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भारत में वामपंथ के पूरे हुए 100 साल, स्वतंत्रता संग्राम का विरोध, चीन का समर्थन और सैंकड़ों सुरक्षाकर्मियों की हत्या: कम्युनिस्टों की ‘विदेशी विचारधारा’ ने देश को हिंसा की आग में जलाया


भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के 100 साल पूरे होने पर इसके नेता और समर्थक जश्न और पुरानी यादों के साथ इस मौके को मना रहे हैं। हालाँकि, सौ साल का सफर सिर्फ यादें ताजा करने के लिए नहीं होता, बल्कि यह समय आत्म-मंथन और गंभीर मूल्यांकन का भी है। राजनीतिक आंदोलन केवल अपनी उम्र से प्रासंगिक नहीं बनते, बल्कि वे अपने परिणामों (कामयाबियों) से अपनी अहमियत साबित करते हैं।

पिछली एक सदी में, भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन ने खुद को गरीबों, मजदूरों और किसानों की आवाज के रूप में पेश किया है। इसने हमेशा यह दावा किया कि वह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक लंबी अवधि का समाधान है और नैतिक रूप से अन्य राजनीतिक परंपराओं से बेहतर है। हालाँकि, अपनी इस छवि के बावजूद, आज कम्युनिस्ट आंदोलन चुनावी रूप से सिमट गया है, विचारधारा के मामले में काफी सख्त (जड़) हो गया है और भारत की सामाजिक व आर्थिक सच्चाइयों से पूरी तरह कटता जा रहा है।

इससे एक ऐसा अनिवार्य सवाल खड़ा होता है जिसे महज नारों या अतीत की पुरानी यादों के सहारे टाला नहीं जा सकता:

क्या भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन ने वाकई भारत की सेवा की, या फिर इसने देश के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुँचाया?

यह लेख इस सवाल का जवाब किसी खोखली बयानबाजी या वैचारिक भेदभाव के आधार पर नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रिकॉर्ड, राजनीतिक व्यवहार और ठोस परिणामों के जरिए देने की कोशिश करता है। क्योंकि 100 साल बीत जाने के बाद, कोई भी विचारधारा न तो बिना सोचे-समझे सम्मान की हकदार है और न ही बिना सोचे-समझे तिरस्कार की, बल्कि वह एक ईमानदार ऑडिट (सच्चे मूल्यांकन) की हकदार है।

साम्यवाद का क्षेत्र: भारतीय नहीं, स्वदेशी कभी नहीं

कम्युनिज्म (Communism) का उदय भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक या आर्थिक हकीकत से नहीं हुआ था। यह एक यूरोपीय वैचारिक उत्पाद था, जो 19वीं सदी के यूरोप की खास परिस्थितियों में पैदा हुआ था। वे परिस्थितियाँ थीं- तेजी से होता औद्योगिकीकरण, फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूर और पूंजीपतियों व औद्योगिक श्रमिकों के बीच गहरी वर्गीय खाई।

इस सिद्धांत को कार्ल मार्क्स ने विकसित किया था, जिन्होंने यूरोपीय पूंजीवाद का विश्लेषण किया, और बाद में इसे व्लादिमीर लेनिन ने अपनाया, जिन्होंने सत्ता हथियाने के लिए एक कड़े नियंत्रण वाले और ‘हरावल दस्ते’ (vanguard) के नेतृत्व वाली क्रांति की वकालत की थी।

इन दोनों विचारकों (मार्क्स और लेनिन) ने ऐसे समाजों में काम किया जो एक जैसे थे और जहाँ उद्योग मुख्य थे। वहाँ इंसान की असली पहचान उसकी आर्थिक स्थिति या ‘क्लास’ से होती थी। उनके काम करने का तरीका इन तीन बातों पर टिका था।

शोषक और शोषित की साफ पहचान: यानी समाज में एक पक्ष हमेशा जुल्म करने वाला और दूसरा जुल्म सहने वाला होता है।

न्याय के लिए हिंसा का रास्ता: यानी इंसाफ पाने के लिए पुरानी व्यवस्था को हिंसक तरीके से तोड़ना जरूरी है।

कड़ा सरकारी नियंत्रण: यानी गैर-बराबरी को खत्म करने के लिए सारी ताकत एक जगह (सरकार के हाथ में) रखना ही समाधान है।

लेकिन भारत की बनावट कभी ऐसी नहीं रही। भारतीय समाज हजारों साल पुरानी एक सभ्यता है, जो विविधताओं (अलग-अलग तरह के लोगों) से भरी हुई है। यहाँ समाज सिर्फ अमीर-गरीब (आर्थिक क्लास) से नहीं, बल्कि समुदायों, क्षेत्रों, धर्मों, भाषाओं और परंपराओं से बना है। इतिहास गवाह है कि भारत में सामाजिक बदलाव हमेशा सुधार आंदोलनों और आपसी तालमेल से आए हैं, न कि पुरानी व्यवस्था को पूरी तरह तबाह करके।

भारत की इसी खूबी और कम्युनिस्ट विचारधारा के बीच मेल न होना ही वह कारण है, जिसकी वजह से कम्युनिज्म को यहाँ गहराई से नहीं अपनाया गया। एक ऐसी विचारधारा जो केवल ‘दो पक्षों’ (शोषक और शोषित) की लड़ाई पर टिकी हो, वह उस सभ्यता में नहीं टिक सकती जो विविधता और सबको साथ लेकर चलने में विश्वास रखती है। भारतीय समाज लचीला और सबको साथ जोड़ने वाला है, जबकि कम्युनिज्म सख्त और बँटा हुआ है। यही विरोध भारत में कम्युनिज्म की असफलता की सबसे बड़ी वजह है।

देश से ऊपर विचारधारा: भारत छोड़ो आंदोलन और चीन युद्ध

नतीजे देने में फेल होने के साथ-साथ, भारतीय कम्युनिस्टों पर यह आरोप भी लगता है कि उन्होंने हमेशा देश के हित से ऊपर अपनी विचारधारा को रखा। इस विरोधाभास के दो बड़े उदाहरण गौर करने लायक हैं।

भारत छोड़ो आंदोलन (1942): जब CPI देश के साथ खड़ी नहीं हुई

अगस्त 1942 में, भारत ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा जन-आंदोलन देखा, जिसे ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ कहा गया। महात्मा गाँधी के नेतृत्व में शुरू हुए इस आंदोलन में देश के हर कोने और हर समुदाय के लोग शामिल हुए थे। लेकिन ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी’ (CPI) ने इस आंदोलन का विरोध करने का फैसला किया।

CPI ने इस आंदोलन का साथ क्यों नहीं दिया? इसकी वजह जानकर आपको हैरानी हो सकती है। यह फैसला भारत के लिए नहीं, बल्कि उनकी विचारधारा से जुड़ा था। उस समय दूसरे विश्व युद्ध के दौरान सोवियत संघ (रूस) पर जर्मनी ने हमला कर दिया था, जिसके बाद रूस ने ब्रिटेन के साथ हाथ मिला लिया। चूंकि ब्रिटेन अब रूस का साथी बन चुका था, इसलिए CPI ने इस युद्ध को फासीवाद के खिलाफ ‘जनता का युद्ध‘ (People’s War) घोषित कर दिया।

उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे अंग्रेजों के खिलाफ कोई रुकावट पैदा न करें और हड़ताल या विरोध प्रदर्शनों को रोकें। यहाँ तक कि कई मामलों में कम्युनिस्ट नेताओं ने ब्रिटिश सरकार का सहयोग भी किया। जब लाखों भारतीय अंग्रेजों की गोलियाँ खा रहे थे और जेल जा रहे थे, तब CPI हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। ऐसा इसलिए नहीं था कि भारत आजादी के लिए तैयार नहीं था, बल्कि इसलिए था क्योंकि उनकी प्राथमिकता भारत नहीं, बल्कि ‘मॉस्को’ (रूस) के हित थे।

1962 का चीन युद्ध: चुप्पी, उलझन और चीन के प्रति लगाव

ठीक 20 साल बाद 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान फिर से वही पुरानी बात दोहराई गई। जब चीनी सेना ने लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सीमाओं को पार किया, तब पूरे देश को राजनीतिक एकता और स्पष्टता की उम्मीद थी। लेकिन इसके बजाय, कम्युनिस्ट आंदोलन के एक बड़े हिस्से ने चीन के प्रति हमदर्दी दिखाई और इस मामले पर गोल-मोल बात की। इसी विवाद की वजह से आगे चलकर CPI के दो टुकड़े हो गए और चीन का समर्थन करने वाले गुट ने अलग होकर ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी)’ यानी CPM बना ली।

देशहित से अलग हटकर सोचना तो कम्युनिज्म की असफलता का सिर्फ एक हिस्सा था। इससे भी ज्यादा नुकसानदेह वह तरीका था, जिसमें कम्युनिस्ट आंदोलन के कुछ हिस्सों ने लोकतांत्रिक राजनीति का रास्ता ही छोड़ दिया और हथियारों के दम पर बगावत शुरू कर दी। 1960 के दशक के आखिर से, भारत में कम्युनिस्ट विचारधारा ने न केवल सरकार का विरोध किया, बल्कि उसके खिलाफ युद्ध छेड़ दिया।

इसके बाद जो कुछ हुआ, वह मजदूरों के अधिकारों की लड़ाई नहीं थी, बल्कि हिंसा का एक लंबा दौर था। इसमें हत्याएँ की गईं, नरसंहार हुए, सरकारी संपत्तियों को तबाह किया गया और आम जनता को डराया-धमकाया गया। इस हिंसा के शिकार कोई विदेशी शासक या बड़े पूंजीपति नहीं थे, बल्कि भारत के आम लोग थे। जनजातीय (आदिवासी), किसान, जनप्रतिनिधि, पुलिसकर्मी और दिहाड़ी मजदूर। भारतीय कम्युनिज्म की असली मानवीय कीमत को समझने के लिए नारों या किताबों को नहीं, बल्कि कम्युनिस्ट उग्रवाद द्वारा छोड़े गए खून के निशानों को देखना होगा।

भारत में कम्युनिस्ट उग्रवादियों द्वारा किए गए 10 सबसे बड़े नरसंहार

दंतेवाड़ा नरसंहार (2010), छत्तीसगढ़– 6 अप्रैल 2010 को, ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (नक्सली)’ के लड़ाकों ने छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में बहुत ही सोची-समझी साजिश के तहत हमला किया। इस हमले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के 76 जवान शहीद हो गए थे। उग्रवादियों ने पहले बारूदी सुरंगों (landmines) का इस्तेमाल किया और फिर ऑपरेशन से लौट रहे जवानों पर अँधाधुँध गोलियाँ बरसा दीं। आजादी के बाद भारतीय सुरक्षा बलों पर हुआ यह अब तक का सबसे बड़ा और भयानक हमला माना जाता है। इस घटना के बाद देश में ‘नक्सलवाद’ के खिलाफ लड़ने के तरीके में बड़ा बदलाव आया।

झीरम घाटी नरसंहार (2013), छत्तीसगढ़- 25 मई 2013 को, नक्सली उग्रवादियों ने बस्तर के झीरम घाटी इलाके में कॉन्ग्रेस पार्टी के काफिले पर हमला किया था। इस हमले में वरिष्ठ राजनेताओं समेत 27 लोगों की जान चली गई। नक्सलियों ने यह हमला उस समय किया जब नेता जनता के बीच जा रहे थे। इस घटना ने यह साफ कर दिया कि माओवादी चुनाव लड़ने या लोकतंत्र में भरोसा रखने के बजाय, जनता द्वारा चुने गए नेताओं को खत्म करने की रणनीति पर काम करते हैं। इस हमले की पूरी देश में निंदा हुई और इसे भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सीधा हमला माना गया।

नयागढ़ शस्त्रागार हमला (2008), ओडिशा- फरवरी 2008 में, नक्सली लड़ाकों ने ओडिशा के नयागढ़ में पुलिस के शस्त्रागार (जहाँ हथियार रखे जाते हैं) पर एक साथ मिलकर रात में हमला बोला। इस हमले में 15 पुलिसकर्मी मारे गए, भारी मात्रा में हथियार लूट लिए गए और सरकारी इमारतों को तबाह कर दिया गया। इस घटना ने दिखाया कि उग्रवादी कितने खतरनाक और बड़े हमले करने की ताकत रखते हैं। इस लूट के बाद उस इलाके में नक्सलियों के पास हथियारों की ताकत काफी बढ़ गई।

सुकमा हमला (2017), छत्तीसगढ़- 24 अप्रैल 2017 को, सुकमा जिले के चिंतालनार इलाके में नक्सलियों ने CRPF की एक टीम पर अचानक हमला कर दिया, जिसमें 25 जवान शहीद हो गए। उग्रवादियों ने इस हमले में देशी बमों (IED) और बहुत करीब से गोलीबारी का इस्तेमाल किया। उन्होंने वहाँ के मुश्किल रास्तों और खुफिया जानकारी के लीक होने का फायदा उठाया। इस घटना ने यह दिखाया कि सालों से चल रहे अभियानों के बावजूद, नक्सली उग्रवाद की ताकत अभी भी खत्म नहीं हुई है।

अरनपुर IED हमला (2023), छत्तीसगढ़- अप्रैल 2023 में, नक्सली उग्रवादियों ने दंतेवाड़ा के अरनपुर इलाके में एक प्रेशर IED (बारूदी सुरंग) में धमाका किया। इस हमले में ‘डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड’ (DRG) के 10 जवान और एक नागरिक ड्राइवर की जान चली गई। उग्रवादियों ने एक ऐसे वाहन को निशाना बनाया जो उग्रवाद विरोधी अभियान से लौट रहा था। यह घटना एक बार फिर नक्सलियों की उस रणनीति को दिखाती है, जिसमें वे सार्वजनिक सड़कों पर बिना सोचे-समझे बमों का इस्तेमाल करते हैं।

सेनारी गाँव नरसंहार (1999), बिहार- मार्च 1999 में, ‘माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर’ (MCC) ने बिहार के सेनारी गाँव में 34 आम लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी थी। मरने वाले ज्यादातर लोग आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के थे। उग्रवादियों ने इन लोगों को कतार में खड़ा करके गोलियों से भून दिया था और इसे ‘अमीर-गरीब की लड़ाई’ (क्लास स्ट्रगल) बताकर सही ठहराया। इस घटना ने नक्सलियों के नारों और उनकी असलियत के बीच के अंतर को साफ कर दिया।

बारा नरसंहार (1992), बिहार- फरवरी 1992 में, नक्सली उग्रवादियों ने गया जिले के बारा गाँव पर हमला किया और 37 ग्रामीणों की जान ले ली। निहत्थे ग्रामीणों के खिलाफ वामपंथी चरमपंथी हिंसा की यह शुरुआती बड़ी घटनाओं में से एक थी। इसी घटना के बाद बिहार में हिंसा और बदले का एक लंबा दौर शुरू हुआ जिसने राज्य को अस्थिर कर दिया।

लातेहार पुलिस वैन ब्लास्ट (2016), झारखंड- जुलाई 2016 में, नक्सलियों ने झारखंड के लातेहार जिले में एक लैंडमाइन धमाका किया, जिसमें गश्ती वाहन में सवार आठ पुलिस अधिकारी शहीद हो गए। यह हमला ग्रामीण इलाकों में पुलिस और सरकारी व्यवस्था को कमजोर करने की उनकी सोची-समझी कोशिश का हिस्सा था।

सुकमा रोड-ओपनिंग पार्टी हमला (2018), छत्तीसगढ़- मार्च 2018 में, सुकमा जिले में नक्सलियों ने CRPF की उस टीम पर हमला किया जो सड़क निर्माण की सुरक्षा में लगी थी। इस हमले में नौ जवान शहीद हुए। उग्रवादियों ने विकास के कामों को रोकने के लिए जानबूझकर सुरक्षा बलों को निशाना बनाया, क्योंकि वे जनजातीय क्षेत्रों में सड़कों और बुनियादी ढाँचे के विस्तार के खिलाफ हैं।
गिरिडीह लैंडमाइन ब्लास्ट (2007), झारखंड- अक्टूबर 2007 में, नक्सलियों ने गिरिडीह जिले में एक आम नागरिक वाहन के नीचे लैंडमाइन धमाका किया, जिसमें 14 लोग मारे गए। इस घटना ने दिखाया कि नक्सली हिंसा कितनी अंधी है, जहाँ सरकार को निशाना बनाने के चक्कर में अक्सर आम नागरिक अपनी जान गँवा देते हैं।

सौ साल, कोई सुधार नहीं

100 साल पूरे होने के बाद, भारतीय कम्युनिज्म का मूल्यांकन सिर्फ उनके इरादों, सिद्धांतों या भाषणों से नहीं किया जा सकता। इसका फैसला उनके रिकॉर्ड से होना चाहिए। वह रिकॉर्ड बताता है कि यह एक ऐसी विचारधारा है जो भारत के बाहर से आई, जिसने भारतीय समाज को कभी नहीं समझा, देश के हितों से ऊपर विदेशी ताकतों को रखा और देश से ऊपर हमेशा अपनी विचारधारा को चुना। जब चुनावों में उनकी ताकत कम हुई, तो इस आंदोलन के कुछ हिस्सों ने लोकतंत्र का रास्ता छोड़ दिया और हिंसा अपना ली। पीछे रह गए हजारों मृत नागरिक, शहीद जवान और तबाह हुए परिवार।
यह कहानी किसी ऐसी विचारधारा की नहीं है जो परिस्थितियों की वजह से हार गई। यह उस विचारधारा की कहानी है जो इसलिए फेल हो गई क्योंकि वह भारत की हकीकत, यहाँ की विविधता और लोकतांत्रिक सोच के साथ तालमेल नहीं बिठा सकी। इसलिए, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के 100 साल पूरे होना जश्न का नहीं, बल्कि हिसाब-किताब का मौका है। इन 100 सालों में कम्युनिज्म ने न तो गरीबों को आजाद किया, न लोकतंत्र को मजबूत किया और न ही देश की रक्षा की। इसने सिर्फ एक बात साबित की है, एक बाहर से आई विचारधारा जो खुद को देश से ऊपर रखती है, वह आखिर में देश और खुद- दोनों को नुकसान ही पहुँचाती है।

धर्मांतरण के खिलाफ छत्तीसगढ़ में भी आएगा कानून, 10 साल की सजा-लाखों के जुर्माने का प्रावधान: कई नियमों से कट्टरपंथियों पर कसी जाएगी नकेल

                                                                                                                   साभार : Grok & Canva
मौलाना मदनी जैसे कट्टरपंथियों की जिहाद आदि की धमकियों से डराने की कोशिश नहीं कर रहे  है उसका कारण है कि इनके द्वारा जो धर्मांतरण का नंगा नाच खेला जा रहा था उस पर लगाम लगनी शुरू हो गयी है। भारत का मुसलमान अगर इस मुगालते में जी रहा है कि ये हमारी दिक्कतों के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं साथ दो, उन्हें मालूम होना चाहिए कि इन धमकियों का विदेशों में क्या असर हो रहा है उसे समझना होगा। जिहाद की बात बोलने वाले मदनी ने एक बार Al Falah University के आतंकी डॉक्टरों के खिलाफ एक लब्ज नहीं बोलना साबित करता है कि जो कुछ हो रहा है इन कट्टरपंथियों के इशारे पर हो रहा है। 
कल(29 नवंबर) को Republic Bharat पर अपने शो "पूछता है भारत" में एंकर ऐश्वर्य कपूर ने बताया कि विदेशों में उसके बहुत पुराने डॉक्टर दोस्त बताते है कि "डॉक्टरों की इन हरकतों से मरीजों ने हमारे पास आना बंद कर दिया है", कपूर की इस बात का शो में शामिल "गरीब नवाज़" के अंसार रज़ा आदि और भी मुस्लिम भागियों के बीच ये बात कही। मदनी जैसे कट्टरपंथी मुसलमानों के लिए मुसीबत खड़ी कर रहे हैं। देखिए वीडियो:-     
इतना ही नहीं News18 की एंकर रुबिका लियाकत के शो "गूंज" की वीडियो देखिए:-   
            
छत्तीसगढ़ सरकार आने वाले शीतकालीन सत्र में एक नया धर्मांतरण निषेध कानून लाने वाली है। सरकार यह कदम इसलिए उठा रही है क्योंकि बस्तर, जशपुर और रायगढ़ जैसे जनजातीय इलाकों में काफी समय से धर्मांतरण को लेकर विवाद और तनाव बढ़ रहा है। कई बार हालात इतने खराब हुए कि पुलिस और प्रशासन को दखल देना पड़ा। अभी राज्य में मध्य प्रदेश का पुराना कानून लागू है, जिसमें धर्म बदलने से पहले DM की अनुमति लेनी होती है। लेकिन सरकार का मानना है कि यह कानून अब पर्याप्त नहीं है और इसे मजबूत करने की जरूरत है।

नए कानून का उद्देश्य साफ है- कोई भी व्यक्ति बिना पूरी कानूनी प्रक्रिया के धर्म नहीं बदल सकेगा। अगर किसी को डर दिखाकर, लालच देकर, दबाव डालकर या धोखे से धर्म परिवर्तन कराया जाता है तो ऐसे मामलों में कड़ी सजा का प्रावधान होगा। सरकार चाहती है कि हर धर्मांतरण की जानकारी कानूनी रूप से दर्ज हो, ताकि आगे किसी तरह का विवाद न हो और जनजातीय इलाकों में शांति बनी रहे। यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान करेगा, लेकिन जबरन या अवैध धर्मांतरण पर सख्त रोक लगाएगा।

नए कानून में क्या-क्या बदलाव हो सकते हैं?

सरकार के नए ड्राफ्ट में सबसे बड़ी बात यह है कि अब धर्म बदलना पहले की तरह आसान नहीं होगा। किसी भी व्यक्ति को धर्म बदलने से पहले पूरी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा। उसे तय समय पर जिला मजिस्ट्रेट (DM) को लिखित जानकारी देनी होगी, ताकि सरकार को पता रहे कि धर्म परिवर्तन अपनी इच्छा से हो रहा है या किसी दबाव में। अगर कोई व्यक्ति बिना जानकारी दिए धर्म बदल लेता है, तो ऐसे धर्मांतरण को मान्य नहीं माना जाएगा। यानी कागजों पर वह धर्म परिवर्तन वैध नहीं होगा।

इसके साथ ही ड्राफ्ट में यह भी साफ कहा गया है कि अगर किसी ने किसी को लालच देकर, डर दिखाकर, धमकाकर या धोखा देकर धर्म बदलवाने की कोशिश की, तो उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई होगी। ऐसे मामलों में जेल की सजा भी हो सकती है और भारी जुर्माना भी लगाया जा सकता है। सरकार का मानना है कि जब तक प्रक्रिया को मजबूत और सख्त नहीं बनाया जाएगा, तब तक अवैध धर्मांतरण पर रोक लगाना मुश्किल है।

एक और अहम मुद्दा ‘शादी के बहाने धर्म परिवर्तन कराना’, जिसे कई राज्यों में लव जिहाद कहा जाता है। नए कानून में छत्तीसगढ़ भी इस तरह के मामलों पर सख्ती बढ़ा सकता है। अगर कोई व्यक्ति केवल शादी करवाने के मकसद से धर्म परिवर्तन करवाता है या किसी को ऐसा करने पर मजबूर करता है, तो ऐसी शादी को कोर्ट अवैध घोषित कर सकेगी। यानी सिर्फ शादी के लिए धर्म परिवर्तन की कोशिश अब गंभीर अपराध माना जा सकता है।

इस कानून का मकसद यह नहीं है कि किसी की धार्मिक स्वतंत्रता छीनी जाए। हर व्यक्ति को अपनी पसंद का धर्म अपनाने का अधिकार रहेगा, लेकिन यह अधिकार कानून के दायरे में रहकर ही मिलेगा। नए प्रावधान यह सुनिश्चित करेंगे कि कोई भी व्यक्ति दबाव, धोखे या लालच का शिकार न बने। सरकार का मानना है कि इससे खासकर जनजातीय इलाकों में फैल रहा तनाव कम होगा, वहाँ होने वाले झगड़े और सामाजिक विभाजन थमेगा और समाज में स्थिरता बनी रहेगी।

भारत के किन राज्यों में पहले से लागू है धर्मांतरण विरोधी कानून?

भारत में धर्मांतरण विरोधी कानून की शुरुआत बहुत पहले ओडिशा से हुई। ओडिशा ने 1967 में पहला कानून बनाया था, जिसमें जबरन या लालच देकर धर्म परिवर्तन करवाने पर सजा का प्रावधान रखा गया। इसके एक साल बाद मध्य प्रदेश ने भी ऐसा ही कानून लागू किया। समय बीतने के साथ, अलग-अलग राज्यों ने महसूस किया कि धर्मांतरण के मामलों में नए तरीके सामने आ रहे हैं, इसलिए उन्होंने कानूनों को और सख्त बनाना शुरू किया।

हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और राजस्थान ने अपने कानूनों में और कड़े नियम जोड़े हैं। इन राज्यों का साफ कहना है कि अगर कोई व्यक्ति किसी को डर दिखाकर, पैसा या नौकरी का लालच देकर, या शादी का झाँसा देकर धर्म परिवर्तन करवाने की कोशिश करता है, तो यह एक गंभीर अपराध माना जाएगा। ऐसे मामलों में दोषी को 3 साल से लेकर 10 साल तक जेल हो सकती है। इसके साथ ही लाखों रुपए का जुर्माना भी देना पड़ सकता है।

अधिकतर राज्यों में यह अपराध गैर-जमानती है। इसका मतलब है कि पुलिस बिना वारंट के भी आरोपित को गिरफ्तार कर सकती है और जमानत आसानी से नहीं मिलती। अगर पीड़ित व्यक्ति नाबालिग हो, महिला हो, या अनुसूचित जाति/जनजाति (SC/ST) समुदाय से हो, तो सजा और अधिक कड़ी कर दी जाती है, क्योंकि ये वर्ग ज्यादा संवेदनशील माने जाते हैं।

कई राज्यों में तो स्वेच्छा से, यानी अपनी इच्छा से धर्म परिवर्तन पर भी नियम बहुत साफ हैं। जिसे खुद से धर्म परिवर्तन करवाना है, उसे पहले जिला मजिस्ट्रेट (DM) को 30 से 60 दिन पहले लिखित रूप से बताना होता है। यह इसलिए किया जाता है ताकि अधिकारियों को पता रहे कि धर्म परिवर्तन पूरी तरह अपनी इच्छा से किया जा रहा है और इसके पीछे कोई दबाव या लालच नहीं है।

इन सभी कानूनों का मुख्य उद्देश्य एक ही है कि लोगों को सुरक्षा देना, उन्हें धोखे से बचाना और धार्मिक स्वतंत्रता को सही अर्थों में सुरक्षित रखना।

अवैध धर्मांतरण का गलत इस्तेमाल कैसे होता है?

धर्मांतरण को लेकर सबसे बड़ी चिंता तब पैदा होती है जब इसे किसी योजना के तहत, संगठित तरीके से किया जाता है। खासकर तब, जब कमजोर या सरल-सहज लोगों को निशाना बनाया जाता है। कई जगहों पर देखा गया है कि कुछ समूह धीरे-धीरे किसी इलाके में बड़ी संख्या में लोगों का धर्म बदलवाते हैं।

इसका असर सिर्फ धर्म तक सीमित नहीं रहता। इससे उस क्षेत्र की जनसंख्या का संतुलन बदलने लगता है। जब किसी एक समुदाय की संख्या अचानक बढ़ जाती है, तो स्थानीय राजनीति, पंचायतों के फैसले, प्रशासनिक ढाँचा और सामाजिक माहौल पर भी बड़ा असर पड़ सकता है। कई बार यह बदलाव वहाँ रहने वाले पुराने समुदायों के लिए चिंता और असुरक्षा की भावना पैदा कर देता है।

दूसरा बड़ा नुकसान तब होता है जब बाहरी या संगठित समूह जनजातीय समुदायों को उनकी अपनी परंपराओं, देवी-देवताओं और जीवनशैली से दूर करने की कोशिश करते हैं। जनजातीय समाज की अपनी विशिष्ट पहचान होती है, और जब उन्हें तेजी से किसी नए मजहब की ओर मोड़ा जाता है, तो समाज में विभाजन बढ़ता है। कई गाँवों में परिवार आपस में बँट जाते हैं, त्यौहार अलग-अलग हो जाते हैं और सामाजिक रिश्तों में तनाव पैदा हो जाता है।

कुछ मामलों में ऐसे धर्मांतरित व्यक्तियों का इस्तेमाल संगठन अपने प्रचार, अपनी संख्या बढ़ाने या गलत गतिविधियों के लिए भी करते हैं। कमजोर या भावनात्मक रूप से टूटे लोगों को प्रभावित करना आसान होता है और ऐसे लोग अनजाने में कट्टरपंथी सोच के शिकार बन सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट भी इस खतरे को समझ चुका है। कोर्ट ने साफ कहा है कि जबरन या लालच देकर धर्म परिवर्तन करवाना देश की सुरक्षा के लिए भी खतरा बन सकता है। इसलिए कई राज्य सरकारें कानूनों को और सख्त कर रही हैं, ताकि कोई भी व्यक्ति दबाव, डर, दिखावे या चालाकी से लोगों का धर्म परिवर्तन ना करवा सके। सरकारों का उद्देश्य यह नहीं है कि किसी की धार्मिक स्वतंत्रता छीनी जाए, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि हर धर्म परिवर्तन साफ, सुरक्षित और पूरी तरह अपनी इच्छा से हो, न कि किसी चाल या दबाव का नतीजा।

यात्रा से पूर्व भगवान जगन्नाथ बीमार क्यों होते हैं? जब अपने परमभक्त माधव दास के बचे बुखार को अपने ऊपर ले लिया ; मन्दिर का ध्वज वायु की विपरीत दिशा में लहराता है; 5 रहस्य जो अब तक अनसुलझे


यह कथा सनातन विरोधियों को शायद रास नहीं आए, क्योकि अपने मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने पुरुषोत्तम श्रीराम को और उनके निर्मित रामसेतु को ही काल्पनिक बताने का दुस्साहस कर सकते हैं, हो सकता है कभी माता-पिता को ही काल्पनिक न कह दें।

ओडिशा में स्थित जगन्नाथ मंदिर भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण को धरती के बैकुंठ स्वरूप रूप में माना जाता है। माना जाता है कि पुरी का ये पौराणिक मंदिर काफी पुराना है। इस मंदिर से जुड़ा इतिहास काफी हैरान कर देने वाला है। धार्मिक मान्यता है कि जगन्नाथ मंदिर की मूर्तियों में आज भी भगवान श्रीकृष्ण का दिल धड़कता है।

सनातन परंपरा में जगन्नाथ मंदिर को वैष्णव परंपरा का सबसे बड़ा तीर्थ स्थान माना जाता है। आस्था के इस धाम पर प्रतिदिन देश-विदेश से हजारों की संख्या में तीर्थयात्री भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। पुरी का यह मंदिर भगवान ​कृष्ण को समर्पित है, लेकिन वहां पर उन्हें जगन्नाथ धाम के नाम से जाना जाता है। हिंदू धर्म से जुड़े चार प्रमुख तीर्थ में से एक पुरी के इस मंदिर में भगवान जगन्नाथ के साथ उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की मूर्ति के दर्शन होते हैं।

ॐज्येष्ठ पूर्णिमा के बाद भगवान जगन्नाथ 15 दिनों के लिए बीमार होकर एकांतवास में चले जाते हैं। इसे अनासरा या ज्वर लीला कहा जाता है। इस दौरान मंदिर के पट बंद रहते हैं और केवल दायित्वगण ही भगवान की सेवा में रहते हैं।

यह परंपरा भगवान जगन्नाथ के भक्त माधव दास से जुड़ी है। एक बार माधव दास बहुत बीमार थे और भगवान जगन्नाथ ने स्वयं उनकी सेवा कर रहें थे यह बात भक्त माधव दास समझ गए उनकी सेवा प्रभु हीं कर रहें हैं फिर भक्त माधव दास ने प्रभु से कहा आप मेरी सेवा कर रहें हैं यह ठीक नहीं हैं आप तो भगवान हैं मुझे ठीक क्यों नहीं कर देते जो आप मेरे लिए कष्ट सह रहें हैं।
भगवान ने कहा कि तुम्हारे भाग्य में 15 दिन की बीमारी और बची है 15 दिन में ठीक हो जाओगे लेकिन माधव दास ठीक करने की हठ करने लगे प्रभु ने बहुत समझाया लेकिन माधव दास नहीं माने तब प्रभु ने माधव दास को तो ठीक कर दिए लेकिन अपने भक्त की बीमारी को अपने ऊपर ले लिए क्योकि कर्म के फल में परमात्मा भी हस्तक्षेप नहीं करते यहीं विधि का विधान हैं।
तभी से, हर साल ज्येष्ठ पूर्णिमा के बाद भगवान जगन्नाथ 15 दिनों के लिए बीमार होकर एकांतवास में चले जाते हैं अपने प्रिय भक्त की पीड़ा को अपने ऊपर ले लेते हैं फिर रथ यात्रा से पहले स्वस्थ होकर भक्तों के दर्शन के लिए निकलते हैं।
भगवान जगन्नाथ 26 जून को पूर्ण स्वस्थ होकर रथ यात्रा के दौरान अपने प्रिय भक्तों को दर्शन देंगे।
प्रतिमा बनाने में स्वर्ण औजारों का प्रयोग
प्रभु की प्रतिमा में उस वृक्ष की लकड़ी का प्रयोग होता है, जिस वृक्ष पर ॐ अंकित होता है। उस वृक्ष को केवल उसी व्यक्ति को काटने की अनुमति होती है, जिसे स्वप्न में जगह और वृक्ष दिखाया जाता है। उसे उस वृक्ष पर पहुँचने पर स्वर्ण कुल्हाड़ी प्राप्त होती है। उस वृक्ष की लकड़ी को निर्धारित स्थल(प्रतिमा बनाने का स्थल) तक ठेले को उसे और उसके परिवार को ही आज्ञा होती है। कोई अन्य व्यक्ति ठेला खींचने में तनिक भी सहायता नहीं सकता।
कहते हैं कि भगवान विश्वकर्मा स्वयं अपने प्रभु की प्रतिमा बनाने निर्धारित स्थल पर एक बंद कक्ष में स्वर्ण छेनी एवं हथोड़ी आदि से बनाते है। और पुरानी प्रतिमा से नवनिर्मित प्रतिमा में हृदय परिवर्तित करते समय मूर्तिकार की दोनों आँखों पर पट्टी बंधी होती है। यही कारण है कि यात्रा से पहले इनके स्वास्थ्य की जाँच होती रहती है। ज्वर होने पर दवाई आदि दी जाती है। ठंठ लगने की स्थिति में गर्म वस्त्र, शाल और रात्रि शयन में लिहाफ आदि प्रदान किये जाते हैं।

जगन्नाथ पुरी मंदिर के ऐसे 5 रहस्य जो अब तक अनसुलझे

  1. मान्यता है कि जगन्नाथ मंदिर में प्रसाद पकाने के लिए 7 बर्तनों को एक के ऊपर एक क्रम में रखा जाता है, जिसमें सबसे ऊपर रखे बर्तन का प्रसाद सबसे पहले पकता है, जबकि, नीचे की तरफ से एक के बाद एक प्रसाद पकता जाता है। जोकि अपने आप में हैरान कर देने वाला है।
  2. मान्यता है कि मंदिर में दिन के समय हवा समुद्र से जमीन की ओर चलती है। जबकि शाम के समय हवा जमीन से समुद्र की ओर चलती है। जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर लगा झंडा हमेशा हवा के विपरीत लहराता है।
  3. मान्यता है कि जगन्नाथ मंदिर की ऊंचाई करीब 214 फीट है। ऐसे में पशु पक्षियों की परछाई तो बननी चाहिए, मगर इस मंदिर के शिखर की छाया हमेशा गायब ही रहती है।
  4. पुरी में समुद्र तट पर स्थित जगन्नाथ मंदिर के ऊपर से न ही कभी कोई हवाई जहाज उड़ता है और न ही कोई पक्षी मंदिर के शिखर पर बैठता है। ऐसा भारत के किसी भी मंदिर में नहीं देखा गया है।
  5. मंदिर में हर 12 साल के भीतर भगवान जगन्नाथ समेत तीनों मूर्तियों को बदला जाता है। जिसके बाद वहां पर नई मूर्तियां स्थापित की जाती हैं। भगवान की मूर्तियों को बदलते समय शहर की बिजली को काट दिया जाता है। इसके साथ ही मंदिर के बाहर भारी सुरक्षा बलों को तैनात कर दिया जाता है। उस दौरान सिर्फ पुजारी को ही मंदिर में जाने की परमिशन होती है।
हर साल देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने के बाद 56 भोग का महाप्रसाद खाने के लिए यहां आते हैं। मान्यताओं के अनुसार यहां की रसोई दुनिया की सबसे बड़ी रसोई है, जो प्रतिदिन हजारों लोगों को सेवा प्रदान की जाती है। लेकिन आपको बता दें कि जगन्नाथ पुरी के इस रहस्यों से भरे मंदिर की रसोई में जो प्रसाद बनाया जाता है उसमें टमाटर का उपयोग पूरी तरह से प्रतिबंधित है। लेकिन क्यों? तो आइए इस बारे में जानते हैं:-
क्यों नहीं किया जाता टमाटर का उपयोग
दरअसल, उड़िया में टमाटर को बिलाती (जो कि एक विदेशी नाम है) के नाम से जाना जाता है। इसलिए जगन्नाथ पुरी मंदिर में बनने वाले प्रसाद में टमाटर का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। क्योंकि मान्यताओं के अनुसार, भारत में टमाटर को पहले के समय में विदेशियों के द्वारा उगाया जाता था और उन्हीं के द्वारा ही इसे भारत में भी लाया गया था। इसलिए इसे जगन्नाथ पुरी मंदिर में उपयोग करने पर बैन है। हालांकि यहां सिर्फ टमाटर ही नहीं। बल्कि आलू सहित कई अन्य सब्जियों पर भी बैन है।
जगन्नाथ पुरी मंदिर के प्रसाद में ये सब्जियां भी हैं प्रतिबंधित
भोग में टमाटर सहित आलू, फूलगोभी, पत्तागोभी, चुकंदर, मक्का, हरी मटर, गाजर, शलजम, बेल मिर्च, धनिया, बीन्स, मिर्च, हरी बीन्स, करेला, भिंडी और खीरे जैसी सब्जियों को भी महाप्रसाद में शामिल करने से रोक दिया गया है।
क्यों प्रतिबंधित हैं विदेशी सब्जियां
दरअसल, माना जाता है कि भगवान जगन्नाथ जी के मंदिर में जो महाप्रसाद भगवान को चढ़ाने के लिए तैयार किया जाता है, उसकी पूरी सामग्रियां लोकल होती हैं। इसमें स्थानीय फूड का इस्तेमाल किया जाता है। इतना ही नहीं, यहां मंदिर में भोग को बनाने के लिए भी मिट्टी और ईंट से बने बर्तनों का इस्तेमाल किया जाता है।
जानकारी के अनुसार, यह महाप्रसाद बनाने के लिए मिट्टी और ईंट से बने 240 स्टोव हैं। जिनमें भोग तैयार किया जाता है। प्रत्येक चूल्हे पर 9 बर्तनों को एक के ऊपर एक रखकर खाना पकाया जाता है। बताया जाता है कि ये 9 बर्तन का अंक 9 नवग्रह, 9 धान्य और 9 दुर्गाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।

ओडिशा में भिड़े विधायक, विधानसभा में ही हाथापाई: माँझी सरकार का आदेश- पत्रकार अंदर ना ले जाएँ मोबाइल, फोटो-वीडियो लेने पर रोक

                                                                                                                                         साभार 
ओडिशा विधानसभा के अंदर मंगलवार (11 मार्च, 2025) को विधायकों ने मारपीट कर दी। अलग-अलग पार्टियों के विधायक एक-दूसरे को पीटते और अभद्र व्यवहार करते देखे गए। इस घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए हैं। उन्हें समाचार टीवी चैनल ने भी प्रसारित कर दिया। विधायकों के व्यवहार की आलोचना हुई है।

 इस घटना के बाद, मोहन माझी सरकार ने पत्रकारों और मीडिया कर्मियों को विधानसभा हॉल की गैलरी के अंदर मोबाइल फोन ले जाने पर प्रतिबंध लगा दिया। मोबाइल बैन के आदेश के बाद ओडिया पत्रकारों ने विधानसभा के बाहर विरोध प्रदर्शन किया।

सरकार ने कुछ देर बाद यह निर्णय वापस ले लिया। हालाँकि, इसमें भी एक शर्त लगा दी गई। सरकार ने पत्रकारों पत्रकार अपने फोन ले जा सकते हैं, लेकिन उन्हें विधानसभा के अंदर फोटो लेने या वीडियो रिकॉर्ड करने की अनुमति नहीं होगी।

मंगलवार, 11 मार्च को भाजपा विधायक जय नारायण मिश्रा और कॉन्ग्रेस विधायक तारा प्रसाद बहिनीपति के बीच झगड़ा होते देखा गया था। कॉन्ग्रेस और भाजपा के विधायकों को विधानसभा के अंदर एक-दूसरे को धक्का-मुक्की करते देखा गया। बाद में स्पीकर के पोडियम पर चढ़ने की कोशिश करने के लिए कॉन्ग्रेस विधायक बहिनीपति को निलंबित कर दिया गया।

बेंगलुरु : ओड़िया साइनबोर्ड देख भड़का कन्नड़ गुंडा, धमकी से डर कर रेस्टोरेंट मालिक ने बोर्ड उतारा

                                                                           ओडिया खाना
कर्नाटक के बेंगलुरु में स्थानीय भाषा के चलते एक और विवाद सामने आया है। यहाँ ‘डिलिशियस पखाल (Delicious pakhal)’ नाम के ओड़िया रेस्टोरेंट के मालिक को एक कन्नड़ भाषी आदमी ने आकर धमकी दी कि वो रेस्टोरेंट के ऊपर से उस साइनबोर्ड को हटाए जिसमें ओड़िया भाषा में रेस्टोरेंट का नाम लिखा है।

राहुल गाँधी द्वारा खोली गयी 'मौहब्बत की दुकान' में बिकने वाले माल की असलियत सामने आती ही रहती है। जब 'मौहब्बत की  दुकान' का ये हाल है नफरत की दुकान का होने पर क्या होता अंदाजा लगाया जा सकता है।    

वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि कार में बैठा युवक रेस्टोरेंट के कर्मचारी को बुलाता है और पूछताछ शुरू करता है। वह पूछता है कि आखिर बोर्ड पर ओड़िया भाषा में रेस्टोरेंट का नाम क्यों लिखा है?

दिलचस्प बात ये है कि ये सवाल वो व्यक्ति तब करता है जब रेस्टोरेंट पर कन्नड़ भाषा में भी रेस्टोरेंट का नाम साफ लिखा था। व्यक्ति का रवैया परखते हुए रेस्टोरेंट का कर्मचारी बहुत सहजता से जवाब देता है, “इस रेस्टोरेंट में ओडिशा का खाना मिलता है। यह खाना 90 फीसदी ओड़िया लोगों के लिए होता है इसलिए इस साइनबोर्ड को लगाया गया है।”

अजीब बात ये है कि ओड़िया रेस्टोरेंट में काम करने वाला कर्मचारी पूरी तरह से कन्नड़ में बात कर रहा था, फिर भी उस कार सवार का गुस्सा बढ़ता गया। उसने कर्मचारी को धमकी दी कि वह अपने रेस्टोरेंट से ओड़िया भाषी बोर्ड हटा दे, क्योंकि वो एक हफ्ते बाद आकर दोबारा देखेगा।

उसने कहा, “बेंगलुरु में काम करने के लिए कन्नड़ भाषा और कन्नड़ लोगों को पहली प्राथमिकता मिलनी चाहिए। क्या आपने अन्य राज्यों को हमारी भाषा में बोर्ड लगाने की अनुमति देते देखा है? यहाँ उस भाषा की अनुमति नहीं है। इसे हटा दें। मैं एक हफ़्ते में वापस आऊँगा।”

इस घटना के बाद उस रेस्टोरेंट के मालिक ने किसी विवाद से बचने के लिए अपने रेस्टोरेंट से वो बोर्ड हटा दिया जिसकी नई तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर हैं। लेकिन, इस बीच लोग पुरानी वीडियो को शेयर करते हुए कई तरह के सवाल खड़े कर रहे हैं। खुद कन्नड़ भाषी लोग ये कह रहे हैं कि जब रेस्टोरेंट का मालिक कन्नड़ में बात कर रहा है, साइनबोर्ड सिर्फ मार्केटिंग के लिए लगाया है तो दिक्कत क्या है? वो लोग ओड़िया व्यंजन परोसते हैं तो इतना तो किया ही जा सकता है।

पंजाब की आर्थिक सेहत सबसे बुरी, केरल-पश्चिम बंगाल भी अत्यंत बीमार: नीति आयोग ने जारी किया 18 राज्यों का आँकड़ा

                                   नीति आयोग ने जारी की रिपोर्ट (फोटो साभार: नीति आयोग)
नीति आयोग ने 18 प्रमुख राज्यों का वित्तीय स्वास्थ्य सूचकांक (Fiscal Health Index) जारी किया। शुक्रवार (24 जनवरी 2025) को जारी, यह सूचकांक राज्यों की जीडीपी में हिस्सेदारी, जनसांख्यिकी, सार्वजनिक खर्च, राजस्व और वित्तीय स्थिरता के आधार पर रैंकिंग करता है। वित्तीय वर्ष 2022-23 के विश्लेषण पर आधारित इस सूचकांक में पंजाब सबसे नीचे स्थान पर है। अन्य निचले पाँच राज्यों में आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, केरल और हरियाणा शामिल हैं।

 रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब व्यय की गुणवत्ता, वित्तीय अनुशासन और ऋण सूचकांक के मामले में सबसे खराब प्रदर्शन करता है, जबकि राजस्व संग्रह और ऋण स्थिरता में थोड़ा बेहतर है। वहीं, ओडिशा ने ऋण सूचकांक और ऋण स्थिरता में सबसे ऊँची रैंकिंग प्राप्त की।

यह सूचकांक पाँच प्रमुख संकेतकों पर आधारित है: व्यय की गुणवत्ता, राजस्व संग्रह, वित्तीय अनुशासन, ऋण सूचकांक और ऋण स्थिरता। डेटा मुख्य रूप से नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) से लिया गया है। ओडिशा ने 67.8 अंकों के साथ शीर्ष स्थान हासिल किया है, जबकि पंजाब केवल 10.7 अंकों के साथ सबसे निचले स्थान पर रहा। शीर्ष पाँच राज्यों में ओडिशा के बाद छत्तीसगढ़, गोवा, झारखंड और गुजरात शामिल हैं। वहीं, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश भी टॉप परफॉर्मर्स में हैं।

नीति आयोग ने कहा कि ओडिशा ने निम्न वित्तीय घाटे, अच्छी ऋण प्रोफाइल और मजबूत पूंजीगत व्यय अनुपात बनाए रखा है। दूसरी ओर, पंजाब, केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों को कमजोर राजस्व संग्रह, उच्च ऋण और बड़े ब्याज भुगतान जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

रिपोर्ट यह भी बताती है कि ओडिशा, छत्तीसगढ़ और गुजरात जैसे राज्य लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, जबकि पंजाब, केरल और पश्चिम बंगाल पिछले नौ वर्षों से खराब वित्तीय स्थिति में हैं।

महाराष्ट्र, उत्तराखंड, ओडिशा… भारत में शरण के लिए सीमा पर खड़े हैं बांग्लादेश के हिंसा पीड़ित, इधर देशभर में पकड़े जा रहे मुस्लिम घुसपैठिए: फर्जी आधार कार्ड भी मिले

                             ओडिशा में संदिग्ध लोग भी हिरासत में (फोटो साभार: दैनिक जागरण)
भारत में अवैध रूप से घुसने वाले बांग्लादेशी घुसपैठियों की धरपकड़ तेज हो गई है। इन दिनों कई लोग पकड़े गए हैं जिनके पास से फर्जी आधार कार्ड बरामद हुए हैं। पुलिस ने नवी मुंबई से 5 बांग्लादेशियों को गिरफ्तार किया है। रुड़की से एक धरा गया है और ओडिशा में भी 34 मजदूरों को बांग्लादेशी होने के संदेह पर हिरासत में लिया गया था। इनके पास से भी फर्जी पहचान पत्र मिले थे।

रुड़की में बांग्लादेशी गिरफ्तार

हरिद्वार के रुड़की से गिरफ्तार होने वाले शख्स का नाम रहीमुल है जो कि बांग्लादेश के हाकीमपुर का रहने वाला है। वह करीब तीन महीने पहले बिना पासपोर्ट के अवैध रूप से पश्चिम बंगाल में बीजापुर में दाखिल हुआ था। कुछ दिन पहले पुलिस को बताया गया कि एक संदिग्ध युवक सैन्य क्षेत्र से सटे ढंडेरा इलाके में दिखा है। पुलिस ने उसे पकड़कर हिरासत में लिया तो उसके बाद से फर्जी पहचान पत्र मिला।
सख्ती से पूछताछ पर उसने बताया कि लगभग तीन महीने पहले एक इंजीनियर उसे सीमा पर छोड़ गया था और कहा था कि नौकरी लग जाएगी। इसके बाद उसने कुछ और बहाना बनाया। बार-बार बरगलाए जाने पर सुरक्षाकर्मी सख्त हुए तब उसने बताया कि पश्चिम बंगाल में बीजापुर सीमा में तीन महीने पहले दाखिल हुआ था। इसके बाद वो रुड़की आया। अब पुलिस ये पता लगाने का प्रयास कर रही है कि रहीमुल को छोड़ने वाला कौन है और किसने उसकी मदद की।

महाराष्ट्र में 5 बांग्लादेशी गिरफ्तार

वहीं महाराष्ट्र के नवी मुंबई में अवैध रूप से बांग्लादेश के पाँच नागरिकों को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस ने रविवार (11 अगस्त 2024) को इस संबंध में जानकारी देते हुए बताया उन्होंने एक गुप्त सूचना के आधार पर शनिवार को कोपरखैरणै क्षेत्र में स्थित एक आवासीय परिसर में छापा मारकर 4 महिलाएँ और 1 पुरुष को गिरफ्तार किया है।
दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने बताया कि उन्हें इन लोगों से पूछताछ के दौरान पता चला है कि पाँचों जाली जाली दस्तावेजों के आधार पर भारत में दाखिल हुए थे। उन्होंने बताया कि चारों महिलाओं की उम्र 34 से 45 वर्ष के बीच है। महिलाएँ घरेलू सहायिका का काम करती हैं, जबकि पुरुष की उम्र 38 साल है और वह घरों में पुताई का काम करता है।
अब पुलिस ने बताया कि पाँचों बांग्लादेशी नागरिकों के खिलाफ आईपीसी की धाराओं के तहत धोखाधड़ी और जालसाजी के साथ-साथ पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) नियम-1950 और विदेशी अधिनियम-1946 के प्रावधानों के तहत एफआईआर की गई है।

ओडिशा में 34 मजदूर हिरासत में

इसी तरह ओडिशा के संबलपुर में 34 मजदूरों को हिरासत में लिया गया था। पुलिस का कहना था कि ये बांग्लादेशी हैं या नहीं ये तो नहीं पता लेकिन ये पता है कि इनके पास से फर्जी पहचान पत्र मिले हैं। पुलिस ने इन्हें छोड़ दिया है मगर इनकी गतिविधियों पर लगातार नजर है।
शहर में पहले भी अवैध घुसपैठ की बात सामने आती रही है इसलिए मामले की संवेदनशीलता देखते हुए जाँच पड़ताल की जा रही है। एक टास्क फोर्स का गठन भी हुआ है इसके दो अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक, एक डीएसपी और संबंधित थाने के थानेदार, सहायक और सब इंस्पेक्टर आदि शामिल हैं।

ओडिशा : जगन्नाथ मंदिर के खुले चारों द्वार… सरकार बनने के पहले दिन BJP ने पूरा किया 1 वादा: CM माझी बोले- विकास के लिए आवंटित करेंगे 500 करोड़ रूपए

खुले जगन्नाथ मंदिर के चारों द्वारा
ओडिशा में प्रचंड जीत हासिल करने के बाद पहली बार सत्ता में आई भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने पहले दिन से ही जनता से किए वादे पूरे करने शुरू कर दिए हैं। कल(जून 12) प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण करने के बाद मोहन शरण माझी ने आज(जून 13) जगन्नाथ पुरी के चारों द्वार खोले जाने का ऐलान किया है।

जानकारी के मुताबिक, इस मामले पर फैसला भाजपा सरकार ने पहली कैबिनेट मीटिंग के बाद ले लिया था। ये बैठक मोहन माझी के बतौर ओडिशा के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लिए जाने के बाद 12 जून की शाम हुई थी।

इसी बैठक में मंदिर के चारों गेट खोलने का प्रस्ताव रखा गया था, जिसे कैबिनेट ने पास कर दिया और अब पुरी के चारो द्वारा खोले जा चुके हैं। मुख्यमंत्री मोहन माझी ने जगन्नाथ मंदिर के सभी गेट खोलने जाने के फैसले की जानकारी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर दी है। माझी ने लिखा है कि पुरी मंदिर के 4 दरवाजे पर जूता और मोबाइल स्टैंड बनाया जाएगा।

मुख्यमंत्री ने कहा है कि प्रबंधन समिति की आपात बैठक में मंदिर को लेकर यह निर्णय हुआ। पुलिस विभाग को नियमित निगरानी की व्यवस्था करने का निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ ही पेयजल उपलब्ध कराया जाएगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि सुबह साढ़े छह बजे मंदिर में फैसले को लागू किया गया है। कैबिनेट में मंदिर के विकास और अन्य कामों के लिए फंड देने का प्रस्ताव रख गया है। हम जब अगला बजट पेश करेंगे। तब 500 करोड़ रुपये का फंड आवंटित करेंगे।

चुनाव के दौरान भाजपा ने जनता से जगन्नाथ मंदिर के चारों द्वार खोलने का वादा किया था, जो सरकार बनते ही पूरा हो गया है। बीजद सरकार ने कोरोना के बाद से इस द्वार को बंद करवा रखा था। बाद में अलग-अलग बहाने देकर वह इसे टालते रहे। हालाँकि भाजपा सरकार ने पहली बैठक में इस पर सुनवाई की और हिंदू श्रद्धालुओं को खुशखबरी दी।

25 सालों बाद ओडिसा में बीजेपी बनने से 19 प्रदेशों में बीजेपी-एनडीए की सरकार; जॉर्ज सोरेस आदि अनेकों सनातन और भारत विरोधियों के तोते उड़े; भारत को तोड़ने हज़ारो-करोड़ों रूपए खर्च किया जा रहा है; कभी मुस्लिम और ईसाईयों में जातपात का शोर सुना? नहीं, क्यों?

भारत से प्रेम रखने वाले हर भारतवासी चाहे वह किसी धर्म अथवा मजहब से हो, नींद से जागने का समय आ गया है। अगर नहीं जागे इतिहास बन जाओगे और तुम्हारी आने वाली पीढ़ियां पानी पी-पीकर तुम्हे कोसेंगी। क्योकि जो देश का नहीं हुआ किसी का नहीं हो सकता। दुनियां में भी तुम्हारी जो दुर्दशा होगी तुम्हारी पीढियों का जीवन भी बर्बाद हो जायेगा। CAA विरोध से लेकर किसान आंदोलन आदि तक जितने भी हिंसक प्रदर्शन हुए सभी सनातन और भारत विरोधी विदेशियों की दी भीख से हुए हैं। भारत को तोड़ने हज़ारो-करोड़ों रूपए खर्च किया जा रहा है। विपक्ष जातपात से हिन्दुओं को बांटकर सनातन और भारत विरोधियों की भाषा बोल रहे हैं। इतने सालों में कभी मुस्लिम और ईसाईयों में जातपात का शोर सुना? नहीं, क्यों? क्योकि ये मजहब के नाम पर एकजुट रहते हैं, जबकि हिन्दू ने अपनी ऐसी दुर्दशा बनाई हुई है, जिसे शब्दों में कहना मुश्किल है। बुद्धिजीवी उर्फ़ मूर्ख हिन्दू अपने आप मतलब निकाल लें। 
लोकसभा चुनाव 2024 का परिणाम आने के बाद बीजेपी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है लगातार तीसरी बार नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनेंगे। जिससे जॉर्ज सोरेस जैसी भारत विरोधी उपद्रवियों की नींद ही नहीं रोटी-पानी तक हराम हो गया है। बीजेपी लोकसभा चुनाव में जहां 240 सीटें जीतकर सिंगल लार्जेस्ट पार्टी बनी है वहीं विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने ओडिशा और अरुणाचल प्रदेश में प्रचंड जीत दर्ज की है और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के घटक दल तेलगु देशम पार्टी (टीडीपी) ने आंध्र प्रदेश में बड़ी विजय हासिल की है। इस तरह चुनाव के बाद तीन राज्यों में बीजेपी-एनडीए की सरकार बनने जा रही है। अब 19 राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में बीजेपी या उसके गठबंधन की सरकार हो गई है। इन राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में उत्तराखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, त्रिपुरा, पुदुचेरी, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर, महाराष्ट्र, हरियाणा, गुजरात, गोवा, असम और अरुणाचल प्रदेश शामिल हैं।

लोकसभा चुनाव 2024 के साथ ही ओडिशा विधानसभा चुनाव के भी नतीजे आए। ओडिशा में जनमत ढाई दशकों के बाद पूरी तरह से बदला नजर आया। जनकल्याण की नीतियों को छोड़कर सिर्फ चेहरा चमकाने की राजनीति कर रहे नवीन बाबू को जब लगा कि चुनाव में बीजेडी कमजोर पड़ रही है, तो उन्होंने मुफ्त की रेवड़ियों की झड़ी लगा दी। नवीन पटनायक की बीजेडी ने ओडिशा में 100 यूनिट फ्री बिजली, सभी छात्रों के छात्रवृत्ति, स्वयंसेवी समूहों को आर्थिक मदद और अन्य वादे किए, लेकिन जब नतीजे 4 जून को आए, तो ओडिशा में बीजू जनता दल को बुरी तरह से पराजय का मुँह देखना पड़ा। खुद मुख्यमंत्री नवीन पटनायक डैमेज कंट्रोल के लिए 2 सीटों पर चुनाव लड़े, लेकिन एक सीट पर उन्हें भी पराजय का मुँह देखना पड़ा।

बीजेपी-एनडीए गठबंधन की अब 19 राज्यों में सरकार
हाल में आए विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद जहां ओडिशा और अरुणाचल प्रदेश में बीजेपी की सरकार बनने जा रही है वहीं आंध्र प्रदेश में एनडीए की सरकार बनेगी। इस तरह विधानसभा चुनाव के बाद तीन राज्यों में बीजेपी-एनडीए की सरकार बनने जा रही है। अब 19 राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में बीजेपी या उसके गठबंधन की सरकार हो गई है। इन राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में उत्तराखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, त्रिपुरा, पुदुचेरी, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर, महाराष्ट्र, हरियाणा, गुजरात, गोवा, असम और अरुणाचल प्रदेश शामिल हैं।

ओडिशा में पहली बार बीजेपी को बहुमत, बीजेडी का पत्ता साफ
ओडिशा विधानसभा चुनाव की 147 सीटों में से भारतीय जनता पार्टी ने बहुमत हासिल करते हुए बीजेपी ने 78 सीटें जीत ली है वहीं दो दशक से सत्ता पर काबिज बीजू जनता दल (बीजेडी) को 51 सीटों पर संतोष करना पड़ा। कांग्रेस पार्टी को यहां 14 सीटें मिली है। बीजू जनता दल ने 2019 में हुए विधानसभा चुनाव में राज्य की 147 में से 117 सीटों पर जीत हासिल कर सरकार बनाई थी। बीजेपी को 23 सीटें, कांग्रेस को 9, सीपीआई एम को 1 और निर्दलीय को 1 सीट मिली थी। ओडिशा में करीब ढाई दशक से नवीन पटनायक मुख्यमंत्री के रूप में कार्य कर रहे थे। ओडिशा में विधानसभा की 147 सीटें और लोकसभा की कुल 21 सीटें हैं। विधानसभा और लोकसभा चुनाव 13 मई से 1 जून तक चार चरणों में एक साथ आयोजित किए गए थे। विधानसभा चुनावों में बीजेडी के नवीन पटनायक चुनावी मैदान में थे तो भाजपा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर यह चुनाव लड़ा।

अरुणाचल प्रदेश में बीजेपी ने लगाई हैट्रिक, विधानसभा की 46 सीटें जीती
भाजपा ने अरुणाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में तीसरी बार जीत हासिल कर सत्ता में वापसी की है। 60 सदस्यीय विधानसभा में बीजेपी ने 46 सीटों पर जीत हासिल की है। 2019 की तुलना में बीजेपी को चार सीटें अधिक मिली हैं। 2 जून 2024 को हुई मतगणना में बीजेपी ने विपक्षी पार्टियों खासकर कांग्रेस को करारी शिकस्त दी है। चुनाव परिणाम में एनपीपी को 5, एनसीपी को 3 और पीपीए को 5, कांग्रेस को एक और निर्दलीय को तीन सीटों पर जीत मिली है। भाजपा ने अरुणाचल प्रदेश में 2019 के विधानसभा चुनाव में 41 सीटों पर जीत हासिल की थी। भाजपा का वोट प्रतिशत 54.57 रहा।

आंध्र प्रदेश में बीजेपी-टीडीपी गठबंधन की जीत, टीडीपी ने 135 सीटें जीती
आंध्र प्रदेश में भाजपा और तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) के गठबंधन को विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत मिली है। राज्य में टीडीपी ने सबसे अधिक सीटें जीती हैं। 135 सीटें जीत कर टीडीपी ने बहुमत के आंकड़े को पार कर लिया है। वहीं, जनसेना ने 21 सीटें जीती हैं। भाजपा आठ सीटें जीतने में सफल रही। वर्तमान सत्तारूढ़ दल वाईएसआर कांग्रेस पार्टी मात्र 11 सीटों पर सिमट गई है। वहीं, लोकसभा की अधिकांश सीटें भी एनडीए की झोली में गई हैं।

चुनाव से पहले एनडीए में दोबारा शामिल हुई थी टीडीपी
चुनाव से पहले भाजपा की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और तेलगु देशम पार्टी (टीडीपी) के नेता चंद्रबाबू नायडू ने वापसी की थी। साल 1996 में टीडीपी पहली बार एनडीए का हिस्सा बनी थी। चंद्रबाबू नायडू ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मिलकर काम किया था। इतना ही नहीं, आंध्र प्रदेश में 2014 का लोकसभा और विधानसभा चुनाव भी टीडीपी ने भाजपा के साथ लड़ा था, लेकिन 2019 में टीडीपी, एनडीए से अलग हो गई थी।

सच हारा, झूठ और अफवाह जीती; मोदी ने दक्षिण भारत में बीजेपी को खड़ा तो कर दिया, लेकिन मुस्लिम रणनीति को नहीं समझ पाए; बंद करो मुफ्त का राशन और PM Awas Yojna ; मुस्लिम महिला कल्याण से क्या मिला? वीडियो देखिए मंद बुद्धि वाले हिन्दुओं

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लोकसभा 2024 चुनाव के परिणाम सामने हैं। भाजपा 240 सीट के साथ देश की सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी है। इन चुनावों में अधिकांश चर्चा भाजपा की उत्तर भारत के कुछ राज्यों में सीटें घटने को लेकर है। दूसरी तरफ पार्टी ने दक्षिण में अपने पैर पसारे हैं, उसने कई राज्यों में वोट प्रतिशत बढ़ाया है और केरल जैसे राज्य में खाता भी खोला है।

इसके साथ-साथ मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में बीजेपी की दयनीय स्थिति पर गंभीरता से विचार करने की। हिन्दू-मुसलमान और सेकुलरिज्म का रोने वाला बहुत खुश है। जितना काम मुस्लिम महिलाओं के लिए किया है अगर उन्होंने ही बीजेपी को वोट दिया होता, बीजेपी 350+ पर होती और NDA 400+ होता। राममंदिर बनने के बाद से मुस्लिम बीजेपी को हराने वाले का साथ देने वाले को वोट देने की मन बना चुके थे। 

भारतीय जनसंघ से लेकर वर्तमान भारतीय जनता पार्टी तक मुसलमान पार्टी से जुड़ तो सकता है, लेकिन वोट नहीं देगा। जिसका विस्तार से उल्लेख दिल्ली में हुए चुनाव में कर चूका हूँ। मंडल का अध्यक्ष मुस्लिम और उसके अपने ही पोलिंग बूथ पर बीजेपी को एक भी वोट नहीं मिली, जिस मंडल अध्यक्ष के पोलिंग बूथ पर एक भी वोट नहीं मिलने का मतलब है मंडल अध्यक्ष ने भी अपनी ही पार्टी को वोट नहीं दिया। क्या कोई कार्यवाही की भाजपा शीर्ष नेतृत्व ने? बीजेपी में ही नहीं, राष्ट्रीय मुस्लिम मंच में महत्वपूर्ण पद पर है। मूर्ख और लालची हिन्दू झूठ, जात-पात और अफवाहों में आकर बीजेपी को वोट नहीं दिया। सोशल मीडिया पर देखिए हिन्दुओं को अपमानित किया जा रहा है। दूसरे, भाजपा मंडल से लेकर शीर्ष नेतृत्व तक पार्टी पुराने और कमर्ठ कार्यकर्ताओं को नज़रअंदाज़ करते रहते हैं। देखिए दोनों वीडियो और समझो मुस्लिम रणनीति को:

  

तमिलनाडु में उसने अपना वोट प्रतिशत तीन गुना कर लिया है। आंध्र प्रदेश में उसके वोट प्रतिशत में 10 गुने की बढ़ोतरी हुई है। कर्नाटक में भी वह अपना किला बचाने में सफल रही है। तेलंगाना में उसने अपना वोट प्रतिशत और सीट दोनों ही लगभग दोगुने कर लिए हैं। इन राज्यों में भाजपा का यह विस्तार उसे आगे चुनावों में और बढ़त देगा। राज्यवार समीक्षा की जाए तो दिखाई देता है कि 2019 के मुकाबले दक्षिण में भाजपा कहीं अधिक प्रभावशाली ढंग से उभरी है।

तमिलनाडु: 10% के पार पहुँचा वोट प्रतिशत

दक्षिण के सबसे बड़े राज्य तमिलनाडु में भाजपा ने 2024 लोकसभा चुनावों में 10% से अधिक वोट हासिल किए हैं। उसे 2024 लोकसभा चुनावों में 11.24% वोट मिले हैं। यह उसका तमिलनाडु में सबसे अच्छा प्रदर्शन है। इससे पहले 2019 चुनावों में उसे 3.62% वोट मिले थे। तमिलनाडु में भाजपा तीसरे सबसे अधिक वोट हासिल करने वाली पार्टी बनी है। उसे सत्ताधारी DMK और विपक्षी AIADMK के बाद राज्य में सबसे अधिक वोट हासिल हुए हैं। कॉन्ग्रेस इस मामले में तमिलनाडु में भाजपा से पीछे रही है।
तमिलनाडु में भाजपा की यह उपलब्धि उसे विधानसभा चुनावों में बड़ी बढ़त दे सकती है। हालाँकि, 11% से अधिक वोट पाने के बाद भी भाजपा तमिलनाडु में सीटें नहीं जीत सकी। लेकिन वह 11 सीटों पर राज्य में दूसरे स्थान पर रही है। इससे यह स्पष्ट होता है कि तमिलनाडु की जनता DMK-AIADMK के अलावा अन्य विकल्प भी तलाश रही है।

केरल: खाता खुला, वोट बढ़े

दक्षिण भारत में केरल अभी तक ऐसा राज्य रहा है जहाँ भाजपा को कभी भी सफलता नहीं मिली थी। 2024 लोकसभा चुनाव में केरल में भाजपा का सीट का सूखा समाप्त हो गया। भाजपा ने यहाँ त्रिशुर सीट जीत ली है। भाजपा उम्मीदवार सुरेश गोपी यहाँ सफलता हासिल करके विजयी हो गए हैं। इसी के साथ वामपंथी राजनीति के आखिरी गढ़ में भाजपा ने सेंधमारी कर दी है। राज्य में भाजपा का वोट प्रतिशत भी बढ़ा है, 2019 चुनाव में राज्य में भाजपा का वोट प्रतिशत 12.99% था।
2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा को 16.68% वोट मिले हैं। उसकी चुनावी सफलता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि राज्य वामदलों को भी 1 ही सीट हासिल हुई है। वह आँकड़े में भाजपा के बराबर आ गए हैं। केरल में भाजपा तिरुवनंतपुरम सीट भी मात्र 16,077 वोट से हारी है। केरल में भी भाजपा के बढ़ते आधार के चलते उसे आगे फायदा होने की उम्मीद है।

तेलंगाना: वोट, सीट सब दोगुने

दक्षिण भारत के एक और महत्वपूर्ण राज्य तेलंगाना में भाजपा का प्रदर्शन अभूतपूर्व रहा है। राज्य भाजपा 17 में से 8 सीट जीतने में सफल रही है। राज्य में सत्ताधारी कॉन्ग्रेस भी 8 ही सीट जीत सकी है। 2019 में यहाँ भाजपा ने 4 सीट जीती थी। ऐसे में भाजपा का आँकड़ा यहाँ दोगुना हो गया है। तेलंगाना में भाजपा अपना वोट प्रतिशत भी बढाने में सफल रही है। उसे 2019 में राज्य में 19.65% वोट मिला था जो कि 2024 में बढ़ कर 35.08% हो गया है।
तेलंगाना में भाजपा ने क्षेत्रीय पार्टी भारत राष्ट्र समिति का भी सफाया कर दिया है। वह हारी हुई 7 सीटों में दूसरे स्थान पर रही है, यानी मुकाबला भाजपा और कॉन्ग्रेस के बीच हुआ है। भारत राष्ट्र समिति यहाँ एक भी सीट जीतने में सफल नहीं हुई है। राज्य में भाजपा अब दूसरे नम्बर की पार्टी बन रही है।

आंध्र प्रदेश: धमाकेदार जीत, 10 गुना वोट बढ़े

आंध्र प्रदेश में 2024 लोकसभा चुनावों में NDA गठबंधन की जोरदार जीत हुई है। उसकी सहयोगी TDP ने राज्य में सरकार बनाई है। BJP ने खुद भी राज्य में 3 सीट जीत ली हैं। भाजपा 2019 में यहाँ से एक भी सीट जीतने में विफल रही थी। भाजपा को आंध्र प्रदेश में 11.28% वोट मिले हैं। उसे 2019 में 1% वोट भी नहीं मिले रहे। उसके वोट प्रतिशत में 2019 के मुकाबले 10 गुने से अधिक उछाल देखी गई है। आंध्र प्रदेश में भाजपा TDP के साथ मिलकर राज्य में सरकार में भी आ गई है।
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कर्नाटक: गढ़ बरकरार, वोट बरकरार

कर्नाटक में 2024 के चुनाव भाजपा के लिए नुकसान वाले रहे है। भाजपा को इन चुनावों में सीटों का नुकसान सहना पड़ा है। कर्नाटक में भाजपा और JDS ने 28 में से 19 सीट जीती हैं। उसकी 2019 चुनाव में 26 सीट थीं। उसका वोट प्रतिशत हालाँकि बचा हुआ है। उसने 46.06% वोट हासिल किए हैं, उसके सहयोगी JDS ने 5.6% वोट हासिल किए हैं। NDA गठबंधन राज्य में 51.6% हासिल करने में सफल रहा है, 2019 में भी भाजपा ने राज्य में 51.7% वोट ही हासिल किए थे। कर्नाटक में भाजपा का गढ़ माने जाने वाले बेंगलुरु में सभी सीट जीत ली हैं।