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‘जो पागलपन हम आज देख रहे हैं, उसकी भविष्यवाणी हिंदू धर्म ने हजारों साल पहले की थी’: पॉडकास्टर रोगन ने कहा- हम संघर्षों के युग कलियुग में हैं

मशहूर पॉडकास्टर जो रोगन (साभार: एनपीआर)
विश्व के सबसे लोकप्रिय पॉडकास्टरों में से एक जो रोगन ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक पोस्ट किया है, जिसके जरिए उन्होंने ‘कलियुग’ और हिंदू धर्म को लेकर बात की है। इसमें उन्होंने राजनीतिक अस्थिरता और महामारी संकट के वर्तमान दौर का वर्णन किया है। इसके साथ ही उन्होंने ये भी कहा है कि वर्तमान में हम जो ‘पागलपन’ देख रहे हैं, वह कभी न खत्म होने वाली प्रक्रिया है।

जो रोगन 1555 में फ्रेंच ज्योतिष नॉस्त्रेदमस की भविष्वाणियों का स्मरण करवा रहे हैं, कि हिन्द(हिन्दुस्तान) को असली आज़ादी 2014 में एक अधेड़ उम्र के नेतृत्व में नयी पार्टी के सत्ता में आने पर मिलेगी। वह देश को नयी उंचाईओं पर लेकर जाएगा, उसके प्रशंसकों के साथ-साथ विरोधी भी बहुत होंगे। विश्व में हिन्दुत्व पताका फहराएगा। जो आज भारत ही नहीं विश्व भी देख रहा है। आखिर में जीत इस अधेड़ उम्र के नेता की पार्टी की ही होगी। दूसरे अर्थों में विरोधी केवल अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।    

जो रोगन ने एक मशहूर मीम शेयर किया है, जिसमें बताया गया है कि शक्तिशाली लोग अच्छा समय लाते हैं और अच्छा समय लोगों को शक्तिहीन बनाता है। फिर कमजोर इंसान कठिन समय लाता है और फिर कठिन वक्त मजबूत लोगों को लाता है। उनका यह मीम पॉलिटिकल कम्पास के प्रारूप को दर्शाने वाला है।

इस मीम को शेयर करते हुए रोगन ने इंस्टाग्राम पर कहा, “हम कलियुग में हैं। संघर्ष का युग। जिस तरह की अराजकता हम आज देख रहे हैं, हिंदू धर्म में हजारों साल पहले ही उसकी घोषणा कर दी गई थी। सभ्यताएँ पहले से अनुमानित चक्रों में चलती हैं, और हम चार्ट के नीचे बाईं तरफ हैं।”

                                            जो रोगन की इंस्टाग्राम पोस्ट का स्क्रीनशॉट

रोगन ने कहा, “अपने आसपास की दुनिया में चारों तरफ फैले पागलपन से अपने आपको ऊपर उठाने की पूरी कोशिश करें, लेकिन यह समझें कि यह पागलपन एक अनंत प्रक्रिया का हिस्सा है।”

संयुक्त राज्य में राजनीतिक ध्रुवीकरण विनाशकारी स्थिति में पहुँच गया है और पॉडकास्ट होस्ट ने खुद को अनिच्छा से ही सही इसमें सदा उलझा हुआ ही पाया है। गौरतलब है कि जो रोगन Spotify पर एक पॉडकास्ट को होस्ट करते हैं, जो कि अपने प्रत्येक एपिसोड में लाखों लोगों के द्वारा सुना जाता है। पिछले साल अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान रोगन ने राष्ट्रपति के पद के लिए बर्नी सैंडर्स का समर्थन किया था। उन्हें वामपंथियों द्वारा ‘फार राइट ट्रांसफोब’ कहा गया था।

हाल ही में जो रोगन ने खुलासा किया था कि उन्होंने ‘आईवरमेक्टिन’ लिया था, जिसके बाद वहाँ की मेनस्ट्रीम मीडिया ने उन पर ‘हॉर्स डीवर्मर’ दवा का सेवन करने का झूठा आरोप लगाया था। काइल रिटनहाउस मुकदमे के दौरान रोगन ने मेनस्ट्रीम मीडिया पर झूठ फैलाने का आरोप लगाया था। एलेक्स जोन्स का दोस्त होने के कारण भी वामपंथियों ने उनकी कड़ी आलोचना की थी। 

‘हिंदू और हिंदुत्व दो अलग चीजें… हिंदुत्व में सिख और मुस्लिम को पीटा जाता है’ : खुर्शीद और अल्वी के बाद अब राहुल गाँधी ने उगला जहर

सलमान खुर्शीद, राहुल गाँधी, राशिद अल्वी
हिन्दुत्व को आरोपित करने वाले कमलेश तिवारी की हत्या, हिन्दू विरोधी दंगा करने वालों पर, हलाल का विरोध करने वालों पर क्यों चुप रहते हैं? सिखों की हत्या किसके इशारे पर हुई, क्यों नहीं बोलते? 7 नवंबर 1966 को निर्दोष और निहत्ते साधुओं के खून की होली खेल पार्लियामेंट स्ट्रीट को लाल करवाने वालों के विरुद्ध क्यों नहीं बोले? निहत्ते रामभक्तों पर गोली चलवाने वालों के विरुद्ध क्यों नहीं आवाज़ निकलती? साबरमती ट्रेन में 56 रामभक्तों को जिन्दा जलाने वालों के विरुद्ध क्यों नहीं आवाज़ निकली,गोधरा दंगे पर मोदी की आलोचना करते शर्म नहीं आती? उत्तर प्रदेश के मलियाना और मुज़फ्फरनगर दंगे किसने करवाए? जब कश्मीर में मस्जिदों से पंडितों से महिलाओं को छोड़ कश्मीर से निकलने की घोषणा होने पर क्यों चुप रहे?
हिंदुत्व को समाज के सामने घृणित तरह से पेश करने वाले कॉन्ग्रेसी एक के बाद एक अपना चेहरा उजागर कर रहे हैं। पहले खुर्शीद ने हिन्दुत्व को आतंकवाद से जोड़ा, फिर राशिद अल्वी ने श्रीराम का नारा लगाने वालों को राक्षस कहा और अब खुद राहुल गाँधी ने दावा किया है कि हिंदू और हिंदुत्व दो अलग-अलग चीजें हैं।

राहुल गाँधी ने कहा, हिंदुस्तान में 2 विचारधाराएँ हैं, एक कांग्रेस पार्टी की और एक RSS की। आज के हिन्दुस्तान में बीजेपी और RSS ने नफरत फैला दी है और कांग्रेस की​ विचारधारा जोड़ने, भाईचारे और प्यार की है। उनका कहना है कि आरएसएस की विचारधार आज प्यार-भाईचारे पर हावी हो गई है।

उन्होंने कहा, “बीजेपी हिंदुत्व की बात करती है। हिंदू और हिंदुत्व में क्या फर्क है, क्या ये एक हो सकते हैं? अगर हैं तो इनका नाम क्यों एक जैसा नहीं है। ये सच में अलग हैं। क्या हिंदू धर्म में ये है कि सिख और मुस्लिम को पीटा जाए? हिंदुत्व में ये है।”

राशिद अल्वी के अनुसार, “आजकल कुछ लोग जय श्री राम का नारा लगाकर देश के लोगों को गुमराह करते हैं, ऐसे लोगों से होशियार रहना चाहिए। आज जो जय श्री राम बोलते हैं, वे बिना नहाएँ बोलते हैं। आज भी बहुत लोग जय श्री राम का नारा लगाते हैं, वे सब मुनि नहीं वे निसिचर घोरा है।”

राहुल गाँधी और राशिद अल्वी की तरह ही सलमान खुर्शीद ने हिंदुत्व पर कमेंट करते हुए अपनी किताब में विवादित बात लिखी थी। उन्होंने हिंदुत्व की तुलना ISIS और बोको हराम जैसे जिहादी संगठनों से की है। सलमान खुर्शीद ने हिन्दू धर्म की सबसे बड़े प्रेरणा गाँधी द्वारा बताए गए सिद्धांतों को माना है। हिंदुत्व की राजनीति पर सलमान खुर्शीद का कहना है कि उनकी पार्टी में कुछ नेताओं को अल्पसंख्यक समर्थक छवि होने का पछतावा है। उनके अनुसार पार्टी का एक धड़ा पार्टी की पहचान जनेऊधारी के रूप में स्थापित करना चाहता है।

इच्छाधारी हिंदू हैं राहुल गाँधी- BJP नेता संबित पात्रा

उल्लेखनीय है कि राहुल गाँधी के बयान के बाद भाजपा प्रवक्त संबित पात्रा ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि हिंदू और हिंदुत्व पर प्रहार करना कांग्रेस का चरित्र है। कांग्रेस वही पार्टी है जिसकी ओर से भगवा आतंकवाद शब्द का इस्तेमाल किया गया था। बीजेपी नेता बोले कि एक वक्त था जब कहा गया था संस्कृति की वजह से बलात्कार होते हैं। कांग्रेस  हमेशा वोट बैंक की राजनीति करती है। राहुल ने कहा था कि मंदिर जाने वाले लड़कियाँ छेड़ते हैं। सोनिया गाँधी ने भगवान राम के लिए हलफनामा दिया था। इन लोगों ने भारत का संविधान नहीं पढ़ा, उपनिषद तो दूर की बातें हैं। भाजपा प्रवक्ता ने कहा राहुल गाँधी इच्छाधारी हिंदू हैं, क्योंकि अगर वह हिंदू दर्शन समझते तो इस तरह की गालियाँ न निकालते। संबित पात्रा ने कहा कि कांग्रेस की तुष्टिकरण की नियत के बारे में हिंदुस्तान को पता है और भारत की संस्कृति को जो लोग इस तरह के शब्दों से अलंकृत करते है उन्हें जनता कभी माफ नहीं करेगी।
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‘मंदिरों में जाकर देश बर्बाद कर रहे राहुल गाँधी और उनका परिवार’: सीपीआईएम नेता केके शैलजा

केरल की पूर्व स्वास्थ्य मंत्री शैलजा टीचर ने कॉन्ग्रेस पार्टी पर ‘सॉफ्ट हिन्दुत्व’ के जरिए देश को बर्बाद करने का आरोप लगाया है। केके शैलजा ने इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी के समय को याद किया और उसी के आधार पर राहुल गाँधी पर भी आरोप लगाया।

सीपीआईएम नेता शैलजा टीचर ने कहा कि गाँधी मंदिर-मंदिर घूमते हैं, यहाँ तक कि शिव मंदिर भी। जबकि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए क्योंकि भारत एक ‘सेक्युलर’ देश है। शैलजा ने इसे नौटंकी बताया और केरल की प्रदेश कॉन्ग्रेस से यह अपेक्षा की कि वह सेक्युलर केरल बनाए रखने के लिए यह सब नौटंकी नहीं करेगी।

केके शैलजा Covid-19 महामारी के दौरान ‘केरल मॉडल’ को लेकर चर्चा में रहीं। हालाँकि मीडिया ने ही महामारी से निपटने में केरल मॉडल के लिए केके शैलजा को उम्मीद से ज्यादा महत्व दिया लेकिन उनकी खुद की पार्टी ने उन्हें स्वास्थ्य मंत्री के पद से हटा दिया।  

शैलजा के इस बयान के बाद त्रिप्पुनितुरा से कॉन्ग्रेस विधायक के. बाबू ने स्पीकर से यह आदेश जारी करने के लिए कहा कि क्या मंदिर जाना अपराध है? कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी चुनावों के पहले हिन्दू वोट के लिए अक्सर मंदिरों की यात्रा करते रहते हैं। राहुल गाँधी द्वारा अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के आरोप से बचने के लिए की जाने वाली मंदिरों की इन यात्राओं को अक्सर चुनावी जानकार नौटंकी कहा करते हैं।

2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान, युवा कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ता सार्वजनिक तौर पर गाय के बछड़े को काटते हुए देखे गए थे। बाद में आरोपित ने यह खुलासा किया था कि उसे राज्य कॉन्ग्रेस अध्यक्ष की अनुमति प्राप्त थी।

सऊदी अरब : जहाँ इस्लाम का जन्म हुआ, वहां पढ़ाई जाएगी रामायण-महाभारत

कहते हैं, "समय बड़ा बलवान होता है", जिसे सिद्ध कर रही सऊदी अरब से हैरान करने वाला समाचार कि अब वहां रामायण और महाभारत पढ़ाई जाएगी। उस सऊदी अरब में जहां "सत्यार्थ प्रकाश" प्रतिबंधित है। जहां मुंह से ॐ या राम निकालना भी अपराध था।(नीचे दिए लिंक को क्लिक करिए) लेकिन जब उसी देश में रामायण और महाभारत पढ़ाए जाने से भारत के छद्दम धर्म-निरपेक्षों की भी नींद हराम हो रही होगी, क्योकि अयोध्या में राम मंदिर मुद्दे पर यूपीए सरकार ने कोर्ट में राम को काल्पनिक बताया था। 
इस्लामिक राष्ट्र सऊदी अरब ने बदलते वैश्विक परिदृश्य के बीच खुद को उसमें ढालना शुरू कर दिया है। मुस्लिम देश ने शैक्षणिक क्षेत्र के लिए नया “विजन-2030” लॉन्च किया है, जिसमें वहाँ सांस्कृतिक पाठ्यक्रमों के तहत विद्यार्थियों को दूसरे देशों के इतिहास और संस्कृति को भी पढ़ाया जा रहा है।

इसमें रामायण, महाभारत को भी पाठ्यक्रमों के तौर पर शामिल किया गया है। ताकि वैश्विक विकास की प्रतिस्पर्धा में सऊदी खुद को खड़ा रख सके। सऊदी के “विजन-2030” के मुताबिक, अंग्रेजी भाषा को जरूरी भाषा के तौर पर शामिल किया जाएगा, क्योंकि यह संचार का अच्छा माध्यम माना गया है।

सऊदी के विजन को नऊफ-अल-मारवई नाम की ट्विटर यूजर ने स्क्रीन शॉट शेयर कर स्पष्ट किया है। उन्होंने लिखा, “सऊदी अरब का नया विजन-2030 और पाठ्यक्रम सबको साथ लेकर चलने वाला, उदारवादी और सहिष्णु भविष्य बनाने में मदद करेगा। सामाजिक अध्ययन की पुस्तक में आज मेरे बेटे की स्कूल परीक्षा के स्क्रीनशॉट में हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म, रामायण, कर्म, महाभारत और धर्म की अवधारणाएँ और इतिहास शामिल हैं। मुझे उसकी पढ़ाई में मदद करने में मजा आया।”

सऊदी की शिक्षा पाठ्यक्रम के परिचय में कहा गया है कि सऊदी अरब शिक्षित और कुशल कार्यबल का निर्माण करके वैश्विक अर्थव्यवस्था की प्रतिस्पर्धा में शामिल होगा। अलग-अलग देशों और लोगों के बीच सांस्कृतिक संवादों का आदान-प्रदान वैश्विक शांति और मानव कल्याण में सहायक है। इसलिए विदेशी भाषाओं में मुख्यतया अंग्रेजी को सीखना आवश्यक है।

इसमें कहा गया है कि दुनिया भर के देशों में विकास और समृद्धि के लिए संवाद सबसे अहम कड़ी है। सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान अब्दुल अजीज ने “2030 के सऊदी विजन” को आगे बढ़ाने का काम किया है। इसके कई पहलू हैं, लेकिन इसका मुख्य उद्देश्य एक ऐसी शैक्षिक प्रणाली का निर्माण करना है, जिससे सरकार और विभिन्न व्यवसायों के बीच आने वाली कठिनाइयों को दूर किया जा सके। इसके अलावा “विजन-2030” के जरिए सऊदी वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिहाज से निवेश के लिए उचित माहौल बनाना चाहता है।

तेल आधारित नीति को बदलने का प्रयास 

सऊदी के विजन-2030 का मुख्य उद्देश्य यह भी है कि वहाँ की अर्थव्यवस्था तेल पर निर्भर है और तेल से मिलने वाले राजस्व की निर्भरता में कमी लाने के लिए भी वह शैक्षिक व्यवस्था में बदलाव कर रहा है। इसीलिए अपनी अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन के लिए सऊदी सरकार ने कई बड़े कदम उठाए हैं।

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In Saudi Arabia,Hindus forced to eat beef,jailed for keeping "Satyartha Prakasha"

‘कुरान में 2500 त्रुटियाँ, इसे आधुनिक युग के अनुकूल बनाने की जरूरत’: सऊदी अरब

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‘कुरान में 2500 त्रुटियाँ, इसे आधुनिक युग के अनुकूल बनाने की जरूरत’: सऊदी अरब
मुस्लिम समाज जिस कुरान को आसमानी किताब के नाम से विश्व को भ्रमित करते रहे हैं, अगर किसी ने कोई अपशब्द बोल दिया, उसकी ....

इसलिए प्रतिबंधित है सत्यार्थ प्रकाश इस्लामिक देशों में

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इसलिए प्रतिबंधित है सत्यार्थ प्रकाश इस्लामिक देशों में
बकरी को शेर कैसे बनाएँ ? ये बात है दिल्ली की Amity University में बीए कर रही

क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान द्वारा घोषित विजन-2030 इन्हीं परिवर्तनों में से एक है। प्रिंस का मानना है कि इससे देश में बड़े आर्थिक बदलाव होंगे। पाठ्यक्रम के मुताबिक 1932 में सउदी के निर्माण के बाद यह सबसे बड़ा बदलाव होने जा रहा है।

मंदिरों में हौले-हौले बजाओ माइक, केरल की वामपंथी सरकार का आदेश

                                           केरल सरकार का मंदिरों के खिलाफ आदेश
केरल में सत्तारूढ़ वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) ने अपनी हिन्दू विरोध की राजनीति को एक नया मोड़ देते हुए एक आदेश जारी कर राज्य के मंदिरों में लाउडस्पीकर पर ‘लगभग’ प्रतिबंध लगा दिया, जिसके चलते नए विवाद ने जन्म ले लिया है। लोगों ने राज्य की वामपंथी सरकार के इस फैसले पर आपत्ति जताते हुए लिखा है कि केवल हिंदू पूजा स्थलों को ही निशाना बनाया जा रहा है।

‘स्वराज्य’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, नए साल की 7 जनवरी को ही केरल देवस्वोम बोर्ड ने एक आदेश जारी करते हुए कहा है कि मंदिरों को 55 डेसीबल से अधिक ध्वनि स्तर वाले लाउडस्पीकर इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं होगी। गौरतलब है कि 55 डेसिबेल की ध्वनि घर के भीतर दो लोगों की बातचीत जितनी ही ऊँची होती है।

कुछ लोगों ने कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर से भी इस फैसले को लेकर सवाल किए हैं।

सोशल मीडिया पर कई लोगों द्वारा केरल सरकार के इस फैसले के प्रति आक्रोश व्यक्त किया जा रहा है।

एक ट्विटर यूजर ने कहा, “सत्तारूढ़ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट नियंत्रित केरल हिंदू मंदिरों में लाउड स्पीकरों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। केवल हिंदू मंदिरों में! हिन्दू?”

कुछ लोगों ने कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर से भी इस फैसले को लेकर सवाल किए हैं।


हिन्दू देवी-देवता पर घटिया कमेंट करने वाले मुनव्वर फारूकी के वकील बने कांग्रेसी नेता, कोर्ट ने नहीं दी जमानत

                                         कथित कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी (लाल-पीले घेरे में)
हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान करना वामपंथी और मुस्लिम कॉमेडियनों का फैशन बन चुका है। वे अक्सर अपने कार्यक्रम में हिन्दू देवी-देवताओं का मजाक बनाकर लोगों को हंसाने की कोशिश करते हैं। कार्यक्रम में मौजूद लोग भी उनका हौसला बढ़ाने से पीछे नहीं रहते हैं। लेकिन अब हिन्दू भी जागरूक हो चुके हैं। इसका नतीजा है कि गुजरात के कॉमेडियन मुनव्वर फारुकी और चार अन्य लोगों को गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे भेज दिया गया। 
मध्य प्रदेश के इंदौर में हिन्दू देवी-देवताओं और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर अभद्र टिप्पणी करने के आरोप में शनिवार(जनवरी 2) को गिरफ्तार कथित कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी समेत 5 आरोपितों को 13 जनवरी तक न्यायिक हिरासत के तहत जेल भेज दिया गया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इंदौर की एक स्थानीय अदालत ने आरोपितों की जमानत याचिका खारिज कर दी और उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) अमन सिंह भूरिया ने फारुकी और अन्य चार को जमानत देने से इनकार करते हुए उन्हें 13 जनवरी तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया।

फारुकी के वकील अंशुमन श्रीवास्तव ने अदालत में बहस के दौरान कहा कि यह मामला पार्टीगत राजनीति से प्रेरित होकर दर्ज कराया गया है। श्रीवास्तव ने कथित कॉमेडियन के पक्ष में पैरवी करते हुए करते हुए मामले में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक प्रावधानों का हवाला दिया।

वकील अंशुमन की दलील "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" कमलेश हत्याकांड और बैंगलोर दंगे पर कहां थी? क्या हिन्दू देवी-देवताओं पर अभद्र टिप्पणी करने को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहते हैं? यदि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है तो वकील अंशुमन श्रीवास्तव इस्लाम के विरुद्ध बोलकर दिखाएं, दिन में तारे दिखने लगेंगे, जान बचानी भारी पड़ जाएगी वकील साहब को। भूल जाएंगे अभिव्यक्ति की आज़ादी क्या होती है। 

 

जानने लायक बात यह है कि वकील अंशुमन श्रीवास्तव मध्य प्रदेश कांग्रेस कमिटी लीगल सेल के सचिव और राज्य प्रवक्ता हैं।

                                                                  अंशुमन श्रीवास्तव का फेसबुक प्रोफाइल
हालाँकि, जमानत के आवेदन का विरोध करते हुए, वकील दिनेश पांडे ने कहा कि यह शो प्रशासन की अनुमति के बिना आयोजित किया गया था और इससे धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँची है।

तुकोगंज पुलिस स्टेशन के प्रभारी कमलेश शर्मा ने कहा कि गुजरात के जूनागढ़ के निवासी मुनव्वर फारुकी और इंदौर के चार लोगों के खिलाफ शुक्रवार देर रात हिंदूवादी एकलव्य सिंह गौर द्वारा दर्ज की गई लिखित शिकायत के आधार पर एक मामला दर्ज किया गया था।

पुलिस को मिली शिकायत के अनुसार, ‘कॉमेडियन’ मुनव्वर फारुकी ने हिन्दू देवी-देवताओं और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ अभद्र टिप्पणी की थी। मध्य प्रदेश पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए अन्य लोगों में एड्विन एंथनी, प्रखर व्यास, प्रियम व्यास और नलिन यादव शामिल हैं। सभी नए साल के मौके पर इंदौर स्थित एक कैफे में इवेंट में शामिल हुए थे।

अधिकारी ने बताया कि, पाँचों आरोपितों के खिलाफ भारतीय दंड विधान की धारा 295-ए (किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के इरादे से जान-बूझकर किए गए विद्वेषपूर्ण कार्य), धारा 269 (ऐसा लापरवाही भरा काम करना जिससे किसी जानलेवा बीमारी का संक्रमण फैलने का खतरा हो) के तहत मामला दर्ज किया है।

हिंदू रक्षक संगठन के प्रमुख एकलव्य सिंह गौर कार्यक्रम में बतौर दर्शक पहुँचे थे। उन्होंने इस मामले की पुलिस से शिकायत की थी। इस इवेंट के दौरान तथाकथित स्टैंडअप कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और हिन्दू देवी-देवताओं पर अभद्र टिप्पणी की थी। इस बात की जानकारी मिलते हिन्दू रक्षक संगठन के कई कार्यकर्ता वहाँ पहुँचे और मुनव्वर फारूकी की कथित तौर पर पिटाई कर दी। पिटाई के बाद उसे तुकोगंज थाने लेकर गए।

एकलव्य गौड़ ने मीडिया से बात करते हुए कहा था कि मुनव्वर फारूकी पहले भी देवी-देवताओं पर इस तरह की टिप्पणी कर चुका है। इसकी वजह से ही जयपुर में इसका एक कार्यक्रम रद्द हो चुका है। इस इवेंट की जानकारी मिलने पर संगठन के कार्यकर्ता टिकट लेकर इसमें शामिल हुए थे।

इसके पहले भी मुनव्वर फारूकी मंचों से ऐसी विवादित और अपमानजनक बातें कर चुका है। माता सीता पर अभद्र टिप्पणी करते हुए मुनव्वर ने कहा था, “मेरा पिया घर आया ओ राम जी। राम जी डोंट गिव अ फ़*** अबाउट पिया। यह सुन राम जी कहते हैं मैं खुद चौदह साल से घर नहीं गया। अगर सीता ने सुन लिया, वो तो शक करेगी। सीता को तो माधुरी पे पहले से ही शक है। वो गाना है तेरा करूँ गिन-गिन इंतजार। उसे लग रहा है वनवास गिन रही है 14 पर आकर रुक गई।

इस हरकत के बाद उस पर एफ़आईआर भी दर्ज की गई थी। इसके अलावा उसने गोधरा में जलाकर मार डाले गए 59 कारसेवकों का मजाक उड़ाया था। गोधरा कांड के लिए उसने अमित शाह और आरएसएस को जिम्मेदार ठहराया था। संज्ञान में यह वीडियो आने के बाद RSS ने उस पर कानूनी एक्शन लेने की बात कही थी।

केरल : क्रिसमस से पहले हलाल माँस का बहिष्कार; हिन्दुओं को भी बेचने के लिए किया जाता है मजबूर

केरल में अब एक नया विवाद छिड़ गया है। दरअसल ईसाईयों के त्योहार क्रिसमस से ठीक पहले ईसाइयों ने हलाल माँस का बहिष्कार करने का फैसला किया है। ईसाई धर्म से उठा यह विरोध वास्तव में सर्वप्रथम हिन्दू समाज की तरफ से नागरिक संशोधक कानून के विरोधियों द्वारा हिन्दुओं को अपमानित करना शुरू किया था, परन्तु किन्हीं कारणों से जोर नहीं पकड़ सका। चर्चा यहां तक हो रही थी कि हलाल से होनी वाली आय का एक अंश गुप्त रूप से मुस्लिम वेलफेयर में जाता है, जिसका उपयोग मदरसों, लव-जिहाद, धर्म परिवर्तन आदि पर किया जाता है। जब तक हलाल पर अंकुश नहीं लगेगा, देश गैर-मुस्लिम विरोधी हरकतों से मुक्त नहीं होगा। 

हलाल के अलावा अभी एक और मुद्दा जोर पकड़ने वाला है, वह यह है कि अवकाश के दिन बाजार में गोश्त कहाँ से आता है? जबकि झटके की समस्त दुकानें तक उस दिन बंद रहती है, लेकिन हलाल की नहीं। क्या साप्ताहिक अवकाश केवल झटका कत्लगाह पर ही लागु होता है? अगर राज्य सरकारें इसकी जाँच नहीं कर सकती तो केंद्र को संज्ञान लेकर कार्यवाही करनी चाहिए। किन-किन गैर-कानूनी कत्लगाहों में गैर-कानूनी काम हो रहा है? देश में कितने गैर-कानूनी कत्लगाह कार्यरत हैं, इसकी जाँच जरुरी है। और जिस क्षेत्र में ऐसे गैर-कानूनी कत्लगाह मिले, सम्बन्धित अधिकारियों पर भी सख्त कार्यवाही करते हुए, उनके बैंक खातों और संपत्ति की भी जाँच की जानी चाहिए। गैर-कानूनी रूप से कटने वाले पशुओं से सरकार को भी वित्तीय नुकसान हो रहा है।  

समाचार पोर्टल ‘टाइम्स नाउ’ की रिपोर्ट के मुताबिक, ईसाई समुदाय के इस फैसले को हिन्दू समूहों ने भी अपना समर्थन दिया है। उनका कहना है कि राज्य में हिन्दू धर्म के लोग हलाल माँस बेचने के लिए मजबूर हैं। क्रिश्चियन एसोसिएशन CASA ने ईसाइयों से अपील की है कि हलाल भोजन को अब उनकी खाने की टेबल पर नहीं लाया जाना चाहिए।

ईसाई समुदाय का कहना है कि ईसा मसीह के जन्मदिन पर हलाल माँस क्यों खाना चाहिए? इस विवाद पर कई तरह की प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। हिन्दू समूहों का दावा है कि ईसाई और हिन्दू दोनों को हलाल माँस बेचने के लिए मजबूर किया जाता है। वहीं आईयूएमएल ने इसे राज्य में मुस्लिम माँस की दुकानों का बहिष्कार करने के लिए उठाया गया एक कदम बताया।

‘झटका सर्टिफिकेशन अथाॅरिटी’ के चेयरमैन रवि रंजन सिंह बताते हैं कि ‘झटका‘ विधि हिन्दुओं, सिखों आदि भारतीय, धार्मिक परम्पराओं में ‘बलि/बलिदान’ देने की पारम्परिक पद्धति है। इसमें जानवर की गर्दन पर एक झटके में वार कर रीढ़ की नस और दिमाग का सम्पर्क काट दिया जाता है, जिससे जानवर को मरते समय दर्द न्यूनतम होता है। इसके उलट, हलाल में जानवर की गले की नस में चीरा लगाकर छोड़ दिया जाता है, और जानवर खून बहने से तड़प-तड़प कर मरता है।

इसके अलावा, मारे जाते समय जानवर को खास समुदाय के पवित्र स्थल मक्का की तरफ़ ही चेहरा करना होगा। लेकिन सबसे आपत्तिजनक शर्तों में से एक है कि हलाल माँस के काम में ‘काफ़िरों’ (‘बुतपरस्त’, जैसे हिन्दू) को रोज़गार नहीं मिलेगा। यानी कि यह काम सिर्फ एक समुदाय विशेष का सदस्य ही कर सकता है।

इसमें जानवर/पक्षी को काटने से लेकर, पैकेजिंग तक में सिर्फ और सिर्फ खास समुदाय वाला ही शामिल हो सकते हैं। मतलब, इस पूरी प्रक्रिया में, पूरी इंडस्ट्री में एक भी नौकरी अन्य धर्मों के लिए नहीं है। यह पूरा कॉन्सेप्ट ही हर नागरिक को रोजगार के समान अवसर देने की अवधारणा के खिलाफ है। बता दें कि आज McDonald’s और Licious जैसी कंपनियाँ सिर्फ हलाल माँस बेचती है।

इसी कड़ी में आइए नज़र डालते हैं हलाल से जुड़ी कुछ अन्य बातों पर, जिनसे पता चलता है कि समुदाय विशेष अपने नियम के तहत गै़र-मुस्लिम के हाथ का मांस हराम तक मानते हैं।

हलाल केवल एक मुस्लिम व्यक्ति ही कर सकता है। इसका मतलब साफ़ है कि हलाल फर्म में गैर-मुस्लिमों को रोज़गार से वंचित रखा जाता है। इसके अलावा कुछ और भी शर्तें हैं, जिन्हें अवश्य पूरा किया जाना चाहिए। जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि यह हलाल पूरी तरह से एक इस्लामी प्रथा है। भारत में हलाल के एक प्रमाणीकरण और प्राधिकरण की आधिकारिक वेबसाइट पर दिशानिर्देश उपलब्ध हैं जो यह स्पष्ट करता है कि पशु वध प्रक्रिया (हलाल) के किसी भी हिस्से में गैर-मुस्लिम कर्मचारियों को रोज़गार नहीं दिया जा सकता है।

पूरे दस्तावेज़ में इस्लामी पशु वध के दिशानिर्देशों को सूचीबद्ध किया गया है, इसमें शामिल कर्मचारियों के धर्म का उल्लेख करने के लिए ध्यान रखा गया है। यह स्पष्ट करता है कि केवल समुदाय विशेष के कर्मचारियों को ही हलाल के हर चरण में भाग लेने की अनुमति है। यहाँ तक ​​कि मांस का लेबल लगाने का काम भी मजहब के ही लोग कर सकते हैं।

                                                                                                              साभार : Halal India
यूरोपीय संघ के हलाल प्रमाणन विभाग ने यह और भी स्पष्ट कर दिया है कि हलाल फ़र्म में रोज़गार के अवसर विशेष रूप से इस्लाम के अनुयायियों के लिए उपलब्ध होंगे। इसमें कहा गया है, ”पशु वध एक वयस्क मुस्लिम द्वारा किया जाना चाहिए। एक ग़ैर-मुस्लिम द्वारा मारा गया जानवर हलाल नहीं कहलाएगा।” इसमें आगे कहा गया है, “जानवर का वध करते समय अल्लाह का नाम (उल्लेखित) लिया जाना चाहिए: बिस्मिल्लाह अल्लाहु अकबर यानी (अल्लाह के नाम पर; अल्लाह सबसे महान है)। यदि पशु का वध करते समय किसी दूसरे का नाम (अर्थात जिसके लिए पशु की बलि दी जा रही हो) अल्लाह का नाम नहीं लिया जाता है, तो वो मांस हराम यानी, ‘ग़ैर-क़ानूनी’ हो जाता है।

                                                                       साभार : Department of Halal Certification EU
समुदाय विशेष को अपने धर्म ग्रंथों द्वारा ग़ैर-हलाल भोजन का सेवन करने से रोका गया है। इस प्रकार, जब एक मुस्लिम विशेष रूप से हलाल मांस की माँग करता है, तो ऐसे में वह साफ़ तौर पर ऐसी सेवा की माँग कर रहा होता है, जो केवल मजहब के लोगों द्वारा दी जा सकती हो। बेहद साफ़ है कि एक समुदाय विशेष का शख्स अपनी धार्मिक पहचान के कारण एक ग़ैर-मुस्लिम से सेवा लेने से इनकार करता है।

हलाल प्रमाणन विभाग भी पशु वध (Slaughtering) के इस्लामी तरीके के बारे में दिशानिर्देश देता है। इसमें कहा गया है कि जानवर का क़त्ल तेज़ चाकू का इस्तेमाल कर सिर्फ़ एक झटके में किया जाना चाहिए। इसमें कहा गया है कि विंडपाइप (गला), फूड-ट्रैक्ट (ग्रासनली) और दो गले की नसों को एक ही झटके में काट देना चाहिए। ध्यान रखा जाना चाहिए कि सिर अलग न होने पाए और रीढ़ की हड्डी को भी न काटें। नियम तो यह भी कहते हैं कि एक मशीन द्वारा वध किया गया मांस हलाल की श्रेणी में नहीं आता, जानवर का क़त्ल एक समुदाय विशेष के व्यक्ति द्वारा ही होना चाहिए।

यह एक संपूर्ण उद्योग है जहाँ कुछ क्षेत्रों में रोज़गार के अवसर गैर-मुस्लिमों के लिए पूरी तरह से बंद और प्रतिबंधित हैं। यह न केवल हिंदू धर्म के लोगों, बल्कि ईसाई धर्म, बौद्ध धर्म, सिख धर्म और अन्य लोगों के प्रति भेदभावपूर्ण रवैया है।

बहुत से लोग यह कहेंगे कि शाकाहारी भोजन की तरह ही हलाल भोजन की माँग करना अपनी-अपनी पसंद की बात है। लेकिन यह पूरी तरह से ग़लत है। जबकि लोग अपनी पसंद से शाकाहारी बन जाते हैं, समुदाय विशेष के लोगों के पास इस संदर्भ में कोई विकल्प नहीं है। इस्लामी नियम उन्हें हराम या ग़ैर-हलाल भोजन का सेवन करने से मना करता है, उन्हें केवल हलाल भोजन का सेवन ही करना होता है।

हलाल के नियम क़ुरान से हदीस और सुन्नत में निहित हैं और इस्लाम के अनुयायियों को इन नियमों का पालन करना पड़ता है। जैसे अधिकांश हिंदुओं के लिए गोमांस नहीं खाना केवल व्यक्तिगत पसंद का मामला नहीं है। एक समुदाय विशेष का व्यक्ति जो सूअर का मांस खाने से इनकार करता है या किसी ग़ैर-मुस्लिम द्वारा मारे गए जानवर का मांस, मात्र पसंद का मामला नहीं है, दोनों ही मामलों में मांस का सेवन करने से धर्म उन्हें रोकता है।

कार्तिक मास: मौसम के बदलाव की सूचना भी पर्व से, सिर्फ सभ्यता-संस्कृति नहीं, छिपे हैं अनगिनत वैज्ञानिक तथ्य

                                                                       कार्तिक मास में सूर्योदय से पहले स्नान के पीछे कई वैज्ञानिक तथ्य
प्राणी मात्र के संरक्षण संवर्धन के ज्ञान से अनुस्यूत वेदों का अनुसरण करने वाली भारतीय संस्कृति में पर्व की एक लंबी पंक्ति है। पर्व या उत्सव किसी संस्कृति की समृद्धता को द्योतित करते हैं। जो संस्कृति जितनी वैभवशाली होती है, उसमें उतने ही पर्व होते हैं और पर्व भी केवल मनोरंजन के लिए नहीं अपितु अन्वर्थ है अर्थात् पर्व शब्द संस्कृत की ‘पृ’ धातु से बना है जिसका अर्थ होता है पूर्ण करने वाला, तृप्त करने वाला। पहाड़ को भी पर्वत कहते हैं क्योंकि वह भी पर्व वाला है अर्थात् उसका निर्माण भी कालखण्ड में धीरे-धीरे हुआ है।

गन्ने के एक-एक भाग को भी पर्व (पौरी) कहते हैं, उसका प्रत्येक भाग मिलकर पूर्ण मिठास, तृप्ति को प्राप्त कराता है। इसी प्रकार वर्ष पर्यन्त प्राकृतिक दिवस विशेष को पर्व कहा जाता है क्योंकि ये दिवस विशेष हमें पूर्ण करने वाले तथा तृप्त करने वाले होते हैं। भारतीय संस्कृति व्यक्ति प्रधान नहीं अपितु समष्टि प्रधान है, अत: वह प्रकृति के परिवर्तन को उत्सव के रूप में मनाती है।

मानव प्रकृति का एक अंग है। वह प्रकृति ही उसे पूर्ण बनाती है, उस प्रकृति को जान करके ही व्यक्ति अपना समुन्नत विकास कर सकता है। भारतीय ऋषि-ज्ञान परंपरा ने बहुत गहन अध्ययन और प्रयोगों के उपरांत उनसे मिलने वाले परिणामों को देखते हुए जन सामान्य को अनुसरण करने के लिए कुछ पर्व के रूप में दिवस निर्दिष्ट किए। मानव और प्रकृति में जब तक सामंजस्य है, तब तक मानव स्वस्थ और दीर्घ जीवन जी सकता है- यह तथ्य भारतीय मनीषी बहुत पहले जान चुके थे। अत: भारतीय समाज प्रकृति की पूजा करता है और पूजा का अर्थ होता है “यथायोग्य व्यवहार करना”।

भारतीय समाज जानता था कि प्रकृति का शोषण नहीं बल्कि “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः” त्याग पूर्वक भोग करना चाहिए। यही त्याग पूर्वक भोग ही प्रकृति की पूजा है, जिसमें किसी प्राणी की हिंसा नहीं अपितु समर्पण होता है। व्यक्ति दैनंदिन की व्यस्तता में यह भूल सकता है अत: पर्व के रूप में उस दिन विशेष को वह पुन: स्मरण करता है और अपने परिश्रम के उपरांत प्राप्त फल के लिए धन्यवाद ज्ञापन करते हुए प्रसन्न हो कर मिल बाँट कर खाता है। अतः ये पर्व मानव जीवन में न्यूनताओं को पूर्ण करने वाले होते हैं। जिनको भारतीय मानव समुदाय बड़ी प्रसन्नता उत्साह के साथ मनाता है।

हम सब होली दिवाली इत्यादि बड़े पर्व से परिचित हैं इसी श्रृंखला में शरद पूर्णिमा भी एक पर्व है और उसके बाद प्रारम्भ होने वाला कार्तिक मास का प्रात:स्नान। पृथ्वी की परिभ्रमण और परिक्रमण गति के कारण वर्ष में दो बार वह सूर्य के सबसे समीप होती है । ग्रीष्म ऋतु में उसकी समीपता रस की शोषक का कारक बनती है तो शरद ऋतु में उसकी समीपता रस की पोषक है।

आयुर्वेद में इस काल को विसर्ग काल कहा जाता है- “जनयति आप्यमंशम् प्राणिनां च बलमिति विसर्ग:’ अर्थात् इसमें वायु की रुक्षता कम हो जाती है और चन्द्रमा का बल बढ़ जाता है। सूर्य जब दक्षिणायन होता है तो उत्तरी गोलार्ध में पड़ने के कारण भारतवर्ष सूर्य से दूर हो जाता, जिससे भूभाग शीतल रहता। इस काल में चन्द्रमा भी पृथ्वी के सबसे अधिक समीप होता है और वह समस्त संसार पर अपनी सौम्य एवं स्निग्ध किरणें बिखेर कर जगत को निरंतर तृप्त करता रहता है।

शरद ऋतु में चन्द्रमा पूर्ण बली होकर जलीय स्नेहांश को बढ़ाने लगता है, जिससे द्रव्यों में मधुर रस की वृद्धि होती है और उसके उपयोग से प्राणियों के शरीर में बल की वृद्धि होने लगाती है। चन्द्रमा के साहचर्य से वायु भी अपने योगवाही गुण के कारण चन्द्रमा के शैत्य आदि गुणों की वृद्धि कराती है। शरद ऋतु के प्रारम्भ में दिन थोड़े गर्म और रातें शीतल हो जाया करती हैं। आयुर्वेद के अनुसार “वर्षाशीतोचिताङ्गानां सहसैवार्करश्मिभि:।

तप्तानामचितं पित्तं प्राय: शरदि कुप्यति” अर्थात् वर्षा ऋतु में शरीर वर्षाकालीन शीत का अभ्यस्त रहता है और ऐसे शरीरांगों पर जब सहसा शरद ऋतु के सूर्य की किरणें पड़ती हैं तो शरीर के अवयव संतप्त हो जाते हैं और वर्षा ऋतु में संचित हुआ पित्त शरद ऋतु में प्रकुपित हो सकता है। अत: प्रकृति के इस परिवर्तन को देखते हुए मनुष्य को अपने आहार-विहार, पथ्य-अपथ्य का ध्यान रखना चाहिए। इसका प्रारम्भ नवरात्रि के उपवास से ही हो जाता है।

भारतीय समाज में शरद पूर्णिमा के बाद प्रारम्भ होने वाले कार्तिक मास में ब्रह्म मुहूर्त में शीतल जल के स्नान की परम्परा है। आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रन्थ चरक संहिता में इस जल को ‘हंसोदक’ कहा गया है क्योंकि दिन के समय सूर्य की किरणों से तपा और रात के समय चन्द्रमा की किरणों के स्पर्श से शीतलकाल स्वभाव में पका हुआ होने से निर्दोष एवं अगस्त्यतारा के उदय होने के प्रभाव से निर्विष हो जाता है।

‘हंस’ शब्द से सूर्य, चन्द्रमा और हंस पक्षी इन तीनों का ग्रहण होता है अत: सूर्य और चन्द्रमा दोनों की किरणों के संपर्क से शुद्ध हुए जल को भी हंस-उदक कहा जाता है। उस जल में स्नान करना, उसका पान करना और उसमें डुबकी लगाना अमृत के सामान फल देने वाला होता है। हमारे पूर्वजों ने इस परंपरा का बड़ी श्रद्धा और निष्ठा से निर्वहण किया है और हम तक सुरक्षित पहुँचाया है।

ये पर्व प्रवाही काल का साक्षात्कार है। मनुष्य द्वारा ऋतु को बदलते देखना, उसकी रंगत पहचानना, उस रंगत का असर अपने भीतर अनुभव करना पर्व का लक्ष्य है। हमारे पर्व-त्यौहार हमारी संवेदनाओं और परंपराओं का जीवंत रूप हैं, जिन्हें मनाना या यूँ कहें कि बार-बार मनाना, हर वर्ष मनाना हमारे लिए गर्व का विषय है। पूरी दुनिया में भारत ही एक ऐसा देश है, जहाँ मौसम के बदलाव की सूचना भी पर्व/त्यौहारों से मिलती है।

इन मान्यताओं, परंपराओं और विचारों में हमारी सभ्यता और संस्कृति के अनगिनत वैज्ञानिक तथ्य छुपे हैं। जीवन के अनोखे रंग समेटे हमारे जीवन में रंग भरने वाली हमारी उत्सवधर्मिता की सोच, मन में उमंग और उत्साह के नए प्रवाह को जन्म देती है। हमारी संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है कि यहाँ पर मनाए जाने वाले सभी त्यौहार समाज में मानवीय गुणों को स्थापित करके लोगों में प्रेम और एकता को बढ़ाते हैं।

त्यौहारों और उत्सवों का संबंध किसी जाति, भाषा या क्षेत्र से न होकर समभाव से है। सभी त्यौहारों के पीछे की भावना मानवीय गरिमा को समृद्धि प्रदान करना है। प्रत्‍येक त्‍यौहार अलग अवसर से संबंधित है, कुछ वर्ष की ऋतुओं का, फसल कटाई का, वर्षा ऋतु का अथवा पूर्णिमा का स्‍वागत करते हैं। दूसरों में धार्मिक अवसर, ईश्‍वरीय सत्‍ता/परमात्‍मा व संतों के जन्‍म दिन अथवा नए वर्ष की शुरुआत के अवसर पर मनाए जाते हैं। 

                                                                             (साभार : डॉ सोनिया अनसूया  )

जब महात्मा गाँधी ने अपने बेटे मणिलाल से पूछा : फातिमा से विवाह अधर्म है, तुम्हारे बच्चों का धर्म क्या होगा?

तनिष्क के विवादित वीडियो ने लव-जिहाद, हिन्दू-मुस्लिम विवाह, इनके पीछे छुपे नैरेटिव आदि विषयों को बहस का विषय बना दिया। ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि देश के विचारकों ने किसी भी बहस के बीच महात्मा गाँधी का जिक्र न किया हो। इसी कड़ी में सेक्स और टीनएज कॉलेज रोमांस की फिक्शन कथाएँ लिखने वाले चेतन भगत ने भी लगे हाथ एक ट्वीट कर कहा कि आज अगर महात्मा गाँधी होते तो वो इस विषय पर क्या कहते?

वास्तव में, महात्मा गाँधी खुद भी अपने हिन्दू बेटे मणिलाल का विवाह दूसरे मजहब की फातिमा से करने के खिलाफ थे। ख़ास बात यह थी कि मणिलाल फातिमा के प्रेम में पागलपन की हद तक डूबे हुए थे।

मोहनदास करमचंद गाँधी के बेटे मणिलाल और फातिमा का प्रेम सम्बन्ध तकरीबन 12 वर्षों तक चला। गाँधी के बेटे मणिलाल फातिमा से शादी करना चाहते थे। लेकिन जब उन्होंने अपने पिता से ‘परमिशन’ माँगी तो उन्होंने कई तर्क देते हुए इस शादी से स्पष्ट रूप से मना कर दिया और फ़ौरन मणिलाल का विवाह अपनी ही जाति में करवाकर मामले को ‘शांत’ कर दिया था।

गाँधी अंतरधार्मिक या अंतरजातीय विवाह के खिलाफ थे इस बात का प्रमाण अपने बेटे मणिलाल को लिखा गया उनका एक पत्र है। उनका मानना था कि ये उचित नहीं है। इससे सामाजिक संरचना और धार्मिक सदभावना को ठेस लगेगी, लिहाजा हिंदू धर्म में अंतरजातीय और अंतरधार्मिक शादियों पर प्रतिबंध उचित है।

मणिलाल करना चाहते थे ‘टिम्मी’ उर्फ़ फातिमा से विवाह

मणिलाल ने 1926 में अपने से छोटे भाई रामदास के जरिए पिता एमके गाँधी को संदेश भेजा कि वो टिम्मी (फातिमा) से शादी करना चाहते हैं। दरअसल फातिमा और उसके परिवार से एमके गाँधी के परिवार का दक्षिण अफ्रीका में रहने के दौरान गहरा रिश्ता था। इसी कारण मणिलाल को यकीन था कि उनके पिता इस शादी के लिए मान जाएँगे। लेकिन मणिलाल के पिता ने जवाब में जो पत्र भेजा, वो उनके लिए आशा के विपरीत था।
मोहनदास करमचंद गाँधी के इस पत्र में उन्होंने अपने पुत्र मणिलाल को संबोधित करते हुए लिखा था। इस पत्र को एमके गाँधी ने ‘एक मित्र के रूप में’ मणिलाल की इच्छा को ‘धर्म के विपरीत इच्छा’ कहते हुए शुरू किया! पत्र में उन्होंने जो लिखा, वह एक ‘आज्ञाकारी बेटे’ के लिए और अधिक चौंकाने वाला था। उसका सपना चकनाचूर हो गया।
एमके गाँधी इस पत्र में लिखते हैं-
“यदि तुम हिंदू होकर फातिमा के इस्लाम से जुड़े रहते हो, तो यह एक म्यान में दो तलवारें डालने जैसा होगा; या तुम अपनी आस्था से विमुख हो जाओगे। और फिर तुम्हारे बच्चों का धर्म क्या होना चाहिए? वे किस धर्म और आस्था के प्रभाव में बड़े होंगे? यह धर्म नहीं है, लेकिन केवल धर्म है, अगर फातिमा सिर्फ तुमसे शादी करने के लिए धर्मांतरण के लिए सहमत है। विश्वास एक परिधान जैसी चीज नहीं है जिसे हमारी सुविधा के अनुरूप बदला जा सकता है।”
“…धर्म के लिए एक व्यक्ति वैवाहिक जीवन को त्याग देगा, अपने घर को त्याग देगा, क्यों? यहाँ तक ​​कि अपने जीवन को भी त्याग देगा।…ये धर्म नहीं अधर्म होगा, अगर फातिमा केवल शादी के लिए अपने धर्म को बदलना भी चाहे तो भी ठीक नहीं होगा। आस्था कोई कपड़ा नहीं, जो आप इसे कपड़े की तरह बदल लें। अगर कोई ऐसा करता है तो धर्म और घर से बहिष्कृत कर दिया जाएगा। ये कतई उचित नहीं..।”
“…ये रिश्ता बनाना समाज के लिए भी हितकर नहीं। ये शादी हिंदू मुस्लिमों पर अच्छा असर नहीं डालेगी। अंतरधार्मिक शादी करने के बाद तुम देश की सेवा के लायक नहीं रह जाओगे और शायद फीनिक्स आश्रम में रहकर ‘इंडियन ओपिनियन’ वीकली निकालने के लिए सही व्यक्ति नहीं रह सकोगे। तुम्हारे लिए भारत आना मुश्किल हो जाएगा। मैं ‘बा’ से तो इस बारे में कह भी नहीं सकता, वो तो इसकी अनुमति देने से रहीं। उसकी जिंदगी में यह हमेशा के लिए ही सबसे कड़वा अनुभव होगा।”
एमके गाँधी ने अपने बेटे को इस पत्र में लिखा, “तुम क्षणिक सुख के लिए ही ऐसी शादी के बारे में सोच रहे हो, जबकि तुम्हे मालूम नहीं कि वास्तविक सुख क्या है।”
दिलचस्प बात यह है कि मणिलाल की फातिमा से शादी तो नहीं हुई लेकिन एमके गाँधी के सबसे बड़े बेटे हरिलाल ने आगे चलकर 1936 में इस्लाम धर्म अपनाया और अपना नाम बदलकर अब्दुल्ला रख लिया था।
हैरानी की बात है कि एमके गाँधी ने कभी भी अपने परिवार से बाहर दूसरों के मामले में हिंदू-मुस्लिम विवाह के बारे में यही नजरिया नहीं अपनाया और खुलकर उन्हें समर्थन दिया। उन्होंने ऐसे ही दो विवाह- हुमायूँ कबीर (एक मुस्लिम की हिंदू बंगाली लड़की से शादी) और बीके नेहरू (जवाहर लाल नेहरू के चचेरे भाई की हंगरी की एक यहूदी से शादी) को संरहतन दिया और इन विवाहों पर कोई आपत्ति नहीं जताई। 
बात 1945 की है, जिस सन तक हर वर्ष दिल्ली में बकरा ईद पर सदर बाजार में गौ-हत्या को लेकर दंगा होता था, लेकिन उस वर्ष सदर बाजार का चर्चित लोटन पहलवान ने गऊ को बचाने हत्यारों से लोहा लेने के अपराध में पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। पिताश्री किसी पारिवारिक काम से करोल बाग़ से वापस अपने निवास आते समय पुलिस के खुले ट्रक में लहूलुहान लोटन को देखा था, घर आकर मौहल्ले में सबको लोटन को देखने की बात बताई। उन दिनों सांयकाल वाल्मीकि मंदिर से महात्मा गाँधी के प्रवचन रेडियो पर प्रसारित होते थे। अफ़सोस ! गाँधी ने गौ-रक्षक को इस तरह बताया, "आज दिल्ली शांत रही, बस पुलिस ने एक दंगाई को गिरफ्तार कर लिया है।"  
ये वही एमके गाँधी है, जिसने अपने मुस्लिम प्रेम की खातिर देश को अनेक निर्णय धरने की धमकियों से बदलने को मजबूर किया था। बंटवारे के समय मुस्लिमों के हाथों मरने को कहा था। लेकिन अपने परिवार को किसी मुस्लिम लड़की से विवाह करने को मना किया। जब मुस्लिमों द्वारा आर्य समाजी स्वामी श्रद्धानन्द की हत्या करने पर महात्मा गाँधी ने उनका बचाव करते कहा था कि "ये मेरे भाई हत्या नहीं कर सकते।" आखिर महात्मा गाँधी ने दोगली नीति क्यों अपनाई? 
तनिष्क के विज्ञापन से शुरू हुआ विवाद 
तनिष्क के जिस विज्ञापन से में एक हिंदू महिला की गोदभराई की रस्म को दिखाया गया था। इस लड़की की शादी मुस्लिम परिवार में हुई थी। इसमें हिंदू संस्कृति को ध्यान में रखते हुए मुस्लिम परिवार सभी रस्मों रिवाजों को हिंदू धर्म के हिसाब से करता दिखाया गया था। 
विज्ञापन को लव जिहाद को बढ़ावा देने के आरोप लगने और सोशल मीडिया पर तनिष्क के बहिष्कार की अपीलों के बाद कंपनी ने विज्ञापन को वापस ले लिया। कुछ इसी तरह का विवाद होली के दौरान सर्फ एक्सेल के एक विज्ञापन को लेकर भी हुआ था।