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ट्रंप के ‘सीजफायर’ दावे के बीच गाजा में फिर बरसे इजरायली बम: 4 की मौत, हमास बोला- पहले सेना हटाओ, तभी देंगे हथियार

                      इजरायल ने लगातार दूसरे दिन गाजा पर किए हवाई हमले (फोटो साभार: Arab news)
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा गाजा में पिछले वर्ष हुए संघर्षविराम समझौते को लागू करने की दिशा में बड़ी प्रगति का दावा किए जाने के बावजूद इजरायल ने रविवार (2 अगस्त 2026) को लगातार दूसरे दिन गाजा पट्टी पर हवाई हमले जारी रखे।

फिलिस्तीनी स्वास्थ्य अधिकारियों के अनुसार, इन हमलों में कम से कम चार की मौत हो गई जबकि कई अन्य घायल हुए हैं। इजरायली लड़ाकू विमानों ने गाजा सिटी और मध्य गाजा के दीर अल-बलाह में अलग-अलग स्थानों को निशाना बनाया।

स्वास्थ्य अधिकारियों और चिकित्सकों के मुताबिक, दीर अल-बलाह में एक अपार्टमेंट पर हुए हवाई हमले में एक दंपति की मौत हो गई और चार अन्य लोग घायल हो गए। वहीं गाजा सिटी में एक अन्य अपार्टमेंट पर हुए हमले में एक बच्चे समेत दो लोगों की जान चली गई।

इन हमलों ने ऐसे समय में तनाव और बढ़ा दिया है, जब अमेरिका की मध्यस्थता में संघर्षविराम समझौते को लागू करने की कोशिशें तेज होने का दावा किया जा रहा है।

संघर्षविराम लागू करने की कोशिशें, लेकिन हथियारों और सैन्य वापसी पर बना गतिरोध

इससे पहले डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया था कि गाजा में संघर्षविराम समझौते को लागू करने के प्रयासों में महत्वपूर्ण सफलता मिली है। उनका कहना था कि अमेरिकी समर्थन वाली पहल के तहत हमास ने अपने हथियार छोड़ने पर सहमति जताई है।
इसके बाद ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ ने संघर्षविराम समझौते को लागू करने के अंतिम चरणों का विवरण देते हुए 15 बिंदुओं वाला एक रोडमैप भी जारी किया। हालाँकि यह रोडमैप अभी तक लागू नहीं हो सका है।
हमास ने स्पष्ट किया है कि वह अपने हथियार केवल सुरक्षित भंडारण के लिए तभी सौंपेगा, जब इजरायल पिछले वर्ष हुए समझौते के अनुरूप अपने सैन्य अभियान बंद करेगा और गाजा से अपनी सेना वापस बुलाएगा।
दूसरी ओर एक इजरायली अधिकारी ने रॉयटर्स से कहा कि जब तक हमास का ‘वास्तविक निरस्त्रीकरण’ (Genuine disarmament) नहीं होता, तब तक इजरायल अपनी मौजूदा सैन्य तैनाती से पीछे नहीं हटेगा।

नेतन्याहू की चुप्पी, बेन-गवीर का विरोध और मोहम्मद दहलान का बड़ा दावा

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी पहल पर अभी तक सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी नहीं की है। वहीं राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-गवीर ने इस पहल को अस्वीकार्य बताते हुए कहा है कि इजरायल को हमास के नेताओं के खिलाफ लक्षित हमले जारी रखने चाहिए।

इस बीच संयुक्त अरब अमीरात में रह रहे फतह के पूर्व वरिष्ठ नेता मोहम्मद दहलान ने फेसबुक पोस्ट में दावा किया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद और इस पहल से जुड़े वरिष्ठ सलाहकार जेरेड कुशनर ने उन्हें बताया है कि वह गाजा पर इजरायली हमले रुकवाने के लिए इजरायली पक्ष के साथ काम कर रहे हैं।

दहलान ने कहा कि अमेरिका के साथ संपर्क लगातार जारी है ताकि संघर्षविराम समझौते को पूरी तरह लागू कराया जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि इस पहल की सफलता अब इस बात पर निर्भर करेगी कि इजरायल गाजा पर अपने दैनिक हमले पूरी तरह बंद करता है या नहीं।

ईरानी उड़ाए पाकिस्तान का मजाक, कहे अमेरिका का ‘दलाल’: मिडिल ईस्ट युद्ध के बीच घुसे पाकिस्तान को हर ओर से पड़ रही लात, दोनों देशों को गुमराह करने में आतंकिस्तान का हाथ

                                                                                                      साभार : BBC, Nationalherald
अमेरिका और ईरान के बीच 6 हफ्तों से चल रही भीषण जंग पर दो हफ्ते के लिए ‘ब्रेक’ तो लग गया है, लेकिन इस ब्रेक के पीछे ‘शांतिदूत’ बनने की कोशिश करने वाले पाकिस्तान की अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर थू-थू हो रही है। खुद को मध्यस्थ बताने वाला पाकिस्तान अब ‘दलाली’ के आरोपों और सोशल मीडिया पर भद्दी गालियों का सामना कर रहा है। वजह है… सीजफायर की शर्तों को लेकर पैदा की गई वो गफलत, जिसने ईरान और इजरायल को फिर से आमने-सामने खड़ा कर दिया है।

प्रस्तावों की गफलत: ईरान के 10-सूत्रीय प्लान में लेबनान का जिक्र

 ईरान ने युद्धविराम के लिए 10 शर्तों का एक प्रस्ताव रखा था, जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बातचीत के लिए एक सही आधार माना। इस प्रस्ताव में ईरान ने मुख्य रूप से तीन बड़ी माँगें रखी थीं, पहली यह कि अमेरिका भविष्य में दोबारा हमला न करने की पक्की गारंटी दे, दूसरी यह कि व्यापार के लिए बेहद जरूरी ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ वाले समुद्री रास्ते पर ईरान का ही कब्जा बना रहे, और तीसरी सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह थी कि लेबनान में हिजबुल्लाह समेत तमाम मोर्चों पर चल रही जंग को तुरंत रोका जाए।

यही लेबनान वाला मुद्दा इस पूरे समझौते में विवाद और फजीहत की सबसे बड़ी वजह बन गया। दरअसल, पाकिस्तान ने बीच में पड़कर ईरान को यह यकीन दिला दिया था कि अमेरिका लेबनान में भी हमले रोकने के लिए तैयार है। लेकिन जैसे ही सीजफायर शुरू हुआ और इजरायल ने लेबनान पर ताबड़तोड़ बमबारी जारी रखी, वैसे ही पाकिस्तान के दावों की पोल खुल गई। इससे यह साफ हो गया कि पाकिस्तान ने दोनों देशों के बीच तालमेल बैठाने के बजाय गलत जानकारी फैलाई थी, जिसके कारण अब उसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी किरकिरी हो रही है।

जेडी वेंस का करारा जवाब: ‘लेबनान शामिल ही नहीं था’

जब लेबनान हमलों पर सवाल उठा, तो अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने स्पष्ट कर दिया कि पाकिस्तान ने ‘कन्फ्यूजन’ पैदा की है। जेडी वेंस ने कहा, “लेबनान का मुद्दा सीजफायर की शर्तों में शामिल ही नहीं था। ईरानियों को शायद गलतफहमी हुई या गलत जानकारी दी गई।” ट्रंप और नेतन्याहू ने भी साफ कर दिया कि यह सीजफायर सिर्फ ईरान और अमेरिका के बीच है, लेबनान के हिजबुल्लाह के लिए नहीं। पाकिस्तान ने अपनी ‘पीठ थपथपाने’ के चक्कर में दोनों पक्षों को अलग-अलग बातें बता दीं, जिसका नतीजा अब गालियों के रूप में सामने आ रहा है।

सोशल मीडिया पर ‘आतंकिस्तान’ की शामत: ईरानियों ने भी लताड़ा

पाकिस्तान को केवल भारत ही नहीं, बल्कि अब ईरानी नागरिक भी जमकर खरी-खोटी सुना रहे हैं। सोशल मीडिया पर #FuckPakistan ट्रेंड कर रहा है। खुद को ईरानी बताने वाले अकॉउंट्स पाकिस्तान को जमकर लताड़ रहे हैं और साथ ही भारत की तारीफ कर रहे हैं।

ی (Sana Ebrahimi) ने साफ लिखा, “ईरानियों के पाकिस्तान से नफरत करने के कई कारण है।” फिर, “पाकिस्तान को फिर से भारत बना दो। मैं उस देश पर भरोसा नहीं करती जिसने ओसामा बिन लादेन को पनाह दी।” उन्होंने यहाँ तक कहा कि ‘जम्मू-कश्मीर भारत का है।’

کاپیتان (The Captwin) ने लिखा, “पाकिस्तानी बिना इंटरनेट के शहबाज का बचाव करने कैसे आएँगे?”, अन्य पोस्ट में लिखा, “पाकिस्तान बम।” इन्होंने भारतीय मीम्स की तारीफ की और 1971 में भारत के सामने 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों के सरेंडर की याद दिलाई।

صادُقِ زَمَند (Zamandaam) ने तंज कसा, “एक ऐसा देश जो आतंकवाद का पालना है और परमाणु बम की धमकी देता है, वो शांति कराएगा? पाकिस्तान और शांति? मज़ाक है क्या! पाकिस्तान, बांग्लादेश और मौजूदा पाकिस्तान को ‘ग्रेटर भारत’ (Greater India) में मिला देना चाहिए।”

इसके अलावा, यूजर ने लिखा, “ईरान का सबसे ज़्यादा परेशान करने वाला पड़ोसी पाकिस्तान है। यह सचमुच एक बेकार और घटिया देश है। पाकिस्तान से हमेशा एक गंदी, पिछड़ी, अंधविश्वासी और प्रदूषित सी वाइब आती है। सच कहूँ तो, मुझे हमेशा से पाकिस्तान और पाकिस्तानियों से नफरत रही है। मुझे उम्मीद है कि भारत इस बेकार और गंदे देश का किस्सा हमेशा के लिए खत्म कर देगा।”

डूब मरने की सलाह और कड़वा सच

पाकिस्तान की हालत आज उस बिन बुलाए बाराती जैसी है जो शादी में क्रेडिट लेने के चक्कर में जूते खा रहा है। एक तरफ उसका अपना मुल्क आर्थिक तंगहाली में डूबा है, और दूसरी तरफ वह दो परमाणु शक्तियों के बीच ‘शांतिदूत’ बनने का स्वांग रच रहा था। पाकिस्तान ने सोचा था कि वह इस मध्यस्थता के जरिए दुनिया में तारीफ बटोरेगा, लेकिन उसकी ‘कॉपी-पेस्ट’ कूटनीति ने उसे दुनिया के सामने एक ‘मैसेंजर बॉय’ और ‘दलाल’ बनाकर छोड़ दिया है।

ईरानियों का यह कहना कि ‘पाकिस्तान उनके पड़ोस का सबसे गंदा और बेकार देश है’, यह बताने के लिए काफी है कि मजहब के नाम पर भी पाकिस्तान की कोई इज्जत नहीं बची है। भारत की विदेश नीति जहाँ स्वतंत्र और अडिग है, वहीं पाकिस्तान आज भी ‘किराए के बिचौलिए’ से ज्यादा कुछ नहीं बन पाया। कुल मिलाकर, पाकिस्तान के लिए यह सीजफायर ‘गले की हड्डी’ बन गया है, न निगलते बन रहा है, न उगलते।

ईरान-US के बीच सीजफायर: क्या खोखला है अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का ‘जीत का दावा’


ईरान और अमेरिका ने 38 दिन के युद्ध के बाद आखिरकार सीजफायर की घोषणा कर दी है। दो हफ्तों के लिए घोषित हुए इस सीजफायर के बाद युद्ध में अमेरिका अपनी जीत का दावा कर रहा है, वहीं ईरान भी इसे अपनी तरफ से जीत बता रहा है। लेकिन सवाल अब भी कायम है कि इस युद्ध में आखिरकार किसकी जीत हुई है?

आईए इस जीत को जमीनी हकीकत के रूप में आँकते हैं। युद्ध में किसको-कितना नुकसान हुआ से लेकर किसको सीजफायर से फायदा हुआ के गणित से पता करते हैं कि आखिरकार किसकी जीत हुई? ये सब जानने के लिए ईरान-अमेरिका के बीच तनाव का कारण जानना बेहद जरूरी है।

ईरान-अमेरिका के बीच तनाव का कारण?

ईरान और अमेरिका के बीच तनाव का सबसे बड़ा मुद्दा न्यूक्लियर प्रोग्राम है। अमेरिका का कहना है कि ईरान परमाणु हथियार बना सकता है, जबकि ईरान कहता है कि उसका प्रोग्राम सिर्फ ऊर्जा के लिए है। इसी वजह से पहले JCPOA न्यूक्लियर समझौता हुआ था, लेकिन बाद में अमेरिका उससे बाहर निकल गया जिससे तनाव और बढ़ गया।

दूसरा बड़ा कारण है मिडिल ईस्ट में प्रभाव की लड़ाई। ईरान और अमेरिका दोनों अलग-अलग देशों और समूहों को सपोर्ट करते हैं। इस वजह से कई बार सीधे नहीं, बल्कि ‘प्रॉक्सी वॉर’ यानी दूसरों के जरिए लड़ाई जैसी स्थिति बनती रहती है।

तीसरा कारण है सैन्य घटनाएँ और हमले। पिछले कुछ सालों में कई बार अमेरिकी बेस पर हमले हुए या ईरान से जुड़े समूहों पर अमेरिका ने जवाबी कार्रवाई की। जैसे 2020 में कासिम सुलेमानी की हत्या के बाद तनाव बहुत बढ़ गया था। इसी तरह दिसंबर 2025 में ईरान में नागरिकों द्वारा प्रदर्शन को भी अमेरिका ने सपोर्ट किया और इस्लामी रिजीम का विरोध किया।

सैन्य ताकत में अमेरिका की बराबरी नहीं कर सकता ईरान

वैसे तो दोनों देशों की सेना की ताकत के नजर से देखा जाए तो अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष बराबरी का है ही नहीं। अमेरिका दुनिया का सबसे ताकतवर सैन्य ताकत वाला देश है, जबकि ईरान 16वें स्थान पर आता है। अमेरिका की सैन्य शक्ति ईरान की तुलना में कहीं अधिक और उन्नत है। दूसरी तरफ ईरान इस युद्ध में सिर्फ अपनी भौगोलिक और रणनीतिक स्थिति के कारण अमेरिका को चुनौती देता रहा है।

अमेरिका और ईरान की सैन्य ताकत की तुलना करें, तो जहाँ अमेरिका का सालाना रक्षा बजट लगभग 895 अरब डॉलर है, जो कि ईरान के 9 अरब डॉलर के रक्षा बजट से करीब 100 गुना है। अमेरिका के पास लगभग 13.3 लाख सक्रिय सैनिक और 7,99,500 रिजर्व सैनिक हैं। वहीं ईरान के पास उससे लगभग आधे 6,10,000 सक्रिय और 3,50,000 रिजर्व सैनिक हैं।

वायुसेना और नौसेना की ताकत की तुलना करें, तो अमेरिका के पास 13 हजार से ज्यादा एयरक्राफ्ट हैं, जो कि दुनिया के सबसे उन्नत विमानों में आते हैं। सिर्फ अमेरिका के पास सबसे बड़ी संख्या में चौथी और पाँचवी पीड़ी के विमान है। दूसरे ओर ईरान के पास केवल 550 के आसपास विमान हैं, जिनमें से ज्यादातर पुराने सोवियत युग के मिग और सुखोई हैं। वहीं अमेरिका की नौसेना के पास 464 पोत हैं, इसके मुकाबले ईरान के पास केवल 109 पोत मौजूद हैं।

इसी के साथ अमेरिका के पास 25 हजार से 30 हजार मिसाइले हैं। जबकि ईरान के पास लगभग 3 हजार बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों का ही जखीरा है। थलसेना की बात करें तो अमेरिका के पास 4,666 टैंक और 4,09,660 बख्तरबंद गाड़ियाँ हैं। वहीं ईरान के पास 2,675 टैंक और 75,939 बख्तरबंद वाहन हैं।

ताकत में फर्क के बावजूद युद्ध में कैसे टिका ईरान?

अमेरिका के मुकाबले आधी से भी कम औसत में सैन्य ताकत होने के बावजूद ईरान युद्ध में टिका रहा और अपनी शर्त मनवाने के बिना सीजफायर के लिए नहीं माना। क्योंकि ईरान ने युद्ध में अपनी भौगोलिक, रणनीतिक और असममित क्षमताओं का फायदा उठाया।

ईरान की सबसे बड़ी ताकत स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज है, जो कि यूरोप और एशिया समेत दुनिया के लिए कई क्षेत्रों के लिए इकलौता तेल मार्ग माना जाता है। यहाँ से दुनिया का 20 प्रतिशत तेल गुजरता है। ईरान ने इस मार्ग को बाधित कर दिया जिससे, दुनिया भर में तेल की कीमतें उछली और पूरी दुनिया के साथ-साथ अमेरिका पर भारी आर्थिक दबाव पड़ा।

इसके साथ ईरान ने अमेरिका से सीधे टकराने के बजाए अलग-अलग तरीकों से पलटवार किया। ईरान ने अपने प्रॉक्सी नेटवर्क का सहारा लिया, जैसे यमन के हूती विद्रोही लाल सागर के अहम शिपिंग रूट को बाधित कर रहे हैं और इजरायल पर मिसाइलें दाग रहे हैं। इसके अलावा लेबनान में हिज्बुल्लाह का साथ लिया और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सहयोगियों को निशाना बनाया।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस युद्ध में ईरान की रणनीति अमेरिका को हराना नहीं, बल्कि खुद को बचाने की है। इसी को वह अपनी जीत मानता है। दूसरी तरफ अमेरिका ने ईरान के सैन्य ठिकानों और राजनीतिक महकमे को निशाना तो बनाया लेकिन ईरान की असल ताकत हॉर्मुज और खर्ग द्वीप पर हमले के लिए सोचता रहा, क्योंकि उसे अपने सैनिक जाने का डर सताता रहा।

अमेरिका की जीत का दावा, पर ईरान की तरफ आए नतीजे

सीजफायर की घोषणा के बाद अमेरिका और ईरान दोनों ही अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। ऐसे में ईरान की जीत यह है कि उसने खुद को बचा लिया। ईरान ने अपने रणनीतिक, भौगोलिक स्थिति को ध्वस्त नहीं होने दिया। वहीं अमेरिका इसीलिए अपनी जीत का डंका बजा रहा है क्योंकि उसने ईरान के सुप्रीम लीडर से लेकर सेना के कई टॉप कमांडर और देश के भीतर भी तबाही मचाई, जैसा कि अमेरिका की सैन्य ताकत के लिए यह कोई बड़ा टास्क रहा भी नहीं।

लेकिन अमेरिका की जीत के दावे खोखले नजर आते हैं। क्योंकि ईरान की सरकार अब भी पूरी तरह कंट्रोल में है, वहाँ न तो सरकार गिरी और न ही कोई बड़ा अंदरूनी बदलाव हुआ। हॉर्मुज अभी भी ईरान के असर में है, यानी दुनिया के सबसे अहम तेल रास्ते पर उसका दबदबा बना हुआ है।

और अमेरिका के लिए जंग शुरू करने का सबसे बड़ा मुद्दा- ईरान का परमाणु कार्यक्रम, वो भी अभी सुलझा नहीं है। ईरान का एनरिच्ड यूरेनियम उसके पास ही है, जिसे न तो खत्म किया गया और न ही कहीं हटाया गया।

सैन्य ताकत की बात करें तो ईरान को नुकसान जरूर हुआ है, लेकिन उसकी सेना पूरी तरह खत्म नहीं हुई। उसकी मिसाइलें, एयर डिफेंस और कमांड सिस्टम अब भी काम कर रहे हैं। इतना ही नहीं ईरान ने ये भी दिखाया कि वह दूर-दूर तक हले करने की क्षमता रखता है और खाड़ी क्षेत्र में कई जगह निशाना साध सकता है।

इसके अलावा अमेरिका और इजरायल के बीच भी युद्ध को लेकर मतभेद सामने आए, जिसका फायदा ईरान ने उठाया। इस लड़ाई में अमेरिका को अपने एयर डिफेंस सिस्टम का काफी इस्तेमाल करना पड़ा, जिससे उसके संसाधनों पर दबाव पड़ा। और सबसे अहम बात, ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के कई बड़े सैन्य ठिकानों और सिस्टम्स को नुकसान पहुँचाया। इससे साफ होता है कि अमेरिका की जीत के दावे खोखले तो हैं। वहीं ईरान को भी युद्ध में काफी नुकसान पहुँचा है।

दोहा में सभी इस्लामी देशों की मीटिंग में इजराइल के खिलाफ NATO की तर्ज पर Islamic NATO नहीं बन पाया; अध्यक्ष बनने के नाम पर सभी पीछे हटे


भारत में मुस्लिम कट्टरपंथी मुसलमानों को इजराइल के खिलाफ भड़काते रहते हैं। कोई फिलिस्तीन का थैला लेकर, कोई हमास और गाज़ा के लिए घालियाली आंसू बहा गुमराह करते रहते हैं। भारत का मुसलमान इतना ज्यादा डरा हुआ है कि किसी में इनसे यह पूछने की हिम्मत नहीं कि इतने मुस्लिम मुल्क हैं कोई फिलिस्तीनियों को अपने-अपने मुल्क में क्यों रख लेते? बस कट्टरपंथियों की तरह victim card खेल खुद भी पागल बनने के साथ दूसरों को भी पागल बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं। आखिर आतंकियों को कोई अपने मुल्क में रख क्यों अपने मुल्क का माहौल ख़राब करना चाहेगा? ध्यान हो, जिया-उल-हक़ के समय पाकिस्तान ने 30,000 फिलिस्तीनियों को रख तो लिया लेकिन फिलिस्तीन का माहौल शांत होने पर जब उन्हें वापस अपने मुल्क जाने को कहा कोई तैयार नहीं हुआ, फिर जिया ने जिस तरह उनको बन्दूक की नोक पर धक्का दिया किसी से नहीं छुपा। 

इजराइल पर कीजड़ फेंकना आसान है। आतंकवाद के खिलाफ कोई बोलने को तैयार नहीं, क्यों? शायद जिया द्वारा फिलिस्तीनियों को पनाह देने से पाकिस्तान में आतंकवाद के बीज फ़ैल गए थे। आखिर हमास कौन है? सभी मुस्लिम अच्छी तरह जानते हैं।

            

कतर की राजधानी दोहा में सोमवार (15 सितंबर 2025) को 60 मुस्लिम देशों की इमरजेंसी मीटिंग हुई है। बैठक में ऑर्गेनाजेशन ऑफ इस्लामिक कर्पोरेशन (OIC) के सदस्य देश और अरब मुल्क शामिल हुए थे। ओआईसी की यह इमरजेंसी बैठक कतर में इजरायली हमले को लेकर की गई है, जिसमें सभी देशों से अपील की गई कि इजरायल के खिलाफ कानूनी और प्रभावी कदम उठाए जाएं। साथ ही इजरायल के साथ अपने रिश्तों पर भी एक बार फिर से गौर करें।

पाकिस्तानी अखबार द डॉन की रिपोर्ट के अनुसार पिछले हफ्ते इजरायल ने कतर में हमास के नेताओ को निशाना बनाकर स्ट्राइक की थी। बैठक में कहा गया कि ये अधिकारी गाजा सीजफायर प्रस्ताव पर चर्चा कर रहे थे, लेकिन इजरायल ने यह हमला करके सभी प्रयासों को विफल कर दिया है इसलिए उसके खिलाफ सख्त कदम उठाया जाना चाहिए। हमास का कहना है कि इजरायल के हमले में छह लोग मारे गए हैं। हालांकि, हमास के टॉप अधिकारी बच गए हैं।

इजरायल के खिलाफ OIC का जॉइंट स्टेटमेंट
ओआईसी देशों ने जॉइंट स्टेटमेंट में अपील की है कि सभी को इजरायल के खिलाफ कानूनी और सख्त कदम उठाने की जरूरत है, साथ ही सभी मुल्कों को उसके साथ अपने डिप्लोमेटिक और आर्थिक रिश्तों पर भी गौर करना चाहिए क्योंकि वह करीब दो साल से फिलिस्तीनी लोगों पर हमले कर रहा है
। संयुक्त राष्ट्र में इजरायल की सदस्यता खत्म करवाने के लिए प्रयास करने की भी इन देशों ने अपील की है। बैठक का मकसद इजरायल पर दबाव बनाना था ताकि गाजा में जारी उसके हमलों पर लगाम लगाई जा सके
।

बैठक में 60 देशों के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति शामिल हुए, लेकिन संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और मोरक्को ने अपने प्रतिनिधियों को बैठक के लिए भेजा था। इन तीनों देशों ने पांच साल पहले अब्राहम समझौते के तहत इजरायल क मान्यता दी थी। इनके अलावा, उसे मान्यता देने वाले देशों में कतर, मिस्त्र और जॉर्डन भी शामिल हैं।

मुस्लिम देशों ने की इजरायल की यूएन सदस्यता खत्म करने की अपील
कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमाद अल थानी ने कहा कि सीजफायर पर बात कर रहे हमास के वार्ताकरों पर हमला करके इजरायल ने साबित कर दिया कि उसका इरादा सीजफायर का नहीं है
। अमीर ने अरब देशों को आगाह करते हुए यह भी कहा कि इजरायल ने कतर में हमास अधिकारियों पर हमला करके गाजा पर बातचीत को पटरी से उतारने की कोशिश की है और इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू अरब को इजरायली क्षेत्र में बदलने का सपना देख रहे हैं, जो एक खतरनाक बात है
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बैठक में 60 देशों के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति शामिल हुए, लेकिन संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और मोरक्को ने अपने प्रतिनिधियों को बैठक के लिए भेजा था। इन तीनों देशों ने पांच साल पहले अब्राहम समझौते के तहत इजरायल क मान्यता दी थी। इनके अलावा, उसे मान्यता देने वाले देशों में कतर, मिस्त्र और जॉर्डन भी शामिल हैं।

मुस्लिम देशों ने की इजरायल की यूएन सदस्यता खत्म करने की अपील
कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमाद अल थानी ने कहा कि सीजफायर पर बात कर रहे हमास के वार्ताकरों पर हमला करके इजरायल ने साबित कर दिया कि उसका इरादा सीजफायर का नहीं है
। अमीर ने अरब देशों को आगाह करते हुए यह भी कहा कि इजरायल ने कतर में हमास अधिकारियों पर हमला करके गाजा पर बातचीत को पटरी से उतारने की कोशिश की है और इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू अरब को इजरायली क्षेत्र में बदलने का सपना देख रहे हैं, जो एक खतरनाक बात है।

बाद में शेख तमीम बिन हमाद अल थानी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर भी पोस्ट किया और कहा, 'दोहा में आज हुई इमरजेंसी अरब-इस्लामिक समिट हमारे क्षेत्र में इजरायल के आतंकवाद के खिलाफ कठोर संदेश है और इसके परिणाम हमारे सामूहिक प्रयासों को तीव्र करने, हमारे देशों की स्थिति में समन्वय स्थापित करने और हमारे रुख और आवाज को एकजुट करने में प्रभावी रूप से योगदान देंगे।'

बैठक में कौन-कौन हुए शामिल?
अरब-इस्लामिक समिट में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, ईरान के राष्ट्रपति मौसाद पेजेशकियान, इराकी पीएम मोहम्मद सिया अल-सुदानी, तुर्किए के राष्ट्रपति रेसेप तैय्यप एर्दोगन और फिलिस्तीन के राष्ट्रपति मोहम्मद अब्बास भी शामिल हुए थे।

ईरानी राष्ट्रपति बोले- कल को किसी और मुस्लिम देश के साथ भी ऐसा कर सकता है इजरायल
ईरानी राष्ट्रपति मौसाद पेजेशकियान ने कहा कि ऐसी स्थिति कल अरब या किसी और इस्लामिक देश के सामने भी आ सकती है, जैसा जुलाई महीने में ईरान के साथ हुआ. जब इजरायल के साथ करीब 12 दिनों तक उसकी जंग चली थी
। ईरान पहले भी मुस्लिम देशों से इजरायल के साथ सभी रिश्ते खत्म करने की अपील कर चुका है।

सभी इस्लामिक देश अपनी पीठ और कपड़े झाड़ते हुए कहे कि देखो इस बार तो हमने इजरायल की पिटाई बर्दाश्त कर लिया लेकिन अगली बार हम इजरायल की पिटाई बर्दाश्त नहीं करेंगे।

NATO की तर्ज पर Islamic NATO नहीं बन पाया
चर्चा है, हालाँकि इस समाचार की पुष्टि नहीं हुई है, कि इस बैठक में इजिप्ट ने प्रस्ताव रखा कि हम नाटो की तर्ज पर एक इस्लामी नाटो बनाएं और बारी-बारी से सभी मुस्लिम देश उसके अध्यक्षता करें।
फिर सऊदी अरब ने इजिप्ट के राष्ट्रपति से कहा कि ठीक है आप इसके पहले अध्यक्ष बन जाइए
तब इजिप्ट के राष्ट्रपति ने कहा कि इस्लामी नाटो का पहला अध्यक्ष बनने का तो आपको मौका मिलना चाहिए क्योंकि हमारे पवित्र मक्का और मदीना आपके देश में है।
फिर सऊदी अरब ने कहा नहीं भाई पहला मौका इराक को मिलना चाहिए क्योंकि शिया संप्रदाय का सबसे पवित्र करबला इराक में है।
इराक ने कहा नहीं भाई पहला मौका तो पाकिस्तान को मिलना चाहिए क्योंकि सभी इस्लामी देशों में एकमात्र न्यूक्लियर हथियार पाकिस्तान के पास है।
फिर पाकिस्तान ने कहा नहीं भाई पहला मौका तो तुर्की को मिलना चाहिए क्योंकि कभी पूरे इस्लामी उम्मत का नेतृत्व तुर्की के खलीफा ने किया था।
तुर्की ने कहा नहीं भाई मैं इसका पहला अध्यक्ष नहीं बनूंगा क्योंकि मैं पहले से अमेरिका के नेतृत्व के नाटो का मेंबर हूं।
लेकिन नाटो का पहला अध्यक्ष जॉर्डन को बनना चाहिए।
फिर जॉर्डन ने कहा नहीं भाई मेरी सीमाएं इजराइल से लगते हैं और 1976 में मैं अपने देश की 10% जमीन पहले ही इजरायल के हाथों गंवा चुका हूं तब किसी भी इस्लामिक देश ने मेरी मदद नहीं की।
यानी कि इजरायल की खौफ और दहशत देखिए इनको मालूम है कि इस वक्त इजरायल के सर पर खून सवार है और जो कोई देश मुस्लिम नाटो का पहला अध्यक्ष बनेगा सबसे पहले इसराइल उसको फोड़ेगा।
तो इसीलिए कोई अध्यक्ष बनने को तैयार नहीं हुआ।
आप लोगों को बचपन की कहानी याद होगी जब किसी लड़के की खूब पिटाई होती थी बाद में वह कहता था अच्छा इस बार तो मैं बर्दाश्त कर ले रहा हूं लेकिन अगली बार मारोगे तो मैं बर्दाश्त नहीं करूंगा।
अगली बार फिर कुटाई होती थी अपने कपड़े झाड़ कर कहता था अच्छा इस बार तो बर्दाश्त कर लेता हूं अगली बार कुटोगे तो बर्दाश्त नहीं करूंगा।
यही हाल 57 मुस्लिम देशों का है इजराइल 1948 से लगातार इनको कुटता है हर बार यह उठते हैं अपने कपड़ों पर लगी धूल मिट्टी साफ करते हैं और कहते हैं अच्छा इस बार कूट दिए कोई बात नहीं अगली बार अगर कुटोगे तो बर्दाश्त नहीं करेंगे।

कांग्रेस के लाडले पाकिस्तान ने ही अमेरिका, राहुल और INDI गठबंधन को बेनकाब कर कर दिया चारों खाने चित; पाकिस्तान के डिप्टी PM ने कहा- भारत ने ठुकरा दिया था डोनाल्ड ट्रंप का सीजफायर प्रस्ताव

                                         इशाक डार, डोनाल्ड ट्रंप (साभार: YT-aljazeera/NYT)
राहुल गाँधी और INDI गठबंधन Operation Sindoor के दौरान पाकिस्तान के DGMO द्वारा सफ़ेद झंडा दिखा cease fire के लिए कहने पर देश को गुमराह करता रहा कि डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने दोस्त नरेंद्र मोदी को कहा "नरेंद्र मोदी 
cease fire कर, मोदी surrender ", लेकिन उस झूठ को पाकिस्तान के ही विदेश मंत्री इशाक डार ने बेनकाब कर राहुल और INDI गठबंधन ही नहीं अपने हितैषी अमेरिका को दुनिया में बेनकाब कर चारों खाने चित कर दिया। अब देखना यह है कि ये तीनों पाकिस्तान के क्या सलूक करते हैं।    

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इन दिनों बार-बार दावा कर रहे हैं कि उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच जंग रुकवाई। वे कहते हैं कि उन्होंने दोनों देशों को धमकी दी थी कि अगर जंग नहीं रुकी तो व्यापार बंद कर देंगे। लेकिन अब पाकिस्तान के ही विदेश मंत्री इशाक डार ने ट्रंप की पोल खोल दी है। डार ने साफ कहा कि भारत ने कभी किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता नहीं मानी। सब कुछ द्विपक्षीय था, यानी सिर्फ भारत और पाकिस्तान के बीच।

पाकिस्तान के डिप्टी पीएम और विदेश मंत्री इशाक डार ने अल जजीरा को इंटरव्यू में ट्रंप के दावे को झूठा साबित कर दिया। डार ने कहा, “हम तीसरे पक्ष की मध्यस्थता के खिलाफ नहीं, लेकिन भारत ने डार ने बताया कि मई में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने युद्ध विराम का प्रस्ताव दिया था। रुबियो ने कहा था कि किसी तीसरी जगह पर बातचीत होगी, लेकिन 25 जुलाई को वॉशिंगटन में रुबियो से मिले तो रुबियो से उन्होंने भारत से बात के बारे में पूछा। इस पर रुबियो ने जवाब दिया, “भारत ने प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। भारत ने कहा कि ये उनका द्विपक्षीय मामला है।” हमेशा कहा कि ये द्विपक्षीय मुद्दा है।” 

डार ने जोड़ा, “हम किसी से भीख नहीं माँग रहे। पाकिस्तान शांति चाहता है। डायलॉग ही रास्ता है, लेकिन बातचीत दोनों तरफ से हो। अगर भारत तैयार हो तो हम बात करने को तैयार हैं।” डार ने साफ कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने अमेरिका से कोई मदद नहीं माँगी।

हालाँकि डार ये कह रहे हैं कि पाकिस्तान ने मदद नहीं माँगी, लेकिन भारत ने साफ कहा है कि पाकिस्तान ने पहले घुटने टेके और ऑपरेशन सिंदूर को रोकने के लिए पाकिस्तान के डीजीएमओ ने भारतीय समकक्ष से गुहार लगाई थी। खैर, दावे अमेरिका की तरफ से भी हुए, पाकिस्तान की तरफ से भी। लेकिन हकीकत क्या है, ये सारी दुनिया देख चुकी है। भारत ने पाकिस्तान को ऑपरेशन सिंदूर में न सिर्फ पंगु कर दिया था, बल्कि उसकी हवाई रक्षा प्रणाली को पंगु करते हुए अंदर तक जोरदार हमले किए। अभी तक पाकिस्तान के सभी एयरबेस ऑपरेशन नहीं हो पाए हैं।

डोनाल्ड ट्रंप लगातार दावा करते रहे हैं कि अमेरिका की मध्यस्थता से दोनों देशों ने पूर्ण युद्धविराम कर लिया। ट्रंप कहते रहे हैं, “मैंने दो न्यूक्लियर देशों की जंग रोकी। लाखों लोग मर सकते थे।” ट्रंप ने दावा किया था कि व्यापार की बात करके भारत को मनाया। लेकिन भारत ने हमेशा इनकार किया।

अब डार के बयान ने सबकुछ साफ कर दिया है। डार का बयान ट्रंप के लिए बड़ा झटका है। पहले पाकिस्तान ने ट्रंप के दावे का समर्थन किया था, लेकिन अब डार ने पलट दिया। भारत ने हमेशा कहा कि आतंकवाद पर बात होगी, लेकिन कश्मीर को अलग मुद्दा बनाना गलत। व्यापार या मध्यस्थता का कोई लिंक नहीं।

22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 निर्दोष लोग मारे गए थे, जिसमें अधिकतर हिंदू पर्यटक थे। भारत ने पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया और 7 मई को ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया। भारतीय सेना ने पाकिस्तान और PoK में जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के नौ कैंपों को निशाना बनाया। पाकिस्तान ने जवाबी कार्रवाई की और हवाई झड़पें हुईं। जिसमें भारतीय वायुसेना ने पाँच पाकिस्तानी लड़ाकू विमान गिराए।

इजराइल ने बैंक ऑफ ईरान के 2 और बैंकों को किया ‘आतंकवादी संगठन’ घोषित, इजरायल ने कहा- आतंकी गतिविधियों के लिए देते हैं अरबों डॉलर

                                          सीजफायर हो गया लेकिन ठंडी नहीं हुई दुश्मनी की आग

ईरान और इजरायल के बीच भले ही सीजफायर हो गया है, लेकिन दोनों मुल्कों के बीच दुश्मनी की आग जरा सी भी ठंडी नहीं हुई है। इजरायल ने अब ईरान के सेंट्रल बैंक को आतंकी संगठन घोषित कर दिया है। इजरायल ने आरोप लगाया है कि ईरान का सेंट्रल बैंक आतंकी गतिविधियों के लिए फंडिग कर रहा है। इजरायल ईरान के बीच 12 दिनों की लड़ाई के बाद ये अहम घटनाक्रम है।

इजरायल के रक्षा मंत्री इजरायल कार्टज ने ट्वीट कर कहा है कि, "मैंने आज मोसाद और राष्ट्रीय आर्थिक युद्ध मुख्यालय के अनुरोध पर ईरान के सेंट्रल बैंक को आतंकवादी संगठन घोषित करने वाले एक विशेष आदेश पर हस्ताक्षर किए, जिसका उद्देश्य ईरानी आतंकवादी शासन की फाइेनेंसिंग सिस्टम के मूल पर प्रहार करना है।"

इजरायल ने ईरान के सेंट्रल बैंक को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया है। इजरायल का कहना है कि ईरान इन बैंकों का इस्तेमाल आतंकवाद को बढ़ावा देने में कर रहा है। इजरायल सरकार ने कहा कि आतंकवाद में शामिल किसी भी हिस्से को छोड़ा नहीं जाएगा।

इजरायल के रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज़ ने क्षेत्र में आतंकवाद के वित्तपोषण से निपटने के इजरायल के प्रयासों के तहत, ईरान के केन्द्रीय बैंक और कई अन्य संस्थाओं और व्यक्तियों को आतंकवादी संगठन और कार्यकर्ता घोषित करने वाले आदेश पर हस्ताक्षर किए।

बयान में कहा गया है, "इस निर्णय का उद्देश्य ईरानी शासन की आतंकवादी वित्तपोषण प्रणाली पर प्रहार करना है, जो कुद्स फोर्स और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के माध्यम से पूरे मध्य पूर्व में आतंकवादी संगठनों को संचालित, वित्तपोषित और हथियार प्रदान करती है।"

इजरायली रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज ने इन सेंट्रल बैंकों को आतंकवाद संगठन ठहराने वाले आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इसमें ईरान के शाहर बैंक, मेलट बैंक और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) से जुड़ी एक ऊर्जा कंपनी भी शामिल है। इसके अलावा सेपेहर एनर्जी जहान कंपनी (SEJ) के तीन अधिकारियों पर भी प्रतिबंध लगाया गया है।

काट्ज ने कहा, “ईरान का केंद्रीय बैंक कोई वित्तीय संस्थान नहीं है। यह एक ऐसा माध्यम है, जो घातक आतंकवाद में अरबों डॉलर खर्च करता है। हम उन स्थानों पर भी हमला करेंगे, जो अयातुल्ला शासन को सबसे अधिक फायदा पहुँचाते हैं।”

यह कदम ईरान के इजरायल पर जासूसी के आरोप में तीन लोगों की हत्या के बाद सामने आया है। हालाँकि, दोनों देशों के बीच सीजफायर का ऐलान किया जा चुका है।

ईरान का केन्द्रीय बैंक पहले से ही संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रतिबंधों के अधीन है, जबकि इजरायल ईरानी शासन के वित्तीय तंत्र पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

यह आदेश इजरायली खुफिया सेवा के अनुरोध के बाद जारी किया गया था और यह ऐसे समय में आया है जब इजरायल और ईरान के बीच तनाव चरम पर है, विशेष रूप से लेबनान में हिजबुल्लाह जैसे सशस्त्र समूहों और सीरिया, इराक और गाजा में अन्य मिलिशियाओं को समर्थन देने में तेहरान की संलिप्तता के कारण।

LoP का मतलब Leader of Pakistan Propaganda: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर राहुल गाँधी के बिगड़े बोल पर BJP ने लताड़ा

                     प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (बाएँ), राहुल गाँधी (दाएँ) (फाइल फोटो, साभार: NDTV/IANS)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अपमानजनक टिप्पणी पर लोकसभा में विपक्ष नेता राहुल गाँधी की आलोचना की जा रही है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इस टिप्पणी को असभ्य और पाकिस्तान खुफिया एजेंसी(ISI) का समर्थन बताया। उन्होंने भारत-पाकिस्तान सीजफायर को लेकर दावा किया था कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का फोन आते ही ‘नरेंद्र’ ने सरेंडर कर दिया।

मंगलवार (03 जून 2025) को भोपाल में आयोजित कांग्रेस के संगठन अभियान के प्रमोचन के दौरान कही। राहुल गाँधी ने कहा, “इन पर (BJP-RSS) थोड़ा सा दबाव डालो ये लोग डर जाते हैं। जैसे डोनाल्ड ट्रंप का फोन आया…कहा मोदी जी क्या कर रहे हो? ‘नरेंद्र सरेंडर’ और नरेंद्र मोदी जी ने ट्रंप के इशारे का पालन किया। ये BJP-RSS का चरित्र है।”

इसके बाद राहुल गाँधी ने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध का जिक्र किया, जिसके अंत में बांग्लादेशी को आजादी मिली। यह युद्ध उस समय लड़ा गया था जब कांग्रेस सत्ता में थी। उन्होंने कहा, “आपको एक समय याद होगा जब फोन कॉल नहीं आया था। 1971 की लड़ाई में एयरक्राफ्ट कैरियर आया था। इंदिरा गाँधी ने कहा था जो मुझे करना है मैं करूँगी। अमेरिका की धमकी के बावजूद पाकिस्तान को तोड़ दिया था। कांग्रेस के शेर और शेरनियाँ महाशक्तियों के खिलाफ लड़ते हैं और कभी झुकते नहीं हैं।”

राहलु गाँधी चीन-पाकिस्तान के ‘पेड एजेंट’

  • उधर, राहुल गाँधी के पीएम मोदी के लिए सरेंडर शब्द का प्रयोग करने पर भारी आलोचना की जा रही है। BJP ने कहा कि लोकसभा में विपक्ष की ऐसी भाषा देश और सेना का अपमान है। कहा कि राहुल गाँधी चीन और पाकिस्तान के पेड एजेंट तो नहीं हैं।
BJP के राष्ट्रीय प्रवक्ता और सांसद संबित पात्रा ने राहुल गाँधी के बयान को ऑपरेशन सिंदूर और भारतीय सेना का अपमान करार दिया है। उन्होंने कहा, “जिस लहजे से ऑपरेशन सिंदूर पर राहुल गाँधी ने बात कही। कोई भी सभ्य राजनेता या विपक्ष का नेता अपने देश के बारे में बात करते समय सरेंडर जैसे शब्द का इस्तेमाल कभी नहीं करेगा। अगर कोई नेता इस तरह के शब्द का प्रयोग कर रहा है तो वह राजनीति लायक नहीं है।”
प्रवक्ता ने आगे कहा कि पहलगाम आतंकी हमले का बदला ऑपरेशन सिंदूर के तहत लिया गया था, जिसमें पाकिस्तान के भीतर घुसकर 9 आतंकी लॉन्चपैड और 11 एयरबेस तबाह किए गए थे। संबित पात्रा ने कहा, “ये सब ऑन रिकॉर्ड है। इसके बावजूद राहुल गाँधी ने भारत की मातृभूमि के लिए सरेंडर शब्द का प्रयोग किया और ऑपरेशन सिंदूर का मजाक उड़ाया। हमारा देश कभी आतंक के सामने सरेंडर नहीं करता।”

वहीं, बीजेपी के प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने कहा, “राहुल गाँधी ने LoP का मतलब, लीडर ऑफ ऑपोजिशन की जगह लीडर ऑफ पाकिस्तानी प्रोपागेंडा समझ लिया है। पाकिस्तान ने भी मान लिया है कि भारत की उनकी कितनी कुटाई की और वह भारत से गिड़गिड़ा रहा था। लेकिन राहुल गाँधी कहते हैं कि ट्रंप का फोन आते ही पीएम ने सरेंडर कर दिया।”
पूनावाला ने आगे कहा, “राहुल जी, DGMO की बात मान लीजिए। उनकी नहीं तो विदेश मंत्रालय की मान लीजिए। कम से कम खुद की पार्टी के सांसद, शशि थरूर, मनीष तिवारी और सलमान खुर्शीद की ही बात मान लीजिए।”

11 एयरबेस तबाह करवा के जीत का दम भर रहे शाहबाज़ शरीफ: चायनीज और तुर्की माल फेल फिर भी चीन को थैंक्यू, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के फर्जी दावों का सच

                                                                                                                     साभार 
पाकिस्तानी फौज ने 10 मई को एक तरफ सीजफायर का उल्लंघन किया और दूसरी तरफ मुल्क के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ कैमरे पर झूठ बोलकर खूब शेखी झाड़ते दिखाई दिए। उन्होंने दावा किया उन्होंने जंग में उनके मुल्क ने जीत हासिल कर ली है।

पीएम शरीफ ने अपनी मुल्क की आवाम को ऐसे बताया जैसे युद्ध विराम का उल्लंघन भारत ने किया था और उन्होंने तो बस जवाब दिया, हकीकत जबकि यह है कि 10 मई को सीजफायर के बाद जो अटैक किए गए वो पाकिस्तान की ओर से किए गए थे।

शरीफ और पाकिस्तान भूल गया कि अगर भारतीय DGMO ने तुम्हारे DGMO के फोन को 2/3 दिन टाल दिया होता, आतंकवाद को संरक्षण देने पर पाकिस्तान की इतनी दुर्दशा हो गयी होती बलूच सेना ही तुम्हारी सेना पर हावी हो गयी होती।     

शहबाज शरीफ बयान में यहीं नहीं रुके। लगातार भारत से मुँह की खाने वाले पाकिस्तान को लेकर उन्होंने दावा किया, कि उनकी फौज भारत पर भारी पड़ी। उन्होंने ये जताया कि भारत ने पाकिस्तानी नागरिकों को निशाना बनाया है, जबकि सच्चाई ये है कि ऑपरेशन सिंदूर के तहत पहली कार्रवाई के बाद ही भारत ने साफ कर दिया था कि उन्होंने सिर्फ आतंकी ठिकानों को टारगेट किया है।

खुद को पाक साफ बताने वाला पाकिस्तान जो LOC पर लगातार गोलियाँ और मोर्टार दागकर कश्मीर के लोगों को मारता रहा, उस पर शहबाज शरीफ ने एक शब्द नहीं बोला।

उनका कहना था कि पाकिस्तानी फौज ने भारत को ऐसा घाव दिया है जो कभी नहीं भर पाएगा, लेकिन भारत की कार्रवाई अगर देखेंगे तो पता चलेगा कि भारत ने पाकिस्तान 11 एयरबेस तबाह किए हैं, जिनमें नूरखान, रफ़ीकी, मुरीद, सुक्कुर, सियालकोट, पसरूर, चूनियाँ, सरगोधा, सकरदु, भोलारी और जैकोबाबाद का नाम शामिल है।

इसके अलावा शहबाज शरीफ ने अपने बयान में खास तौर पर चीन को ‘धन्यवाद’ बोला और इस मुश्किल घड़ी में पाकिस्तान का साथ देने के लिए आभार जताया। ये सब उन्होंने केवल चीन को खुश करने के लिए किया, क्योंकि ये स्पष्ट है कि कि पाकिस्तान के एयरबेसों को जो नुकसान हुआ उसके पीछे एक कारण चीनी सैन्य प्रणाली HQ-9 का विफल होना भी है।

भारत-पाक के बीच सीजफायर : ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से पाकिस्तान को पहुँची करारी चोट, शाम 5 बजे से थमी लड़ाई

                            भारत-पाकिस्तान के बीच सीजफायर (फोटो साभार: Rediff)
Operation Sindoor से पाकिस्तान को पहुंची जबरदस्त आर्थिक मार ने पाकिस्तान को घुटने पर ला दिया। अगर अभी भी पाकिस्तान ने आतंकवादी हमले बंद नहीं किए तो इससे भी जबरदस्त नुकसान को उठाना पड़ेगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि मदरसों और मस्जिदों की आड़ में जो आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम दिया जा रहा था सब दुनिया के सामने आ गया। 10 मई की रात में भारत द्वारा पाकिस्तान को पहुंचे नुकसान ने घुटने पर आने को मजबूर कर दिया। अगर लड़ाई कम से कम 3 दिन और चल गयी IMF से मिला अनुदान भी पाकिस्तान को बचा नहीं सकता था।  Cease fire के लिए भारत के आगे गिरगिराया। इतने दिनों में हुए पाकिस्तान को हुए नुकसान ने पाकिस्तान को 30 साल पीछे धकेल दिया है। 

भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा पर कई दिनों तक चली तनातनी आखिरकार थम गई। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (US President Donald Trump) ने शनिवार (10 मई 2025) को ऐलान किया कि दोनों देशों ने ‘तुरंत और पूरी तरह से युद्ध रोकने (Full and Immediate Ceasefire)’ करने का फैसला किया है। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा, “पूरी रात चली बातचीत के बाद, अमेरिका की मदद से भारत और पाकिस्तान सीजफायर पर राजी हुए। दोनों को समझदारी दिखाने की बधाई।”

भारत और पाकिस्तान के बीच अचानक घोषित हुए संघर्षविराम के पीछे बड़ी कूटनीतिक वजह है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल और विदेश मंत्री एस. जयशंकर बीते कई दिनों से अपने अमेरिकी समकक्षों के साथ लगातार बातचीत में शामिल थे। शाम 5 बजे से ही युद्ध विराम लागू हो चुका है।

भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने इस बारे में आधिकारिक बयान दिया है। उन्होंने बताया कि पाकिस्तानी डीजीएमओ ने भारतीय डीजीएमओ को 3.35 बजे शाम को कॉल किया था, जिसके बाद दोनों पक्षों में फायरिंग और सैन्य अभियानों को रोकने की सहमति बनी। ये समझौता शाम 5 बजे से लागू हो गया।

ये खबर तब आई जब दोनों देश एक-दूसरे की फौजी चौकियों पर हमले कर रहे थे। भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के जरिए पाकिस्तान को करारा जवाब दिया, जिससे पाक बैकफुट पर आ गया।

कुछ हफ्तों में भारत-पाक सीमा पर हालात बेहद गर्म थे। 22 अप्रैल को कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 लोग मारे गए थे, जिसके लिए भारत ने पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया। इसके जवाब में भारत ने 7 मई को ‘ऑपरेशन सिंदूर‘ शुरू किया, जिसमें पाकिस्तान के नौ आतंकी ठिकानों को तबाह किया गया। भारतीय सेना ने ड्रोन और एंटी-टैंक मिसाइलों का इस्तेमाल कर पाकिस्तानी फौजी ठिकानों को निशाना बनाया। खबरों के मुताबिक, रावलपिंडी और चकलाला जैसे इलाकों में पाकिस्तान को भारी नुकसान हुआ।

पाकिस्तान ने भी पलटवार किया। उसने भारत पर 400 ड्रोनों और मिसाइलों से हमले का इल्जाम लगाया। पाकिस्तानी फौज ने ‘ऑपरेशन बनयान उल मरसूस’ शुरू कर भारतीय ठिकानों पर हमले किए। जम्मू, अमृतसर और पूंछ में धमाकों की खबरें आईं। लेकिन भारतीय सेना ने इन हमलों को नाकाम कर दिया। 8-9 मई की रात भारत ने पाकिस्तानी ड्रोनों को मार गिराया और सीमा पर कालाबाजी दिखाने वालों को सबक सिखाया।

भारत का कहना था कि पाकिस्तान बार-बार सीजफायर तोड़ रहा था और आतंकियों को भेज रहा था। भारतीय सेना ने न सिर्फ इन हमलों को रोका, बल्कि पाकिस्तान के फौजी ठिकानों को भी निशाना बनाया।

दूसरी तरफ, बलूच विद्रोहियों ने भी पाकिस्तान को निशाना बनाया। बलूच लिबरेशन आर्मी ने मंगोचार शहर पर कब्जा कर लिया और 39 ठिकानों पर हमले किए। उन्होंने CPEC हाइवे को ब्लॉक कर दिया और पाकिस्तानी सेना को बैकफुट पर धकेल दिया। बलूच नेता मीर यार बलूच ने कहा, “पाकिस्तान का पतन करीब है। हम आजादी चाहते हैं और भारत से दूतावास खोलने की अपील करते हैं।” इससे पाकिस्तान पर दो तरफा दबाव पड़ा।

ट्रंप की मध्यस्थता के बाद सीजफायर तो हो गया, लेकिन भारत और पाकिस्तान भी इसकी पुष्टि कर देंगे। वहीं, सऊदी अरब ने भी मध्यस्थता की पेशकश की है। जानकारों का कहना है कि ऑपरेशन सिंदूर ने पाकिस्तान को साफ संदेश दिया कि भारत अब चुप नहीं रहेगा। लेकिन शांति के लिए दोनों देशों को भरोसा बनाए रखना होगा।