी वायनाड में जोर लगा रहे हैं। वहीं, नरेंद्र मोदी ने गुजरात छोड़कर उत्तर प्रदेश को चुना, क्योंकि अगर आप हिंदी पट्टी को नहीं जीतेंगे, तो फिर आप लड़ाई में ही नहीं होंगे। नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी ने हिंदी पट्टी में अपनी पकड़ बनाकर रखी है।

विपक्षी दलों खासकर कॉन्ग्रेस को मिले थे तीन बड़े मौके

प्रशांत किशोर ने कहा कि कॉन्ग्रेस और विपक्षी दलों को बीजेपी को रोकने के तीन बड़े मौके मिले थे, लेकिन हर बार वो चूक गए। उन्होंने कहा कि साल 2014 के बाद जब भी बीजेपी बैकफुट पर गई, विपक्षी दल उस मौके को भुनाने में असफल रहे। साल 2015 और 2016 में बीजेपी लगातार चुनाव हारी, असम को छोड़कर, लेकिन विपक्ष ने बीजेपी को वापसी करने का मौका दिया। इसी तरह से साल 2017 में नोटबंदी के बाद यूपी में विधानसभा चुनाव जीतने के बाद बीजेपी एक बार फिर से हारने लगी थी। वो गुजरात में लगभग हार गई थी, एमपी-राजस्थान-छत्तीसगढ़ में बुरी पराजय हुआ, लेकिन बीजेपी ने 2019 में वापसी कर ली।
किशोर ने आगे कहा कि इसी तरह से कोरोना के समय बीजेपी की हालत खराब हुई। बीजेपी पश्चिम बंगाल में बुरी तरह से हारी, लेकिन विपक्ष के नेता नरेंद्र मोदी की चुनौती का सामना करने की जगह अपने घरों में बैठ गए और नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी फिर से वापसी करने में सफल रही। उन्होंने कहा, “अगर आप किसी बल्लेबाज का कैच बार-बार छोड़ते रहेंगे, तो वो शतक बनाएगा, खासकर जब वो नरेंद्र मोदी जैसा अच्छा बल्लेबाज हो।”

इंडी गठबंधन प्रभावी नहीं

प्रशांत किशोर ने कहा कि बीजेपी से मुकाबले के लिए विपक्षी दलों का जो गठबंधन बना है, न तो उसकी जरूरत थी और न ही वो प्रभावी है। उन्होंने कहा कि देश की 350 लोकसभा सीटों पर तो बीजेपी और किसी अन्य दल की सीधी टक्कर है। ऐसे में गठबंधन का यहाँ कोई मतलब नहीं बनता। वैसे भी बीजेपी इसलिए जीत रही है, क्योंकि गठबंधन की पार्टियाँ कॉन्ग्रेस, सपा, आरजेडी, एनसीपी और टीएमसी अपने ही इलाकों में बीजेपी का मुकाबला करने में सक्षम नहीं हैं। इस पार्टियों के पास ही कोई नैरेटिव है, न ही कोई मजबूत चेहरा और न ही कोई ढंग का एजेंडा।