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फैयाज मंसूरी ने कहा था-‘बाबरी मस्जिद तुर्की की सोफिया मस्जिद की तरह फिर बनाई जाएगी’, सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक मामला रद्द करने से किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद को लेकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करने वाले फैयाज मंसूरी के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया है। याचिकाकर्ता मंसूरी के वकील ने कोर्ट में दावा किया कि उसकी पोस्ट में कोई अश्लीलता नहीं था इसलिए आपराधिक केस को रद्द कर दिया जाए।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, मंसूरी द्वारा सोशल मीडिया पर शेयर की गई पोस्ट में कहा गया था कि बाबरी मस्जिद एक दिन तुर्की की सोफिया मस्जिद की तरह फिर से बनाई जाएगी। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की है।

गौरतलब यह है कि मस्जिद के लिए मिली जमीन पर आज तक नींव तक खुदी। सुना है धन भी जमा है यानि "अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर बुझि टके सेर खा जा", जबकि अयोध्या में राममंदिर बनकर तैयार भी हो गया। श्रद्धालु दर्शन करने जा रहे हैं। लेकिन मस्जिद का कोई अता पता नहीं। और अपने फायदे के लिए मुसलमानों के जज्बातों से खेल अपनी तिजोरियां भरते हैं।  

वहीं, याचिकाकर्ता के वकील तल्हा अब्दुल रहमान का दावा है कि जिस पोस्ट में अश्लीलता और भड़काऊ टिप्पणी की गई थी वह किसी अन्य व्यक्ति का है। अब्दुल ने दावा किया कि उसकी जाँच नहीं की गई है।

जस्टिस कांत ने इससे सहमत ना होते हुए कहा कि कोर्ट ने याचिकाकर्ता की पोस्ट की जाँच की है। हालाँकि, जज ने चेतावनी देते हुए कहा, “हमसे कोई टिप्पणी ना माँगी जाए।” सुप्रीम कोर्ट ने अपराधिक मामले ना रद्द करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए सभी तर्कों पर ट्रायल कोर्ट द्वारा उनके गुण-दोष के आधार पर विचार किया जाएगा।

क्या है मामला?

लखीमपुर खीरी के रहने वाले याचिकाकर्ता मंसूरी के खिलाफ 6 अगस्त 2020 को FIR दर्ज की गई थी। इसमें जिसमें दावा किया गया था कि मंसूरी ने फेसबुक अकाउंट पर अपमानजनक संदेश पोस्ट किया, जिस पर समरीन बानो नामक व्यक्ति ने हिंदू समुदाय के देवी-देवताओं पर अभद्र टिप्पणी की थी।

मंसूरी के खिलाफ यह FIR भारतीय दंड संहिता की (IPC) धारा 153ए, 292, 505 (2), 506, 509 और सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधन) अधिनियम, 2008 (IT Act) की धारा 67 के तहत दर्ज की गई थी।

इसके बाद लखीमपुर खीरी के जिलाधिकारी ने याचिकाकर्ता के विरुद्ध राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम 1980 (NSA) के तहत निरोध आदेश पारित किया। हालाँकि, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सितंबर 2021 में इसे रद्द कर दिया।

इसके बाद मंसूरी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए यह तर्क दिया कि उसका अकाउंट हैक कर लिया गया था। मंसूरी ने दावा किया कि उस पोस्ट में कोई आपराधिकता या दुश्मनी/वैमनस्य बढ़ाने का इरादा नहीं था। सितंबर में हाईकोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी और इसके बाद मंसूरी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।

गाजा युद्ध के दौरान इजरायल को हथियार से लेकर फाइटर जेट तक की मदद दे रहा था तुर्की, फोड़ रहा था TATA कंपनी पर ठीकरा: UN की रिपोर्ट ने खोल दी पोल

                                               यूएन रिपोर्ट में तुर्की को लेकर खुलासा ( x@tnt,nbt)
जाने-माने हबीब पेंटर की एक बहु-चर्चित कव्वाली है "जब खून ही बना दुश्मन ..." जो इजराइल और गाज़ा युद्ध में चरितार्थ हो रही है। यानि मुसलमान ही मुसलमान को निपटाने में लगा है और बदनाम इजराइल को किया जा रहा है। भारत मुस्लिम वोट के भूखे नेता और उनकी पार्टियां गाज़ा को लेकर मुसलमानों को मोदी सरकार के खिलाफ बयानबाज़ी कर रहे हैं। लोकसभा में फलीस्तीन का बैग लेकर जाने पर सुरमा भोपाली बनने वाली प्रियंका गाँधी 
UN की रिपोर्ट में खुलासा होने पर माफ़ी मांगेगी? 

भारत में यूँ तो मुसलमान बड़ी-बड़ी बात करता है लेकिन भूल जाता है फिलिस्तीन को कोई भी मुस्लिम देश किसी भी कीमत पर पनाह देने को तैयार नहीं। एक बार सदर जिया-उल-हक़ के समय पाकिस्तान ने फिलिस्तीनियों को शरण देकर गलती की थी, हालत सामान्य होने पर जब वापस अपने मुल्क जाने से मना करने पर जिया-उल-हक़ ने क्या हश्र किया किसी से नहीं छुपा। लेकिन भारत में मुस्लिम कट्टरपंथी, मुस्लिम वोट की भूखी पार्टियां और मुसलमान फिलिस्तीन के लिए छाती पीट रहे हैं। फिलिस्तीन दंगाई में पाकिस्तान से कम नहीं। 

क्या भारत में मुस्लिम कट्टरपंथी, मुस्लिम तुष्टिकरण करने वाली पार्टियां और इनके इशारे पर नाचने वाले मुसलमान तुर्की के खिलाफ बोलेगा? क्या तुर्की दूतावास पर प्रदर्शन करने की हिम्मत है? मुसलमानों को इस ढोंगी गैंग को दरकिनार कर सच्चाई को जानने के बाद ही अगर कुछ बोलें तो उनके ही हित में होगा। आखिर तुर्की क्यों इजराइल की मदद कर रहा है इसकी सच्चाई सामने आने पर बेशर्म ढोंगी गैंग तो मालपुए खाने में मस्त रहेगा और आम मुसलमान बदनाम होता रहेगा। ये ही वजह है कि मुसलमान शक के दायरे में रहता है। ये तुष्टिकरण करने वाला गैंग मुसलमानों को उकसा कर अपनी तिजोरियां भरते हैं और बदनाम आम मुसलमान होता रहता है।

         

तुर्की इन दिनों भारत की मशहूर कंपनी टाटा ग्रुप पर गुस्सा निकाल रहा है। उसका ब्रॉडकास्टर टीआरटी कह रहा है कि टाटा ने इजरायल को गाजा युद्ध के लिए हथियारों के पार्ट्स दिए। लेकिन संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ने तुर्की की पोल खोल दी। रिपोर्ट में साफ लिखा है कि तुर्की खुद इजरायल की मदद कर रहा था।

पत्रकार सिद्धांत सिब्बल ने यूएन की रिपोर्ट की कॉपी शेयर की है। सिद्धांत ने लिखा, “जिन बंदरगाहों ने एफ-35 के पुर्जों, हथियारों, जेट ईंधन, तेल और अन्य सामग्रियों को इजरायल तक पहुँचाने में मदद की है, उनमें तुर्की भी शामिल है।”

यूएन रिपोर्ट में तुर्की का आया नाम

 रिपोर्ट में कहा गया है कि अगस्त 2025 में जब गाजा पर इजरायल का कब्जा कर लिया, उस वक्त भी मिस्र ने इजरायल के साथ 35 बिलियन यूएस डॉलर के गैस डील की। ये इजरायल के इतिहास में सबसे बड़ी गैस डील थी। यूरोपीय यूनियन और मिस्र लगातार गाजा से नजदीक से अवैध तरीके से होकर जाने वाले गैस पाइप लाइन से गैस मँगाते रहे हैं। ये तभी भी था जब फिलिस्तीन पर इजरायल ने ताबड़तोड़ हमला किया और अभी भी है, जब गाजा पर इजरायल का कब्जा हो चुका है।

इजरायल का व्यापार और सामानों की आवाजाही दूसरे देशों के परिवहन तंत्र पर ही निर्भर रही है। अमेरिका के अलावा तुर्की, फ्रांस, इटली, बेलजियम, नीदरलैंड,ग्रीस, मोरक्को आदि देशों के बंदरगाहों से एफ-35 के पुर्जों, हथियारों, जेट ईंधन, गैस और ऑयल समेत दूसरी सामग्रियों को इजरायल तक पहुँचाए गए।

टाटा समूह पर तुर्की के आरोप

तुर्की गाजा के विनाश के लिए भारतीय कंपनी ‘टाटा समूह’ पर आरोप लगा रहा है। टीआरटी का कहना है कि इजरायल को हार्ड वेयर और दूसरे साजो सामान टाटा ने उपलब्ध कराए। टाटा समूह की कंपनी टाटा मोटर्स की सहायक कंपनी जगुआर लैंड रोवर पर एमडीटी डेविड हल्के वाहनों के चेसिस की आपूर्ति करने का आरोप लगाया।

टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) पर इजरायल की वित्तीय और सरकारी प्रणालियों के लिए महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचा प्रदान करने और प्रोजेक्ट निम्बस में भागीदारी करने का आरोप लगाया है। टीआरटी का कहना है कि इसका इस्तेमाल इजरायल ने गाजा की निगरानी में किया।

टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (TASL) पर आरोप लगाया गया कि सभी नए F-16 लड़ाकू विमानों के लिए विंग और सभी AH-64 अपाचे हमलावर हेलीकॉप्टरों के लिए फ्यूज़लेज उपलब्ध कराया। जबकि इन विमानों के फ्यूल की व्यवस्था तुर्की के बंदरगाहों ने किया। इन बंदरगाहों से विमानों के कलपुर्जें और दूसरे सामान मँगाए गए। इनका इस्तेमाल गाजा युद्ध में इजरायल ने किया। तुर्की पहले अपने गिरेबान में झाँक ले। इजरायल को मदद करने के सबूत संयुक्त राष्ट्र के पास हैं।

इजरायल-फिलिस्तीन युद्ध और गाजा में बमबारी के दौरान इजरायल द्वारा इस्तेमाल विस्फोटकों को पहुँचाने में तुर्की का हाथ रहा। जबकि भारत ने इस युद्ध से दूरी बनाई और मानवीय आधार पर इजरायल के साथ-साथ गाजा में रहने वाले लोगों की मदद की। तुर्की के दोगले रवैये का ये एक उदाहरण है।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ में पाकिस्तान का दिया था साथ

दरअसल ये वही तुर्की है, जिसने गाजा युद्ध के दौरान अपनी हवाई अड्डों को इजरायल के लिए बंद करने का ऐलान किया था। यहाँ तक कि अपने बंदरगाहों पर इजरायली जहाजों के आने पर पाबंदी लगा दी थी, लेकिन अब उसकी असलियत सामने आ गई है।

तुर्की उन चंद देशों में शामिल है, जिसकी नीति ‘भारत विरोध’ की रही है। तुर्की पर जब प्राकृतिक आपदा आई, तो उसकी मदद के लिए सबसे पहला हाथ भारत ने उठाया। लेकिन जब भारत पर पहलगाम में पाकिस्तानी आतंकियों ने पर्यटकों पर हमला किया और भारत ने पाकिस्तान स्थित आतंकियों के ठिकानों को निशाना बनाया, तो तुर्की को ‘सार्वभौमिकता’ याद आ गई।

उसने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के वक्त भारत के खिलाफ और पाकिस्तान के समर्थन में बयान दिए और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस्लामाबाद के पक्ष में खड़े दिखाई दिया था। अब साजिश के तहत भारतीय कंपनियों को टारगेट किया जा रहा है। दरअसल ये सभी सामने आया था कि तुर्की में भारतीय पर्यटकों की संख्या काफी कम हो गई है।

पहले भारतीयों की पसंदीदा जगहों में इस्तांबुल हुआ करता था। हिन्दी फिल्मों की शूटिंग भी काफी यहाँ होती थी, लेकिन ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान तुर्की के स्टेंड की वजह से भारत में नाराजगी दिखाई दी। सोशल मीडिया पर #BoycottTurkey हैशटैग ट्रेंड करने लगा। तुर्की की यात्रा रद्द करने की अपील की जाने लगी और पर्यटन एजेंसियों ने अपनी सेवाएँ रोक दी।

तुर्की के पर्यटन उद्योग पर काफी असर पड़ा। अनुमान के मुताबिक ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद 33.3% भारतीय पर्यटकों की संख्या यहाँ कम हो गई। इसकी खीझ निकालने के लिए अब तुर्की भारतीय कंपनियों को टारगेट कर रहा है।

संयुक्त राष्ट्र ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जिन देशों ने इजरायल को जरूरी सामानों यहाँ तक कि ऑयल और गैस के आवाजाही के लिए अपनी बंदरगाह का इस्तेमाल करने दिया, उनमें तुर्की, फ्रांस, इटली,मोरक्को भी शामिल हैं। अब तुर्की से पूछा जाना चाहिए कि उसने किस आधार पर टाटा समूह पर उँगली उठाई। इजरायल के साजो सामान के लिए अपने बंदरगाह के इस्तेमाल करने की इजाजत दी। न सिर्फ तुर्की बल्कि यूरोपियन देशों और मिस्र ने गैस डील की। ये गाजा पर आक्रमण करने से अब तक जारी है।

दोहा में सभी इस्लामी देशों की मीटिंग में इजराइल के खिलाफ NATO की तर्ज पर Islamic NATO नहीं बन पाया; अध्यक्ष बनने के नाम पर सभी पीछे हटे


भारत में मुस्लिम कट्टरपंथी मुसलमानों को इजराइल के खिलाफ भड़काते रहते हैं। कोई फिलिस्तीन का थैला लेकर, कोई हमास और गाज़ा के लिए घालियाली आंसू बहा गुमराह करते रहते हैं। भारत का मुसलमान इतना ज्यादा डरा हुआ है कि किसी में इनसे यह पूछने की हिम्मत नहीं कि इतने मुस्लिम मुल्क हैं कोई फिलिस्तीनियों को अपने-अपने मुल्क में क्यों रख लेते? बस कट्टरपंथियों की तरह victim card खेल खुद भी पागल बनने के साथ दूसरों को भी पागल बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं। आखिर आतंकियों को कोई अपने मुल्क में रख क्यों अपने मुल्क का माहौल ख़राब करना चाहेगा? ध्यान हो, जिया-उल-हक़ के समय पाकिस्तान ने 30,000 फिलिस्तीनियों को रख तो लिया लेकिन फिलिस्तीन का माहौल शांत होने पर जब उन्हें वापस अपने मुल्क जाने को कहा कोई तैयार नहीं हुआ, फिर जिया ने जिस तरह उनको बन्दूक की नोक पर धक्का दिया किसी से नहीं छुपा। 

इजराइल पर कीजड़ फेंकना आसान है। आतंकवाद के खिलाफ कोई बोलने को तैयार नहीं, क्यों? शायद जिया द्वारा फिलिस्तीनियों को पनाह देने से पाकिस्तान में आतंकवाद के बीज फ़ैल गए थे। आखिर हमास कौन है? सभी मुस्लिम अच्छी तरह जानते हैं।

            

कतर की राजधानी दोहा में सोमवार (15 सितंबर 2025) को 60 मुस्लिम देशों की इमरजेंसी मीटिंग हुई है। बैठक में ऑर्गेनाजेशन ऑफ इस्लामिक कर्पोरेशन (OIC) के सदस्य देश और अरब मुल्क शामिल हुए थे। ओआईसी की यह इमरजेंसी बैठक कतर में इजरायली हमले को लेकर की गई है, जिसमें सभी देशों से अपील की गई कि इजरायल के खिलाफ कानूनी और प्रभावी कदम उठाए जाएं। साथ ही इजरायल के साथ अपने रिश्तों पर भी एक बार फिर से गौर करें।

पाकिस्तानी अखबार द डॉन की रिपोर्ट के अनुसार पिछले हफ्ते इजरायल ने कतर में हमास के नेताओ को निशाना बनाकर स्ट्राइक की थी। बैठक में कहा गया कि ये अधिकारी गाजा सीजफायर प्रस्ताव पर चर्चा कर रहे थे, लेकिन इजरायल ने यह हमला करके सभी प्रयासों को विफल कर दिया है इसलिए उसके खिलाफ सख्त कदम उठाया जाना चाहिए। हमास का कहना है कि इजरायल के हमले में छह लोग मारे गए हैं। हालांकि, हमास के टॉप अधिकारी बच गए हैं।

इजरायल के खिलाफ OIC का जॉइंट स्टेटमेंट
ओआईसी देशों ने जॉइंट स्टेटमेंट में अपील की है कि सभी को इजरायल के खिलाफ कानूनी और सख्त कदम उठाने की जरूरत है, साथ ही सभी मुल्कों को उसके साथ अपने डिप्लोमेटिक और आर्थिक रिश्तों पर भी गौर करना चाहिए क्योंकि वह करीब दो साल से फिलिस्तीनी लोगों पर हमले कर रहा है
। संयुक्त राष्ट्र में इजरायल की सदस्यता खत्म करवाने के लिए प्रयास करने की भी इन देशों ने अपील की है। बैठक का मकसद इजरायल पर दबाव बनाना था ताकि गाजा में जारी उसके हमलों पर लगाम लगाई जा सके
।

बैठक में 60 देशों के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति शामिल हुए, लेकिन संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और मोरक्को ने अपने प्रतिनिधियों को बैठक के लिए भेजा था। इन तीनों देशों ने पांच साल पहले अब्राहम समझौते के तहत इजरायल क मान्यता दी थी। इनके अलावा, उसे मान्यता देने वाले देशों में कतर, मिस्त्र और जॉर्डन भी शामिल हैं।

मुस्लिम देशों ने की इजरायल की यूएन सदस्यता खत्म करने की अपील
कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमाद अल थानी ने कहा कि सीजफायर पर बात कर रहे हमास के वार्ताकरों पर हमला करके इजरायल ने साबित कर दिया कि उसका इरादा सीजफायर का नहीं है
। अमीर ने अरब देशों को आगाह करते हुए यह भी कहा कि इजरायल ने कतर में हमास अधिकारियों पर हमला करके गाजा पर बातचीत को पटरी से उतारने की कोशिश की है और इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू अरब को इजरायली क्षेत्र में बदलने का सपना देख रहे हैं, जो एक खतरनाक बात है
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बैठक में 60 देशों के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति शामिल हुए, लेकिन संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और मोरक्को ने अपने प्रतिनिधियों को बैठक के लिए भेजा था। इन तीनों देशों ने पांच साल पहले अब्राहम समझौते के तहत इजरायल क मान्यता दी थी। इनके अलावा, उसे मान्यता देने वाले देशों में कतर, मिस्त्र और जॉर्डन भी शामिल हैं।

मुस्लिम देशों ने की इजरायल की यूएन सदस्यता खत्म करने की अपील
कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमाद अल थानी ने कहा कि सीजफायर पर बात कर रहे हमास के वार्ताकरों पर हमला करके इजरायल ने साबित कर दिया कि उसका इरादा सीजफायर का नहीं है
। अमीर ने अरब देशों को आगाह करते हुए यह भी कहा कि इजरायल ने कतर में हमास अधिकारियों पर हमला करके गाजा पर बातचीत को पटरी से उतारने की कोशिश की है और इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू अरब को इजरायली क्षेत्र में बदलने का सपना देख रहे हैं, जो एक खतरनाक बात है।

बाद में शेख तमीम बिन हमाद अल थानी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर भी पोस्ट किया और कहा, 'दोहा में आज हुई इमरजेंसी अरब-इस्लामिक समिट हमारे क्षेत्र में इजरायल के आतंकवाद के खिलाफ कठोर संदेश है और इसके परिणाम हमारे सामूहिक प्रयासों को तीव्र करने, हमारे देशों की स्थिति में समन्वय स्थापित करने और हमारे रुख और आवाज को एकजुट करने में प्रभावी रूप से योगदान देंगे।'

बैठक में कौन-कौन हुए शामिल?
अरब-इस्लामिक समिट में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, ईरान के राष्ट्रपति मौसाद पेजेशकियान, इराकी पीएम मोहम्मद सिया अल-सुदानी, तुर्किए के राष्ट्रपति रेसेप तैय्यप एर्दोगन और फिलिस्तीन के राष्ट्रपति मोहम्मद अब्बास भी शामिल हुए थे।

ईरानी राष्ट्रपति बोले- कल को किसी और मुस्लिम देश के साथ भी ऐसा कर सकता है इजरायल
ईरानी राष्ट्रपति मौसाद पेजेशकियान ने कहा कि ऐसी स्थिति कल अरब या किसी और इस्लामिक देश के सामने भी आ सकती है, जैसा जुलाई महीने में ईरान के साथ हुआ. जब इजरायल के साथ करीब 12 दिनों तक उसकी जंग चली थी
। ईरान पहले भी मुस्लिम देशों से इजरायल के साथ सभी रिश्ते खत्म करने की अपील कर चुका है।

सभी इस्लामिक देश अपनी पीठ और कपड़े झाड़ते हुए कहे कि देखो इस बार तो हमने इजरायल की पिटाई बर्दाश्त कर लिया लेकिन अगली बार हम इजरायल की पिटाई बर्दाश्त नहीं करेंगे।

NATO की तर्ज पर Islamic NATO नहीं बन पाया
चर्चा है, हालाँकि इस समाचार की पुष्टि नहीं हुई है, कि इस बैठक में इजिप्ट ने प्रस्ताव रखा कि हम नाटो की तर्ज पर एक इस्लामी नाटो बनाएं और बारी-बारी से सभी मुस्लिम देश उसके अध्यक्षता करें।
फिर सऊदी अरब ने इजिप्ट के राष्ट्रपति से कहा कि ठीक है आप इसके पहले अध्यक्ष बन जाइए
तब इजिप्ट के राष्ट्रपति ने कहा कि इस्लामी नाटो का पहला अध्यक्ष बनने का तो आपको मौका मिलना चाहिए क्योंकि हमारे पवित्र मक्का और मदीना आपके देश में है।
फिर सऊदी अरब ने कहा नहीं भाई पहला मौका इराक को मिलना चाहिए क्योंकि शिया संप्रदाय का सबसे पवित्र करबला इराक में है।
इराक ने कहा नहीं भाई पहला मौका तो पाकिस्तान को मिलना चाहिए क्योंकि सभी इस्लामी देशों में एकमात्र न्यूक्लियर हथियार पाकिस्तान के पास है।
फिर पाकिस्तान ने कहा नहीं भाई पहला मौका तो तुर्की को मिलना चाहिए क्योंकि कभी पूरे इस्लामी उम्मत का नेतृत्व तुर्की के खलीफा ने किया था।
तुर्की ने कहा नहीं भाई मैं इसका पहला अध्यक्ष नहीं बनूंगा क्योंकि मैं पहले से अमेरिका के नेतृत्व के नाटो का मेंबर हूं।
लेकिन नाटो का पहला अध्यक्ष जॉर्डन को बनना चाहिए।
फिर जॉर्डन ने कहा नहीं भाई मेरी सीमाएं इजराइल से लगते हैं और 1976 में मैं अपने देश की 10% जमीन पहले ही इजरायल के हाथों गंवा चुका हूं तब किसी भी इस्लामिक देश ने मेरी मदद नहीं की।
यानी कि इजरायल की खौफ और दहशत देखिए इनको मालूम है कि इस वक्त इजरायल के सर पर खून सवार है और जो कोई देश मुस्लिम नाटो का पहला अध्यक्ष बनेगा सबसे पहले इसराइल उसको फोड़ेगा।
तो इसीलिए कोई अध्यक्ष बनने को तैयार नहीं हुआ।
आप लोगों को बचपन की कहानी याद होगी जब किसी लड़के की खूब पिटाई होती थी बाद में वह कहता था अच्छा इस बार तो मैं बर्दाश्त कर ले रहा हूं लेकिन अगली बार मारोगे तो मैं बर्दाश्त नहीं करूंगा।
अगली बार फिर कुटाई होती थी अपने कपड़े झाड़ कर कहता था अच्छा इस बार तो बर्दाश्त कर लेता हूं अगली बार कुटोगे तो बर्दाश्त नहीं करूंगा।
यही हाल 57 मुस्लिम देशों का है इजराइल 1948 से लगातार इनको कुटता है हर बार यह उठते हैं अपने कपड़ों पर लगी धूल मिट्टी साफ करते हैं और कहते हैं अच्छा इस बार कूट दिए कोई बात नहीं अगली बार अगर कुटोगे तो बर्दाश्त नहीं करेंगे।

इस्लामी दुनिया के खलीफा बन रहे तुर्की को कड़ा संदेश: भारत ही नहीं, दुनिया के लिए क्यों खास है ये दौरा, दुश्मन को चारों तरफ से घेरने की तैयारी‘ : यह 140 करोड़ भारतीयों का सम्मान’: PM मोदी को साइप्रस सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजा, 11 साल में भारतीय प्रधानमंत्री को 20+ देश कर चुके हैं सम्मानित


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी साइप्रस पहुँचे हैं। ये 20 साल बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री का साइप्रस दौरा है। इससे पहले 1983 में इंदिरा गाँधी और 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी वहाँ गए थे। साइप्रस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जोरदार स्वागत हुआ। वहाँ उन्होंने भारतीय मूल के लोगों से भी मुलाकात की। यहाँ पीएम मोदी की राष्ट्रपति निकोस क्रिस्टोडुलाइड्स से भी मुलाकात होगी।

वैश्विक नेता के रूप में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता निरंतर बढ़ती जा रही है। पीएम मोदी को विभिन्न देशों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों  से ना सिर्फ सम्मानित किया गया है, बल्कि अपने देश के सर्वोच्च सम्मान से भी नवाजा गया है। अब उन्हें साइप्रस के सबसे बड़े सम्मान ग्रैंड क्रॉस ऑफ द ऑर्डर ऑफ मकारियोस III से सम्मानित किया गया है। ऑर्डर ऑफ मकारियोस तृतीय साइप्रस की ओर से प्रदान किया जाने वाला नाइटहुड सम्मान है, जिसका नाम साइप्रस के प्रथम राष्ट्रपति आर्कबिशप मकारियोस तृतीय के नाम पर रखा गया। प्रधानमंत्री मोदी को मिला यह 23वां अंतर्राष्ट्रीय सम्मान है। साइप्रस का सर्वोच्च सम्मान पाने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, ‘मुझे विश्वास है कि आने वाले समय में हमारी सक्रिय भागीदारी नई ऊंचाइयों को छुएगी। साथ मिलकर हम न केवल अपने दोनों देशों की प्रगति को मजबूत करेंगे, बल्कि एक शांतिपूर्ण और सुरक्षित वैश्विक वातावरण के निर्माण में भी योगदान देंगे।’

16.06.2025
साइप्रस का सम्मान मैत्रीपूर्ण संबंधों, साझा मूल्यों और आपसी समझ को समर्पित

प्रधानमंत्री मोदी को साइप्रस के सर्वोच्च सम्मान से नवाजा गया है। साइप्रस के राष्ट्रपति निकोस क्रिस्टोडौलिडेस ने प्रधानमंत्री मोदी को साइप्रस का सर्वोच्च सम्मान दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, ‘राष्ट्रपति जी, ग्रैंड क्रॉस ऑफ द ऑर्डर ऑफ मकारियोस III सम्मान के लिए मैं आपका, साइप्रस सरकार का और साइप्रस के लोगों का हृदय से आभार व्यक्त करता हूं। यह सिर्फ नरेंन्द्र मोदी का ही नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों का सम्मान है। यह उनकी क्षमताओं और आकांक्षाओं का सम्मान है। यह हमारी संस्कृति, भाईचारे और वसुधैव कुटुम्बकम की विचारधारा का सम्मान है। मैं इसे भारत और साइप्रस के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों, हमारे साझा मूल्यों और आपसी समझ को समर्पित करता हूं। मैं सभी भारतीयों की ओर से इस सम्मान को बड़ी विनम्रता और कृतज्ञता के साथ स्वीकार करता हूं। यह पुरस्कार शांति, सुरक्षा, संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और हमारे लोगों के प्रति हमारी अटूट प्रतिबद्धता का प्रतीक है।’ 

तुर्की को हैरान करने वाला है पीएम मोदी का दौरा

मोदी का साइप्रस दौरा सिर्फ दो देशों के बीच दोस्ती बढ़ाने के लिए नहीं है, बल्कि तुर्की को एक सख्त संदेश भी देता है। दरअसल, तुर्की पिछले कुछ समय से भारत के खिलाफ खुलकर बोल रहा है, खासकर कश्मीर के मुद्दे पर और पाकिस्तान को सैन्य और कूटनीतिक समर्थन दे रहा है।

भारत इसका जवाब तुर्की के विरोधी देशों – जैसे ग्रीस, आर्मेनिया, मिस्र और अब साइप्रस के साथ अपनी दोस्ती मजबूत करके दे रहा है। भारत इन देशों के साथ न सिर्फ व्यापारिक बल्कि सामरिक संबंध भी मजबूत कर रहा है। ये एक तरह से तुर्की को चारों तरफ से घेरने की रणनीति है। साइप्रस के बाद मोदी जी7 शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने जाएँगे, जिससे भारत की वैश्विक ताकत और बढ़ेगी।

साइप्रस और भारत की दोस्ती बेहद खास

भारत और साइप्रस की दोस्ती पुरानी और गहरी है। साइप्रस ने हमेशा भारत का साथ दिया है। 1998 में भारत के परमाणु परीक्षण के समय, 2008 में भारत-अमेरिका परमाणु समझौते में और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता के लिए साइप्रस ने खुलकर समर्थन किया। आतंकवाद और कश्मीर जैसे मुद्दों पर साइप्रस ने कभी पाकिस्तान या तुर्की का साथ नहीं दिया।

दूसरी तरफ भारत भी साइप्रस की एकता और अखंडता का समर्थन करता है। भारत चाहता है कि साइप्रस का मसला संयुक्त राष्ट्र के नियमों और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत हल हो। पीएम मोदी का ये दौरा इस दोस्ती को और मजबूत करेगा। दोनों देशों के बीच व्यापार, संस्कृति, और शायद रक्षा सहयोग को भी बढ़ावा मिलेगा।

साइप्रस-तुर्की विवाद क्या है?

साइप्रस और तुर्की का झगड़ा 1974 से चला आ रहा है। उस साल ग्रीस के समर्थन से साइप्रस में तख्तापलट हुआ, जिसका मकसद साइप्रस को ग्रीस के साथ मिलाना था। जवाब में तुर्की ने साइप्रस के उत्तरी हिस्से पर हमला कर उसे अपने कब्जे में ले लिया। तब से साइप्रस दो हिस्सों में बँटा हुआ है।

  1. दक्षिणी हिस्सा: ये ग्रीक साइप्रियट्स है। इसे पूरी दुनिया मान्यता देती है। इसे ही रिपब्लिक ऑफ साइप्रस कहते हैं।
  2. उत्तरी हिस्सा: ये तुर्की साइप्रियट्स है। इसे तुर्की ने तुर्की रिपब्लिक ऑफ नॉर्दर्न साइप्रस घोषित किया, लेकिन इसे सिर्फ तुर्की ही मान्यता देता है। इसे अंतर्राष्ट्रीय मान्यता नहीं है।
तुर्की ने उत्तरी साइप्रस में अपनी सेना तैनात कर रखी है और वहाँ की समुद्री सीमाओं पर भी विवाद करता रहता है। साइप्रस के पास समुद्र में प्राकृतिक गैस के बड़े भंडार हैं, जिन्हें तुर्की अपने नियंत्रण में लेना चाहता है।
तुर्की का कहना है कि साइप्रस जैसे छोटे द्वीप को इतना बड़ा समुद्री क्षेत्र (EEZ) नहीं मिलना चाहिए, जबकि अंतरराष्ट्रीय कानून इसके खिलाफ है। तुर्की ने साइप्रस के समुद्री क्षेत्र में अपने जहाज भेजकर गैस खोजने की कोशिश की, जिससे साइप्रस, ग्रीस और यूरोपीय संघ के साथ उसका तनाव बढ़ गया। भारत का साइप्रस के साथ खड़ा होना तुर्की के लिए साफ संदेश है कि भारत उसके खिलाफ उन देशों का समर्थन करेगा, जो तुर्की की आक्रामकता से परेशान हैं।

IMEC को लेकर साइप्रस का महत्वपूर्ण स्थान

साइप्रस की भौगोलिक स्थिति इसे बहुत खास बनाती है। ये भूमध्य सागर में तुर्की के दक्षिण में, लेवांत (सीरिया-लेबनान-फिलिस्तीन-इजरायल) के पश्चिम में और स्वेज नहर के पास है। यानी ये यूरोप, एशिया और अफ्रीका के बीच एक अहम पड़ाव है।
भारत-मध्य पूर्व-यूरोप कॉरिडोर (IMEC) में साइप्रस की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो सकती है। IMEC एक ऐसा व्यापारिक रास्ता है, जो भारत को मध्य पूर्व के रास्ते यूरोप से जोड़ेगा। साइप्रस इस कॉरिडोर का एक अहम हिस्सा बन सकता है, क्योंकि ये व्यापार, ऊर्जा और रणनीतिक प्रभाव के लिए एक शानदार जगह है।
साइप्रस के पास 12-15 ट्रिलियन क्यूबिक फीट प्राकृतिक गैस के भंडार हैं। ये भंडार भले ही वैश्विक स्तर पर बहुत बड़े न हों, लेकिन साइप्रस जैसे छोटे देश के लिए बहुत मायने रखते हैं। यूरोप रूस से गैस कम लेना चाहता है और साइप्रस इसमें मदद कर सकता है। लेकिन तुर्की की दखलंदाजी की वजह से साइप्रस को अपनी गैस निर्यात करने में दिक्कत होती है।
साइप्रस अब ग्रीस या मिस्र के रास्ते गैस निर्यात करने की योजना बना रहा है, ताकि तुर्की को बाइपास किया जा सके। भारत अगर साइप्रस के साथ ऊर्जा, व्यापार या बुनियादी ढाँचे के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाता है, तो ये तुर्की के लिए बड़ा झटका होगा।

तुर्की को घेरना अब भारत की रणनीति

तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तईप एर्दोआन ने कई बार कश्मीर जैसे मुद्दों पर भारत के खिलाफ बयान दिए हैं। वो खुद को इस्लामिक दुनिया का नेता दिखाने की कोशिश करते हैं और संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर भारत की आलोचना करते हैं।
तुर्की ने पाकिस्तान के साथ अपनी सैन्य और कूटनीतिक साझेदारी भी बढ़ाई है। भारत इसका जवाब तुर्की के विरोधी देशों के साथ दोस्ती बढ़ाकर दे रहा है। साइप्रस के अलावा, भारत ग्रीस, आर्मेनिया और मिस्र के साथ अपने रिश्ते मजबूत कर रहा है। ये सभी देश तुर्की के साथ किसी न किसी तरह के विवाद में हैं।
मोदी का साइप्रस दौरा तुर्की को साफ बताता है कि भारत उसकी हरकतों का जवाब देना जानता है। साइप्रस यूरोपीय संघ का सदस्य है और भारत का पुराना दोस्त है। इस दौरे से दोनों देशों के बीच व्यापार, संस्कृति और रक्षा सहयोग को नया बढ़ावा मिलेगा। साथ ही साइप्रस IMEC में भारत के लिए एक अहम साझेदार बन सकता है।

साइप्रस के बाद जी7 शिखर सम्मेलन के लिए जाएँगे पीएम मोदी

साइप्रस के बाद मोदी जी7 शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने जाएँगे। ये भारत के लिए अपनी वैश्विक ताकत दिखाने का एक और मौका होगा। साइप्रस दौरा और जी7 में हिस्सा लेना दोनों ही भारत की उस रणनीति का हिस्सा हैं, जिसमें वो वैश्विक मंचों पर अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। तुर्की जैसे देशों को घेरने के साथ-साथ भारत उन देशों के साथ दोस्ती बढ़ा रहा है, जो उसके हितों का समर्थन करते हैं। साइप्रस के साथ भारत का ये रिश्ता न सिर्फ तुर्की को जवाब है, बल्कि भारत की बढ़ती वैश्विक ताकत का भी प्रतीक है।

मोदी को 20 से ज्यादा देश कर चुके हैं सम्मानित

इतिहास में सबसे अधिक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित भारतीय नेता पीएम मोदी हैं जिन्हें 21 देशों ने सम्मानित किया है।
  • सऊदी अरब ने 2016 में ‘ऑर्डर ऑफ किंग अब्दुलअजीज’ से सम्मानित किया।
  • अफगानिस्तान ने 2016 में ‘स्टेट आर्डर ऑफ़ ग़ाज़ी आमिर अमानुल्लाह खान’ से सम्मानित किया।
  • फिलिस्तीन ने 2018 में ‘ग्रैंड कॉलर’ से सम्मानित किया।
  • मालदीव ने 2019 में ‘निशान इज्जुद्दीन’ से नवाजा।
  • संयुक्त अरब अमीरात ने 2019 में ‘ऑर्डर ऑफ जायद’ से सम्मानित किया।
  • बहरीन ने 2019 में ‘किंग हमाद ऑर्डर ऑफ द रेनेसां’ से नवाजा।
  • अमेरिका ने 2020 में ‘लीजन ऑफ मेरिट’ की सर्वोच्च डिग्री से सम्मानित किया।
  • फिजी ने 2023 में सर्वोच्च सम्मान ‘ऑर्डर ऑफ फिजी’ से सम्मानित किया।
  • पापुआ न्यू गिनी ने 2023 में ‘ऑर्डर ऑफ लोगोहू ‘ से नवाजा।
  • मिस्र ने 2023 में ‘ऑर्डर ऑफ द नाइल’ से सम्मानित किया।
  • फ्रांस ने 2023 में ‘लीजन ऑफ ऑनर’ से सम्मानित किया ।
  • ग्रीस ने 2023 में ‘ऑर्डर ऑफ द ड्रुक ग्यालपो’ से नवाजा गया।
  • भूटान ने 2024 में ‘ऑर्डर ऑफ द ड्रुक ग्यालपो’ से सम्मानित किया।
  • रूस ने 2024 में ‘ऑर्डर ऑफ सेंट एंड्रयू द ए पोस्टल’ से नवाजा।
  • नाइजीरिया ने 2024 में ‘ग्रैंड कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द नाइजर’ से सम्मानित किया।
  • डोमिनिका ने 2024 में ‘ डोमिनिका अवार्ड ऑफ ऑनर ‘ से सम्मानित किया।
  • गुयाना ने 2024 में ‘ऑर्डर ऑफ एक्सीलेंस’ से सम्मानित किया।
  • कुवैत ने 2024 में ‘ऑर्डर ऑफ मुबारक अल-कबीर’ से नवाजा।
  • रूस ने 2024 में ‘ग्रैंड क्रॉस विद कॉलर’ से सम्मानित किया।
  • बारबाडोस ने 2025 में ‘ऑर्डर ऑफ एक्सीलेंस’ से नवाजा।
  • मॉरीशस ने 2025 में ‘ऑर्डर ऑफ द स्टार और की ऑफ द इंडियन ओशन’ से नवाजा।
  • श्रीलंका ने 2025 में ‘मित्र विभूषण’ अवॉर्ड से नवाजा।
  • साइप्रस ने 2025 में ‘क्रॉस ऑफ द ऑर्डर ऑफ मकारियोस 3’ से नवाजा।

G-7 से पहले साइप्रस जाएँगे PM मोदी, तुर्की से है 36 का आँकड़ा: ‘उम्माह’ के नाम पर पाकिस्तान को दिए थे वो ड्रोन, जो भारत पर दागे गए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी न्यूयॉर्क में साइप्रस के तत्कालीन राष्ट्रपति निकोस अनास्तासियादेस से हाथ मिलाते हुए (साभार : Thestatemen)
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आगामी दिनों में साइप्रस और क्रोएशिया के दौरे पर जाएँगे। यह दौरा उनकी कनाडा में होने वाले G7 शिखर सम्मेलन यात्रा से पहले होगा। वह कनाडा के रास्ते में ही इन दोनों देशों का दौरा करेंगे। प्रधानमंत्री का यह साइप्रस दौरा भारत का तुर्की को जवाब माना जा रहा है।

साइप्रस अगले साल (2026) यूरोपीय संघ परिषद का अध्यक्ष भी बनने वाला है, जिससे यह दौरा और भी खास हो जाता है। पीएम मोदी का यह साइप्रस दौरा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि तुर्की ने बीते दिनों पाकिस्तान को खुला समर्थन दिया है। प्रधानमंत्री मोदी से पहले अटल बिहारी वाजपेयी और इंदिरा गाँधी ही साइप्रस का दौरा करने गए हैं।

क्यों साइप्रस जा रहे प्रधानमंत्री मोदी?

मोदी के साइप्रस दौरे के कई कारण हैं। भारत यूरोप में अपनी पहचान और रिश्ते बढ़ाना चाहता है। साइप्रस यूरोपियन यूनियन का सदस्य है। ऐसे में उसके साथ रिश्ते भारत के लिए जरूरी हैं। इसके अलावा भारत तुर्की को साफ़ सन्देश देना चाहता है। तुर्की की साइप्रस से बिलकुल नहीं बनती।

इसके अलावा साइप्रस ने हमेशा कश्मीर और पाकिस्तान से होने वाले सीमा-पार आतंकवाद पर भारत का समर्थन किया है। साइप्रस ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सीट, न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (NSG) की सदस्यता और 1998 के परमाणु परीक्षणों जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी भारत का साथ दिया है।

साइप्रस ने हाल ही में पहलगाम में हुए आतंकी हमले की निंदा की थी और यूरोपीय संघ में पाकिस्तान से होने वाले सीमा-पार आतंकवाद का मुद्दा उठाने का संकेत दिया था। साइप्रस को एक महत्वपूर्ण निवेशक के तौर पर भी देखा जा रहा है।

साइप्रस से तुर्की की है लड़ाई

तुर्की और साइप्रस के बीच कई दशकों से गहरा विवाद है। यह विवाद 1974 में और बढ़ गया, जब तुर्की ने साइप्रस के उत्तरी हिस्से पर हमला कर दिया और उस पर कब्ज़ा कर लिया। तुर्की इस हिस्से को ‘टर्किश रिपब्लिक ऑफ नॉर्दर्न साइप्रस’ के रूप में मान्यता देता है। हालाँकि, इसे और किसी देश ने नहीं माना है।

इसके अलावा, पूर्वी भूमध्य सागर में गैस की खोज के अधिकारों को लेकर भी दोनों देशों में लगातार तनाव बना रहता है। भारत ने हमेशा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के प्रस्तावों और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार साइप्रस समस्या के समाधान का समर्थन किया है। उसने पाकिस्तान को ड्रोन समेत तमाम हथियार दिए थे, जो भारत पर दागे गए।

तुर्की के लिए साइप्रस एक दुखती रग की तरह है, ऐसे में भारतीय प्रधानमंत्री का साइप्रस दौरा उसे एकदम अच्छा नहीं लगेगा। पहलगाम हमले और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्की ने पाकिस्तान का खुलकर समर्थन किया था, और खुद तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप एर्दोआन ने भी इस समर्थन को सार्वजनिक किया था।

अजरबैजान में टूरिज्म को बढ़ावा देने में जुटा विश्व मलयाली परिषद, ऑपरेशन सिंदूर के समय पाकिस्तान का कर रहा था समर्थन: इससे पहले CUBAA ने की थी शाहिद अफरीदी की मेजबानी

मलयाली समाज को शायद नहीं मालूम कि पहलगाम में धर्म पूछकर हिन्दू महिलाओं का सिन्दूर उजाड़ने के बाद सरकार ने #Operation Sindoor शुरू कर हिन्दुओं में एक और मुद्दे को जन्म दे दिया है, जिस पर हिन्दू समाज में चर्चा चल रही है कि जम्मू-कश्मीर में मन्दिरों के दर्शन करने के अलावा कश्मीर में किसी अन्य स्थान पर पर्यटन के लिए जब तक नहीं जाए जब तक वहाँ कश्मीरी पंडितों का पुनर्वास नहीं हो जाता और कश्मीरियों द्वारा आतंकियों को संरक्षण देना बंद नहीं किया जाता।  
दुनियाभर के मलयाली प्रवासियों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन, वर्ल्ड मलयाली काउंसिल (WMC) ने 28-29 जून 2025 को अजरबैजान के बाकू में सम्मेलन की घोषणा की है। डब्लूएमसी के इस फैसले की कई संगठन ने आलोचना की है।

दरअसल मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अजरबैजान उन तीन देशों में शामिल है जिसने पाकिस्तान का समर्थन किया था। पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों को ध्वस्त किया था।

वर्ल्ड मलयाली काउंसिल के इस आयोजन का प्रचार वेबसाइट पर हो रहा है। ‘रोमांचक WMC वैश्विक सम्मेलन पैकेज’ में आलीशान होटल में ठहरना, निर्देशित शहर में घूमना, दैनिक नाश्ता, दोपहर का भोजन और रात का खाना, हवाई अड्डा स्थानांतरण, ई वीज़ा, फेलोशिप के साथ भव्य रात्रिभोज, फाउंटेन स्क्वायर, अग्नि मंदिर, धधकते पहाड़, बुलेवार्ड वॉकिंग टूर, ओल्ड बाकू वॉकिंग टूर आदि जैसे प्रतिष्ठित स्थलों पर दर्शनीय स्थल, डीजे पार्टी, अरबी और पश्चिमी नृत्य शामिल हैं। मूल रूप से यह किसी सम्मेलन का नहीं, बल्कि अजरबैजान के लिए एक टूर पैकेज का प्रचार-प्रसार जैसा लगता है।

22 अप्रैल, 2025 को पहलगाम आतंकी हमले के बाद, जिसमें 26 लोगों की जान चली गई थी, अजरबैजान ने पाकिस्तान का सार्वजनिक रूप से समर्थन किया था और ऑपरेशन सिंदूर के तहत भारत के जवाबी कार्रवाई की निंदा की थी। अजरबैजान ने पाकिस्तान के साथ एकजुटता दिखाई थी। बताया जाता है कि उसने पाकिस्तान को हथियार मुहैया कराए। अजरबैजान के रुख के चलते भारतीयों ने तुर्की के साथ-साथ अजरबैजान का भी बहिष्कार किया। पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ बड़ी संख्या में तुर्की में बने हथियारों का भी इस्तेमाल किया, जिसमें ड्रोन भी शामिल हैं।

इसके बावजूद, WMC बाकू में सम्मेलन कर अजरबैजान के पर्यटन को बढ़ावा दे रहा है। दुनिया भर के मलयाली लोगों से ‘अजरबैजान की यात्रा करने और अनुभव शेयर करने’ को कहा गया है। इससे WMC का भारत में विरोध शुरू हो गया है। आलोचकों का कहना है कि WMC अजरबैजान में पर्यटन को बढ़ावा दे रहा है, जबकि भारतीय पाकिस्तान का समर्थन करने की वजह से उसका बहिष्कार कर रहे हैं। इसका असर वहाँ की अर्थव्यवस्था पर भी दिखने लगा है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, खास तौर पर एक्स पर लोगों की प्रतिक्रिया आने लगी है। एक यूजर ने अपने पोस्ट में WMC के फैसले को ‘शर्मनाक’ बताया, समूह पर ‘भारत विरोधी राष्ट्र’ के साथ गठबंधन करने का आरोप लगाया और कार्यक्रम के बहिष्कार की अपील की।

एक अन्य यूजर्स द राइटवेव ने लिखा कि अजरबैजान की विदेश नीति हमेशा पाकिस्तान के पक्ष में रही है, चाहे वह कश्मीर मुद्दा हो या आतंकवाद का मुद्दा। यूजर्स को शक है कि पाकिस्तान अपनी कूटनीतिक सफलता के लिए मलयाली लोगों का इस्तेमाल कर रहा है।

हालाँकि आयोजकों द्वारा यह तर्क दिया गया है कि अजरबैजान में सम्मेलन आयोजित करने का निर्णय जनता की राय को प्रभावित कर सकता है और भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण व्यवहार करने वाले अजरबैजान को ‘सुधार’ सकता है।

मलयाली समुदाय के भीतर डब्ल्यूएमसी का प्रभाव काफी है। अगस्त 2024 में इसके एक कार्यक्रम में केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन भी मौजूद रहे। सीएम तिरुवनंतपुरम में विश्व मलयाली परिषद के 14वें द्विवार्षिक वैश्विक सम्मेलन के उद्घाटन कार्यक्रम में शामिल हुए।

इससे पहले केरल के कोचीन यूनिवर्सिटी बी.टेक एलुमनाई एसोसिएशन (CUBAA) ने पाकिस्तानी क्रिकेटर शाहिद अफरीदी को आमंत्रित किया था। 25 मई, 2025 को दुबई में ये कार्यक्रम आयोजित किया गया था जिसकी जमकर आलोचना हुई थी। भारत विरोधी टिप्पणियों के लिए जाने जाने वाले अफरीदी ने पहलगाम हमले के बाद भारतीय सुरक्षा बलों की आलोचना की थी, उन्हें “अक्षम” कहा था और ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान की “जीत” का जश्न मनाने के लिए एक कार रैली का नेतृत्व किया था।

CUBAA के अध्यक्ष ने हालाँकि बाद में विरोध को देखते हुए माफी मांगी। उन्होने दावा किया कि अफरीदी की मौजूदगी की जानकारी पहले से उन्हें नहीं थी।

तुर्की के बॉयकॉट के सवाल पर पत्रकारों को टरकाते और माइक सरकाते नजर आए कांग्रेस नेता, वीडियो हो रहा वायरल; मुसलमान #boycottChina क्यों नहीं करते? चीन के आगे कट्टरपंथियों ने क्यों घुटने टेक दिए?


आखिर पाकिस्तान के खिलाफ कांग्रेस क्यों नहीं बोल सकती? मुंबई हमले होने पर पाकिस्तान पर कार्यवाही करने की बजाए "हिन्दू आतंकवाद" और "भगवा आतंकवाद" कहकर पाकिस्तान के बचाव में लगी रही और अब जब ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्की ने जिस तरह से पाकिस्तान की मदद की, उसको लेकर पूरे देश में गुस्से का माहौल है। लोग तुर्की के बॉयकॉट का अभियान चला रहे हैं। इसी बीच बुधवार, 14 मई को कांग्रेस की और से आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब सीनियर लीडर जयराम रमेश और पार्टी प्रवक्ता पवन खेड़ा से तुर्की के बॉयकॉट को लेकर सवाल पूछे गए तो वे जवाब देने से कतराते नजर आए। जयराम रमेश और पवन खेड़ा पत्रकारों को टरकाने के साथ माइक को एक-दूसरे के पास सरकाते दिखे।

जहाँ तक बॉयकॉट की बात है समस्त मुस्लिम देशों को चीन के हर उत्पादन का बॉयकॉट करना चाहिए था। लेकिन भारत तो क्या हर मुस्लिम देश उस चीन को गले लगाए हुए है जहाँ रोजे रखना तो दूर नमाज तक पर पाबन्दी लगा रखी है। भारत में कट्टरपंथी मुसलमानों को कभी तीन तलाक, कभी बुर्का तो कभी हिजाब के नाम पर भड़काता रहता है लेकिन चीन में मुस्लिम महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों पर #boycottChina क्यों नहीं करते? कट्टरपंथी तो क्या कांग्रेस भी खामोश है, क्यों? राष्ट्रपति शी जिनपिंग के कार्यकाल में सीक्यांग जैसे इलाकों में उइगर मुसलमानों पर काफी सख्ती बरती गई है। बीजिंग उइगर मुसलमानों के अलगावादी और चरमपंथी गतिविधियों में लिप्त होने का संदेह जताता रहा है।

गौरतलब है कि चीन मे करीब दो करोड़ मुसलमान हैं। चीन में इस्लाम सहित कुल पांच धर्मों को मान्यता दी गई जिनमें ताओ, कैथोलिक और बौद्ध धर्म भी शामिल हैं। चीन की इस बात के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय की आलोचना का शिकार होना पड़ा है कि उसने 10 लाख से से ज्यादा उइगर मुसलमानों को सीक्यांग के इनडॉक्ट्र‍िनेशन शिविरों में रखा है, जहां उनमें कथित देशभक्ति के बारे में ब्रेनवाश किया जाता है। 

दोनों नेताओं के एक-दूसरे की ओर माइक पास करते हुए सवाल को टालने की कोशिश का वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है। लोग इस वीडियो को शेयर कर कांग्रेस को ट्रोल करने के साथ तंज कस रहे हैं। आप भी देखिए लोग किस तरह से कांग्रेस का मजाक उड़ा रहे हैं…