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भारत में वामपंथ के पूरे हुए 100 साल, स्वतंत्रता संग्राम का विरोध, चीन का समर्थन और सैंकड़ों सुरक्षाकर्मियों की हत्या: कम्युनिस्टों की ‘विदेशी विचारधारा’ ने देश को हिंसा की आग में जलाया


भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के 100 साल पूरे होने पर इसके नेता और समर्थक जश्न और पुरानी यादों के साथ इस मौके को मना रहे हैं। हालाँकि, सौ साल का सफर सिर्फ यादें ताजा करने के लिए नहीं होता, बल्कि यह समय आत्म-मंथन और गंभीर मूल्यांकन का भी है। राजनीतिक आंदोलन केवल अपनी उम्र से प्रासंगिक नहीं बनते, बल्कि वे अपने परिणामों (कामयाबियों) से अपनी अहमियत साबित करते हैं।

पिछली एक सदी में, भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन ने खुद को गरीबों, मजदूरों और किसानों की आवाज के रूप में पेश किया है। इसने हमेशा यह दावा किया कि वह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक लंबी अवधि का समाधान है और नैतिक रूप से अन्य राजनीतिक परंपराओं से बेहतर है। हालाँकि, अपनी इस छवि के बावजूद, आज कम्युनिस्ट आंदोलन चुनावी रूप से सिमट गया है, विचारधारा के मामले में काफी सख्त (जड़) हो गया है और भारत की सामाजिक व आर्थिक सच्चाइयों से पूरी तरह कटता जा रहा है।

इससे एक ऐसा अनिवार्य सवाल खड़ा होता है जिसे महज नारों या अतीत की पुरानी यादों के सहारे टाला नहीं जा सकता:

क्या भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन ने वाकई भारत की सेवा की, या फिर इसने देश के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुँचाया?

यह लेख इस सवाल का जवाब किसी खोखली बयानबाजी या वैचारिक भेदभाव के आधार पर नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रिकॉर्ड, राजनीतिक व्यवहार और ठोस परिणामों के जरिए देने की कोशिश करता है। क्योंकि 100 साल बीत जाने के बाद, कोई भी विचारधारा न तो बिना सोचे-समझे सम्मान की हकदार है और न ही बिना सोचे-समझे तिरस्कार की, बल्कि वह एक ईमानदार ऑडिट (सच्चे मूल्यांकन) की हकदार है।

साम्यवाद का क्षेत्र: भारतीय नहीं, स्वदेशी कभी नहीं

कम्युनिज्म (Communism) का उदय भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक या आर्थिक हकीकत से नहीं हुआ था। यह एक यूरोपीय वैचारिक उत्पाद था, जो 19वीं सदी के यूरोप की खास परिस्थितियों में पैदा हुआ था। वे परिस्थितियाँ थीं- तेजी से होता औद्योगिकीकरण, फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूर और पूंजीपतियों व औद्योगिक श्रमिकों के बीच गहरी वर्गीय खाई।

इस सिद्धांत को कार्ल मार्क्स ने विकसित किया था, जिन्होंने यूरोपीय पूंजीवाद का विश्लेषण किया, और बाद में इसे व्लादिमीर लेनिन ने अपनाया, जिन्होंने सत्ता हथियाने के लिए एक कड़े नियंत्रण वाले और ‘हरावल दस्ते’ (vanguard) के नेतृत्व वाली क्रांति की वकालत की थी।

इन दोनों विचारकों (मार्क्स और लेनिन) ने ऐसे समाजों में काम किया जो एक जैसे थे और जहाँ उद्योग मुख्य थे। वहाँ इंसान की असली पहचान उसकी आर्थिक स्थिति या ‘क्लास’ से होती थी। उनके काम करने का तरीका इन तीन बातों पर टिका था।

शोषक और शोषित की साफ पहचान: यानी समाज में एक पक्ष हमेशा जुल्म करने वाला और दूसरा जुल्म सहने वाला होता है।

न्याय के लिए हिंसा का रास्ता: यानी इंसाफ पाने के लिए पुरानी व्यवस्था को हिंसक तरीके से तोड़ना जरूरी है।

कड़ा सरकारी नियंत्रण: यानी गैर-बराबरी को खत्म करने के लिए सारी ताकत एक जगह (सरकार के हाथ में) रखना ही समाधान है।

लेकिन भारत की बनावट कभी ऐसी नहीं रही। भारतीय समाज हजारों साल पुरानी एक सभ्यता है, जो विविधताओं (अलग-अलग तरह के लोगों) से भरी हुई है। यहाँ समाज सिर्फ अमीर-गरीब (आर्थिक क्लास) से नहीं, बल्कि समुदायों, क्षेत्रों, धर्मों, भाषाओं और परंपराओं से बना है। इतिहास गवाह है कि भारत में सामाजिक बदलाव हमेशा सुधार आंदोलनों और आपसी तालमेल से आए हैं, न कि पुरानी व्यवस्था को पूरी तरह तबाह करके।

भारत की इसी खूबी और कम्युनिस्ट विचारधारा के बीच मेल न होना ही वह कारण है, जिसकी वजह से कम्युनिज्म को यहाँ गहराई से नहीं अपनाया गया। एक ऐसी विचारधारा जो केवल ‘दो पक्षों’ (शोषक और शोषित) की लड़ाई पर टिकी हो, वह उस सभ्यता में नहीं टिक सकती जो विविधता और सबको साथ लेकर चलने में विश्वास रखती है। भारतीय समाज लचीला और सबको साथ जोड़ने वाला है, जबकि कम्युनिज्म सख्त और बँटा हुआ है। यही विरोध भारत में कम्युनिज्म की असफलता की सबसे बड़ी वजह है।

देश से ऊपर विचारधारा: भारत छोड़ो आंदोलन और चीन युद्ध

नतीजे देने में फेल होने के साथ-साथ, भारतीय कम्युनिस्टों पर यह आरोप भी लगता है कि उन्होंने हमेशा देश के हित से ऊपर अपनी विचारधारा को रखा। इस विरोधाभास के दो बड़े उदाहरण गौर करने लायक हैं।

भारत छोड़ो आंदोलन (1942): जब CPI देश के साथ खड़ी नहीं हुई

अगस्त 1942 में, भारत ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा जन-आंदोलन देखा, जिसे ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ कहा गया। महात्मा गाँधी के नेतृत्व में शुरू हुए इस आंदोलन में देश के हर कोने और हर समुदाय के लोग शामिल हुए थे। लेकिन ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी’ (CPI) ने इस आंदोलन का विरोध करने का फैसला किया।

CPI ने इस आंदोलन का साथ क्यों नहीं दिया? इसकी वजह जानकर आपको हैरानी हो सकती है। यह फैसला भारत के लिए नहीं, बल्कि उनकी विचारधारा से जुड़ा था। उस समय दूसरे विश्व युद्ध के दौरान सोवियत संघ (रूस) पर जर्मनी ने हमला कर दिया था, जिसके बाद रूस ने ब्रिटेन के साथ हाथ मिला लिया। चूंकि ब्रिटेन अब रूस का साथी बन चुका था, इसलिए CPI ने इस युद्ध को फासीवाद के खिलाफ ‘जनता का युद्ध‘ (People’s War) घोषित कर दिया।

उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे अंग्रेजों के खिलाफ कोई रुकावट पैदा न करें और हड़ताल या विरोध प्रदर्शनों को रोकें। यहाँ तक कि कई मामलों में कम्युनिस्ट नेताओं ने ब्रिटिश सरकार का सहयोग भी किया। जब लाखों भारतीय अंग्रेजों की गोलियाँ खा रहे थे और जेल जा रहे थे, तब CPI हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। ऐसा इसलिए नहीं था कि भारत आजादी के लिए तैयार नहीं था, बल्कि इसलिए था क्योंकि उनकी प्राथमिकता भारत नहीं, बल्कि ‘मॉस्को’ (रूस) के हित थे।

1962 का चीन युद्ध: चुप्पी, उलझन और चीन के प्रति लगाव

ठीक 20 साल बाद 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान फिर से वही पुरानी बात दोहराई गई। जब चीनी सेना ने लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सीमाओं को पार किया, तब पूरे देश को राजनीतिक एकता और स्पष्टता की उम्मीद थी। लेकिन इसके बजाय, कम्युनिस्ट आंदोलन के एक बड़े हिस्से ने चीन के प्रति हमदर्दी दिखाई और इस मामले पर गोल-मोल बात की। इसी विवाद की वजह से आगे चलकर CPI के दो टुकड़े हो गए और चीन का समर्थन करने वाले गुट ने अलग होकर ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी)’ यानी CPM बना ली।

देशहित से अलग हटकर सोचना तो कम्युनिज्म की असफलता का सिर्फ एक हिस्सा था। इससे भी ज्यादा नुकसानदेह वह तरीका था, जिसमें कम्युनिस्ट आंदोलन के कुछ हिस्सों ने लोकतांत्रिक राजनीति का रास्ता ही छोड़ दिया और हथियारों के दम पर बगावत शुरू कर दी। 1960 के दशक के आखिर से, भारत में कम्युनिस्ट विचारधारा ने न केवल सरकार का विरोध किया, बल्कि उसके खिलाफ युद्ध छेड़ दिया।

इसके बाद जो कुछ हुआ, वह मजदूरों के अधिकारों की लड़ाई नहीं थी, बल्कि हिंसा का एक लंबा दौर था। इसमें हत्याएँ की गईं, नरसंहार हुए, सरकारी संपत्तियों को तबाह किया गया और आम जनता को डराया-धमकाया गया। इस हिंसा के शिकार कोई विदेशी शासक या बड़े पूंजीपति नहीं थे, बल्कि भारत के आम लोग थे। जनजातीय (आदिवासी), किसान, जनप्रतिनिधि, पुलिसकर्मी और दिहाड़ी मजदूर। भारतीय कम्युनिज्म की असली मानवीय कीमत को समझने के लिए नारों या किताबों को नहीं, बल्कि कम्युनिस्ट उग्रवाद द्वारा छोड़े गए खून के निशानों को देखना होगा।

भारत में कम्युनिस्ट उग्रवादियों द्वारा किए गए 10 सबसे बड़े नरसंहार

दंतेवाड़ा नरसंहार (2010), छत्तीसगढ़– 6 अप्रैल 2010 को, ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (नक्सली)’ के लड़ाकों ने छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में बहुत ही सोची-समझी साजिश के तहत हमला किया। इस हमले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के 76 जवान शहीद हो गए थे। उग्रवादियों ने पहले बारूदी सुरंगों (landmines) का इस्तेमाल किया और फिर ऑपरेशन से लौट रहे जवानों पर अँधाधुँध गोलियाँ बरसा दीं। आजादी के बाद भारतीय सुरक्षा बलों पर हुआ यह अब तक का सबसे बड़ा और भयानक हमला माना जाता है। इस घटना के बाद देश में ‘नक्सलवाद’ के खिलाफ लड़ने के तरीके में बड़ा बदलाव आया।

झीरम घाटी नरसंहार (2013), छत्तीसगढ़- 25 मई 2013 को, नक्सली उग्रवादियों ने बस्तर के झीरम घाटी इलाके में कॉन्ग्रेस पार्टी के काफिले पर हमला किया था। इस हमले में वरिष्ठ राजनेताओं समेत 27 लोगों की जान चली गई। नक्सलियों ने यह हमला उस समय किया जब नेता जनता के बीच जा रहे थे। इस घटना ने यह साफ कर दिया कि माओवादी चुनाव लड़ने या लोकतंत्र में भरोसा रखने के बजाय, जनता द्वारा चुने गए नेताओं को खत्म करने की रणनीति पर काम करते हैं। इस हमले की पूरी देश में निंदा हुई और इसे भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सीधा हमला माना गया।

नयागढ़ शस्त्रागार हमला (2008), ओडिशा- फरवरी 2008 में, नक्सली लड़ाकों ने ओडिशा के नयागढ़ में पुलिस के शस्त्रागार (जहाँ हथियार रखे जाते हैं) पर एक साथ मिलकर रात में हमला बोला। इस हमले में 15 पुलिसकर्मी मारे गए, भारी मात्रा में हथियार लूट लिए गए और सरकारी इमारतों को तबाह कर दिया गया। इस घटना ने दिखाया कि उग्रवादी कितने खतरनाक और बड़े हमले करने की ताकत रखते हैं। इस लूट के बाद उस इलाके में नक्सलियों के पास हथियारों की ताकत काफी बढ़ गई।

सुकमा हमला (2017), छत्तीसगढ़- 24 अप्रैल 2017 को, सुकमा जिले के चिंतालनार इलाके में नक्सलियों ने CRPF की एक टीम पर अचानक हमला कर दिया, जिसमें 25 जवान शहीद हो गए। उग्रवादियों ने इस हमले में देशी बमों (IED) और बहुत करीब से गोलीबारी का इस्तेमाल किया। उन्होंने वहाँ के मुश्किल रास्तों और खुफिया जानकारी के लीक होने का फायदा उठाया। इस घटना ने यह दिखाया कि सालों से चल रहे अभियानों के बावजूद, नक्सली उग्रवाद की ताकत अभी भी खत्म नहीं हुई है।

अरनपुर IED हमला (2023), छत्तीसगढ़- अप्रैल 2023 में, नक्सली उग्रवादियों ने दंतेवाड़ा के अरनपुर इलाके में एक प्रेशर IED (बारूदी सुरंग) में धमाका किया। इस हमले में ‘डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड’ (DRG) के 10 जवान और एक नागरिक ड्राइवर की जान चली गई। उग्रवादियों ने एक ऐसे वाहन को निशाना बनाया जो उग्रवाद विरोधी अभियान से लौट रहा था। यह घटना एक बार फिर नक्सलियों की उस रणनीति को दिखाती है, जिसमें वे सार्वजनिक सड़कों पर बिना सोचे-समझे बमों का इस्तेमाल करते हैं।

सेनारी गाँव नरसंहार (1999), बिहार- मार्च 1999 में, ‘माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर’ (MCC) ने बिहार के सेनारी गाँव में 34 आम लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी थी। मरने वाले ज्यादातर लोग आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के थे। उग्रवादियों ने इन लोगों को कतार में खड़ा करके गोलियों से भून दिया था और इसे ‘अमीर-गरीब की लड़ाई’ (क्लास स्ट्रगल) बताकर सही ठहराया। इस घटना ने नक्सलियों के नारों और उनकी असलियत के बीच के अंतर को साफ कर दिया।

बारा नरसंहार (1992), बिहार- फरवरी 1992 में, नक्सली उग्रवादियों ने गया जिले के बारा गाँव पर हमला किया और 37 ग्रामीणों की जान ले ली। निहत्थे ग्रामीणों के खिलाफ वामपंथी चरमपंथी हिंसा की यह शुरुआती बड़ी घटनाओं में से एक थी। इसी घटना के बाद बिहार में हिंसा और बदले का एक लंबा दौर शुरू हुआ जिसने राज्य को अस्थिर कर दिया।

लातेहार पुलिस वैन ब्लास्ट (2016), झारखंड- जुलाई 2016 में, नक्सलियों ने झारखंड के लातेहार जिले में एक लैंडमाइन धमाका किया, जिसमें गश्ती वाहन में सवार आठ पुलिस अधिकारी शहीद हो गए। यह हमला ग्रामीण इलाकों में पुलिस और सरकारी व्यवस्था को कमजोर करने की उनकी सोची-समझी कोशिश का हिस्सा था।

सुकमा रोड-ओपनिंग पार्टी हमला (2018), छत्तीसगढ़- मार्च 2018 में, सुकमा जिले में नक्सलियों ने CRPF की उस टीम पर हमला किया जो सड़क निर्माण की सुरक्षा में लगी थी। इस हमले में नौ जवान शहीद हुए। उग्रवादियों ने विकास के कामों को रोकने के लिए जानबूझकर सुरक्षा बलों को निशाना बनाया, क्योंकि वे जनजातीय क्षेत्रों में सड़कों और बुनियादी ढाँचे के विस्तार के खिलाफ हैं।
गिरिडीह लैंडमाइन ब्लास्ट (2007), झारखंड- अक्टूबर 2007 में, नक्सलियों ने गिरिडीह जिले में एक आम नागरिक वाहन के नीचे लैंडमाइन धमाका किया, जिसमें 14 लोग मारे गए। इस घटना ने दिखाया कि नक्सली हिंसा कितनी अंधी है, जहाँ सरकार को निशाना बनाने के चक्कर में अक्सर आम नागरिक अपनी जान गँवा देते हैं।

सौ साल, कोई सुधार नहीं

100 साल पूरे होने के बाद, भारतीय कम्युनिज्म का मूल्यांकन सिर्फ उनके इरादों, सिद्धांतों या भाषणों से नहीं किया जा सकता। इसका फैसला उनके रिकॉर्ड से होना चाहिए। वह रिकॉर्ड बताता है कि यह एक ऐसी विचारधारा है जो भारत के बाहर से आई, जिसने भारतीय समाज को कभी नहीं समझा, देश के हितों से ऊपर विदेशी ताकतों को रखा और देश से ऊपर हमेशा अपनी विचारधारा को चुना। जब चुनावों में उनकी ताकत कम हुई, तो इस आंदोलन के कुछ हिस्सों ने लोकतंत्र का रास्ता छोड़ दिया और हिंसा अपना ली। पीछे रह गए हजारों मृत नागरिक, शहीद जवान और तबाह हुए परिवार।
यह कहानी किसी ऐसी विचारधारा की नहीं है जो परिस्थितियों की वजह से हार गई। यह उस विचारधारा की कहानी है जो इसलिए फेल हो गई क्योंकि वह भारत की हकीकत, यहाँ की विविधता और लोकतांत्रिक सोच के साथ तालमेल नहीं बिठा सकी। इसलिए, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के 100 साल पूरे होना जश्न का नहीं, बल्कि हिसाब-किताब का मौका है। इन 100 सालों में कम्युनिज्म ने न तो गरीबों को आजाद किया, न लोकतंत्र को मजबूत किया और न ही देश की रक्षा की। इसने सिर्फ एक बात साबित की है, एक बाहर से आई विचारधारा जो खुद को देश से ऊपर रखती है, वह आखिर में देश और खुद- दोनों को नुकसान ही पहुँचाती है।

जॉर्ज सोरोस से लिंक पर घिरीं सोनिया गाँधी, जिस फाउंडेशन की को-चेयरपर्सन वह ‘आजाद कश्मीर’ की पैरोकार: BJP ने पूछा- भारत विरोधियों से कांग्रेस का कैसा रिश्ता? अब तक डरपोक खोजी पत्रकार क्यों चुप रहे?

जॉर्ज सोरोस, सोनिया गाँधी (फोटो साभार: TV9/Punjab Kesari)
कहते हैं 'जब जागो तब सवेरा', 2013 में बीजेपी नेता तेजेन्द्र सिंह बग्गा ने सोनिया गाँधी का कश्मीर विरोधी संस्था की co-president होने का खुलासा करने पर समस्त तथाकथित खोजी पत्रकार कहाँ थे? सोनिया ही नहीं अनेक भारतीय पत्रकार भी इस भारत विरोधी संस्था के सदस्य हैं। उन दिनों एक हिंदी पाक्षिक को सम्पादित करते इस खुलासे को विस्तार से प्रकाशित किया था। (देखिए नीचे पृष्ठ) अगर बीजेपी ने 2013 में ही बग्गा को गंभीरता से लिया होता, आज कांग्रेस की क्षेत्रीय दलों से बदतर हालत होती। 

    

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गाँधी पर विदेशी ताकतों से जुड़ाव का गंभीर आरोप लगाया है। बीजेपी ने कहा है कि सोनिया गाँधी का संबंध ‘फोरम ऑफ डेमोक्रेटिक लीडर्स इन एशिया पैसिफिक’ (FDL-AP) से है, जिसे जॉर्ज सोरोस फाउंडेशन द्वारा वित्तीय मदद मिलती है। बीजेपी का दावा है कि यह संगठन कश्मीर को भारत से अलग करने की वकालत करता रहा है। इस मुद्दे को लेकर संसद में जबर्दस्त हंगामा हुआ और कई बार सदन की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी।

सोनिया-सोरोस मुद्दे पर संसद में हंगामा

सोमवार(9 दिसंबर 2024) को संसद के दोनों सदनों में इस मुद्दे पर गर्मागर्म बहस देखने को मिली। जैसे ही लोकसभा की कार्यवाही शुरू हुई, विपक्षी दलों ने इसे बेबुनियाद आरोप बताते हुए जोरदार हंगामा किया। स्पीकर ओम बिरला ने विपक्ष को शांत करने की कोशिश की लेकिन बात नहीं बनी। आखिरकार, लोकसभा की कार्यवाही को दोपहर 12 बजे तक स्थगित कर दिया गया। इसी तरह, राज्यसभा में भी भारी हंगामा हुआ और कार्यवाही पहले 12 बजे और फिर 2 बजे तक के लिए स्थगित करनी पड़ी।

बीजेपी ने सोनिया गाँधी पर लगाए गंभीर आरोप

बीजेपी ने दावा किया है कि सोनिया गाँधी, एफडीएल-एपी की सह-अध्यक्ष होने के नाते, उस संगठन से जुड़ी रही हैं जो कश्मीर को स्वतंत्र राष्ट्र मानने का समर्थन करता है। बीजेपी ने सोशल मीडिया पर लिखा, “सोनिया गाँधी और जॉर्ज सोरोस के बीच का यह संबंध भारत के आंतरिक मामलों में विदेशी ताकतों के हस्तक्षेप को दर्शाता है।” बीजेपी ने यह भी आरोप लगाया कि राजीव गाँधी फाउंडेशन और सोरोस फाउंडेशन के बीच साझेदारी हुई थी, जो इस विदेशी प्रभाव को और पुष्ट करती है।

बीजेपी ने सोनिया गाँधी पर लगाए गंभीर आरोप

बीजेपी ने दावा किया है कि सोनिया गाँधी, एफडीएल-एपी की सह-अध्यक्ष होने के नाते, उस संगठन से जुड़ी रही हैं जो कश्मीर को स्वतंत्र राष्ट्र मानने का समर्थन करता है। पार्टी प्रवक्ता ने सोशल मीडिया पर लिखा, “सोनिया गाँधी और जॉर्ज सोरोस के बीच का यह संबंध भारत के आंतरिक मामलों में विदेशी ताकतों के हस्तक्षेप को दर्शाता है।” बीजेपी ने यह भी आरोप लगाया कि राजीव गाँधी फाउंडेशन और सोरोस फाउंडेशन के बीच साझेदारी हुई थी, जो इस विदेशी प्रभाव को और पुष्ट करती है।
बीजेपी ने यह भी आरोप लगाया कि राहुल गाँधी ने अडानी समूह के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ओसीसीआरपी (ऑर्गनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट) की रिपोर्ट का हवाला दिया था। ओसीसीआरपी को भी सोरोस फाउंडेशन से फंडिंग मिलती है। बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने कहा, “राहुल गाँधी और ओसीसीआरपी के बीच यह संबंध दिखाता है कि विपक्ष किस तरह से भारत की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचाने की कोशिश कर रहा है।”
निशिकांत दुबे ने संसद में अपनी आवाज दबाने का आरोप लगाया और एक्स पर लिखा, “आज लोकसभा में मुझे बोलने का अवसर शून्य काल में था, लेकिन विपक्ष ख़ासकर कांग्रेस पार्टी ने सोरोस के सम्बन्ध में पोल खुलने के डर से मेरी आवाज़ को दबाया। संसद में नियम के अनुसार यदि आवाज़ उठाने पर हल्ला कर दबाया जाए तो लोकतंत्र ख़तरे में है। संविधान कैसे बचेगा?”

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने सभी दलों से की एकजुटता की अपील

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इस मामले को ‘भारत की संप्रभुता पर हमला बताया। उन्होंने कहा, “अगर कोई भारत-विरोधी ताकतों के साथ काम करता है, तो सभी राजनीतिक दलों को एकजुट होकर उसका विरोध करना चाहिए। यह सिर्फ कांग्रेस का मुद्दा नहीं है, यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा सवाल है।” रिजिजू ने कांग्रेस नेताओं से अपील की कि अगर उनकी पार्टी का कोई सदस्य देशविरोधी तत्वों से जुड़ा है, तो उसे सामने लाएँ।
वहीं, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इन आरोपों को ‘राजनीतिक साजिश’ करार दिया। कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा, “जब सरकार को कुछ छिपाना होता है, तो वह ऐसे मुद्दे उछालती है। अगर उनके पास कोई ठोस सबूत है, तो जाँच कराएँ।” वहीं, राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के सांसद मनोज झा ने कहा, “सरकार को पहले अपने घर की सफाई करनी चाहिए। विपक्ष को डराने-धमकाने की यह कोशिश अब नहीं चलेगी।”

ओसीसीआरपी और सोरोस फाउंडेशन पर क्या हैं आरोप?

ओसीसीआरपी एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया संगठन है, जो अपराध और भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों पर रिपोर्टिंग करता है। बीजेपी ने आरोप लगाया है कि यह संगठन भारत की छवि खराब करने और मोदी सरकार को अस्थिर करने के लिए विपक्ष के साथ मिलकर काम कर रहा है। हालाँकि, अमेरिका ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि ओसीसीआरपी जैसे संगठन स्वतंत्र रूप से काम करते हैं और उनकी संपादकीय नीति पर किसी का नियंत्रण नहीं होता।
बीजेपी के आरोपों पर अमेरिकी दूतावास ने बयान जारी कर कहा, “यह निराशाजनक है कि भारत की सत्ताधारी पार्टी इस तरह के आरोप लगा रही है। अमेरिकी सरकार पत्रकारों को पेशेवर प्रशिक्षण और विकास के लिए मदद करती है, लेकिन इसका संपादकीय स्वतंत्रता से कोई लेना-देना नहीं है।” बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने इस बयान को आधार बनाते हुए कहा, “अमेरिका ने खुद स्वीकार किया है कि ओसीसीआरपी और सोरोस फाउंडेशन को उनके फंड मिलते हैं। यह साफ दिखाता है कि विपक्ष और विदेशी ताकतें भारत के खिलाफ साजिश रच रही हैं।”

संसद में सोरोस चैप्टर कैसे शुरू हुआ

संसद में सोरोस का मुद्दा सबसे पहले बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने 6 दिसंबर को उठाया था। उन्होंने राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा के दौरान सोरोस के करीबियों के साथ मुलाकात का जिक्र किया और इसे ‘भारत-विरोधी ताकतों’ से जोड़ा। उन्होंने संसद में कहा, “कांग्रेस का हाथ जार्ज सोरोस के साथ, राहुल गाँधी जी की भारत जोड़ो यात्रा का खर्च सोरोस ने दिया या नहीं, सोरोस ने 1000 भारतीय बच्चों को विदेश में पढ़ाई का खर्च दिया, उसमें कितने कांग्रेस नेताओं के बच्चे हैं? मेरा कांग्रेस पार्टी से प्रश्न पूछने का सिलसिला जारी रहेगा।” इसके बाद, यह मुद्दा संसद में हंगामे का कारण बन गया।
बीजेपी ने यह भी कहा है कि जॉर्ज सोरोस की फंडिंग से चलने वाले खोजी पत्रकारों ने ही अडानी पर हमले को लेकर राहुल गाँधी के भाषणों का प्रसारण किया। राहुल गाँधी भी इसे अपने सोर्स के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं। वह चाहते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था बर्बाद हो जाए। बीजेपी ने यह भी कहा कि कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर भी जॉर्ज सोरोस को अपना दोस्त बता चुके हैं।
बहरहाल, सोरोस और सोनिया गाँधी के बीच कथित संबंधों को लेकर संसद में उठा यह मुद्दा राजनीतिक संघर्ष का नया अध्याय बन गया है। जहाँ बीजेपी इसे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का सवाल बता रही है, वहीं विपक्ष इसे ‘ध्यान भटकाने की चाल’ करार दे रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह विवाद संसद के बाहर जनता के बीच कितना असर डालता है।

‘जो पागलपन हम आज देख रहे हैं, उसकी भविष्यवाणी हिंदू धर्म ने हजारों साल पहले की थी’: पॉडकास्टर रोगन ने कहा- हम संघर्षों के युग कलियुग में हैं

मशहूर पॉडकास्टर जो रोगन (साभार: एनपीआर)
विश्व के सबसे लोकप्रिय पॉडकास्टरों में से एक जो रोगन ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक पोस्ट किया है, जिसके जरिए उन्होंने ‘कलियुग’ और हिंदू धर्म को लेकर बात की है। इसमें उन्होंने राजनीतिक अस्थिरता और महामारी संकट के वर्तमान दौर का वर्णन किया है। इसके साथ ही उन्होंने ये भी कहा है कि वर्तमान में हम जो ‘पागलपन’ देख रहे हैं, वह कभी न खत्म होने वाली प्रक्रिया है।

जो रोगन 1555 में फ्रेंच ज्योतिष नॉस्त्रेदमस की भविष्वाणियों का स्मरण करवा रहे हैं, कि हिन्द(हिन्दुस्तान) को असली आज़ादी 2014 में एक अधेड़ उम्र के नेतृत्व में नयी पार्टी के सत्ता में आने पर मिलेगी। वह देश को नयी उंचाईओं पर लेकर जाएगा, उसके प्रशंसकों के साथ-साथ विरोधी भी बहुत होंगे। विश्व में हिन्दुत्व पताका फहराएगा। जो आज भारत ही नहीं विश्व भी देख रहा है। आखिर में जीत इस अधेड़ उम्र के नेता की पार्टी की ही होगी। दूसरे अर्थों में विरोधी केवल अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।    

जो रोगन ने एक मशहूर मीम शेयर किया है, जिसमें बताया गया है कि शक्तिशाली लोग अच्छा समय लाते हैं और अच्छा समय लोगों को शक्तिहीन बनाता है। फिर कमजोर इंसान कठिन समय लाता है और फिर कठिन वक्त मजबूत लोगों को लाता है। उनका यह मीम पॉलिटिकल कम्पास के प्रारूप को दर्शाने वाला है।

इस मीम को शेयर करते हुए रोगन ने इंस्टाग्राम पर कहा, “हम कलियुग में हैं। संघर्ष का युग। जिस तरह की अराजकता हम आज देख रहे हैं, हिंदू धर्म में हजारों साल पहले ही उसकी घोषणा कर दी गई थी। सभ्यताएँ पहले से अनुमानित चक्रों में चलती हैं, और हम चार्ट के नीचे बाईं तरफ हैं।”

                                            जो रोगन की इंस्टाग्राम पोस्ट का स्क्रीनशॉट

रोगन ने कहा, “अपने आसपास की दुनिया में चारों तरफ फैले पागलपन से अपने आपको ऊपर उठाने की पूरी कोशिश करें, लेकिन यह समझें कि यह पागलपन एक अनंत प्रक्रिया का हिस्सा है।”

संयुक्त राज्य में राजनीतिक ध्रुवीकरण विनाशकारी स्थिति में पहुँच गया है और पॉडकास्ट होस्ट ने खुद को अनिच्छा से ही सही इसमें सदा उलझा हुआ ही पाया है। गौरतलब है कि जो रोगन Spotify पर एक पॉडकास्ट को होस्ट करते हैं, जो कि अपने प्रत्येक एपिसोड में लाखों लोगों के द्वारा सुना जाता है। पिछले साल अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान रोगन ने राष्ट्रपति के पद के लिए बर्नी सैंडर्स का समर्थन किया था। उन्हें वामपंथियों द्वारा ‘फार राइट ट्रांसफोब’ कहा गया था।

हाल ही में जो रोगन ने खुलासा किया था कि उन्होंने ‘आईवरमेक्टिन’ लिया था, जिसके बाद वहाँ की मेनस्ट्रीम मीडिया ने उन पर ‘हॉर्स डीवर्मर’ दवा का सेवन करने का झूठा आरोप लगाया था। काइल रिटनहाउस मुकदमे के दौरान रोगन ने मेनस्ट्रीम मीडिया पर झूठ फैलाने का आरोप लगाया था। एलेक्स जोन्स का दोस्त होने के कारण भी वामपंथियों ने उनकी कड़ी आलोचना की थी।