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चीन से फंडिंग होने पर पहलगाम आतंकी हमले पर UN रैपोर्टियर बेन सॉल ने दिए थे भारत विरोधी बयान, ऑपइंडिया ने उसी समय उठाए थे सवाल: जाँच में हुआ खुलासा

                       यूएन वॉच रिपोर्ट में बेन सॉल पर गंभीर आरोप। (फोटो साभार - UNOG न्यूजरूम)
दुनिया में अंतरराष्ट्रीय भिखारियों की कमी नहीं। भीख लो और भारत के खिलाफ बयानबाज़ी करो। आखिर UNO और मानवाधिकार वाले ऐसे लोगों को क्यों नहीं ब्लैकलिस्ट करते? या यूँ कहा जाए इन लोगों की मिलीभगत से भारत के विरुद्ध ये खेल खेला जा रहा है? अगर ये संस्थाएं ऐसे लोगों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं कर सकते UNO और Human Rights Commission को हमेशा के लिए बंद कर देना चाहिए। फंडिंग पर गलत बयान देने से भारत में माहौल ख़राब हो गया होता उसका कौन जिम्मेदार होता? ऐसे लोग चाहे किसी भी पद पर हो भिखारी से भी बदतर हैं। 
चीन जिस तरह चालें चल रहा है भारतीयों को हर चीनी उत्पाद का बहिष्कार करना चाहिए।  
UN वॉच की एक रिपोर्ट ने आतंकवाद-रोधी मामलों पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष रैपोर्टियर बेन सॉल पर वैचारिक पक्षपात और हितों के टकराव के आरोप लगाए हैं। रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि सॉल को चीनी सरकार से फंडिंग मिल रही है।

स्काई न्यूज के अनुसार, जिनेवा स्थित इस समूह की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सॉल में पश्चिम-विरोधी और इजरायल-विरोधी पक्षपात है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सॉल ने अफगानिस्तान में आतंकवादी संगठन अल-कायदा के वरिष्ठ सदस्य और आतंकवादी नेता अयमान मोहम्मद रबी अल-जवाहिरी की हत्या की निंदा की थी।

यूएन वॉच के कार्यकारी निदेशक हिलेल नोयर ने स्काई न्यूज से बात करते हुए कहा, “उन्हें एक कार्यकर्ता (एक्टिविस्ट) नहीं होना चाहिए, उन्हें एक अकादमिक होना चाहिए। हमें विद्वतापूर्ण दृष्टिकोण देखने को मिलना चाहिए।”

नोयर ने कहा  “संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ को सबसे पहले हमास के आतंकवादियों का विरोध करना चाहिए, ईरान के इस्लामी शासन का विरोध करना चाहिए, लेकिन बेन सॉल ईरान के इस्लामी शासन और उसके आतंकवादी सहयोगियों की बातों को दोहराते हुए दिखाई देते हैं।”

रिपोर्ट का हवाला देते हुए नोयर ने कहा कि सॉल को चीनी कम्युनिस्ट शासन से 1,50,000 डॉलर प्राप्त हुए। उन्होंने यह भी कहा कि सॉल ने रिपोर्ट की सामग्री का कोई खंडन नहीं किया है। नोयर ने कई ऐसे संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों का नाम लिया, जिनके कार्यालयों को चीन से फंडिंग मिली है।

हिलेल नोयर ने स्काई न्यूज से कहा, “वह खुद को एक स्वतंत्र विशेषज्ञ बताते हैं। वह सिडनी में कानून के प्रोफेसर हैं और खुद को स्वतंत्र विशेषज्ञ कहते हैं। मैं जानना चाहता हूँ कि जब उन्हें चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से 1,50,000 डॉलर मिल रहे हैं, तो वह स्वतंत्र विशेषज्ञ कैसे हो सकते हैं? मैं स्पष्ट कर दूँ। कोई यह नहीं कह रहा कि यह पैसा उनकी निजी जेब में जा रहा है ताकि वह कोई फेरारी खरीद सकें, लेकिन यह उनके कार्यालय को जा रहा है। वही कार्यालय जिसने कभी भी चीन द्वारा आतंकवाद-रोधी कार्रवाई के नाम पर दस लाख उइगरों को शिविरों में रखने की निंदा नहीं की, जबकि यही वह विषय है जिसके वह विशेषज्ञ होने का दावा करते हैं।”

उन्होंने कहा कि जबरदस्ती के उपायों (कोअर्सिव मेजर्स) पर संयुक्त राष्ट्र की विशेष रैपोर्टियर एलेना दोहान के कार्यालय को रूस, चीन और कतर से 13 लाख डॉलर प्राप्त हुए। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के एक अन्य विशेषज्ञ जॉर्ज कैट्रूगालोस का भी नाम लिया, जो संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार विशेषज्ञों के कार्यालय के अध्यक्ष हैं।

नोयर ने कहा कि उनके कार्यालय को चीन से 1,00,000 डॉलर मिले थे, उसी वर्ष जब उन्होंने एथेंस में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की पुस्तक के प्रचार के लिए आयोजित एक कार्यक्रम में भाग लिया था।

UN वॉच ने संयुक्त राष्ट्र के कई विशेषज्ञों द्वारा चीन, कतर, रूस जैसे देशों से संदिग्ध फंडिंग प्राप्त करने और मानवाधिकारों के नाम पर विशेष वैचारिक हितों को बढ़ावा देने के कई मामलों को चिन्हित किया है। संगठन का आरोप है कि ये विशेषज्ञ आतंकवादी घटनाओं और इस्लामी आतंकवाद के पीड़ितों की स्थिति की अनदेखी करते हैं।

बेन सॉल समेत UN रिपोर्टर्स ने पहलगाम हमले पर भारत को घेरा

सॉल उन आठ संयुक्त राष्ट्र विशेष रैपोर्टियरों में शामिल थे, जिन्होंने पहलगाम हमले के बाद जम्मू-कश्मीर में भारतीय अधिकारियों द्वारा अपनाए गए आतंकवाद-रोधी उपायों को लेकर मानवाधिकार उल्लंघनों पर चिंता व्यक्त करते हुए एक संयुक्त प्रेस बयान जारी किया था।
ऑपइंडिया ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि संयुक्त राष्ट्र के इस विशेष विशेषज्ञ ने आतंकवादी हमले की निंदा तो की थी, लेकिन भारत के आतंकवाद-रोधी अभियानों को, जिनमें अस्थायी मीडिया प्रतिबंध, इंटरनेट सेवाओं का निलंबन और 8000 सोशल मीडिया खातों को ब्लॉक करना शामिल था, असंगत (डिसप्रोपोर्शनेट) और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून का उल्लंघन बताया था।
भारत की आतंकवाद-रोधी कार्रवाइयों को सामूहिक दंड (कलेक्टिव पनिशमेंट) बताते हुए संयुक्त राष्ट्र के रैपोर्टियरों ने दावा किया कि अधिकारियों ने संदिग्ध आतंकवादियों से जुड़े परिवारों के घरों, व्यवसायों और संपत्तियों को बिना किसी न्यायालयी आदेश या विधिक प्रक्रिया के मनमाने ढंग से ध्वस्त कर दिया।
UN वॉच की रिपोर्ट के बाद यह समझना आसान हो जाता है कि बेन सॉल, जिनसे आतंकवादी कृत्यों की निंदा करने की अपेक्षा की जाती है, पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ भारत की कार्रवाई की आलोचना क्यों कर रहे थे।
किसी तरह संयुक्त राष्ट्र के रैपोर्टियरों ने असम और गुजरात में अवैध अतिक्रमण विरोधी अभियानों को भी पहलगाम हमले के बाद देशभर में चलाए गए कार्रवाई अभियान से जोड़ दिया। उनका तर्क था कि आतंकवाद से असंबंधित मुसलमानों को केवल इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि उनका धर्म पहलगाम हमले के आरोपियों जैसा है।
जबकि असम और गुजरात में अवैध अतिक्रमणों के खिलाफ कार्रवाई लंबे समय से चल रही है, जिनमें मुख्य रूप से सरकारी जमीन पर कब्जा कर मजार या दरगाह बनाने वाले इस्लामवादी तत्वों तथा अवैध रूप से भूमि पर कब्जा करने वाले बांग्लादेशी और रोहिंग्या शामिल हैं। ये अतिक्रमण-रोधी अभियान एक वर्ष से भी अधिक समय से जारी हैं।
हालाँकि इनका पहलगाम हमले से कोई संबंध नहीं था। गुजरात में पहलगाम हमले के कुछ दिनों बाद जो एकमात्र ध्वस्तीकरण अभियान चला, वह सरकार द्वारा चंडोला झील और उसके आसपास बने अवैध ढाँचों को हटाने के लिए था, जिसे अवैध बांग्लादेशियों का केंद्र माना जाता है। यह कार्रवाई भी गुजरात हाई कोर्ट की अनुमति मिलने के बाद की गई थी।
इसके अलावा, यह दावा भी गलत बताया गया कि ‘निर्दोष कश्मीरी नागरिकों’ के घर गिराए गए। अधिकारियों ने घरों को ध्वस्त किया था, लेकिन वे निर्दोष नागरिकों के नहीं थे।
अधिकारियों ने केवल प्रमाणित आतंकवादियों के घरों को ही गिराया। सुरक्षा बलों ने विस्फोटकों का इस्तेमाल कर आतंकवादी शाहिद अहमद कुट्टे के शोपियाँ स्थित घर, कुलगाम में सक्रिय जिहादी जाकिर के घर, पुलवामा के मुरन में एहसान-उल-हक शेख के घर, जो 2018 में पाकिस्तान गया था और इसी वर्ष घाटी में घुसपैठ कर लौटा था, फारूक तीवड़ा के घर, जो 1990 के दशक की शुरुआत में पाकिस्तान चला गया था और कभी वापस नहीं लौटा, तथा लश्कर-ए-तैयबा के जिहादियों आदिल हुसैन ठोकर (बीजबेहड़ा, अनंतनाग) और आसिफ शेख (त्राल, पुलवामा) के घरों को ध्वस्त किया। लेख के अनुसार, इनमें से कोई भी व्यक्ति निर्दोष या शांतिप्रिय नागरिक नहीं था।


गाजा युद्ध के दौरान इजरायल को हथियार से लेकर फाइटर जेट तक की मदद दे रहा था तुर्की, फोड़ रहा था TATA कंपनी पर ठीकरा: UN की रिपोर्ट ने खोल दी पोल

                                               यूएन रिपोर्ट में तुर्की को लेकर खुलासा ( x@tnt,nbt)
जाने-माने हबीब पेंटर की एक बहु-चर्चित कव्वाली है "जब खून ही बना दुश्मन ..." जो इजराइल और गाज़ा युद्ध में चरितार्थ हो रही है। यानि मुसलमान ही मुसलमान को निपटाने में लगा है और बदनाम इजराइल को किया जा रहा है। भारत मुस्लिम वोट के भूखे नेता और उनकी पार्टियां गाज़ा को लेकर मुसलमानों को मोदी सरकार के खिलाफ बयानबाज़ी कर रहे हैं। लोकसभा में फलीस्तीन का बैग लेकर जाने पर सुरमा भोपाली बनने वाली प्रियंका गाँधी 
UN की रिपोर्ट में खुलासा होने पर माफ़ी मांगेगी? 

भारत में यूँ तो मुसलमान बड़ी-बड़ी बात करता है लेकिन भूल जाता है फिलिस्तीन को कोई भी मुस्लिम देश किसी भी कीमत पर पनाह देने को तैयार नहीं। एक बार सदर जिया-उल-हक़ के समय पाकिस्तान ने फिलिस्तीनियों को शरण देकर गलती की थी, हालत सामान्य होने पर जब वापस अपने मुल्क जाने से मना करने पर जिया-उल-हक़ ने क्या हश्र किया किसी से नहीं छुपा। लेकिन भारत में मुस्लिम कट्टरपंथी, मुस्लिम वोट की भूखी पार्टियां और मुसलमान फिलिस्तीन के लिए छाती पीट रहे हैं। फिलिस्तीन दंगाई में पाकिस्तान से कम नहीं। 

क्या भारत में मुस्लिम कट्टरपंथी, मुस्लिम तुष्टिकरण करने वाली पार्टियां और इनके इशारे पर नाचने वाले मुसलमान तुर्की के खिलाफ बोलेगा? क्या तुर्की दूतावास पर प्रदर्शन करने की हिम्मत है? मुसलमानों को इस ढोंगी गैंग को दरकिनार कर सच्चाई को जानने के बाद ही अगर कुछ बोलें तो उनके ही हित में होगा। आखिर तुर्की क्यों इजराइल की मदद कर रहा है इसकी सच्चाई सामने आने पर बेशर्म ढोंगी गैंग तो मालपुए खाने में मस्त रहेगा और आम मुसलमान बदनाम होता रहेगा। ये ही वजह है कि मुसलमान शक के दायरे में रहता है। ये तुष्टिकरण करने वाला गैंग मुसलमानों को उकसा कर अपनी तिजोरियां भरते हैं और बदनाम आम मुसलमान होता रहता है।

         

तुर्की इन दिनों भारत की मशहूर कंपनी टाटा ग्रुप पर गुस्सा निकाल रहा है। उसका ब्रॉडकास्टर टीआरटी कह रहा है कि टाटा ने इजरायल को गाजा युद्ध के लिए हथियारों के पार्ट्स दिए। लेकिन संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ने तुर्की की पोल खोल दी। रिपोर्ट में साफ लिखा है कि तुर्की खुद इजरायल की मदद कर रहा था।

पत्रकार सिद्धांत सिब्बल ने यूएन की रिपोर्ट की कॉपी शेयर की है। सिद्धांत ने लिखा, “जिन बंदरगाहों ने एफ-35 के पुर्जों, हथियारों, जेट ईंधन, तेल और अन्य सामग्रियों को इजरायल तक पहुँचाने में मदद की है, उनमें तुर्की भी शामिल है।”

यूएन रिपोर्ट में तुर्की का आया नाम

 रिपोर्ट में कहा गया है कि अगस्त 2025 में जब गाजा पर इजरायल का कब्जा कर लिया, उस वक्त भी मिस्र ने इजरायल के साथ 35 बिलियन यूएस डॉलर के गैस डील की। ये इजरायल के इतिहास में सबसे बड़ी गैस डील थी। यूरोपीय यूनियन और मिस्र लगातार गाजा से नजदीक से अवैध तरीके से होकर जाने वाले गैस पाइप लाइन से गैस मँगाते रहे हैं। ये तभी भी था जब फिलिस्तीन पर इजरायल ने ताबड़तोड़ हमला किया और अभी भी है, जब गाजा पर इजरायल का कब्जा हो चुका है।

इजरायल का व्यापार और सामानों की आवाजाही दूसरे देशों के परिवहन तंत्र पर ही निर्भर रही है। अमेरिका के अलावा तुर्की, फ्रांस, इटली, बेलजियम, नीदरलैंड,ग्रीस, मोरक्को आदि देशों के बंदरगाहों से एफ-35 के पुर्जों, हथियारों, जेट ईंधन, गैस और ऑयल समेत दूसरी सामग्रियों को इजरायल तक पहुँचाए गए।

टाटा समूह पर तुर्की के आरोप

तुर्की गाजा के विनाश के लिए भारतीय कंपनी ‘टाटा समूह’ पर आरोप लगा रहा है। टीआरटी का कहना है कि इजरायल को हार्ड वेयर और दूसरे साजो सामान टाटा ने उपलब्ध कराए। टाटा समूह की कंपनी टाटा मोटर्स की सहायक कंपनी जगुआर लैंड रोवर पर एमडीटी डेविड हल्के वाहनों के चेसिस की आपूर्ति करने का आरोप लगाया।

टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) पर इजरायल की वित्तीय और सरकारी प्रणालियों के लिए महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचा प्रदान करने और प्रोजेक्ट निम्बस में भागीदारी करने का आरोप लगाया है। टीआरटी का कहना है कि इसका इस्तेमाल इजरायल ने गाजा की निगरानी में किया।

टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (TASL) पर आरोप लगाया गया कि सभी नए F-16 लड़ाकू विमानों के लिए विंग और सभी AH-64 अपाचे हमलावर हेलीकॉप्टरों के लिए फ्यूज़लेज उपलब्ध कराया। जबकि इन विमानों के फ्यूल की व्यवस्था तुर्की के बंदरगाहों ने किया। इन बंदरगाहों से विमानों के कलपुर्जें और दूसरे सामान मँगाए गए। इनका इस्तेमाल गाजा युद्ध में इजरायल ने किया। तुर्की पहले अपने गिरेबान में झाँक ले। इजरायल को मदद करने के सबूत संयुक्त राष्ट्र के पास हैं।

इजरायल-फिलिस्तीन युद्ध और गाजा में बमबारी के दौरान इजरायल द्वारा इस्तेमाल विस्फोटकों को पहुँचाने में तुर्की का हाथ रहा। जबकि भारत ने इस युद्ध से दूरी बनाई और मानवीय आधार पर इजरायल के साथ-साथ गाजा में रहने वाले लोगों की मदद की। तुर्की के दोगले रवैये का ये एक उदाहरण है।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ में पाकिस्तान का दिया था साथ

दरअसल ये वही तुर्की है, जिसने गाजा युद्ध के दौरान अपनी हवाई अड्डों को इजरायल के लिए बंद करने का ऐलान किया था। यहाँ तक कि अपने बंदरगाहों पर इजरायली जहाजों के आने पर पाबंदी लगा दी थी, लेकिन अब उसकी असलियत सामने आ गई है।

तुर्की उन चंद देशों में शामिल है, जिसकी नीति ‘भारत विरोध’ की रही है। तुर्की पर जब प्राकृतिक आपदा आई, तो उसकी मदद के लिए सबसे पहला हाथ भारत ने उठाया। लेकिन जब भारत पर पहलगाम में पाकिस्तानी आतंकियों ने पर्यटकों पर हमला किया और भारत ने पाकिस्तान स्थित आतंकियों के ठिकानों को निशाना बनाया, तो तुर्की को ‘सार्वभौमिकता’ याद आ गई।

उसने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के वक्त भारत के खिलाफ और पाकिस्तान के समर्थन में बयान दिए और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस्लामाबाद के पक्ष में खड़े दिखाई दिया था। अब साजिश के तहत भारतीय कंपनियों को टारगेट किया जा रहा है। दरअसल ये सभी सामने आया था कि तुर्की में भारतीय पर्यटकों की संख्या काफी कम हो गई है।

पहले भारतीयों की पसंदीदा जगहों में इस्तांबुल हुआ करता था। हिन्दी फिल्मों की शूटिंग भी काफी यहाँ होती थी, लेकिन ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान तुर्की के स्टेंड की वजह से भारत में नाराजगी दिखाई दी। सोशल मीडिया पर #BoycottTurkey हैशटैग ट्रेंड करने लगा। तुर्की की यात्रा रद्द करने की अपील की जाने लगी और पर्यटन एजेंसियों ने अपनी सेवाएँ रोक दी।

तुर्की के पर्यटन उद्योग पर काफी असर पड़ा। अनुमान के मुताबिक ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद 33.3% भारतीय पर्यटकों की संख्या यहाँ कम हो गई। इसकी खीझ निकालने के लिए अब तुर्की भारतीय कंपनियों को टारगेट कर रहा है।

संयुक्त राष्ट्र ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जिन देशों ने इजरायल को जरूरी सामानों यहाँ तक कि ऑयल और गैस के आवाजाही के लिए अपनी बंदरगाह का इस्तेमाल करने दिया, उनमें तुर्की, फ्रांस, इटली,मोरक्को भी शामिल हैं। अब तुर्की से पूछा जाना चाहिए कि उसने किस आधार पर टाटा समूह पर उँगली उठाई। इजरायल के साजो सामान के लिए अपने बंदरगाह के इस्तेमाल करने की इजाजत दी। न सिर्फ तुर्की बल्कि यूरोपियन देशों और मिस्र ने गैस डील की। ये गाजा पर आक्रमण करने से अब तक जारी है।

UN में उतर गया ‘दुष्ट पाकिस्तान’ का नकाब, रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के कबूलनामे पर घिरा: आतंकियों को समर्थन-फंडिंग पर पूरी दुनिया के सामने भारत की योजना ने किया जलील

                                              भारत ने यूएन में पाकिस्तान को लताड़ा (साभार- amarujala)
संयुक्त राष्ट्र में भारत की उप स्थाई प्रतिनिधि योजना पटेल ने पाकिस्तान के कबूलनामे को ही सबूत के रूप में पेश करते हुए जमकर पाकिस्तान की बखिया उधेड़ी। उन्होने कहा कि रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ का कबूलनामा ये साबित करने के लिए काफी है कि इनका आतंकवाद को बढ़ावा देने का इतिहास रहा है जो पाकिस्तान को एक दुष्ट देश के रूप में स्थापित करता है।

आतंकवाद के शिकार देशों के नेटवर्क की शुरुआत के अवसर पर बोलते हुए उन्होने कहा कि “यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक विशेष प्रतिनिधिमंडल ने इस मंच का दुरुपयोग करने और इसे कमजोर करने का विकल्प चुना है ताकि वह दुष्प्रचार में शामिल हो सके और भारत के खिलाफ निराधार आरोप लगा सके।”

आतंकवादी संगठनों को प्रशिक्षण, फंडिंग दे रहा पाकिस्तान- भारत

उन्होने कहा कि “पूरी दुनिया ने हाल ही में एक टेलीविजन साक्षात्कार में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ को आतंकवादी संगठनों को समर्थन, प्रशिक्षण और पैसे देने के पाकिस्तान के अतीत को स्वीकार करते हुए सुना है। यह रक्षा मंत्री का खुला कबूलनामा है जो किसी को भी आश्चर्यचकित नहीं करता है बल्कि पाकिस्तान को एक दुष्ट राज्य के रूप में उजागर करता है जो वैश्विक आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है और क्षेत्र को अस्थिर कर रहा है। दुनिया अब और आंखें मूंद कर नहीं रह सकती।”
योजना पटेल ने कहा कि 2008 के मुंबई धमाके के 17 साल बाद पहलगाम में आतंकी हमले में सबसे ज्यादा लोगों की मौत हुई है। भारत लगातार सीमा पार आतंकवाद से पीड़ित रहा है इसलिए आतंकवादी हमले के असर को बखूबी समझता है।

 दुनिया ने इस हमले की तीखी आलोचना की है और ज्यादातर अहम देशों के नेताओं का समर्थन भारत को मिला है। ऐसे में पाकिस्तान जबरदस्ती प्रोपेगैंडा फैलाकर दुनिया को गुमराह करने की कोशिश कर रहा है।

पाकिस्तानी रक्षा मंत्री का बयान

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने हाल ही में एक टीवी चैनल को दिये इंटरव्यू में कहा था कि पाकिस्तान का आतंकियों को फंडिंग करने का इतिहास रहा है । उन्होने कहा था कि” पिछले 30 सालों से पाकिस्तान इस गंदे काम को अमेरिका के लिए करता रहा है।”
ख्वाजा आसिफ ने इंटरव्यू के दौरान स्वीकार किया था कि “लश्कर ए तैयबा का पाकिस्तान से कनेक्शन रहा है। यहां लश्कर के कई लिंक हैं हालाँकि अब ये संगठन खत्म हो चुका है।”

UN की राहत-बचाव कार्य करने वाली एजेंसी इजरायल में बैन: कड़ी निंदा पर बोले नेतान्याहू – ‘आतंकी गतिविधियों में शामिल UN कर्मियों को ठहराया जाए जिम्मेदार’

यूएन की एजेंसी पर इजरायल ने लगाया बैन (फोटो साभार: TimesOfIsrael)
इजरायल ने हाल ही में एक कानून पारित किया है जिसके तहत संयुक्त राष्ट्र की राहत एजेंसी UNRWA (United Nations Relief and Works Agency) को देश के अंदर काम करने से प्रतिबंधित कर दिया गया है। ये एजेंसी गजा में राहत और बचाव अभियान चलाती है। इस कदम के बाद अंतर्राष्ट्रीय समुदाय और इजरायल के कुछ सहयोगियों ने चिंता जताई है कि इससे गाजा में मानवाधिकार संकट और भी गंभीर हो सकता है।

इजरायली सांसदों ने कहा कि UNRWA के कई कर्मचारियों का अक्टूबर 2023 में हुए इजरायल पर हमले थे। इन कर्मचारियों पर हमास और अन्य सशस्त्र समूहों के सदस्य होने का भी आरोप है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि जो UNRWA कर्मचारी इजरायल के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों में शामिल हैं, उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।

UNRWA के प्रमुख फिलिप लज़ारिनी ने इस फैसले की आलोचना करते हुए इसे संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतर्राष्ट्रीय कानून के खिलाफ बताया। उनका कहना है कि इस तरह का निर्णय UNRWA की भूमिका को कमज़ोर करता है और फ़िलिस्तीनी शरणार्थियों की मदद को असंवैधानिक रूप से प्रभावित करता है।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इजरायल के इस कदम का कड़ा विरोध करते हुए चेतावनी दी कि इसका फ़िलिस्तीनी शरणार्थियों पर विनाशकारी प्रभाव हो सकता है। उन्होंने इजरायल से अपील की कि वह अपने अंतरराष्ट्रीय कर्तव्यों का पालन करे और राष्ट्रीय कानून के जरिए इन कर्तव्यों में बदलाव न करे। गुटेरेस का कहना है कि यह कानून लागू हुआ तो UNRWA की गाजा में महत्वपूर्ण सेवाएं बाधित हो सकती हैं।

इसी बीच, इजरायली सेना ने उत्तरी गाजा में सैन्य अभियान तेज कर दिया है। गाजा स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, इजरायली हवाई हमलों में कम से कम 19 लोगों की मौत हुई है। साथ ही, लगभग एक लाख नागरिक बुनियादी सुविधाओं और दवाइयों के अभाव में फंसे हुए हैं। गाजा के उत्तरी हिस्सों में तीन हफ्तों से चल रहे इजरायली हमलों के कारण वहाँ मानवीय सेवाओं का संचालन ठप हो गया है। गाजा स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि इजरायली हमलों में अब तक 43,020 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है।

क्या जॉर्जिया मेलोनी को डेट कर रहे एलन मस्क? क्यों कहा- ये जितनी बाहर से सुंदर, उससे कहीं अधिक भीतर से…

        फोटो पर दोनों के डेटिंग करने की बात कही गई (फोटो साभार: X/@SawyerMerritt/@iam_smx)
इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी की हाल ही में अमेरिकी कारोबारी एलन मस्क ने काफी प्रशंसा की। इटली की प्रधानमंत्री की प्रशंसा एलन मस्क ने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र के एक कार्यक्रम में की। इसका एक वीडियो भी जॉर्जिया मेलोनी ने अपने एक्स (पहले ट्विटर) पर पोस्ट किया।

इस वीडियो में एलन मस्क मस्क, मेलोनी के इटली में किए गए कामों और उससे आए परिणामों को बताते हैं। इसके बाद मस्क ने यह भी कहा कि मेलोनी जितनी बाहर से सुंदर हैं, उससे ज्यादा अंदर से सुंदर हैं। दोनों की एक तस्वीर भी सोशल मीडिया पर वायरल हुई।

इस तस्वीर में दोनों एक डिनर में एक साथ बैठे हैं और एक दूसरे की तरफ देख रहे हैं। यह फोटो सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गई। इस तस्वीर के बाद लोगों ने इस बात को लेकर चर्चा की क्या एलन मस्क और जॉर्जिया मेलोनी एक-दूसरे को डेट कर रहे हैं।

एलन मस्क ने डेटिंग के इस सवाल का खुद ही जवाब दे दिया है। उन्होंने डेटिंग के कयास को लेकर एक्स पर की गई एक पोस्ट के जवाब में साफ किया कि वह डेट नहीं कर रहे। उन्होंने लिखा, “हम डेट नहीं कर रहे हैं।” उनका यह जवाब भी अब वायरल है। यह ऐसा पहला मौका नहीं है जब जॉर्जिया मेलोनी चर्चाओं में बनी हुई हैं, इससे पहले भी वह कई बार कई मामलों को लेकर इंटरनेट पर छाई रही है।

जॉर्जिया मेलोनी

जॉर्जिया मेलोनी का जन्म 15 जनवरी 1977 को हुआ। प्रधानमंत्री बनने से पहले वह एक इतालवी पत्रकार और पॉलिटिशियन थीं। सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी के समर्थकों ने एक आंदोलन शुरू किया था। इसे इटालियन सोशल मूवमेंट नाम दिया गया था। 15 साल की उम्र में मेलोनी ने इसके यूथ विंग में काम किया। मेलोनी के पिता अकाउंटेंट थे। रोम में जन्मीं मेलोनी अंग्रेजी, स्पेनिश और फ्रेंच बोलती हैं। उनकी एक बेटी है, जिसका जन्म 2006 में हुआ।

इटली की पहली दक्षिणपंथी प्रधानमंत्री

जॉर्जिया मेलोनी साल 2008 में 31 साल की उम्र में इटली की सबसे युवा मंत्री बनी थीं। वहीं साल 2012 में उन्होंने ब्रदर्स ऑफ इटली पार्टी की स्थापना की। इसके बाद 2021 में मेलोनी की किताब आई ‘आइ एम जॉर्जिया’, जिसमें उनके विजन और विचारों पर खूब बात हुई है। 
जॉर्जिया मेलोनी के बारें में एक तथ्य ये भी है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद इटली में ये पहली बार हुआ है जब राइट विंग कि कोई नेता प्रधानमंत्री की गद्दी पर बैठी हों। ब्रदर्स ऑफ इटली पार्टी की नेता मेलोनी ने प्रधानमंत्री बनने से पहले ही मुस्लिम अप्रवासियों को शरण देने का खुलकर विरोध किया था और इसके साथ ही समलैंगिकों (LGBT) का भी उन्होंने जमकर विरोध किया था।

कट्टरपंथी इस्लाम, आतंकवाद और समलैंगिकता की मुखर विरोधी 

25 सितंबर, 2022 को अपनी जीत के बाद से ही मेलोनी समर्थक जहाँ खुश हैं वहीं उनके आलोचक उनकी दक्षिणपंथी ब्रदर्स ऑफ़ इटली पार्टी के उदय के बाद से ही लगातार हमले कर रहे हैं। मेलोनी जिन मुद्दों पर चुनाव जीतकर आईं थीं, उन्होंने प्रधानमंत्री बनते ही स्पष्ट कर दिया है कि वह एलजीबीटी लॉबी, जेंडर आइडियोलॉजी और कट्टरपंथी इस्लाम का विरोध करती हैं, इसके साथ अपने ऊपर लगाए जा रहे आरोप की वह नव-फासीवादी हैं, उन्होंने साफ़ मना कर दिया था।

UN दफ्तर के बाहर प्रदर्शन, अमेरिकी सांसदों ने भी उठाई आवाज़: जान बचा कर निकले हिन्दुओं ने बताया – हमारे घरों पर किया हमला

                             संयुक्त राष्ट्र के दफ्तर के बाहर प्रदर्शन (फोटो साभार : News18)
बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के नाम पर जो उत्पात हो रहा है, उसकी आवाज पूरी दुनिया में सुनी जा रही है। बांग्लादेश में हिदुओं का सफाया हो रहा है, तो आवामी लीग के समर्थकों को भी मारा जा रहा है। पार्षद से लेकर सांसद तक मार दिए जा रहे हैं। भारत में हिंदू बांग्लादेशी हिंदुओं को बचाने की माँग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं, तो ये प्रदर्शन अब संयुक्त राष्ट्र के मुख्यालय तक पहुँच गया है। यही नहीं, भारतीय मूल के अमेरिकी सांसद राजा कृष्णमूर्ति ने अमेरिकी सरकार से भी हस्तक्षेप की माँग की है कि वो बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों को रोकने के लिए कोई कदम उठाए।

संयुक्त राष्ट्र के मुख्यालय पर प्रदर्शन

बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की माँग करते हुए शनिवार (10 अगस्त 2024) को संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के बाहर बड़ी संख्या में लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया। इस विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व वॉशिंगटन स्थित एक एनजीओ हिंदू एक्शन ने किया। एनजीओ हिंदू एक्शन ने न्यूयॉर्क में भी कई स्थानों पर विरोध प्रदर्शन किया। एनजीओ ने बांग्लादेश में हिंदुओं को निशाना बनाकर की जा रही हिंसा के खिलाफ बोलने के लिए कई अमेरिकी प्रतिनिधियों की प्रशंसा की।

अमेरिकी रिपब्लिकन सांसद पैट फॉलन ने भी बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों को निशाना बनाए जाने की घटनाओं पर चिंता व्यक्त की और इनकी निंदा की। रिपब्लिकन सांसद पैट फॉलन ने कहा था, “मैं बांग्लादेश में चल रही राजनीतिक हिंसा और धार्मिक उत्पीड़न की कड़ी निंदा करता हूं। मैं अंतरिम सरकार से अनुरोध करता हूं कि वह बांग्लादेशी लोगों के साझा हित में काम करे और इस हिंसा को तुरंत खत्म करे।” उन्होंने कहा, “हिंदुओं, बौद्धों, ईसाइयों और किसी भी अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक को निशाना बनाना निंदनीय है। जिन लोगों ने हिंसा के इन कृत्यों को भड़काया और उनमें भाग लिया, उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।” भारतीय मूल के अमेरिकी सांसद श्रीथानेदार ने भी बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर हमले की घटनाओं पर कड़ी नाराजगी जाहिर की और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की माँग की।
भारतीय-अमेरिकी सांसद राजा कृष्णमूर्ति ने अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन को पत्र लिखकर उनसे देश में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा को समाप्त करने में बांग्लादेशी सरकार की सहायता करने का आग्रह किया। कृष्णमूर्ति ने ब्लिंकन से अनुरोध किया कि वह बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख मुहम्मद यूनुस से बात करें और हिंसा को समाप्त करें तथा अपराधियों को न्याय के दायरे में लाएँ।

बांग्लादेश के जेसोर में होटल फूँका, 25 लोगों की मौत, बचकर भागे लोगों ने सुनाई आपबीती

इस बीच, बांग्लादेश में हो रही हिंसा से बचकर भारत भाग आए कुछ लोगों ने अपनी आपबीती भास्कर के साथ साझा की है। असम से बांग्लादेश अपने बिजनेस के सिलसिले में गए रजिउल इस्लाम बेहद बुरी हालत में भारत लौट पाए हैं। वो जेसोर में थे, जब साबिर होटल इंटरनेशनल पर बीएनपी के गुंडों और प्रदर्शनकारियों ने हमला बोल दिया। होटल साबिर इंटरनेशनल आवामी लीग के सांसद और पार्टी महासचिव शाहीन चकलाघर का है। दंगाइयों ने इस होटल में आग लगा दी। इस आग से बचकर निकले रजिउल ने बताया कि लोग डरे हुए थे, हर तरफ चीख पुकार मची थी। मैं और मेरे भाई ने रूप की खिड़की से छलाँग लगा दी।
रजिउल इस्लाम असम के हैं। उनके साथ उनका भाई भी बांग्लादेश से बचकर निकलने में सफल रहे। दोनों होटल साबिर इंटरनेशनल में थे, जब 5 अगस्त को भीड़ ने उन पर धावा बोला। दोनों के पैर टूट गए हैं। रजिउल ने कहा, “बांग्लादेश में हालात भयावह हैं। हर तरफ हिंसा हो रही है। मैं अपने भाई के साथ होटल की चौथी मंजिल पर था, जब साबिर इंटरनेशनल होटल को दंगाइयों ने फूँक दिया। भाई ने खिड़की से छलाँग लगा दी। कई अन्य लोगों ने भी लगाई। लोग टूट-फूट गए, लेकिन जिन कमरों में खिड़की नहीं थी, उनमें लोग बाहर नहीं निकल पाए। 2 दर्जन से ज्यादा लोगों की दम घुटने से मौत हो गई। अब हम कोलकाता जाकर अपना इलाज कराएँगे। हालत बेहद खराब है। हम बचकर आ गए, यही बहुत है।”
रजिउल इस्लाम अपने भाई के साथ जब असम पहुँचे, तो कुल 65 लोगों ने उनके साथ असम में एंट्री की। इनमें से कुछ बांग्लादेशी भी हैं। जो अवामी लीग पार्टी से जुड़े हुए हैं। बांग्लादेशी नागरिक रियाज भी उनमें से एक हैं। वो बिजनेस वीजा पर भाग निकले हैं। उन्होंने कहा कि आवामी लीग से जुड़े होने की वजह से बीएनपी के लोग उन्हें नुकसान पहुँचाते। बीवी-बच्चों और परिवार के पास वीजा नहीं है, तो वो वहीं फँसे हैं। किसी तरह से अभी जान बचानी प्राथमिकता है।

हिंदुओं और मंदिरों को बनाया गया निशाना

जेसोर में रहने वाले एक हिंदू परिवार ने अपनी पहचान छिपाते हुए बताया, “हमलावरों की भीड़ मेरे घर में घुस गई। वो करीब 15-20 लोग थे। हम पड़ोसी के घर में छिपे हुए थे। उन्होंने खिड़कियाँ तोड़ी और घर को तोड़ा। उन्होंने मंदिर तोड़े और हिंदुओं को निशाना बनाने के लिए ढूँढते रहे।” बता दें कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे लगातार अत्याचारों की वजह से बड़ी संख्या में पलायन की भी खबर आ रही है। भारत से लगी सीमा पर कई जगहों पर हिंदू पहुँचे हुए हैं और वो भारत में एंट्री के लिए अनुमति माँग रहे हैं। हालाँकि भारत सरकार ने एक बड़ी कमेटी का गठन किया है, जो इन मामलों पर नजर रख रही हैं।
बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हो रहे अपराधों पर हिंदू-बौद्ध-ईसाई-ओइक्या परिषद के महासचिव राणा दासगुप्ता ने कहा, “भीड़ के निशाने पर सिर्फ सरकारी संस्थाएं और मुक्ति संग्राम की उपलब्धियाँ ही नहीं, बल्कि अल्पसंख्यक भी हैं। अल्पसंख्यकों पर देश के कई हिस्सों में हमले हुए। कालीगंज से लेकर खुलना तक हमले किए गए। मंदिरों-दुकानों को निशाना बनाया गया। जमीनों पर कब्जा किया जा रहा है।”

United Nations बन रहा है Useless Nations : आतंकी हमास का साथ देना और इज़रायल का विरोध मक्कारी है

 

महासचिव António Guterres का शर्मनाक आचरण

सुभाष चन्द्र

यह विश्व का दुर्भाग्य है कि हमास समर्थक हमास और इजराइल के बीच लड़ाई को फिलिस्तीन के विरुद्ध बता आतंकवाद का खुले रूप से समर्थन कर रहे हैं। दूसरे, कोई यह नहीं देख रहा कि इस लड़ाई की शुरुआत हमास ने की है, ना कि इजराइल ने। यह तो वही बात हो रही कि भारत में 2014 में मोदी सरकार से पहले पिछली सरकारें आतंकवादी हमले को कभी 'हिन्दू आतंकवाद' तो कभी 'भगवा आतंकवाद' का नाम देकर आतंकवादियों को संरक्षण दिया जाता था, ठीक वही स्थिति आज है। कोई फिलिस्तीन से यह नहीं पूछ रहा कि वह अपने देश में आतंकवाद को क्यों पनाह दे रहा है? क्या इस स्थिति में फिलिस्तीन को किसी भी प्रकार की मानवीय सहायता दी जानी चाहिए, इस ज्वलंत प्रश्न पर विश्व को सोंचना होगा। तीसरे, जहां तक बेकसूर आम नागरिको के मरने की बात है, इसका जिम्मेदार इजराइल नहीं, हमास है, क्यों वह स्कूलों, हॉस्पिटल और मस्जिदों को अपना अड्डा बना रहा है? 

जिस तरह UNO महासचिव António Guterres ने खुल कर हमास के इज़रायल पर  हमले को समर्थन दिया है और इज़रायल के खिलाफ खड़े हो गए, उसे देख कर लगता है UNO अब Useless Nations Organisation बन चुका है - Guterres ने एक पक्ष के साथ खड़े होकर महासचिव पद की मर्यादाओं का गंभीर उल्लंघन किया है। 

Guterres ने हमास के हमले के जवाब में इज़रायल द्वारा की गई गाज़ा में बमवर्षा को अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन बताया और तुरंत युद्ध रोकने के लिए कहा- उन्होंने कहा कि-

“there was no excuse for the "appalling" violence by Hamas militants on October 7 but also warned against "collective punishment" of the Palestinians.

यहां तक तो Guterres का बयान बर्दाश्त किया जा सकता था लेकिन उन्होंने जो आगे कहा वह एक घटिया और ओछी राजनीति थी जिसमें इज़रायल को ही दोषी करार देने की कोशिश की गई, उन्होंने यह कहते हुए हमास के हमले को पूरी तरह जायज बता दिया कि- “the Hamas attacks "did not happen in a vacuum" as the Palestinians have been "subjected to 56 years of suffocating occupation."

Guterres के बयान से जाहिर है इज़रायल के विदेश मंत्री Eli Cohen का क्रोध करना और उन्होंने Guterres को हर एक हमले में इज़रायली नागरिकों की किस तरह हत्या की गयी।  उसका इतिहास खोल कर रखते हुए कहा "Mr Secretary-General, in what world do you live?" और Guterres के बयान के लिए उनका इस्तीफा माँगा। 

His remarks infuriated Israeli Foreign Minister Eli Cohen who, pointing his finger at Guterres and raising his voice, recounted graphic accounts of civilians including young children killed in the deadliest single attack in Israeli history.

Cohen said - "Mr Secretary-General, in what world do you live?"  Rejecting tying the violence to the occupation, Cohen said Israel gave Gaza to the Palestinians "to the last millimeter" with its withdrawal in 2005.

UNO में इज़रायल के राजदूत Gilad Erdan ने Guterres का त्यागपत्र मांग कर कोई गलती नहीं की क्योंकि उन्होंने सही कहा कि Guterres has "expressed an understanding for terrorism and murder." 

कुछ दिन पहले UN Geneva  ने X पर ट्वीट कर लिखा था कि Even War Has Rules जिसके जवाब में इज़रायल ने लिखा था Even Israel Has Right to Live -

Guterres ने फिलिस्तीन की आड़ में हमास का समर्थन किया है और दुनिया भर में लोग दोनों को एक साथ जोड़ कर ही देखते हैं जबकि फिलिस्तीन के राष्ट्रपति Mahmoud Abbas ने कहा है कि हमास फिलिस्तीन का प्रतिनिधित्व नहीं करता - फिलिस्तीन का प्रतिनिधित्व करने वाला PLO संगठन था। 

तो पहले दुनिया भर में इस बात पर फैसला होना चाहिए कि हमास और फिलिस्तीन के संबंध आखिर हैं क्या ? यदि इन दोनों के कोई संबंध नहीं हैं तो गाज़ा समेत फिलिस्तीन के अंदर तक हमास के लोग कैसे घुसे रहते हैं - Mahmoud Abbas आज कुछ भी कहें लेकिन सत्य यही है कि फिलिस्तीन अपने आप तो इज़रायल से लड़ने की सोच भी नहीं सकता और उसके लिए यह काम हमास करता है। 

ईरान और चीन दूर बैठ कर इस युद्ध को ईसाई / यहूदी बनाम इस्लाम बनाने की कोशिश में लगे है और साथ दे रहा है, रूस भी क्योंकि सभी का निशाना अमेरिका है। फिलिस्तीन की आड़ में हमास को समर्थन देने वाले देशों को सोचना होगा कि उन सभी के यहां हमास पल रहा है। जो चिंगारी हमास ने इज़रायल में लगाईं है, वह किसी भी देश में लगा सकते है। बेहतर होगा अपने अपने देश की चिंता करे। 

इस्लामोफोबिया है तो हिंदुफोबिया भी है, दोहरा मापदंड स्वीकार नहीं: भारत ने UN में दी इस्लामी देशों को नसीहत

                 UN में तिरुमूर्ति और अफगानिस्तान में बुद्ध की प्रतिमा तोड़ते तालिबान (फोटो साभार: Panos)
धार्मिक घृणा को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) में भारत ने दुनिया के देशों द्वारा अपनाए जा रहे दोहरे मानदंड पर लताड़ लगाई है। भारत ने कहा कि ‘रिलीजियोफोबिया (Religiophobia)’ सिर्फ अब्राहमिक मजहबों (यहूदी, ईसाई और मुस्लिम) के लिए नहीं, बल्कि सभी धर्मों पर लागू होना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि टीएस तिरुमूर्ति ने कहा, “रिलिजियोफोबिया केवल 1 या 2 धर्मों को शामिल करने वाला एक चयनात्मक अभ्यास नहीं होना चाहिए, बल्कि गैर-अब्राहम धर्मों के खिलाफ भी यह समान रूप से लागू होना चाहिए। धार्मिक भय पर दोहरे मानदंड नहीं हो सकते।”

तिरुमूर्ति ने कहा, “हमने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि धार्मिक भय का मुकाबला करना केवल एक या दो धर्मों को शामिल करने वाला एक चुनिंदा अभ्यास नहीं होना चाहिए, बल्कि गैर-अब्राहम धर्मों के खिलाफ भी समान रूप से लागू होना चाहिए। जब ​​तक ऐसा नहीं किया जाता, हम अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में कभी सफल नहीं हो सकेंगे।”

उन्होंने कहा कि भारत ने अब्राहिमक धर्मों के खिलाफ ही नहीं, बल्कि सिख धर्म, बौद्ध धर्म और हिंदू धर्म सहित सभी धर्मों के खिलाफ नफरत और हिंसा का मुकाबला करने के लिए लगातार कोशिश की है। दरअसल, तिरुमूर्ति हेट स्पीच (Hate Speech), गैर-भेदभाव और शांति के मूल कारणों को लेकर शिक्षा की भूमिका नाम से आयोजित अंतर्राष्ट्रीय दिवस की पहली वर्षगाँठ पर बोल रहे थे।

तिरुमूर्ति ने आगे कहा, “हम सहनशीलता और समावेश को बढ़ावा देने की पूरी कोशिश करते हैं। किसी भी विचार में भिन्नता को कानूनी ढाँचे के भीतर हल किया जाना चाहिए।” बीजेपी के दो नेताओं की टिप्पणी को लेकर कई मुस्लिम देशों द्वारा दी गई प्रतिक्रिया के मामले में सलाह देते हुए उन्होंने कहा, “दूसरे देशों को विशेष बात को मसला बनाकर भारत को आक्रोश दिखाने की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं है।”

हिंदू-सिखों पर बढ़ते हमलों को लेकर उन्होंने कहा कि धार्मिक भय के रूपों को गुरुद्वारों, मठों और मंदिरों जैसे धार्मिक स्थलों पर हमलों में वृद्धि के रूप में देखा जा सकता है। गैर-अब्राहमिक धर्मों के खिलाफ घृणा और दुष्प्रचार के प्रसार में वृद्धि इसका उदाहरण है।

अफगानिस्तान में इस्लामिक कट्टरपंथ का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि कट्टरपंथियों द्वारा बामियान स्थित प्रतिष्ठित बुद्ध की मूर्ति को तोड़ना, गुरुद्वारे पर आतंकवादी हमला करना, हिंदू और बौद्ध मंदिरों का विनाश जैसे धार्मिक घृणा वाले कृत्यों की भी निंदा की जानी चाहिए।

अफगानिस्तान के काबुल में शनिवार (19 जून 2022) को गुरुद्वारा करते परवान पर आतंकी हमला किया गया, जिसमें दो लोगों के मौत हो गई है। वहीं, मार्च 2020 में अफगानिस्तान के ही एक गुरुद्वारे पर इस्लामिक आतंकियों ने हमला किया गया था, जिसमें 25 सिख मारे गए थे।

तिरुमूर्ति ने यह भी कहा कि भारतीय समाज की बहु-सांस्कृतिक ढाँचे ने सदियों से भारत को आश्रयदाता बनाया है। चाहे वह यहूदी समुदाय हो, पारसी समुदाय हो या पड़ोस का तिब्बती समुदाय, भारत ने सबको सुरक्षित शरण दिया है।

टीएस तिरुमूर्ति ने कहा कि भारत आतंकवाद, खासकर सीमा पार आतंकवाद का सबसे बड़ा शिकार रहा है। उन्होंने कहा कि सभी देशों को एक ऐसी शिक्षा प्रणाली विकसित करनी चाहिए, जो लोकतंत्र के सिद्धांतों को बढ़ावा देकर आतंकवाद का मुकाबला करने में सही अर्थों में योगदान दे सके।

दरअसल, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इस्लामोफोबिया का मुकाबला करने के लिए 15 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में घोषित करने के लिए इस साल के शुरू में एक प्रस्ताव पारित किया था। इस प्रस्ताव को पाकिस्तान द्वारा पेश किया गया था।

भारत ने सिर्फ धर्म के खिलाफ फोबिया के लिए एक अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाए जाने पर चिंता व्यक्त की थी। भारत ने कहा था कि धार्मिक भय के कई रूप आजकल बढ़ रहे हैं, जिनमें हिंदू विरोधी, बौद्ध विरोधी और सिख विरोधी फोबिया विशेष रूप से शामिल है।

तिरुमूर्ति ने तब कहा था कि भारत को उम्मीद है कि इससे चुनिंदा धर्मों के आधार पर फोबिया पर कई प्रस्तावों को जन्म देगा और संयुक्त राष्ट्र को धार्मिक में विभाजित करेगा। उन्होंने कहा था कि अब समय आ गया है कि केवल एक धर्म के बजाय संपूर्ण धार्मिक भय के प्रसार के रोक को स्वीकार किया जाए।

हिंदू धर्म के 1.2 अरब, बौद्ध धर्म के 53.5 करोड़ और सिख धर्म के 3 करोड़ से अधिक अनुयायी दुनिया भर में फैले हुए हैं। वहीं, दुनिया भर इस्लाम मानने लोगों की संख्या 1.8 अरब और ईसाइयों की संख्या 2.3 अरब है। यहूदियों की संख्या 1.52 करोड़ और पारसियों की संख्या लगभग 2 लाख है।

पाकिस्तान की इंटरनेशनल बेइज्जती : UNSC ने लगाई फटकार; 2 भारतीयों को घोषित करवाना चाहता था आतंकवादी,

पाकिस्तान भारतीय आतंकी UNSC
                                                        संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (फ़ाइल फोटो) साभार - डीडी न्यूज़
पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान को एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा है। पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1267 का हवाला देते हुए भारत के दो लोगों को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने की माँग उठाई। लेकिन पाकिस्तान की इस माँग को सुरक्षा परिषद ने सिरे से नकार दिया।
पाकिस्तान की इस माँग को खारिज करने में सुरक्षा परिषद के 5 सदस्य देशों ने अहम भूमिका निभाई। इनमें अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी और बेल्जियम हैं। इस मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि टीएस तिरुमूर्ति ने ट्वीट भी किया।
उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, “पाकिस्तान ने पिछले कुछ समय में लगातार प्रयास किए हैं कि आतंकवाद संबंधी प्रस्ताव 1267 का राजनीतिकरण हो। इसके अलावा पाकिस्तान ने इसे धार्मिक रंग देने का भी पूरा प्रयास किया है लेकिन सुरक्षा परिषद ने पाकिस्तान की इस कोशिश को पूरी तरह विफल कर दिया है। हम परिषद के हर उस सदस्य का आभार जताते हैं, जिन्होंने पाकिस्तान की इस कोशिश को नाकाम करने में योगदान दिया है।”


पाकिस्तान की हुई अंतरराष्ट्रीय बेइज्जती पर ट्विटर पर आती प्रतिक्रियाएं:





साल 2019 के दौरान पाकिस्तान ने प्रस्ताव 1267 के तहत कुल 4 भारतीय नागरिकों को आतंकवादियों की सूची में डालने की माँग उठाई थी। चीन ने भी इस मुद्दे पर पाकिस्तान का समर्थन किया था। सुरक्षा परिषद ने पहले ही दो नामों को इस सूची में डालने से मना कर दिया था। वहीं दो और नाम अंगारा अप्पाजी गोविंदा पट्टनाइक दुग्गीवालसा को कल (2 सितंबर 2020) आतंकवादी घोषित करने से मना कर दिया। सूत्रों की मानें तो पाकिस्तान के पास अपने दावों को साबित करने के लिए किसी भी तरह के ठोस सबूत नहीं थे।
इसके पहले फ्रांस समेत अन्य सदस्यों ने पाकिस्तान को अपने दावे सिद्ध करने का मौक़ा दिया था। उन्होंने पाकिस्तान को इस संबंध में सबूत पेश करने के लिए कहा था लेकिन पाकिस्तान ऐसा नहीं कर पाया था। बल्कि इस मुद्दे पर अंतिम आदेश जारी करने से पहले पाकिस्तान के सबूतों का इंतज़ार भी किया गया। इसके बावजूद इस्लामाबाद अपनी बात साबित नहीं कर पाया। जिसके बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने पाकिस्तान की माँग को पूरी तरह खारिज करते हुए अपना फैसला सुनाया।
पाकिस्तान की इस चाल को बदले की भावना के तौर पर देखा जा रहा है। दरअसल बीते वर्ष 1 मई को भारत जैश-ए-मोहम्मद के मुखिया मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकवादी घोषित कराने में कामयाब हुआ था। जिसके जवाब में पाकिस्तान ने यह चाल चली थी लेकिन बदले की भावना से उठाए गए इस कदम में पाकिस्तान कामयाब नहीं हुआ।
इसके ठीक एक हफ्ते पहले भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद पाकिस्तान को फटकार लगा चुका है। बुधवार (26 अगस्त 2020) को सुरक्षा परिषद ने पाकिस्तानी दूत के बयान को अस्वीकार कर दिया था। साथ ही यह भी कहा था कि पाकिस्तानी दूत का यह बयान आधिकारिक रूप से दर्ज नहीं किया जाएगा।  
संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के स्थायी प्रतिनिधि मुनीर अकरम ने बयान दिया था। बयान में उन्होंने भारत को लेकर कई तरह के दावे किए थे। अंत में पता चला कि उनके सारे झूठे हैं और भारत को लेकर दुष्प्रचार करते हैं। सोमवार के दिन पाकिस्तान जैसे गैर सदस्यों को सुरक्षा परिषद की बैठक शामिल होने की इजाज़त नहीं मिली थी।
पाकिस्तान की तरफ से जारी किए गए बयान के बाद भारत की तरफ प्रतिक्रिया आई थी। तिरुमूर्ति ने ट्वीट करते हुए लिखा ‘हमने देखा कि संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान मिशन की तरफ से बयान जारी किया गया था। बयान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पाकिस्तान के स्थायी प्रतिनिधि की तरफ से जारी किया गया था। लेकिन हम एक बात नहीं समझ पाए कि जब सुरक्षा परिषद की सभा गैर सदस्यों के लिए खुली ही नहीं थी तो उन्होंने बयान कहाँ दर्ज कराया था।’  

पाकिस्तान : संयुक्त राष्ट्र ने तहरीक-ए-तालिबान के सरगना मुफ्ती नूर वली महसूद को घोषित किया ‘वैश्विक आतंकवादी’

नूर वली महसूद, वैश्विक आतंकवादी, पाकिस्तान
आतंकी मुफ़्ती नूर वली महसूद, वैश्विक आतंकवादी 
कंगाली के दौर से गुजर रहे पाकिस्तान ब्लैकलिस्ट होने के हाशिए पर है। अभी तक ग्रे लिस्ट से बाहर नहीं आ पाया। उसका मुख्य कारण पाकिस्तान में पल रहा आतंकवाद। इतना ही नहीं, दुनियां को धोखा देते, उसने हाफिज सईद आदि आतंकवादी सरगनाओं के बैंक खाते सील कर दिए थे, लेकिन ग्रे लिस्ट में ही रहने की घोषणा के साथ इन आतंकवाद सरगनाओं के बैंक खातों पर लगी पाबन्दी हटा ली। जितना धन पाकिस्तान ने आतंकवाद पालने में व्यर्थ किया है, अगर विकास पर खर्च किया होता, पाकिस्तान का नक्शा ही कुछ और होता। 
परन्तु आतंकवाद पर बड़ी चोट करते हुए संयुक्त राष्ट्र ने वैश्विक स्तर पर इसके विरुद्ध कदम उठाया है।संयुक्त राष्ट्र ने पाकिस्तान के आतंकवादी संगठन तहरीक-ए-तालिबान, पाकिस्तान के आतंकी मुफ़्ती नूर वली महसूद (Mufti Noor Wali Mehsud) को वैश्विक स्तर का आतंकवादी घोषित कर दिया है। आतंकवाद के क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र के इस कदम को एक बड़ी कार्रवाई के तौर पर देखा जा रहा है। 
संयुक्त राज्य सुरक्षा परिषद् 1267 अलक़ायदा प्रतिबन्ध समिति ने अपनी आईएसआईएल और और अलक़ायदा प्रतिबंध सूची में नूर वली महसूद का नाम शामिल किया है। पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन के इस नेता को अनुवर्ती 2368 (2017) के पैराग्राफ 2 और 4 के तहत सूची का हिस्सा बनाया गया है। 
दुनिया के कई देशों सहित अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र के इस फैसले की प्रशंसा की है। अमेरिका के स्टेट विभाग ने इस मामले पर ट्वीट करके प्रतिक्रिया दी है। ट्वीट में लिखा था, “यह ख़बर स्वागत करने योग्य है कि संयुक्त राष्ट्र ने तहरीक-ए-तालिबान, पाकिस्तान के नेता मुफ़्ती नूर वली महसूद को वैश्विक स्तर का आतंकवादी करार दिया है। यह संगठन पाकिस्तान में हुए तमाम बड़े आतंकवादी हमलों के लिए ज़िम्मेदार है। पिछले साल 2019 में संयुक्त राष्ट्र ने सितम्बर महीने के दौरान वली महसूद को आतंकवादी घोषित किया था।”

 
तहरीक-ए-तालिबान, पाकिस्तान ऐसा संगठन है जिसने पाकिस्तान के भीतर पिछले कुछ समय में कई बड़े आतंकवादी हमले अंजाम दिए हैं। इस संगठन ने पाकिस्तान में कई आत्मघाती हमले भी करवाए हैं जिसकी वजह से सैकड़ों लोगों ने अपनी जान गँवाई है। जून 2018 के दौरान वली महसूद, तहरीक-ए-तालिबान के नेता मुल्ला फजलुल्लाह की मौत के बाद संगठन का नेता बन गया था। उसने बीते कुछ समय में अपने नेतृत्व में पाकिस्तान के भीतर कई बड़े आतंकवादी हमले कराए हैं।