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हलाल सर्टिफिकेट के नाम पर हिंदू एवं अन्य समुदाय के व्यापारियों का बहिष्कार, आतंकियों को फंडिंग की आशंका: FIR में साजिशों का खुलासा

                                                                                                                      साभार- दैनिक जागरण
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 17 नवम्बर 2023 को हलाल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी और जमीयत उलेमा-ए-हिन्द सहित कुछ अन्य संस्थाओं एवं लोगों पर FIR दर्ज हुई थी। इस FIR में हलाल सर्टिफिकेट को हिन्दू आस्था पर आघात बताते हुए इससे जुड़े लोगों पर कार्रवाई करने की माँग की गई थी। केस दर्ज होने के बाद उत्तर प्रदेश शासन ने अगले दिन 18 नवम्बर को हलाल के बजाय FSSAI (Food Safety and Standards Authority of India) प्रमाण पत्र को मानकों के लिए उचित बताया।

ऑपइंडिया के पास मौजूद इस केस में दर्ज हुई FIR में हलाल इंडिया के चेन्नई और मुंबई कार्यालय के साथ जमीयत उलेमा ए हिन्द के दिल्ली और मुंबई ऑफिस को नामजद किया है। इसके अलावा हलाल सर्टिफिकेट को बढ़ावा देने वाली कुछ अज्ञात कम्पनियाँ, राष्ट्र विरोधी साजिश रचने वाले कुछ अन्य अज्ञात लोग, आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा दे रहे अज्ञात समूह और जनआस्था से खिलवाड़ करने के साथ दंगे करवाने की साजिश रच रहे कुछ अज्ञात लोगों को नामजद किया गया है। ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है।

शिकायतकर्ता शैलेन्द्र कुमार ने अपनी शिकायत में बताया है कि हलाल सर्टिफिकेट मजहब के नाम पर मजहब विशेष के लोगों द्वारा जारी किया जा रहा है। इस साजिश में एक मजहब विशेष के लोगों के सामानों की बिक्री बढ़ाने के लिए हलाल के नाम पर छल किया जा रहा है। FIR में कहा गया है कि जिन कंपनियों ने इनसे हलाल सर्टिफिकेट नहीं लिया है, उनकी बिक्री घटाने के लिए आपराधिक कृत्य किया जा रहा है।

शिकायत में हलाल सर्टिफिकेट को मुस्लिमों की अपनी तरफ आकर्षित करने का खास तरीका बताया गया है। FIR में आरोप है कि हलाल सर्टिफिकेट देने वाली कंपनियों ने सरकार के नाम का भी फर्जी कागजातों से दुरूपयोग किया है। हालात सर्टिफिकेट देने वाली कंपनियों के कागजातों में भी गड़बड़ी होने की बात कही गई है। इसके साथ ही गया है कि इसके जरिए समाज में विभाजन पैदा करने की कोशिश की जा रही है।

शिकायतकर्ता ने सभी आरोपितों पर समाज में विद्वेष फैलाने, आपराधिक कृत्य कर के करोड़ों रुपए कमाने, राष्ट्र विरोधी साजिश रचने के साथ हलाल सर्टिफिकेट से मिल रहे पैसे से आतंकियों को फंडिंग होने की आशंका जताई गई है। FIR में कहा गया है कि इससे होने वाले अनुचित लाभ को देश विरोधी गतिविधियों में इस्तेमाल किया जा रहा है।

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उत्तर प्रदेश : अब जेल भेजवा देगा ‘हलाल’: निर्माण, भंडारण, वितरण, खरीद-बेच सब पर योगी सरकार ने लगा द

FIR में कहा गया है कि तेल, साबुन, टूथपेस्ट, शहद आदि तक के लिए हलाल सर्टिफिकेट दिए जा रहे हैं, जबकि इनके लिए हलाल सर्टिफिकेट की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि ये शाकाहारी वस्तुएँ हैं। शाकाहारी वस्तुओं के लिए हलाल सर्टिफिकेट की आवश्कयता नहीं होती। इसमें आगे कहा गया है कि एक विशेष वर्ग द्वारा प्रचार किया जा रहा है कि उन वस्तुओं का इस्तेमाल ना करो, जिन्हें हलाल सर्टिफिकेट नहीं दिया गया हो। इससे दूसरे वर्ग के व्यापारियों के हितों को नुकसान पहुँचाया जा रहा है।

उत्तर प्रदेश : अब जेल भेजवा देगा ‘हलाल’: निर्माण, भंडारण, वितरण, खरीद-बेच सब पर योगी सरकार ने लगा दिया बैन, कहा- ये नियमों का उल्लंघन

                                     साभार : अमर उजाया/X_ANI
उत्तर प्रदेश में अब हलाल सर्टिफिकेट के कोई मायने नहीं रह गए हैं, बल्कि ये हलाल सर्टिफिकेट वाले उत्पादों को रखने पर जेल की हवा खानी पड़ सकती है। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने तय किया है कि राज्य की सीमा के भीतर हलाल उत्पादों के उत्पादन, वितरण, भण्डारण पर संपूर्ण बैन लागू हो। इसके लिए आधिकारिक तौर पर आदेश भी जारी कर दिया गया है।

एक खास वर्ग हर सामान में ‘हलाल सर्टिफिकेट’ ढूँढता था, जिससे व्यापारिक वर्ग को वर्गीकृत ढंग से नुकसान उठाने पर मजबूर होना पड़ता था। अब ऐसा बिल्कुल नहीं चलने वाला है। 

अब चर्चा यह है कि हलाल के नाम पर व्यापारियों से जो करोड़ों की कमाई इन कट्टरपंथियों ने की है, उसकी ब्याज सहित वापसी कब होगी? इस मुद्दे पर केंद्र एवं अन्य राज्य सरकारों को भी संज्ञान लेने की जरुरत है। देश में इतना बड़ा घोटाला खुलेआम चल रहा है और सरकारें आराम से बैठी हैं? इतना ही नहीं, उन लोगों पर भी कार्यवाही हो, जिनके इशारे पर ये खुली लूट हो रही थी। 

दरअसल, उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से जारी आदेश में कहा है कि हलाल सर्टिफिकेट किसी उत्पाद की गुणवत्ता से संबंधित नहीं है। ऐसे निशान गुणवत्ता को लेकर भ्रम की स्थिति ही पैदा करते हैं। जिन उत्पादों पर इस तरह के प्रतिबंध लगाए गए हैं, उनका उल्लेख राज्य सरकार द्वारा जारी पत्र में साफ तौर पर किया गया है।

इस पत्र में बताया गया है कि डेरी उत्पाद, चीनी, बेकरी उत्पाद, पिपरमिंट ऑयल, रेडी टू ईट सेवरीज व खाद्य तेल आदि के लेबल पर हलाल प्रमाणन का उल्लेख किया जा रहा है, जो कि गलत है। उत्तर प्रदेश सरकार का कहना है कि इन उत्पादों के लिए एफएसएसएआई (Food Safety and Standards Authority of India) प्रमाण पत्र ही काफी है।

उत्तर प्रदेश सरकार के खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रसाधन विभाग की आयुक्त अनीता सिंह द्वारा जारी पत्र में साफ तौर पर लिखा गया है कि उत्तर प्रदेश राज्य की सीमा में हलाल प्रमाणन युक्त खाद्य उत्पादों के निर्माण, भण्डारण, वितरण एवं विक्रय पर (निर्यातक के लिए निर्यात हेतु उत्पादित खाद्य पदार्थ को छोड़कर) तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगाया जाता है।

इसका मतलब है कि ये पदार्थ अगर दूसरे देशों में भेजे जाने के लिए उत्पादित किए जा रहे हैं, तब इन पर सरकार रोक नहीं लगाएगी, लेकिन ऐसे पदार्थ अगर राज्य की सीमा में मिले, तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी तय है।

एएनआई द्वारा जारी यूपी सरकार के आदेश में कहा गया है, “सार्वजनिक स्वास्थ्य के हित में उत्तर प्रदेश में हलाल प्रमाणित खाद्य पदार्थों के उत्पादन, भंडारण, वितरण और बिक्री पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगा दिया गया है।”

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उत्तर प्रदेश : अब नहीं बिकेंगे हलाल प्रोडक्ट? योगी ने दिए कार्रवाई के निर्देश; क्या यह कोई महाघो

योगी आदित्यनाथ की सरकार द्वारा ये आदेश तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है। अब सूची में शामिल किसी भी वस्तु पर हलाल सर्टिफिकेट या ठप्पा मिला, तो उस पर कार्रवाई होनी तय है।

उत्तर प्रदेश : अब नहीं बिकेंगे हलाल प्रोडक्ट? योगी ने दिए कार्रवाई के निर्देश; क्या यह कोई महाघोटाला है?

कई वर्षों से देश में हलाल सर्टिफिकेशन पर प्रतिबन्ध की मांग हो रही है, लेकिन पिछली सरकारों ने मुस्लिम तुष्टिकरण के चलते अपने खाद्य पदार्थों को प्रमाणित करने वाले संस्थानों को बौना बनाकर कट्टरपंथियों के निजी संस्थानों को सर्टिफिकेशन का काम सौंप दिया था। चर्चा है कि इस आड़ में यही संस्थाएं आतंकवादियों को आर्थिक सहायता प्रदान कर रही हैं। इसी कारण देश में आतंकवाद समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा। कौन-सी चीज शुध्द है अथवा नहीं, इसको प्रमाणित का काम ISI सरकारी संस्थान का किसी मुस्लिम संगठन का नहीं। जो धन सरकारी तिजोरी में आना चाहिए, वह निजी संस्थानों की तिजोरियों में जा रहा है। जिसे दिल्ली शराब घोटाले के समान बड़े घोटाले का नाम दिया जाए तो कोई अतिशियोक्ति नहीं होगी। किस सरकार ने इसकी अनुमति दी? गंभीर जाँच अति आवश्यक है। संभव हो एक लम्बी कड़ी सामने आए।  

उत्तर प्रदेश में हलाल सर्टिफिकेशन से जुड़े उत्पादों की बिक्री पर जल्द प्रतिबंध लग सकता है। बताया जा रहा है कि इस मामले पर खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संज्ञान लिया है। प्रदेश में हलाल सर्टिफिकेशन को धंधा बनाकर चलाने वाली उन कंपनियों पर कार्रवाई की शुरुआत हो गई है, जो तेल, साबुन, टूथपेस्ट, मधु समेत कई अन्य शाकाहारी उत्पादों को भी हलाल प्रमाण पत्र दे रही हैं।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, हलाल सर्टिफिकेशन देने वाली 9 कंपनियों पर लखनऊ में एफआईआर दर्ज कराई गई है। ये शिकायत शैलेंद्र शर्मा ने अज्ञात कंपनियों पर करवाई है। इनके विरुद्ध आईपीसी की धारा 120 b/ 153A/ 298/ 384 /420 /467/ 468 /471/ 505 के तहत केस दर्ज हुआ है।

एफआईआर में हलाल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड चेन्नई, जमीयत उलेमा हिन्द हलाल ट्रस्ट दिल्ली, हलाल काउंसिल ऑफ इंडिया मुम्बई, जमीयत उलेमा महाराष्ट्र मुम्बई आदि का नाम है। इन संस्थाओं पर आरोप है कि ये एक मजहब के नाम पर कुछ उत्पादों पर हलाल प्रमाणपत्र दे रहे हैं जबकि ये देने का उनका अधिकार नहीं है। खान-पान के उत्पादों की गुणवत्ता आदि के प्रमाण पत्र के लिए एफएसएसएआई व आईएसआई जैसी संस्थाओं को अधिकृत किया गया है।

शिकायतकर्ता ने आशंका जताई है कि इन सबके पीछे आपराधिक षड्यंत्र वजह हो सकती है। जहाँ हलाल सर्टिफिकेट के नाम पर इकट्ठा हो रही अवैध कमाई से आतंकवादी संगठन व राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को फंडिंग की जा रही हैं। या फिर इसके जरिए उन कंपनियों को वित्तीय नुकसान पहुँचाने का प्रयास हो रहा है जो ऐसे हलाल सर्टिफिकेशन के साथ सामान नहीं बेचतीं।

हलाल क्या होता है?

इस्लाम मजहब के अनुसार, हलाल का मतलब जायज होता है। खाद्य व सौंदर्य उत्पाद पर जब हलाल सर्टिफाइड लिखा जाता है तो उसका अर्थ होता है कि वो उत्पाद मुस्लिमों के इस्तेमाल योग्य है क्योंकि उसमें ऐसा कुछ नहीं डाला गया है जो उनके मजहब में हराम है।
इस्लामी देशों में कोई भी प्रोडक्ट एक्सपोर्ट करने के लिए ये हलाल सर्टिफिकेशन जरूरी होता है। हालाँकि भारत में शाकाहारी वस्तुओं पर इसका प्रयोग क्यों किया जा रहा, ये बात अब तक नहीं समझ आई है। पिछले दिनों भारतीय रेलवे में यात्रा करते वक्त एक यात्री ने इस पर सवाल खड़ा किया था कि उसकी चाय के पैकेट पर हलाल क्यों लिखा है। इस घटना की वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी, उसी के बाद ये पूरा मुद्दा संज्ञान में आया।

कर्नाटक : हलाल बैन करने वाला पहला राज्य हो सकता है : बिल लाने की तैयारी, विधानसभा में सावरकर की तस्वीर से कांग्रेस चिढ़ी

                                    सीएम बोम्मई, हलाल और सावरकर (साभार: हिंदुस्तान और ANI)
कर्नाटक की भाजपा ने राज्य में हलाल मांस (Anti Halal Bill) की प्रतिबंधित करने के लिए विधानसभा में बिल लाने का निर्णय किया है। अगर यह बिल सदन में पास हो जाता है और कानून लागू हो जाता है तो कर्नाटक भारत का पहला राज्य बन जाएगा, जो हलाल मीट पर प्रतिबंध लागू करेगा। हालाँकि, इस बिल को लेकर हंगामा होने के आसार हैं, क्योंकि कांग्रेस ने इसका विरोध किया है।

दूसरी ओर, विधानसभा में विनायक दामोदर सावरकर (Vinayak Damodar Savarkar) के चित्र के अनावरण को लेकर कांग्रेस ने बसवराज बोम्मई सरकार (Basavaraj Bommai Government) के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया है। चित्र का अनावरण कर्नाटक विधानसभा के अध्यक्ष विश्वेश्वर हेगड़े कागेरी ने किया।

भाजपा के विधान पार्षद एन रविकुमार ने इस बिल को सदन में लाने की पहल की है। इसमें भारतीय खाद्य सुरक्षा और सुरक्षा संघ (FSSAI) के अलावा किसी अन्य संस्था के खाद्य प्रमाणन पर प्रतिबंध लगाने की बात कही गई है। इस संबंध में रविकुमार ने इस संबंध में राज्यपाल थावरचंद गहलोत को लिखा था।

रविकुमार ने इसे निजी विधेयक के रूप में पेश की का विचार किया था, लेकिन अब वे इसे सरकारी विधेयक के रूप में पेश कर सकते हैं। कहा जा रहा है कि पार्टी नेतृत्व के समर्थन और सहयोग के बाद उन्होंने इसे सरकारी विधेयक के रूप में पेश करने की योजना बनाई है।

रविकुमार ने कहा कि बाजार को अवैध रूप से नियंत्रित करने के लिए कुछ अनधिकृत संस्थाएँ खाद्य प्रमाणन के काम जुटी हुई हैं। इसको खत्म करने के प्रयास के तहत इस विधेयक को सदन में पेश किया जाएगा। वहीं, कांग्रेस ने इस प्रस्तावित विधेयक का विरोध किया है।

परिषद में कांग्रेस के विपक्ष के नेता बीके हरिप्रसाद ने कहा कि पार्टी ने सदन के अध्यक्ष से इस बिल को मंजूर नहीं करने का आग्रह किया है। उन्होंने कहा कि यह भाजपा की एक रणनीति है। इसके आधार पर वह मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने का प्रयास कर रही है।

इस साल अप्रैल में भी हलाल मीट को लेकर कर्नाटक में बवाल हुआ था। हिन्दू संगठनों ने उगादी उत्सव के दौरान हलाल मांस का बहिष्कार करने की अपील की थी। बता दें कि हलाल मीट को लेकर देश भर में बहस होती रही है और इसे जानवरों के प्रति क्रूरता कहा जाता है।

हलाल अरबी भाषा का शब्द है। हलाल प्रक्रिया में जानवर के श्वसन नली को थोड़ा सा काट कर छोड़ दिया जाता है। इससे वह लंबे समय तक तड़पता रहता है। इस्लाम में जानवरों के हलाल करने के बाद ही उसे खाने की बात कही गई है। इसलिए मुस्लिम समुदाय हलाल पर जोर देता है।

हलाल में जानवर को मारने की क्रूर प्रक्रिया के कारण नीदरलैंड, जर्मनी, स्पेन, साइप्रस, ऑस्ट्रिया, ग्रीस और बेल्जियम में इस पर बैन लगाया गया है। साल 2021 में बेल्जियम ने हलाल पर प्रतिबंध लगाते हुए नियम कहा था जानवरों को मारने से पहले अनिवार्य रूप से उसे पहले बेहोश किया जाए। इससे हलाल मांस पर अपने आप रोक लग जाए।

‘हिन्दुओं पर क्यों थोपा जा रहा हलाल? Haldiram’s जैसी कंपनी भी सर्टिफिकेट लेने को मजबूर’: ‘हलाल फ्री दिवाली’ का आह्वान

                       ट्विटर पर ट्रेंड हुआ 'हलाल फ्री दीवाली', हिंदू संगठन भी कर रहे हैं आंदोलन

                                                                                      (फोटो साभार: umanagraj का ट्विटर अकाउंट)
18 अक्टूबर, 2022 को सुबह से ही #Halal_Free_Diwali (हलाल फ्री दिवाली) ट्विटर पर ट्रेंड कर रहा है। ऐसा कहा जा रहा है कि ‘हलाल’ प्रोडक्ट का सहारा लेकर करोड़ों रुपए जुटाए जा रहे हैं और इसका उपयोग मजहबी विस्तार और देश विरोधी गतिविधियों में किया जा रहा है।

दरअसल, वर्तमान समय में सोशल मीडिया अभिव्यक्ति का सबसे बेहतरीन माध्यम है। ऐसे में, हिन्दू अपने पवित्र त्योहार दिवाली के पहले ट्विटर पर #Halal_Free_Diwali कैम्पेन चला रहे हैं। इस कैम्पेन के जरिए लोग अपने त्योहार को ‘हलाल’ का प्रमाण-पत्र प्राप्त करने वाले उत्पादों से दूर रखना चाहते हैं।

हलाल फ्री दिवाली कैम्पेन में फूड चैन और डिलीवरी एप्स चलाने वाली कंपनियों को भी निशाना बनाते हुए ट्वीट्स किए गए हैं। इन कम्पनियों से पूछा जा रहा है कि आखिर हिंदुओं पर हलाल प्रोडक्ट क्यों थोपा जा रहा है?

हलाल फ्री दिवाली को लेकर अभियान चला रहे हिन्दू संगठन ‘हिंदू जनजागृति समिति’ ने भी हिंदुओं से हलाल उत्पादों का बहिष्कार करने का आह्वान किया है। संगठन ने दावा किया है कि इस साल की दिवाली ‘हलाल’ फ्री होगी।

                               बेंगलुरु में ‘हलाल फ्री दिवाली ‘ को लेकर हिंदू जनजागृति समिति ने किया आंदोलन

इस अभियान को लेकर हिंदू जनजागृति समिति के राष्ट्रीय प्रवक्ता रमेश शिंदे ने कहा है कि हलाल उत्पादों का विरोध और इसका बहिष्कार महाराष्ट्र और कर्नाटक में शुरू हो गया है और धीरे-धीरे यह पूरे देश में फैल जाएगा। समिति ने बेंगलुरु में केएफसी और मैकडोनाल्ड रेस्टॉरेंट्स के बाहर ‘हलाल प्रोडक्ट’ के खिलाफ प्रदर्शन किया है।

उन्होंने यह भी पूछा कि दिवाली अंधेरे से उजाले की ओर ले जाने वाला त्योहार है, ऐसे में क्या हम इस त्योहार अपने देश और धर्म को अंधेरे में लेकर जाएँगे? उन्होंने बताया कि कैसे जिस तरह से चीन भारत में अपनी वस्तुएँ बेचकर हमारे देश और जवानों के खिलाफ षड्यंत्र कर रहा है, उसी प्रकार हलाल इकोनॉमी भारत के खिलाफ जिहाद को बढ़ावा दे रही है। साथ ही कहा कि आज इसी हलाल इकॉनमी के बल पर देश में आतंकवादियों का काम चल रहा है।

रमेश शिंदे ने सवाल किया है कि पिज्जा हट, केएफसी या मैकडॉनल्ड्स जैसे फूड आउटलेट केवल हलाल खाना ही क्यों परोसते हैं? उन्होंने सवाल दागा कि हिंदू ग्राहकों को हलाल खाना ही खाने के लिए मजबूर क्यों किया जा रहा है। जहाँ हलाल खाना परोसा जाता है, वहाँ पोर्क और पेपरोनी पिज्जा नहीं परोसा जाता है, आखिर ऐसा भेदभाव क्यों?

उन्होंने यह भी कहा है कि सभी मानदंड केवल हिंदुओं के लिए ही क्यों हैं। हिंदू देश की आबादी का 80 प्रतिशत है फिर भी उनके लिए ये हलाल मानदंड हैं। उन्होंने आगे कहा कि हलाल सर्टिफिकेट देना अवैध है। उन्होंने कहा कि इसे हटाने के लिए हमें संघर्ष करना होगा और सरकार की ओर से ऐसा कोई सर्टिफिकेट जारी नहीं किया गया है। उन्होंने जानकारी दी कि सरकार के केवल दो विभाग जो खाद्य लाइसेंसिंग करते हैं, वे एफएसएसएआई और एफडीए हैं और यह हलाल सार्टिफिकेट अवैध है। हलाल सार्टिफिकेट केवल मांस के निर्यात के लिए है, न कि देश में हो रहे अन्य खाद्य उत्पादों के लिए।

वहीं, एक अन्य हिन्दू संगठन ‘श्री राम सेना’ के प्रमुख प्रमोद मुतालिक ने ‘हलाल फ्री दीपावली’ उत्सव का आह्वान करते हुए कहा है कि मुस्लिम व्यापारियों और विक्रेताओं से ‘पूजा सामग्री’ खरीदना शास्त्रों के खिलाफ होगा।

उन्होंने कहा कि मुस्लिम विक्रेताओं से ‘पूजा सामग्री’ खरीदना हिंदू संस्कृति और परंपरा के खिलाफ होगा। हम हिंदुओं से पूजा के लिए आवश्यक सामग्री जैसे गन्ना, फूल, फल और केले के पौधे मुस्लिम विक्रेताओं से नहीं खरीदने का आग्रह करेंगे। हिन्दू, पूजन सामग्री हिन्दू व्यापारियों से ही खरीदें।

हलाल सर्टिफिकेशन को बड़ा घोटाला बताते हुए प्रमोद मुतालिक ने कहा कि इसे सरकारी मान्यता नहीं होने के बस भी इसे हिंदुओं पर थोपा जा रहा है। मुस्लिम संगठन ‘जमात-ए-उलेमा-हिंद हलाल ट्रस्ट’ दवाओं, भोजन और अन्य वस्तुओं पर हलाल सर्टिफिकेट जारी कर रहा है। हल्दीराम जैसी बड़ी कंपनी के भी 140 से अधिक प्रोडक्ट हलाल सार्टिफिकेट के अंतर्गत हैं।

झटका Vs हलाल मीट

‘झटका‘ हिन्दुओं, सिखों आदि भारतीय, धार्मिक परम्पराओं में ‘बलि/बलिदान’ देने की पारम्परिक पद्धति है। इसमें जानवर की गर्दन पर एक झटके में वार कर रीढ़ की नस और दिमाग का सम्पर्क काट दिया जाता है, जिससे जानवर को मरते समय दर्द न्यूनतम होता है। इसके उलट हलाल में जानवर की गले की नस में चीरा लगाकर छोड़ दिया जाता है, और जानवर खून बहने से तड़प-तड़प कर मरता है।
इसमें भी बड़ी बात यह है कि किसी मांसाहारी प्रोडक्ट के हलाल होने का मतलब यह होता है कि जानवर को मुस्लिमों द्वारा ही काटा जाना चाहिए। यदि किसी और के द्वारा काटा जाता है तो इसे मुस्लिम गैर-हलाल बताते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि हलाल और गैर-हलाल मांस के चलते लगभग सभी बूचड़खानों में केवल मुस्लिमों को ही नौकरी में रखा जाता है। इसका कारण यह है कि कोई भी हलाल और गैर-हलाल के लिए अलग-अलग बूचड़खाने खोलना अपेक्षाकृत महंगा साबित होगा।
‘हलाल उद्योग’ कोई छोटा-मोटा उद्योग नहीं है। वास्तव में, यह 3 अरब डॉलर से अधिक की कमाई वाला उद्योग है, जहाँ सिर्फ हलाल माँस के लिए मुस्लिमों को काम पर रखा जाता है। इसी हलाल के चलते ऐसे लाखों लोग खासतौर से दलित वर्ग के लोग जो परंपरागत रूप से ‘कसाई’ का काम करते आ रहे हैं, वह बेरोजगार हो चुके हैं।
‘Dr. झटका’ और ‘King of झटका revolution’ कहे जाने वाले रवि रंजन सिंह ने ऑपइंडिया से बात करते हुए ‘हलाल’ के आर्थिक पहलू की बात की थी। उन्होंने समझाते हुए कहा था कि किसी भी भोज्य पदार्थ, चाहे वे आलू के चिप्स क्यों न हों, को ‘हलाल’ तभी माना जा सकता है जब उसकी कमाई में से एक हिस्सा ‘ज़कात’ में जाए- जिसे वे जिहादी आतंकवाद को पैसा देने के ही बराबर मानते हैं।
दिक्कत ये है कि हमारे पास यह जानने का कोई ज़रिया नहीं है कि ज़कात के नाम पर गया पैसा ज़कात में ही जा रहा है या जिहाद में। और जिहाद काफ़िर के खिलाफ ही होता है- जब तक यह इस्लाम स्वीकार न कर ले! ‘हलाल इंडिया’ के एक उच्चाधिकारी ने शाकाहारी खाद्य पदार्थों को ‘हलाल सर्टिफिकेट’ देने की प्रक्रिया के बारे में बताते हुए कहा था कि उनके अधिकारी फैक्ट्रियों तक जाते हैं और ये भी पता करते हैं कि रॉ-मैटेरियल्स कहाँ से आते हैं।

भारत में भी ‘हलाल’ से क्यों हारे झटका? हिन्दुओं से छिनता है रोजगार, सिखों में वर्जित

कर्नाटक में शुरू हुए हलाल विवाद ने देश के बाकी हिस्सों में भी तीखी बहस छेड़ दी है। एक हफ्ते पहले, हिंदू जनजागृति समिति ने हलाल मांस के खिलाफ एक आंदोलन शुरू किया और हलाल उत्पादों के बहिष्कार का आह्वान किया।

हिंदू जनजागृति समिति कर्नाटक के प्रवक्ता ने एक वीडियो जारी किया था जिसमें दावा किया गया था कि मांस को हलाल के रूप में प्रमाणित करने के लिए हजारों करोड़ रुपए एकत्र किए जा रहे हैं, जिनका दावा है कि इससे भारत के इस्लामिक राज्य बनाने की रूपरेखा तैयार की जा रही है। गौड़ा ने तर्क दिया कि इस पैसे का इस्तेमाल पूरे भारत में राज्य के खिलाफ राष्ट्र विरोधी साजिशों के लिए किया जाता है।

मोहन गौड़ा ने ट्विटर पर जारी वीडियो में आग्रह किया, “हम सभी हिंदुओं से हलाल मांस, हलाल उत्पादों का बहिष्कार करने और झटका मांस का उपयोग करने का आग्रह करते हैं। आइए हम हलाल जैसी राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के आर्थिक बहिष्कार में भाग लें।”

जैसे ही हलाल बनाम झटका मांस विवाद बढ़ता है, देखते ही देखते एक राष्ट्रीय बहस में बदल जाता है। ऐसे में यह समझना आवश्यक हो जाता है कि हलाल क्या है, झटका क्या है और भारत में भी हलाल की चर्चा इतनी क्यों है? यह समझना भी अनिवार्य होता जा रहा है कि भारत को झटका मांस के लिए एक बाजार विकसित करने में किन-किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिससे देश के गैर-मुस्लिमों को लाभ होगा।

हलाल मांस और शाकाहारी उत्पादों के लिए ‘हलाल’ प्रमाणीकरण क्या है?

हलाल मांस में जानवरों को मारने और पैकेजिंग की एक विधि है जो इस्लामी तौर-तरीकों और मजहबी मूल्यों के अनुरूप है। हलाल केवल एक मुस्लिम आदमी ही कर सकता है। इस प्रकार, गैर-मुस्लिमों को हलाल फर्म में रोजगार से स्वचालित रूप से वंचित कर दिया जाता है। कुछ अन्य शर्तें हैं जिन्हें पूरा किया जाना चाहिए जो यह स्पष्ट करता है कि यह आंतरिक रूप से एक इस्लामी प्रथा है। भारत में हलाल के प्रमाणन प्राधिकरण की आधिकारिक वेबसाइट पर दिशानिर्देश उपलब्ध हैं जो यह स्पष्ट करता है कि गैर-मुस्लिम कर्मचारियों को हलाल प्रक्रिया के किसी भी हिस्से में नियोजित नहीं किया जा सकता है।
यूरोपीय संघ के हलाल प्रमाणन विभाग का कहना है, “हलाल के समय अल्लाह के नाम का उल्लेख (उल्लेख) किया जाना चाहिए: बिस्मिल्लाह अल्लाह-हू-अकबर। (अल्लाह के नाम पर, अल्लाह सबसे बड़ा है।) यदि हलाल के समय अल्लाह के अलावा किसी और का नाम लिया जाता है (यानी उसके लिए जानवर की बलि दी जाती है), तो मांस हराम हो जाता है।
हलाल प्रमाणन विभाग हलाल की सटीक इस्लामी पद्धति को भी निर्दिष्ट करता है। इसमें कहा गया है कि जानवर की हत्या सिर्फ एक झटके में बिना चाकू उठाए, तेज चाकू से किया जाना चाहिए। यह कहता है कि श्वासनली (गला), भोजन-पथ (ग्रासनली) और दो गले की नसों को एक ही झटके में काट देना चाहिए। इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि सिर न टूटे और रीढ़ की हड्डी न कटी। नियम यह भी कहते हैं कि मशीन द्वारा काटा गया मांस हलाल नहीं हो सकता, इसे एक मुस्लिम व्यक्ति द्वारा ही हलाल किया जाना चाहिए।
हलाल प्रक्रिया केवल काटे जाने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि पैकेजिंग, शिपिंग आदि तक भी है। इसलिए, पूरी श्रृंखला में, यदि मांस हलाल है, तो इसे इस्लामी तौर-तरीकों के अनुरूप बनाने के लिए केवल मुस्लिमों को काम पर रखा जाएगा और अल्लाह का नाम लिया जाएगा।
केवल मांस ही नहीं शाकाहारी उत्पादों के लिए भी हलाल प्रमाणन दिया जाता है। आटा, गेहूँ आदि उत्पादों को भी हलाल प्रमाणीकरण के साथ देखा जाता है। इस विशेष उदाहरण में प्रमाणन प्राधिकरण, हलाल इंडिया का कहना है कि प्रसंस्कृत भोजन को हलाल माना जाता है यदि यह शरिया कानून के अनुसार ‘नाजिस’ मानी जाने वाली सामग्री से दूषित नहीं होता है। इसके अलावा, इसके उत्पादन के लिए उपयोग किए जाने वाले उपकरण भी ‘नाजिस’ नहीं होने चाहिए। शरिया कानून के अनुसार ‘नाजिस’ ऐसे मिलावटी पदार्थ हैं जो किसी उत्पाद को अशुद्ध बनाते हैं। शराब, कुत्ते, सूअर और जानवरों के दूध जैसे पदार्थ मुस्लिमों को पीने की अनुमति नहीं है और ऐसी अन्य चीजों को ‘नाजिस’ माना जाता है।

क्या है झटका मांस?

सीधे शब्दों में कहें, झटका, जैसा कि शब्द से पता चलता है, का अर्थ है “तेज”। वध की झटका विधि में, पशु को बिना किसी कष्ट के तुरंत मार दिया जाता है, जैसा कि वध की हलाल प्रक्रिया में होता है। झटका में, जानवर का सिर तुरंत काट दिया जाता है और इसलिए, इसमें धीरे-धीरे मौत के घाट नहीं उतारा जाता है। हलाल और झटका के बीच एक और महत्वपूर्ण अंतर यह है कि झटका की कोई धार्मिक प्रक्रिया नहीं है और इसलिए, धार्मिक संबद्धता की परवाह किए बिना हर कोई इसका सेवन कर सकता है।
झटका का मूल विचार जानवर को कम से कम यातना देकर मारना है।

हलाल भेदभावपूर्ण कैसे है? हिंदुओं को रोजगार नहीं, सिखों को हलाल खाने की इजाजत नहीं

हलाल स्वाभाविक रूप से कई मायनों में भेदभावपूर्ण है। यह ध्यान रखना सबसे महत्वपूर्ण है कि मांस उद्योग में, यदि कोई कंपनी हलाल प्रमाणित मांस का उत्पादन करती है, तो वे पशु को मारने के लिए गैर-मुस्लिमों को काम पर नहीं रख सकते हैं। यह देखते हुए कि कई हाशिए पर रहने वाले हिंदू भी मांस उद्योग में काम करते हैं, लेकिन केवल यह शर्त कि मुस्लिम ही जानवर हलाल कर सकते हैं, उद्योग में शामिल हिंदुओं के प्रति भेदभावपूर्ण हो जाता है।
इसके अलावा, यह गैर-मुस्लिमों पर इस्लामी सिद्धांतों को लागू करता है। एक गैर-मुस्लिम, उदाहरण के लिए एक हिंदू या सिख – को अल्लाह का नाम लेने के बाद हलाल मांस खाने के लिए मजबूर किया जाता है। यह गैर-मुस्लिमों के अधिकारों के खिलाफ है, जिन्हें इस्लाम के मजहबी सिद्धांतों का पालन करने के लिए मजबूर किया जाता है, जिसका वे आमतौर पर पालन नहीं करते हैं।
इसके अलावा, सिख विशेष रूप से हलाल मांस का सेवन अपनी धार्मिक मान्यताओं के हिस्से के रूप में नहीं करते हैं।
सिख हलाल प्रक्रिया को “कुट्टा” (Kuttha) कहते हैं, जिसका अर्थ है धीमी, दर्दनाक प्रक्रिया में जानवर को मारने के बाद प्राप्त मांस।
सिख इनसाइक्लोपीडिया कहता है:
ऐतिहासिक रूप से, गुरुओं द्वारा निर्धारित झटका मोड को लागू करने के लिए कोई सकारात्मक निषेधाज्ञा नहीं है। हालाँकि, गुरु गोबिंद सिंह ने 1699 में खालसा के आदेश को प्रकट करते हुए, सिखों को मुस्लिम शासक वर्ग द्वारा शुरू किए गए कुट्टा या हलाल भोजन से परहेज करने का आदेश दिया। ‘आसा की वर’ में गुरु नानक देव के एक श्लोक से पता चलता है कि कई उच्च कोटि के हिंदू कुट्टा खाने की प्रथा के आगे झुक गए थे, “वे इस्लामी शब्दों के उच्चारण के साथ मारे गए बकरियों का कुट्टा खाते हैं, यानी कलिमा, लेकिन किसी दूसरे को कभी अनुमति नहीं देते थे जो उनके खाना पकाने वाले वर्ग में प्रवेश करने कर सके (स्पर्श द्वारा नाजिस से बचाव के लिए)” वध के झटका विधि के बारे में निर्देश सिखों के लिए विभिन्न रहितंडमा या आचार संहिता और अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान लिखे गए सिख इतिहास में संगृहीत हैं।
वे सभी इस बात की पुष्टि करते हैं कि गुरु गोबिंद सिंह ने चार प्रमुख कुराहितों में से एक, या सिख आचार संहिता का उल्लंघन किया। हालाँकि, इनमें से दो स्रोत सकारात्मक रूप से कहते हैं, “यदि आप खाना चाहते हैं तो बकरों को झटका तरीके से मारें, लेकिन कभी किसी अन्य प्रकार के मांस को न खाएँ।” {भाई देसा सिंह का रहितनामा,), और “बकरों का वध झटका के माध्यम से होना चाहिए। कैरियन या कुत्था के पास मत जाओ” (रतन सिंह भारिगु, प्रद्चम पंथ प्रकाश)। भाई देसा सिंह का रहितनामा भी वध को रसोई से दूर ले जाने का आदेश देता है। परंपरागत रूप से, यह एक पवित्र स्थान से दूर होना भी है।
इसलिए, हलाल न केवल हिंदुओं बल्कि सिखों और अन्य गैर-मुस्लिम संप्रदायों के लिए भी भेदभावपूर्ण हो जाता है।

झटका की माँग करने वाले हिंदुओं से पूछे गए कुछ फालतू के सवाल

हिंदुओं और सिखों, विशेषकर हिंदुओं ने झटका मांस पर जोर नहीं दिया क्योंकि हिंदुओं में धार्मिकता और जागरूकता कम है।
सबसे पहले, यह याद रखना आवश्यक है कि हिंदू धर्म में पशु वध के लिए वर्णित एक बहुत ही विनियमित और सख्त प्रक्रिया है, जिसके बाद शाक्त संप्रदाय हैं। पशुबली हिंदू धर्म में कुछ संप्रदायों द्वारा उन आवश्यक धार्मिक प्रथाओं में से एक है और यह उन लोगों के खिलाफ इस्तेमाल किए जाने वाले तर्कों में से एक है जो वध की हलाल प्रक्रिया के दौरान जानवरों के साथ हुई क्रूरता के बारे में बात करते हैं। जो प्रश्न अक्सर इधर-उधर उछाला जाता है, वह है – “पशुबली के दौरान भी हिंदू जानवरों का वध करते हैं। तो क्या हिंदू और सिख हलाल के खिलाफ हैं क्योंकि वे इस्लामोफोबिक हैं?”
इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए, यह जानना आवश्यक है कि धार्मिक और व्यवहार दोनों में, वध की इस्लामी पद्धति बर्बर है जो कि पशुबली में नहीं है। पशुबली की धार्मिक अवधारणा इस आधार पर है कि यह देवता को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है और स्वयं देवता की आज्ञा के तहत, वध इस तरह से किया जाता है कि पशु की पीड़ा कम से कम हो।
पाशुबली के सवाल के अलावा, हिंदुओं से अक्सर पूछा जाता है, ‘किस शास्त्र में यह लिखा है कि केवल झटका ही खाना चाहिए, हर बार हलाल बनाम झटका बहस फिर से जीवित हो जाती है।
ये मुखर तर्क हैं जिन्हें हिंदुओं और सिखों को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। ये प्रश्न अब्राहमिक मजहबों से उपजे हैं जहाँ मजहबी ग्रंथों में किसी चीज़ को विशेष रूप से अनुमति या अस्वीकार करना होता है। हिंदू धर्म एक किताब और “एक पैगंबर, एक अल्लाह” अवधारणा पर आधारित नहीं है, इसलिए कई चीजें हैं जो पारंपरिक रूप से हिंदू धर्म के लिए आवश्यक हैं, जरूरी नहीं कि ग्रंथों में इसका उल्लेख किया गया हो। उदाहरण के लिए, किसी भी हिंदू शास्त्र में खतना की विशेष रूप से मनाही नहीं है। तो क्या इसका मतलब यह है कि सभी हिंदू केवल इसलिए खतना करवाएँगे क्योंकि इसकी मनाही नहीं है?
हिंदू धर्म में “हराम” की अवधारणा नहीं है, लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि हिंदुओं को उस मजहब के सिद्धांतों का पालन करने के लिए मजबूर किया जाना चाहिए जिसका वे पालन नहीं करते हैं। सिर्फ इसलिए कि हमारे ग्रंथ हिजाब को मना नहीं करते हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि हिंदुओं को इसे पहनने के लिए मजबूर होना चाहिए। इसी तरह, भले ही हिंदू धर्म में हलाल को विशेष रूप से अस्वीकार नहीं किया गया हो, इसका मतलब यह नहीं है कि हिंदुओं को इस्लामी सिद्धांतों के तहत होने के लिए मजबूर किया जाना चाहिए।

क्या हलाल सर्टिफिकेशन मार्केट सिर्फ इसलिए विकसित हुआ क्योंकि मुस्लिम हलाल पर जोर देते हैं?

मोटे तौर पर हाँ, लेकिन एक बड़ा कारक निर्यात है। किसी भी व्यावसाय को संस्थागत बनाने के लिए, उसे औद्योगिक स्तर पर शुरू करने की आवश्यकता होती है। मांस के निर्यात में औद्योगिक पैमाने पर केवल स्थानीय दुकानों के एक समूह के एक साथ आने से निर्यात की माँग पूरी नहीं हो सकती है। इसके लिए एक बड़े पैमाने की आवश्यकता होती है और यह अपने स्वयं के सिस्टम विकसित करता है। निर्यात उद्देश्यों के लिए बड़े बूचड़खाने स्थापित किए गए थे। कई देश जहाँ भारतीय मांस कंपनियाँ व्यापार के तहत निर्यात करती हैं, वे हलाल प्रमाणपत्र चाहते हैं क्योंकि वे मुस्लिम देश हैं, और इसके कारण कई बड़ी कंपनियों को हलाल प्रमाणपत्र प्राप्त करना हुआ। दशकों से पूरी व्यापार आपूर्ति श्रृंखला हलाल प्रमाणन को ‘सामान्य’ और ‘मानकीकृत’ करती चली गई। इसका मतलब यह हुआ कि ऐसे बूचड़खानों में केवल मुस्लिम कसाइयों को ही रखा जा सकता है क्योंकि हलाल प्रमाण पत्र प्राप्त करने की यह एक शर्त है।

जब तक हम झटका मांस का निर्यात नहीं कर रहे हैं, तब तक झटका प्रमाणन नहीं हो सकता है?

ज़रुरी नहीं। विवादास्पद मुद्दा ‘व्यापार का औद्योगिक पैमाना’ है। यदि झटका मांस की माँग में अचानक वृद्धि होती है और जहाँ हिंदू और सिख उपभोक्ता झटका मांस पर जोर देते हैं, कंपनियाँ खुशी से झटका प्रमाणीकरण के लिए भी बाध्य होंगी। झटका प्रमाणन प्रणाली में पहले से ही कुछ बहुत छोटे संगठन हैं लेकिन कुछ बड़े संगठनों को माँग होने पर इस तरह के प्रमाणीकरण की आवश्यकता और आपूर्ति को आसान और जरूरी बनाने की जरूरत है।
झटका प्रमाणन प्राधिकरण, उदाहरण के लिए, रवि रंजन सिंह के नेतृत्व में, एक ऐसा झटका प्रमाणन प्राधिकरण है जो हलाल की मोनोपॉली को तोड़ने की कोशिश कर रहा है।

यह माँग और आपूर्ति का खेल है: जरूरत इस बात की है कि झटके की माँग बढ़े?

काश यह इतना आसान होता। जबकि हिंदुओं और सिखों की माँग निश्चित रूप से कंपनियों को बदलने के लिए प्रेरित करेगी, खुद कंपनियों से बड़ा प्रतिरोध होगा क्योंकि संस्थागत प्रणालियों और प्रक्रियाओं ने हलाल प्रक्रिया को आंतरिक कर दिया है। इसका मतलब होगा कि विशेष बूचड़खाने की स्थापना जहाँ झटका नियमों के अनुसार वध होता है। यानी इंफ्रास्ट्रक्चर और मैनपावर में निवेश। कंपनियाँ इस बुनियादी ढाँचे और आपूर्ति श्रृंखला को बनाने पर पैसा खर्च करने के बजाय कुछ मीडिया घरानों को झटका के लिए ब्रांड की माँग को स्थापित करने के रूप में निवेश के तौर पर पैसा दे सकती हैं।

हमें झटके की जरूरत क्यों है? यह सिर्फ एक प्रमाण पत्र है? चलो हलाल ही खाते हैं, क्या नुकसान?

खैर, हलाल से संबंधित कई पहलू हैं जो इसे समस्याग्रस्त बनाते हैं और कुछ ऐसा जो गैर-मुस्लिमों को एक वैकल्पिक प्रणाली विकसित करने की आवश्यकता है। सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण, हलाल बेहद भेदभावपूर्ण है। जैसा कि लेख की शुरुआत में बताया गया है, हलाल न केवल हिंदुओं के लिए भेदभावपूर्ण है, यह देखते हुए कि वे केवल मुस्लिमों को काम पर रखते हैं, यह सिखों के लिए भी भेदभावपूर्ण है क्योंकि धार्मिक रूप से सिख केवल झटका मांस का सेवन करते हैं।
इसके अलावा, अधिकांश व्यवसायों ने हलाल और गैर-हलाल मांस के लिए 2 आपूर्ति श्रृंखलाओं को बनाए रखने की लागत को बचाने के लिए अब केवल हलाल मांस परोसना शुरू कर दिया है। इसलिए यह उनके साथ भेदभावपूर्ण है जो हलाल का सेवन बिल्कुल भी नहीं करना चाहते। भोजनालयों में जाने का मतलब है कि उन्हें इस्लामवादी लॉबी द्वारा उनके लिए चुने गए विकल्प के लिए खुद को मजबूर करना होगा।
हलाल की भेदभावपूर्ण प्रकृति के अलावा, कुछ अन्य मुद्दे भी हैं।
जैसा कि हम हिमालया के मामले में देख सकते हैं, हलाल अर्थव्यवस्था अब केवल मांस उत्पादों तक ही सीमित नहीं है। फार्मास्युटिकल उत्पाद, व्यक्तिगत देखभाल उत्पाद, सौंदर्य प्रसाधन और यहाँ तक ​​कि आटा, सभी अब हलाल प्रमाणन के साथ आते हैं। अपने लगातार बढ़ते दायरे के साथ, यह इन क्षेत्रों में नौकरी की संभावनाओं को केवल एक मजहब के लोगों तक सीमित रखने के लिए आधार तैयार कर रहा है। इसके अलावा, प्रमाणीकरण की यह समानांतर प्रणाली सरकार की ओर से बिना किसी रोक-टोक के चलती है।
इसके अलावा, जमीयत उलेमा-ए-हिंद (JUH) जैसा संगठन, जो भारत के सबसे पुराने हलाल प्रमाणित संगठनों में से एक है, आतंकवाद से संबंधित मामलों में आरोपितों को कानूनी समर्थन देने के लिए लगातार चर्चा में बनी रहती है। इसलिए, यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि हलाल अर्थव्यवस्था के पैसे का इस्तेमाल इस्लाम के नाम पर आतंकवादी गतिविधियों को आगे बढ़ाने के लिए भी किया जा रहा है।

यह एक असमान लड़ाई जहाँ दूसरा पक्ष मजबूत? एक साधारण व्यक्ति क्या कर सकता है?

जागरूकता लाएँ। ऑनलाइन मीट खरीद रहे हैं या किसी रेस्टोरेंट से पका हुआ खाना ले रहे हैं तो झटका पर जोर दें। बता दें कि माँग बढ़ रही है। स्थानीय झटका विक्रेताओं का समर्थन करें, कई अभी भी मौजूद हैं। ऑनलाइन ऐप्स पर बने रहने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करें और उनकी मदद करें। दैनिक जरूरतों को पूरा करने वाले इन ऐप्स को कम से कम मांस के साथ शुरू करने के लिए एक झटका श्रेणी बनाने के लिए कहें।

केरल : क्रिसमस से पहले हलाल माँस का बहिष्कार; हिन्दुओं को भी बेचने के लिए किया जाता है मजबूर

केरल में अब एक नया विवाद छिड़ गया है। दरअसल ईसाईयों के त्योहार क्रिसमस से ठीक पहले ईसाइयों ने हलाल माँस का बहिष्कार करने का फैसला किया है। ईसाई धर्म से उठा यह विरोध वास्तव में सर्वप्रथम हिन्दू समाज की तरफ से नागरिक संशोधक कानून के विरोधियों द्वारा हिन्दुओं को अपमानित करना शुरू किया था, परन्तु किन्हीं कारणों से जोर नहीं पकड़ सका। चर्चा यहां तक हो रही थी कि हलाल से होनी वाली आय का एक अंश गुप्त रूप से मुस्लिम वेलफेयर में जाता है, जिसका उपयोग मदरसों, लव-जिहाद, धर्म परिवर्तन आदि पर किया जाता है। जब तक हलाल पर अंकुश नहीं लगेगा, देश गैर-मुस्लिम विरोधी हरकतों से मुक्त नहीं होगा। 

हलाल के अलावा अभी एक और मुद्दा जोर पकड़ने वाला है, वह यह है कि अवकाश के दिन बाजार में गोश्त कहाँ से आता है? जबकि झटके की समस्त दुकानें तक उस दिन बंद रहती है, लेकिन हलाल की नहीं। क्या साप्ताहिक अवकाश केवल झटका कत्लगाह पर ही लागु होता है? अगर राज्य सरकारें इसकी जाँच नहीं कर सकती तो केंद्र को संज्ञान लेकर कार्यवाही करनी चाहिए। किन-किन गैर-कानूनी कत्लगाहों में गैर-कानूनी काम हो रहा है? देश में कितने गैर-कानूनी कत्लगाह कार्यरत हैं, इसकी जाँच जरुरी है। और जिस क्षेत्र में ऐसे गैर-कानूनी कत्लगाह मिले, सम्बन्धित अधिकारियों पर भी सख्त कार्यवाही करते हुए, उनके बैंक खातों और संपत्ति की भी जाँच की जानी चाहिए। गैर-कानूनी रूप से कटने वाले पशुओं से सरकार को भी वित्तीय नुकसान हो रहा है।  

समाचार पोर्टल ‘टाइम्स नाउ’ की रिपोर्ट के मुताबिक, ईसाई समुदाय के इस फैसले को हिन्दू समूहों ने भी अपना समर्थन दिया है। उनका कहना है कि राज्य में हिन्दू धर्म के लोग हलाल माँस बेचने के लिए मजबूर हैं। क्रिश्चियन एसोसिएशन CASA ने ईसाइयों से अपील की है कि हलाल भोजन को अब उनकी खाने की टेबल पर नहीं लाया जाना चाहिए।

ईसाई समुदाय का कहना है कि ईसा मसीह के जन्मदिन पर हलाल माँस क्यों खाना चाहिए? इस विवाद पर कई तरह की प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। हिन्दू समूहों का दावा है कि ईसाई और हिन्दू दोनों को हलाल माँस बेचने के लिए मजबूर किया जाता है। वहीं आईयूएमएल ने इसे राज्य में मुस्लिम माँस की दुकानों का बहिष्कार करने के लिए उठाया गया एक कदम बताया।

‘झटका सर्टिफिकेशन अथाॅरिटी’ के चेयरमैन रवि रंजन सिंह बताते हैं कि ‘झटका‘ विधि हिन्दुओं, सिखों आदि भारतीय, धार्मिक परम्पराओं में ‘बलि/बलिदान’ देने की पारम्परिक पद्धति है। इसमें जानवर की गर्दन पर एक झटके में वार कर रीढ़ की नस और दिमाग का सम्पर्क काट दिया जाता है, जिससे जानवर को मरते समय दर्द न्यूनतम होता है। इसके उलट, हलाल में जानवर की गले की नस में चीरा लगाकर छोड़ दिया जाता है, और जानवर खून बहने से तड़प-तड़प कर मरता है।

इसके अलावा, मारे जाते समय जानवर को खास समुदाय के पवित्र स्थल मक्का की तरफ़ ही चेहरा करना होगा। लेकिन सबसे आपत्तिजनक शर्तों में से एक है कि हलाल माँस के काम में ‘काफ़िरों’ (‘बुतपरस्त’, जैसे हिन्दू) को रोज़गार नहीं मिलेगा। यानी कि यह काम सिर्फ एक समुदाय विशेष का सदस्य ही कर सकता है।

इसमें जानवर/पक्षी को काटने से लेकर, पैकेजिंग तक में सिर्फ और सिर्फ खास समुदाय वाला ही शामिल हो सकते हैं। मतलब, इस पूरी प्रक्रिया में, पूरी इंडस्ट्री में एक भी नौकरी अन्य धर्मों के लिए नहीं है। यह पूरा कॉन्सेप्ट ही हर नागरिक को रोजगार के समान अवसर देने की अवधारणा के खिलाफ है। बता दें कि आज McDonald’s और Licious जैसी कंपनियाँ सिर्फ हलाल माँस बेचती है।

इसी कड़ी में आइए नज़र डालते हैं हलाल से जुड़ी कुछ अन्य बातों पर, जिनसे पता चलता है कि समुदाय विशेष अपने नियम के तहत गै़र-मुस्लिम के हाथ का मांस हराम तक मानते हैं।

हलाल केवल एक मुस्लिम व्यक्ति ही कर सकता है। इसका मतलब साफ़ है कि हलाल फर्म में गैर-मुस्लिमों को रोज़गार से वंचित रखा जाता है। इसके अलावा कुछ और भी शर्तें हैं, जिन्हें अवश्य पूरा किया जाना चाहिए। जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि यह हलाल पूरी तरह से एक इस्लामी प्रथा है। भारत में हलाल के एक प्रमाणीकरण और प्राधिकरण की आधिकारिक वेबसाइट पर दिशानिर्देश उपलब्ध हैं जो यह स्पष्ट करता है कि पशु वध प्रक्रिया (हलाल) के किसी भी हिस्से में गैर-मुस्लिम कर्मचारियों को रोज़गार नहीं दिया जा सकता है।

पूरे दस्तावेज़ में इस्लामी पशु वध के दिशानिर्देशों को सूचीबद्ध किया गया है, इसमें शामिल कर्मचारियों के धर्म का उल्लेख करने के लिए ध्यान रखा गया है। यह स्पष्ट करता है कि केवल समुदाय विशेष के कर्मचारियों को ही हलाल के हर चरण में भाग लेने की अनुमति है। यहाँ तक ​​कि मांस का लेबल लगाने का काम भी मजहब के ही लोग कर सकते हैं।

                                                                                                              साभार : Halal India
यूरोपीय संघ के हलाल प्रमाणन विभाग ने यह और भी स्पष्ट कर दिया है कि हलाल फ़र्म में रोज़गार के अवसर विशेष रूप से इस्लाम के अनुयायियों के लिए उपलब्ध होंगे। इसमें कहा गया है, ”पशु वध एक वयस्क मुस्लिम द्वारा किया जाना चाहिए। एक ग़ैर-मुस्लिम द्वारा मारा गया जानवर हलाल नहीं कहलाएगा।” इसमें आगे कहा गया है, “जानवर का वध करते समय अल्लाह का नाम (उल्लेखित) लिया जाना चाहिए: बिस्मिल्लाह अल्लाहु अकबर यानी (अल्लाह के नाम पर; अल्लाह सबसे महान है)। यदि पशु का वध करते समय किसी दूसरे का नाम (अर्थात जिसके लिए पशु की बलि दी जा रही हो) अल्लाह का नाम नहीं लिया जाता है, तो वो मांस हराम यानी, ‘ग़ैर-क़ानूनी’ हो जाता है।

                                                                       साभार : Department of Halal Certification EU
समुदाय विशेष को अपने धर्म ग्रंथों द्वारा ग़ैर-हलाल भोजन का सेवन करने से रोका गया है। इस प्रकार, जब एक मुस्लिम विशेष रूप से हलाल मांस की माँग करता है, तो ऐसे में वह साफ़ तौर पर ऐसी सेवा की माँग कर रहा होता है, जो केवल मजहब के लोगों द्वारा दी जा सकती हो। बेहद साफ़ है कि एक समुदाय विशेष का शख्स अपनी धार्मिक पहचान के कारण एक ग़ैर-मुस्लिम से सेवा लेने से इनकार करता है।

हलाल प्रमाणन विभाग भी पशु वध (Slaughtering) के इस्लामी तरीके के बारे में दिशानिर्देश देता है। इसमें कहा गया है कि जानवर का क़त्ल तेज़ चाकू का इस्तेमाल कर सिर्फ़ एक झटके में किया जाना चाहिए। इसमें कहा गया है कि विंडपाइप (गला), फूड-ट्रैक्ट (ग्रासनली) और दो गले की नसों को एक ही झटके में काट देना चाहिए। ध्यान रखा जाना चाहिए कि सिर अलग न होने पाए और रीढ़ की हड्डी को भी न काटें। नियम तो यह भी कहते हैं कि एक मशीन द्वारा वध किया गया मांस हलाल की श्रेणी में नहीं आता, जानवर का क़त्ल एक समुदाय विशेष के व्यक्ति द्वारा ही होना चाहिए।

यह एक संपूर्ण उद्योग है जहाँ कुछ क्षेत्रों में रोज़गार के अवसर गैर-मुस्लिमों के लिए पूरी तरह से बंद और प्रतिबंधित हैं। यह न केवल हिंदू धर्म के लोगों, बल्कि ईसाई धर्म, बौद्ध धर्म, सिख धर्म और अन्य लोगों के प्रति भेदभावपूर्ण रवैया है।

बहुत से लोग यह कहेंगे कि शाकाहारी भोजन की तरह ही हलाल भोजन की माँग करना अपनी-अपनी पसंद की बात है। लेकिन यह पूरी तरह से ग़लत है। जबकि लोग अपनी पसंद से शाकाहारी बन जाते हैं, समुदाय विशेष के लोगों के पास इस संदर्भ में कोई विकल्प नहीं है। इस्लामी नियम उन्हें हराम या ग़ैर-हलाल भोजन का सेवन करने से मना करता है, उन्हें केवल हलाल भोजन का सेवन ही करना होता है।

हलाल के नियम क़ुरान से हदीस और सुन्नत में निहित हैं और इस्लाम के अनुयायियों को इन नियमों का पालन करना पड़ता है। जैसे अधिकांश हिंदुओं के लिए गोमांस नहीं खाना केवल व्यक्तिगत पसंद का मामला नहीं है। एक समुदाय विशेष का व्यक्ति जो सूअर का मांस खाने से इनकार करता है या किसी ग़ैर-मुस्लिम द्वारा मारे गए जानवर का मांस, मात्र पसंद का मामला नहीं है, दोनों ही मामलों में मांस का सेवन करने से धर्म उन्हें रोकता है।