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स्पेन में घुसे हजारों अफ्रीकी घुसपैठियों को संभालने के लिए सेना तैनात, SC का आदेश बना ढाल: 6 साल पहले कैसे तबाही की कगार पर पहुँचा था यूरोप, भारत में भी घुसपैठियों के पास कानूनी ढाल

                                     स्पेन पहुँचे हजारो मोरक्को के घुसपैठिए (फोटो साभार-x@foxnews)

यूरोप एक बार फिर अवैध शरणार्थियों के नाम से काँप रहा है। दरअसल अफ्रीकी देश मोरक्को से बड़ी संख्या में अवैध शरणार्थी स्पेन में घुस गए हैं। ये लोग समुद्र तैर कर या जमीनी बॉर्डर के जरिए अवैध तरीके से स्पेन में घुस रहे हैं। सेउटा में घुसने से माइग्रेंट स्पेन के इलाके और आगे चलकर EU के इलाके में आ सकते हैं, जहाँ वे शरण माँग सकते हैं।

इन शरणार्थियों ने 8 साल पहले सीरिया संकट की याद ताजा कर दी है, जब यूरोप में बड़े पैमाने पर कट्टरपंथी शरणार्थी के तौर पर आए थे। स्पेन, फ्रांस, स्वीडन, जर्मनी समेत कई देशों में इनकी संख्या इतनी बढ़ गई कि प्रशासनिक व्यवस्था चरमराने लगी। इसकी याद दिलाते हुए इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी ने शरणार्थियों के नए दौर पर चिंता जाहिर की है और कहा है कि वे स्पेन के साथ शेंगेन समझौता रद्द कर सकते हैं।

क्या है मामला

सेउटा मोरक्को के उत्तरी तट पर स्पेन के कंट्रोल वाला एक छोटा सा इलाका है। इससे सटे मेलिला एन्क्लेव में अफ्रीका और यूरोपियन यूनियन का जमीनी बॉर्डर है। सेउटा में हजारों शरणार्थी ब्रेकवॉटर के आस-पास तैरकर या बॉर्डर की बाड़ तोड़कर घुस गए हैं, जिससे छोटा-सा यूरोपियन देश स्पेन पर काफी दबाव बढ़ गया है। यहाँ तक कि स्पेन को सेना और ज्यादा पुलिस बल तैनात करनी पड़ी है।

अवैध तरीके से घुस आए बेलगाम शरणार्थियों के चलते बवाल मच गया है। यहाँ बड़ा मानवीय और सुरक्षा संकट पैदा हो गया है। दरअसल अचानक हजारों शरणार्थी सीमा पार कर घुसने लगे। फॉक्स न्यूज के मुताबिक, हजारों शरणार्थी मोरक्को की सीमा पार कर स्पेन के शहर सेउटा में दाखिल हुए। नए जत्थे में 1500 से ज्यादा शरणार्थी हैं, जो समुद्र के रास्ते शहर में दाखिल हो रहे हैं। सेउटा के प्रशासनिक अधिकारी जुआन जीसस विवास के मुताबिक, पिछले हफ्ते भर से शरणार्थियों का आना काफी बढ़ गया है और संसाधनों की कमी हो रही है।

स्पेन में घुस रहे शरणार्थियों का वीडियो भी सामने आया है। सैकड़ों लोग इन्फ्लेटेबल ट्यूब और दूसरे फ्लोटेशन डिवाइस का इस्तेमाल करके ब्रेकवाटर के आसपास तैरते हुए दिखे। हजारों लोग जमीनी सीमा के गेट से घुसते दिखाई दिए। इससे घबरा कर सीमा पर तैनात सुरक्षाकर्मी घबरा कर भाग गए।

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, स्पेन के सरकारी ब्रॉडकास्टर TVE ने अंदाजा लगाया है कि करीब 3000 लोग इस इलाके में घुसे हैं। समुद्र पार करते वक्त 9 शरणार्थियों की लाश भी पुलिस ने बरामद की है। इन शरणार्थियों में ज्यादातर मोरक्को के नागरिक हैं। दरअसल यूरोप में जमीन से घुसने का एकमात्र रास्ता मोरक्को और स्पेन की सीमा है। यहाँ तक कि सबसे आसान समुद्री रास्ता भी स्पेन तक ही जाता है। इसलिए 2021 के बाद 30 जुलाई 2026 को सबसे ज्यादा शरणार्थी स्पेन में घुस आए हैं। इसके साथ ही लगातार इनके आने का सिलसिला जारी है।

स्थानीय प्रशासन ने केन्द्र को आर्मी तैनात करने और नेशनल इमरजैंसी घोषित करने की माँग की है। स्पेन में आर्मी की हलचल तेज है। बख्तरबंद गाड़ियाँ घूमने लगी हैं। हालाँकि आपातकाल की घोषणा नहीं की गई है।

क्या कहा मेलोनी ने

स्पेन में बॉर्डर पर बवाल के बाद इटली भी सचेत हो गया है। अवैध शरणार्थियों के आने पर इटली ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी ने कहा कि वह ‘कड़े उपायों’ पर विचार कर रही हैं। उन्होंने स्पेन के साथ शेंगेन समझौते (Schengen Agreement) को अस्थायी रूप से निलंबित करने की चेतावनी दी है।

यूरोपीय देशों के बीच सीमा खुला रखने से जुडा शेंगेन समझौता इसके सदस्य देशों के बीच 1985 में हुई थी। जिसके तहत सदस्य देशों ने अपनी आपसी सीमाओं पर नियंत्रण समाप्त कर दिया है यानी इटली ने अपनी सीमा सील करने की चेतावनी दी है।

मेलोनी ने X पर लिखा, “सेउटा से आ रही तस्वीरें चौंकाने वाली हैं और एक बार फिर दिखाती हैं कि बिना कंट्रोल के अवैध घुसपैठ यूरोप के बॉर्डर की सिक्योरिटी के लिए एक बड़ा खतरा है।”

उन्होंने कहा कि इटली इस पर विचार कर रहा है कि वह स्पेन के साथ शेंगेन एरिया को सस्पेंड कर दिया जाए। हालाँकि मेलोनी ने यह नहीं बताया कि ऐसा कैसे किया जाएगा।

स्पेन के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आई शरणार्थियों की बाढ़

शरणार्थियों को लगता है कि यहाँ पहुँचने पर स्पेन के मुख्य भाग में एंट्री हो जाएगी और फिर यूरोपीय यूनियन के देशों तक पहुँचना आसान हो जाएगा।

स्पेन का मानना है कि मोरक्को और दूसरे अफ्रीकी देशों से जो शरणार्थी आ रहे हैं, उसके पीछे तस्करी करने वाले नेटवर्क का हाथ है। हाल ही में स्पेन के सुप्रीम कोर्ट ने बिना सही प्रक्रिया के समुद्र के रास्ते सेउटा में आने वाले शरणार्थियों को तुरंत वापस लौटने पर रोक लगा दी थी। स्पेन के सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मोरक्को के रास्ते सेउटा-मेलिला आने वाले शरणार्थियों को पकड़े जाने पर बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के सीधा मोरक्को नहीं भेजा जा सकता है। इससे तस्करी करने वाले नेटवर्क को बढ़ावा मिला है।

शरणार्थी सेउटा पहुँचने से पहले मोरक्को के शहर फनीडेक में इकट्ठा हो रहे हैं। मोरक्को के सुरक्षा बल इन पर काबू पाने की कोशिश कर रहे हैं और इन पर पानी की बौछारें की जा रही हैं, लेकिन ये टस से मस नहीं हो रहे।

स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज और गृह मंत्री फर्नांडो ग्रांडे-मार्लास्का के शुक्रवार को सेउटा जाकर लोकल अधिकारियों और सुरक्षा कर्मियों से मुलाकात की है। साथ ही मोरक्को के साथ कोऑर्डिनेट कर जो लोग अवैध तरीके से आए हैं, उन्हें वापस भेजने को लेकर वार्ता करेंगे।

2011-21 के बीच सेउटा में घुस आए थे शरणार्थी

स्पेन के साथ डिप्लोमैटिक विवाद के बीच मई 2021 में मोरक्को ने सीमा पर ढील दे दी थी, जिससे मात्र दो दिनों में हजारों लोग सेउटा घुस आए थे। इन अवैध शरणार्थियों में कई नाबालिग शामिल थे। नई शरणार्थियों की घुसपैठ से स्पेन और मोरक्को के रिश्तों पर असर पड़ने की आशंका है। हालाँकि अभी तक दोनों देशों ने सहयोग करने की बात कही है।

साल 2011 में शुरू हुए सीरियाई गृहयुद्ध और आईएसआईएस के आतंक से बचने के लिए लाखों सीरियाई यूरोपीय यूनियन के देशों में शरणार्थी बन कर आए। इनके यूरोप पहुँचने के कई मार्ग थे, जिनमें मोरक्को से होते हुए स्पेन तक पहुँचना भी एक था। उस वक्त भी इनलोगों ने समुद्री और जमीनी रास्ते को वैसे ही चुना था, जैसा अभी हो रहा है।

यहाँ से यूरोप के दूसरे देशों में ये पहुँचे। जर्मनी, स्वीडन, ऑस्ट्रिया, नीदरलैंड जैसे अमीर यूरोपीय देशों ने इनके लिए अपनी ‘मानवीयता’ दिखाई। इनलोगों को शरण दी गई। इसके बाद 2015 में यूरोप का प्रवासी संकट भी आया और यूरोप के ज्यादातर देशों में कट्टरपंथियों की जमात बढ़ गई। हालात ये है कि इंग्लैंड, फ्राँस, जर्मनी समेत सारे देश अब क्राइम काफी बढ़ गया है। इस्लामी ग्रूमिंग गैंग लगातार स्थानीय नाबालिग लड़कियों को अपना निशाना बना रहे हैं। रेप, लूट-पाट, नशे की तस्करी जैसे क्राइम से निपटना स्थानीय सुरक्षा बलों के लिए मुश्किल हो रहा है।

अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल ही में घुसपैठियों को लेकर कहा है कि अफ्रीका और दुनिया के दूसरे हिस्सों से आने वाले घुसपैठिए यूरोपीय देशों और यूके के लिए खतरा हैं। ये लोग यूरोप की पहचान और संस्कृति को नष्ट कर रहे हैं। उन्होंने इसको लेकर यूरोपीय नेताओं की आलोचना भी की थी कि उन्होंने नरमी बरती और कड़े कदम नहीं उठाए।

यूरोप की इस समस्या से भारत भी दो चार होता रहा है। यहाँ अवैध घुसपैठियों की वजह से दशकों से कई दिक्कतें पेश आ रही हैं। असम से पश्चिम बंगाल तक बांग्लादेशी घुसपैठियों से सिर्फ आबादी ही नहीं बढ़ी है, बल्कि सीमावर्ती इलाकों में जबरदस्त तरीके से डेमोग्राफी भी बदली है।

संसद में विदेश मामलों की स्थाई समिति ने बांग्लादेश से भारत में होने वाली अवैध घुसपैठ पर चिंता जताते हुए इस पर ज्वाइंट वर्किंग ग्रुप तैयार करने की बात कही है। ताकि बांग्लादेशी घुसपैठियों की राष्ट्रीयता की पुष्टि होने और उनके प्रत्यर्पण पर निगरानी रखने में आसानी हो। समिति के मुताबिक, अभी 2369 संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों की राष्ट्रीयता की पुष्टि के मामले बांग्लादेश सरकार के पास लंबित हैं।

ये तो उन नागरिकों की बात है, जिनके मामले सामने आए हैं। लेकिन भारत में ऐसे अवैध घुसपैठियों के मामले अक्सर सामने आते हैं, जिनका पता सालों बाद चलता है। इनके वजह से भारत के संसाधनों पर असर पड़ता है और रोजगार प्रभावित होते हैं। चुनाव में ये लोग पार्टियों के वोट बैंक बन जाते हैं और उनके पास भारत के वोटर कार्ड से लेकर आधार कार्ड तक पहुँच जाता है। ये लोग रोजगार पर बहुत ज्यादा दबाव डालते हैं। चुनावों में इसका असर भी दिखता है।

न सिर्फ राजनीतिक-सामाजिक तौर पर बल्कि आर्थिक तौर पर भी इससे देश कमजोर होता है। घुसपैठियों के खिलाफ अभियान चलाने के दौरान कई बार मानवाधिकार की बात की जाती है। सुप्रीम कोर्ट तक में कई ऐसे मामले दर्ज हैं। कोर्ट ने घुसपैठियों को लेकर कहा है कि उनके पास कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

लेकिन स्थानीय स्तर पर मिलने वाले फर्जी दस्तावेज और कानूनों की कुछ सीमाएं उन्हें अनौपचारिक सुरक्षा प्रदान करती हैं। स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार और मिलीभगत से आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर आईडी जैसे कागजात बन जाने के कारण पुलिस या प्रशासन के लिए तुरंत पहचान करना मुश्किल होता है। अगर पहचान हो भी गई तो कोर्ट में मामला लंबित रहता है। बड़े बड़े वकील से लेकर पूरा लिबरल इकोसिस्टम उन्हें बचाने में लग जाता है।

‘मुझे लोकप्रियता के लिए तुम्हारी जरूरत नहीं’: ट्रंप पर फिर फायर हुईं इटली की PM मेलोनी, पहले भी पाकिस्तान से लेकर मैंक्रों तक को दिखी चुकी हैं आँखें

डोनाल्ड ट्रम्प यह समझते हैं कि अमेरिका का राष्ट्रपति जब चाहे जो चाहे किसी को भी बोल सकता है और दुनिया चुप रहेगी। हर देश को पाकिस्तान समझने की गलती नहीं करें। पाकिस्तान को पैसों की खातिर बेइज्जती बर्दाश्त कर सकता है हर देश नहीं। आज लगभग हर देश अपने आप में स्वतंत्र है। सबका अपना आत्मसम्मान है। 

अमेरिका राष्ट्रपति ट्रंप से भिड़ने से पहले भी इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी कई आलोचकों को करारा जवाब दे चुकी हैं। उन्होंने अपने अंदाज में फ्रांस के राष्ट्रपति मेक्रों को सुना दिया था। यहाँ तक कि अपने देश में कोर्ट के फैसले की आलोचना करने से लेकर पॉर्न साइट को अपना बोरिया बिस्तर समेटने को मजबूर कर दिया था। वह यूरोप के इस्लामीकरण से काफी परेशान दिखीं। उनका पुराना वीडिया 2018 में आया था, जिसमें उन्होंने ब्रिटेन-अलबेनिया के साथ मिलकर काम करने की बात कही है। 

राष्ट्रपति ट्रंप और मेलोनी विवाद

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और मेलोनी के बीच विवाद के बाद मेलोनी के बेबाक अंदाज की दुनियाभर में चर्चे हो रहे हैं। यह विवाद तब शुरू हुआ जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया कि लोकप्रियता गिरने के कारण मेलोनी ने जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान मेलोनी ने उनके साथ तस्वीर खिंचवाने के लिए ‘मिन्नतें’ की थीं। ट्रंप ने यह भी कहा था कि उन्होंने मेलोनी के साथ फोटो सिर्फ इसलिए खिंचवाई क्योंकि उन्हें उन पर तरस आ गया था। दरअसल ट्रंप की असली नाराजगी ईरान युद्ध के समय इटली ने अमेरिकी फाइटर्स प्लेन को लैंडिंग की इजाजत नही दी थी।

ट्रंप के बयान पर मेलोनी ने कड़ा पलटवार करते हुए कहा कि ट्रंप की दोस्ती से उनकी लोकप्रियता में इजाफा नहीं हुआ है। उनके दावे मनगढ़ंत है, जिसे सुनकर उन्हें हैरानी हुई। मेलोनी ने दो टूक शब्दों में चेतावनी दी कि इटली एक संप्रभु देश है और अमेरिकी एयरबेस का इस्तेमाल उनकी शर्तों पर ही होगा। मेलोनी ने यहाँ तक कह दिया कि मेरी चिंता ना करें, अपना देखें।

मेलोनी ने कहा, “डोनाल्ड ट्रंप की बातें पूरी तरह झूठी हैं। मैं सचमुच हैरान हूँ। मुझे समझ नहीं आता कि अमेरिका के राष्ट्रपति अपने सहयोगी देशों के साथ ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं।”

यह पहली बार नहीं है जब मेलोनी के जवाब पूरी दुनिया में सुर्खियाँ पाई हो। उन्होंने पहले भी कई बार अपनी बेबाकी का परिचय दिया है।

फ्रांस के राष्ट्रपति को दिया जवाब

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के आप्रवासन की नीतियों और यूरोप के फैसलों को लेकर मेलोनी की फ्रांस के नेतृत्व के साथ कई बार तीखी नोक-झोंक हो चुकी है। फ्रांस के ल्योन शहर में दक्षिणपंथी कार्यकर्ता क्विंटिन डेरांक की वामपंथी चरमपंथियों ने हत्या कर दी थी। इसको लेकर जॉर्जिया मेलोनी ने फ्रांस को सुनाया था और यूरोप के लिए एक गहरा घाव बताया था। इस पर भड़के फ्रांसीसी राष्ट्रपति मैक्रों ने मेलोनी पर निशाना साधते हुए कहा कि राष्ट्रवादियों को अपने देश तक सीमित रहना चाहिए और दूसरों के मामलों में टांग नहीं अड़ाना चाहिए। मेलोनी ने भी तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए साफ कहा कि वह यूरोप में वैचारिक हिंसा के खिलाफ बोलने से पीछे नहीं हटेंगी, चाहे सामने फ्रांस जैसी बड़ी ताकत ही क्यों न हो।

यूरोप के इस्लामीकरण से चिंतित मेलोनी

जॉर्जिया मेलोनी का एक पुराना वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें उन्होंने यूरोप में हो रहे इस्लामीकरण और सऊदी अरब की मदद से चल रहे कई सांस्कृतिक केंद्रों पर खुलकर चिंता जताई थी। साथ ही साफ किया था कि इस्लामी संस्कृति की कुछ व्याख्या और यूरोपीय सभ्यता के मूल्यों और अधिकारों के बीच सामंजस्य बैठना काफी मुश्किल है। इस पर मेलोनी को पाकिस्‍तान में काफी ट्रोल किया गया था। हालाँकि ये बयान 2018 है, जब वह इटली की प्रधानमंत्री नहीं थीं। उस वक्त उन्होंने साफ कहा था कि अवैध प्रवासियों को वापस भेजने के लिए वह ब्रिटेन और अल्बानिया जैसे देशों के साथ मिलकर काम कर रही हैं।

फिलिस्तीन को नहीं दिया अलग देश का दर्जा

मेलोनी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में ब्रिटेन और फ्रांस के रुख का समर्थन करते हुए फिलिस्तीन को तुरंत मान्यता देने से साफ इनकार कर दिया। इटली ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस अल्टीमेटम का भी समर्थन किया, जिसमें हमास को पूरी तरह हथियार छोड़ने और इजरायली बंधकों को तुरंत रिहा करने को कहा गया था। हालाँकि उनके इस रुख का इटली में ही विरोध हुआ। इजरायल पर प्रतिबंध लगाने की माँग को लेकर 20 लाख से अधिक लोगों और ट्रेड यूनियनों ने देशव्यापी हड़ताल किया, लेकिन वह टस से मस नहीं हुई।

पोर्न वेबसाइट पर कसी लगाम

फिका नाम की एक पोर्न वेबसाइट ने मेलोनी, उनकी बहन आरियाना और विपक्षी महिला नेता एली श्लेन की तस्वीरों से छेड़छाड़ कर उसे आपत्तिजनक बनाते हुए अपने साइट पर अपलोड कर दिया। इस पर एक्शन लेते हुए मेलोनी ने कानूनी कार्रवाई करने के निर्देश दिए। इसको देखते हुए वेबसाइट ही बंद कर दी गई।

अदालत से भी भिड़ चुकी हैं मेलोनी

हमास के इजरायल पर हमले और निर्दोष लोगों को बंधक बनाने को मिस्र के निवासी इमाम मोहम्मद शाहिन को इटली की अदालत ने रिहा कर दिया तो मेलोनी कोर्ट पर बरस गईं। दरअसल इटली सरकार ने उसे देश से निकालने का आदेश दिया था, जिसे कोर्ट ने पलट दिया। इस पर मेलोनी ने सीधे कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाते हुए पूछा कि अगर कोर्ट आतंकवाद का समर्थन करने वालों को ऐसे ही छोड़ देगी तो वह इटली के नागरिकों की सुरक्षा कैसे करेंगी?

स्पेन के जिस शहर पर रहा मुसलमानों का रहा सदियों तक कब्जा, वहाँ खुले में ईद-बकरीद भी नहीं मना पाएँगे मुस्लिम: इस्लामी कट्टरपंथ पर लगाम लगाने के लिए ईसाई हुए एकजुट

                                                                                                                                साभार: कैनवा
यूरोप में इस्लामी कट्टरपंथ के बढ़ते खतरे को अब सरकारें भी महसूस कर रही हैं। इसी क्रम में स्पेन में जुमिला नाम के शहर में ईद-बकरीद जैसे त्योहारों को पब्लिक प्लेस पर मनाने पर बैन लगा दिया गया है। स्पेन का जुमिला शहर कभी सदियों तक मुसलमानों के कब्जे में रहा था। खुद स्पेन के बड़े हिस्से पर इस्लामी सल्तनत ने राज किया था, लेकिन अब जुमिला की लोकल अथॉरिटी ने बाकायदा एक प्रस्ताव पास किया है। इसके मुताबिक, ‘ईसाइयों’ के शहर में ‘इस्लामी’ त्योहारों के सार्वजनिक प्रदर्शन को रोक दिया गया है।

ईसाइयों की पार्टी ने ‘गायब’ रहकर पास कराया प्रस्ताव

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस प्रस्ताव को कंजर्वेटिव मानी जाने वाली पीपल्स पार्टी (पीपी) ने पेश किया था और वामपंथी पार्टियों ने इसका विरोध किया। वहीं, वोटिंग के दौरान दक्षिणपंथी पार्टी ‘वॉक्स’ अनुपस्थित रही थी लेकिन फिर भी इस प्रस्ताव को पास करा लिया गया है।

इस प्रस्ताव में कहा गया है, “नगरपालिका खेल सुविधाओं का उपयोग हमारी पहचान से अलग की धार्मिक, सांस्कृतिक या सामाजिक गतिविधियों के लिए नहीं किया जा सकता, जब तक कि स्थानीय प्राधिकारी द्वारा इसका आयोजन न किया जाए।”

‘वॉक्स’ पार्टी ने इस फैसले पर कहा, “वॉक्स के चलते स्पेन के सार्वजनिक जगहों पर इस्लामी त्योहारों पर प्रतिबंध लगाने का पहला कदम पारित हो गया है। स्पेन हमेशा से ईसाइयों का रहा है और हमेशा रहेगा।”

क्या कह रहे हैं विरोधी दल और मुस्लिम नेता?

इस फैसला का विरोधी दलों और मुस्लिम संगठनों ने विरोध किया है। स्पैनिश फेडरेशन ऑफ इस्लामिक ऑर्गनाइजेशन के प्रमुख मुनीर बेनजेलून अंडालूसी अज़हरी ने एक अखबार से बातचीत में दावा किया कि यह प्रतिबंध इस्लामोफोबिक और भेदभावपूर्ण है। उन्होंने कहा, “30 वर्षों में पहली बार मुझे डर लग रहा है। वे किसी दूसरे धर्म पर नहीं सिर्फ हमारे धर्म पर हमला कर रहे हैं।”
वहीं, मर्सिया क्षेत्र के समाजवादी नेता फ्रांसिस्को लुकास ने इस फैसले को लेकर कहा, “पीपी पार्टी संविधान का उल्लंघन करती है और सिर्फ सत्ता की चाह में सामाजिक एकता को खतरे में डाल रही है।” शहर के पूर्व समाजवादी मेयर जुआना गार्डियोला ने कहा, “यहाँ सदियों पुरानी मुस्लिम विरासत का क्या होगा?”

कोर्ट में जाएगा मामला?

जानकारी के मुताबिक, स्थानीय कानून विशेषज्ञ बता रहे हैं कि इस फैसले के खिलाफ अदालत का रुख किया जा सकता है। यह फैसला स्पेन के संविधान के अनुच्छेद 16 का उल्लंघन है।

इस अनुच्छेद में कहा गया है, “व्यक्तियों और समुदायों की विचारधारा, धर्म और पूजा की स्वतंत्रता की गारंटी दी जाती है और उनकी अभिव्यक्ति पर कोई अन्य प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता, सिवाय इसके कि कानून द्वारा संरक्षित सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह आवश्यक हो।”

जुमिला और इस्लाम

जुमिला शहर का इतिहास रोमन साम्राज्य से जुड़ा है। 8वीं शताब्दी में अरबों द्वारा कब्जा किए जाने के पहले यह रोमन साम्राज्य का हिस्सा होता था। इसके बाद यह सदियों तक अरबों का शहर रहा और इसका नाम युमिल-ला हुआ करता था।

इसके बाद 13वीं शताब्दी के मध्य में कैस्टिले के अल्फोंसो X के नेतृत्व में ईसाइयों ने इस पर हमला कर वापस इसे अपने कब्जे में ले लिया था। मौजूदा समय में जुमिला की आबादी करीब 27,000 है, जिसमें करीब 7.5% आबादी मुस्लिमों की है।

इस्लामी दुनिया के खलीफा बन रहे तुर्की को कड़ा संदेश: भारत ही नहीं, दुनिया के लिए क्यों खास है ये दौरा, दुश्मन को चारों तरफ से घेरने की तैयारी‘ : यह 140 करोड़ भारतीयों का सम्मान’: PM मोदी को साइप्रस सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजा, 11 साल में भारतीय प्रधानमंत्री को 20+ देश कर चुके हैं सम्मानित


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी साइप्रस पहुँचे हैं। ये 20 साल बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री का साइप्रस दौरा है। इससे पहले 1983 में इंदिरा गाँधी और 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी वहाँ गए थे। साइप्रस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जोरदार स्वागत हुआ। वहाँ उन्होंने भारतीय मूल के लोगों से भी मुलाकात की। यहाँ पीएम मोदी की राष्ट्रपति निकोस क्रिस्टोडुलाइड्स से भी मुलाकात होगी।

वैश्विक नेता के रूप में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता निरंतर बढ़ती जा रही है। पीएम मोदी को विभिन्न देशों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों  से ना सिर्फ सम्मानित किया गया है, बल्कि अपने देश के सर्वोच्च सम्मान से भी नवाजा गया है। अब उन्हें साइप्रस के सबसे बड़े सम्मान ग्रैंड क्रॉस ऑफ द ऑर्डर ऑफ मकारियोस III से सम्मानित किया गया है। ऑर्डर ऑफ मकारियोस तृतीय साइप्रस की ओर से प्रदान किया जाने वाला नाइटहुड सम्मान है, जिसका नाम साइप्रस के प्रथम राष्ट्रपति आर्कबिशप मकारियोस तृतीय के नाम पर रखा गया। प्रधानमंत्री मोदी को मिला यह 23वां अंतर्राष्ट्रीय सम्मान है। साइप्रस का सर्वोच्च सम्मान पाने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, ‘मुझे विश्वास है कि आने वाले समय में हमारी सक्रिय भागीदारी नई ऊंचाइयों को छुएगी। साथ मिलकर हम न केवल अपने दोनों देशों की प्रगति को मजबूत करेंगे, बल्कि एक शांतिपूर्ण और सुरक्षित वैश्विक वातावरण के निर्माण में भी योगदान देंगे।’

16.06.2025
साइप्रस का सम्मान मैत्रीपूर्ण संबंधों, साझा मूल्यों और आपसी समझ को समर्पित

प्रधानमंत्री मोदी को साइप्रस के सर्वोच्च सम्मान से नवाजा गया है। साइप्रस के राष्ट्रपति निकोस क्रिस्टोडौलिडेस ने प्रधानमंत्री मोदी को साइप्रस का सर्वोच्च सम्मान दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, ‘राष्ट्रपति जी, ग्रैंड क्रॉस ऑफ द ऑर्डर ऑफ मकारियोस III सम्मान के लिए मैं आपका, साइप्रस सरकार का और साइप्रस के लोगों का हृदय से आभार व्यक्त करता हूं। यह सिर्फ नरेंन्द्र मोदी का ही नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों का सम्मान है। यह उनकी क्षमताओं और आकांक्षाओं का सम्मान है। यह हमारी संस्कृति, भाईचारे और वसुधैव कुटुम्बकम की विचारधारा का सम्मान है। मैं इसे भारत और साइप्रस के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों, हमारे साझा मूल्यों और आपसी समझ को समर्पित करता हूं। मैं सभी भारतीयों की ओर से इस सम्मान को बड़ी विनम्रता और कृतज्ञता के साथ स्वीकार करता हूं। यह पुरस्कार शांति, सुरक्षा, संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और हमारे लोगों के प्रति हमारी अटूट प्रतिबद्धता का प्रतीक है।’ 

तुर्की को हैरान करने वाला है पीएम मोदी का दौरा

मोदी का साइप्रस दौरा सिर्फ दो देशों के बीच दोस्ती बढ़ाने के लिए नहीं है, बल्कि तुर्की को एक सख्त संदेश भी देता है। दरअसल, तुर्की पिछले कुछ समय से भारत के खिलाफ खुलकर बोल रहा है, खासकर कश्मीर के मुद्दे पर और पाकिस्तान को सैन्य और कूटनीतिक समर्थन दे रहा है।

भारत इसका जवाब तुर्की के विरोधी देशों – जैसे ग्रीस, आर्मेनिया, मिस्र और अब साइप्रस के साथ अपनी दोस्ती मजबूत करके दे रहा है। भारत इन देशों के साथ न सिर्फ व्यापारिक बल्कि सामरिक संबंध भी मजबूत कर रहा है। ये एक तरह से तुर्की को चारों तरफ से घेरने की रणनीति है। साइप्रस के बाद मोदी जी7 शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने जाएँगे, जिससे भारत की वैश्विक ताकत और बढ़ेगी।

साइप्रस और भारत की दोस्ती बेहद खास

भारत और साइप्रस की दोस्ती पुरानी और गहरी है। साइप्रस ने हमेशा भारत का साथ दिया है। 1998 में भारत के परमाणु परीक्षण के समय, 2008 में भारत-अमेरिका परमाणु समझौते में और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता के लिए साइप्रस ने खुलकर समर्थन किया। आतंकवाद और कश्मीर जैसे मुद्दों पर साइप्रस ने कभी पाकिस्तान या तुर्की का साथ नहीं दिया।

दूसरी तरफ भारत भी साइप्रस की एकता और अखंडता का समर्थन करता है। भारत चाहता है कि साइप्रस का मसला संयुक्त राष्ट्र के नियमों और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत हल हो। पीएम मोदी का ये दौरा इस दोस्ती को और मजबूत करेगा। दोनों देशों के बीच व्यापार, संस्कृति, और शायद रक्षा सहयोग को भी बढ़ावा मिलेगा।

साइप्रस-तुर्की विवाद क्या है?

साइप्रस और तुर्की का झगड़ा 1974 से चला आ रहा है। उस साल ग्रीस के समर्थन से साइप्रस में तख्तापलट हुआ, जिसका मकसद साइप्रस को ग्रीस के साथ मिलाना था। जवाब में तुर्की ने साइप्रस के उत्तरी हिस्से पर हमला कर उसे अपने कब्जे में ले लिया। तब से साइप्रस दो हिस्सों में बँटा हुआ है।

  1. दक्षिणी हिस्सा: ये ग्रीक साइप्रियट्स है। इसे पूरी दुनिया मान्यता देती है। इसे ही रिपब्लिक ऑफ साइप्रस कहते हैं।
  2. उत्तरी हिस्सा: ये तुर्की साइप्रियट्स है। इसे तुर्की ने तुर्की रिपब्लिक ऑफ नॉर्दर्न साइप्रस घोषित किया, लेकिन इसे सिर्फ तुर्की ही मान्यता देता है। इसे अंतर्राष्ट्रीय मान्यता नहीं है।
तुर्की ने उत्तरी साइप्रस में अपनी सेना तैनात कर रखी है और वहाँ की समुद्री सीमाओं पर भी विवाद करता रहता है। साइप्रस के पास समुद्र में प्राकृतिक गैस के बड़े भंडार हैं, जिन्हें तुर्की अपने नियंत्रण में लेना चाहता है।
तुर्की का कहना है कि साइप्रस जैसे छोटे द्वीप को इतना बड़ा समुद्री क्षेत्र (EEZ) नहीं मिलना चाहिए, जबकि अंतरराष्ट्रीय कानून इसके खिलाफ है। तुर्की ने साइप्रस के समुद्री क्षेत्र में अपने जहाज भेजकर गैस खोजने की कोशिश की, जिससे साइप्रस, ग्रीस और यूरोपीय संघ के साथ उसका तनाव बढ़ गया। भारत का साइप्रस के साथ खड़ा होना तुर्की के लिए साफ संदेश है कि भारत उसके खिलाफ उन देशों का समर्थन करेगा, जो तुर्की की आक्रामकता से परेशान हैं।

IMEC को लेकर साइप्रस का महत्वपूर्ण स्थान

साइप्रस की भौगोलिक स्थिति इसे बहुत खास बनाती है। ये भूमध्य सागर में तुर्की के दक्षिण में, लेवांत (सीरिया-लेबनान-फिलिस्तीन-इजरायल) के पश्चिम में और स्वेज नहर के पास है। यानी ये यूरोप, एशिया और अफ्रीका के बीच एक अहम पड़ाव है।
भारत-मध्य पूर्व-यूरोप कॉरिडोर (IMEC) में साइप्रस की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो सकती है। IMEC एक ऐसा व्यापारिक रास्ता है, जो भारत को मध्य पूर्व के रास्ते यूरोप से जोड़ेगा। साइप्रस इस कॉरिडोर का एक अहम हिस्सा बन सकता है, क्योंकि ये व्यापार, ऊर्जा और रणनीतिक प्रभाव के लिए एक शानदार जगह है।
साइप्रस के पास 12-15 ट्रिलियन क्यूबिक फीट प्राकृतिक गैस के भंडार हैं। ये भंडार भले ही वैश्विक स्तर पर बहुत बड़े न हों, लेकिन साइप्रस जैसे छोटे देश के लिए बहुत मायने रखते हैं। यूरोप रूस से गैस कम लेना चाहता है और साइप्रस इसमें मदद कर सकता है। लेकिन तुर्की की दखलंदाजी की वजह से साइप्रस को अपनी गैस निर्यात करने में दिक्कत होती है।
साइप्रस अब ग्रीस या मिस्र के रास्ते गैस निर्यात करने की योजना बना रहा है, ताकि तुर्की को बाइपास किया जा सके। भारत अगर साइप्रस के साथ ऊर्जा, व्यापार या बुनियादी ढाँचे के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाता है, तो ये तुर्की के लिए बड़ा झटका होगा।

तुर्की को घेरना अब भारत की रणनीति

तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तईप एर्दोआन ने कई बार कश्मीर जैसे मुद्दों पर भारत के खिलाफ बयान दिए हैं। वो खुद को इस्लामिक दुनिया का नेता दिखाने की कोशिश करते हैं और संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर भारत की आलोचना करते हैं।
तुर्की ने पाकिस्तान के साथ अपनी सैन्य और कूटनीतिक साझेदारी भी बढ़ाई है। भारत इसका जवाब तुर्की के विरोधी देशों के साथ दोस्ती बढ़ाकर दे रहा है। साइप्रस के अलावा, भारत ग्रीस, आर्मेनिया और मिस्र के साथ अपने रिश्ते मजबूत कर रहा है। ये सभी देश तुर्की के साथ किसी न किसी तरह के विवाद में हैं।
मोदी का साइप्रस दौरा तुर्की को साफ बताता है कि भारत उसकी हरकतों का जवाब देना जानता है। साइप्रस यूरोपीय संघ का सदस्य है और भारत का पुराना दोस्त है। इस दौरे से दोनों देशों के बीच व्यापार, संस्कृति और रक्षा सहयोग को नया बढ़ावा मिलेगा। साथ ही साइप्रस IMEC में भारत के लिए एक अहम साझेदार बन सकता है।

साइप्रस के बाद जी7 शिखर सम्मेलन के लिए जाएँगे पीएम मोदी

साइप्रस के बाद मोदी जी7 शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने जाएँगे। ये भारत के लिए अपनी वैश्विक ताकत दिखाने का एक और मौका होगा। साइप्रस दौरा और जी7 में हिस्सा लेना दोनों ही भारत की उस रणनीति का हिस्सा हैं, जिसमें वो वैश्विक मंचों पर अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। तुर्की जैसे देशों को घेरने के साथ-साथ भारत उन देशों के साथ दोस्ती बढ़ा रहा है, जो उसके हितों का समर्थन करते हैं। साइप्रस के साथ भारत का ये रिश्ता न सिर्फ तुर्की को जवाब है, बल्कि भारत की बढ़ती वैश्विक ताकत का भी प्रतीक है।

मोदी को 20 से ज्यादा देश कर चुके हैं सम्मानित

इतिहास में सबसे अधिक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित भारतीय नेता पीएम मोदी हैं जिन्हें 21 देशों ने सम्मानित किया है।
  • सऊदी अरब ने 2016 में ‘ऑर्डर ऑफ किंग अब्दुलअजीज’ से सम्मानित किया।
  • अफगानिस्तान ने 2016 में ‘स्टेट आर्डर ऑफ़ ग़ाज़ी आमिर अमानुल्लाह खान’ से सम्मानित किया।
  • फिलिस्तीन ने 2018 में ‘ग्रैंड कॉलर’ से सम्मानित किया।
  • मालदीव ने 2019 में ‘निशान इज्जुद्दीन’ से नवाजा।
  • संयुक्त अरब अमीरात ने 2019 में ‘ऑर्डर ऑफ जायद’ से सम्मानित किया।
  • बहरीन ने 2019 में ‘किंग हमाद ऑर्डर ऑफ द रेनेसां’ से नवाजा।
  • अमेरिका ने 2020 में ‘लीजन ऑफ मेरिट’ की सर्वोच्च डिग्री से सम्मानित किया।
  • फिजी ने 2023 में सर्वोच्च सम्मान ‘ऑर्डर ऑफ फिजी’ से सम्मानित किया।
  • पापुआ न्यू गिनी ने 2023 में ‘ऑर्डर ऑफ लोगोहू ‘ से नवाजा।
  • मिस्र ने 2023 में ‘ऑर्डर ऑफ द नाइल’ से सम्मानित किया।
  • फ्रांस ने 2023 में ‘लीजन ऑफ ऑनर’ से सम्मानित किया ।
  • ग्रीस ने 2023 में ‘ऑर्डर ऑफ द ड्रुक ग्यालपो’ से नवाजा गया।
  • भूटान ने 2024 में ‘ऑर्डर ऑफ द ड्रुक ग्यालपो’ से सम्मानित किया।
  • रूस ने 2024 में ‘ऑर्डर ऑफ सेंट एंड्रयू द ए पोस्टल’ से नवाजा।
  • नाइजीरिया ने 2024 में ‘ग्रैंड कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द नाइजर’ से सम्मानित किया।
  • डोमिनिका ने 2024 में ‘ डोमिनिका अवार्ड ऑफ ऑनर ‘ से सम्मानित किया।
  • गुयाना ने 2024 में ‘ऑर्डर ऑफ एक्सीलेंस’ से सम्मानित किया।
  • कुवैत ने 2024 में ‘ऑर्डर ऑफ मुबारक अल-कबीर’ से नवाजा।
  • रूस ने 2024 में ‘ग्रैंड क्रॉस विद कॉलर’ से सम्मानित किया।
  • बारबाडोस ने 2025 में ‘ऑर्डर ऑफ एक्सीलेंस’ से नवाजा।
  • मॉरीशस ने 2025 में ‘ऑर्डर ऑफ द स्टार और की ऑफ द इंडियन ओशन’ से नवाजा।
  • श्रीलंका ने 2025 में ‘मित्र विभूषण’ अवॉर्ड से नवाजा।
  • साइप्रस ने 2025 में ‘क्रॉस ऑफ द ऑर्डर ऑफ मकारियोस 3’ से नवाजा।

घुसपैठियों को बाहर निकालना क्यों है इतना कठिन? कैसे एक्टिविस्ट-NGO और कुर्सी के भूखे नेता बनाते हैं सुरक्षा की दीवाल?

                  अवैध घुसपैठिए अमेरिका में कोहराम मचा रहे हैं (फोटो साभार: The Straight Times)
भारत में वर्तमान में ऑपरेशन पुशबैक चल रहा है। इसके तहत बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भेजने का प्रयास हो रहा है। यह कार्रवाई अभी कुछ हजार लोगों तक ही सीमित है। इसी तरह अमेरिका में भी वर्तमान में घुसपैठियों को वापस भेजने की कार्रवाई चल रही है, इसको लेकर लॉस एंजिल्स शहर में दंगे हो रहे हैं। कमोबेश यही स्थिति यूरोप के कई देशों में है, जहाँ से घुसपैठियों को वापस भेजे जाने की माँग हो है। 

असल में एक बार जब अवैध प्रवासी किसी देश में प्रवेश कर जाते हैं तो चाहे वह भारत हो, अमेरिका या फिर यूरोप के देश, तो उन्हें वापस भेजना कानूनी अड़चन, राजनीतिक विरोध और एक्टिविज्म का एक चक्रव्यूह बन जाता है। कायदा तो यह होना चाहिए कि किसी देश में अवैध रूप से रहने वालों को उठा कर सीधे वापस भेज दिया जाना चाहिए। हालाँकि, यह लंबी अदालती लड़ाइयों, एक्टिविज्म और कानूनी दाँवपेंच में बदल गया है। 

दिलचस्प बात यह है कि जहाँ भारत जैसे देशों में घुसपैठियों को बाहर निकालना मुश्किल काम है, वहीं पाकिस्तान धड़ाधड़ अफगानिस्तान के लोगों को निर्वासित कर रहा है। रिपोर्ट बताती है कि फरवरी 2025 तक, पाकिस्तान ने 800,000 से ज़्यादा अफ़गानों को बिना किसी बवाल के डिपोर्ट कर दिया है। लेकिन भारत में तुष्टिकरण करने और कुर्सी के भूखे नेता और उनकी पार्टियां उनके बचाव में खड़े हो जाते हैं। वास्तव में जनता को ही जागरूक होना पड़ेगा। जो नेता घुसपैठियों के समर्थन में आएं उन नेताओं को ही नहीं उनकी पार्टियों को भी चुनावों में एक भी वोट नहीं दें। घुसपैठियों के चक्कर में देशवासियों को उतनी सुविधाएं नहीं मिल पाती जितनी मिलनी चाहिए। 

भारत में कोर्ट और एक्टिविस्ट लगाते हैं अड़ंगा

जनसंख्या के मामले में चीन की तुलना में भारत एक बहुत बड़ा देश नहीं है। भारत में जनसंख्या बहुत ज़्यादा है लेकिन यहाँ सांस लेने के लिए जगह हर दिन कम होती जा रही है। हमारे देश में संसाधन कम होते जा रहे हैं। चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद भारत में ज़मीन, भोजन, और रोजगार बड़ी समस्या है। 

ऐसे देश में यह बात हैरान कर देती है कि बांग्लादेश और म्यांमार (खासकर रोहिंग्या) से आए घुसपैठिए लगातार कानूनका फ़ायदा उठाते हैं। हिरासत में लिए जाने के बाद बड़ी संख्या में NGO एक्टिविस्ट, प्रशांत भूषण और कपिल सिब्बल जैसे तथाकथित वरिष्ठ वकील खड़े हो जाते हैं। ये लोग इन्हें बचाने को सुप्रीम कोर्ट पहुँच जाते हैं। हिरासत में लिए गए कई घुसपैठिए भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत याचिकाएँ दायर करते हैं, जिसमें उनके जीवन या स्वतंत्रता को ख़तरा बताया जाता है।

दुखद बात ये है कि हमारी न्यायपालिका इन्हें बाहर फेंके जाने से अक्सर रोक देती है। इसके चलते केंद्र और राज्य सरकारों को अवैध अप्रवासियों को बाहर नहीं निकाल पातीं। भले ही सुप्रीम कोर्ट अवैध अप्रवासियों को डिपोर्ट करने के पक्ष में हो, लेकिन घुसपैठिए अनुभवी वकीलों की मदद से दायर रिट से अंतरिम राहत पा जाते हैं।  इससे डिपोर्ट होने पर रोक लग जाती है और अदालती मामला सालों तक चलता रहता है। 

कानूनी व्यवस्था से इस तरह के प्रतिरोध के साथ, राज्य सरकारें अब इसे पूरी तरह से दरकिनार करके मामलों को तेज़ी से निपटाने की कोशिश कर रही हैं। उदाहरण के लिए, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने हाल ही में विदेशी ट्रिब्यूनल को दरकिनार करने और घुसपैठियों को बांग्लादेश और म्यांमार में वापस भेजने के लिए 1950 के कानून का हवाला दिया है।  इस कदम की भी यह एक्टिविस्ट आलोचना कर रहे हैं। 

अमेरिका में नेताओं ने दी हुई शरण

अमेरिका में भी घुसपैठ का हाल कमोबेश ऐसा ही है। यह जब एक बार घुसपैठिया अंदर आ जाता है तो उसको डिपोर्ट करना भीइसी तरह एक लंबा और विवादास्पद मामला बन जाता है। अमेरिका में लॉस एंजिल्स, न्यूयॉर्क और सैन फ्रांसिस्को जैसे कुछ ऐसे शहर हैं, जहाँ अधिकारियों को इन घुसपैठियों से पूछताछ करने या उन्हें हिरासत में लेने की अनुमति नहीं है। ये शहर डिपोर्ट करने के आदेशों या पुलिस के साथ सहयोग करने से साफ इनकार करते हैं, उन्हें कानून प्रवर्तन के राजनीतिक हथियार के रूप में देखते हैं।

जून 2025 की शुरुआत से लॉस एंजिल्स में इसी से जुड़ा एक नाटक चल रहा है। यहाँ घुसपैठियों पर जब एक्शन चालू हुआ तो इसके विरोध में प्रदर्शन होने लगे। पुलिस ने इन प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस और रबर की गोलियाँ चलाई। यहाँ इसके बाद यूनियन नेता डेविड ह्यूर्टा को गिरफ्तार कर लिया गया, जिससे आक्रोश फैल गया। इसके बाद ऑपरेशन के दौरान 118 प्रवासियों को हिरासत में लिया गया।

ट्रम्प सरकार ने इसके बाद टाइटल 10 कानून के तहत 4,000 नेशनल गार्ड सैनिकों और 700 मरीन को तैनात करके जवाब दिया। इसके बाद तो बवाल और बढ़ा। कई कारों को जला दिया गया, सड़कों को अवरुद्ध कर दिया गया, कई पत्रकारों को घायल कर दिया गया। 

इस पूरे बवाल से ट्रंप सरकार की घुसपैठियों को लेकर नीति और किसी शहर को उनके लिए स्वर्ग बनाने की राजनीति माना जा सकता है। इन सब चक्करों में डिपोर्टेशन और भी कठिन हो जाता है। 

भले ही अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प सख्त सीमा प्रवर्तन और भूमि से अवैध अप्रवासियों को हटाने के लिए जोर दे रहे हैं, लेकिन कानूनी प्रणाली और कुछ विशिष्ट शहर इससे कड़ी लड़ाई लड़ रहे हैं। डिपोर्ट किए जाने वाले लोगों में कई सैकड़ों भारतीय भी थे जो अवैध रूप से अमेरिका में घुस आए थे।

यूरोप में कानून सबसे बड़ी अड़चन

यूरोपियन यूनियन के देशों में  घुसपैठियों को निकलने जाने में सबसे मजबूत अड़चन यहाँ के कानून हैं। मानवाधिकारों पर यूरोपीय सम्मेलन (ECHR) उन व्यक्तियों को डिपोर्ट करने पर रोक लगाता है, जिनको यातना या अमानवीय व्यवहार का जोखिम हो। 
इसके तहत यूरोपियन यूनियन के देशों को डिपोर्ट करते टाइम तमाम मानदंड पूरे पड़ते हैं, जिससे प्रक्रिया लगभग असंभव हो जाती है। हालाँकि, ये नियम स्थानीय लोगों के जीवन को नरक बना रहे हैं। यूरोपीय देशों में बड़े पैमाने पर अपराध, स्थानीय महिलाओं के साथ बलात्कार और डेमोग्राफी बदलाव आम हो गए हैं। 
हाल के दिनों में, इन नीतियों के खिलाफ़ विरोध हुआ है। बढ़ते दबाव के बीच, कुछ सरकारें (इटली, जर्मनी, ऑस्ट्रिया, डेनमार्क) खुले तौर पर ECHR में सुधार करने या यहाँ तक कि इससे बाहर निकलने पर विचार कर रही हैं, इसे प्रवासन पर ‘संप्रभु नियंत्रण में बाधा’ के रूप में देख रही हैं।

क्या सहिष्णु होना बन रहा है बाधा?

जो लोकतांत्रिक देश अपने यहाँ अधिकारों, सही न्यायिक प्रक्रिया और समानता के अधिकार जैसे ढिंढोरे पीटते हैं, वहीं यह घुसपैठियों को निकालने की कार्रवाई और कठिन हो जाती है। 
यहाँ जब भी किसी घुसपैठिए को निकाला जाना होता है तो उसके समर्थक कोर्ट पहुँच याचिका ठोक देते हैं। यह संवैधानिक, अंतरराष्ट्रीय या मानवीय आधार पर लगाई जाती हैं। दुखद बात यह है कि अधिकतर फ़ैसले घुसपैठियों पक्ष में होते हैं, देश के नागरिकों के पक्ष में नहीं। 
जमीनी स्तर के NGO से लेकर नागरिक संगठनों तक के कार्यकर्ता इसके लिए जन समर्थन जुटाते हैं, कानूनी चुनौतियाँ देते हैं, विरोध प्रदर्शन आयोजित करते हैं और मीडिया में सनसनी फैलाते हैं।
इसके बाद वामपंथी-उदारवादी मीडिया घुसपैठियों की दुख भरी कहानी को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है। इस कार्रवाई से लोगों के मन में ग्लानि उत्पन्न करने का प्रयास होता है। इसके अलावा नेता भी इसे अपने राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं और खुद का वोटबैंक बनाते हैं। इससे डिपोर्ट करना और भी कठिन काम हो जाता है।

पाकिस्तान ने दिखाया- कानूनी अड़चन ना होता होता है मददगार

जब अमेरिका और NATO सेना ने अफ़गानिस्तान छोड़ा और तालिबान ने सत्ता संभाली, तो लाखों अफ़गान अवैध रूप से पाकिस्तान और दुनिया के अन्य हिस्सों में चले गए। पाकिस्तान ने जल्द ही अफ़गानों को वापस खदेड़ना शुरू कर दिया। 
2023-25 ​​के बीच, अफ़गानों को निशाना बनाकर डिपोर्ट किया गया। संयुक्त राष्ट्र और पाकिस्तानी स्रोतों के अनुमानों के अनुसार जनवरी 2025 तक निर्वासित लोगों की संख्या 813,300 से अधिक और जून 2025 तक लगभग दस लाख हो जाएगी। पाकिस्तान को इस काम में ना किसी कानूनी अड़चन का सामना करना पड़ा और ना ही कोई एक्टिविज्म करने आया। ऐसा इसलिए क्योंकि पाकिस्तान में मानवाधिकार का ना कोई मोल है और ना ही वहाँ इस पर काम करने वाले कथित एक्टिविस्ट हैं। 

सहनशील होने की अपनी कीमत

असल में, अधिकारों का आवश्यकता से अधिक सम्मान करने वाले समाज अपने ही हाथ बाँध लेते हैं। कानूनी ढांचे, कार्यकर्ता प्रतिरोध और जन भावनाएँ अवैध घुसपैठियों के इर्द-गिर्द अदृश्य दीवारें खड़ी कर देती हैं। न्याय और स्वतंत्रता के नैतिक गुण प्रशासनिक कार्रवाई को धीमा कर देते हैं। 
जहाँ एक और अधिकारों को ज्यादा देखने पर यूरोप जैसे हाल होने का खतरा है तो वहीं पाकिस्तान जैसी अमानवीय कार्रवाई भारत नहीं कर सकता। ऐसे में सवाल उठता है कि घुसपैठियों को लेकर क्या किया जाना चाहिए। 
अब सवाल यह है कि कौन सा मॉडल बेहतर है? अधिकार-उन्मुख लोकतंत्र धीमे, गड़बड़ और कानूनी रूप से संघर्षशील हो सकते हैं, लेकिन वे व्यक्तिगत स्वतंत्रता को संरक्षित करते हैं। जो देश उन सुरक्षा उपायों को त्याग देते हैं, वे डिपोर्ट करने का लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन कहीं ना कहीं तो हमें रेखा खींचनी होगी।


स्वीडन : स्कूल में अंधाधुन फायरिंग, कम-से-कम 10 की मौत, मारा गया हमलावर भी: कुरान जलाने वाले सलवान मोमिका की भी यहीं हुई थी हत्या

                                                          स्वीडन स्कूल फायरिंग (साभार: NPR)
यूरोपीय देश स्वीडन के ऑरेब्रो शहर में मंगलवार (4 फरवरी 2025) को बंदूकधारी हमलावर ने एक स्कूल में अंधाधुन फायरिंग की, जिसमें कम-से-कम 10 लोग मारे गए हैं। मृतकों में हमलावर भी शामिल है। मृतकों के पहचान के बारे में अभी तक पुलिस ने नहीं बताया है। पुलिस का कहना है कि वह हमले के संभावित मकसद का पता लगाने की कोशिश कर रही है।

गोलीबारी स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम से लगभग 200 किलोमीटर (125 मील) पश्चिम में स्थित ऑरेब्रो में कैंपस रिसबर्गस्का सेकेंड्री स्कूल हुई। इसमें प्राइमरी और अपर सेकेंडरी की पढ़ाई होती है। इसके साथ ही इस विद्यालय में आप्रवासियों के लिए स्वीडिश कक्षाएँ, व्यावसायिक प्रशिक्षण और बौद्धिक विकलांग लोगों के लिए कार्यक्रम भी प्रदान किए जाते हैं।

इस स्कूल के छात्रों की उम्र 20 साल से अधिक है। जिस समय गोलीबारी हुई, उस समय वहाँ कई स्कूली बच्चे, टीचर एवं अन्य लोग उपस्थित थे। ऑरेब्रो के पुलिस प्रमुख रॉबर्टो ईद फॉरेस्ट ने बताया, “करीब 10 लोग मारे गए हैं। संख्या के बारे में हम अभी स्पष्ट नहीं हैं।” पुलिस को आशंका है कि मृतकों की संख्या बढ़ सकती है। वहीं, इसे आतंकी घटना मानने से भी इनकार किया है।

इस हमले के कई प्रत्यक्षदर्शी भी सामने आए हैं। उनमें से एक 28 वर्षीय एंड्रियास सुंडलिंग ने कहा कि उसने तीन धमाके और तेज चीखेें सुनीं। इसके बाद वह जान बचाने के लिए एक कक्षा में जाकर छिप गई। स्कूल के अधिकारियों का कहना है कि हमले के वक्त घटनास्थल पर बहुत कम बच्चे थे। अधिकांश बच्चे घर जा चुके थे। माना जा रहा है कि हमला ऑटोमेटिक राइफल से की गई है।

वहीं, स्कूल की 54 वर्षीय टीचर मारिया पेगाडो ने बताया कि लंच ब्रेक के ठीक बाद किसी ने उनकी कक्षा का दरवाज़ा खोला और चिल्लाते हुए सभी को बाहर निकलने के लिए चिल्लाया। उन्होंने कहा, “मैंने अपने सभी 15 छात्रों को बाहर हॉलवे में ले जाकर भागना शुरू कर दिया। फिर मैंने दो गोलियाँ सुनीं, लेकिन हम बच गए। हम स्कूल के प्रवेश द्वार के करीब थे।”

टीचर मारिया ने आगे कहा, “मैंने लोगों को घायलों को घसीटते हुए बाहर निकलते देखा। पहले एक को देखा, फिर दूसरे को। मुझे एहसास हुआ कि यह बहुत गंभीर स्थिति है।” पुलिस ने मृतकों की उम्र, लिंग या निवास स्थान आदि को लेकर कोई जानकारी नही दी है। पुलिस का मानना है कि हमलावर अकेला था। स्थानीय मीडिया के अनुसार, पुलिस ने हमलावर के घर पर छापेमारी की है।

कुछ रिपोर्ट में कहा गया है कि संदिग्ध हमलावर की उम्र करीब 35 साल है और उसके पास हथियार रखने का लाइसेंस है। उसका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, लेकिन उसकी पहचान के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई। पुलिस ने इस जानकारी की पुष्टि नहीं की है। बता दें कि मुस्लिमों के दीनी किताब कुरान जलाने वाले सलवान मोमिका की भी कुछ दिन पहले स्वीडन में हत्या कर दी गई थी।

स्वीडन के राजा कार्ल सोलहवें गुस्ताफ ने इस घटना की निंदा की है। वहीं, स्वीडन के प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टरसन ने इस हमले को देश के इतिहास में सबसे भयानक सामूहिक गोलीबारी बताया है। इस देश में संगठित अपराधिक गिरोहों को लेकर क्रिस्टरसन ने कहा, “यह स्वीडन को विरासत में मिली समस्या है। वे बहुत लंबे समय से विकसित हो रहे हैं। हिंसा पर हमारा नियंत्रण नहीं है, यह बिल्कुल स्पष्ट है।”

स्वीडन में गिरोह अपराध की समस्या के कारण गोलीबारी और बम विस्फोट की घटनाएँ बढ़ रही हैं। हालाँकि स्कूलों में घातक हमले अभी भी दुर्लभ हैं। स्वीडिश नेशनल काउंसिल फॉर क्राइम प्रिवेंशन के अनुसार 2010 से 2022 के बीच स्कूलों में घातक हिंसा की सात घटनाओं में दस लोग मारे गए।

अब इस्लामी कानून से ब्रिटेन को हाँक रहे मुस्लिम, चल रहे 85 शरिया कोर्ट: 4 बीवी की रवायत को बढ़ावा; भारत में मुस्लिम तुष्टिकरण करने वालों को आंखें खोलनी चाहिए

इंग्लैंड का कानून इस्लामी कट्टरपंथ के आगे घुटने टेक रहा है। कभी दुनिया के एक बड़े हिस्से पर राज करने वाला इंग्लैंड अब मुस्लिम कट्टरपंथियों के नतमस्तक है। जिस इंग्लैंड ने ‘कानून का राज’ की अवधारणा दी थी, उस देश में अब इस्लामी अदालतें चल रही हैं। ब्रिटेन में दशकों से आदर्शवादी और लिबरल बनने के चक्कर में कट्टरपंथ पर मुंह बंद रखा गया था।

इंग्लैंड में जो कुछ घटित हो रहा है उसे देख भारत में मुस्लिम तुष्टिकरण करने वाले हिन्दू खासकर संघचालक मोहन भागवत जैसों को अपनी आंखें ही नहीं दिमाग भी खोलने की जरुरत है। मुस्लिम कट्टरपंथी जब फंसे होते है तभी संविधान की बात करते हैं, हकीकत में इनकी मंशा संविधान की आड़ में वही है जो इंग्लैंड में हो रहा है। भारत में संविधान सिर्फ तभी तक सुरक्षित है जब तक हिन्दू बहुसंख्यक है। 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने से पहले संविधान में जो संशोधन किये गए सभी देश को शरीयत का संकेत देते हैं। यही वजह है कि विपक्ष 2024 चुनावों में संविधान बचाओ का शोर मचाकर जनता को गुमराह करती है और मूर्ख जनता इनके झांसे में आ गयी। 

     

इस्लामी कट्टरपंथ के पैर पसारने को लेकर अगर कोई बोलता है तो उसे इस्लामोफोब करार दिया जाता है। इस्लाम पर इस चुप्पी का सबसे ज्वलंत उदाहरण ग्रूमिंग गैंग रहे हैं, जिन्होंने हजारों ब्रिटिश लड़कियों को निशाना बनाया। यह निशाना बनाने वाले मुस्लिम थे और उनके ऊपर कोई कार्रवाई नहीं हुई।

अब शरिया अदालतें खुल्लम-खुल्ला ब्रिटिश कानूनों की धज्जियाँ उड़ा रही हैं। ‘शरिया कोर्ट’ के नाम पर चलाई जा रहीं यह अदालतें ब्रिटेन 4 निकाह जैसी सामजिक कुरीतियों को बढ़ावा दे रही हैं। इन अदालतों पर ब्रिटिश सरकार अंकुश नहीं लगा पा रही है। यह अदालतें अवैध निकाह भी करवा रही हैं जिनका कानूनन कोई रिकॉर्ड नहीं है।

ब्रिटिश अखबार द टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, इंग्लैंड में वर्तमान में 85 ऐसी शरिया अदालतें चल रही हैं। मुस्लिमों के मसलों से निपटने के लिए बनाई गई यह शरिया अदालतें पूरे इंग्लैंड में फैली हुई हैं। यह अदालतें निकाह, तलाक, खुला और चार निकाह जैसे मामलों पर फैसले दे रही हैं। यह अदालतें ब्रिटिश कानून के खिलाफ जाकर तमाम फैसले देती हैं।

रिपोर्ट बताती है कि ऐसी पहली शरिया अदालत इंग्लैंड में लंदन में 1982 में खोली गई थी। तब से यह लगातार बढ़ रही हैं। इनमें से एक अदालत ने एक ऐसे एप को मंजूरी दे रखी थी जो मुस्लिम पुरुषों से उनकी बीवियों की संख्या पूछता था। इसके अलावा इंग्लैंड में चलने वाले एक और एप में भी मुस्लिम युवा निकाह के बाद कितनी बीवियाँ रखेंगे, इसकी जानकारी भर सकते हैं।

ब्रिटिश कानून के अंतर्गत कोई भी व्यक्ति एक से अधिक शादी/निकाह नहीं कर सकता। ऐसा करने के लिए तलाक और उसका कानूनी आदेश जरूरी है। हालाँकि, यहः शरियाई अदालतें इन सब बातों को नहीं मानती हैं और धड़ल्ले से इन सब कामों में मशगूल हैं।

इन शरिया अदालतों ने लगभग 100000 ऐसे निकाह करवाए हुए हैं, जिनका ब्रिटिश कानून में कोई पंजीकरण नहीं हुआ है। इंग्लैंड के भीतर शरिया अदालतों की धाक इतनी बढ़ गई है कि अब यूरोप के बाकी देशों और अमेरिका से मुस्लिम यहाँ अपने इस्लामी मसले लेकर पहुँच रहे हैं।

यह अदालतें चार निकाह को बढ़ावा दे रही हैं लेकिन ब्रिटिश एजेंसियाँ इनके आगे लाचार हैं। लगातार मुस्लिम तुष्टिकरण में लगे रहने वाले ब्रिटिश नेताओं ने इस मसले पर आँखे मूँद ली हैं। इसी के चलते इंग्लैंड अब शरिया कोर्ट के पश्चिमी देशों का प्रमुख केंद्र है।

इंग्लैंड में इन शरिया अदालतों को लेकर धर्मनिरपेक्षता को लेकर काम करने वाले संगठन विरोध कर रहे हैं। इंग्लैंड के ऐसे ही एक संगठन नेशनल सेक्युलर सोसायटी ने माँग की है कि ब्रिटेन में चल रही इस समानांतर कानून व्यवस्था पर नकेल कसी जाए। उन्होंने कहा है कि इससे महिलाओं और बच्चों के अधिकारों पर असर पड़ रहा है। हालाँकि, सरकार इस मामले पर शांत है।

ब्रिटेन में इस्लामी कट्टरपंथ पर सरकार और लिबरल समाज का चुप रहना कोई विचित्र बात नहीं है। ग्रूमिंग गैंग के हाथों जब हजारों ब्रिटिश लड़कियाँ शिकार बन गईं तो एक टास्क फ़ोर्स बनाई गई। लेकिन इसी के साथ अब ब्रिटेन में इस्लामी कानून नाफ़िज करने की तैयारी है। ब्रिटिश सरकार ने इस दौरान शुतुरमुर्ग की तरह रेत में गर्दन धँसा ली है।

ब्रिटिश सरकार इस पूरे इस्लामी कट्टरपंथ के तंत्र पर प्रहार नहीं करना चाहती। उसे लगता है कि इससे उसकी कथित उदार छवि पर असर पड़ेगा, जबकि सच्चाई यह है कि इसी का फायदा उठा कर इस्लामी कट्टरपंथी अपनी धाक इंग्लैंड में जमा रहे हैं। वह हिन्दुओं पर हमला करते हैं, महिलाओं को छेड़ते हैं यहाँ तक कि इंग्लैंड में धमाके भी हो चुके हैं।

जर्मनी : इस्लाम विरोधी रैली में चाकू से ताबड़तोड़ हमला करने वाले को पुलिस ने पहुंचा दिया 72 हूरों के पास

                              जर्मनी में चाकूबाजी करने वाला हमलावर ढेर (फोटो साभार : मेट्रो.को.यूके)
जर्मनी में एक रैली के दौरान एक इस्लामी कट्टरपंथी ने चाकू से हमला कर दिया। उसने अपने हमले में कई लोगों को घायल कर दिया, जिसमें एक पुलिसकर्मी भी शामिल है। इस हमले में रैली के दौरान बोल रहे इस्लाम विरोधी प्रचारक माइकल स्टूर्जेनबर्गर भी घायल हो गए। हालाँकि पुलिस कर्मियों ने लोगों को बचाने के लिए हमलावर को भी ढेर कर दिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस रैली का यूट्यूब पर लाइव प्रसारण किया जा रहा था, जिसे सिटीजन्स मूवमेंट पैक्स यूरोपा (बीपीई) ने मैनहैम शहर में आयोजित किया था। सिटीजन्स मूवमेंट पैक्स यूरोपा ऐसा ग्रुप है, जो यूरोप के इस्लामीकरण के खिलाफ आवाज उठाता रहा है।

भारत में छद्दम देशप्रेमी नेता और उनकी पार्टियां कट्टरपंथियों की गोदी में बैठ रोहिंग्या और अवैध घुसपैठियों को संरक्षण में लगे हुए हैं, जबकि विदेशों में घुसपैठियों के विरोध में जनमानस खड़ा हो रहा।  

इस रैली में यूरोप में तेजी से फैल रहे इस्लाम को लेकर चर्चा हो रही थी, जिसमें मािकल स्टूर्जेनबर्गर को भी भाषण देना था। वो उस समय मंच पर ही मौजूद थे, लेकिन इस्लामिक कट्टरपंथी ने उन्हें चाकुओं से गोद दिया। यूट्यूब पर प्रसारित इस हमले की फुटेज में सारे घटनाक्रम साफ दिख रहे हैं। जिसमें हमलावर उनपर ताबड़तोड़ हमले करता दिखा। इसके बाद पुलिस ने उसे रुकने की चेतावनी दी, लेकिन उसने एक पुलिस अधिकारी पर ही हमला बोल दिया, जिसके बाद एक अन्य पुलिसकर्मी ने उसे बिल्कुल पास से गोली मार दी और वो गिर पड़ा। थोड़ी देर में उसके शरीर ने हरकत करनी बंद कर दी।

Islam critics stabbed in Mannheim, Germany, by crazed
Muslim migrant.

Police were also stabbed. pic.twitter.com/TrQGp9JSfd

— Tommy Robinson 🇬🇧 (@TRobinsonNewEra) May 31, 2024

पुलिस ने इस हमले में घायल लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया है। पुलिस ने थोड़े समय बाद एक बयान जारी किया और बताया कि हमलावर नीचे रंग के लोवर में था और उसकी पीठ पर बैग भी था। उसने अचानक हमला किया और लोगों को संभलने का मौका नहीं मिला।

हाल के महीनों में जर्मनी में इस्लाम और शरणार्थी समस्या को लेकर चर्चा बढ़ी है, खासतौर पर दक्षिणपंथी राजनीतिक दलों मुख्य रूप से ‘अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी’ (एएफडी) पार्टी की बढ़ती लोकप्रियता के बीच। जर्मनी शरणार्थियों के लिए एक प्रमुख गंतव्य रहा है। बता दें कि जर्मनी में मुस्लिम शरणार्थियों की संख्या तेजी से बढ़ी है। साल 2015 के बाद से अब तक 10 लाख लोग जर्मनी में शरण ले चुके हैं।

यूरोप, पश्चिमी देश और अमेरिका, अब भारत के मामलों में दखल देना बंद करें; मुसलमानों के उत्पीड़न के लिए चिल्ल पों अब बंद होनी चाहिए ; उनका उत्पीड़न है तो उन्हें अपने देशों में शरण दे सकते हैं

 सुभाष चन्द्र 

अमेरिका की संस्था USCIRF 1998 में स्थापना के बाद से ही भारत के विरुद्ध मुस्लिमों के उत्पीड़न का आरोप लगाती रही है। शायद ही इसकी कोई रिपोर्ट आई हो जिसमें भारत की निंदा न की गई हो। अभी इस संस्था “अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग” में एक भी हिंदू सदस्य नहीं रखा गया है और इसी से साबित होता है कि यह भारत के विरुद्ध नेरेटिव बनाने के लिए  एकतरफा रिपोर्ट बनाता है।

ब्रिटेन के समाचार पत्र “डेली एक्सप्रेस” के असिस्टेंट एडिटर सैम स्टीवनसन भारत के लोकसभा चुनावों को कवर करने आए हुए हैं। उन्होंने कल खुल कर कहा कि यूरोप और पश्चिमी देशों ने अपने मीडिया के जरिए भारत के खिलाफ “नकारात्मक और पक्षपातपूर्ण” कहानियों के हुजूम लगा दिए हैं। जबकि जमीनी हकीकत है कि प्रधानमंत्रियों की चुनावी रैलियों में सांप्रदायिक सद्भाव की झांकी देखी जा सकती है।

लेखक 
चर्चित यूटूबर 
स्टीवनसन ने कहा कि ब्रिटिश मीडिया कुछ जटिल चीज़ों को सतही रुप से देखने का प्रयास कर रहा है और मोदी को इस्लाम विरोधी बताते हैं जबकि मोदी की रैलियों में मुस्लिम महिलाओं समेत हर धर्म के लोग आते हैं। इस देश की समृद्ध विरासत और समग्रता को नज़रअंदाज किया जा रहा है। स्टीवनसन ने कहा कि भारत विरोधी बकवास के साथ भारत को नीचा दिखाने के प्रयास बंद होने चाहियें। दुर्भाग्य से पश्चिमी और यूरोप के देशों का नजरिया भारत एक लिए अच्छा नहीं है।

स्टीवनसन की बातों में मुझे और जोड़ना है कि ये पश्चिमी और यूरोपियन देश अपने मीडिया के जरिए ही भारत की नकारात्मक छवि नहीं बना रहे बल्कि उन्हें ऐसा करने में भारत के अनेक ढक्कन पत्रकार इन देशों में ही नहीं अमेरिका में भी बहरत के खिलाफ जहर पैदा करने में सहायक है और उनके काम में कुछ राजनेता भी भरपूर सहयोग कर रहे हैं। सैम पित्रोदा जैसे लोग तो अमेरिका में ही बैठे हुए हैं। मोदी को इस्लाम विरोधी बताने में इन विदेशी शक्तियों को भारत के राजनेता भी पूरा योगदान दे रहे हैं।

लेकिन ये पश्चिमी, यूरोपीय देश और अमेरिका आदि अपने अपने देशों में मुस्लिमों को दी हुई छूट से कैसे मकड़जाल में फंसते जा रहे हैं, उन्हें इसका आभास भी नहीं है। ब्रिटेन आज विभाजन के कगार पर खड़ा है, फ्रांस में जब मर्जी मुस्लिम आग लगाने में सक्षम हैं जैसे पिछले साल जनवरी में किया था और यही हाल जर्मनी और अन्य देशों का है।

ब्रिटेन को यह विभाजन का दिन देखना ही पड़ेगा क्योंकि उसने जितने भी देश आज़ाद किए उनमे केवल एक भारत के टुकड़े किए मुस्लिमो के लिए और उस “कुकर्म”  का फल तो भुगतना पड़ेगा हर हाल में।

अमेरिका को ऐसा देखने में कुछ समय लगेगा लेकिन इस्लामिक फोबिया जिसका वह विरोध करता है, उसे ऐसा भुगतना पड़ेगा कि स्थिति को संभालना मुश्किल हो जायेगा। इसलिए बेहतर है अपने अपने मुल्कों को देखें, भारत पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है।

लेकिन इन देशों को समझना चाहिए कि भारत में मुस्लिमों के “उत्पीड़न” नाम की कोई चीज़ नहीं है क्योंकि अगर होती फिर मुस्लिम भारत में आ कर क्यों रहना चाहते हैं। पाकिस्तान बना कर भी पाकिस्तानी भारत आना चाहते हैं, बांग्लादेशी आए घुसपैठ करके और रोहिंग्या भी आए। यहां आने से बेहतर था चीन चले जाते। 

लेकिन फिर भी अगर इन देशों को लगता है मुस्लिमों का “उत्पीड़न” हो रहा है तो जो भी “पीड़ित” हैं, उन्हें अपने यहां ले जाएं और शरण दे दें। इन देशों में जो मिल सकता है मुस्लिमों को, वह भारत नहीं दे सकता जैसे बेरोजगारी भत्ता। 

नीदरलैंड में फिलिस्तीन समर्थकों पर बुलडोजर वाली कार्रवाई: एम्स्टर्डम यूनिवर्सिटी में घुस पुलिस ने 125 को पकड़ा, US-यूरोप में भी सख्ती

एम्स्टर्डम यूनिवर्सिटी में फिलिस्तीन समर्थक प्रदर्शन खत्म (फोटो साभार : Time)
नीदरलैंड्स की एम्स्टर्डम यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की जगह फिलिस्तीन के समर्थन में चल रहे प्रदर्शन को पुलिस ने तितर-बितर कर दिया है। एम्स्टर्डम पुलिस ने यूनिवर्सिटी कैंपस में प्रदर्शन कर रहे 125 से ज्यादा फिलिस्तीन समर्थकों को गिरफ्तार भी कर लिया है। फिलिस्तीन के समर्थन में प्रदर्शन कर रहे कथित छात्रों ने यूनिवर्सिटी कैंपस में कैंप लगा लिए थे, जिसे पुलिस ने उखाड़ फेंका है।

टाइम मैगजीन की रिपोर्ट के मुताबिक, मंगलवार (7 मई 2024) के तड़के ही एम्स्टर्डम पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को यूनिवर्सिटी कैंपस से हटाने की मुहिम छेड़ी और सभी प्रदर्शनकारियों को टेंट खाली करके जाने के लिए कहा, लेकिन प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की बात नहीं मानी, जिसके बाद पुलिस ने बल प्रयोग करते हुए सभी टेंटों को हटा दिया और 125 से अधिक प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार कर लिया।

एम्स्टर्डम पुलिस ने इस कार्रवाई की सूचना एक्स पर भी साझा की है, जिसमें बताया गया है कि 125 फिलिस्तीन समर्थकों को पुलिस ने गिरफ्तार करते हुए हिरासत में ले लिया है।

नीदरलैंड्स के राष्ट्रीय न्यूज चैनल ने घटनास्थल की तस्वीरें प्रसारित की है। इन वीडियो में पुलिस को बैरिकेड्स को गिराते दिखाया जा रहा है, जिसमें पुलिस ने भारी मशीनों का इस्तेमाल करते हुए अस्थाई निर्माणों को ध्वस्त कर दिया। इस दौरान पुलिस वालों ने लाठियों का भी जमकर इस्तेमाल किया। पुलिस वालों ने फिलिस्तीन समर्थक प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया और तंबुओं को उखाड़ फेंका।

फिलिस्तीन के समर्थन में अमेरिका और यूरोप के कई देशों की यूनिवर्सिटीज में प्रदर्शन हो रहे थे। अमेरिका में प्रदर्शन उग्र भी हो रहा था, जिसके बाद प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए कई फिलिस्तीन समर्थक प्रदर्शनकारियों के खिलाफ न सिर्फ कार्रवाई की, बल्कि यूनिवर्सिटीज ने प्रदर्शन में शामिल छात्रों को यूनिवर्सिटी से भी निकाल दिया है। ये प्रदर्शनकारी 7 अक्टूबर 2023 को हमास के इजरायल पर हुए हमले के बाद इजरायल की जवाबी कार्रवाई का विरोध कर रहे थे।

क्यों विवादों में घिरी सेरेलक बनाने वाली नेस्ले, बेबी फूड में कैसे कर रही मिलावट: खुलासे के बाद हरकत में आयीं सोयी हुई भारतीय एजेंसियाँ


खाने पीने के उत्पाद बनाने वाली कम्पनी नेस्ले के भारतीय समेत तमाम विकाशील या गरीब देशों के बच्चों पर दोहरे मानक सामने आ गए हैं। एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि नेस्ले भारतीय बच्चों के लिए बेचे जाने फूड सेरेलेक में मिठास के लिए चीनी जैसे उत्पाद मिलाती है जबकि यही काम यूरोप के बच्चों के लिए नहीं किया जाता। भारतीय बच्चों और यूरोपियन बच्चों के लिए बेंचे जाने एक ही उत्पाद में इतना अंतर कैसे है,नेस्ले से इस बात का जवाब देते नहीं बन रहा है। अब भारत सरकार भी इस मामले का संज्ञान ले रही है।

आखिर बच्चों से लेकर बड़ों तक के स्वास्थ्य के साथ कब से खिलवाड़ किया जाता है? इसका मतलब है कि भारत में FSSAI का कोई डर नहीं? क्यों बनाया गया यह विभाग? क्या इसके अधिकारियों पर कोई कार्यवाही नहीं होनी चाहिए? ऐसे अनेकों खाद्य पदार्थ हैं, जिनकी जाँच की जानी चाहिए। अक्सर देखा गया है कि जब जाँच टीम बाजार में आती है दुकाने बंद कर दी जाती हैं, ऐसे हालत में उस जाँच टीम को अधिकार होना चाहिए कि दुकान बंद मिलने पर टीम दुकान सील कर दे। जब दुकानदार सैंपल देने को तैयार हो तभी सील तोड़ी जाये। जब ग्राहक बड़ी हुई कीमत दे रहा है फिर मिलावटी खाद्य पदार्थ क्यों? मोदी सरकार को वापस आने पर जनता की सेहत को देखते इस ओर कढोर कदम उठाने होंगे। 

स्विटज़रलैंड के पब्लिक आई और इंटरनेशनल बेबीफूड एक्शन नेटवर्क (IBFAN) ने पूरे विश्व से नेस्ले के बच्चों के लिए बेंचें जाने वाले उत्पादों के सैंपल की जाँच की है। भारत समेत कई देशों में यह उत्पाद सेरेलेक के नाम से बेचा जाता है। यह उत्पाद छोटे बच्चों को खाने के रूप में दिया जाता है। फिलिपीन्स में बेचे जाने वाले इसी उत्पाद में प्रति खुराक में 7.3 ग्राम चीनी पाई गई। स्विटज़रलैंड समेत अन्य यूरोपियन देशों में बेंचे जाने वाले इन्हीं उत्पादों में बिलकुल भी चीनी नहीं थी।

इस रिपोर्ट में बताया गया कि नेस्ले सेरेलेक के सभी उत्पादों में चीनी डाली जाती है। औसतन यह 4 ग्राम होती है। सबसे ज्यादा फ़िलीपीन्स के सैंपल में चीनी पाई गई। यूरोपियन बाजारों के सैंपल में चीनी नहीं मिली। भारत से लिए गए सैंपल की जाँच में भी बड़े खुलासे हुए। भारत में बिकने वाले सेरेलेक में औसतन हर खुराक में 3 ग्राम चीनी पाई गई है। यह भी बताया गया है कि चीनी इस उत्पाद में डाली गई लेकिन उसके विषय में डिब्बों पर स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया।

रिपोर्ट में बताया गया है, “भारत में, जहाँ इस उत्पाद की बिक्री 2022 $250 मिलियन (लगभग ₹2000 करोड़) के पार थी, सभी सेरेलैक बेबीफूड में प्रति खुराक लगभग 3 ग्राम अतिरिक्त चीनी होती है। यही स्थिति अफ्रिका के मुख्य बाज़ार दक्षिण अफ़्रीका में भी है, जहाँ सभी सेरेलैक प्रति खुराक में 4 ग्राम या अधिक चीनी होती है।”

सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि दक्षिण अफ्रीका, बांग्लादेश और पाकिस्तान समेत तमाम देशों में भी नेस्ले ने यही किया। यह भी बताया गया कि इनमें से कुछ पैकेज पर इनमें चीनी होने की बात लिखी तक नहीं थी। इन उत्पादों में शहद के रूप में चीनी थी जिसको लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) मना करता है।

नेस्ले का यह कदम बच्चों के लिए खतरनाक क्यों?

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, बच्चों के खाने में छोटी उम्र से ही अधिक चीनी दिया जाना ठीक नहीं है। इससे उनमें मोटापा, ह्रदय सम्बंधित बीमारियाँ और कैंसर आदि का खतरा बढ़ा सकती हैं। इसके अलावा बच्चों के दांतों पर भी चीनी का विपरीत प्रभाव पड़ता है। मिठास के लिए उत्पाद कम्पनियाँ उपयोग करती हैं, वह भी शुद्ध चीनी ना होकर अन्य मिठास वाले उत्पाद होते हैं। ऐसे में इनसे बचने की सलाह दी जाती है।

औपनिवेशिक सोच का नतीजा

नेस्ले के दोहरे मानकों पर सवाल उठाते हुए, जोहान्सबर्ग में विटवाटरसैंड विश्वविद्यालय में स्वास्थ्य के प्रोफेसर और एक बाल रोग विशेषज्ञ करेन हॉफमैन ने पब्लिक आई से कहा, ”मुझे समझ में नहीं आता कि दक्षिण अफ्रीका बिकने वाले उत्पाद उन उत्पादों से अलग क्यों है जो विकसित देशों में बेचे जाते हैं। यह औपनिवेशीकरण का एक रूप है और इसे बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। बच्चों के खाने में चीनी मिलाना भी एकदम सही नहीं है।”
अवलोकन करें:- 
नेस्ले ने इस मामले पर बयान जारी किया है। भारत में नेस्ले के प्रवक्ता ने कहा है, “नेस्ले इंडिया अपने उपभोक्ताओं को सबसे अच्छा न्यूट्रीशन प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है, यह हम पिछले 100 सालों से कर रहे हैं और हम हमेशा अपने उत्पादों में पोषण, गुणवत्ता और सुरक्षा के उच्चतम मानकों को बनाए रखेंगे।”
भारत में खाने-पीने की वस्तुओं की गुणवता का प्रमाणन करने वाली एजेंसी FSSAI ने भी इस मामले का संज्ञान लिया है और पब्लिक आई की रिपोर्ट के बाद इस पर कार्रवाई करेगी।