Showing posts with label #Uttar Pradesh. Show all posts
Showing posts with label #Uttar Pradesh. Show all posts

समाजवादी पार्टी के PDA मतलब Parivar Development Authority यानि अखिलेश यादव की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी!


कहते हैं "आसमान पर तारे बहुत हैं लेकिन तोड़ने के लिए अक्ल चाहिए" समाजवादी पार्टी वही कर रही है। PDA का नाम देकर खूब जनता को पागल बनाया जा रहा है और जनता बन रही है। PDA का मतलब बताया जाता है "पिछड़ा", "दलित" और "अल्पसंख्यक", जबकि इन लोगों का उद्धार यानि भला करने की बजाए अपने ही परिवार का भला किया। उनकी भावी पीढ़ियों तक के ऐश से रहने और खाने-पीने का इंतज़ाम कर दिया गया है। प्रत्यक्ष को प्रमाण की जरुरत नहीं, जनता देख ले खुली आंख से। फिर भी जनता अंधी बन समाजवादी पार्टी को वोट देती है तो उससे बड़ा अँधा कोई नहीं। 
हिन्दुओं को जातियों में बांट जातिगत आधारित कई पार्टियां बन गयी हैं, लेकिन समाजवादी पार्टी की तरह भला इन पार्टियों के मुखियाओं के परिवारों का हुआ है और हो भी रहा है। हिन्दू है कि इनके मकड़जाल में फंस वोट दे देता है जबकि मुसलमान बीजेपी को हराने एकजुट होकर बीजेपी को हराने वाली पार्टी को वोट देता है। समझदार कौन हिन्दू या मुसलमान?   

           

भारतीय राजनीति में परिवारवाद का मुद्दा हमेशा चर्चा का केंद्र रहा है, लेकिन समाजवादी पार्टी (सपा) को लेकर यह बहस सबसे अधिक इसलिए होती है क्योंकि इस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व, संगठन और चुनावी राजनीति में लंबे समय से सैफई परिवार की निर्णायक भूमिका रही है। समाजवादी पार्टी की स्थापना 1992 में समाजवादी विचारधारा और आम कार्यकर्ताओं को राजनीति में आगे लाने के उद्देश्य से हुई थी, लेकिन समय के साथ पार्टी की कमान एक ही परिवार के इर्द-गिर्द सिमटती चली गई। आलोचकों का आरोप रहा है कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर सांसदों और महत्वपूर्ण चुनावी सीटों तक पर सैफई परिवार का प्रभाव दिखाई देता है। समाजवादी पार्टी में किसी तरह का आंतरिक लोकतंत्र नहीं है, बल्कि यह यादव परिवार की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह काम कर रही है।

परिवार के कई सदस्य लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा तक पहुंचे
मुलायम सिंह यादव के दौर से शुरू हुआ यह राजनीतिक वर्चस्व आज अखिलेश यादव के नेतृत्व में भी जारी है। यादव परिवार के कई सदस्य लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा तक पहुंचे, कई मंत्री बने और पार्टी के संगठन में भी महत्वपूर्ण पदों पर रहे। समाजवादी पार्टी में परिवारवाद इस कदर हावी रहा है कि मुलायम सिंह यादव से लेकर अखिलेश, डिंपल, धर्मेंद्र, अक्षय, आदित्य और तेज प्रताप यादव तक पार्टी की हर सुरक्षित और वीआईपी सीट परिवार के भीतर ही घूमती रहती है। समाजवादी सोच के आधार पर बनी पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र का यह हाल है कि साढ़े तीन दशक के बाद भी पार्टी अध्यक्ष मुलायम परिवार के अलावा कोई नहीं बन पाया है।

पांच भाईयों में तीसरे नंबर के मुलायम सिंह थे सबसे तेज
सपा सुप्रीमो रहे मुलायम सिंह यादव के बाबा का नाम मेवाराम था। मेवाराम के दो बेटे थे। सुगहर सिंह और बच्चीलाल सिंह। सुघर सिंह के पांच बेटे थे। इनमें मुलायम सिंह यादव, रतन सिंह, राजपाल सिंह यादव, अभय राम सिंह और शिवपाल सिंह यादव। भाइयों में मुलायम सिंह तीसरे नंबर और शिवपाल सिंह सबसे छोटे हैं। मुलायम सिंह यादव ने दो शादी की है। मुलायम सिंह यादव की पहली पत्नी मालती देवी के बेटे अखिलेश यादव हैं। अखिलेश यादव ने डिंपल यादव से शादी की है। मुलायम की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता है। प्रतीक यादव मुलायम की दूसरी पत्नी साधना सिंह के बेटे हैं। प्रतीक का पिछले महीने निधन हो गया। अपर्णा यादव की शादी प्रतीक यादव से हुई थी। इस तरह अपर्णा मुलायम सिंह यादव की दूसरी बहू हैं। मुलायम के भाई, बेटे, भतीजे के अलावा अब इस कुनबे की तीसरी पीढ़ी भी राजनीति के मैदान में है।

शिक्षक से सपा के संस्थापक और मुख्यमंत्री तक का सफर
मुलायम सिंह यादव ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत समाजवादी आंदोलन से की। वर्ष 1967 में पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए जसवंतनगर सीट से विधायक चुने गए। आपातकाल के दौरान जेल गए और बाद में उत्तर प्रदेश की राजनीति के प्रमुख नेताओं में शामिल हो गए। 1992 में उन्होंने समाजवादी पार्टी की स्थापना की। वह तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री (1989-91, 1993-95 और 2003-07) रहे। इसके अलावा वे भारत सरकार में रक्षा मंत्री भी बने। मुलायम सिंह यादव कई बार लोकसभा सांसद रहे और लंबे समय तक समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर रहे। सपा की राजनीतिक पहचान और संगठन का निर्माण मुख्य रूप से उनके नेतृत्व में हुआ। मुलायम यादव ने ही अयोध्या में कार सेवकों पर बर्बरता से गोलियां चलवाईं थीं। मुलायम सिंह के नक्शेकदम पर चलते हुए उनके पुत्र अखिलेश यादव भी पूरी तरह मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति पर चल रहे हैं।

मुलायम के पांच भाइयों में सबसे बड़े, बेटा बना सांसद
मुलायम के पांच भाइयों में अभयराम सबसे बड़े हैं। धर्मेंद्र यादव उनके बेटे हैं। धर्मेंद्र तीन बार सांसद रह चुके हैं। सबसे पहले 2004 में मैनपुरी से लोकसभा सदस्य चुने गए थे। इसके बाद 2009 और फिर 2014 में बदायूं से जीत हासिल की। 2019 लोकसभा चुनाव में वह हार गए।

मुलायम सिंह के भाई, पौत्र को मैनपुरी से बनाया सांसद
मुलायम सिंह के पांच भाइयों में रतन सिंह दूसरे नंबर पर हैं। मैनपुरी के पूर्व सांसद तेज प्रताप यादव रतन सिंह के पौत्र हैं। तेज प्रताप के पिता रणवीर सिंह हैं। तेज प्रताप ने इंग्लैंड की लीड्स यूनिवर्सिटी से मैनेजमेंट साइंस में एमएससी की है। तेज प्रताप की शादी बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की बेटी से हुई है। मतलब तेज प्रताप लालू के दामाद भी हैं।

सपा के रणनीतिकार और संगठन के प्रमुख चेहरे
रामगोपाल यादव मुलायम सिंह यादव के चचेरे भाई हैं और समाजवादी पार्टी के प्रमुख रणनीतिकारों में गिने जाते हैं। वे लंबे समय से सपा की राष्ट्रीय राजनीति का अहम हिस्सा रहे हैं। वे कई बार राज्यसभा सांसद चुने गए और पार्टी में राष्ट्रीय महासचिव जैसे महत्वपूर्ण संगठनात्मक पद पर रहे। नीतिगत फैसलों और संसदीय रणनीति तय करने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है।

संगठन निर्माता और परिवार की राजनीतिक धुरी
शिवपाल सिंह यादव मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई हैं और लंबे समय तक उत्तर प्रदेश में सपा संगठन की रीढ़ माने गए। वे कई बार जसवंतनगर विधानसभा सीट से विधायक चुने गए। वे उत्तर प्रदेश सरकार में लोक निर्माण विभाग, सिंचाई और अन्य महत्वपूर्ण मंत्रालयों के मंत्री रहे। 2016 में अखिलेश यादव के साथ राजनीतिक मतभेदों के कारण परिवार में बड़ा संघर्ष सामने आया। बाद में उन्होंने प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) बनाई, हालांकि बाद में फिर सपा के साथ राजनीतिक रूप से जुड़े।

विरासत के उत्तराधिकारी और सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष
अखिलेश यादव मुलायम सिंह यादव के पुत्र हैं और सैफई परिवार की दूसरी पीढ़ी के सबसे प्रमुख नेता हैं। उन्होंने 2000 में कन्नौज लोकसभा उपचुनाव जीतकर सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। वर्ष 2004 और 2009 में भी वे कन्नौज से सांसद चुने गए। 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने बहुमत प्राप्त किया और अखिलेश यादव 38 वर्ष की आयु में उत्तर प्रदेश के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने। 2017 में परिवार के भीतर सत्ता संघर्ष के बाद उन्होंने मुलायम सिंह यादव की जगह समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद संभाला। 2022 में वे करहल विधानसभा सीट से विधायक चुने गए और वर्तमान में विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं।

मुलायम परिवार की बहू से संसद तक का सफर
डिंपल यादव अखिलेश यादव की पत्नी और मुलायम सिंह यादव की पुत्रवधू हैं। उन्होंने पहली बार 2009 में फिरोजाबाद लोकसभा उपचुनाव लड़ा, लेकिन कांग्रेस उम्मीदवार राज बब्बर से हार गईं। 2012 में कन्नौज लोकसभा सीट पर उपचुनाव हुआ, जहां वह सांसद चुनी गईं। 2014 और 2019 में भी कन्नौज से चुनाव लड़ा, लेकिन 2019 में भाजपा उम्मीदवार से हार का सामना करना पड़ा। 2022 में मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद खाली हुई मैनपुरी लोकसभा सीट से उपचुनाव जीतकर संसद पहुंचीं और वर्तमान में सांसद हैं।

अखिलेश के चचेरे भाई ने मैनपुरी से जीता पहला चुनाव
धर्मेंद्र यादव मुलायम सिंह यादव के भतीजे और रामगोपाल यादव के पुत्र हैं। उन्होंने 2004 में पहली बार मैनपुरी से लोकसभा चुनाव जीता। वे 2009 और 2014 में बदायूं लोकसभा सीट से सांसद बने। 2019 में भाजपा उम्मीदवार से चुनाव हार गए। 2022 में आजमगढ़ लोकसभा उपचुनाव भी हार गए। इसके बावजूद वे पार्टी के प्रमुख प्रचारकों और रणनीतिक नेताओं में शामिल रहे हैं।

मुलायम के भतीजे का फिरोजाबाद से संसद तक का सफर
अक्षय यादव रामगोपाल यादव के पुत्र और मुलायम सिंह यादव के भतीजे के बेटे हैं। उन्होंने 2014 में फिरोजाबाद लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर संसद में प्रवेश किया। 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्हें भाजपा उम्मीदवार के खिलाफ हार का सामना करना पड़ा। वे पार्टी की नई पीढ़ी के नेताओं में गिने जाते हैं और समय-समय पर संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रिय रहते हैं।

मुलायम के भाई के पौत्र और लालू यादव के दामाद
तेज प्रताप यादव मुलायम सिंह यादव के बड़े भाई रतन सिंह यादव के पौत्र हैं। वे मुलायम सिंह यादव के भतीजे के बेटे हैं। उन्होंने 2014 में मैनपुरी लोकसभा सीट से चुनाव जीता। 2019 में उन्होंने उत्तर प्रदेश की कन्नौज लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा लेकिन हार गए। बाद में 2024 के लोकसभा चुनाव में यादव परिवार की पारंपरिक मानी जाने वाली सीटों में उनकी भूमिका फिर चर्चा में रही।

यादव परिवार की नई पीढ़ी की राजनीतिक एंट्री
आदित्य यादव, शिवपाल सिंह यादव के पुत्र हैं और सैफई परिवार की नई राजनीतिक पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे समाजवादी पार्टी के संगठन में सक्रिय हैं और उन्हें पार्टी की युवा राजनीति का उभरता हुआ चेहरा माना जाता है। वे लंबे समय से पार्टी के कार्यक्रमों और संगठनात्मक गतिविधियों में भाग लेते रहे हैं। सपा में उनकी सक्रियता यह संकेत देती है कि सैफई परिवार की अगली पीढ़ी भी राजनीति में अपनी भूमिका मजबूत कर रही है।

अखिलेश के चचेरे भाई को सपा की युवा ईकाई से जोड़ा
समाजवादी युवजन सभा के पूर्व राष्ट्रीय सचिव अनुराग यादव सैफई परिवार के सदस्य हैं और वे अखिलेश यादव के चचेरे भाई लगते हैं। मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई अभय राम यादव के दो पुत्र धर्मेंद्र यादव और अनुराग यादव हैं। अनुराग यादव उर्फ दीपू यादव समाजवादी पार्टी की युवा इकाई समाजवादी युवजन सभा में राष्ट्रीय सचिव रहे हैं। वर्ष 2013 में उन्हें यह संगठनात्मक जिम्मेदारी दी गई थी। वे चुनावी राजनीति में अपने भाई धर्मेंद्र यादव की तरह ज्यादा सक्रिय नहीं रहे, लेकिन पार्टी संगठन और सैफई परिवार की राजनीतिक गतिविधियों में उनकी भूमिका रही है।

राम गोपाल यादव के अपने भांजे को एमएलसी बनाया
एमएलसी अरविंद सिंह यादव भी सैफई परिवार की राजनीतिक शाखा से जुड़े हुए हैं और वे अखिलेश यादव के चचेरे भाई लगते हैं। उनका संबंध मुलायम सिंह यादव के चचेरे भाई और सपा के वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव के परिवार से है। रामगोपाल यादव की बहन गीता देवी हैं। अरविंद सिंह यादव गीता देवी के ही पुत्र हैं। इस प्रकार अरविंद यादव रामगोपाल यादव के भांजे हैं। अरविंद यादव का राजनीतिक सफर स्थानीय स्तर से शुरू हुआ। वे मैनपुरी जिले की करहल ब्लॉक के ब्लॉक प्रमुख रहे। बाद में वे उत्तर प्रदेश विधान परिषद (एमएलसी) के सदस्य बने। वर्ष 2016 में समाजवादी पार्टी के अंदरूनी विवाद के दौरान उनका नाम चर्चा में आया था।

मुलायम के भतीजे को इटावा जिला पंचायत अध्यक्ष बनाया
इटावा जिला पंचायत अध्यक्ष अंशुल यादव सैफई परिवार के सदस्य हैं और वे अखिलेश यादव के चचेरे भाई हैं। वे मुलायम सिंह यादव के सगे छोटे भाई राजपाल यादव के पुत्र हैं। अंशुल यादव लंबे समय से समाजवादी पार्टी की राजनीति में सक्रिय हैं। उन्होंने वर्ष 2015 में इटावा जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव निर्विरोध जीता। वर्ष 2021 में वे फिर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में इटावा जिला पंचायत अध्यक्ष बने और निर्विरोध निर्वाचित हुए।

अखिलेश की भाभी को सैफई ब्लॉक प्रमुख बनाया
सैफई ब्लॉक प्रमुख मृदुला यादव का संबंध भी मुलायम सिंह यादव के परिवार से है। वह अखिलेश यादव की चचेरी भाभी लगती हैं। वह मुलायम सिंह यादव के बड़े भाई रतन सिंह यादव के पुत्र रणवीर सिंह यादव की पत्नी हैं। रणवीर सिंह यादव मुलायम सिंह यादव के भतीजे थे। मृदुला यादव लंबे समय तक सैफई की स्थानीय राजनीति में प्रभावशाली भूमिका में रहीं। वह सैफई ब्लॉक प्रमुख के पद पर कई बार निर्वाचित हो चुकी हैं। सैफई ब्लॉक पर पिछले लगभग ढाई दशकों से मुलायम सिंह यादव परिवार या उससे जुड़े सदस्यों का प्रभाव रहा है। पहले रणवीर सिंह यादव, फिर धर्मेंद्र यादव, उसके बाद तेज प्रताप यादव और बाद में मृदुला यादव इस पद तक पहुंचे।

अखिलेश की चचेरे भाई सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने
इटावा जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष आदित्य यादव का संबंध मुलायम परिवार से है। वह अखिलेश यादव के चचेरे भाई लगते हैं। आदित्य यादव, शिवपाल सिंह यादव के पुत्र हैं और शिवपाल सिंह यादव, मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई तथा अखिलेश यादव के चाचा हैं। आदित्य यादव सैफई परिवार की नई पीढ़ी के राजनीतिक चेहरों में शामिल हैं। उन्होंने वर्ष 2010 में जसवंतनगर जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़कर राजनीतिक शुरुआत की, हालांकि उन्हें हार का सामना करना पड़ा। वर्ष 2016 में उन्हें इटावा जिला सहकारी बैंक की ओर से उत्तर प्रदेश कोऑपरेटिव बैंक और प्रदेशिक कोऑपरेटिव फेडरेशन में प्रतिनिधि चुना गया था। वर्ष 2021 में वे निर्विरोध रूप से इटावा जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने। इससे पहले इस पद पर उनके पिता शिवपाल सिंह यादव लगभग 33 वर्षों तक काबिज रहे थे।

अखिलेश की चचेरी बहन इटावा जिला सहकारी बैंक की निदेशक
इटावा जिला सहकारी बैंक की निदेशक डॉ. अनुभा यादव सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव की चचेरी बहन लगती हैं। वह शिवपाल सिंह यादव की पुत्री हैं। शिवपाल सिंह यादव, मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई हैं। डॉ. अनुभा यादव की शादी आईएएस अधिकारी अजय यादव से हुई। डॉ. अनुभा यादव सैफई परिवार की उन महिला सदस्यों में शामिल हैं, जिन्हें सहकारी संस्थाओं में जिम्मेदारी मिली। वर्ष 2021 में इटावा जिला सहकारी बैंक के चुनाव में शिवपाल सिंह यादव के परिवार के कई सदस्य निर्विरोध चुने गए थे। इसी चुनाव में डॉ. अनुभा यादव भी बैंक की निदेशक चुनी गई थीं।

मुलायम सिंह यादव के निजी जीवन का महत्वपूर्ण अध्याय
मुलायम सिंह यादव की पहली पत्नी मालती देवी का निधन 2003 में हुआ। इसके बाद साधना गुप्ता के साथ उनके संबंध सार्वजनिक रूप से सामने आए और उन्होंने चुनावी हलफनामों में साधना गुप्ता को अपनी पत्नी के रूप में दर्ज किया। हालांकि साधना गुप्ता ने कभी सक्रिय राजनीति नहीं की, लेकिन सैफई परिवार की आंतरिक राजनीति और उत्तराधिकार की चर्चाओं में उनका नाम कई बार सामने आया। 2022 में उनका निधन हो गया।

राजनीति से दूरी लेकिन परिवार की चर्चित शाखा
प्रतीक यादव साधना गुप्ता के पुत्र हैं और मुलायम सिंह यादव के सौतेले पुत्र के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बनाए रखी है और मुख्य रूप से व्यवसाय और फिटनेस के क्षेत्र से जुड़े रहे हैं। प्रतीक कभी चुनावी राजनीति में नहीं आए और न ही समाजवादी पार्टी में कोई संगठनात्मक पद संभाला।

सपा परिवार की बहू लखनऊ से चुनाव लड़कर हारीं
अपर्णा यादव, प्रतीक यादव की पत्नी हैं। उन्होंने 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के टिकट पर लखनऊ कैंट सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन भाजपा की रीता बहुगुणा जोशी से हार गईं। बाद में 2022 में उन्होंने समाजवादी पार्टी छोड़कर भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली। वर्तमान में वे भाजपा की राजनीति में सक्रिय हैं और विभिन्न सामाजिक व राजनीतिक कार्यक्रमों में भाग लेती हैं।

समाजवादी पार्टी में बड़ी टूट, भाजपा में शामिल होने को तैयार बैठी है पूरी समाजवादी पार्टी; रामगोपाल यादव ने अमित शाह को सौंपी चिट्ठी


उत्तर प्रदेश में चुनाव होने से पहले ही लगता है चुनाव परिणाम घोषित हो गया है। राहुल गाँधी की छत्रसाया में रहने वाली एक और पार्टी अपने अंत की ओर चल पड़ी है। महाराष्ट्र में शिवसेना (UBT) और पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस(TMC) में टूट और दल-बदल चर्चाओं के बीच उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) को लेकर भी बड़ा दावा सामने आया है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के अध्यक्ष और योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने दावा किया है कि सपा में जल्द ही बड़ी टूट हो सकती है।

उन्होंने कहा, “समाजवादी पार्टी में बड़ी टूट होगी। राम गोपाल यादव ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह जी को चिट्ठी सौंपी है। खनन घोटाला और गोमती रिवर फ्रंट घोटाला का मास्टरमाइंड कौन है, पूरा उत्तर प्रदेश जानता है। शिकंजा कस रहा है तो सपा परेशान है। महाराष्ट्र बंगाल छोड़िए, समूची सपा, भाजपा में शामिल होने को तैयार बैठी है।”

एक बयान में राम गोपाल यादव ने कहा, “अब यूपी का नंबर है, राम गोपाल जी एक चिट्ठी अमित शाह को थमा दिए हैं और उनसे कह दिए हैं उनसे कि इतने लोगों का नाम है। इन लोगों को अपने पास ले लीजिए, हम लोगों की जान बचाकर रखिएगा।”

राजभर ने अपने बयान में कई घोटालों का भी जिक्र किया है जिसके बाद सियासी हलचल बढ़ना तय माना जा रहा है।

उत्तर प्रदेश : अब जब्त अफीम से बनेगी जीवनरक्षक दवा, योगी सरकार का अपराध से जनकल्याण तक का सफर

            जब्त अफीम से बनेगी दवा, योगी सरकार ने अपराध को बदला जनकल्याण में (फोटो साभार : ChatGPT)
योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से पहले जिस उत्तर प्रदेश में माफियाओं का डंका बजता था, पुलिस मंत्रियों की भैंस ढूंढने में लगी रहती थी, आज स्थिति एकदम बदल चुकी है।   

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने जिस तरह अपराधियों के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति बनाई है, उसी तरह अब उनसे जब्त की गई सामग्री को भी प्रयोग में लाया जाएगा। दरअसल गाजियाबाद पुलिस ने अलग-अलग थानों के मालखानों में सालों से बंद पड़े 16,378 किलोग्राम से ज्यादा के नशीले पदार्थ जब्त कर उसे पूरी तरफ नष्ट किया है।

इसी के साथ, अपराधियों से पकड़ी गई 4.206 किलोग्राम शुद्ध अफीम को नष्ट करने के बजाय सरकारी अफीम कारखाने (गाजीपुर) भेजा गया है। इस अफीम का इस्तेमाल अब नशे के लिए नहीं, बल्कि गंभीर बीमारियों की दवाएँ बनाने में किया जाएगा। योगी सरकार का यह कदम दिखाता है कि कैसे अपराध की सामग्री का इस्तेमाल अब जन-कल्याण के लिए हो रहा है।

थानों में जमा ड्रग्स को ऐसे किया गया नष्ट

गाजियाबाद पुलिस कमिश्नरेट के थानों में सालों से भारी मात्रा में नशीले पदार्थ जमा थे। इन मादक पदार्थों की वजह से थानों के मालखानों में जगह कम पड़ रही थी और इनके दुरुपयोग का खतरा भी बना हुआ था। इसी समस्या को देखते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर एक उच्च स्तरीय ड्रग डिस्पोजल कमेटी का गठन किया गया। इस कमेटी में अपर पुलिस आयुक्त अपराध और अपर पुलिस उपायुक्त यातायात जैसे वरिष्ठ अधिकारियों को शामिल किया गया था।

इस विशेष कमेटी ने कोर्ट, संबंधित विभागाध्यक्षों और मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) से सभी जरूरी कानूनी अनुमतियाँ और अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) प्राप्त किए। इसके बाद बुधवार (10 जून) को धौलाना स्थित एक अधिकृत बायो मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट एंड डिस्पोजल केंद्र में कुल 63 मुकदमों से जुड़े मादक पदार्थों को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया। नष्ट किए गए सामान में सबसे अधिक मात्रा नंदग्राम थाने से बरामद हुई 15,735 लीटर कोडीन युक्त नशीली कफ सिरप की थी। नियमों के मुताबिक इस पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग भी कराई गई।

जब्त अफीम से दवा बनने की पूरी प्रक्रिया

अफीम एक खास पौधे से मिलती है। इस पौधे का नाम ‘अफीम पोस्त‘ है। इसे वैज्ञानिक भाषा में पैपावर सोम्रिफेरस कहते हैं। इस पौधे पर हरे रंग के कच्चे फल लगते हैं। इन कच्चे फलों को ‘डोडा’ कहा जाता है। जब इन डोडों पर हल्का सा चीरा लगाया जाता है, तो उनमें से सफेद रंग का गाढ़ा दूध जैसा रस निकलता है। यही रस हवा के संपर्क में आकर सूख जाता है और गोंद जैसा काला-भूरा बन जाता है। इसी सूखे रस को हम अफीम कहते हैं।

अफीम के अंदर कई तरह के प्राकृतिक तत्व होते हैं। विज्ञान की भाषा में इन तत्वों को ‘एल्कलॉइड्स’ कहते हैं। अफीम में ऐसे 25 से ज्यादा अलग-अलग तत्व पाए जाते हैं। जब पुलिस अपराधियों से यह अफीम पकड़ती है, तो उसे गाजीपुर के सरकारी कारखाने में भेजा जाता है। इस कारखाने को ‘सरकारी अफीम और अल्कलॉइड वर्क्स’ (GOAW) कहते हैं। यहाँ वैज्ञानिक सबसे पहले लैब में अफीम की पूरी जाँच करते हैं। वह देखते हैं कि अफीम कितनी असली है। इसके बाद मशीनों की मदद से अफीम को अच्छी तरह साफ किया जाता है।

अफीम से कैसे निकाली जाती है दवा?

साफ करने की इस प्रक्रिया को ‘प्रोसेसिंग’ कहते हैं। प्रोसेसिंग के दौरान वैज्ञानिक अफीम के अंदर से दो सबसे जरूरी तत्व अलग करते हैं। पहले तत्व का नाम ‘मॉर्फीन’ है। दूसरे तत्व का नाम ‘कोडीन’ है। ये दोनों तत्व बहुत काम के होते हैं। जब ये तत्व अफीम से अलग हो जाते हैं, तो सरकार इन्हें दवा बनाने वाली बड़ी कंपनियों को बेच देती है। ये कंपनियाँ इन तत्वों की मदद से बहुत ही असरदार और तेज दर्द को ठीक करने वाली दवाएँ तैयार करती हैं।

इन दोनों तत्वों का काम अलग-अलग बीमारियों में होता है। उदाहरण के लिए, ‘कोडीन’ नाम के तत्व का इस्तेमाल सूखी खांसी को ठीक करने के लिए किया जाता है। इससे खांसी के कफ सिरप बनाए जाते हैं। वहीं दूसरी तरफ, ‘मॉर्फीन’ नाम का तत्व बहुत तेज दर्द को रोकने के काम आता है। डॉक्टर इसका इस्तेमाल गंभीर मरीजों के लिए करते हैं। मॉर्फीन की मदद से दर्द को दबाने वाले इंजेक्शन और गोलियाँ (टैबलेट) बनाई जाती हैं। इस तरह यह अफीम मरीजों का जीवन बचाने के काम आती है।

क्या हर पकड़ी गई अफीम से दवा बन सकती है?

यहाँ एक बात समझना बहुत जरूरी है। पुलिस जो भी अफीम पकड़ती है, उस हर अफीम से दवा नहीं बनाई जा सकती। असल में, नशा बेचने वाले तस्कर बहुत चालाक होते हैं। वे ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए अफीम में मिलावट कर देते हैं। वे अफीम का वजन बढ़ाने के लिए उसमें स्टार्च, पाउडर या खराब केमिकल मिला देते हैं। कभी-कभी तो इसमें आर्सेनिक और लेड जैसी जहरीली चीजें भी मिला दी जाती हैं। ऐसी मिलावटी अफीम इंसानी शरीर के लिए बहुत ज्यादा खतरनाक और जानलेवा हो जाती है।

जब पुलिस इस अफीम को गाजीपुर या नीमच के सरकारी कारखाने में भेजती है, तो वहाँ सबसे पहले उसकी शुद्धता जाँची जाती है। इसके लिए लैब में एक खास टेस्ट होता है। अगर टेस्ट में अफीम मिलावटी निकलती है, तो कारखाना उसे लेने से मना कर देता है। यही नहीं, अगर अफीम में सीलन (नमी) या फंगस लगी हो, तो भी वह रिजेक्ट हो जाती है। ऐसी खराब अफीम को दवा बनाने के लायक नहीं माना जाता। बाद में, इस खराब अफीम को भी बाकी नशीले पदार्थों की तरह आग में जलाकर या केमिकल डालकर पूरी तरह नष्ट कर दिया जाता है। कारखाने में सिर्फ और सिर्फ एकदम शुद्ध अफीम का ही इस्तेमाल दवा बनाने के लिए होता है।

योगी सरकार: अपराध खत्म कर लोगों की भलाई का नया सफर

उत्तर प्रदेश में जब से योगी आदित्यनाथ की सरकार आई है, कामकाज का तरीका बिल्कुल बदल गया है। पहले के समय में पुलिस जो करोड़ों रुपए की अफीम पकड़ती थी, वह थानों के मालखानों में सालों तक बंद रहती थी। वह रखी-रखी सड़ जाती थी या फिर कई बार चोरी भी हो जाती थी। लेकिन अब योगी सरकार ने इस पूरे सिस्टम को साफ-सुथरा और बेहतर बना दिया है। अब पकड़ी गई चीजों का सही इस्तेमाल हो रहा है।

सरकार की इस नई नीति से एक साथ दो बड़े फायदे हो रहे हैं। पहला फायदा यह है कि पुलिस नशे का काला कारोबार करने वाले अपराधियों को पकड़कर उनका पूरा नेटवर्क तोड़ रही है। दूसरा फायदा यह है कि उनसे जो अफीम मिल रही है, उसका इस्तेमाल बीमार और लाचार लोगों के इलाज के लिए किया जा रहा है। सरकार एक तरफ अपराधियों पर कड़ा एक्शन ले रही है, तो दूसरी तरफ उनकी जब्त की गई चीजों को जनता की भलाई में लगा रही है। यह सरकार की एक बहुत अच्छी और दूर की सोच को दिखाता है।

पुलिस और कानून के लिए क्यों जरूरी है यह कदम?

कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए यह कार्रवाई बहुत जरूरी है। थानों के मालखानों में बहुत ज्यादा नशा जमा रखना खतरे से खाली नहीं होता। हमेशा डर रहता है कि कहीं यह नशीले पदार्थ चोरी न हो जाएँ। यह भी डर रहता है कि कोई इन्हें दोबारा चोरी-छिपे बाजार में न बेच दे। इसलिए समय-समय पर अभियान चलाकर इन्हें नष्ट करना बहुत जरूरी है। इससे थानों का रिकॉर्ड एकदम साफ हो जाता है और पुलिस के कामकाज में ईमानदारी बनी रहती है।

गाजियाबाद पुलिस ने इन नशीले पदार्थों को खुले में नहीं जलाया। खुले में जलाने से हवा जहरीली हो जाती है। इसके बजाय पुलिस इन्हें धौलाना के एक विशेष वेस्ट ट्रीटमेंट प्लांट में लेकर गई। वहाँ पूरी सावधानी और नियमों के साथ इन्हें नष्ट किया गया। इससे पर्यावरण को बिल्कुल भी नुकसान नहीं पहुँचा। उत्तर प्रदेश पुलिस का यह कदम देश के बाकी राज्यों के लिए भी एक मिसाल है। यह दिखाता है कि कैसे कड़े नियमों का पालन करके जनता की भलाई और सुरक्षा की जा सकती है।

उत्तर प्रदेश चुनाव 2027 : ममता की तरह धमकाने पर उतरे अखिलेश यादव, कहा- सरकार बनी तो करेंगे सख्त कार्रवाई: एनकाउंटर्स को बताया फर्जी

जिस तरह बंगाल में ममता बनर्जी मुसलमानों का डर दिखाकर हिन्दुओं को धमका रही थी, ठीक उसी रास्ते पर अखिलेश यादव चल निकले हैं। योगी आदित्यनाथ से पहले उत्तर प्रदेश में जो जंगल राज था उसी की वापसी करने की तैयारी की जा रही है। जो पुलिस समाजवादी पार्टी के मंत्री की भैंस ढूंढने कानून व्यवस्था को छिन बिन्न कर रखा था वही वापस लाने पुलिस को धमकाना शुरू कर दिया है। जब सत्ता से 10 साल दूर रहने की इतनी तड़प हो रही है कि पुलिस अधिकारियों को धमका रहे हैं हिन्दुओं का क्या होगा? क्या हिन्दू योगी राज से पहले की तरह समाजवादी पार्टी के राज में अपने त्यौहारों को खुलकर नहीं मना सकेंगे? बंगाल की तर्ज पर उत्तर प्रदेश के हिन्दुओं को ही नहीं बल्कि सभी धर्मों को समाजवादी पार्टी के खिलाफ लामबंद होना होगा।  
चांदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा होने सत्ता के बिना किस तरह बिलबिला रहे हैं कि प्रदेश में सत्ताभोग नहीं तो चलो संसद पहुँच कर राजशाही करो। ऐसे नेताओं को ना ही देश की चिंता है और ना ही जनता की इन्हे चाहिए विलासिता जीवन और तिजोरी भरने का साधन।  
देखिए सोशल मीडिया पर वायरल ‎ये है असली रुप इन कांग्रेसी,सपा,आरजेडी,टीएमसी और अन्य पारिवारिक पार्टी का।
हिंदुओं के वोट पाने के लिए 2014 के बाद से हमें मजबूरन पूजा करने मंदिरों में जाना पड़ रहा है। लेकिन उससे आप कोई गलतफहमी मत पाल लेना कि हम अब बदल गए हैं, खुदा कसम हम वही है और वही रहेंगे जो 2014 पहले हुआ करते थे
देखिए न, हम जो भी तोड़फोड़ करते हैं हिंदुओं में ही करते हैं मुसलमानों को जातियों में बांटकर आपस में लड़ाने का काम ना हम तब करते थे और न आज कर रहे हैं, ऐसा गंदा काम करने की बात तो हम कभी सोचते भी नहीं
 2027 में रहम मेरे ऊपर ही करना किसी और पर नहीं,आपको खुदा का वास्ता  
आज राज्य की जनता योगी मॉडल अपनाने की मांग कर रही है, और समाजवादी पार्टी और INDI गठबंधन हिन्दुओं को जातियों में बाँट राज करने की हिमाकत कर रहे हैं। मुसलमानों को भी सोंचना होगा कि जो अपने धर्म का नहीं किसी दूसरे के मजहब नहीं हो सकता। अगर हिन्दुओं को ये लोग बांट रहे हैं तो बदनाम मुसलमान भी हो रहा है।   
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव अब धमकाने पर उतर आए हैं। अखिलेश यादव ने कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर बयान देते हुए धमकी दी है कि प्रदेश में उनकी सरकार बनती है तो जिन अधिकारियों ने फर्जी एनकाउंटर किए हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

इसके साथ ही अखिलेश यादव ने रोजगार के मुद्दे पर योगी सरकार और केंद्र की BJP सरकार पर आरोप लगाया कि युवाओं को नौकरी देने के मोर्चे पर सरकार पूरी तरह नाकाम रही है। उन्होंने दावा किया कि सत्ता में आने पर उनकी पार्टी बड़े स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा करेगी।

स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर भी उन्होंने वादा किया कि समाजवादी सरकार बनने पर एंबुलेंस व्यवस्था को मजबूत किया जाएगा और गरीबों को सरकारी अस्पतालों में बेहतर तथा मुफ्त इलाज उपलब्ध कराया जाएगा। अखिलेश ने पेट्रोल-डीजल में कथित मिलावट का आरोप लगाते हुए कहा कि इससे लोगों की गाड़ियों को नुकसान हो रहा है।

उत्तर प्रदेश : किस ‘शर्त’ पर चुनावों में सपा के समर्थन को तैयार हैं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद, क्यों हिंदू विरोधी अतीत को दे रहे हैं ‘क्लीनचिट’?

      स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की आरती करतीं डिंपल यादव और अखिलेश यादव (फोटो साभार: X/Dimple Yadav)
जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव निकट आ रहे हैं, सनातन को अपमानित करने वाली समाजवादी पार्टी ने कालनेमि बन हिन्दुओं को गुमराह करने साधु-संतों की शरण में जाना शुरू कर दिया है। हिन्दू यह भी नहीं भुला कि किस तरह समाजवादी नेता रामायण के पृष्ठ फाड़ रहे थे, सनातन के विरुद्ध बयानबाज़ी कर रहे थे और आज सत्ता पाने उसी सनातन की शरण में जा रही है। लेकिन हिन्दुओं को इन सनातन विरोधियों से बंगाल की तरह दूरी बनानी होगी।       
गाय को ‘राष्ट्रमाता’ का दर्जा दिलाने और गौहत्या पर प्रतिबंध की माँग को लेकर निकाली जा रही स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की ‘गविष्ठी यात्रा’ लगातार चर्चाओं में है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की यात्रा को लेकर यह सवाल उठ रहे थे कि इसे समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस ने हाईजैक तो नहीं कर लिया है। अब अखिलेश यादव के एक बयान के बाद विवाद और बढ़ गया है।

दरअसल, अखिलेश यादव ने शुक्रवार (12 जून 2026) को एटा में कहा कि शंकराचार्य भी PDA हो गए हैं। विधानसभा चुनाव 2026 में टिकट बँटवारे को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, “पूजनीय शंकराचार्य जी भी पीड़ित, दुखी, अपमानित हो रहे हैं इस सरकार में। वह भी PDA हो गए हैं, इसलिए हम उनके साथ हैं।” अखिलेश यादव के इस बयान और यात्रा में सपा नेताओं के शामिल होने पर उठ रहे सवालों को लेकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के मीडिया प्रभारी संजय पांडेय ने ऑपइंडिया से बात की है।

गलफहमी ना पालें अखिलेश: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पक्ष

3 मई 2026 से शुरू हुई इस 81 दिवसीय यात्रा को लेकर संजय पांडेय ने कहा कि यात्रा को लेकर जनता का रुख सकारात्मक है और यात्रा के बाद से मुस्लिम और ईसाई भी समर्थन में आ गए हैं। वहीं, अखिलेश यादव के बयान पर उन्होंने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा, “अगर ऐसा कुछ भी अखिलेश जी ने बयान दिया है कि महाराज जी PDA का हिस्सा हो गए हैं, तो ये उनकी गलतफहमी है। महाराज जी सिर्फ सनातन धर्म के हैं। वो किसी राजनीतिक दल के नहीं हैं।”

हालाँकि, उन्होंने कहा, “अगर PDA अभी यह घोषणा कर दे कि सरकार बनने पर गाय को ‘राज्य माता’ घोषित किया जाएगा और गौकशी पर पूरी तरह रोक लगाई जाएगी, तो उन्हें शंकराचार्य जी का समर्थन और आशीर्वाद मिलेगा। वे और उनके समर्थक PDA के साथ खड़े होंगे। लेकिन अगर ऐसा नहीं किया गया तो शंकराचार्य जी का समर्थन उन्हें नहीं मिलेगा।”

संजय पांडेय ने कहा, “यह किसी विशेष दल का समर्थन करने का मामला नहीं है। अगर बीजेपी, कॉन्ग्रेस या PDA कोई भी दल अपने घोषणा पत्र में गाय को राज्य माता घोषित करने और गोकशी बंद कराने का लिखित व सार्वजनिक वादा करेगा तो उन्हें समर्थन दिया जाएगा। यह मुद्दा किसी पार्टी का नहीं बल्कि गौ माता के प्राणों की रक्षा का है।”

सपा-कांग्रेस के नेताओं के यात्रा में शामिल होने पर क्या बोले अविमुक्तेश्वरानंद के मीडिया प्रभारी?

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की यात्रा को लेकर यह सवाल पूछा जा रहा है कि कहीं उनकी यात्रा को उत्तर प्रदेश में विपक्षी दलों ने हाईजैक तो नहीं कर लिया है। दरअसल, उनकी यात्रा के मंचों पर सपा और कांग्रेस के नेता खूब नजर आ रहे हैं और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का रुख सरकार को लेकर गोरक्षा के विषय से आगे बढ़कर आक्रामक नजर आ रहा है।

कुछ दिनों पहले उनकी यात्रा जब इटावा के सैफई पहुँची तो उनके मंच पर अखिलेश यादव की सांसद पत्नी डिंपल यादव और उनके चाचा शिवपाल यादव नजर आए थे। इस दौरान उन्होंने मुलायम सिंह यादव के परिवार की न सिर्फ जमकर तारीफ की बल्कि मुलायम सिंह को ‘संतों का सम्मान करने वाला’ और ‘दशकों पुराना सच्चा हितैषी’ तक करार दे दिया।

उन्होंने अखिलेश यादव और डिंपल यादव को ‘बड़े दिल वाला’ बताते हुए मुलायम सिंह यादव द्वारा पूर्व में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की गिरफ्तारी का भी एक तरह से बचाव कर डाला था। इस बारे में भी संजय पांडेय ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का रुख स्पष्ट किया है।

संजय पांडेय ने कहा, “किसी भी राजनीतिक दल वाले आ रहे हैं तो वो सनातनी ही हैं। जब मुस्लिम समर्थन कर रहे हैं, गौ माता को राष्ट्र माता बोल रहे हैं जबकि उनके धर्म में पशु माना जाता है। तो जब वो तैयार हो गए हैं, किसी भी राजनीतिक पार्टी का हिंदू अगर आ रहा है, तो उसका स्वागत है। उसमें भाजपा के भी लोग आएँ, उनके लिए भी कोई रोक नहीं है।”

‘सपा के हिंदू विरोधी अतीत’ से जुड़े सवालों पर उन्होंने कहा, “शंकराचार्य जी महाराज, परंपरा से जुड़े हुए हैं और सपा की सच्चाई भी इनको मालूम है। सपा जहाँ गड़बड़ है, सपा जो गलत कर रही है धर्म विरोधी, तो सपा का भी विरोध रहेगा। अभी जब राजकुमार भाटी ने बयान दिया था ब्राह्मणों और धर्म के खिलाफ तो महाराज श्री ने उनकी भी निंदा की थी और कहा था कि समाजवादी पार्टी को जनता ठीक कर देगी।”

उन्होंने कहा, “जितना धर्म के अंश में वह काम करेंगे, उतना ही शंकराचार्य जी का उनके साथ समर्थन रहेगा, आशीर्वाद रहेगा। जो भी अधर्म करेगा, यहाँ तक कि हम शिष्य भी अगर अधर्म करेंगे तो हम लोग को वह मार के भगा देंगे। शंकराचार्य जी को केवल शास्त्र और धर्म से मतलब है और किसी से कोई उनका और मतलब नहीं है। अगर कोई ऐसा सोचता है तो उसकी मूर्खता है।”

वहीं, मजहबी आधार पर आरक्षण की माँग करने वाली पार्टियों को लेकर सवाल पूछे जाने पर उन्होंने हर तरह के आरक्षण का विरोध करने की बात कही हैं। उन्होंने कहा, “हम लोग तो किसी आधार पर आरक्षण नहीं चाहते हैं। किसी भी मजहब या किसी भी तरह से, आरक्षण से हम लोग का देश नष्ट ही हो जाएगा। शंकराचार्य जी का मानना है कि आरक्षण नहीं होना चाहिए।”

बरेली हिंसा में मौलाना तौकीर रजा की जमानत याचिका खारिज, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा- आरोप बेहद संगीन: लगवाए थे ‘सर तन से जुदा’ के नारे, पुलिसकर्मी भी हुए थे घायल

                                                              मौलाना तौकीर रजा खान 
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरेली में हुई सांप्रदायिक हिंसा के मुख्य आरोपित और साजिशकर्ता मौलाना तौकीर रजा खान को बड़ा झटका देते हुए उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने मामले की गंभीरता और आरोपित के आपराधिक इतिहास को देखते हुए उसे राहत देने से साफ इनकार कर दिया। जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने शुक्रवार (5 जून 2026) को यह कड़ा आदेश पारित किया। जो इस मौलाना के लिए बहुत जरुरी भी था। 

हाईकोर्ट ने जमानत याचिका नामंजूर करते हुए सख्त टिप्पणी की कि आरोपित को जेल से बाहर भेजने पर समाज की शांति को खतरा पैदा हो सकता है। कोर्ट ने कहा, “मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखने से यह स्पष्ट होता है कि आवेदक(तौकीर रजा) ने एक सार्वजनिक सभा में मुस्लिम समुदाय के कई युवाओं को इस्लामिया इंटर कॉलेज में इकट्ठा होने के लिए उकसाया था। गवाहों के बयान और वीडियो क्लिप से ये संकेत मिलता है कि तौकीर रजा खान ने भड़काऊ भाषण देकर भीड़ को इकट्ठा होने के लिए प्रेरित किया। भीड़ द्वारा किए गए अपराध के लिए मुख्य साजिशकर्ता होने के नाते खान पूरी तरह जिम्मेदार हैं, क्योंकि उनके द्वारा भड़काने के बाद ही भीड़ ने कानून-व्यवस्था हाथ में ली।

सुनवाई के दौरान अदालत ने उस समय लगी पाबंदियों और उपद्रवियों के रवैये पर भी गहरी नाराजगी जताई। कोर्ट ने नोट किया कि इलाके में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS 2023) की धारा 163(पूर्व में धारा 144) के तहत निषेधाज्ञा लागू थी। इसके बावजूद आरोपित के उकसावे में आकर भारी भीड़ सड़कों पर उतरी।

अदालत ने भीड़ द्वारा लगाए गए विवादित नारों को देश की संप्रभुता के लिए खतरा बताया। जज ने आदेश में लिखा, “भीड़ द्वारा ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा, सर तन से जुदा, सर तन से जुदा’ जैसे विवादित नारे लगाना देश के कानून की सत्ता के साथ-साथ भारत की संप्रभुता और अखंडता को एक सीधी चुनौती है। ये कृत्य सीधे तौर पर एक सशस्त्र विद्रोह की अपील करता है। इस तरह की हिंसक और भड़काऊ नारेबाजी करना न केवल भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 के तहत एक गंभीर दंडनीय अपराध है, बल्कि ये कृत्य इस्लाम के बुनियादी सिद्धांतों और शिक्षाओं के भी पूरी तरह खिलाफ है।”

जमानत याचिका खारिज करने का मुख्य आधार तौकीर रजा के पुराने रिकॉर्ड को बनाया गया। कोर्ट ने कहा, “तौकीर रजा खान का इसी तरह के मामलों में एक लंबा और विस्तृत आपराधिक इतिहास रहा है। ऐसे में इस बात का बड़ा जोखिम है कि यदि उन्हें जमानत पर रिहा किया गया, तो वो फिर से एक विशेष समुदाय को भड़का सकते हैं और समाज की शांति व सद्भाव को बिगाड़ सकते हैं।”

यह पूरा मामला पिछले साल 26 सितंबर 2025 को दर्ज पुलिस एफआईआर से जुड़ा है। आरोप है कि तौकीर रजा ने प्रशासन के कड़े प्रतिबंधों को दरकिनार कर मुस्लिमों को बरेली के इस्लामिया इंटर कॉलेज में एकत्र होने का आह्वान किया था। इसके बाद करीब 200 से 250 लोगों की उग्र इस्लामी भीड़ हाथों में भड़काऊ बोर्ड लेकर मौलाना आजाद इंटर कॉलेज से श्यामगंज चौराहे की तरफ बढ़ने लगी।

जब मौके पर तैनात पुलिस टीम ने उग्र हो रही भीड़ को समझाने और आगे बढ़ने से रोकने का प्रयास किया, तो उपद्रवी हिंसक हो गए। भीड़ ने पुलिस टीम को निशाना बनाते हुए उन पर ईंट-पत्थर, पेट्रोल बम और तेजाब (एसिड) की बोतलें फेंकनी शुरू कर दीं।

सरकार को उपद्रवियों के सरगनाओं पर कार्यवाही करने के साथ-साथ एसिड, पेट्रोल और पत्थर सप्लाई करने वालों पर भी कार्यवाही करनी चाहिए। इतना ही नहीं इन दंगाइयों को समर्थन में victim card खेल बचाने वालों पर नकेल जरुरी है।    

इस भयानक हिंसा और पथराव के दौरान उपद्रवियों ने कई राउंड फायरिंग भी की और पुलिसकर्मियों के कपड़े तक फाड़ दिए। इस हिंसक टकराव में दो वरिष्ठ पुलिस अधिकारी गंभीर रूप से घायल हो गए थे और सरकारी संपत्ति को भी भारी नुकसान पहुँचाया गया था। अदालत ने इन सभी तथ्यों को बेहद संगीन माना।

उत्तर प्रदेश : कॉकरोच जनता पार्टी के पदाधिकारी ने की डॉक्टर से मारपीट, सदस्यता लेने से मना करने पर पीटा: मऊ में दर्ज हुई FIR

                                                                                                            सभार - एक्स/@AnkurSingh
उत्तर प्रदेश के मऊ जिले में सोशल मीडिया पर चर्चा में आई कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की सदस्यता को लेकर विवाद सामने आया है। घोसी कोतवाली क्षेत्र के मझवारा मोड़ स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में एक युवक ने खुद को पार्टी का पदाधिकारी बताते हुए सरकारी चिकित्सक पर पार्टी का समर्थन करने और सदस्यता लेने का दबाव बनाया।

डॉक्टर के इनकार करने पर मारपीट की, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाया और जान से मारने की धमकी भी दी।

डॉक्टर का आरोप- सदस्यता लेने से मना किया तो की मारपीट

गाजीपुर जिले के बरेसर थाना क्षेत्र स्थित अलावलपुर अफगा गाँव के निवासी और मझवारा मोड़ सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में तैनात सरकारी डॉक्टर हरिश्चन्द्र जायसवाल ने बताया कि गुरुवार (4 जून 2026) की सुबह करीब 10 बजे वह अपने चैंबर में मरीजों को देख रहे थे।

इसी दौरान केरमा महरूपुर निवासी रविशंकर यादव उनके पास ECG जाँच कराने पहुँचा। जाँच पूरी होने के बाद उसने खुद को कॉकरोच जनता पार्टी का पदाधिकारी बताया और डॉक्टर से पार्टी में शामिल होने को कहा। डॉक्टर के अनुसार जब उन्होंने इससे इनकार किया तो युवक नाराज हो गया और बहस करने लगा फिर बात आगे बढ़ी तो उनके साथ मारपीट शुरू कर दी।

पुलिस ने दर्ज किया मुकदमा, आरोपित की तलाश जारी

घटना की सूचना मिलने पर अस्पताल के डॉक्टर और कर्मचारी कोतवाली पहुँचे तथा पुलिस को शिकायत देकर कार्रवाई की माँग की। पुलिस ने बताया कि डॉक्टर की तहरीर के आधार पर मुकदमा दर्ज कर लिया गया है और मामले की जाँच की जा रही है।

वहीं डॉ जितेन्द्र कुमार सिंह ने बताया कि आरोपित के खिलाफ डॉ से मारपीट, सरकारी कार्य में बाधा डालने और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने सहित अन्य धाराओं में मामला दर्ज किया गया है। उसकी गिरफ्तारी के लिए पुलिस टीम गठित कर दी गई है।

झाँसी में NSUI नेता पर हत्या का केस, घर में फंदे से लटकी मिली पत्नी: याद आई नैना साहनी, दिल्ली में कांग्रेस नेता ने टुकड़े-टुकड़े कर तंदूर में झोंक दिया था

        NSUI नेता भरत व्यास की राहुल गाँधी और पत्नी के साथ की तस्वीर (साभार: Facebook-Drx Bharat Vyas              Samthar)
उत्तर प्रदेश के झाँसी में दहेज हत्या का मामला सामने आया है। यहाँ कांग्रेस के छात्र संगठन नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) के प्रदेश उपाध्यक्ष भरत व्यास की पत्नी प्रिया मिश्रा की संदिग्ध परिस्थितियों में फाँसी के फंदे पर लाश लटकी मिली। प्रिया के परिवार ने NSUI नेता पर दहेज उत्पीड़न और हत्या का मामले में FIR दर्ज की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, घटना 31 मई 2026 की रात की है। प्रिया ने रात 12 बजे अपने पिता विनोद मिश्रा को फोन भी किया था लेकिन देर रात होने के चलते वह फोन नहीं उठा सके। इसके बाद सुबह जब प्रिया के ससुराल से कॉल आया तो बेटी की मौत की खबर सुनने को मिली।

प्रिया मिश्रा के परिवार का आरोप

प्रिया के परिवार ने बेटी की मौत को खुदकुशी मानने से इनकार किया है। प्रिया के परिवार ने बताया कि शुरुआत में सब कुछ ठीक था, लेकिन कुछ समय बाद भरत व्यास और उसके घरवाले ज्यादा दहेज की डिमांड करने लगे। परिवार का कहना है कि कई बाद नकदी और ऑनलाइन माध्यम से पैसे भी दिए गएं, इसके बावजूद प्रिया को परेशान किया जाता रहा है।

परिजनों ने भरत व्यास और उसके घरवालों के खिलाफ दहेज उत्पीड़न और हत्या का मुकदमा भी दर्ज करवाया है। पुलिस ने मामले की जाँच शुरू कर दी है। शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है। पुलिस का कहना है कि हर पहलुओं से जाँच जारी है।

कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय हैं भरत व्यास

NSUI नेता भरत व्यास और प्रिया की शादी 14 फरवरी 2025 को हुई थी। भरत व्यास राजनीति में काफी सक्रिय है। उसके कांग्रेस नेता राहुल गाँधी सहित पार्टी के तमाम नेताओं के साथ तस्वीर भी है। फेसबुक पर भी वे काफी एक्टिव हैं और आए दिन कॉन्ग्रेस समर्थित पोस्ट शेयर करते रहते हैं। भरत ने कॉकरोच जनता पार्टी के समर्थन में भी पोस्ट किया हुआ है।

कांग्रेस नेता के कांड, नंबर वन पर नैना साहनी हत्याकांड

यह पहली बार नहीं है कांग्रेस के किसी युवा नेता का अपराध में नाम सामने आय़ा है। 1995 में दिल्ली में हुआ बहुचर्चित नैना साहनी हत्याकांड, जिसे तंदूर कांड भी कहा जाता है, उसमें भी यूथ कांग्रेस का नेता ही शामिल था। 

इस मामले में मुख्य आरोपित सुशील शर्मा था, जो उस समय दिल्ली युवा कांग्रेस का बड़ा नेता माना जाता था। हत्या कर नैना को तंदूर की भट्ठी में झोंकने वाला उसका ही प्रेमी सुशील शर्मा था। दोनों लिव इन में रहते थे। कई लोगों का दावा है कि चुपचाप दोनों ने शादी भी कर रखी थी। सुशील यूथ कांग्रेस का उस समय उभरता हुआ नेता था। बताते हैं कि सीधे हाईकमान तक पहुॅंच थी उसकी।

सुशील के इस कारनामे की दुनिया को भनक भी नहीं लगती यदि 2 जुलाई 1995 की उस रात दिल्ली पुलिस के कॉन्स्टेबल अब्दुल नज़ीर कुंजू और होमगार्ड चंदर पाल गश्त पर ना होते। रात के करीब साढ़े ग्यारह बज रहे थे। होटल अशोक यात्री निवास में स्थित बगिया रेस्टोरेंट से दोनों ने आग और धुआँ निकलता देखा। मौके पर पहुॅंचे तो बताया गया कि कांग्रेस पार्टी के पुराने बैनर पोस्टर जलाए जा रहे हैं। पर वे नहीं माने। पुलिस बुलाई। फायर ब्रिगेड को बुलाया गया और पता चला कि तंदूर में एक महिला की लाश जल रही है।

उस महिला की पहचान नैना साहनी के तौर पर हुई। नैना को घर में गोली मारने के बाद सुशील शर्मा जलाने के लिए लाया था। मामला खुलने के बाद सुशील ने पुलिस से बचे रहने के लिए अपने राजनीतिक संपर्कों का भरपूर इस्तेमाल किया। लेकिन, जनआक्रोश की वजह से उसे सरेंडर करना पड़ा और बाद में सजा भी हुई।


मुलायम से अखिलेश यादव तक आतंकियों को बचाने समाजवादी पार्टी की नापाक कोशिशें


समाजवादी राजनीति का केवल कहने और दिखाने के लिए दर्शन सामाजिक न्याय, पिछड़ों की आवाज़ और लोकतांत्रिक संघर्ष है, लेकिन वास्तविकता में पार्टी के नेताओं की करनी इससे ठीक उलट है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक लंबा दौर ऐसा भी आया जब समाजवादी पार्टी पर बार-बार उंगलियां उठीं कि उसने वोट बैंक की राजनीति के लिए आतंकवाद जैसे गंभीर मुद्दे पर भी समझौते किए। आतंकवाद के खिलाफ देश जहां कठोर कार्रवाई की अपेक्षा करता है, वहीं सपा सरकारों और उसके नेताओं के कई फैसलों ने यह बार-बार साबित किया कि उनके लिए राष्ट्र सुरक्षा से ऊपर तुष्टिकरण की राजनीति है! यही कारण है कि पीएम से लेकर सीएम तक और अन्य बीजेपी नेता लगातार चुनावी मंचों से सपा पर आतंकियों के प्रति नरमी बरतने का आरोप लगाते रहे हैं। सपा के कई फैसलों और बयानों ने बार-बार यह धारणा बनी कि उसने आतंकवाद जैसे गंभीर विषय को भी राजनीतिक समीकरणों के चश्मे से देखा। अदालतों की फटकार, सुरक्षा एजेंसियों पर सवाल और आतंकवाद मामलों में मुकदमे वापस लेने की कोशिशें सपा की राजनीति पर अब भी सबसे बड़े सवालिया निशान हैं।

तुष्टिकरण के लिए आतंकियों के पोषक बने समाजवादी पार्टी के नेता
सबसे बड़ा प्रश्न केवल बयानबाजी का नहीं, बल्कि उन प्रशासनिक और राजनीतिक फैसलों का है जिनमें आतंकवाद के आरोपियों पर दर्ज मुकदमों को वापस लेने की कोशिश की गई, सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई पर सवाल उठाए गए और कई बार आतंकवादियों के प्रति सहानुभूति का माहौल बनाया गया। अदालतों तक को हस्तक्षेप करना पड़ा और कई मामलों में सरकार की मंशा पर तीखी टिप्पणियां करनी पड़ीं। यही घटनाएं आज भी उत्तर प्रदेश की राजनीति में “तुष्टिकरण बनाम राष्ट्र सुरक्षा” की सबसे बड़ी बहस के रूप में सामने आती हैं।

आतंकी के पिता के साथ अखिलेश यादव ने किया चुनाव प्रचार
19 फरवरी 2022
आतंकवाद के कई मामलों में आजमगढ़ का नाम सामने आने के बाद भी सपा नेताओं पर साफ-साफ आरोप लगे कि उन्होंने कठोर संदेश देने के बजाय अपराधियों और आतंकियों के साथ “राजनीतिक सहानुभूति” दिखाई। अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट केस में दोषी ठहराए गए कुछ आतंकियों के परिवारों के सपा से संबंधों को लेकर भी राजनीतिक विवाद खड़ा हुआ। बीजेपी नेताओं ने आरोप लगाया कि सपा ने ऐसे मामलों में स्पष्ट और कठोर रुख अपनाने के बजाय हमेशा बचाव की राजनीति की। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने चुनावी रैलियों और प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरोप लगाया था कि फांसी की सजा पाने वाले 38 आतंकवादियों में से एक मोहम्मद सैफ का पिता शादाब अहमद, समाजवादी पार्टी का सक्रिय नेता व कार्यकर्ता है। भाजपा नेताओं ने एक तस्वीर जारी की थी, जिसमें दोषी आतंकी के पिता को सपा प्रमुख अखिलेश यादव के साथ चुनाव प्रचार और मंच साझा कर रहे थे।

अयोध्या राम मंदिर हमले के आरोपियों पर नरमी का आरोप
14 फरवरी 2022
यूपी विधानसभा चुनावों में मुख्यमंत्री योगी ने आरोप लगाया कि जब अखिलेश यादव 2012 में मुख्यमंत्री बने थे तो उन्होंने सबसे पहला काम अयोध्या में राम मंदिर पर हमला करने वाले आतंकियों के ख़िलाफ़ दर्ज़ मुकदमों को वापस लेने वाली फाइल पर साइन किए थे। बीजेपी ने इसे “राष्ट्र और आस्था दोनों के खिलाफ अपराध” बताया। यह आरोप इसलिए और गंभीर बना क्योंकि अयोध्या केवल एक शहर नहीं, करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। आतंकवाद के ऐसे मामलों में नरमी दिखाना सपा की राजनीति पर सबसे बड़ा दाग बन गया। काबिले जिक्र है कि अयोध्या के राम जन्मभूमि परिसर में स्थित अस्थायी राम मंदिर पर आतंकी हमला 5 जुलाई 2005 को हुआ था।

अलकायदा आतंकियों की गिरफ्तारी पर यूपी पुलिस पर अविश्वास
12 जुलाई 2021
लखनऊ के काकोरी इलाके से एटीएस ने अलकायदा से जुड़े दो आतंकियों को गिरफ्तार किया। उस समय पूरे देश में सुरक्षा एजेंसियों की सराहना हो रही थी, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि उन्हें यूपी पुलिस पर भरोसा नहीं है। बीजेपी ने इसे आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई को कमजोर करने वाला बयान बताया। सवाल यह उठा कि जब देश की सुरक्षा एजेंसियाँ संभावित आतंकी साजिश को विफल कर रही थीं, तब एक पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा पुलिस पर अविश्वास जताना किस संदेश को मजबूत कर रहा था?

अखिलेश सरकार द्वारा आतंकवाद मामलों को वापस लेने की कोशिश
12 दिसंबर 2013
यूपी की सत्ता में आने के बाद अखिलेश यादव सरकार ने उन मामलों की समीक्षा शुरू की, जिनमें आतंकवाद के आरोपियों पर मुकदमे चल रहे थे। सरकार ने करीब 14 आतंकवाद मामलों में 19 आरोपियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की। इनमें गोरखपुर ब्लास्ट, लखनऊ-फैजाबाद कोर्ट ब्लास्ट जैसे गंभीर मामले शामिल थे। विपक्ष ने आरोप लगाया कि यह कदम न्याय व्यवस्था को कमजोर करने और कट्टरपंथी तत्वों को राजनीतिक संरक्षण देने जैसा है। बाद में अदालतों ने कई मामलों में सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए मुकदमे वापस लेने की अनुमति नहीं दी।

आतंकी खालिद मुजाहिद के परिजनों को सपा सरकार में मुआवजा!
31 मई 2013
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ सहित वाराणसी और फैजाबाद के अदालत परिसरों में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के आरोपी खालिद मुजाहिद अखिलेश सरकार के गले की फांस बन गया था। दरअसल, खालिद की मौत के बाद प्रदेश सरकार द्वारा मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए दी गई मुआवजे की राशि को परिवार ने लेने से ही इनकार कर दिया था। प्रदेश सरकार को लोकसभा चुनाव-2014 में जहां एक खास वर्ग के मुस्लिमों की नाराजगी का भय सता रहा है तो वहीं विपक्षी दलों ने सरकार के इस निर्णय को मुस्लिम तुष्टीकरण की संज्ञा देकर सीधा कटघरे में खड़ा कर दिया है। विपक्ष ने कहा कि सपा सरकार आतंकवाद के आरोपियों के प्रति इतनी नरम थी कि उसने प्रशासनिक मशीनरी पर ही दबाव बनाना शुरू कर दिया। इस पूरे प्रकरण ने यह धारणा और मजबूत की कि सपा आतंकवाद के मामलों में हमेशा सुरक्षा एजेंसियों के बजाय आरोपियों के पक्ष में खड़ी दिखाई देती है।

बटला हाउस एनकाउंटर पर सवाल और आतंकियों के प्रति सहानुभूति
19 सितंबर 2008
दिल्ली के बटला हाउस में हुए एनकाउंटर में इंडियन मुजाहिदीन से जुड़े आतंकियों को मार गिराया गया था। उस समय पूरे देश में आतंकवादी हमलों का भय था, लेकिन समाजवादी पार्टी के कई नेताओं ने सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई पर सवाल खड़े किए। मुलायम सिंह यादव ने एनकाउंटर की निष्पक्ष जांच की मांग की। दरअसल, सपा आतंकवादियों के प्रति सहानुभूति दिखाकर एक विशेष वोट बैंक को साधना चाहती थी। जिस समय देश आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता चाहता था, उस समय सुरक्षा बलों की कार्रवाई पर अविश्वास खड़ा करना सपा की राजनीति पर गंभीर प्रश्नचिह्न बन गया।

वाराणसी ब्लास्ट आरोपी वलीउल्लाह को राहत देने का प्रयास
7 मार्च 2006
वाराणसी सीरियल ब्लास्ट में निर्दोष श्रद्धालुओं की मौत हुई थी। लेकिन अखिलेश सरकार ने इस मामले के आरोपी वलीउल्लाह सहित कुछ आतंकवादियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने की कोशिश की। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस कदम पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि क्या सरकार आतंकवादियों को “पद्मभूषण” देना चाहती है? अदालत की यह टिप्पणी इस बात का प्रतीक बन गई कि सरकार का कदम कितना विवादास्पद माना गया। आलोचकों ने कहा कि सपा सरकार आतंकवादियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जगह उन्हें राजनीतिक संरक्षण देने में लगी थी।

आतंकवादियों के प्रति फर्जी मुकदमे का सपा का नैरेटिव
समाजवादी पार्टी ने कई बार यह तर्क दिया कि आतंकवाद के मामलों में कुछ युवकों को झूठा फंसाया गया है। लेकिन आलोचकों का कहना था कि इस तर्क के जरिए आतंकवाद के खिलाफ सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई को ही कटघरे में खड़ा किया गया। जब अदालतों में कई आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत हुए और सजा भी हुई, तब सपा की राजनीतिक लाइन पर और सवाल उठे। बीजेपी ने आरोप लगाया कि सपा ने “निर्दोष” का नैरेटिव बनाकर आतंकवादियों के लिए सहानुभूति पैदा करने की कोशिश की। यहां तक कि सपा सरकार को अदालतों से फटकार मिली। फिर भी उसने आतंकवाद मामलों में मुकदमे वापस लेने की नापाक कोशिशें कीं। समाजवादी पार्टी के कई बयानों ने यह धारणा और मजबूत हुई कि उसने हमेशा आतंकवाद जैसे गंभीर विषय को भी राजनीतिक समीकरण और तुष्टिकरण के चश्मे से देखा।

अखलाख, हमास, फिलिस्तीन और गाज़ा पर मातम करने वाले ईद पर सूर्या की क़ुरबानी पर खामोश क्यों? पड़ोसी मुस्लिमों के मुँह से भी कट्टरपंथियों के लिए नहीं फूट रहा एक भी शब्द

गाजियाबाद के खोड़ा में सूर्या चौहान की हत्या के बाद एनकाउंटर में मुख्य आरोपित असद भी ढेर हो गया। गंगा-जमुना की तहजीब और सेकुलरिज्म का रोना वाले सूर्या की क़ुरबानी पर क्यों खामोश हैं? टीवी पर चर्चाओं में जब घिरने पर बेशर्म संविधान की दुहाई देने लगते हैं। वामपंथी लिबरल गैंग ने सूर्या की हत्या से ज्यादा एनकाउंटर में मारे गए असद की चिंता की। यहाँ तक कि कुर्बानी देखने के लिए बुलाए गए सूर्या की निर्मम हत्या को आपसी विवाद में हत्या करार दे दिया।

सूर्या की हत्या में शामिल नवाब, फरहान, आतिफ और शारिक को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। घटना के बाद से असद फरार था, जिस पर 50 हजार रुपए इनाम की घोषणा की गई थी। पुलिस ने सूचना मिलने पर उसे इंदिरापुरम में ढेर कर दिया। इससे पहले इलाके में तनाव को देखते हुए पुलिस लगातार सतर्क है। बकरीद के दिन सूर्या चौहान की घर से बुला कर हत्या कर दी गई। उसे ‘आओ कुर्बानी कैसे दी जाती है, तुम्हें दिखाते हैं…’ कह कर घर से बुलाकर सूर्या को ले जाने और उसकी चाकूओं से निर्मम हत्या करने पर लिबरल वामपंथी गैंग का मुँह नहीं खुला।

घटना की निंदा करना तो दूर प्रोपेगेंडाबाजों ने घटना की जानकारी देना भी जरूरी नहीं समझा। देता भी कैसे? इस खबर से उनकी पोल खुल जाती, जो हमेशा देश में मुस्लिमों पर तथाकथित ‘अत्याचार’ की दुहाई देते-देते नहीं थकते। ट्वीट करते हैं, रिट्वीट करते हैं, लंबी-लंबी पोस्ट लिखते हैं, सरकार की आलोचना करते हैं। लेकिन, 17 साल के हिन्दू युवक की इस तरह हत्या राजधानी दिल्ली से सटे गाजियाबाद के खोड़ा में हो जाती है, ये कुछ नहीं बोलते।

Republic Bharat पर अपने शो महाभारत पर एंकर राम मोहन शर्मा जब इस दुर्घटना की ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रहे थे तब एक महिला ने कहा कि सरकार को इन लोगों को मिलने वाली हर सुविधा वापस ले लेनी चाहिए। यह सच भी है। जब तक सरकार ऐसे ठोस कदम नहीं उठाएगी इस तरह की हरकतों, दंगों और हिन्दू त्यौहारों पर होने वाली पत्थरबाज़ी बंद नहीं होगी। दूसरे, इन कट्टरपंथी और इनके समर्थकों को मालूम है कि मोदी सरकार सिर्फ पाकिस्तान के लिए सख्त हो सकती है, किसी और के लिए नहीं। बांग्लादेश में हिन्दुओं का नरसंहार होने के बावजूद मानवीय आधार पर आर्थिक मदद बंद नहीं की जबकि पाकिस्तान का पानी बंद कर दिया।      

प्रोपेगेंडाबाजों की पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग

हत्या की हर हाल में आलोचना की जानी चाहिए। यहाँ नाबालिग युवक को बुला कर हत्या कर दी जाती है। चूँकि सभी आरोपित मुस्लिम हैं, इसलिए चुप रह जाओ। आरफा खानम को ही देख लो, मुख्यमंत्री योगी के आपत्तिजनक शब्द का इस्तेमाल करने की उसने आलोचना नहीं की, लेकिन ऐसा बोलने वाले मुस्लिम को जब पुलिस उठा कर ले गई, तो सामने आ गई अत्याचार की कहानी लेकर।

हिन्दू नाबालिग लड़के की बेरहम हत्या पर बात करना, तो वैसे भी उसके सिलेबस से बाहर का विषय है। द वायर, द क्विंट, द प्रिंट में तो खबर छापी, लेकिन हत्या को नाबालिगों द्वारा की गई वारदात कहा। द प्रिंट ने कहा, “सूर्या को पास के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। शुक्रवार को चोटों के कारण उनकी मृत्यु हो गई, जिससे खोड़ा कॉलोनी में विरोध प्रदर्शन भड़क उठे। शनिवार को स्थानीय बाजार बंद रहा, जबकि पुलिस ने फ्लैग मार्च किया।”

वहीँ द क्विंट ने मुख्य आरोपित असद के पुलिस एनकाउंटर में मौत पर जोर देते हुए बताया कि 31 मई 2026 को, उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में बकरीद के दौरान 17 साल के एक हिंदू छात्र की हत्या के मुख्य आरोपी असद को पुलिस मुठभेड़ में मार गिराया गया। पीड़ित, सूर्य चौहान को बकरीद के दिन एक कहासुनी के दौरान चाकू मार दिया गया था, और 29 मई 2026 को इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। पुलिस ने असद की तलाश शुरू कर दी थी, जो घटना के बाद से कथित तौर पर फरार था।

क्यों की गई सूर्या की हत्या

सूर्या और असद पड़ोसी हैं। खोड़ा की गली में दोनों का मकान है। बताया जाता है कि सात आठ महीने पहले एक छोटा सा विवाद हुआ था। दोनों के माता-पिता ने अपने-अपने बच्चे को समझाया और मामला शांत हो गया। लेकिन बातचीत दोनों परिवारों में लगभग नहीं होती थी। बकरीद के दिन सूर्यो चौहान का बाइक चलाने को लेकर असद और उसके दोस्तों से विवाद हुआ। इनलोगों ने उसे चाकूओं से गोद कर हत्या कर दी।

चश्मदीदों के मुताबिक, असद और उसके साथियों ने सूर्या से कहा, “क्या तुमने कभी बकरे की कुर्बानी देखी है?” जब सूर्या ने मना किया, तो उन्होंने कथित तौर पर कहा, “आज तुझे दिखाते हैं।” इसके बाद आरोपियों ने उस पर चाकू से ताबड़तोड़ वार कर दिए। हमले में सूर्या बुरी तरह घायल हो गया और अस्पताल ले जाते समय दम तोड़ दिया।

सूर्या का भाई मानसिक रूप से विक्षिप्त है। वह अपने माँ-बाप का एकमात्र सहारा था। इस मामले में असद, नवाब, फरहान, आतिफ और शारिक सहित कई लोगों के नाम सामने आए। सभी आरोपितों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। मुख्य आरोपित असद फरार चल रहा था, जिसे इंदिरापुरम में एक मुठभेड़ में पुलिस ने मार गिराया।

पड़ोसी घटना को लेकर जता रहे अनभिज्ञता

घर से कुछ दूर पर 17 साल के युवक सूर्या चौहान की हत्या हो जाती है। उसके आस पड़ोस में ज्यादातर मुस्लिम परिवार रहते हैं। ये लोग मुँह खोलने को तैयार नहीं हैं। ये ऐसे जता रहे हैं, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। भीडभाड़ पूरी है, लेकिन कोई ये नहीं बता रहा कि उसे घटना की जानकारी है।

सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो आए हैं, जिससे पता चलता है कि हिन्दू युवक की बेरहमी से कत्ल किए जाने पर लोगों को कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा। ये लोग कैमरा देख कर चुपचाप बचते नजर आ रहे हैं।

सूर्या की मौत के बाद पड़ोसी मुस्लिम घर के बाहर एक किलो से ज्यादा बकरे का मांस नीचे रखा मिला। जब कुछ लोगों ने बोला, तो बच्चों को भेजकर उसे नाली में डाल दिया गया। इससे भी हिन्दुओं में गुस्सा है।

सूर्या की माँ ने असद के एनकाउंटर पर संतोष जताया

मुख्य आरोपित असद की मुठभेड़ में मौत के बाद सूर्या की माँ का बयान सामने आया। सूर्या की माँ सरोज का कहना है कि उसने सिर्फ एक का एनकाउंटर देखा है। वह चाहती है कि असद की तस्वीर उसे दिखाई जाए। तस्वीर देखने के बाद ही उसे विश्वास होगा कि वह मारा जा चुका है। सरोज का कहना है कि बाकी आरोपितों को भी इसी तरह से मौत के घाट उतारा जाना चाहिए। इतना ही नहीं उनके घरों पर बुलडोजर भी चलना चाहिए।

इस मामले में 5 नामजद आरोपितों को पुलिस ने 30 मई 2026 को गिरफ्तार किया। असद के बारे में पुलिस को जानकारी मिली कि वह इंदिरापुरम में छिपा हुआ है। उसे पुलिस ने घेर लिया, उसने पुलिस पर फायरिंग की। इस दौरान असद को पुलिस ने बुरी तरह घायल कर दिया और अस्पताल ले जाते वक्त उसकी मौत हो गई। बाकी आरोपित भी पहले से ही पुलिस की गिरफ्त में हैं।