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बिना कानून बाजार पर हलाल सर्टिफिकेट का कब्जा: केन्या में कोर्ट तक पहुँची सर्टिफिकेशन की लड़ाई, समझें- कैसे पिस रहे व्यापारी


केन्या में हलाल सर्टिफिकेशन को लेकर कानूनी विवाद चल रहा है। 16 अप्रैल 2026 को डेनिस नथुम्बी, डेनिस ओवुओर ओचांडा और हेनरी बरासा टॉम ने नैरोबी हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की। उनका आरोप है कि हलाल सर्टिफिकेशन जैसी निजी व्यवस्थाएँ किसी स्पष्ट कानून के बिना ही खाद्य और मांस उद्योग में बाजार तक पहुँचने, सरकारी खरीद में भाग लेने और व्यापार करने की व्यावहारिक शर्त बनती जा रही हैं। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से सरकारी संस्थाओं को किसी निजी सर्टिफिकेट को लाइसेंस, व्यापार या सार्वजनिक खरीद की अनिवार्य शर्त मानने से रोकने की माँग की है।

जून 2026 में केन्या हलाल सर्टिफिकेशन ब्यूरो (KBHC) ने इस मुकदमे में पक्षकार बनाए जाने की माँग की। संस्था का तर्क है कि मुस्लिम उपभोक्ताओं को यह जानने का संवैधानिक अधिकार है कि कोई खाद्य पदार्थ उनकी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार तैयार किया गया है या नहीं।

याचिकाकर्ताओं की मुख्य आपत्ति क्या है?

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वे मुसलमानों के हलाल भोजन खाने के अधिकार का विरोध नहीं कर रहे हैं। उनका सवाल केवल इतना है कि हलाल सर्टिफिकेशन जैसी एक निजी मजहबी व्यवस्था धीरे-धीरे खाने-पीने की चीजों के उत्पादन, बिक्री और सप्लाई की पूरी प्रक्रिया में जरूरी शर्त कैसे बन गई।

उनका कहना है कि बूचड़खानों से लेकर सुपरमार्केट और सरकारी खरीद तक, हलाल सर्टिफिकेट ही व्यवसाय की स्वीकार्यता निर्धारित करने लगा है। सर्टिफिकेट न लेने वाला कारोबारी कुछ आपूर्ति शृंखलाओं, ठेकों और बाजारों से बाहर हो जाता है। इस स्थिति में कागज पर स्वैच्छिक दिखने वाला सर्टिफिकेशन व्यवहार में अनिवार्य बन जा रहा है।

दूसरी आपत्ति प्रमाणन शुल्क को लेकर है। याचिका में दावा किया गया है कि निजी संस्थाओं को दिया जाने वाला शुल्क अंततः वस्तु की कीमत में जोड़कर उपभोक्ता से वसूला जा सकता है जबकि अधिकांश खरीदारों को न प्रमाणन की प्रक्रिया पता होती है, न उसकी कीमत।

केन्या के कानून में टकराव कहाँ है?

याचिका में केन्या के संविधान के अनुच्छेद 43, 46 और 47 का उल्लेख किया गया है। अनुच्छेद 43 स्वास्थ्य और स्वीकार्य गुणवत्ता वाले भोजन जैसे सामाजिक-आर्थिक अधिकारों से जुड़ा है। अनुच्छेद 46 उपभोक्ताओं को उचित गुणवत्ता, आवश्यक जानकारी और उनके स्वास्थ्य, सुरक्षा तथा आर्थिक हितों की रक्षा का अधिकार देता है। अनुच्छेद 47 सरकारी प्रशासनिक कार्रवाई को वैध, तर्कसंगत और प्रक्रियात्मक रूप से निष्पक्ष बनाने की माँग करता है।

केन्या के मांस नियंत्रण नियम में पशु और मांस की जाँच का अधिकार सरकारी पशु चिकित्सकों, स्वास्थ्य निरीक्षकों और अधिकृत अधिकारियों को दिया गया है। पशु को काटने से पहले और मांस को बाजार में भेजने से पहले सरकारी निरीक्षण आवश्यक है। इसलिए धार्मिक प्रमाणन सार्वजनिक स्वास्थ्य की वैधानिक जाँच का स्थान नहीं ले सकता है।

हलाल वास्तव में क्या है?

हलाल अरबी शब्द है, जिसका अर्थ है इस्लामी कानून के अनुसार जायज। यह केवल जानवर काटने की पद्धति नहीं है। किसी उत्पाद में सूअर, रक्त, शराब या अन्य निषिद्ध सामग्री न हो, उसके निर्माण, प्रसंस्करण, भंडारण और परिवहन के दौरान वह गैर-हलाल पदार्थों के संपर्क में न आया हो ये सभी शर्तें हलाल व्यवस्था का हिस्सा हो सकती हैं।
FAO और WHO की Codex Alimentarius Guidelines के अनुसार, हलाल पशु का वध एक मानसिक रूप से स्वस्थ और इस्लामी प्रक्रिया से परिचित मुस्लिम द्वारा किया जाना चाहिए। प्रत्येक पशु को काटने से ठीक पहले ‘बिस्मिल्लाह’ कहा जाना चाहिए, पशु जीवित होना चाहिए, उपकरण तेज होना चाहिए और गर्दन की श्वासनली, भोजन नली तथा मुख्य रक्त वाहिकाएँ काटी जानी चाहिए। Codex यह भी स्वीकार करता है कि विभिन्न इस्लामी मतों और देशों के बीच हलाल की व्याख्या में अंतर हो सकता है।
इसी Codex में यह चेतावनी भी दी गई है कि हलाल लेबल का प्रयोग इस तरह नहीं होना चाहिए जिससे दूसरे खाद्य पदार्थों की सुरक्षा पर संदेह पैदा हो या यह दावा किया जाए कि हलाल भोजन स्वभावतः अधिक पौष्टिक या स्वास्थ्यवर्धक है। इससे साफ जाहिर होता है कि हलाल एक धार्मिक अनुरूपता का दावा है, सरकारी खाद्य-सुरक्षा प्रमाणपत्र नहीं है।
हलाल मांस को लेकर सबसे तीखा विवाद जानवर को काटने से पहले बेहोश करने पर होता है। सभी हलाल व्यवस्थाएँ एक जैसी नहीं हैं। कई मुस्लिम प्रमाणन संस्थाएँ reversible stunning स्वीकार करती हैं, जिसमें जानवर मरे बिना अस्थायी रूप से बेहोश होता है। कुछ संस्थाएँ बिना stunning किए वध को ही स्वीकार करती हैं।
Codex के अनुसार हलाल करने वाला व्यक्ति मुस्लिम होना चाहिए। व्यक्तिगत मजहबी उपभोग के संदर्भ में यह इस्लामी प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन यदि किसी देश का पूरा मांस बाजार हलाल व्यवस्था पर निर्भर हो जाए तो पशु काटने का एक विशेष काम गैर-मुस्लिम कर्मचारियों के लिए व्यावहारिक रूप से बंद हो सकता है।

अधिकार की रक्षा हो, लेकिन छिपी अनिवार्यता नहीं: क्यों मुसीबत में व्यापारी

किसी भी मुस्लिम व्यक्ति को हलाल खाना खरीदने, उसकी पहचान करने और उसका सर्टिफिकेट माँगने का पूरा अधिकार है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पूरे देश का खाद्य उद्योग हलाल व्यवस्था को ही सामान्य नियम मान ले। यह भी जरूरी नहीं कि गैर-मुस्लिम ग्राहक और व्यापारी किसी मजहबी सर्टिफिकेट का खर्च उठाएँ या उसके नियम मानने के लिए मजबूर हों।
इसका सही रास्ता न तो हलाल सर्टिफिकेशन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाना है और न ही उसे हर जगह अनिवार्य बनाना। हलाल सर्टिफिकेशन लोगों और कारोबारियों की इच्छा पर निर्भर होना चाहिए। सर्टिफिकेट देने वाली संस्था और उसकी फीस की जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। खाने के पैकेट पर साफ लिखा होना चाहिए कि वह हलाल प्रमाणित है या नहीं। बाजार में गैर-हलाल विकल्प भी आसानी से उपलब्ध रहने चाहिए। सरकारी खाद्य-सुरक्षा जाँच को किसी मजहबी प्रमाणपत्र से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
सरकारी खरीद में भी हलाल सर्टिफिकेट की शर्त केवल तभी लगनी चाहिए, जब भोजन खास तौर पर उन लोगों के लिए खरीदा जा रहा हो जिन्हें हलाल खाना चाहिए। इसके लिए भी स्पष्ट कानून या सरकारी नियम होना जरूरी है।
केन्या का यह मामला इसलिए अहम है क्योंकि अदालत को यह तय नहीं करना है कि हलाल सही है या गलत। अदालत को यह तय करना है कि किसी निजी मजहबी संस्था को बाजार और कारोबार पर कितनी ताकत दी जा सकती है। मजहबी स्वतंत्रता का मतलब लोगों को विकल्प देना है। लेकिन बिना किसी कानून के उसी विकल्प को व्यापार करने की जरूरी शर्त बना देना स्वतंत्रता नहीं बल्कि बाजार पर निजी नियंत्रण बन सकता है।

TCS के बाद अब पुणे के Wipro में इस्लामीकरण कांड, हिंदू महिला बोली- विरोध करने पर मुझे कंपनी से निकाला; ‘इस्लाम अपनाओ, मुस्लिम लड़के से संबंध बनाओ’

           पुणे की Wipro कंपनी में हिंदू महिला कर्मचारी पर जबरन धर्मांतरण का आरोप ( साभार : Bhaskar)
TCS नासिक कांड के बाद अब पुणे की दिग्गज IT कंपनी ‘विप्रो’ (Wipro) से भी ऐसा ही चौंकाने वाला मामला सामने आया। 
Wipro की एक पूर्व हिंदू महिला कर्मचारी ने कंपनी के ही एक सहकर्मी पर जबरन धर्मांतरण का दबाव बनाने और मानसिक उत्पीड़न का गंभीर आरोप लगाया है।

देश में मुस्लिम कट्टरपंथी हर क्षेत्र में घुसकर माहौल ख़राब करने की कोशिश कर रहे हैं। हिन्दू महिलाओं को नौकरी पर रखो और लव जिहाद की आड़ में इस्लाम कबूल करने का दबाव बनाओ। क्या सरकार ऐसे कर्मचारियों, अधिकारियों और कंपनी के विरुद्ध सख्त कार्रवाही करेगी? क्या हिन्दू महिलाओं को अपने जाल में फंसा इस्लाम कबूल करवाकर फिदायीन बनाने का घिनौना खेल चल रहा है? पकडे जाने पर बदनाम होंगे हिन्दू।    

इस मामले में पुणे के हिंजवड़ी थाने में शिकायत दर्ज कराई गई है। साथ ही हिंदू पीड़ित के वकील ने Wipro कंपनी को एक लीगल नोटिस भी भेजा है। हिंदू जनजागृति समिति की प्रेस कॉन्फ्रेंस में हिंदू पीड़िता ने अपनी आपबीती बताई।

पीड़िता का आरोप है कि उसका एक साथी कर्मचारी उसे बार-बार इस्लाम अपनाने और एक मुस्लिम युवक से संबंध बनाने के लिए मजबूर करता था। विरोध करने पर कंपनी के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने महिला की मदद करने के बजाय उल्टा उसी पर दबाव बनाया।

पीड़िता का आरोप है कि अगस्त 2025 में एक ऑनलाइन मीटिंग के दौरान उससे जबरन इस्तीफा ले लिया गया। पीड़िता के वकील विवेक भोसले ने बताया कि Wipro कंपनी को नोटिस भेजकर महिला को वापस नौकरी पर रखने और मानसिक प्रताड़ना के लिए 50 लाख रुपए का मुआवजा देने की माँग की गई है।

नोटिस में कहा गया है कि अगर 15 दिनों में कार्रवाई नहीं हुई, तो वे कोर्ट जाएँगे। फिलहाल Wipro कंपनी की तरफ से इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है और पुलिस मामले की जाँच कर रही है।

अखलाख, हमास, फिलिस्तीन और गाज़ा पर मातम करने वाले ईद पर सूर्या की क़ुरबानी पर खामोश क्यों? पड़ोसी मुस्लिमों के मुँह से भी कट्टरपंथियों के लिए नहीं फूट रहा एक भी शब्द

गाजियाबाद के खोड़ा में सूर्या चौहान की हत्या के बाद एनकाउंटर में मुख्य आरोपित असद भी ढेर हो गया। गंगा-जमुना की तहजीब और सेकुलरिज्म का रोना वाले सूर्या की क़ुरबानी पर क्यों खामोश हैं? टीवी पर चर्चाओं में जब घिरने पर बेशर्म संविधान की दुहाई देने लगते हैं। वामपंथी लिबरल गैंग ने सूर्या की हत्या से ज्यादा एनकाउंटर में मारे गए असद की चिंता की। यहाँ तक कि कुर्बानी देखने के लिए बुलाए गए सूर्या की निर्मम हत्या को आपसी विवाद में हत्या करार दे दिया।

सूर्या की हत्या में शामिल नवाब, फरहान, आतिफ और शारिक को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। घटना के बाद से असद फरार था, जिस पर 50 हजार रुपए इनाम की घोषणा की गई थी। पुलिस ने सूचना मिलने पर उसे इंदिरापुरम में ढेर कर दिया। इससे पहले इलाके में तनाव को देखते हुए पुलिस लगातार सतर्क है। बकरीद के दिन सूर्या चौहान की घर से बुला कर हत्या कर दी गई। उसे ‘आओ कुर्बानी कैसे दी जाती है, तुम्हें दिखाते हैं…’ कह कर घर से बुलाकर सूर्या को ले जाने और उसकी चाकूओं से निर्मम हत्या करने पर लिबरल वामपंथी गैंग का मुँह नहीं खुला।

घटना की निंदा करना तो दूर प्रोपेगेंडाबाजों ने घटना की जानकारी देना भी जरूरी नहीं समझा। देता भी कैसे? इस खबर से उनकी पोल खुल जाती, जो हमेशा देश में मुस्लिमों पर तथाकथित ‘अत्याचार’ की दुहाई देते-देते नहीं थकते। ट्वीट करते हैं, रिट्वीट करते हैं, लंबी-लंबी पोस्ट लिखते हैं, सरकार की आलोचना करते हैं। लेकिन, 17 साल के हिन्दू युवक की इस तरह हत्या राजधानी दिल्ली से सटे गाजियाबाद के खोड़ा में हो जाती है, ये कुछ नहीं बोलते।

Republic Bharat पर अपने शो महाभारत पर एंकर राम मोहन शर्मा जब इस दुर्घटना की ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रहे थे तब एक महिला ने कहा कि सरकार को इन लोगों को मिलने वाली हर सुविधा वापस ले लेनी चाहिए। यह सच भी है। जब तक सरकार ऐसे ठोस कदम नहीं उठाएगी इस तरह की हरकतों, दंगों और हिन्दू त्यौहारों पर होने वाली पत्थरबाज़ी बंद नहीं होगी। दूसरे, इन कट्टरपंथी और इनके समर्थकों को मालूम है कि मोदी सरकार सिर्फ पाकिस्तान के लिए सख्त हो सकती है, किसी और के लिए नहीं। बांग्लादेश में हिन्दुओं का नरसंहार होने के बावजूद मानवीय आधार पर आर्थिक मदद बंद नहीं की जबकि पाकिस्तान का पानी बंद कर दिया।      

प्रोपेगेंडाबाजों की पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग

हत्या की हर हाल में आलोचना की जानी चाहिए। यहाँ नाबालिग युवक को बुला कर हत्या कर दी जाती है। चूँकि सभी आरोपित मुस्लिम हैं, इसलिए चुप रह जाओ। आरफा खानम को ही देख लो, मुख्यमंत्री योगी के आपत्तिजनक शब्द का इस्तेमाल करने की उसने आलोचना नहीं की, लेकिन ऐसा बोलने वाले मुस्लिम को जब पुलिस उठा कर ले गई, तो सामने आ गई अत्याचार की कहानी लेकर।

हिन्दू नाबालिग लड़के की बेरहम हत्या पर बात करना, तो वैसे भी उसके सिलेबस से बाहर का विषय है। द वायर, द क्विंट, द प्रिंट में तो खबर छापी, लेकिन हत्या को नाबालिगों द्वारा की गई वारदात कहा। द प्रिंट ने कहा, “सूर्या को पास के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। शुक्रवार को चोटों के कारण उनकी मृत्यु हो गई, जिससे खोड़ा कॉलोनी में विरोध प्रदर्शन भड़क उठे। शनिवार को स्थानीय बाजार बंद रहा, जबकि पुलिस ने फ्लैग मार्च किया।”

वहीँ द क्विंट ने मुख्य आरोपित असद के पुलिस एनकाउंटर में मौत पर जोर देते हुए बताया कि 31 मई 2026 को, उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में बकरीद के दौरान 17 साल के एक हिंदू छात्र की हत्या के मुख्य आरोपी असद को पुलिस मुठभेड़ में मार गिराया गया। पीड़ित, सूर्य चौहान को बकरीद के दिन एक कहासुनी के दौरान चाकू मार दिया गया था, और 29 मई 2026 को इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। पुलिस ने असद की तलाश शुरू कर दी थी, जो घटना के बाद से कथित तौर पर फरार था।

क्यों की गई सूर्या की हत्या

सूर्या और असद पड़ोसी हैं। खोड़ा की गली में दोनों का मकान है। बताया जाता है कि सात आठ महीने पहले एक छोटा सा विवाद हुआ था। दोनों के माता-पिता ने अपने-अपने बच्चे को समझाया और मामला शांत हो गया। लेकिन बातचीत दोनों परिवारों में लगभग नहीं होती थी। बकरीद के दिन सूर्यो चौहान का बाइक चलाने को लेकर असद और उसके दोस्तों से विवाद हुआ। इनलोगों ने उसे चाकूओं से गोद कर हत्या कर दी।

चश्मदीदों के मुताबिक, असद और उसके साथियों ने सूर्या से कहा, “क्या तुमने कभी बकरे की कुर्बानी देखी है?” जब सूर्या ने मना किया, तो उन्होंने कथित तौर पर कहा, “आज तुझे दिखाते हैं।” इसके बाद आरोपियों ने उस पर चाकू से ताबड़तोड़ वार कर दिए। हमले में सूर्या बुरी तरह घायल हो गया और अस्पताल ले जाते समय दम तोड़ दिया।

सूर्या का भाई मानसिक रूप से विक्षिप्त है। वह अपने माँ-बाप का एकमात्र सहारा था। इस मामले में असद, नवाब, फरहान, आतिफ और शारिक सहित कई लोगों के नाम सामने आए। सभी आरोपितों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। मुख्य आरोपित असद फरार चल रहा था, जिसे इंदिरापुरम में एक मुठभेड़ में पुलिस ने मार गिराया।

पड़ोसी घटना को लेकर जता रहे अनभिज्ञता

घर से कुछ दूर पर 17 साल के युवक सूर्या चौहान की हत्या हो जाती है। उसके आस पड़ोस में ज्यादातर मुस्लिम परिवार रहते हैं। ये लोग मुँह खोलने को तैयार नहीं हैं। ये ऐसे जता रहे हैं, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। भीडभाड़ पूरी है, लेकिन कोई ये नहीं बता रहा कि उसे घटना की जानकारी है।

सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो आए हैं, जिससे पता चलता है कि हिन्दू युवक की बेरहमी से कत्ल किए जाने पर लोगों को कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा। ये लोग कैमरा देख कर चुपचाप बचते नजर आ रहे हैं।

सूर्या की मौत के बाद पड़ोसी मुस्लिम घर के बाहर एक किलो से ज्यादा बकरे का मांस नीचे रखा मिला। जब कुछ लोगों ने बोला, तो बच्चों को भेजकर उसे नाली में डाल दिया गया। इससे भी हिन्दुओं में गुस्सा है।

सूर्या की माँ ने असद के एनकाउंटर पर संतोष जताया

मुख्य आरोपित असद की मुठभेड़ में मौत के बाद सूर्या की माँ का बयान सामने आया। सूर्या की माँ सरोज का कहना है कि उसने सिर्फ एक का एनकाउंटर देखा है। वह चाहती है कि असद की तस्वीर उसे दिखाई जाए। तस्वीर देखने के बाद ही उसे विश्वास होगा कि वह मारा जा चुका है। सरोज का कहना है कि बाकी आरोपितों को भी इसी तरह से मौत के घाट उतारा जाना चाहिए। इतना ही नहीं उनके घरों पर बुलडोजर भी चलना चाहिए।

इस मामले में 5 नामजद आरोपितों को पुलिस ने 30 मई 2026 को गिरफ्तार किया। असद के बारे में पुलिस को जानकारी मिली कि वह इंदिरापुरम में छिपा हुआ है। उसे पुलिस ने घेर लिया, उसने पुलिस पर फायरिंग की। इस दौरान असद को पुलिस ने बुरी तरह घायल कर दिया और अस्पताल ले जाते वक्त उसकी मौत हो गई। बाकी आरोपित भी पहले से ही पुलिस की गिरफ्त में हैं।

‘लव जिहाद देश के लिए खतरा’, "एक षड़यंत्र" : हरियाणा की अदालत ने शहबाज को सुनाई 7 साल की जेल; CAA विरोध में मोदी विरोध में हिन्दुत्व के अपमान का विरोध नहीं करना देश को पड़ रहा भारी

                                                                                                                                                                                            साभार 
हरियाणा की एक अदालत ने लव जिहाद को देश के लिए खतरा करार दिया है। अदालत ने कहा है कि भले ही कानून में इसको लेकर कुछ ना कहा गया हो लेकिन यह एक षड्यंत्र है। यह टिप्पणियाँ अदालत ने एक नाबालिग हिन्दू लड़की की FIR पर दायर मुकदमे में सुनाई है।

क्या ऐसी भाषा का इस्तेमाल इस्लाम के खिलाफ किया जा सकता था?
बेशर्म हिन्दू बर्दाश्त करते रहे 
 
जिस तरह देश में लव जिहाद और इस्लामिक धर्मांतरण का खेल चल रहा है, पक्ष और विपक्ष के हिन्दुओं में इस बात पर चर्चा शुरू हो रही है कि लव जिहाद की शिकार लड़की के पक्ष में खड़ा होने की बजाये पूरे परिवार का सामाजिक बहिष्कार किया जाये। जब तक हिन्दू महिलाओं में इसके दुष्परिणामों से सचेत किया जायेगा वह दिन दूर नहीं देश गज़वा-ए-हिन्द बन जायेगा। CAA विरोध में बने शाहीन बागों में हिन्दुत्व के विरोध में उठी आवाज़ों को मोदी विरोध में नज़रअंदाज़ करना दुर्भाग्यपूर्ण था। मोदी विरोध में हिन्दुत्व को दांव पर नहीं लगाना था। जिस तरह शाहीन बागों में हिन्दुत्व के लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया था अगर इस्लाम के विरुद्ध कर दिए होते कत्लेआम हो गया होता। बेशर्म हिन्दू सुनते रहे।       

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हरियाणा के यमुनानगर में जगाधरी की एक अदालत ने 17 जुलाई, 2025 को यह फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि उसके सामने आया मामला लव जिहाद है। अदालत ने लव जिहाद को देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा बताया।

अदालत ने कहा कि भले ही भारतीय न्याय संहिता (BNS) और POCSO में लव जिहाद को लेकर कोई परिभाषा नहीं दी गई है लेकिन यह असल में मुस्लिम पुरुषों का गैर-मुस्लिम महिलाओं के साथ प्रेम में होकर उन्हें इस्लाम में धर्मांतरित करने का एक षड्यंत्र है।

यह फैसला जज रंजना अग्रवाल ने सुनाया। उन्होंने इस मामले में दोषी शहबाज को कुल 7 साल की सजा सुनाई। उसे एक मामले में 4 साल, एक में 2 साल और एक में 1 साल की सजा सुनाई गई है। उस पर POCSO समेत बाकी धाराओं में लगाए गए आरोप में यह सजाए सुनाई गईं।

अदालत ने उस पर ₹1 लाख का जुर्माना भी ठोंका। शहबाज एक 14 वर्षीय हिन्दू बच्ची को स्कूल जाते समय परेशान करता था। वह हिन्दू बच्ची पर दबाव बनाता था कि वह एक मुस्लिम नाबालिग के साथ रिश्ते में आ जाए।

वह इसके लिए लगातार बच्ची का पीछा करता था और उसका उत्पीड़न करता था। बच्ची ने इस मामले में नवम्बर, 2024 में मामला दर्ज करवाया था। अब कोर्ट ने इस मामले में अंतिम फैसला सुनाया है।

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सेकुलरिज्म सिर्फ तब तक, जब तक भारत में इस्लाम की हुकूमत नहीं ले आते : अरफ़ा खानुम, मुस्लिम पत्रकार
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विपक्ष में हिन्दुओं को सताया गज़वा-ए-हिन्द का डर; आगरा का धर्मांतरण गिरोह निकला ‘छांगुर पीर’ से भ

गौरतलब है कि लम्बे समय से मुस्लिम युवक, हिन्दू युवतियों को फँसाने के लिए पहचान बदल कर, कलावा पहन और तिलक आदि लगा कर भ्रमित करते रहे हैं। ऐसे मामलों में पहचान तब सामने आती है जब हिन्दू पीड़िता पूरी तरह से फँस चुकी होती है। केरल में ईसाई युवतियाँ भी इसकी शिकार हुई हैं।

जुबैर ने कोई तथ्यात्मक जाँच (फैक्ट चेक) नहीं की: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी वकील से पूछा – ‘जुबैर पर देश की एकता एवं अखंडता को नुकसान पहुँचाने वाली धारा क्यों नहीं लगे’

यति नरसिंहानंद का क्लिप ऑल्ट न्यूज के सह संस्थापक मोहम्मद जुबैर द्वारा सोशल मीडिया पर शेयर करने के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कई सवाल किए। इस मामले में यति नरसिंहानंद फाउंडेशन की शिकायत पर जुबैर के खिलाफ विभिन्न धाराओं के साथ-साथ बीएनएस की धारा 152 में भी मुकदमा दर्ज किया गया है। कोर्ट ने जुबैर के वकील से पूछा कि उस पर देश की एकता एवं अखंडता को नुकसान पहुँचाने वाली धारा 152 क्यों नहीं लगानी चाहिए थी। वहीं, सरकार से भी इस पर जवाब माँगा था।

वहीं, अतिरिक्त अटॉर्नी जनरल (AAG) ने कहा कि एफआईआर से पता चलता है कि मोहम्मद जुबैर के आचरण ने क्या किया है। इससे कितना नुकसान हुआ है और देश की संप्रभुता और अखंडता के लिए कितना खतरा पैदा हुआ है। AAG ने कहा कि जुबैर ने अपने एक्स पोस्ट पर आधी-अधूरी जानकारी दे रहा था। वह यह नहीं देख रहा है कि कोर्ट ने यति नरसिंहानंद को जमानत दी है।

AAG ने कहा कि जुबैर ने कोई तथ्यात्मक जाँच नहीं की। उसने कहा कि ‘लोग मुझ पर विश्वास करते हैं, इसलिए रीपोस्ट कर रहे हैं। एक हजार लोग रीपोस्ट कर रहे हैं। वह कह रहे हैं कि एफआईआर हुई, उन्हें (यति नरसिंहानंद) जमानत मिल गई.. और वह ट्वीट कर रहे हैं कि कोई कार्रवाई नहीं हुई।’ उन्होंने पूछा कि क्या यह फैक्ट चेक है?

बहराइच के जिस घर में हुई राम गोपाल मिश्रा हत्या, वहाँ खून के धब्बे-काँच की बोतलें : बिजली के झटके देकर भी किया टॉर्चर, अब्दुल हमीद की लाइसेंसी बंदूक से मारी गोली; घर पर बुलडोज़र ही नहीं हर सरकारी सुविधा भी इन जालिमों की छीनी जाए

    रामगोपाल मिश्रा (दाएँ) और अब्दुल हमीद की छत पर मिले पत्थर (बाएँ) (चित्र साभार: Bhaskar & Amar ujala)
बहराइच में रविवार (13 अक्टूबर, 2024) को इस्लामी कट्टरपंथियों ने दुर्गा पूजा के जुलूस पर हमला किया था। यहाँ इस्लामी कट्टरपंथियों ने रामगोपाल मिश्रा की हत्या कर दी थी। रामगोपाल मिश्रा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सामने आया है कि वह उन्हें करेंट लगाया गया था और उनके नाखून उखाड़ कर बर्बरता की गई थी।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया है कि अब्दुल हमीद और उसके साथ के मुस्लिमों ने रामगोपाल मिश्रा को गोली मारने के बाद करेंट लगाया था और प्रताड़ित किया था। उनके पैर के नाखून उखाड़े गए और साथ ही में धारदार हथियारों से हमला किया गया। आँखों के पास नुकीली चीज मारी गई थी।

करेंट लगाने के कारण रामगोपाल मिश्रा को ब्रेन हैमरेज हो गया था। बर्बरता की वजह से उनका खून भी बहा था और ज्यादा इन्हीं दोनों कारणों से रामगोपाल मिश्रा की मौत हुई। इस प्रताड़ना की बात रामगोपाल मिश्रा की पत्नी ने भी बताई थी।

अमर उजाला की रिपोर्ट में बताया गया है कि रामगोपाल को अब्दुल हमीद की लाइसेंसी बंदूक से गोली मारी गई थी। इससे उनके शरीर में छर्रे फ़ैल गए थे। इस बंदूक का लाइसेंस निरस्त करने के लिए पुलिस ने रिपोर्ट भेजी है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट में बताया गया है कि अब्दुल हमीद के घर की छत पर खून के धब्बे भी मिले हैं। यहाँ कांच की बोतलों के टुकड़े भी मिले हैं। संभवतः रामगोपाल मिश्रा पर काँच की बोतलों से वार किया गया था। यह भी अंदाजा लगाया जा सकता है कि रामगोपाल को काँच की बोतलें लगीं जिसके कारण वह पहले घायल हुए।

रामगोपाल मिश्रा शव के साथ बर्बरता करने के बाद भी जब अब्दुल हमीद और उसके साथ के मुस्लिमों का मन नहीं भरा तो उन्होंने शव को लेने आए लोगों पर भी हमला बोला। रामगोपाल के भाई और दोस्त जब शव निकालने लगे तो उन पर फायरिंग और पथराव हुआ।

रिपोर्ट्स में बताया गया है कि अब्दुल हमीद और उसका परिवार भाग कर अब नेपाल चला गया है। ऑपइंडिया ने इससे पहले बताया था कि अब्दुल हमीद का एक बेटा नेपाल में रहता है और अपराधी है। सूचना मिली है कि अब्दुल हमीद और उसका परिवार नेपाल के रिश्तेदार के यहाँ शरण लेकर बैठा हुआ है।

यह भी सामने आया है कि रामगोपाल मिश्रा ने भगवा झंडा मुस्लिमों के हमले के बाद लगाया था। पहले दुर्गा पूजा पर पथराव किया गया था, इसमें देवी प्रतिमा पर पत्थर लगा था और उसे नुकसान पहुँचा था। इसके बाद हिन्दू शांतिपूर्ण रूप से प्रदर्शन कर रहे थे। एक और घायल ने बताया है कि पहले मस्जिद ने निकल कर लोगों ने उन पर हमला किया था।

बहराइच में हुए दंगे के बाद अब यहाँ पुलिस की भारी तैनाती है। फरार दंगाइयों को गिरफ्तार करने के प्रयास किए जा रहे हैं। रामगोपाल मिश्रा का परिवार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिला है। उन्होंने इस मामले में सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया है।

वो चाहते थे कि मोदी सत्ता में न आए लेकिन फिर भी आ गया, अब चाहते हैं ट्रंप न आए, लेकिन वह भी आएगा

सुभाष चन्द्र 

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एक 20 साल का युवक Thomas Matthew Crooks गोली मार हत्या करने की नाकाम कोशिश करता है जिसके बारे में अमेरिकी रिकॉर्ड के अनुसार कहा गया है कि उसने 17 वर्ष की आयु में एक ऐसे संगठन को 15 डॉलर का दान किया था जो वामपंथी और democrat politicians के लिए काम करता था। मतलब उसकी सोच सामने है।

Crooks का एक भवन पर चढ़ कर जाना और वहां से ट्रंप पर गोली चलाना साबित करता है कि सुरक्षा एजेंसियां प्रबंधों में फेल हुई वरना तो ट्रंप बिडेन या अन्य बड़े लोगों के लिए तो आसपास के सभी भवनों को सील कर दिया जाना चाहिए लेकिन Crooks पर लगता है कोई पाबंदी नहीं थी।

भारत में यदि ऐसा हुआ होता तो सुरक्षा कर्मियों के हाथों हमलावर के मारे जाने पर जाति और धर्म तलाश कर राजनीति शुरू हो जाती और इसे “जघन्य हत्या” बता कर उसके परिवार के लिए भारी भरकम मुआवजा मांग लिया जाता  और यदि  किसी विशेष धार्मिक समुदाय का होता तो उसे अभी तक “मानसिक रूप” से विक्षिप्त कह कर “पीड़ित” साबित कर दिया गया होता।

भारत में प्रधानमंत्री मोदी को सत्ता में आने से रोकने के लिए George Soros, China, पाकिस्तान, अनेक इस्लामिक संगठन और स्वयं अमेरिका के बहुत संस्थान लगे हुए थे लेकिन मोदी फिर भी नहीं रुका। मोदी को बार बार मणिपुर जाने के लिए कांग्रेस द्वारा जोर देना कुछ ईशारा करता है कि शायद वहां कोई खेल की संरचना की गई हो मोदी की हत्या की और इसलिए मेरे विचार से मोदी जी को मणिपुर फिलहाल तो नहीं जाना चाहिए। जो कांग्रेस विदेशी ताकतों से मिलकर मणिपुर का षड़यंत्र रच सकती है, वह कुछ भी कर सकती है।

प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रंप पर हमले को गंभीर बताते हुए चिंता व्यक्त करते हुए निंदा की है और कहा है कि राजनीति में हिंसा का कोई स्थान नहीं है लेकिन यह बात आपके विरोधी नहीं मानते। दूसरी तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन ने कहा है कि “उन्हें ख़ुशी है ट्रंप सुरक्षित हैं और अमेरिका में इस तरह की हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है, हमें एक राष्ट्र के रूप में इसकी निंदा करनी चाहिए”। 

लेकिन बिडेन साहब, यह Gun Culture तो अमेरिका के आम जीवन का हिस्सा बन चुकी है क्योंकि आए दिन अमेरिका में जगह जगह लोग ऐसे गोली चलाते फिरते हैं जैसे उनके लिए ऐसा करना कोई खेल का विषय हो और हत्या करने में आनंद लेते हैं। अबकी बार यह गोलीकांड आपके प्रतिद्वंदी के साथ हुआ है। अफ़सोस इस बात का है कि कोई अमेरिकी राष्ट्रपति इस Gun Culture को रोक लगाने के लिए तैयार नहीं है।

अब इसके पीछे कौन है इसका पता लगाना तो संभव नहीं होगा क्योंकि Crooks को तो मार गिराया गया है। इसका जवाब ढूढ़ने के लिए पहले जानना होगा कि पिछले चुनाव में कौन सी शक्तियां थी जो ट्रंप की जीत को रोक रही थी और वे ही शक्तियां आज भी उसे वापस नहीं आने देना चाहती। 

कौन नहीं जानता पिछले चुनाव में Soros और China ने खेल खेला था और अभी भी वे इसके पीछे हो सकते हैं लेकिन किसी के रोल कभी सामने नहीं आते खासकर तब, जब हमलावर ढेर हो जाता है। 

एक 20 वर्ष के युवक के दिल में ट्रंप के इतनी नफरत कहां से और कैसे आ गई जो उसने ट्रंप की  हत्या का ही इरादा बना लिया? कोई तो होगा उसका “मार्गदर्शन” करने वाला? सलमान रुश्दी पर जानलेवा हमला करने वाला “Hadi Matar” भी मात्र 24 साल का था जिसने रुश्दी की किताब “Satanic Verses” लिखने पर उसे दंड देने के लिए हमला किया था, जो 1988 में लिखी गई थी, यानी किताब लिखने के 10 साल बाद पैदा होने वाले के दिल में इतनी नफरत थी रुश्दी के लिए जो उसकी जान लेने की कोशिश कर दी? लेकिन उसका मार्ग दर्शन तो मज़हब विशेष था, Crooks का कौन था? “Satanic Verses” किताब लिखने पर सलमान रुश्दी पर तो हमला हो सकता है, लेकिन 1995, 1998, 1999 में Islam Sex & Violence और Islam The Arab Imperialism आदि अन्य किताबें लिखने वाले अनवर शेख के खिलाफ मुंह खोलने की आज तक किसी की हिम्मत नहीं हुई, क्यों? 

ट्रिपल तलाक़ से मुक्ति के बाद भी मोदी को वोट न देने वाली मुस्लिम औरतों को अब कुछ समझ आया ? सुप्रीम कोर्ट ने नए फैसले में मोदी के कानून में ही उन्हें गुजारा भत्ते के अधिकार दिए हैं

सुभाष चन्द्र

वर्ष 1985 में सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की संविधान पीठ ने शाहबानो केस में CrPc के section 125 मुस्लिम महिलाओं को तलाक़ के बाद अपने शौहर से गुजारा  भत्ता लेने का अधिकार दिया था। उस बेंच में जज थे - चीफ जस्टिस वाई वी चंद्रचूड़, जस्टिस रंगनाथ मिश्रा, जस्टिस डी ए देसाई, जस्टिस ओ चिनप्पा रेड्डी और जस्टिस E S Vekkataramaiah। इस फैसले में मध्यप्रदेश हाई कोर्ट के फैसले की पुष्टि की गई थी और मौहम्मद अहमद खान को अपनी पत्नी शाहबानो को गुजारा भत्ता देने के आदेश दिए गए थे। फैसले में कहा गया था मुस्लिम पर्सनल लॉ के रहते हुए भी तलाकशुदा औरत को CrPc के section 125 में गुजारा भाता लेने का अधिकार है।

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लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने मुस्लिम संगठनों के दबाव में और मुस्लिम तुष्टिकरण की खातिर संसद में बिल पास करा कर वह आदेश रद्द कर दिया और मुस्लिम औरतें फिर अपनी पतियों की रहमोकरम पर सड़कों पर आ गई। लेकिन 30 साल बाद नरेंद्र मोदी ने उन्हें ट्रिपल तलाक़ से मुक्ति दिलाई और रात के अंधेरे में छोटी छोटी बात पर बच्चों के साथ घर से निकाले जाने से छुटकारा दिलाया लेकिन वे औरतें सब भूल गई और मोदी को 2024 के इलेक्शन में तबियत से उसे हटाने के लिए वोट दिया।  

सुप्रीम कोर्ट द्वारा तलाकशुदा मुस्लिम महिला को गुजारा भत्ता देने के निर्णय से मुस्लिम कट्टरपंथियों में बड़ी जबरदस्त खलबली मच गयी है। उनके द्वारा इसे इस्लाम पर हमला बताया जा रहा है। जुलाई 11 को टीवी परिचर्चाओं में सहभागी बने मौलानाओं को पहली बार जलील होते देखा। सबसे बड़ी बात News18 पर एंकर लुबिका लियाकत द्वारा उस तस्लीम रहमानी को, जिसके कारण निर्दोष नूपुर शर्मा को 'सर तन से जुदा' गैंग की वजह से गुमनामी जिंदगी जीने को मजबूर होना पड़ा, मुंह काला करने को बोल दिया। नीचे देखिए वीडियो। 

हो सकता है कि ये कट्टरपंथी जितना ज्यादा इस मुद्दे को उछलेंगे, उतना ही इस्लाम के लिए नुकसानदेह होने वाला है। इन परिचर्चाओं में एक बात मुखर हुई की निकाह एक contract है, लेकिन ये नहीं बता रहे कि contract for what? हलाला? आने वाले समय में यही contract for what गरमाने वाला है। दूसरे, इन परिचर्चाओं में एक बात और सामने आयी कि 'जब कोई पुरुष चोरी करता है, जेब काटता है, क़त्ल करता है आदि अपराध करने पर कोर्ट को क्यों जाते हैं, तब शरीयत कहाँ चली जाती है? औरतों के अधिकारों पर ही शरीयत क्यों जरुरी हो जाती है?  

    

जुलाई 10 को भी सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस B V Nagarathna  और जस्टिस Augustine George Masih की पीठ ने एक बार फिर section 125 में मुस्लिम महिला के गुजारा भत्ता पाने के अधिकार को सही कहा और यह भी कहा कि यदि किसी महिला की अर्जी Section 125 में लंबित है तो वह The Muslim Women (Protection of Rights on Marriage) Act, 2019 के अंतर्गत भी अपना अधिकार मांग सकती है।

इसी क़ानून में ट्रिपल तलाक़ देने वाले को 3 साल की सजा का प्रावधान किया गया था जिसके खिलाफ बड़े बड़े मौलाना लड़ते रहे हैं। 

जुलाई 10 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी तेलंगाना हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ एक मुस्लिम द्वारा लड़ा गया था और हाई कोर्ट ने उसे अपनी तलाकशुदा पत्नी को 10 हजार रूपए महीने गुजारा भत्ता देने के आदेश दिए थे। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा है।  

ऐसे में अब सवाल उठता है कि जो नरेंद्र मोदी ने मुस्लिम महिलाओं के लिए किया, वह उनके ही हित में था लेकिन कुल मिला कर औरतों समेत 98% मुसलमानों ने मोदी को हटाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया और कांग्रेस के तलुए चाटने लगे जिसने शाहबानो केस से लेकर अभी तक मुस्लिम महिलाओं का साथ नहीं दिया। 2024 लोक सभा चुनाव में कुछेक मुस्लिम महिलाओं को बीजेपी को वोट देने के कारण तलाक का सामना करना पड़ा। 

आज भी कांग्रेस जुलाई 10 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संसद से रद्द कराने के लिए हल्ला ठोकेगी। अब देखते हैं मुस्लिम संगठनों ने जिस तरह शाहबानो के फैसले के खिलाफ आवाज़ उठाई थी, अब कितना उत्पात करते हैं। 

वैसे तो जो आचरण मुस्लिम महिलाओं ने मोदी के लिए दिखाया है, अब मोदी की तरफ से उनके लिए कुछ भी करना फिर से धोखा खाना होगा क्योंकि ये महिलाएं और मुस्लिम पुरुष किसी हाल में मोदी का समर्थन नहीं करेंगे।

यूरोप, पश्चिमी देश और अमेरिका, अब भारत के मामलों में दखल देना बंद करें; मुसलमानों के उत्पीड़न के लिए चिल्ल पों अब बंद होनी चाहिए ; उनका उत्पीड़न है तो उन्हें अपने देशों में शरण दे सकते हैं

 सुभाष चन्द्र 

अमेरिका की संस्था USCIRF 1998 में स्थापना के बाद से ही भारत के विरुद्ध मुस्लिमों के उत्पीड़न का आरोप लगाती रही है। शायद ही इसकी कोई रिपोर्ट आई हो जिसमें भारत की निंदा न की गई हो। अभी इस संस्था “अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग” में एक भी हिंदू सदस्य नहीं रखा गया है और इसी से साबित होता है कि यह भारत के विरुद्ध नेरेटिव बनाने के लिए  एकतरफा रिपोर्ट बनाता है।

ब्रिटेन के समाचार पत्र “डेली एक्सप्रेस” के असिस्टेंट एडिटर सैम स्टीवनसन भारत के लोकसभा चुनावों को कवर करने आए हुए हैं। उन्होंने कल खुल कर कहा कि यूरोप और पश्चिमी देशों ने अपने मीडिया के जरिए भारत के खिलाफ “नकारात्मक और पक्षपातपूर्ण” कहानियों के हुजूम लगा दिए हैं। जबकि जमीनी हकीकत है कि प्रधानमंत्रियों की चुनावी रैलियों में सांप्रदायिक सद्भाव की झांकी देखी जा सकती है।

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स्टीवनसन ने कहा कि ब्रिटिश मीडिया कुछ जटिल चीज़ों को सतही रुप से देखने का प्रयास कर रहा है और मोदी को इस्लाम विरोधी बताते हैं जबकि मोदी की रैलियों में मुस्लिम महिलाओं समेत हर धर्म के लोग आते हैं। इस देश की समृद्ध विरासत और समग्रता को नज़रअंदाज किया जा रहा है। स्टीवनसन ने कहा कि भारत विरोधी बकवास के साथ भारत को नीचा दिखाने के प्रयास बंद होने चाहियें। दुर्भाग्य से पश्चिमी और यूरोप के देशों का नजरिया भारत एक लिए अच्छा नहीं है।

स्टीवनसन की बातों में मुझे और जोड़ना है कि ये पश्चिमी और यूरोपियन देश अपने मीडिया के जरिए ही भारत की नकारात्मक छवि नहीं बना रहे बल्कि उन्हें ऐसा करने में भारत के अनेक ढक्कन पत्रकार इन देशों में ही नहीं अमेरिका में भी बहरत के खिलाफ जहर पैदा करने में सहायक है और उनके काम में कुछ राजनेता भी भरपूर सहयोग कर रहे हैं। सैम पित्रोदा जैसे लोग तो अमेरिका में ही बैठे हुए हैं। मोदी को इस्लाम विरोधी बताने में इन विदेशी शक्तियों को भारत के राजनेता भी पूरा योगदान दे रहे हैं।

लेकिन ये पश्चिमी, यूरोपीय देश और अमेरिका आदि अपने अपने देशों में मुस्लिमों को दी हुई छूट से कैसे मकड़जाल में फंसते जा रहे हैं, उन्हें इसका आभास भी नहीं है। ब्रिटेन आज विभाजन के कगार पर खड़ा है, फ्रांस में जब मर्जी मुस्लिम आग लगाने में सक्षम हैं जैसे पिछले साल जनवरी में किया था और यही हाल जर्मनी और अन्य देशों का है।

ब्रिटेन को यह विभाजन का दिन देखना ही पड़ेगा क्योंकि उसने जितने भी देश आज़ाद किए उनमे केवल एक भारत के टुकड़े किए मुस्लिमो के लिए और उस “कुकर्म”  का फल तो भुगतना पड़ेगा हर हाल में।

अमेरिका को ऐसा देखने में कुछ समय लगेगा लेकिन इस्लामिक फोबिया जिसका वह विरोध करता है, उसे ऐसा भुगतना पड़ेगा कि स्थिति को संभालना मुश्किल हो जायेगा। इसलिए बेहतर है अपने अपने मुल्कों को देखें, भारत पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है।

लेकिन इन देशों को समझना चाहिए कि भारत में मुस्लिमों के “उत्पीड़न” नाम की कोई चीज़ नहीं है क्योंकि अगर होती फिर मुस्लिम भारत में आ कर क्यों रहना चाहते हैं। पाकिस्तान बना कर भी पाकिस्तानी भारत आना चाहते हैं, बांग्लादेशी आए घुसपैठ करके और रोहिंग्या भी आए। यहां आने से बेहतर था चीन चले जाते। 

लेकिन फिर भी अगर इन देशों को लगता है मुस्लिमों का “उत्पीड़न” हो रहा है तो जो भी “पीड़ित” हैं, उन्हें अपने यहां ले जाएं और शरण दे दें। इन देशों में जो मिल सकता है मुस्लिमों को, वह भारत नहीं दे सकता जैसे बेरोजगारी भत्ता। 

ओवैसी की जुबान बेलगाम क्यों है? मियां याद रखो, मोदी हिटलर होते तो मुसलमानों को फ्री राशन न देते ; ओवैसी यहूदियों से तुलना कर बेगुनाह मुसलमानों को बदनाम मत करो

सुभाष चन्द्र

कैसे लोकतंत्र को भोग रहा है विपक्ष जो जी भर के मोदी को गाली बकता है और फिर भी कहता है मोदी तानाशाह है जिसने हमारी बोलने की आज़ादी छीन ली है। 

अब ओवैसी पगलाया है जो कह गया कि मोदी हिटलर है और आज मुसलमानों की हालत हिटलर राज में यहूदियों जैसी है; ओवैसी और कहता है कि मुसलमान सबसे गरीब है।  

लगता है ओवैसी मियां कुछ पगला गए हैं। अगर मोदी हिटलर हैं और मुसलमानों की हालत यहूदियों जैसी है तो आज तक 10 साल में मोदी ने कितने मुस्लिमों को जहरीले गैस चैंबरों में डाल कर मारा है। ऐसी बकवास करना बहुत आसान है ओवैसी मियां मगर इसका क्या मतलब है वह तुम खुद भी नहीं बता सकते। 

अगर मुसलमानों की हालत यहूदियों जैसी है इसलिए 'सर तन से जुदा' गैंग हिन्दू कन्हैया लाल तेली का क़त्ल कर देता है। Vote jehad बोल पा रहा है। नवनिर्मित राम मंदिर को तोड़ने की बात बोलता है।  

तुम मुस्लिमों को विक्टिम बता रहे हो तो फिर यह भी बताओ कि मुस्लिम अगर यहूदी जैसे हैं तो यहूदियों के साथ आज हमास, हिज़्बुल्लाह, हुती और ईरान क्या कर रहे हैं, उनका वश चले तो सारे यहूदियों को वो गैस चैंबरों में डाल कर ख़त्म कर दें।

ओवैसी देखो इस वीडियो को मुसलमानों की तुलना यहूदियों से कर किसको पागल बना रहे हो? क्यों बेगुनाह मुसलमानों को बलि का बकरा बनाने पर तूले हो? तुम्हारे जैसे फिरकापरस्तों ने बेगुनाह मुसलमानों को बदनाम किया हुआ है। यहूदियों से तुलना करते शर्म नहीं आयी? 

 

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ओवैसी कह रहे हैं कि देश में सबसे गरीब मुसलमान हैं लेकिन इसके लिए जिम्मेदार कौन है और कौम ने उनकी गरीबी को दूर करने के लिए क्या किया। गरीबी होते हुए भी बच्चे पैदा करते रहने का क्या मतलब अल्लाह की देन बता कर। लेकिन  दंगे करने में वो आगे रहते हैं और सरकारी संपत्ति जलाना अपना फर्ज समझते हैं, आज देश में मस्जिद 3 लाख हो गई जो 1947 में 3000 हजार थी। ये “गरीब मुसलमानों” ने कैसे बढ़ा ली।  

गरीब और अमीर हर कौम में होते हैं लेकिन अन्य कौमों के “गरीब” देश की संपत्ति को आग लगाना अपनी ड्यूटी नहीं समझते और उनके अमीर देश के खजाने में योगदान देते हैं जिसका लाभ आज मुस्लिम भी उठा रहे हैं।

अमीर मुसलमान उन गरीब मुसलमानों को दंगा करने, पत्थरबाजी करने के लिए ट्रेन करते हैं। कश्मीर में पत्थरबाजों की यही कहानी थी कि सब बड़े नेताओं के बच्चे विदेशों में पढ़ते हैं और गरीब मुसलमानों को 500 रुपये देकर सेना पर हमला करवाते थे। यदि मुसलमान यहूदियों की तरह प्रताड़ित हैं तो रोहिंग्या और बांग्लादेशी भारत में क्यों रहना चाहते हैं।

ओवैसी मियां, हिटलर कौन, यह पहचानो। हिटलर तुम्हारा भाई है जिसने कहा कि 15 मिनट के लिए पुलिस हटा दो तो हम 100 करोड़ हिंदुओं को खत्म कर सकते हैं। कश्मीर में मस्जिदों से ही ऐलान किए गए कि सभी मर्द अपनी औरतें छोड़ कर कश्मीर से चले जाएं। जरा बताओ, ओवैसी इसे क्या कहते हैं। ये होती है हिटलरशाही?

मुस्लिम लीग पाकिस्तान ले कर पाकिस्तान चली गई लेकिन मुस्लिम लीग फिर भी देश में मौजूद है और उसी एजेंडे पर काम कर रही है। याद है न केरल से मुस्लिम लीग ने धमकी दी थी कि हिन्दुओं को मंदिरों के बाहर काट कर लटका देंगे और हनुमान चालीसा भी नहीं पढ़ सकोगे। 

ओवैसी कहते हैं कि रजाकार पाकिस्तान चले गए लेकिन सत्य यह है कि जाने वालों से भी बड़े भारत में और पैदा हो गए।

आज भी मौका मिले तो अनेक  मुसलमान मोहम्मद बिन कासिम, गौरी, गज़नी, खिलजी, बाबर, औरंगजेब और टीपू सुल्तान बन सकते हैं। तभी तो 2047 तक गज़वा ए हिन्द की तैयारी है।

मोदी से मुसलमान फ्री राशन लेंगे, फिर भी ओवैसी मोदी को हिटलर कहता है। कोई हिटलर ऐसे किसी को फ्री राशन नहीं देता और ओवैसी मियां, मोदी हिटलर होता तो तुम इतना बोलने की हिम्मत करते तो “गैस चैम्बर” में फ़ेंक दिए जाते।

इसलिए ही पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी के अध्यक्ष रमेश सिंह अरोरा ने महाराजा रणजीत सिंह की बरसी पर भारत से पाकिस्तान जाने वाले श्रद्धालुओं से कहा है कि अपने साथ कम से कम 10 किलो आटा लेकर आएं क्योंकि पाकिस्तान में आटा 800 रुपए किलो है जो मोदी से मुसलमान फ्री में ले रहे हैं।

नेपाल : सुप्रीम कोर्ट के जज को घोषित किया ‘गुस्ताख़-ए-रसूल, ’‘अल्लाह-हू-अकबर’ के साथ ‘सर तन से जुदा’ के नारे

नेपाल में सुप्रीम कोर्ट जज को बता गुस्ताख़ ए रसूल, लगाया 'सिर तन से जुदा' का नारा (चित्र साभार- FB/Farhad Ahmad )
नेपाल में वहाँ के सुप्रीम कोर्ट के जज कमलनारायण दास के नाम से एक पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। इस पोस्ट के खिलाफ मुस्लिम समुदाय सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन कर रहा है। उन्मादी भीड़ ‘अल्लाह-हू-अकबर’ का नारा लगा कर कई जगहों पर सड़क जाम कर रही है। भीड़ में शामिल लोग पोस्ट में लिखी बातों को अपने पैगंबर का अपमान बता कर पुतले जला रहे हैं। सोशल मीडिया पर ‘सर तन से जुदा’ के नारे भी लिखे जा रहे हैं। नेपाल के मुस्लिम आयोग ने भी इस मामले में अपनी सरकार से कड़ी कार्रवाई की माँग की है।

इस घटना पर नेपाल के मुस्लिम आयोग ने सरकार को एक शिकायती पत्र दिया है। पत्र में बताया गया है कि फेसबुक पर कमल नारायण दास के नाम से इस्लाम को बदनाम करने के लिए झूठी और भ्रामक बातें लिखी गईं है। इस पोस्ट में मुस्लिम समुदाय द्वारा रखे जाने वाले रोजा पर टिप्पणी की गई है। मुस्लिम आयोग ने इस पोस्ट पर रमजान में शेयर करने के पीछे नेपाल के भाईचारे को खत्म करने की साजिश करार दिया है। मुस्लिम आयोग ने दुःख प्रकट करते इसे नेपाल में साम्प्रदायिकता फैलाने की साजिश बताया है।

                                                        नेपाली मुस्लिम आयोग का बयान

नेपाल में सभी मत-मजहबों को एक जैसा बताते हए मुस्लिम आयोग ने कहा है कि कुछ लोग कमल नारायण दास के नाम से वायरल हो रही पोस्ट को अभिव्यक्ति की आज़ादी बता रहे हैं। मुस्लिम आयोग ने अभिव्यक्ति की आज़ादी जैसे तर्कों को इस मामले में गलत बताते हुए इसको अपनी संस्कृति पर हमला करार दिया है। मुस्लिम आयोग का मानना है कि ऐसी पोस्ट को अभिव्यक्ति की आज़ादी बताना नेपाली कानून और संविधान का उल्लंघन होगा। अंत में मुस्लिम आयोग ने आरोपित के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग की है। पत्र पर अध्यक्ष के तौर पर शमीम मियाँ अंसारी के दस्तखत हैं।

सुप्रीम कोर्ट के जज की गिरफ्तारी की माँग

यह पोस्ट जिस हैंडल किया किया गया है वह नॉन-वेरिफाइड है। अभी तक नेपाली पुलिस या कोई जाँच एजेंसी आधिकारिक तौर पर यह नहीं बता पाई है कि पोस्ट किसके द्वारा लिखी गई है। इसके बावजूद नेपाल के एक बड़े हिस्से में मुस्लिम वर्ग वहाँ की सुप्रीम कोर्ट के जज कमल नारायण दास के खिलाफ सड़क पर उतर कर कार्रवाई की माँग कर रही है। ‘नेपाली मुस्लिम शांति समाज सरलाही मलंगवा’ नाम के फेसबुक पेज पर तो ‘Arrest Kamal Naranyan Das’ नाम से कैप्शन भी दे दिया गया है। 12 अप्रैल (शुक्रवार) को इस कैप्शन से साथ अटैच वीडियो में मुस्लिम भीड़ चौराहे पर आग जला कर नारेबाजी कर रही है।

कमल नारायण ‘गुस्ताख़ ए रसूल’ घोषित

फरहाद अहमद नाम के व्यक्ति ने शनिवार (13 अप्रैल, 2024) को अपने फेसबुक पर कमलनारायण दास के खिलाफ नेपाल के सरलाही जिला स्थित मलंगवा में निकले जुलूस के वीडियो शेयर किए हैं। यह जुलूस मुस्लिम बोर्ड नेपाल द्वारा निकाला गया है। इस प्रदर्शन के जुलूस में छपे बैनरों पर ‘गुस्ताख-ए-रसूल के खिलाफ कार्रवाई’ लिखा हुआ है। जुलूस में कई मौलवी और मौलाना शामिल दिख रहे हैं। ये सभी पुलिस के आगे ही उत्तेजक नारे लगा रहे हैं।
इन नारों में अल्लाह हु अकबर, नारा ए तकबीर के साथ ‘तेरा मेरा रिश्ता क्या, ला इलाह इल्ललाह’ जैसी बातें बोली जा रहीं हैं। बीच में से एक व्यक्ति ने कहा, ‘सर तन से जुदा’ वाला लगाओ। फ़िलहाल अभी तक नेपाली पुलिस द्वारा किसी की गिरफ्तारी की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

‘दुनिया में रहेंगे तो गाज़ी की तरह…’: जानें इस्लामी किताबों में क्या है इसका अर्थ, क्या काफिरों के कत्लेआम के लिए भड़का रहे हैं ओवैसी?

कालचक्र इतनी तेजी से बदल रहा है, जिसकी छद्दम सेक्युलरिस्ट्स कल्पना नहीं कर सकते। मोदी-योगी विरोध में संविधान और सेकुलरिज्म के नाम पर हिन्दुओं से छल-कपट करने वाले सामने आने शुरू हो चुके हैं। निम्न लेख उसी पर रौशनी डाल रहा है। 

हिन्दुओं और शांतिप्रिय मुसलमानों को आंखे और दिमाग को खोल उन सभी नेताओं और उनकी पार्टियों का सामाजिक बहिष्कार करों जिन्होंने गाज़ियों को महान मुग़ल बादशाह बता कर देश को गुमराह किया। 

इन्ही जैसे तथाकथित जनहितैषी नेताओं की वजह से ही देश में दंगे होते हैं, जिनमे बेगुनाह -चाहे वह हिन्दू है या मुसलमान- लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है। ये ओवैसी जब मुस्लिम बहुल क्षेत्र में बोलता है ऐसी ही भाषा बोलता है और जब हिन्दू क्षेत्रों में बोलता है हिन्दुओं को विभाजित करने दलितों का मसीहा बनकर बोलता है। 
असदुद्दीन ओवैसी ने कोई हैरान करने वाली बात नहीं की, बल्कि सच्चाई को कबूला है। इस्लाम की वास्तविकता जानने के लिए अनवर शेख को पढ़ना चाहिए, नूपुर शर्मा विवाद के दिनों के Jaipur Dialogue, Sach और NewsNation पर 'इस्लाम क्या कहता है' एपिसोड देखने चाहिए जिस पर एक्स-मुस्लिमों के तीखे सवालों ने 
वातानुकूलित कमरों में बैठे होने के बावजूद बड़े-बड़े मौलानाओं और मौलवियों को पसीना पोंछते देखा जा सकता। 
देखिए कुछ वीडियो, जो ओवैसी जैसे गाज़ी सोंच वालो को बेनकाब कर रही है। ये तो केवल मुस्लिम के हैं, हिन्दुओं के नहीं। महाराज देवकी नंदन ठाकुर ने भी इन कट्टरपंथियों को चारों खाने चित किया हुआ है।  
  

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) ने रविवार (7 अप्रैल 2024) को पार्टी प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी का एक छोटा वीडियो एक्स पर पोस्ट किया। इस वीडियो में ओवैसी लोगों को संबोधित कर रहे हैं, जिसमें ओवैसी कह रहे हैं कि वो ‘गाजी’ के रूप में जीना या मरना पसंद करते हैं। उन्होंने अपने साथी मुस्लिमों से भी गाजी के तौर पर जीने-मरने की बात कही। बता दें कि गौरतलब है कि इस्लामिक पुस्तकों में गाजी का मतलब अल्लाह के बताए रास्ते पर चलने वाला इस्लामिक लड़ाका होता है। एक गाजी काफिरों (मतलब इस्लाम को न मानने वालों) के खिलाफ लड़ता है। वह या तो काफिरों और अनेकेश्वरवादियों को मार डालता है या लड़ाई में मारा जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि असदुद्दीन ओवैसी भारत में मुस्लिमों से आख़िर क्या करने को कह रहे हैं?

इस वीडियो में असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, ”तुम हमको मारना चाहते हो तो मारो प्यारे, कौन रोक रहा है तुमको? मेरी जिंदगी अल्लाह ने लिख दी, जब मैं अपनी माँ के पेट में था। मेरी जिल्लत, मेरी इज्जत सबकुछ अल्लाह लिख चुका है। तुम क्या लोगे मुझसे? अरे याद रखो, दुनिया में रहेंगे तो गाजियों की तरह रहेंगे, या फिर मौत आएगी तो शहादत को पसंद करेंगे। हम अपने माता-पिता को शर्मिंदा नहीं होने देंगे, इंशाल्लाह!”

गाजी का क्या मतलब होता है?

सबसे पहले तो ये समझने की जरूरत है कि गाजी का मतलब आखिर क्या होता है? गाजी शब्द की पैदाइश अरबी भाषा में हुई, जिसमें ग़ज़व का अर्थ लड़ाई है। गाज़ी का अर्थ है लड़ने वाला, या योद्धा। इस्लामी संदर्भ में गाज़ी शब्द स्पेशल माना जाना है। इस्लाम में गाज़ी का मतलब वह व्यक्ति है जो इस्लाम और उसकी शिक्षाओं के लिए जिहाद में लड़ता है। जिहाद का मूल मतलब काफिरों और गैर-इस्लामियों या इस्लाम त्यागने वालों के खिलाफ धर्म की लड़ाई है। यह हर किसी और हर उस चीज़ के खिलाफ लड़ाई है जो इस्लाम में विश्वास नहीं करता है। इस प्रकार गाजी का मतलब अनिवार्य रूप से एक जिहादी है जो गैर-मुस्लिमों के खिलाफ लड़ने को तैयार है। इस युद्ध में वह या तो मरने या दूसरों को मारने के लिए तैयार रहता है।
सुन्नन अन-नसाई 2625 (पुस्तक 24, हदीस 7) के अनुसार, गाजी अल्लाह के तीन सबसे प्रिय मेहमानों में से एक हैं। इस्लामिक धर्मग्रंथों की एक वेबसाइट पर इस हदीस की व्याख्या में कहा गया है, “अबू हुरैरा द्वारा सुनाई गई हदीस के अनुसार, अल्लाह के दूत ने तीन प्रकार के लोगों का उल्लेख किया है जिन्हें अल्लाह का मेहमान माना जाता है। इनमें एक गाजी, एक हज यात्री और एक मुतामिर शामिल हैं। गाज़ी वह है जो इस्लाम और उसकी शिक्षाओं के लिए जिहाद में लड़ता है। हज यात्री वह व्यक्ति होता है जो अपने जीवनकाल में कम से कम एक बार मक्का की तीर्थयात्रा करता है यदि उसके पास ऐसा करने के लिए पर्याप्त संसाधन हों। अंत में, मुतामिर वह व्यक्ति होता है जो ज्ञान प्राप्त करने या अल्सेलाह से ईनाम पाने करने के लिए व्यापार या शिक्षा जैसे किसी भी उद्देश्य के लिए यात्रा करता है। इन तीनों को अल्लाह का अतिथि माना जाता है और उसके लिए किए गए कामों या प्रयासों के हिसाब से उन्हें ईनाम भी दिया जाता है।

एक गाजी की मदद करना भी गाजी होने के बराबर

इस्लामी किताबों में सिर्फ गाजी को ही सम्मान नहीं मिला, बल्कि उन लोगों को भी सम्मान मिलता है, जो गाजी की मदद करता है। या फिर गाजी के परिवार के सदस्यों की मदद करता है या देखरेख की जिम्मेदारी लेता है। साहिह अल-बुखारी 2843  ( किताब 56, हदीस 59) ने इसे विस्तार से बताया है। यह उन लोगों के लिए इनाम की बात करता है, जो गाजी के बच्चों या परिवार की देखभाल करते हैं और उनकी मदद करते हैं या फिर गाजियों को इस्लाम के लिए लड़ने के लिए तैयार करते हैं। इस हदीस के अनुसार , पैगंबर मुहम्मद ने कहा, “जो अल्लाह के रास्ते पर जाने के लिए एक गाजी को तैयार करता है, उसे एक गाजी के बराबर इनाम दिया जाता है। और जो अल्लाह की राह में जाने वाले गाजी के परिजनों की ठीक से देखभाल करता है, उसे भी गाजी के बराबर इनाम दिया जाता है।
इसके अलावा, रियाद अस-सलीहिन (किताब 11 हदीस 22) के अनुसार, पैगंबर मुहम्मद ने कहा था, “वह जो अल्लाह के रास्ते में एक गाजी (लड़ाकू) को तैयार करता है, ऐसा लगता है जैसे उसने खुद लड़ाई में भाग लिया हो; और जो गाज़ी की अनुपस्थिति में उसके आश्रितों की देखभाल करता है, वह मानो स्वयं लड़ाई में भाग लेता है।

असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, ‘हम गाजियों की तरह जिएँगे’

असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि ‘हम (खुद और अन्य मुस्लिम जिनका वह दावा करते हैं कि वह प्रतिनिधित्व करते हैं) गाजियों की तरह रहेंगे।’ एआईएमआईएम प्रमुख के इस भाषण के बाद स्वाभाविक रूप से उठने वाले सवालों को इस्लामिक धर्मग्रंथ में इस शब्द के स्पष्ट अर्थ और संदर्भ को देखते हुए हेरफेर करना आसान नहीं है। क्या ओवेसी का मतलब यह है कि वह और भारत में जिन मुस्लिमों का वह नेतृत्व करने का दावा करते हैं, वे देश में गैर-मुस्लिमों के खिलाफ लड़ाई कर रहे हैं? क्या इसका मतलब यह है कि गाजी बनकर ओवैसी और उसके साथी गैर-मुस्लिमों, काफिरों, इस्लाम त्यागने वालों को मारना चाहते हैं या ऐसी उनपर हुक्म करने की इच्छा रखते हैं?
असदुद्दीन ओवैसी ने बलिदान और मौत को वरीयता देने की बात कही है, जैसे ही वो गाजी शब्द पर आए, वैसे ही ‘मैं’ की जगह ‘हम’ कहने लगे। इसका मतलब साफ है कि वो अन्य मुस्लिमों को भी गाजी बनने के लिए उकसा रहा है। ऐतिहासिक रूप से, मुहम्मद बिन कासिम, गजनी के महमूद, मुहम्मद गोरी, अलाउद्दीन खिलजी, बाबर, औरंगजेब आदि इस्लामी अत्याचारियों को इस्लामिक हलकों में गाज़ियों के रूप में पहचाना जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्होंने भारत पर हमला किया, जोकि अनेकेश्वरवादियों और गैर-मुस्लिमों का देश है। उन्होंने यहाँ रहने वाले लोगों को लूटा और मार डाला, क्योंकि वे गैर-मुस्लिम थे। इस तरह से वे ग़ाज़ी कहलाने के योग्य हो गए। खुद को और अपने साथियों को ग़ाज़ी कहकर, असदुद्दीन ओवेसी यकीनन खुद को और उन्हें मानने वालों को इन गाजियों से जोड़ रहे हैं।

क्या इस क्लिप को पोस्ट करने के समय में कोई संदेश छिपा है?

AIMIM ने यह वीडियो क्लिप 7 अप्रैल को पोस्ट किया – हिंदू नव वर्ष से ठीक दो दिन पहले, जो 9 अप्रैल को चैत्र नवरात्रि और गुड़ी पड़वा के साथ शुरू हुआ था। 17 अप्रैल को, देश राम नवमी मनाएगा – हिंदू देवता भगवान राम का जन्म उत्सव। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अयोध्या में उनके जन्मस्थान पर बने भव्य मंदिर में भगवान की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा के बाद यह पहली राम नवमी होगी।
पिछले कुछ सालों में देश के विभिन्न हिस्सों में रामनवमी जुलूसों और शोभा यात्राओं पर हमले हुए हैं। खास तौर पर 2022 और 2023 में, भारत में इस्लामिक कट्टरपंथियों ने शांतिपूर्ण जुलूसों पर पथराव और हमले किए। इसके बाद कानूनी कार्रवाई में जब दंगाइयों के घरों को जमींदोज किया गया, तो ये खुद को पीड़ित दिखाने लगे। और अब रामनवमी से कुछ ही दिन पहले ओवैसी ने गाजियों वाली अपील की है।
इस साल 2024 की रामनवरी 17 अप्रैल को है, जो लोकसभा चुनाव 2024 के पहले चरण के मतदान के लिए प्रचार का आखिरी दिन है। 19 अप्रैल को देश के 21 राज्यों के 102 लोकसभा सीटों पर मतदान होना है। अब तक के चुनाव प्रचार में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी अपने विरोधियों पर भारी पड़ती दिख रही है। बीजेपी उम्मीदवार और हिंदू शेरनी माधवी लता हैदराबाद में असदुद्दीन ओवैसी को चुनौती दे रही हैं और ओवैसी पर भारी पड़ती दिख रही हैं। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी और एनडीए अजेय दिख रहे हैं, तो दूसरी तरफ हताश हो चुके विपक्ष को ये तक नहीं समझ आ रहा कि वो मोदी का सामना कैसे करें। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए ओवैसी के इस वीडियो पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है।
यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी भाषा में लिखा गया है। मूल लेख को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।(साभार)