दिपके- दास पर जीरो एफआईआर दर्ज करने की माँग (फोटो साभार-X@abp) NEET पेपर लीक को लेकर जंतर मंतर पर हुए सीजेपी के विरोध- प्रदर्शन में बच्चों के शामिल होने पर विवाद शुरू हो गया है। वकील रिंकी चटर्जी ने सौरव दास, अभिजीत दिपके और CJP के विरोध प्रदर्शन के आयोजकों के खिलाफ POCSO एक्ट की धाराओं के तहत जीरो FIR दर्ज करने की बंगाल के सिलीगुड़ी क्राइम ब्रांच में शिकायत दर्ज कराई है। उनका कहना है कि प्रदर्शन में 12 साल की बच्ची को शामिल क्यों किया गया था? अगर हिंसक हुए आंदोलन में बच्ची या बच्चियों की मौत हो गयी होती कौन जिम्मेदार होता?
वैसे ऐसी ही FIR हर उस प्रदर्शन/पत्थरबाजों पर भी हो जहाँ छोटे बच्चों और महिलाओं को ढाल बनाकर आगे कर दिया जाता है ताकि उनकी मौत होने पर सियासती रोटियां और लाशों पर बैठ मालपुए खाए जा सके।
एडवोकेट रिंकी चटर्जी सिंह के मुताबिक, “विरोध प्रदर्शन में बच्चों को शामिल करने के लिए आयोजकों के खिलाफ POCSO एक्ट की धारा 13, 14, और 15 और BNS की धारा 153 के तहत मामला दर्ज किया जाना चाहिए।”
#WATCH | Siliguri, West Bengal: On submitting a complaint for registration of a Zero FIR against Saurav Das, Abhijeet Dipke, and CJP organisers under sections of the POCSO Act, Advocate Rinki Chatterjee Singh says, "The FIR was filed over an incident at Jantar Mantar on July 20,… pic.twitter.com/N0GuAenHkH
वकील रिंकी चटर्जी सिंह ने कहा कि 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक को लेकर प्रदर्शन हो रहा था। इस दौरान लाठीचार्ज हुआ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया।
इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंस्टाग्राम पर एक लाइव वीडियो पोस्ट किया, जिसमें कहा गया कि उन्होंने युवाओं को उनकी भद्दी गालियों के लिए माफ कर दिया है और उनके भविष्य को देखते हुए कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी।
वकील के मुताबिक, CJP के ऑर्गनाइजर अभिजीत दिपके और सौरव दास ने बाद में 12 साल की लड़कियों पर पुलिस के लाठीचार्ज और उनके साथ दुर्व्यवहार को लेकर पीएम मोदी से माफी की माँग की और इसको लेकर वीडियो पोस्ट किया।
इसको लेकर वकील रिंकी चटर्जी ने सवाल उठाया कि आखिर इतनी छोटी बच्चियों को विरोध प्रदर्शन में कौन लेकर आया और जिस उम्र में सुरक्षा देने की जरूरत होती है, उस उम्र में उसे विरोध प्रदर्शन में शामिल कैसे किया गया। उन्होंने इसके लिए आयोजकों पर पोक्सो एक्ट के तहत कार्रवाई की माँग की।
उन्होंने सवाल किया कि विरोध प्रदर्शन को कौन फंड कर रहा है, और पैसा कहाँ से आ रहा है? यह बिल्कुल ‘डीप स्टेट’ का काम है। उनका कहना है कि इसमें कुछ दलाल और देशद्रोही शामिल हैं। हमारे अपने देश के लोग जो इसका भला नहीं चाहते। वे सभी मोदी सरकार को गिराने की कोशिश में एक साथ आ गए हैं।
दरअसल जंतर मंतर के प्रदर्शन के दौरान नाबालिग बच्चों के शामिल होने पर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया था कि पुलिस के लाठीचार्ज में इनमें से कई बच्चे घायल हुए हैं।
(फोटो साभार: इंडिया टूडे, बिजनेस स्टैंडर्ड) कई वर्षों से योगेंद्र यादव खुद को लोकतंत्र, संवैधानिक व्यवस्था और नागरिक स्वतंत्रताओं के प्रति प्रतिबद्ध एक सार्वजनिक बुद्धिजीवी के रूप में पेश करते रहे हैं। लेकिन उनके राजनीतिक हस्तक्षेप लगातार लोकतांत्रिक राजनीति की एक अलग ही अवधारणा को सामने रखते हैं।
यह ऐसी सोच है, जिसमें संसदीय प्रक्रियाओं से अधिक महत्व लगातार आंदोलनों को दिया जाता है, चुनावों से मिली वैधता से ऊपर सड़क पर होने वाली लामबंदी (Mobilization) को रखा जाता है और सरकारों को चुनौती देने तथा बदलने के लिए संविधान के सामान्य लोकतांत्रिक तरीकों के बजाय ‘प्रतिरोध की राजनीति’ को प्राथमिकता दी जाती है।
NEET पेपर लीक को लेकर हुए आंदोलन पर उनका हालिया लेख केवल एक विरोध प्रदर्शन के बारे में नहीं है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें एक व्यापक राजनीतिक रणनीति सामने आती दिखाई देती है। योगेंद्र यादव ने तर्क दिया है कि विपक्ष को चुनावी राजनीति से आगे बढ़कर ‘प्रतिरोध की राजनीति’ की ओर जाना चाहिए।
उन्होंने जंतर-मंतर पर हुए हिंसक आंदोलन को इस नई राजनीति के एक मॉडल के रूप में भी प्रस्तुत किया है।
(साभार: इंडियन एक्सप्रेस)
इस तर्क की गंभीरता से जाँच होनी चाहिए, खासकर 2026 में पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत के बाद।
पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत और उसके बाद शुभेंदु अधिकारी का राज्य के पहले BJP मुख्यमंत्री बनना केवल एक और विधानसभा चुनाव का परिणाम नहीं था। यह उस राजनीतिक धारणा के टूटने का संकेत था, जिसमें BJP के वैचारिक विरोधी पश्चिम बंगाल को भगवा दल के लिए आखिरी बड़ा राजनीतिक गढ़ मानते थे।
लंबे समय तक पश्चिम बंगाल को वामपंथी-उदारवादी राजनीति, क्षेत्रीय प्रतिरोध और BJP विरोधी वैचारिक एकजुटता का केंद्र बताया जाता रहा। ऐसे में राज्य में BJP की जीत ने सिर्फ चुनावी समीकरण ही नहीं बदले, बल्कि भारतीय राजनीति की मनोवैज्ञानिक तस्वीर भी बदल दी।
BJP विरोधी खेमे का लंबे समय से मानना था कि जैसे ही पार्टी की राजनीतिक रफ्तार कमजोर होगी, उसका सामाजिक गठबंधन बिखरेगा या कुछ मजबूत राज्य उसके विस्तार को रोक देंगे, वैसे ही उसे चुनाव में हराया जा सकेगा।
लेकिन BJP ने बार-बार यह दिखाया कि वह बदलते हालात के अनुसार खुद को ढाल सकती है, अपना जनाधार बढ़ा सकती है, राष्ट्रवाद को अपने मुख्य आधार के रूप में बनाए रख सकती है, सुशासन के मुद्दों को चुनावी समर्थन में बदल सकती है और उन इलाकों में भी अपनी जगह बना सकती है जिन्हें कभी उसके लिए पूरी तरह प्रतिकूल माना जाता था।
पश्चिम बंगाल के नतीजों ने इस पूरी बहस की दिशा बदल दी। ऐसे में कुछ कार्यकर्ताओं और वैचारिक समूहों के बीच लगातार सार्वजनिक आंदोलनों के प्रति बढ़ते उत्साह को केवल ‘लोकतांत्रिक असहमति’ के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसे चुनावी राजनीति की सीमाओं से पैदा हुई निराशा के रूप में भी समझा जा सकता है।
इसका यह मतलब नहीं है कि हर प्रदर्शनकारी या कार्यकर्ता की सोच एक जैसी है या फिर हर सार्वजनिक आंदोलन गलत है। लेकिन इससे एक अहम सवाल जरूर उठता है कि जब चुनावी राजनीति बार-बार मनचाहा राजनीतिक परिणाम देने में असफल रहती है और राजनीतिक आंदोलनों पर वही पुराने चेहरे हावी हो जाते हैं, तो क्या सड़क को निर्णायक राजनीतिक मैदान बनाने का आकर्षण बढ़ने लगता है? योगेंद्र यादव के हालिया बयान भी इसी तरह के बदलाव की ओर इशारा करते दिखाई देते हैं।
फिर से आ गया पेशेवर प्रदर्शनकारी
पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ हुए शायद ही किसी बड़े आंदोलन में ऐसा हुआ हो, जिसमें योगेंद्र यादव किसी न किसी रूप में सक्रिय भागीदार, टिप्पणीकार या वैचारिक समर्थक के तौर पर नजर न आए हों।
नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ हुए प्रदर्शनों और शाहीन बाग धरने से लेकर किसान आंदोलन और अब परीक्षा में अनियमितताओं को लेकर CJP के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन तक, योगेंद्र यादव लगातार ऐसे आंदोलनों के साथ खड़े दिखाई दिए हैं, जिनका उद्देश्य मोदी सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाना रहा है।
सिर्फ इससे उन्हें अलोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता। किसी भी सार्वजनिक बुद्धिजीवी को किसी मुद्दे या आंदोलन का समर्थन करने का अधिकार है। लेकिन एक पैटर्न लगातार दिखाई देता है, जिसे नजरअंदाज करना आसान नहीं है। सबसे बड़ी चिंता तब पैदा होती है, जब जनता के गुस्से को भड़काने और उन्हें हिंसा की ओर उकसाने की कोशिश की जाती है।
हाल ही में वायरल हुए एक वीडियो में योगेंद्र यादव कहते नजर आए कि लोकतंत्र संसद से नहीं, बल्कि सड़कों से चलेगा। इस बयान को कई लोगों ने हिंसक और टकराव वाली राजनीति को समर्थन देने वाला बताया।
“Democracy will run from the streets, not Parliament”
Yogendra Yadav is blatantly advocating for anarchy!
यही राजनीतिक तरीका बार-बार सामने आता दिखाई देता है। किसी एक विशेष शिकायत को पूरे संस्थागत ढाँचे पर आरोप में बदल दिया जाता है। किसी सरकारी नीति पर मतभेद को लोकतंत्र के पूरी तरह विफल हो जाने का प्रमाण बताया जाता है। एक विरोध प्रदर्शन को चुनी हुई सरकार की वैधता पर नैतिक जनमत-संग्रह की तरह पेश किया जाता है।
और धीरे-धीरे जवाबदेही की भाषा की जगह हिंसा और टकराव की भाषा लेने लगती है। CJP का आंदोलन इसी बदलाव का ताजा उदाहरण माना जा सकता है।
NEET परीक्षा में हुई अनियमितताओं की निष्पक्ष और गंभीर जाँच होना जरूरी था। परीक्षा में गड़बड़ियों या पेपर लीक से प्रभावित छात्रों को न्याय मिलना चाहिए और प्रशासनिक लापरवाही से परेशान परिवारों के प्रति जवाबदेही तय होनी चाहिए। किसी भी सरकार को ऐसी चिंताओं को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
लेकिन प्रशासनिक सुधार की माँग करने और हर सार्वजनिक शिकायत को हिंसक सड़क आंदोलन में बदल देने के बीच एक स्पष्ट अंतर होता है। यह अंतर तब और महत्वपूर्ण हो जाता है, जब कुछ कार्यकर्ता जनता के गुस्से को केवल सुधार की माँग के रूप में नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक टकराव का आधार बनाने की कोशिश करने लगते हैं।
‘ऑक्युपाई इंडिया’ को खड़ा करना
अपने Indian Express के लेख में योगेंद्र यादव ने जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन को भारत का ‘ऑक्युपाई मोमेंट’ बताया। उन्होंने इस आंदोलन के बड़े पैमाने, इसमें शामिल विभिन्न वर्गों की भागीदारी और इसकी स्वतःस्फूर्त प्रकृति की सराहना करते हुए इसे ऐसा ‘स्वाभाविक जन आंदोलन’ कहा, जो पारंपरिक राजनीतिक दलों की व्यवस्था से अलग खड़ा हुआ।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि विपक्ष को अब अपनी राजनीति का केंद्र चुनावों से आगे बढ़ाकर ‘प्रतिरोध की राजनीति’ की ओर ले जाना चाहिए।
यहाँ इस्तेमाल की गई भाषा महत्वपूर्ण है।
‘प्रतिरोध की राजनीति’ सुनने में तब तक सामान्य लग सकती है, जब इसका इस्तेमाल शांतिपूर्ण विरोध और लोकतांत्रिक असहमति के समर्थन में किया जाए। किसी भी लोकतंत्र में नागरिकों का अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना, विरोध करना और सरकार से जवाबदेही माँगना जरूरी होता है। लेकिन यही शब्द तब कहीं अधिक गंभीर अर्थ लेने लगते हैं, जब इनके जरिए यह संकेत दिया जाए कि प्रतिनिधिक लोकतंत्र और चुनावी राजनीति अब पर्याप्त नहीं रह गई है।
योगेंद्र यादव का तर्क इस धारणा पर आधारित है कि भारत उस दिशा में बढ़ रहा है, जिसे वह ‘चुनावी निरंकुशता’ (Electoral Autocracy) कहते हैं। इस सोच के अनुसार चुनाव तो होते रहते हैं, लेकिन चुनावी व्यवस्था को इस तरह पेश किया जाता है मानो वह अब वास्तविक लोकतांत्रिक बदलाव लाने में सक्षम नहीं रह गई हो।
इसका राजनीतिक संदेश साफ है।
अगर चुनावों को पर्याप्त नहीं माना जाएगा, तो फिर सड़क पर होने वाले आंदोलन नैतिक रूप से अधिक महत्वपूर्ण माने जाने लगेंगे। वे केवल लोकतांत्रिक अधिकार नहीं रहेंगे, बल्कि राजनीति का एक वैकल्पिक मंच बन जाएँगे। संसद की भूमिका पीछे छूटने लगेगी, चुनावी जनादेश पर सवाल उठाए जाएंगे और सार्वजनिक प्रदर्शन ही राजनीतिक वैधता का नया आधार बनने लगेंगे।
यही वह बिंदु है, जहाँ खतरा पैदा होता है।
भारत ऐसा देश नहीं है, जहाँ चुनाव खत्म हो गए हों। यहां आज भी सरकारें चुनाव जीतती और हारती हैं। कई राज्यों में विपक्ष की सरकारें हैं। अदालतें सार्वजनिक विवादों में हस्तक्षेप करती हैं। संसद काम कर रही है और चुनावी मुकाबले लगातार होते रहते हैं। पश्चिम बंगाल में BJP की जीत भी, चाहे उसका राजनीतिक आँकलन कुछ भी हो, यह दिखाती है कि भारतीय राजनीति में चुनावों के जरिए बदलाव की पूरी संभावना बनी हुई है।
इसलिए सवाल यह नहीं है कि बीजेपी राजनीतिक रूप से मजबूत है या नहीं। वह है।
असल सवाल यह है कि इस राजनीतिक बढ़त का जवाब नए जनसमर्थन और चुनावी प्रतिस्पर्धा के जरिए दिया जाना चाहिए या फिर लगातार आंदोलनों की ऐसी स्थायी राजनीति के जरिए, जिसका उद्देश्य बैलट बॉक्स के बाहर चुनी हुई सरकार की वैधता को कमजोर करना हो।
बंगाल और हताशा की राजनीति
पश्चिम बंगाल का चुनाव परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उसने एक लंबे समय से बनी वैचारिक धारणा को झटका दिया है।
कई वर्षों तक BJP के आलोचक पश्चिम बंगाल को एक प्रतीकात्मक सीमा के रूप में देखते रहे। उनका मानना था कि यह ऐसा राज्य है, जहाँ हिंदुत्व की राजनीति चुनावी स्तर पर सीमित रहेगी, जहाँ की राजनीतिक संस्कृति भगवा दल के विस्तार को रोक देगी और जहाँ वामपंथी-उदारवादी विचारधारा की जड़ें सबसे मजबूत बनी रहेंगी।
लेकिन अब यह धारणा टूट चुकी है। पश्चिम बंगाल में BJP की जीत ने केवल पार्टी को एक और राज्य नहीं दिया, बल्कि उन लोगों की सोच को भी बड़ा झटका दिया, जो मानते थे कि चुनावी राजनीति अंततः BJP के विस्तार की एक स्वाभाविक सीमा तय कर देगी। शुभेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने के साथ BJP अब उस राजनीतिक क्षेत्र में पहुँच चुकी है, जिसे कभी उसके लिए लगभग असंभव माना जाता था।
बदले हुए इसी राजनीतिक माहौल में योगेंद्र यादव का ‘प्रतिरोध की राजनीति’ पर जोर और अधिक महत्वपूर्ण नजर आता है।
इसकी एक व्याख्या यह हो सकती है कि योगेंद्र यादव और उनके जैसे वैचारिक समूह अब यह महसूस करने लगे हैं कि पारंपरिक चुनावी राजनीति के जरिए BJP को हराना उनकी अपेक्षा से कहीं अधिक कठिन है। लगातार आलोचनाओं, सत्ता विरोधी माहौल की कोशिशों और राजनीतिक हमलों के बावजूद BJP ने अपना व्यापक जनसमर्थन बनाए रखा है और उन राज्यों में भी विस्तार किया है, जिन्हें कभी उसके लिए वैचारिक रूप से बंद माना जाता था।
ऐसे में CJP के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन को केवल परीक्षा में अनियमितताओं के खिलाफ छात्रों की प्रतिक्रिया के रूप में ही नहीं, बल्कि BJP विरोधी वैचारिक समूहों के लिए एक नए राजनीतिक मंच के रूप में भी देखा जा सकता है। ऐसा मंच, जिसकी नींव जन असंतोष, गुस्से, कैंपस आधारित लामबंदी, सोशल मीडिया पर वायरल अभियानों और बड़े पैमाने पर सार्वजनिक आंदोलनों पर टिकी हो।
इसका यह मतलब नहीं है कि इस आंदोलन में शामिल हर छात्र या प्रतिभागी राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित है। कई छात्रों की चिंताएँ पूरी तरह वास्तविक और जायज हो सकती हैं। लेकिन जब प्रभावशाली वैचारिक समूह ऐसे आंदोलनों से जुड़ते हैं, तो वे केवल निष्पक्ष पर्यवेक्षक बनकर नहीं आते। वे अपने साथ राजनीतिक सोच, संगठनात्मक अनुभव और दीर्घकालिक रणनीतिक लक्ष्य भी लेकर आते हैं।
योगेंद्र यादव द्वारा इस आंदोलन का खुलकर समर्थन करना यह संकेत देता है कि वह इसे केवल परीक्षा सुधार के अभियान के रूप में नहीं देखते। उनकी नजर में यह भविष्य की राजनीति का एक संभावित मॉडल या खाका हो सकता है।
जब विरोध धीरे-धीरे ‘सड़क पर वीटो’ का रूप लेने लगता है
विरोध प्रदर्शन और ‘सड़क के जरिए वीटो’ (Street Veto) के बीच का अंतर केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि लोकतंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। एक विरोध प्रदर्शन सरकार से अपनी बात सुनने और उस पर विचार करने की मांग करता है। वहीं स्ट्रीट वीटो की सोच यह मानकर चलती है कि सरकार को सड़क पर जुटी भीड़ के दबाव के आगे झुकना ही होगा।
विरोध प्रदर्शन का उद्देश्य सरकार की नीतियों को प्रभावित करना हो सकता है, लेकिन स्ट्रीट वीटो का लक्ष्य लोकतांत्रिक संस्थाओं की वैधता पर सवाल खड़े करना होता है।
कोई भी विरोध प्रदर्शन तेज, असुविधाजनक या व्यापक हो सकता है, लेकिन यदि वह लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर रहता है तो वह लोकतंत्र का हिस्सा माना जाता है। स्ट्रीट वीटो की स्थिति तब पैदा होती है, जब कोई संगठित समूह यह दावा करने लगे कि संसद के बाहर उसकी मौजूदगी और उसका जनसमर्थन, संसद के भीतर मौजूद चुनावी जनादेश से अधिक वैध और महत्वपूर्ण है।
इसी वजह से योगेंद्र यादव का वह वायरल वीडियो चिंता का विषय माना जा रहा है, जिसमें वह कहते हैं कि लोकतंत्र संसद से नहीं, बल्कि सड़कों से चलेगा।
संसद कोई सामान्य संस्था नहीं है। यह जनता की संप्रभुता की संवैधानिक अभिव्यक्ति है। सांसदों को अपनी वैधता सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के जरिए मिले जनादेश से प्राप्त होती है। सरकारें जनता के वोट से चुनी जाती हैं, लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से जवाबदेह बनाई जाती हैं और चुनावों के जरिए ही बदली जाती हैं।
भारतीय संविधान शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से एकत्र होने तथा विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार देता है, लेकिन वह कानून बनाने या शासन चलाने का अधिकार उस समूह को नहीं देता, जो सबसे बड़ी या सबसे शोरगुल वाली भीड़ जुटा ले।
अगर संसद से ऊपर सड़क को रखा जाने लगे, तो लोकतांत्रिक राजनीति धीरे-धीरे टकराव और अवरोध की प्रतिस्पर्धा में बदल सकती है। तब चुनाव हारने वाला हर राजनीतिक दल या समूह मतपेटी के बजाय सड़क जाम, घेराव, दबाव और लगातार आंदोलनों के जरिए दूसरा जनादेश हासिल करने की कोशिश करेगा।
यह लोकतंत्र को मजबूत करने का रास्ता नहीं है। बल्कि यह उस संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर करने का खतरा पैदा करता है, जिसके आधार पर लोकतंत्र कायम रहता है।
हिंसा के सवाल को नहीं किया जा सकता नजरअंदाज
यह चिंता इसलिए और गंभीर हो जाती है क्योंकि CJP का आंदोलन केवल भाषणों, तख्तियों और शांतिपूर्ण प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा।
मीडिया रिपोर्ट्स और पुलिस के अनुसार, जंतर-मंतर के पास प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई, जिसमें पुलिसकर्मी भी घायल हुए। अधिकारियों का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने पथराव किया और सुरक्षा बलों पर हमला किया, जबकि प्रदर्शनकारियों और विपक्ष ने इसके लिए पुलिस को जिम्मेदार ठहराया।
इन दोनों पक्षों के दावों की निष्पक्ष जाँच और जहाँ आवश्यक हो, न्यायिक प्रक्रिया के जरिए सत्य सामने आना चाहिए। लेकिन एक बात केवल इसलिए विवाद का विषय नहीं बननी चाहिए क्योंकि इस आंदोलन के इर्द-गिर्द राजनीति हो रही है। पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा को लोकतांत्रिक प्रतिरोध कहकर उचित नहीं ठहराया जा सकता।
पथराव को संवैधानिक असहमति नहीं कहा जा सकता और सुरक्षा बलों पर हमला लोकतांत्रिक भागीदारी का विकल्प नहीं हो सकता। जो भी आंदोलन नैतिक आधार पर खुद को सही ठहराने का दावा करता है, उसे ऐसी हिंसक घटनाओं की बिना किसी शर्त के निंदा करनी चाहिए। यही कारण था कि महात्मा गाँधी हिंसक प्रदर्शनों के सख्त विरोधी थे।
हालाँकि आज जो लोग खुद को गाँधी की वैचारिक परंपरा का प्रतिनिधि बताते हैं, वे कई बार तथाकथित ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शनों’ के दौरान हुई हिंसा की उतनी स्पष्ट आलोचना करते नजर नहीं आते। यहीं पर योगेंद्र यादव की भाषा और बयान महत्वपूर्ण हो जाते हैं। जब कोई सार्वजनिक बुद्धिजीवी लगातार किसी सरकार को तानाशाही प्रवृत्ति वाला, संसद को अपर्याप्त और ‘प्रतिरोध’ को लोकतंत्र का सबसे बड़ा माध्यम बताने लगे, तो ऐसा माहौल बन सकता है जिसमें टकराव और उग्रता राजनीतिक रूप से उचित या सार्थक दिखाई देने लगें।
हो सकता है कि वे सीधे तौर पर हिंसा का आह्वान न करें, लेकिन ऐसी भाषा, जो हर राजनीतिक विवाद को अत्याचार के खिलाफ लड़ाई के रूप में पेश करती है, लोगों को यह महसूस करा सकती है कि टकराव नैतिक रूप से उचित है। क्योंकि शब्द कभी भी शून्य में अस्तित्व नहीं रखते, उनके सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव भी होते हैं।
अंबेडकरवादी विरोधाभास
योगेंद्र यादव और उनके वैचारिक समर्थक अक्सर डॉ भीमराव आंबेडकर, संवैधानिक नैतिकता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा की बात करते हैं। लेकिन डॉ आंबेडकर की संवैधानिक सोच इस विचार पर आधारित नहीं थी कि भीड़ प्रतिनिधिक संस्थाओं की जगह ले ले।
इसके विपरीत, उनका स्पष्ट मानना था कि जब भारत ने राजनीतिक बदलाव के लिए संवैधानिक रास्ते अपना लिए हैं, तब नागरिकों और राजनीतिक दलों को सत्ता परिवर्तन के लिए संविधान से बाहर के तरीकों को सामान्य नहीं बनाना चाहिए। संविधान किसी भी सरकार को चुनौती देने के लिए कई लोकतांत्रिक और संवैधानिक रास्ते उपलब्ध कराता है।
नागरिक चुनाव में वोट दे सकते हैं। विपक्षी दल चुनाव लड़ सकते हैं। अदालतों में याचिकाएँ दायर की जा सकती हैं। संसद में कानूनों पर बहस हो सकती है। मीडिया सरकार की कार्यप्रणाली की जाँच और आलोचना कर सकता है। वहीं, शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन भी जनमत को प्रभावित करने का एक लोकतांत्रिक माध्यम है।
लेकिन इनमें से कोई भी संवैधानिक व्यवस्था यह नहीं कहती कि किसी निर्वाचित सरकार की वैधता को लगातार सड़क पर होने वाले आंदोलनों या भीड़ के दबाव के भरोसे रखा जाए।विडंबना यह है कि जो लोग खुद को संविधान का रक्षक बताते हैं, वही कई बार उसके सबसे मूल सिद्धांत को कमजोर करते हुए दिखाई देते हैं।
संविधान का मूल सिद्धांत यही है कि राजनीतिक सत्ता और उसकी वैधता संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से संचालित होनी चाहिए, न कि वैचारिक दबाव बनाने वाले ऐसे आंदोलनों के जरिए जिनका उद्देश्य शासन को प्रभावी ढंग से चलने से रोकना हो।
लोकतंत्र में विरोध जरूरी, लेकिन इसे विरोध के जरिए नहीं चलाया जा सकता
भारत को असहमति की जरूरत है। देश को ऐसे छात्र आंदोलन, नागरिक समाज संगठन, विपक्षी दल और सार्वजनिक बुद्धिजीवी चाहिए, जो सत्ता से सवाल पूछ सकें और सरकार को जवाबदेह बना सकें। लेकिन इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि लोकतांत्रिक दबाव और राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने की कोशिश के बीच का अंतर स्पष्ट बना रहे।
पश्चिम बंगाल में BJP की जीत ने इस अंतर को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। इस जीत ने दिखाया कि BJP का राजनीतिक विस्तार अब केवल उसके पारंपरिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। साथ ही यह भी स्पष्ट हुआ कि उसके विरोधी लंबे समय तक इस उम्मीद पर निर्भर नहीं रह सकते कि चुनावी राजनीति अपने आप उनके पसंदीदा वैचारिक संतुलन को वापस ले आएगी।
संभव है कि यही कारण हो कि लगातार आंदोलनों की राजनीति कुछ वर्गों को अधिक आकर्षित करने लगी है। भारत के सामने चुनौती यह है कि चुनावी नतीजों से असंतोष कहीं चुनावी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति अविश्वास में न बदल जाए।
योगेंद्र यादव ‘प्रतिरोध की राजनीति’ को लोकतंत्र को मजबूत करने का माध्यम बताकर पेश कर सकते हैं। लेकिन जब इसे लगातार उग्र सड़क आंदोलनों के महिमामंडन, संसद के प्रति अविश्वास और हर सार्वजनिक शिकायत को सरकार की वैधता के संकट में बदलने की कोशिशों के साथ देखा जाता है, तो यह एक अलग तरह की राजनीति का रूप लेती दिखाई देती है।
ऐसी राजनीति, जो लोकतांत्रिक अधिकार का केंद्र जनता के वोट और चुनावी जनादेश से हटाकर सड़कों पर होने वाले राजनीतिक प्रदर्शनों की ओर ले जाने का प्रयास करती है।
यह एक बेहद जोखिम भरा विचार माना जा सकता है। योगेंद्र यादव के हस्तक्षेप का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह नहीं है कि वह विरोध प्रदर्शन के अधिकार का समर्थन करते हैं। शांतिपूर्ण विरोध किसी भी संवैधानिक लोकतंत्र का आवश्यक हिस्सा है।
असली चिंता यह है कि उनकी अवधारणा सड़क पर होने वाले आंदोलनों को केवल लोकतांत्रिक अधिकार तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उन्हें राजनीतिक वैधता के समानांतर स्रोत के रूप में स्थापित करती दिखाई देती है। ‘प्रतिरोध की राजनीति’ की वकालत और यह कहना कि लोकतंत्र ‘संसद से नहीं, बल्कि सड़कों से चलेगा’, ऐसी राजनीतिक सोच को सामने रखता है, जो भारतीय गणराज्य की संवैधानिक व्यवस्था के साथ सहज मेल नहीं खाती।
भारतीय संविधान के अनुसार सर्वोच्च राजनीतिक अधिकार जनता में निहित है, जो चुनावों और प्रतिनिधिक संस्थाओं के माध्यम से लागू होता है। विरोध प्रदर्शन इसलिए संरक्षित है क्योंकि वह लोकतंत्र को मजबूत करता है, न कि इसलिए कि वह उन संस्थाओं की जगह ले सकता है, जिनके जरिए लोकतांत्रिक सत्ता संचालित होती है।
लोकतंत्र विरोध प्रदर्शनों को दबाने से मजबूत नहीं होता। वह तब मजबूत होता है, जब विरोध प्रदर्शन संविधान के दायरे में रहकर जनमत को प्रभावित करने का माध्यम बने, न कि जनता की संप्रभुता और चुनावी जनादेश का विकल्प।
सड़कों पर उठने वाली आवाज सुनी जानी चाहिए, लेकिन संप्रभुता का अंतिम स्रोत सड़क नहीं, बल्कि जनता का लोकतांत्रिक जनादेश और संविधान ही होना चाहिए।
भारत में घुसपैठियों को अपना दामाद मानने वालों की कमी नहीं। विपक्ष तो यह काम कर ही रहा है, लेकिन कुछ मीडिया वाले भी पीछे नहीं। जो समाचार-पत्र घुसपैठियों को बाहर निकालने के लिए विलाप करता हो उसके राष्ट्रहित समाचार प्रकाशित करने पर भी शंका होती है। क्या घुसपैठियों पर विलाप करने के लिए उनके दामादों के आकाओं ने किसी रूप में इनाम दिया है? क्या दामाद घुसपैठियों का विलाप करने वाले समाचारपत्र को नहीं मालूम कि ये दामाद किस तरह भारत की अर्थव्यवस्था में दीमक का काम कर रहे हैं?
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की अभूतपूर्व सफलता मिली। पार्टी ने पूर्व सीएम ममता बनर्जी की अखिल भारतीय तृणमूल कॉन्ग्रेस (एआईटीसी या टीएमसी) को सत्ता से बेदखल करते हुए 200 सीटों का आँकड़ा पार किया। यह राज्य में ऐतिहासिक राजनीतिक बदलाव का प्रतीक था और इसने शासन में एक नए युग की शुरुआत की।
नई शुभेंदु सरकार ने भारत-बांग्लादेश की सीमा को सुरक्षित करना और अवैध माइग्रेशन के खिलाफ एक मजबूत नीति लागू करना जैसे महत्वपूर्ण कार्य शुरू किए, जिन्हें पिछली सरकार ने नजरअंदाज कर दिया था।
दरअसल, टीएमसी ने राज्य में बांग्लादेशी घुसपैठियों की एंट्री को बनाए रखने के लिए केंद्र सरकार के साथ लगातार लड़ती रही, यहाँ तक कि उसके नेताओं ने राष्ट्रीय सुरक्षा और हितों को नुकसान पहुँचाते हुए इस तरह के घुसपैठियों को बढ़ावा देने का दावा भी किया। हालाँकि, वोट बैंक की राजनीति के लिए अपनाई गई इस खतरनाक रणनीति को शुभेंदु अधिकारी सरकार ने रोक दिया।
घुसपैठियों का बचाव करने में जुटा गुट
1 जुलाई 2026 को Financial Times ने ‘भारत ने रात के अंधेरे में हजारों प्रवासियों को निष्कासित किया’ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया इसके लेखक एंड्रेस शिपानी थे। यह लेख एक संप्रभु राष्ट्र की निर्वाचित राज्य सरकार के फैसलों के विरोध में था, जिसने अपने मतदाताओं के व्यापक हित में पड़ोसी देश से अवैध घुसपैठ पर रोक लगाने का प्रयास करते हुए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।
लेख में पाठकों को उकसाने के लिए सनसनीखेज शीर्षक का भी इस्तेमाल किया गया। जिसमें आरोप लगाया गया कि भारत में कानून का उल्लंघन करके प्रवेश करने वालों के बजाय वैध नागरिकों को निष्कासित किया जा रहा है।
कथित सरकारी क्रूरता और अन्याय की एक सनसनीखेज कहानी गढ़ते हुए लेख में दावा किया गया, “बांग्लादेशी सीमा रक्षक लाउडस्पीकर का इस्तेमाल करके अपने भारतीय समकक्षों को लोगों को सीमा पार धकेलने से रोकते हैं।”
इसने बांग्लादेशी अधिकारियों के हवाले से कहा कि भारतीय पक्ष अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए अंधेरे का इस्तेमाल ढाल के रूप में करता है, जो मई में पश्चिम बंगाल में भगवा पार्टी के सत्ता में आने के बाद से और भी बढ़ गया है।
लेख में लांस कॉर्पोरल महमूद मसूद के हवाले से लिखा गया है कि उसने बताया, “वे अंधेरा होने का इंतजार करते हैं, फिर स्पॉटलाइट बंद कर देते हैं और सही मौके की तलाश करते हैं।” बांग्लादेश सीमा सुरक्षा के महानिदेशक मोहम्मद अशरफुज्जमान सिद्दीकी ने जोर देकर कहा, “वे भारतीय बाड़ के फाटक खोल देते हैं और लोगों को अँधेरे में धकेल देते हैं। वहाँ महिलाएँ होती हैं, बच्चे होते हैं और ये बेचारे लोग बीच में फँस जाते हैं।”
आर्टिकल में बताया गया है कि भारतीय और बांग्लादेशी अधिकारियों के अनुसार, राज्य ने हजारों लोगों को, जिनमें अधिकतर बंगाली मूल के मुस्लिम हैं, बांग्लादेश भेज दिया है। इसमें दावा किया गया है कि बांग्लादेशी अधिकारियों ने ‘भारत और बांग्लादेश की सीमा में मौजूद एक पतली बंजर भूमि जीरो लाइन में फँसे दर्जनों लोगों’ के बारे में बताया।
इसमें कहीं भी बांग्लादेश की आलोचना नहीं की गई है कि वह अपने नागरिकों को अपने यहाँ लाना क्यों नहीं चाहता? बल्कि बड़ी चालाकी से भारत को ‘खलनायक’ के रूप में पेश करने की कोशिश करता है। लेखक कहता है, “निर्वासन अभियान ने दोनों देशों के बीच नाजुक संबंधों को और खराब कर दिया है, हिंदू राष्ट्रवाद के बारे में आशंकाओं को रेखांकित किया है और पश्चिम बंगाल और दूसरे सीमावर्ती राज्यों में लाखों मुसलमानों के लिए असुरक्षा की भावना को बढ़ा दिया है।”
बेशक Financial Times ने तुरंत ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ का सहारा लिया। ज्यादातर लिबरल गैंग इस मूलभूत सिद्धांत का ही सहारा लेते हैं मोदी सरकार पर हमला करने के लिए। लेकिन यह हिन्दू राष्ट्रवाद का नहीं, बल्कि घुसपैठियों को पीड़ित के रूप में पेश करने के दुष्प्रचार का एक हिस्सा है।
धार्मिक रंग देने की कोशिश
लेख में भारत-बांग्लादेश के बीच ऐतिहासिक संबंधों और पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश की भाषा में समानता का हवाला देते हुए तर्क दिया कि सरकार को देश में अवैध बांग्लादेशियों को शरण देना चाहिए था। इसमें बांग्लादेश को बस शांत रहने की सलाह दी गई है. क्योंकि उसके लोग पड़ोस में बेलगाम भाग रहे हैं।
असम जैसे राज्यों में बांग्लादेशियों के अनियंत्रित और बड़े पैमाने पर हो रहे प्रवाह को एक भावुक ‘माइग्रेशन का इतिहास’ के रूप में चित्रित किया गया है। इसका इतिहास या वास्तविकता में कोई लेना-देना नहीं है। इसके बाद लेख में पश्चिम बंगाल सरकार पर अवैध बांग्लादेशी या रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर नाराजगी जताई गई।
आर्टिकल में इस बात पर जोर दिया गया कि राज्य में 30% मुस्लिम आबादी है, जिसका मतलब यह था कि इन कार्रवाइयों से उन पर असर पड़ने की संभावना है। यह बात नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) विरोधी आंदोलन के दौरान फैलाई गई साजिश की याद दिलाती है, जिसमें कहा गया था कि इस कानून का इस्तेमाल दूसरी सबसे बड़ी बहुसंख्यक आबादी के खिलाफ हथियार के तौर पर किया जाएगा। हालाँकि इसके लागू होने के बाद ऐसी कोई बात सामने नहीं आई।
संविधान में भारतीय नागरिकों को उनके धर्म की परवाह किए बिना देश के किसी भी हिस्से में रहने और बसने की छूट है, लेकिन सरकार की विश्वसनीयता को कम करने और संदेह और विभाजन को बढ़ावा देने के लिए इस तरह की बयानबाजी से सच्चाई को दबाने और हिंसा के लिए भड़काने का प्रयास किया गया।
Financial Times ने जोर देते हुए कहा, “आलोचकों का कहना है कि निर्वासन की यह मुहिम भाजपा की भारत को मुस्लिम अल्पसंख्यकों की कीमत पर एक हिंदू राष्ट्र बनाने की इच्छा को दर्शाती है।” इसके बाद उसने ह्यूमन राइट्स वॉच की एशिया उप प्रमुख मीनाक्षी गाँगुली के हवाले से कहा कि भारतीय अधिकारी ज्यादातर मुस्लिम परिवारों को बेरहमी से बांग्लादेश में धकेलने या उन्हें सीमा पर छोड़ रहे हैं। साथ ही ‘मुस्लिम के प्रति इस निंदनीय शत्रुता को समाप्त करने’ की अपील की।
अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने वाले तत्वों से निपटने के लिए सरकार की रणनीति को फाइनेंशियल टाइम्स द्वारा ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने की साजिश करार दिया गया। एक तरह से मीडिया संस्थान यह संकेत देता है कि भारत को चुपचाप देखते रहना चाहिए। जबकि भारत के नागरिक अच्छी तरह जानते हैं कि बांग्लादेशी और रोहिंग्या न केवल देश की अर्थव्यवस्था पर बोझ डाल रहे हैं, बल्कि मुस्लिम सहित सही नागरिकों के अधिकारों का भी उल्लंघन कर रहे हैं।
बांग्लादेश न केवल अपने नागरिकों को स्वीकार करने से इनकार कर रहा है, बल्कि अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं के खिलाफ दमन का एक शर्मनाक इतिहास भी रखता है। लेकिन इस गुट की विकृत विचारधारा उन अत्याचारों को सिर्फ देखती है जो नहीं हो रहा है। ये बांग्लादेश में हो रहे हिंदुओं पर अत्याचार को नजरअंदाज कर देती है।
न्यायिक आदेशों का सम्मान करने के लिए भाजपा सरकारों पर हमले
शिपानी ने पश्चिम बंगाल सरकार के ‘पता लगाओ, हटाओ और निर्वासित करो’ के दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए बताया कि मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने खुद की कहा था, “उनके पदभार संभालने के बाद से लगभग 10000 अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को निष्कासित किया जा चुका है, जबकि 1800 अन्य निर्वासन की प्रतीक्षा कर रहे हैं।”
इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि इस मंच ने असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के इस मुद्दे पर अडिग रुख की भी आलोचना की। मंच ने उनके उन बयानों का जिक्र किया, जिनमें उन्होंने भारत में डेमोग्राफी बदलाव ला सकने वाले घुसपैठियों से निपटने के लिए अपनी सरकार की नीतियों पर प्रकाश डाला था और इसलिए उन्हें उनके वतन वापस भेजने का इरादा जताया था।
गौरतलब है कि अवैध घुसपैठियों की भारी संख्या के कारण जनसांख्यिकीय बदलाव की नाजुक स्थिति को हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक ने माना था। 2025 में गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने कहा कि असम एक ‘मूक और दुर्भावनापूर्ण जनसांख्यिकीय आक्रमण’ का सामना कर रहा है और यह भी स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार के पास ‘भारतीय क्षेत्र से विदेशियों को निष्कासित करने का पूर्ण और असीमित अधिकार’ हैं। कोर्ट ने कहा, “राज्य के पास घोषित विदेशी नागरिक को निष्कासित करने की शक्ति है।”
असम में घुसपैठियों को शरण न देने में सीएम सरमा की अहम भूमिका रही है और उन्होंने घुसपैठियों के निर्वासन के लिए कठोर नीति अपनाई है। यह मुद्दा राज्य में विधानसभा चुनावों से पहले जारी किए गए पार्टी के घोषणापत्र का अभिन्न अंग रहा है। इसमें ‘विदेशी’ घोषित किए गए लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने का वादा किया गया था। उन्होंने वन और कृषि भूमि सहित कई एकड़ सार्वजनिक संपत्तियों को भी घुसपैठियों के कब्जे से मुक्त कराया है।
दोहरी मानसिकता का खुला प्रदर्शन
अदालत के आदेशों का पालन करने वाली सरकार से फाइनेंशियल टाइम्स को निश्चित रूप से चिढ़ होगी, क्योंकि यह उसके एजेंडे के खिलाफ था। हाल ही में भारत में हो रहे घटनाक्रमों पर बांग्लादेशी प्रधानमंत्री तारिक रहमान के बयान से भी इसका पता चलता है। बांग्लादेशी अधिकारियों ने अपने नागरिकों को स्वीकार करने में कोताही की है, जबकि पहले से ही करीब ’10 लाख रोहिंग्या’ शरणार्थी बने हुए हैं।
स्पष्ट रूप से बांग्लादेश के पास संकट को कम करने के लिए अपने ही नागरिकों को अस्वीकार करने का अधिकार है, लेकिन भारत, जो विश्व का सबसे अधिक आबादी वाला देश है, उसे खुद पर अतिरिक्त बोझ डालना होगा। इतना ही नहीं अपने संसाधनों के दुरुपयोग की अनुमति भी देनी होगी।
लेख में बताया गया है कि विदेश मामलों के राज्य मंत्री शमा ओबैद इस्लाम ने चेतावनी दी है कि अगर भारत अपना रुख नहीं बदलता है तो संबंध ‘तनावपूर्ण’ बने रहेंगे, जबकि उनके देश ने घोषणा की है कि वह एक भी रोहिंग्या का स्वागत नहीं करेगा।
दूसरी ओर, भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत में अवैध प्रवासियों के साथ कानूनी रूप से व्यवहार किया जाएगा। भारत ने राष्ट्रीयता सत्यापन के लिए बांग्लादेशी अधिकारियों को 2680 से अधिक मामले भेजे हैं, लेकिन ये अभी भी लंबित हैं। कई मामलों में तो 5 साल की दूरी हो गई है।
एफटी ने एक भारतीय अधिकारी के हवाले से कहा है कि देश निकाला एक तरह से तत्काल निष्कासन है, लेकिन इसके लिए उस देश का सहयोग आवश्यक है, जहाँ हम निर्वासित कर रहे हैं। दुर्भाग्य से, बांग्लादेश में ऐसा सहयोग कभी नहीं मिल रहा। उन्होंने कहा कि भारत के पास अवैध प्रवासियों को वापस भेजने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।
लेख को भावनात्मक मूल्य बनाने के लिए एक ऐसे घुसपैठिए की कहानी भी बताई, जिसे देश में एक दशक से अधिक समय तक रहने के बाद आत्मसमर्पण करना पड़ा।
Financial Times के इस आर्टिकल में सच्चाई की कोई परवाह नहीं की गई और इसका मकसद एक दुर्भावनापूर्ण एजेंडा को बढ़ावा देना था। बांग्लादेश ने भारतीय अधिकारियों के साथ सहयोग करने में अनिच्छा दिखाई है। ऐसे में भारतीय अधिकारियों के पास क्या विकल्प बचते हैं? एफटी हमेशा की तरह निष्क्रियता का समर्थन करेगा।
कोई भी समझदार सरकार अपने देश में किसी को भी प्रवेश करने की अनुमति नहीं दे सकती और न ही ऐसा करना चाहिए। खुली सीमाएँ किसी भी राष्ट्र के लिए अव्यावहारिक हैं, जिनमें भारत और बांग्लादेश भी शामिल हैं। यही कारण है कि मिस्र और जॉर्डन जैसे राष्ट्र विस्थापित फिलिस्तीनियों को स्वीकार करने से इनकार करते हैं, जबकि वे उनका भरपूर समर्थन करते हैं।
यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका सहित कई विकसित पश्चिमी शक्तियाँ भी इस तरह के अनियंत्रित आप्रवासन का विरोध करती हैं, क्योंकि वे अपने हितों को प्राथमिकता देती हैं। हालाँकि फाइनेंशियल टाइम्स के अनुसार, भारत को इस संप्रभु अधिकार का प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे उसकी स्थिरता और सुरक्षा दोनों खतरे में पड़ सकती हैं।
भारत का विभाजन धार्मिक आधार पर हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप पड़ोसी इस्लामी देशों में हिंदू समुदाय को अपने धर्म के कारण उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बड़े जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के परिणाम कश्मीर से लेकर मुर्शिदाबाद तक स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं।
योगी आदित्यनाथ या हिमंता सरमा से नहीं तो शुभेंदु अधिकारी से दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को सीखना चाहिए। दिल्ली में आए दिन हो रहे क़त्ल और अधिक्रमण पर श्रीमती रेखा गुप्ता को इन मुख्यमंत्रियों की तरह काम करना चाहिए। क्या हुआ CAG रिपोर्ट्स, शराब घोटाला, मनी लॉन्डरिंग आदि का? क्या इन सबको चुनाव आने तक ठंठे बस्ते में डाल दिया गया है? मुस्लिम तुष्टिकरण को छोड़ काम करना होगा। अब तक जो अधिक्रमण हटाए जा रहे हैं सभी हिन्दू क्षेत्रों में लेकिन मुस्लिम क्षेत्रों पर आंखें मूंदे हुए हैं। बंगाल मुख्यमंत्री शुभेंदु ने मुख्यमंत्री बनते ही विरोधियों के साथ-साथ दंगाइयों में और बांग्लादेश तक में खलबली मची हुई है।
ममता की पार्टी TMC ऐसे ही नहीं बिखरी, अधिकारी की कार्यशैली से बिखरी है। अगर अधिकारी ने बिना भेदभाव के काम किया ममता से अलग हुए कई विधायक और सांसद भी लपेटे में आएंगे। क्योकि ममता राज में जितना भी उपद्रव हुआ इन लोगों का भी प्रत्यक्ष नहीं तो अप्रत्यक्ष समर्थन था। यदि नहीं, फिर क्यों नहीं ममता का विरोध कर पार्टी छोड़ी? तब ये ही सब बड़े आनंद के साथ मलाई खा रहे था।
पश्चिम बंगाल में अपराधियों और दंगाइयों पर लगाम कसने के लिए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी एक बेहद सख्त नया कानून ला रहे हैं। सोमवार(29 जून) को विधानसभा में पेश होने जा रहा यह बिल यूपी के ‘बुलडोजर मॉडल’ से भी ज्यादा घातक माना जा रहा है।
इस नए कानून के तहत सार्वजनिक या निजी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वाले दंगाइयों से भारी वसूली की जाएगी। इसके कड़े प्रावधानों को देखकर अभी से विपक्ष और अपराधियों के बीच खलबली मच गई है।
54 साल पुराना ढर्रा होगा खत्म
बंगाल सरकार साल 1972 के पुराने कानून ‘द वेस्ट बंगाल मेंटेनेंस ऑफ पब्लिक ऑर्डर एक्ट’ में बड़ा बदलाव करने जा रही है। इसकी जगह अब विधानसभा में ‘पश्चिम बंगाल लोक सुरक्षा और असामाजिक गतिविधि नियंत्रण विधेयक, 2026’ पेश किया जाएगा।
सरकार का मानना है कि पुराना कानून आज के आधुनिक और संगठित अपराधों से निपटने के लिए काफी नहीं था। शुभेंदु अधिकारी सरकार ने साफ कर दिया है कि अब बंगाल में सिंडिकेट का नहीं बल्कि सिर्फ कानून का राज चलेगा।
दंगाइयों का होगा आर्थिक खात्मा
इस नए कानून का सबसे बड़ा डर इसका रिकवरी मैकेनिज्म यानी नुकसान की वसूली का नियम है। अगर किसी दंगे या बवाल में सरकारी या किसी की निजी संपत्ति को नुकसान पहुँचता है, तो उसकी पूरी भरपाई अपराधी की संपत्ति बेचकर की जाएगी।
कानूनी जानकारों के मुताबिक यह कानून इतना कड़ा है कि नुकसान की भरपाई करते-करते दंगाइयों की आने वाली 7 पीढ़ियाँ तक कंगाल हो जाएँगी। यह अपराधियों को पूरी तरह आर्थिक रूप से खत्म करने वाला कदम है।
UP के मॉडल से भी दो कदम आगे
यह नया बिल उत्तर प्रदेश के योगी मॉडल से भी ज्यादा सख्त बताया जा रहा है। इसमें पुलिस को बिना मुकदमे के हिरासत में लेने और अपराधियों को जिले से बाहर निकालने की असीमित शक्तियाँ दी गई हैं। इतना ही नहीं, दंगाइयों और गुंडों को शरण देने वालों के खिलाफ भी इसमें सख्त नियम हैं। अब किसी भी अपराधी को छिपाने या पनाह देने पर सीधे दो साल की जेल की सजा काटनी होगी।
मोदी ने ‘पश्चिम बंगाल दिवस’ पर बाबा तारकेश्वर की धरती से दी 820 करोड़ की सौगात (साभार: नवभारत टाइम्स, एक्स @narendramodi) जनसभाओं से लेकर राष्ट्रीय मंचों तक देश को आज़ादी दिलवाने के कसीदे पढ़ने वाली कांग्रेस और इसकी समर्थक वामपंथी पार्टी से लेकर ममता बनर्जी की TMC ने इतने साल बंगाल में राज किया, लेकिन कभी बंगाल का ‘पश्चिम बंग दिवस’ नहीं मनाया। फिर देशभक्ति की दुहाई देते फिरते हैं। धीरे-धीरे भारत विरोधियों की कठपुतली बनी पार्टियों की कलई खुलनी शुरू से बिलबिला रहे हैं। जो पार्टी राज्य का पावन ‘पश्चिम बंग दिवस’ नहीं मनाए वह देशभक्त पार्टी नहीं हो सकती।
पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार के आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहली बार 2 दिवसीय दौरे पर राज्य पहुँचे। उनके दौरे की शुरुआत हुगली जिले के धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व वाले तारकेश्वर से हुई। यहाँ पहली बार आधिकारिक तौर पर आयोजित ‘पश्चिम बंग दिवस’ कार्यक्रम में PM मोदी ने हिस्सा लिया।
इस दौरान राज्यपाल आरएन रवि और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी भी मंच पर मौजूद रहे। PM मोदी ने राज्य के लिए विकास परियोजनाओं का शुभारंभ किया, किसानों के खातों में PM-किसान योजना की राशि जारी की और राजनीतिक व ऐतिहासिक संदर्भों पर भी अपनी बात रखी।
Delighted to be in Tarakeswar. Addressing a programme on Paschimbanga Divas. Do watch. https://t.co/fh9IHujCpQ
पहली बार आधिकारिक तौर पर मनाया गया ‘पश्चिम बंग दिवस’, इतिहास से जोड़ा गया आयोजन
नई राज्य सरकार ने 20 जून को आधिकारिक ‘पश्चिम बंग दिवस’ के रूप में मनाने का फैसला किया। यह तारीख इसलिए महत्वपूर्ण मानी गई क्योंकि 20 जून 1947 को बंगाल विधानसभा में विभाजन संबंधी प्रस्ताव पारित हुआ था। कार्यक्रम के लिए तारकेश्वर को चुना गया, जिसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया।
अपने संबोधन में PM मोदी ने कहा, “इस बार पश्चिम बंग दिवस की यह तारीख और भी खास है। आजादी के बाद बंगाल के उज्जवल भविष्य के लिए जो सपना देखा गया था, बंगाल की महान आत्माओं ने जो परिकल्पना की थी। आज पहली बार हम पश्चिम बंग दिवस पर उन सपनों को सच्चाई में बदलते देख रहे हैं।”
मोदी ने आगे कहा, “यह ऐतिहासिक तारीख पश्चिम बंगाल के विकास की प्रेरणा बने, हम एक नया और गौरवशाली इतिहास रचे। आज भाजपा-NDA सरकार में विकास के महाअभियान की शुरुआत हो रही है। मैं कामना करता हूँ कि ऐतिहासिक ‘पश्चिम बंगाल दिवस’ राज्य के विकास के लिए प्रेरणा बने।”
तारकेश्वर मंदिर में पूजा, 820 करोड़ की परियोजनाएँ और रेलवे को बड़ा पैकेज
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तारकेश्वर स्थित बाबा तारकनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना की और इसके बाद राज्य के लिए लगभग 820 करोड़ रुपए की विभिन्न विकास परियोजनाओं की शुरुआत की। इनमें रेलवे अवसंरचना पर विशेष जोर दिया गया और करीब 590 करोड़ रुपए रेलवे परियोजनाओं के लिए निर्धारित किए गए।
इसी क्रम में हावड़ा में 99 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले 300 बेड के नए डिवीजनल रेलवे अस्पताल का शिलान्यास भी किया गया। सरकार के अनुसार, यह अस्पताल रेलवे कर्मचारियों के साथ-साथ आम नागरिकों को भी आधुनिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराएगा।
पीएम ने कहा, “बंगाल में दशकों तक पहले लेफ्ट और फिर TMC ने जो गड्ढे बनाए, उन्हें भरने के लिए डबल इंजन सरकार ने सुपरफास्ट गति से काम करना शुरू कर दिया है। बिजली की रफ्तार से फैसले हो रहे हैं। रुकी हुई योजनाओं पर काम आगे बढ़ रहा है। इसी कड़ी में आज यहाँ सैकड़ों करोड़ की विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास हुआ है।”
किसानों को पीएम-किसान की किस्त और नवद्वीप-पुरी रेल सेवा का शुभारंभ
कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री ने पीएम-किसान सम्मान निधि योजना की 23वीं किस्त भी जारी की। इसके तहत देश के 9.44 करोड़ से अधिक किसानों के खातों में कुल 18,880 करोड़ रुपए सीधे डीबीटी के माध्यम से ट्रांसफर किए गए। इनमें पश्चिम बंगाल के 45 लाख से अधिक किसानों को 900 करोड़ रुपए से ज्यादा की राशि मिली।
इसके साथ ही प्रधानमंत्री ने पश्चिम बंगाल के नवद्वीप और ओडिशा के पुरी के बीच नई सीधी रेल सेवा का भी उद्घाटन किया। माना जा रहा है कि इससे धार्मिक पर्यटन और दोनों राज्यों के बीच संपर्क को मजबूती मिलेगी।
कॉन्ग्रेस, लेफ्ट और TMC पर हमला
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में कॉन्ग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए कहा, “उस कठिन समय में कॉन्ग्रेस ने मजबूती से खड़े होने के बजाय घुटने टेक दिए थे। “उन्होंने आरोप लगाया कि स्वतंत्रता के समय बंगाल को भारत से अलग करने की कोशिश हुई थी और उस दौर की घटनाओं को देश नहीं भूल सकता।
उन्होंने कहा, “बीजेपी की जीत के बाद राज्य में बदलाव साफ दिखाई देने लगा है, अब बंगाल विकास, निवेश और भविष्य के निर्माण की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।” सभा में उन्होंने कहा, “बंटवारे के समय कॉन्ग्रेस ने बंगाल को अनाथ छोड़ दिया था और स्वतंत्रता के बाद तुष्टीकरण की राजनीति की।”
प्रधानमंत्री ने आगे कहा, “गुलामी के दौर में हमारे बंगाल ने क्या कुछ नहीं सहा, कितने बलिदान दिए, कितने त्याग सहे, 1946 में, कोलकाता में हुई हिंसा, कितने निर्दोष बंगाली लोग उसकी भेंट चढ़ गए। बंगाल ने रक्तपात सहा, अपनों को खोया, अपनी मातृभूमि के टुकड़े होते देखे लेकिन बंगाल ने अपनी अस्मिता, पहचान को नष्ट नहीं होने दिया।”
उन्होंने कहा, “इसी का परिणाम था कि जब पूरे बंगाल को भारत से अलग करने की साजिश हो रही थी, तब अलग पश्चिम बंगाल बनाकर उन मंसूबों को कामयाब नहीं होने दिया गया। पश्चिमबंग दिवस के रूप में हम केवल एक तारीख को याद नहीं कर रहे, बल्कि पूरे इतिहास को याद कर रहे हैं।”
अंत में उन्होंने योग दिवस का भी उल्लेख करते हुए कहा, “कल देश, दुनिया में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाना है। इस बार मैं बंगाल में ही योग दिवस का हिस्सा बनूँगा। स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविंद जैसे योगियों की भूमि से जो संदेश जाएगा उससे पूरे विश्व का मार्गदर्शन होगा। मैं चाहूँगा कि इस बार बंगाल के कोने-कोने में योग दिवस के आयोजन हो।”
TMC नेता रबीउल इस्लाम का करोड़ों का घर, जहाँ लूटता था महिलाओं की इज्जत (साभार : News18) जैसे-जैसे TMC के सत्ता से बाहर होने के दिन बीत रहे हैं वैसे-वैसे ममता बनर्जी के समय हुई काली करतूतें सामने आने लगी हैं। जिसे देख शंका होती है कि ये जो नेता ममता का साथ छोड़ रहे हैं इसके पीछे बहुत गहरा षड़यंत्र दिखाई पड़ता है। क्योकि जो आज पार्टी को छोड़ अपने आपको दूध का धुला साबित करने की कोशिश कर रहे हैं इन काली करतूतों में इनके भी शामिल होने पर शक होना स्वाभाविक है। इनको मालूम है कि पहले तो ममता की छत्रसाया में चाहे कुछ भी कर लो कोई पूछने वाला नहीं। जिस हिसाब से नेता पार्टी छोड़ रहे हैं उस हिसाब से तो इतनी काली करतूतें नहीं होनी चाहिए थी, लेकिन हुई, क्यों? क्यों नहीं जिस तरह हिन्दू महिलाओं का बलात्कार हो रहा था, हिन्दू त्यौहारों पर हमले हो रहे थे और हिन्दुओं पर जानलेवा हमले हो रहे थे तब क्यों नहीं पार्टी छोड़ी? तब कहाँ मर गया था इनका जमीर?
बंगाल में संदेशखाली के विलेन शेख शाहजहाँ के बाद एक और दरिंदा सामने आया है। TMC नेता रबीउल इस्लाम पर महिलाओं को बंधक बनाकर उनका जिस्म लूटने और करोड़ों का साम्राज्य खड़ा करने का आरोप है। पुलिस ने इस हैवान को बांग्लादेश भागते समय बॉर्डर पर दबोचा।
न्यूज18 की रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर 24 परगना के देगंगा से इस TMC नेता की काली करतूत बाहर आई है। आरोप है कि रबीउल इस्लाम ने 100 बीघे की जमीन पर अपना एक आलीशान गार्डन हाउस बना रखा था।
वह गरीब महिलाओं को रात के अँधेरे में वहाँ मछली तलने और खाना बनाने के बहाने बुलाता था। वहाँ पहुँचने के बाद महिलाओं को बंधक बना लिया जाता था। फिर रबीउल और उसके गुर्गे उनके साथ अमानवीय अत्याचार करते थे। इलाके में इसका इतना खौफ था कि पीड़ित परिवार डर के मारे मुँह नहीं खोलते थे।
#WatchNow: দেগঙ্গায় গ্রেফতার তৃণমূল নেতা রবিউল ইসলাম। ভাঙচুর, তোলাবাজি-সহ একাধিক অভিযোগ তাঁর বিরুদ্ধে।
रबीउल इस्लाम के अपराध और रसूख की कहानी बेहद चौंकाने वाली है। साल 2011 से पहले रबीउल एक साधारण दिहाड़ी मजदूर था। वह दो वक्त की रोटी के लिए तरसता था। लेकिन सत्ता का हाथ मिलते ही वह देगंगा पंचायत समिति में वन एवं भूमि विभाग का बड़ा अफसर बन बैठा। इसके बाद उसने सरकारी पैसों और पेड़ों को लूटकर अपना 10 करोड़ का अय्याशी का अड्डा तैयार किया।
पुलिस को ठेंगा, फिर भागते हुए दबोचा गया
रबीउल ने अपने राजनीतिक रसूख के दम पर लंबे समय तक कानून की धज्जियाँ उड़ाईं। उसके खिलाफ जबरन वसूली और महिला उत्पीड़न के कई केस थाने पहुँचे, लेकिन पुलिस हाथ डालने से डरती थी।
अब जब बीजेपी की सरकार आई, तब जाकर इस हवस के शिकारी पर शिकंजा कसा, और ये डरपोक अंडरग्राउंड हो गया। जान बचाकर सीमा पार बांग्लादेश भागने की फिराक में था। लेकिन बसिरहाट बॉर्डर पर मुस्तैद पुलिस ने उसकी चालाकी फेल कर दी और उसे सलाखों के पीछे भेज दिया।
बंगाल में TMC नेता साड़ियों के ढेर में छिपा(बाएँ), TMC नेता के घर में मिला तिरपाल का ढेर(दाएँ) 60 के दशक में गायक मौहम्मद रफ़ी का बहुचर्चित गीत "रात भर का है मेहमां अंधेरा, किसके रोके रुका है सवेरा....." है, सनातन विरोधियों को इस गीत को जरूर सुनना ही सबको सुनाना भी चाहिए। पीछे एक ब्लॉग में लिखा था कि बंगाल विधानसभा चुनाव सिर्फ चुनाव ही बल्कि भारतीय राजनीति का नया सवेरा है, जिसे सियासतखोरों ने सियासत नाम दे दिया। अपनी आने वाली भावी पीढ़ियों के लिए मुस्लिम तुष्टिकरण कर जो तिजोरियों भर रहे हो, देख लो बंगाल में क्या हो रहा है? अत्याचार की भी एक सीमा होती है और जब टूटती है कोई नहीं बचता।
बहुत जल्दी ममता बनर्जी और इसकी पार्टी अत्याचारों के ढेर में दब जाएगी। बंगाल में सनातन पर हमलों की पराकाष्ठा हो चुकी थी। घुसपैठियों को दामाद बनाकर पाला जा रहा था। वो भी भाग रहे हैं। हैरानी तो उत्तर प्रदेश के हिन्दुओं पर होती है जो समाजवादी पार्टी को वोट देते हैं। समाजवादी पार्टी तृणमूल कांग्रेस का ही दूसरा नाम है। मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में 11 बजे के बाद खासकर अगर होली वाले दिन शुक्रवार है होली खेलने पर पाबन्दी थी। 84 कोसी परिक्रमा पर अड़चने डाली जाती थी। जबसे उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार आयी है ये सब अड़चनें समाप्त हो गयी। फिर भी पता नहीं क्यों हिन्दू समाजवादी पार्टी को वोट देता है?
पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार बनने के बाद से तृणमूल कांग्रेस पार्टी (TMC) का ‘जंगलराज’ सामने आ रहा है। TMC के काले कारनामे सामने आने के बाद जनता का गुस्सा भी फूट रहा है। ऐसा गुस्सा कि कहीं TMC नेता पर अंडे फेंके जा रहे हैं, तो कहीं जनता के गुस्से से बचने के लिए नेता साड़ियों के ढेर में छिपे हुए हैं।
एक मामले में उत्तर 24 परगना जिले के कमरहाटी में TMC विधायक मदन मित्रा की कार को घेरकर लोगों ने अंडे और ईंटे फेंकी गई। ऐसे ही कोलकाता नगर निगम में पार्षद बप्पादित्य दासगुप्ता पर कोर्ट में पेशी के दौरान अंडे फेंके गए। दासगुप्ता को जबरन वसूली के आरोप में शनिवार (06 जून 2026) को गिरफ्तार किया गया था।
एक अन्य मामले में हावड़ा जिले के TMC नेता ब्रह्मानंद चक्रवर्ती का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें वह साड़ियों के ढेर के भीतर छिपे हुए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, चक्रवर्ती पर सरकारी योजना के नाम पर लोगों से कटमनी लेने के आरोप हैं। पुलिस के डर से वह साड़ियों के ढेर में छिप गए। हालाँकि, इसके बावजूद पुलिस चक्रवर्ती को ढूँढकर अपने साथ गिरफ्तार करके ले गई।
हावड़ा में TMC नेता कपड़ों के ढेर के नीचे छिपा पाया गया। वायरल वीडियो में दिख रहे व्यक्ति की पहचान ब्रह्मानंद चक्रवर्ती के तौर पर हुई है, जो स्थानीय तृणमूल नेता है। इसपर हाउसिंग स्कीम के लिए आवंटित फंड से 'कट मनी' लेने का आरोप है।#TMC#WestBengal#CutMoney#ZeeNewspic.twitter.com/rBd55ltlfu
उधर, TMC नेता के बंद घर का ताला तोड़कर स्थानीय लोगों ने जमा करके रखे गए लगभग 50 हजार तिरपाल बरामद किए। यह सरकारी राहत सामग्री जनता को पहुँचानी थी, लेकिन TMC नेताओं ने अपनी संपत्ति समझकर रखी हुई थी। इसका वीडियो भी सामने आया है, जिसमें एक घर में फर्श से छत तक केवल तिरपाल के ढेर नजर आ रहे हैं। बताया गया कि यह बंद घर TMC नेता राजू बाग और उनके भाई बीजू बाग का है। बंगाल चुनाव के नतीजों के बाद से ही दोनों भाई फरार चल रहे हैं।
यह कोई गिनी-चुनी घटनाएँ नहीं हैं। इससे पहले भी कई मामले सामने आए हैं। जहाँ कटमनी का पैसा खाकर बैठे TMC नेता कहीं बिस्तर के नीचे छिपे पाए गए, तो कहीं लोगों ने गुस्से में आकर TMC नेता के करीबी को ही कूट दिया। इसके अलावा TMC नेता पर रिश्वत और जमाखोरी के मामलों में भी लगातार शिकंजा कसा जा रहा है।
साभार: ABP न्यूज पश्चिम बंगाल में नकदी बरामदगी से जुड़े मामलों की सूची में अब कोलकाता के सुरेंद्रनाथ कॉलेज का नाम भी जुड़ गया है। कॉलेज परिसर में स्थित तृणमूल कांग्रेस छात्र परिषद (TMCP) के यूनियन रूम से लाखों या संभवतः करोड़ों रुपए तक की नकदी बरामद होने का दावा किया जा रहा है।
नोटों का बड़ा हिस्सा दीमकों और कीड़ों द्वारा पूरी तरह नष्ट किया जा चुका है। मामला उस समय सामने आया जब लंबे समय से बंद पड़े यूनियन रूम को प्रशासनिक निर्देशों के तहत खोला गया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, छात्रसंघ चुनाव न होने के कारण हाईकोर्ट के निर्देश पर कॉलेज के यूनियन रूम को वर्षों पहले बंद कर दिया गया था।
Lakhs of termite-infested cash were allegedly recovered from an almirah inside the union room of Surendranath College In Kolkata. pic.twitter.com/qKuAcaz6kO
हाल ही में सफाई और रखरखाव कार्य के दौरान अधिकारियों ने कमरे के भीतर मौजूद एक अलमारी को खुलवाया। अलमारी में TMC के बैनर और पोस्टर के साथ दो ट्रॉली बैग भी रखे मिले। जब बैग खोले गए तो उनमें 500 और 100 रुपए के नोटों के बंडल भरे हुए थे, लंबे समय तक आलमारी में पड़े रहने के कारण अधिकांश नोट दीमकों की भेंट चढ़ चुके थे।
This is BIG!
Lakhs and Lakhs of rupees, possibly crores, have been recovered from the Trinamool Congress Chhatra Parishad office at Surendranath College.
— Sensei Kraken Zero (@YearOfTheKraken) June 2, 2026
BJP विधायक सजल घोष ने TMC पर निशाना साधते हुए कहा, “इस जीवन में मुझे और क्या देखना चाहिए? हमने पार्थ बाबू के घर में पैसों के पहाड़ देखे। तृणमूल नेता के जूट के खेत में पैसा। आज मैंने देखा कि तृणमूल के छात्र नेता… साठ साल से अधिक उम्र के होने के बावजूद, यूनियन रूम की अलमारी में लाखों रुपए रखे हैं और वह पैसा भी बर्बाद कर दिया गया है।
TMC नेताओं पर एक्शन जारी ( फोटो साभार-chatgpt) पश्चिम बंगाल में BJP सरकार बनने के बाद कानून-व्यवस्था को दुरुस्त करने के साथ-साथ आपराधिक नेटवर्क पर लगाम कसी जा रही है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में बीजेपी सरकार बांग्लादेशियों को बाहर निकाल रही है, वहीं ‘तोलाबाजी’ यानी सिंडिकेट, चुनाव बाद हिंसा और आपराधिक गिरोहों के खिलाफ अभियान चला रही है। बीते एक हफ्ते में 70 से ज्यादा टीएमसी नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया है।
कोई बनियान-कच्छे में तो कोई लुंगी पहने हुआ गिरफ्तार
अपराधियों को हर हाल में गिरफ्तार करने के आदेश हैं। यही वजह है कि कई ऐसी तस्वीरें सामने आई जब इन लोगों को अचानक घरों, अड्डों और शराब के ठेकों से उठाया गया और सड़कों पर घुमाया गया। ये वे लोग हैं, जिन्होंने बंगाल में अराजकता फैला दी थी और जनता दहशत में जीने के लिए मजबूर थी।
West Bengal Police after getting free from shackles of TMC govt, Now catching Goons and Culprits.
The don of Howrah, Akash Singh, accused of shooting policemen in 2021 and hurling more than 20 bombs was paraded in his underwear on the streets of Howrah to send a strong message pic.twitter.com/EBypfNzOTZ
बंगाल पुलिस ने हावड़ा के गैंगस्टर आकाश सिंह को कच्छा और बनियान में सड़कों पर घुमाया था। वह हावड़ा के डॉन कहलाता था। आकाश सिंह पर 2021 में पुलिसकर्मियों पर गोली चलाने और 20 से ज्यादा बम फेंकने का आरोप है। एक कड़ा संदेश देने के लिए उसे हावड़ा की सड़कों पर सिर्फ अंडरवियर में घुमाया गया।
पश्चिम बंगाल में TMC के गुंडे सनी मोल्ला पर पुलिस का शिकंजा
इसके बाद 25 मई 2026 को टीएमसी के गुंडे और कुख्यात सनी मोल्ला को पुलिस ने गिरफ्तार कर सड़कों पर बनियान-पैजामा में घुमाया। स्थानीय लोगों के अनुसार, सनी मोल्ला TMC से जुड़ा एक संविदा आधारित होम गार्ड था और लंबे समय से संकराइल और आसपास के इलाकों में रंगदारी और दबंगई का नेटवर्क चला रहा था। वह व्यापारियों, छोटे दुकानदारों से रंगदारी वसूलता था। विरोध करने पर धमकी देता, मारपीट करता और कारोबार बंद कराने की चेतावनी देता था। इलाके में लोग उसे ‘छोटा डॉन’ कहकर बुलाते हैं।
TMC’s “Bade Bhai” Shamim Ahmed,paraded by WB Police.
The same man accused of unleashing Islamist violence in Shibpur, bombing streets, and opening fire on BJP supporters.
From threatening citizens to being marched publicly.
टीएमसी से जुड़ा और ‘बड़े भाई’ कहलाने वाले शमीम अहमद को भी पश्चिम बंगाल पुलिस ने बनियान- ऑफ पेंट में सड़कों पर घुमाया। दरअसल ये वह व्यक्ति है, जिस पर शिबपुर में इस्लामी हिंसा भड़काने, सड़कों पर बमबारी करने और BJP समर्थकों पर गोली चलाने के आरोप है।
जलपाईगुड़ी जिले में टीएमसी नेता पंचानन रॉय को एक कार में शराब पीते हुए पकड़ा गया था। वह स्थानीय पंचायत समिति के अध्यक्ष हैं और शराब पार्टी करते हुए गिरफ्तार किया गया। टीएमसी पार्षद मोनी गाजी को भी पुलिस रेड के दौरान शराब की बोतलों और आपत्तिजनक स्थिति में पकड़ा गया था। उस पर सेक्स रैकेट चलाने का आरोप है।
ऐसे अपराधी शुभेंदु शासन के आते ही छिपने की कोशिश कर रहे हैं। यही वजह है कि इनलोगों को बनियान कच्छा शॉर्ट पैंट में ही पुलिस उठा कर ले गई। इनलोगों को सड़कों पर घुमा भी रही है, ताकि लोगों के मन में उनका भय खत्म हो सके, जो पिछले 15 सालों से व्याप्त है। सरकार ‘नो नोटिस एक्शन’ वाली छवि बना रही है। अपराधियों को देर रात छापेमारी कर भी गिरफ्तार किया जा रहा है। कई जिलों में लगातार तलाशी के बाद कई लोगों को दबोचा गया, ताकि लोगों को संदेश मिले कि ‘भागने पर भी बचना मुश्किल’ है।
बीते 18 मई से करीब एक हफ्ते में राज्य में भ्रष्टाचार वसूली और चुनाव बाद हिंसा को लेकर टीएमसी के 70 से ज्यादा नेताओं को गिरफ्तार किया जा चुका है। इनमें पूर्व मंत्री सुजीत बसु भी शामिल हैं। वहीं पूर्व मंत्री के करीबी बंगाल के बिधाननगर नगर निगम के 34 नंबर वार्ड के टीएमसी पार्षद और बोरो चेयरमैन रंजन पोद्दार को बिधाननगर उत्तर थाना पुलिस ने गिरफ्तार किया। उनके खिलाफ तोलाबाजी यानी जबरन वसूली करने और लोगों को डराने-धमकाने का आरोप है।
बीते 23 मई 2026 को एक दिन में राज्यभर में 17 टीएमसी नेताओं को गिरफ्तार किया गया। इनमें कोलकाता और बिधाननगर के कई पार्षद शामिल हैं। मुर्शिदाबाद के बड़ंचा में दबंग तृणमूल नेता अबु बक्कर को हत्या के प्रयास और हथियार से हमला करने के आरोप में पकड़ा गया।
कोलकाता नगर निगम के पार्षद सुदीप पोल्ले और बिधाननगर के पार्षद बरुआ को तोलाबाजी के आरोप में गिरफ्तार किया गया। हावड़ा से 2021 विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी कार्यकर्ताओं पर हमले के आरोपित उपग्राम प्रधान गुरुपद माझी और उसके भाई राजू माझी को गिरफ्तार किया गया। इसके अलावा हुगली, नदिया, मुर्शिदाबाद से लेकर कूचबिहार तक के टीएमसी गुंडों को पुलिस ने पकड़ा।
उत्तर 24 परगना जिले में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के एक पार्षद को घर के अंदर सेक्स रैकेट चलाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। बनगांव नगर पालिका के वार्ड नंबर 22 से TMC पार्षद सुकुमार राय को पुलिस कॉलर पकड़कर थाने ले गई।
पश्चिम बर्धमान के पांडवेश्वर में शेख कमरुद्दीन को चुनावी आतंक, भ्रष्टाचार और वसूली के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। वहीं कूच बिहार से भवरंजन बर्मन को बीजेपी कार्यकर्ता को पीटने और पैसे माँगने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। बीजेपी नेता पप्पू साना पर हमले और शुभेंदु अधिकारी के पीएम रहे चंद्रनाथ रथ की हत्या के बाद पुलिस ने कई इलाकों में लगातार छापेमारी की है और कई लोगों को हिरासत में लिया।
टीएमसी नेताओं और कार्यकर्ताओं के जुल्मों से त्रस्त जनता की प्रतिक्रिया भी इस दौरान सामने आई। जब कोलकाता के युवा टीएमसी अध्यक्ष तपन बिस्वास और उसके साथियों को पुलिस गिरफ्तार कर ले जा रही थी तो उसे लोगों ने थप्पड़ मारे। कुछ ऐसा ही हाल हावड़ा से गिरफ्तार श्यामला मित्रा का हुआ। उसे भी लोगों ने पीटा।
दक्षिण 24 परगना से जब TMC नेता अरित्रा बोस को गिरफ्तार किए जाने के बाद महिलाएँ उसे पीटने के लिए चप्पल- झाड़ू लेकर दौड़ी। जब पुलिस उसे वैन में बैठाकर ले जा रही थी, तब झाड़ू, चप्पल और पानी की बोतलें पुलिस वैन पर फेंकने लगी। संदेशखाली में ईडी टीम पर हमले को लेकर गिरफ्तार टीएमसी नेता शाहजहाँ की मदद करने वाली दो महिला नेताओं को भी गिरफ्तार किया गया। इन पर शाहजहाँ को बचाने के लिए भीड़ जमा कर हिंसा भड़काने का आरोप है।
घुसपैठियों को बाहर निकालने का अभियान
अवैध घुसपैठ और बॉर्डर नेटवर्क पर भी कार्रवाई तेज हुई है। बंगाल सरकार ने ‘होल्डिंग सेंटर’ शुरू किए हैं और पुलिस-आरपीएफ-बीएसएफ के समन्वय से संदिग्ध घुसपैठियों को बाहर निकालने का अभियान चलाया जा रहा है।
North 24 Parganas, West Bengal: More than 100 Bangladeshi nationals allegedly living illegally in different parts of West Bengal gathered at the Hakimpur check post in North 24 Parganas on Tuesday morning to return to Bangladesh. The gathering comes after directives regarding… pic.twitter.com/TC06rVaeMm
हाल ही में राज्य के अलग-अलग हिस्सों में अवैध रूप से रह रहे 100 से ज्यादा बांग्लादेशी घुसपैठियों को मंगलवार सुबह (26 मई 2026) को बांग्लादेश लौटने के लिए उत्तरी 24 परगना के हाकिमपुर चेक पोस्ट पर जमा किया गया।
हाल ही में सीएम शुभेंदु अधिकारी ने घुसपैठियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का ऐलान किया था। उन्होंने कहा था कि बगैर दस्तावेज वाले बांग्लादेशियों की पहचान कर उसे पुलिस के हवाले करें, ताकि जनता से इनलोगों को अलग किया जा सके और देश से निकाला जा सके।
बीजेपी सरकार का पूरा अभियान ये दिखाता है कि अपराधियों और घुसपैठियों को अब ‘पहले जैसा संरक्षण’ नहीं दिया जाएगा। अपराधियों का जेल भेजा जाएगा और घुसपैठियों को ‘देश निकाला’ मिलेगा। चाहे ये लोग कहीं भी छिप जाएँ, पुलिस उन्हें ढूंढ निकालेगी और हर हाल में सलाखों के पीछे भेजेगी। इसलिए अपराधी कहीं जंगल में छिपे मिल रहे हैं तो कहीं घरों में छिप कर शराब पीते।
पश्चिम बंगाल में बीजेपी की सरकार बनने के बाद कानून-व्यवस्था को लेकर सख्त रुख अपनाया जा रहा है। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने शनिवार (16 मई 2026) को डायमंड हार्बर क्षेत्र में एक अहम प्रशासनिक बैठक कर पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की।
यह इलाका लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस (TMC) का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। बैठक के बाद मुख्यमंत्री ने साफ संकेत दिए कि अब राज्य में सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी और हिंसा या तोड़फोड़ की कीमत सीधे आरोपियों को चुकानी पड़ेगी।
Diamond Harbour, West Bengal: Chief Minister Suvendu Adhikari says, "An incident occurred yesterday in Asansol. So far, 15 arrests have been made... The individuals responsible for the vandalism will certainly face actions like police custody, remand, and interrogation. In… pic.twitter.com/wzPpKUwKgh
आसनसोल में हुई हिंसा का जिक्र करते हुए सुवेंदु ने कहा, “आसनसोल में जो अप्रिय घटना हुई थी, उस पर हमारी सरकार ने त्वरित कार्रवाई की है। पुलिस ने अब तक इस मामले में संलिप्त 15 उपद्रवियों को गिरफ्तार कर लिया है। तोड़-फोड़ और हिंसा के लिए जिम्मेदार इन सभी आरोपियों को पुलिस हिरासत, रिमांड और कड़ी पूछताछ का सामना करना पड़ेगा।”
उन्होंने कहा कि राज्य में किसी भी स्थिति में अराजकता फैलाने की अनुमति नहीं दी जाएगी और पुलिस को पूरी सख्ती के साथ कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।
‘योगी मॉडल’ की तर्ज पर भरपाई की नीति, सीएम ने कहा- एजेंसियों को दी जाएगी खुली छूट
मुख्यमंत्री ने उत्तर प्रदेश की तर्ज पर नई नीति लागू करने का संकेत देते हुए कहा कि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वालों से पूरी क्षतिपूर्ति वसूली जाएगी। उन्होंने कहा, “किसी को भी बंगाल में सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने की इजाजत नहीं दी जाएगी।”
उन्होंने आगे कहा, “आसनसोल घटना या भविष्य में होने वाली किसी भी ऐसी तोड़फोड़ के नुकसान की शत-प्रतिशत भरपाई सीधे आरोपियों के निजी फंड और संपत्तियों से कराई जाएगी। यह कदम राज्य में कानून का राज स्थापित करने के लिए बेहद जरूरी है।”
अंत में सुवेंदु कहा, “पूर्ववर्ती व्यवस्था के दौरान CID और अन्य राज्य स्तरीय जाँच एजेंसियों का कानून-व्यवस्था सुधारने में पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं किया गया था। हमारी सरकार अब इन पेशेवर एजेंसियों को खुली छूट देगी ताकि वे बिना किसी राजनीतिक दबाव के अपराधियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई कर सकें।”
वाह शुभेंदु अधिकारी वाह ! दिल जीत लिया
कांग्रेस के हटते ही धीरे धीरे नर्क में बदले जा रहे बंगाल में 50 बरस बाद लागू कर दिया योगी मॉडल! सोमवार से सभी स्कूलों में वन्देमातरम अनिवार्य। धर्मस्थलों से हटेंगे लाउडस्पीकर। गौ हत्या और गौ कटान पर पूरी तरह प्रतिबंध। गरीबों और मजदूरों के लिए 5 रूपए में माछ भात । सीमावर्ती तमाम जिलों में बॉर्डर पर फैंसिंग के लिए 6 महीनों के भीतर लैंड ट्रान्सफर। मदरसों की गतिविधियों की पड़ताल, राष्ट्र विरोधी गतिविधियों पर सख्त एक्शन। गुंडा माफियाओं के खिलाफ ऑपरेशन लंगड़ा। घुसपैठियों को चुनचुनकर निकालने की तैयारी।
80 साल बाद बंगाल में खुशियों की बहार। छह दिनों में ही शुभेंदु के ताबड़तोड़ फैसलों से ममता बनर्जी इतनी बौखलाई कि वकीलों की ड्रेस और काला कोट पहनकर हाईकोर्ट पहुंच गई। छह ही दिनों में सरकार पर आरोपों की बौछार कर दी। अरी दीदी सब्र करो थोड़ा धीरज धरो। अभी शुभेंदु के पास 5 साल ही नहीं हैं, लंबा भविष्य भी है। बंगाल की जनता ममता से इसकदर ऊब चुकी है कि उनकी सूरत नहीं देखनी चाहते। तभी तो ममता जैसे ही कोर्ट से बाहर निकलीं, लोगों ने चोर चोर के नारे लगाने शुरू कर दिए। याद कीजिए ऐसे ही नारे अभी हाल ही में महुआ मोइत्रा के विरुद्ध भी लगे जब वे प्लेन में कोलकाता से दिल्ली पहुंची। बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने बंगाल बार से ममता के लाइसेंस की बाबत रिकॉर्ड तलब किया है।
तृणमूल को अभी यह झेलना होगा, ममता समझ लें। थोड़ा रुकिए ममता दीदी, आपके भतीजे अभिषेक को अभी काफी भुगतना है। अपने भ्रष्टाचार, कटमनी, तोलाबाजी और धमकियों के लिए अभिषेक को अभी जेलें भी काटनी हैं। यही नहीं घुसपैठियों की बदौलत बंगाल की डेमोग्राफी बदलने वाली ममता को राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और केंद्रीय जांच एजेंसियों को बंधक बनाने लेने के लिए काफी कुछ झेलना है। अभिषेक को मुख्यमंत्री पद देकर दिल्ली की राजनीति करते हुए प्रधानमंत्री बनने का स्वप्न तो चकनाचूर हुआ। हां सब ठीक चला तो वे राज्यसभा के रास्ते दिल्ली पहुंचकर दिल्ली में इंडी का नेतृत्व संभाल सकती हैं। बशर्ते कि ममता से मुंह फेर चुके राहुल गांधी अपना सपना वापस ले लें।
तो ममता बनर्जी, आपका खेल खत्म हो चुका है। वामपंथियों ने 35 साल और अपने 15 साल बड़े जुल्म ढहाए। इस बॉर्डर स्टेट को भारत से अलग करने का षड्यंत्र किया, राज्यपाल को कुछ नहीं समझा। आपकी तमन्ना थी कि केन्द्र सरकार बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगा दे ताकि आप सहानुभूति का वोट हासिल कर लें। लेकिन दीदी आप शाह मोदी को अब तक गलत पहचानती रही। आ जाएगा, जल्द समझ आ जाएगा कि देश के सिस्टम के ख़िलाफ़ जाना भी देशद्रोह के समान है। बंगाल के साथ साथ पूरे देश की जनता समझ गई है कि आपके समर्थन में बांग्लादेश और पाकिस्तान में प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं? समझ जाओ दीदी वक्त बदल गया है।
पश्चिम बंगाल में नई BJP सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में बड़ा फैसला लिया गया है। राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में लंबित उस याचिका को वापस लेने का निर्णय किया है, जिसमें कलकत्ता हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसने 75 मुस्लिम और 2 हिंदू समुदायों समेत कुल 77 समुदायों का OBC दर्जा रद्द कर दिया था।
22 मई 2024 को कलकत्ता हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि इन समुदायों को बिना उचित सामाजिक और शैक्षणिक सर्वे के केवल धार्मिक आधार पर OBC सूची में शामिल किया गया था, जो संविधान के खिलाफ है। ये समुदाय 2010 से 2012 के बीच पहले वाम मोर्चा सरकार और बाद में TMC सरकार के दौरान OBC सूची में जोड़े गए थे।
जबकि मुसलमानों में शिया, सुन्नी, पठान, अहमदी, वहाबी और पासमांदा आदि अनेकों फिरकों में इतना ज्यादा भेदभाव है कि कोई एक दूसरे की मस्जिद में नमाज नहीं पढ़ सकता दूसरे के कब्रिस्तान में मुर्दा दफ़न नहीं कर सकने के अलावा जातियों को मानते ही नहीं फिर सिर्फ वोट की सियासत में यह काम एकदम गलत है।
कोर्ट ने 2010 के बाद जारी सभी OBC प्रमाणपत्रों को अमान्य कर दिया था और नौकरी व एडमिशन में उनके इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी। इसके तुरंत बाद ममता बनर्जी की सरकार इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुँची थी।
सुप्रीम कोर्ट से याचिका वापस लेने की तैयारी
आनंदबाजार पत्रिका की एक रिपोर्ट के अनुसार, राज्य सरकार के वकील कुनाल मिमानी ने सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्रार को पत्र भेजकर इस मामले को वापस लेने की अनुमति माँगी है। सरकार ने मामले की जल्द सुनवाई की भी माँग की है। इस फैसले से 2010 के बाद जारी हुए करीब 5 लाख OBC प्रमाणपत्र प्रभावित हो सकते हैं।
इससे पहले वाम मोर्चा सरकार ने 42 मुस्लिम समुदायों और TMC सरकार ने 35 अन्य समुदायों को OBC सूची में शामिल किया था। बाद में 2023 में OBC रिजर्वेशन एक्ट भी लाया गया था।
1.69 करोड़ जाति प्रमाणपत्रों की होगी दोबारा जाँच
नई सरकार ने इसके साथ ही 2011 के बाद जारी सभी SC, ST और OBC प्रमाणपत्रों की दोबारा जाँच का आदेश भी दिया है। इसमें करीब 1.69 करोड़ दस्तावेज शामिल हैं। जिलाधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि अधिकारी सभी प्रमाणपत्रों की जाँच करें और फर्जी या अनियमित पाए जाने पर कार्रवाई करें।
भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष तपस राय ने इस कदम का स्वागत करते हुए कहा, “TMC सरकार ने मनमाने ढंग से काम किया। उसने किसी कानून, संविधान या नियम का पालन नहीं किया। ओबीसी आरक्षण के मामले में भी यही हुआ है। नई सरकार ने सही कदम उठाया है।”
वहीं TMC प्रवक्ता कुणाल घोष ने कहा है, “पिछली सरकार ने जनता के हितों की रक्षा के लिए कदम उठाए थे। पार्टी नेतृत्व द्वारा नई सरकार के इस फैसले की कानूनी स्तर पर जाँच की जाएगी।”
भाजपा ने इस पूरी प्रक्रिया को ‘वोट बैंक की राजनीति’ और पिछली सरकार के दौरान हुई अनियमितताओं का अंत बताया है। सरकार ने संकेत दिया है कि OBC सूची को संशोधित करने और यह सुनिश्चित करने के लिए कि लाभ वास्तविक लाभार्थियों तक पहुँचे, एक नया, संवैधानिक रूप से अनुपालन करने वाला पिछड़ापन सर्वेक्षण कराया जाएगा।