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‘इस्लाम की रोशनी’ पर ज्ञान देने से नहीं चला ओझा ‘सर’ का काम, अब देश में क्रांति के नाम पर कर रहे ‘मारने-काटने’ की बात: पूर्व AAP नेता का आतंकियों के बखान का रहा है इतिहास

UPSC एजुकेटर अवध प्रताप ओझा उर्फ ओझा सर ने देश में 'मार-काट' होने की भविष्यवाणी की (साभार: Salt by Lutyens)

जो न राजनीति में टिका, न शिक्षक के रूप में उसने आज तक ढंग की कोई बात कही। वह अब चला है देश का भविष्य तय करने। तो ये हैं हमारे UPSC एजुकेटर अवध प्रताप ओझा उर्फ ओझा सर। जिन्होंने फेमस होने के लिए, हिंदुओं के खिलाफ टिप्पणी भी की, इस्लाम की सराहना भी की, क्लासेज में सेक्सी-सेक्सी बातें भी कीं और यहाँ तक की आतंकवादी का बखान भी इन्होंने किया। लेकिन इतने विवादों के बाद भी करियर किसी क्षेत्र में सफल नहीं हुआ।
अरविन्द केजरीवाल ने राजनीति में कदम रखते ही कहा था कि "हाँ मै अराजक हूँ", जिसे उन्होंने अपनी कार्यशैली से एक बार नहीं कई बार साबित किया है। लेकिन महामूर्ख जनता मुफ्त रेवड़ियों के लालच में आम आदमी पार्टी को वोट देते रहते हैं। बिना इस्तीफा दिया बिना जेल में रहना, मुख्यमंत्री रहते किसी मंत्रालय का नहीं लेना लेकिन इसके हुक्म के बिना पार्टी में पत्ता नहीं हिलता। जाँच अधिकारीयों को लैपटॉप/मोबाइल का पासवर्ड नहीं बताना, अपनी ही महिला सांसद की अपने ही घर में पिटाई करवाना आदि आदि अराजकता के मुख्य प्रमाण हैं। ठीक यही हालत केजरीवाल पार्टी की है।      

इन सारे विवादित बयानों के बाद उन्होंने आम आदमी पार्टी (AAP) के टिकट पर दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 में हाथ आजमाया, यह सोचकर कि विवादों में ही सही, फेमस तो हुआ हूँ, लोग वोट कर ही देंगे। लेकिन लोगों को उनकी देश-विरोधी और हिंदू विरोधी बयानों की सच्चाई पता थी, तभी वह चुनाव हार गए। और अब दोबारा निकल पड़े हैं देश की तबाही की राह खोजने।

तो हाल ही में ओझा सर ने सॉल्ट बाय लुटियंस को इंटरव्यू दिया। इस इंटरव्यू का एक वीडियो क्लिप काफी चर्चा का विषय बना। वीडियो में ओझा सर ने US-इजरायल और ईरान के बीच जारी जंग का हवाला देते हुए भारत में ‘मार-काट’ होने की भविष्यवाणी कर दी। और बोला कि ऐसे में वह खुद चीन भाग जाएँगे।

ओझा सर के ‘मारकाट’ वाले बयान का संदर्भ

ओझा सर यह बात किस संदर्भ में कहते हैं उसे भी पहले जान लेना जरूरी है, क्योंकि यह बात एक शिक्षक की जुबान से सुनना काफी अटपटा लगता है। भारत में शिक्षा व्यवस्था को खराब बताते हुए ओझा कहते हैं, “यहाँ शिक्षा व्यवस्था ध्वस्त है। मेरी बेटियों के टीचर्स मुझसे शिकायत करते हैं कि पढ़ती नहीं हैं। हमने कहा कि क्या करोगे इतना पढ़ाकर… इंजीनियर, डॉक्टर हमें बनाना नहीं… हमें बनाना है नेता।”

यह बात वाकई में एक शिक्षक के जुबान से सुननी अटपटी लगती हैं। एक शिक्षक, जो छात्रों को बेहतर शिक्षा देकर एक बेहतर समाज तैयार करता है। अगर वह कहे कि पढ़ाई की क्या जरूरत, नेता बन जाओ। जैसे नेता तो पढ़े-लिखे होते ही नहीं, और अगर कुछ धारणाएँ और हकीकत ऐसी हैं भी। तो क्या इसे बदलना एक शिक्षक का कर्तव्य नहीं, या बच्चों के मन में ये भरना कि पढ़ो मत, नेता बन जाना। क्या इससे देश में कोई बदलाव आएगा?

ओझा सर शायद ही ऐसा सोच पाएँ, क्योंकि वह ठान कर बैठे हैं कि भारत माता को जय करने वाला हमारा देश एक ‘जंगल’ है। वह कहते हैं कि इस जंगल में या तो ‘शिकारी’ या फिर ‘शेर’ रहते हैं। एक शिक्षक की ऐसी भाषा न सिर्फ आक्रामक है, बल्कि पूरी व्यवस्था और समाज को नकारने वाली भी है। अगर एक शिक्षक ही देश के बारे में ऐसी सोच रखता है, तो वह छात्रों को क्या दिशा देगा।

अब ओझा सर की विशेष भविष्यवाणी

और बस यहीं ओझा सर क्रांति की बात शुरू करते हैं। भविष्यवाणी करते हैं कि शिक्षा व्यवस्था को ठीक करने के लिए एक क्रांति होगी। ओझा कहते हैं, “एक क्रांति होने जा रही है, भयंकर मार-काट होगी… इस देश में। इकोनॉमी और बैंकों का पतन होगा।”

इसके बाद खुद को दुनिया की राजनीति का ‘फर्जी’ एक्सपर्ट दिखाते हुए आगे कहते हैं, “ये ईरान और अमेरिका वाला युद्ध बढ़ जाए और गैस सिलेंडर की सप्लाई बंद हो जाए। तो ये दिल्ली, मुंबई, कोलकाता… यहाँ भूखा आदमी मरने से पहले मारेगा।”

ओझा सर ने यह तुलना फ्रांस और रूस की क्रांतियों से की, जब पहले विश्व युद्ध के दौरान 1917 में रूस में भूखमरी और खाद्यान्न की भारी कमी के कारण जनता ने विद्रोह किया था। ये ओझा सर की भविष्यवाणी कम और बददुआ ज्यादा नजर आती है। पहली बात तो भारत की स्थिति को उसी तराजू में रखना पूरी तरह गलत है, दूसरी बात ओझा सर को अंदाजा भी नहीं है कि ऐसी बातों से लोगों में कितना डर पैदा हो सकती है, जिनका कोई ठोस आधार तक नहीं है।

लेकिन ओझा सर ने ऐसे डर पैदा करने वाले बयान जानबूझ कर दिए हैं। यहाँ भी दो पहलू हो सकते हैं। पहली बात की वो फेमस होने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ते हैं, उन्हें अच्छा लगता है जब लोग उनकी बात करते हैं, उन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता कि ये बातें आलोचना हो या तारीफ। दूसरी बात कि यहाँ ओझा सर की भारत के खिलाफ घृणा साफ झलकती है, जो कि सिर्फ झलकने तक सीमित नहीं है, बल्कि इस देश को ‘तबाह’ करने की सोची-समझी मंशा है।

क्योंकि खुद तो वह चीन भागने की तैयारी में हैं। वह खुद कहते हैं, “मैं तो चीन निकल जाऊँगा, मेरा तो अपना है सारा व्यापार। दोस्त हैं, शोरूम हैं… वहाँ निकल जाएँगे।” यहाँ पूरे देशवासियों में डर पैदा करके ओझा सर ने अपना इंतजाम कर लिया है। भागने की बात कर रहे हैं, वो भी एक ऐसे देश में, जिसके साथ भारत की दुश्मनी है। ये तो वही हो गया, विजय माल्या ने देशवासियों के पैसे लूटे और बस गया ‘अंग्रेजों’ के बीच, जिन्होंने भारत पर 200 साल राज किया।

ये सभी लोग देश को बर्बाद करने के ख्वाब बुनते हैं और खुद विदेशी सहयोग के सहारे बैठे रहते हैं। कोई चौंकने वाली बात नहीं होगी, जब कल को ओझा सर का कोई विदेशी लिंक सामने आएगा, जिसमें कहा जाएगा कि ओझा सर को विदेशी फंडिंग मिल रही थी ये सब बेतुके और भद्दे बयान देने के लिए।

ओझा सर के इस्लाम और आतंकियों के बखान में प्रवचन

देश में ‘मार-काट’ हो जाने जैसा भारत-विरोधी और ‘आतंकी’ विचारधारा वाला बयान ओझा सर ने कोई पहली बार नहीं दिया है। ये वही ओझा सर हैं, जिनके इस्लाम और आतंकियों का बखान करते वीडियो वायरल होते हैं। और हिंदू धर्म के देवी-देवताओं को गाली देने में भी इनका नाम कुख्यात की लिस्ट में आता है।

कभी ये आतंकवादी ओसामा बिन लादेन ने अमेरिका में किए 9/11 हमले को महान उपलब्धि ठहरा देते हैं और उसके बहादुरी के किस्से छात्रों को सुनाते हैं। कभी इस्लाम की बड़ाई में चूर रहते हैं और कहते हैं कि इस्लाम ही पूरी दुनिया में रोशनी लेकर आया, इससे पहले तो अँधेरा था।

वहीं हिंदुओं की बात आती है तो अवध ओझा कड़वाहट के बोल निकालने शुरू कर देते हैं। श्रीकृष्ण पर लांछन लगाते हैं औऱ दावा करते हैं कि यादव लोग एक बार भगवान को मिलकर मारने वाले थे। इतना ही नहीं श्रीकृष्ण के चरित्र पर भी सरेआण बोलते हैं कि वे तो यादव की बीवियों के साथ नाचते थे।

और ऐसा नहीं है कि छात्र जानते नहीं है अवध ओझा की सच्चाई को। ओझा की क्लासेज अटेंड करने वाले छात्र कहते हैं कि ओझा सर कच्छा पहनकर क्लास में आते हैं और सेक्स की बातें करते हैं। कहने को ये UPSC एस्पिरेंट को पढ़ाने वाले शिक्षक हैं।

अगर ऐसी घटिया मानसिकता वाले शिक्षक से छात्र पड़ेगा, तो लाजमी है कि कल को परीक्षा में सफल होकर कोई छात्र देश के बड़े उच्च पदों पर बैठेगा, तो उसके विचार क्या होंगे? वो देश को किस नजरिए से देखेगा? और देश की तरक्की में योगदान देने के बजाए क्या वह भी ओझा सर की तरह चीन चला जाएगा?

ओझा सर खुद तो राजनीति में टिक नहीं पाए, और शिक्षक के तौर पर भी उनका करियर सफल हो नहीं सका। तो अब वे ऐसे भविष्य तैयार करने में निकल पड़े हैं, जो उनकी मानसिकता को पूरे देश में फैलाए। तो इसीलिए छात्र को समझना होगा कि ऐसे शिक्षक केवल देश को तबाह करने के बारे में सोचते हैं, न कि देश की तरक्की के बारे में।

रेखा गुप्ता ने भी नापा सुप्रीम कोर्ट और दलाल वकीलों को; CJI गवई पर सुप्रीम कोर्ट में जूता फेंकने सनातन धर्म का विरोध कर हिंदुओं को बाँटने का फैला रहे प्रोपेगेंडा करने वालों में हिम्मत है तो मुसलमानों और ईसाईयों में भयंकर जातिवाद पर बोलकर दिखाएं

         बीआर गवई पर जूता फेंके जाने पर वामपंथी और उदारवादी लोगों ने इसे 'दलित CJI पर हमला' करार दिया
कुछ समय से देखा जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट दलाल वकीलों के इशारों पर काम करती हैं। दलाल वकीलों द्वारा दायर केस की फटाफट सुनवाई होती है, क्यों? सनातन धर्म और हिन्दू त्यौहारों पर सारे कानून याद आ जाते हैं लेकिन दूसरे मजहबों पर जरुरत से ज्यादा दयालु बनना क्या कोर्ट का अपमान नहीं? निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक को इस गंभीर मुद्दे पर मंथन करना होगा। अभी जो अनहोनी घटना हुई है वह इसी घिनौनी मानसिकता के कारण हुआ। दलाल वकील तो मोटी रकम लेकर जनता ही नहीं माननीय अदालतों तक के स्तर को नीचे धरातल में धकेल रहे हैं।  लेकिन जज किसी भी कोर्ट का हो जनता उसे भगवान के समान इज्जत देता है, और जजों को भी इस सोंच पर काम कर दलाल वकीलों के इशारों पर नाचना बंद करना होगा।

   
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बीआर गवई पर एक 71 साल के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में सरेआम जूता फेंका और चिल्लाए- “सनातन का अपमान नहीं सहेंगे!”, यह गुस्से से भरा एक भावनात्मक कदम था। यह कदम नासमझी भरा, निंदनीय भी है लेकिन साफ तौर पर आस्था से जुड़ा हुआ है।

मगर कुछ ही मिनटों में भारत के उदारवादी हलकों ने इस घटना को एक अलग नजरिए से देखना शुरू कर दिया। उन्होंने इसे जाति से जोड़ दिया। उनका कहना था कि यह जूता सनातन धर्म की रक्षा में नहीं फेंका गया बल्कि एक ‘दलित CJI पर हमला’ था।

भारत के कुछ वामपंथी-उदारवादी बुद्धिजीवी हर बात को सामाजिक दरार में बदलने की कोशिश करते हैं। आस्था से जुड़ा हर विरोध उनके लिए जाति की लड़ाई बन जाता है। यह एक तरह की उलटी सोच है, जहाँ धर्म की बात भी जातिवाद के चश्मे से देखी जाती है।

विपक्ष के बड़े नेताओं में से एक राहुल गाँधी ने खुद को लंबे समय से जाति के मुद्दों का योद्धा बताया है। वे दलितों, पिछड़ों और जनजातीय समाज के लिए मसीहा बनने की कोशिश करते हैं लेकिन असल में उनकी पहचान को सिर्फ वोटों की गिनती तक सीमित कर देते हैं।

कभी मंदिरों में तयशुदा अंदाज में दर्शन करना, तो कभी पूरे देश में जाति जनगणना की माँग। राहुल की राजनीति सशक्तिकरण से ज्यादा समाज को बाँटने की रणनीति लगती है। इसी तरह कई क्षेत्रीय पार्टियाँ भी जाति के नाम पर समाज में दरारें पैदा करती हैं और अपनी राजनीति को आगे बढ़ाती हैं। 

 

लेकिन इस माले में हकीकत बिल्कुल साफ है। जूता फेंकने वाले वकील ने कहीं भी जाति का जिक्र तक नहीं किया। उन्होंने कोई अपमानजनक शब्द नहीं बोले। उसके मुँह से सिर्फ एक बात निकली- ‘सनातन धर्म का अपमान नहीं सहेंगे।’

यहाँ वकील का गुस्सा खजुराहो में भगवान विष्णु की खंडित मूर्ति की पुनरुद्धार को लेकर सुनवाई में की गई टिप्पणी से जुड़ा था। सुनवाई के दौरान CJI बीआर गवई ने टिप्पणी की, जिसे कई लोगों ने तंज के तौर पर लिया। उन्होंने कहा- ‘जाइए, भगवान से खुद कहिए कुछ करें। आप कहते हैं कि आप कट्टर भक्त हैं तो जाकर प्रार्थना कीजिए।”

किसी आस्थावान हिंदू के लिए ऐसे शब्द आस्था का अपमान लगते हैं, चाहे ये अनजाने में ही क्यों न कहे गए हों। खासकर जब वो देश की सबसे बड़ी न्यायिपालिका से आए हों। वकील की प्रतिक्रिया जरूर हद से ज्यादा थी और स्वीकार नहीं की जा सकती लेकिन वो भावनात्मक थी, जातिवादी नहीं।

फिर भी कुछ ही घंटों में जाति की राजनीति शुरू हो गई। सोशल मीडिया पर एक्टिविस्ट और कुछ ‘धर्मनिरपेक्ष’ पत्रकार चिल्लाने लगे- “दलित CJI पर जातिवादी हमला!” ऐसा लगा जैसे उनके तय ढाँचे में फिट ने बैठने वाली कोई भी हिंदू आस्था की अभिव्यक्ति, उन्हें बर्दाश्त नहीं होती।

जातिवाद के पीछे की राजनीति

इस तरह की घुमावदार बातें करने की वजह साफ है- आस्था हिंदुओं को जोड़ती है, जबकि जाति उन्हें बाँटती है।

साल 2014 के बाद जब नरेंद्र मोदी का उदय हुआ और पुरानी वोट-बैंक की राजनीति हिल गई तब से विपक्ष और उसके समर्थक लगातार हिंदू एकता को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए वे बार-बार जाति के पुराने मुद्दों को हवा देते हैं। हर चुनाव में वही पुरानी रणनीति दोहराई जाती है। आरक्षण खत्म होने की झूठी बातें, ‘ब्राह्मणवादी हिंदुत्व’ का डर फैलाना और अब नया शोर, ‘दलित CJI पर हमला।’

साल 2024 के चुनाव से पहले अमित शाह का एक एडिट किया हुआ वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें झूठा दावा किया गया कि BJP जातिगत आरक्षण खत्म करना चाहती है? ये एक साजिश थी और अब वही सोच फिर से काम पर लग गया है। एक भावनात्मक विरोध को बहाना बनाकर दलित मतदाताओं को भड़काया जा रहा है और हिंदू समाज में दरार डालने की कोशिश हो रही है।

क्योंकि उनके लिए एकजुट हिंदू पहचान राजनीतिक रूप से खतरनाक है, खासकर जब सनातन धर्म से जुड़ी हो।

जब कुछ इस्लामी कट्टरपंथी ‘सर तन से जुदा’ जैसे नारे लगाते हैं, तब न तो वामपंथी सोच वाले लोग कुछ कहते हैं और न ही सुप्रीम कोर्ट इस्लामी विचारधारा पर कोई सवाल करता है। लेकिन जब कोई हिंदू अपनी आस्था की बात करता है तो सारा दोष उसी पर डाल दिया जाता है।

नूपुर शर्मा विवाद के दौरान दोहरापन साफ नजर आया। जब भीड़ खुलेआम सिर काटने की धमकी दे रही थी, पुतले फूँके जा रहे थे और मौत की माँग हो रही थी। तब सुप्रीम कोर्ट की मौखिक टिप्पणी ने चौंका दिया। कोर्ट ने कहा- “देश में जो हो रहा है, उसके लिए अकेली नूपुर शर्मा जिम्मेदार हैं।”

यानि कट्टरपंथी सड़कों पर खून माँग रहे थे लेकिन चर्चा का केंद्र बन गई एक महिला, जिसने उनके ही धर्मग्रंथों से उद्धरण दिया था। और वही वामपंथी-उदारवादी जमात, जो हर हिंदू विरोधी फिल्म पर ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ का रोना रोती है, उस वक्त ‘सर तन से जुदा’ के नारों पर पूरी तरह चुप हो गई।

तब भारत के तथाकथित ‘धर्मनिरपेक्ष जमीर’ वालों में से किसी ने दंगाइयों की निंदा करने की हिम्मत नहीं दिखाई। उल्टा, उन्होंने नूपुर शर्मा को ही दोषी ठहराना आसान और फैशनेबल समझा, जैसे देश को आग लगाने वाली वही थीं। लेकिन आज जब एक भावनात्मक और निंदनीय प्रतिक्रिया सामने आती है तो उसे जातिवादी हमला बताकर नया नैरेटिव खड़ा किया जा रहा है। यही है सोच का असली विरोधाभास।

सामान्य संदिग्ध: इंदिरा जयसिंह से लेकर सबा नकवी तक और अनगिनत ऑनलाइन ट्रोल

अपनी आदत से मजबूर कार्यकर्ता और वकील इंदिरा जयसिंह ने जूता फेंकने वाली घटना को ‘जातिवादी हमला’ घोषिक करने में कोई संकोच नहीं किया। 
किस आधार पर? किसी भी नहीं। न कोई जातिसूचक शब्द बोला गया, न कोई अपमानजनक टिप्पणी, न ही कोई जाति का जिक्र। लेकिन सच्चाई से किसी की नैरेटिव क्यों बिगाड़े?
सबा नकवी, वही ‘पत्रकार’ जिन्होंने ज्ञानवापी मस्जिद में मिले शिवलिंग का मजाक उड़ाते हुए उसे परमाणु मॉडल से तुलना करने वाला मीम शेयर किया था। उन्होंने इस बार भी अपनी ‘धर्मनिरपेक्ष बुद्धिमत्ता’ का परिचय देते हुए कहा कि इस घटना के ‘साफतौर पर सामाजिक पहलू’ हैं।
उदारवादी शब्दावली में ‘सामाजिक आयाम’ का मतलब है- हमारे पास साक्ष्य नहीं है लेकिन हम संदर्भ का आविष्कार कर लेंगे।
कॉन्ग्रेस और विपक्षी दलों के मुद्दों को आगे बढ़ाने वाले कई सोशल मीडिया ट्रोल्स ने भी इस मुहिम में शामिल होकर आरोप लगाया कि यह एक दलित CJI के खिलाफ ‘जातिवादी हमला’ है।

पहचान की राजनीति के खतरनाक परिणाम

यहाँ सबसे दुखद बात यह है कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोग आस्था के प्रति संवेदनशीलता कैसे दिखाएँ। इस असली सवाल को पहचान की राजनीति की आँधी में दबा दिया गया है।
इस पर चर्चा करने के बजाए कि क्या CJI गवई की पिछली टिप्पणी उच्च संस्थानों में हिंदू भावनाओं के प्रति बढ़ती असंवेदनशीलता को दर्शाती है। बात को मोड़कर एक और ‘दलित पीड़ित’ की कहानी बना दी गई।
यह सिर्फ बौद्धिक बेईमानी नहीं है, बल्कि समाज के लिए नुकसानदेह भी है। इससे यह संदेश जाता है कि अगर कोई हिंदू अपनी धार्मिक चोट को सामने रखता है तो उसे भी गलत ठहराया जाएगा। जब तक कि वह वामपंथी जातिगत गणित में फिट न बैठे।

आस्था कोई जातिगत विशेषाधिकार नहीं

यह याद दिलाना जरूरी है कि सनातन धर्म किसी एक जाति की जागीर नहीं है। जिस आस्था की बात उस वकील ने की है, वह दलितों, ब्राह्मणों, पिछड़ों और आदिवासियों की समान रूप से है। अयोध्या से लेकर तिरुपति तक देशभर के मंदिरों में दलित श्रद्धालु बड़ी संख्या में जाते हैं। संत रविदास से लेकर चोखामेला तक कई दलित संत हिंदू आध्यात्मिक परंपरा के केंद्र में रहे हैं।
जब कोई कहता है, ‘सनातन का अपमान नहीं सहेंगे’ तो वह किसी जाति की नहीं बल्कि एक सभ्यता की पहचान की बात करता है। उसे जातिवाद में बदल देना सिर्फ आलसी सोच नहीं है बल्कि यह सनातन धर्म की उस आत्मा का अपमान है जो जाति और पंथ से ऊपर है।

जूता विरोध और न्यायिक स्वतंत्रता पर वामपंथियों का दोहरा मापदंड

विडंबना देखिए कि जो वामपंथी इकोसिस्टम आज CJI गवई पर जूता फेंकने को लेकर शोर मचा रही है, वही लोग सालों तक ऐसे ही कृत्यों को ‘विरोध का जायज तरीका’ बताकर सराहते रहे हैं। जब किसी नेता, पत्रकार या सार्वजनिक व्यक्ति पर जूता फेंका गया तो उसे प्रतिरोध का प्रतीक बना दिया गया। मीम बनाए गए, ट्वीट्स में तालियाँ बजीं और जूता फेंकने वालों को ‘फासीवाद के खिलाफ बहादुर लड़ाके’ कहकर महिमामंडित किया गया।
साल 2009 में पत्रकार जरनैल सिंह ने उस वक्त के गृह मंत्री पी चिदंबरम पर प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जूता फेंका था। यह विरोध था साल 1984 के सिख विरोधी दंगों में आरोपित दो कॉन्ग्रेस नेताओं को CBI द्वारा क्लीन चिट दिए जाने के खिलाफ।
उस समय कई उदारवादी हलकों ने जरनैल सिंह को राजनीतिक अन्याय के खिलाफ साहसी प्रतिरोध का प्रतीक बताया। इसी तरह 2008 में इराकी पत्रकार मुन्तज़र अल-ज़ैदी ने अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश पर जूते फेंके थे। वामपंथी खेमे ने इसे अमेरिका के इराक पर कब्जे के खिलाफ प्रतिरोध की मिसाल बताया।
लेकिन जैसे ही निशाना एक दलित CJI बन गया और विरोध करने वाला व्यक्ति सनातन धर्म की रक्षा में खड़ा था। वामपंथी नैतिकता की दिशा ही बदल गई। वही जूता फेंकने की हरकत, जिसे पहले ‘विरोध का साहसिक तरीका’ कहा गया था, अब ‘दलित गरिमा पर हमला’ बन गई। उनकी यह चुनिंदा नाराजगी साफ दिखाती है कि उनके लिए विरोध की स्वीकार्यता सिद्धांतों से नहीं बल्कि विचारधारा से तय होती है।
यह बात भी गौर करने लायक है कि वामपंथी खेमे ने कभी न्यायपालिका का सम्मान नहीं किया जब उसने उनकी विचारधारा की गूँज नहीं दोहराई। पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़, जिन्हें कभी ‘प्रगतिशील प्रतीक’ माना जाता था, उन्हीं बुद्धिजीवियों के निशाने पर आ गए जब उन्होंने श्रीनिवासन जैन को दिए इंटरव्यू में वह चर्चित टिप्पणी की- “बाबरी मस्जिद का निर्माण ही अपवित्रता का मूल कार्य था।”
बस यही एक वाक्य काफी था कि जो व्यक्ति कभी उदारवादी ड्रॉइंग रूम्स का चहेता था, वह अचानक तीखी आलोचना का शिकार बन गया। वामपंथी पोर्टलों में एक के बाद एक लेख आए, जिनमें उनकी ‘धर्मनिरपेक्षता’ पर सवाल उठाए गए। कुछ ने तो उनके बयान को ‘खतरनाक’ और ‘पिछड़ापन दर्शाने वाला’ तक कह दिया।
तो जब वही जमात अचानक CJI गवई पर हुए जूता फेंकने की कोशिश पर आँसू बहाने लगती है तो यह न्यायपालिका की गरिमा या संस्थागत सम्मान की चिंता नहीं होती। यह सिर्फ एक राजनीतिक मौका होता है, एक ऐसा मौका जिससे सार्वजनिक बहस में जाति का तड़का लगाया जा सके और ‘दलित पीड़ित’ की पुरानी कहानी को फिर से दोहराया जा सके।
वामपंथी खेमे को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि CJI पर हमला हुआ। उन्हें सिर्फ इस बात की परवाह है कि इस घटना को कैसे हिंदू समाज में दरार डालने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है और जाति की राजनीति को गर्म रखा जा सके।

क्या यह वास्तव में जातिवादी हमला था या हिंदू एकता को कमजोर करने की वामपंथियों की हताशा?

हाँ, उस वकील का व्यवहार बेहद अनुचित था और कानून के अनुसार उसे सजा भी मिलनी चाहिए। लेकिन इस घटना पर जो प्रतिक्रिया सामने आई, वह भारत के बुद्धिजीवी वर्ग की एक और चिंताजनक तस्वीर दिखाती है कि उनका पहला स्वभाव समझने का नहीं बल्कि बाँटने का होता है।
किसी एक भी वामपंथी विचारक ने इस मुद्दे को गहराई से देखने या संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की कोशिश नहीं की। किसी ने एक आसान सवाल पूछना भी जरूरी नहीं समझा- उस वकील ने ऐसा क्यों किया? उसे किस बात ने उकसाया? उस समय उसकी मानसिक स्थिति क्या थी? अगर सिर्फ उसके इरादे को समझने की कोशिश की जाती, तो तस्वीर काफी हद तक साफ हो सकती थी।
आत्मचिंतन कभी वामपंथी खेमे की ताकत नहीं रही। तथ्य जानने की कोशिश करने के बजाए उन्होंने तुरंत हंगामा खड़ा कर दिया और इस घटना को ‘दलित CJI पर जातिवादी हमला’ कहकर प्रचारित करने लगे। न मंशा की परवाह की गई, न हालात की, बस नैरेटिव चलाना था। उनके लिए हिंदू की आस्था कट्टरता है लेकिन मुस्लिम की चोट ‘न्यायसंगत गुस्सा’ बन जाती है।
कोर्ट में एक 71 साल के वकील ने शायद जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया दी हो लेकिन उससे भी बड़ा अपराध है उन बुद्धिजीवियों की बौद्धिक बेईमानी, जिन्होंने इस घटना को हथियार बनाकर एक बार फिर हिंदू समाज को बाँटने की कोशिश की।

कर्नाटक : जो मस्जिद में नमाज़ नहीं पढ़ सकती मंदिर में पूजा कैसे करवा रही है? क्या बानू मुश्ताक एक्स-मुस्लिम है? नहीं ‘पाप’ का भागी केवल व्याध (कांग्रेस+सुप्रीम कोर्ट), सुषुप्त हिंदुओं का भी समय लिखेगा ‘अपराध’

              बानू मुश्ताक ने मैसूर दशहरा महोत्सव का किया उद्घाटन (फोटो साभार: X/@publictvnews)
वह मुस्लिम है। पर मस्जिद में नमाज नहीं पढ़ सकती। क्योंकि वह मुस्लिम होने के साथ-साथ औरत भी है। कुछेक मस्जिदों में उसे नमाज पढ़ने का हक मिला भी है तो शर्तों के साथ। मसलन, पर्दे में रहना, सुगंध न लगाना, अलग कमरा… वगैरह वगैरह। लेकिन एक गैर हिंदू (मुस्लिम महिला) आपके मंदिर में प्रवेश कर नवरात्र के आपके आगमिक अनुष्ठानों का प्रारंभ कर सकती है। क्योंकि कांग्रेस और इस देश की अदालतें ऐसा चाहती हैं। क्योंकि इस देश का हिंदू सुषुप्त है।

सोमवार (22 सितंबर 2025) को कलश स्थापना के साथ हिंदुओं की आस्था के महत्वपूर्ण पर्व नवरात्रि का प्रारंभ हुआ। लेकिन इसी दिन कांग्रेस शासित कर्नाटक से एक ऐसा वीडियो आया है जो हिंदुओं की आस्था पर सीधा प्रहार है। बानू मुश्ताक ने चामुंडेश्वरी मंदिर में प्रवेश कर मैसूर के विश्व प्रसिद्ध दशहरा महोत्सव का प्रारंभ किया है।

कहाँ है हिन्दू स्वयंसेवी संस्थाएं? क्यों नहीं हिन्दू स्वयंसेवी संस्थाओं ने हिन्दुओं को एकजुट कर माता की आरती करने का विरोध किया? कांग्रेस जेल में ही तो भेजती कृष्ण ने भी जेल में जन्म लेकर अपनी लीला खेलनी शुरू कर दी थी। अगर बानू मुश्ताक इस्लाम छोड़ एक्स-मुस्लिम बन गयी है बात दूसरी है क्योकि एक्स-मुस्लिम मंदिरों में जाकर पूजा अर्चना आदि करते हैं।     

ऐसा नहीं है कि लेखिका बानू मुश्ताक की हिंदुत्व में आस्था है। उनकी देवी पूजा में आस्था है। जैसा कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य प्रियांक कानूनगो ने इस घटना को लेकर टिप्पणी करते हुए कहा भी है, “कन्नड़ भाषा को देवी के रूप में पूजने पर स्वयं के मुस्लिम होने के नाते मजहबी ऐतराज जताने वाली लेखिका मुश्ताक बानो को कर्नाटक सरकार ने मैसूर दशहरा समारोह का अतिथि बना कर आमंत्रित किया है।”

बानू मुश्ताक इतने अव्वल दर्जे की सेकुलर हैं कि इस्लाम में औरतों की स्थिति पर वह केवल चुप्पी ही नहीं ओढ़ती हैं, बल्कि वह प्रयास करती हैं कि औरतों के साथ भेदभाव का ठीकरा भी सनातन की कथित परंपराओं पर फोड़ा जा सके। ऐसे में सीधा सवाल यह है कि जिसकी सनातन में कोई आस्था नहीं है, उसे माँ चामुंडेश्वरी के अनुष्ठान में शामिल क्यों किया गया? वैदिक मंत्रोच्चार के बीच माँ की पवित्र मूर्ति पर पुष्प अर्पित करने की अनुमति कैसे दी गई?

चामुंडी पहाड़ियों पर स्थित इस मंदिर में विराजमान माँ चामुंडेश्वरी, मैसूर राजघराने की अधिष्ठात्री देवी हैं। भले कर्नाटक की कांग्रेस सरकार मैसूर के दशहरा महोत्सव को ‘राजकीय यानी सरकारी’ कार्यक्रम बताए। भले हिंदुओं की याचिका खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट भी इसे ‘सरकारी कार्यक्रम’ कह दे। पर सच्चाई यह है कि यह​ सदियों से चला आ रहा एक आगमिक अनुष्ठान है।

हमारे मंदिर, हमारे अनुष्ठान, हमारी परम्पराएँ किसी व्यक्ति या सरकार की बपौती नहीं हैं। सरकारी कार्यक्रम बताकर हमारी आस्थाओं से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता है। इनकी व्याख्या कोई अपनी सहूलियत के हिसाब से नहीं कर सकता। बावजूद एक विधर्मी महिला ने हमारे मंदिर में प्रवेश किया, हमारे अनुष्ठान की पवित्रता और गरिमा को भंग किया।

क्या इसकी दोषी केवल कांग्रेस है? यकीनन नहीं। अतीत में ऐसे सैकड़ों उदाहरण भरे पड़े हैं जब हिंदुओं की आस्थाओं पर प्रहार कर कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टिकरण किया है। फिर क्या इसकी दोषी कर्नाटक की वह जनता नहीं, जिसने कांग्रेस को अपनी आस्था पर प्रहार का यह मौका प्रदान किया है?

क्या हम इस मामले में अदालतों के भरोसे रहे सकते हैं? यकीनन नहीं। बानू मुश्ताक को आमंत्रित करने के कर्नाटक सरकार के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। उसने याचिका खारिज कर दी। फिर हिंदू सुप्रीम कोर्ट गए। परिणाम नहीं बदला। वैसे भी जिस देश का मुख्य न्यायाधीश एक याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी करे कि ‘अपने भगवान से कहो कि वे भी अपने लिए कुछ करें’, उस देश की न्यायपालिका से उम्मीद करना अपने कर्तव्यों से भागने जैसा है। 

अवलोकन करें:-

सुप्रीम कोर्ट आखिर कब तक हिन्दुओं का मजाक बनाती रहेगी? गैर हिंदू नहीं कर सकते चामुंडेश्वरी मंद
सुप्रीम कोर्ट आखिर कब तक हिन्दुओं का मजाक बनाती रहेगी? गैर हिंदू नहीं कर सकते चामुंडेश्वरी मंद
 

इस क्षण के लिए दोषी माँ चामुंडेश्वरी मंदिर के वे पुजारी भी हैं, जिन्होंने बानू मुश्ताक के हाथों में पूजा की थाली थमाई। पवित्र मूर्ति पर चढ़ाने के लिए उन्हें पुष्प भेंट किया। उन्हें आरती दी। दोषी मैसूर के वे हिंदू भी हैं जिन्होंने इस क्षण को आने से रोकने के लिए विरोध के अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल नहीं किया। इस क्षण के लिए हर एक हिंदू दोषी है। क्यों नहीं पुजारी और मौजूद हिन्दुओं ने इसका विरोध किया? क्या हर धार्मिक अनुष्ठान के लिए हिन्दू अदालतों पर निर्भर रहेगा? हिन्दुओं को मालूम होना चाहिए कि जब तक सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम तुष्टिकरण की जनक कांग्रेस समर्पित जजों और कपिल सिबल, अभिषेक मनु सिंघवी और प्रशांत भूषण जैसे हिन्दू विरोधी वकीलों के भरमार रहेगी कोर्ट से न्याय नहीं मिलेगा। क्या हिन्दू इतना नपुंसक हो गया है कि सच्चाई के एकजुट होकर विरोध कर सकते? इस पाप का पाश्ताचाप उन्हें ही करना होगा। कांग्रेस या न्यायापालिका को कोस कर हम अपने कर्तव्यों से भाग नहीं सकते।

भगवान श्रीकृष्ण की फोटो पोस्ट कर की गंदी बातें, ​तमिलनाडु पुलिस पता भी नहीं लगा पाई: हाई कोर्ट ने लगाई क्लास, कहा- हिंदू देवी-देवताओं का अपमान नहीं कर सकते

                                            भगवान श्रीकृष्ण के अपमान पर मद्रास हाई कोर्ट सख्त
फेसबुक पर भगवान श्रीकृष्ण की फोटो पोस्ट कर एक व्यक्ति ने अपमानजनक बातें की। तमिलनाडु पुलिस ने इस मामले में फाइनल रिपोर्ट यह कहते हुए दाखिल कर दी कि ‘आरोपित’ का पता नहीं चल सका है। मद्रास हाई कोर्ट ने इस पर फटकार लगाते हुए कहा है कि हिंदू देवी-देवताओं का अपमान नहीं किया जा सकता है।

अदालत ने यह भी कहा है कि बोलने की स्वतंत्रता का मतलब हिंदुओं की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाना नहीं है। इससे धार्मिक आक्रोश भड़क सकता है और कानून व्यवस्था के लिए खतरा पैदा हो सकता है। मजिस्ट्रेट कोर्ट की रिपोर्ट को रद्द कर पुलिस को तीन महीने के भीतर जाँच कर इस मामले में रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है।

हाई कोर्ट ने कहा है कि तूतीकोरिन पुलिस ने जाँच में लापरवाही की है। फाइनल रिपोर्ट जल्दबाजी में दाखिल की है। उल्लेखनीय है कि सतीश कुमार नाम के व्यक्ति ने अगस्त 2022 में फेसबुक पर यह अपमानजनक पोस्ट की थी। उसने भगवान कृष्ण द्वारा गोपियों के वस्त्र चुराने की तस्वीर के साथ अभद्र कैप्शन लिखे थे।

भगवान श्रीकृष्ण के अपमान पर मद्रास हाई कोर्ट सख्त

बार ऐंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, हाई कोर्ट ने कहा कि देवी-देवताओं के चित्रण को लेकर ज्यादा संवेदनशीलता बरतनी चाहिए और सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना न हो। जस्टिस के मुरली शंकर ने 4 अगस्त के आदेश में कहा है, “हिंदू देवी-देवताओं को अपमानजनक तरीके से दिखाना, जानबूझकर लाखों-करोड़ों लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँचाना है। इसे किसी भी तरह सही नहीं ठहराया जा सकता। इससे धार्मिक शत्रुता और सामाजिक अशांति फैल सकती है।”

उन्होंने कहा, “धार्मिक प्रतीकों और देवी-देवताओं के प्रति गहरी आस्था को देखते हुए उनका अपमान समाज के बड़े हिस्से को आहत कर सकता है और सामाजिक अशांति फैल सकती है। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना न हो।”

अदालत ने कहा कि भगवान कृष्ण द्वारा गोपियों के कपड़े छिपाने की कहानी एक प्रतीकात्मक कथा है। इसकी कई तरह से व्याख्या की जाती है। इनमें से एक के अनुसार यह जानने के लिए भगवान ने परीक्षा ली थी कि क्या गोपियों की भक्ति सांसारिक मोह-माया से ऊपर है? कोर्ट ने कहा, “यह कहानी आध्यात्मिक साधना और विरक्ति के महत्व को दर्शाती है।”

भगवान श्रीकृष्ण को लेकर किया था अपमानजनक पोस्ट

सतीश कुमार नामक व्यक्ति के अकाउंट से टिप्पणी की गई थी कि कृष्ण जन्माष्टमी उनका त्योहार है, जिन्होंने नहाती हुई महिलाओं के कपड़े चुरा लिए थे। इस मामले में पी. परमेसिवन नामक शख्स ने शिकायत दर्ज कराई थी कि यह पोस्ट हिंदू देवी-देवताओं के अपमान के इरादे से की गई है। शिकायतकर्ता ने यह भी चिंता जताई थी कि यह पोस्ट कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगाड़ सकती है।

इसी साल फरवरी में पुलिस ने निचली कोर्ट में ‘निगेटिव फाइनल रिपोर्ट’ दाखिल की। इसमें कहा गया कि उन्होंने पोस्ट अपलोड करने वाले फेसबुक यूज़र की जानकारी के लिए मेटा से संपर्क किया। लेकिन उन्हें यूज़र की जानकारी नहीं मिल पाई। ट्रायल कोर्ट ने पुलिस की इस निगेटिव रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया और मामले को बंद कर दिया गया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी।

तमिलनाडु पुलिस को हाई कोर्ट ने फटकारा

हाई कोर्ट ने इस मामले में एमके स्टालिन सरकार की पुलिस को फटकार लगाई है कि उन्होंने गंभीरता नहीं दिखाई। कोर्ट ने पुलिस को आदेश दिया है कि फिर से जाँच शुरू कर 3 महीने के भीतर फाइनल रिपोर्ट दाखिल करे। हाई कोर्ट ने कहा, “गंभीर आरोपों के बावजूद पुलिस ने मामले को लापरवाही से देखा, जाँच रोक दी और इसे ‘अनडिटेक्टेड’ बताकर बंद कर दिया।”

हाई कोर्ट ने कहा कि पुलिस ने जाँच सिर्फ फेसबुक से जानकारी माँगने तक सीमित रखा। कोर्ट ने बताया कि जिस फेसबुक पेज की बात हो रही है, उस पर पहले से कुछ निजी जानकारी मौजूद थी जिसे देखकर फेसबुक यूजर को खोजा जा सकता था। हाई कोर्ट ने कहा कि जाँच को गंभीरता से नहीं किया गया और फाइनल रिपोर्ट बस औपचारिक तौर पर दाखिल कर दी गई।

हाई कोर्ट ने मजिस्ट्रेट को लेकर कहा कि उन्होंने केस बंद करते समय फाइनल रिपोर्ट पर उठाए गए आपत्तियों पर ध्यान ही नहीं दिया। हाई कोर्ट ने कहा कि फाइनल रिपोर्ट को स्वीकार करने का मजिस्ट्रेट का आदेश कानूनी रूप से सही नहीं था।

आखिर कब तक जेहादी उर्फ़ आतंकी हिन्दू त्यौहारों पर उपद्रव करते रहेंगे? संत तुकाराम-संत ज्ञानेश्वर की पालकी लेकर पुणे में यात्रा कर रहे थे हिंदू, मुस्लिम महिला ने फेंके माँस-हड्डियों के टुकड़े: कहा- किसी से डरती नहीं, जो करना है कर लो; क्या फर्क इस जेहादी और आतंकवादी में?

               पुणे में आषाढ़ी वारि जुलूस पर फेंका गया माँस का टुकड़ा (साभार- the free press journal)
जब तक केन्द्र और राज्य सरकारें इन जेहादियों को आतंकवादियों के बराबर मान कार्यवाही नहीं करेगी हिन्दुओं को अपने त्यौहार मनाने मुश्किल हो जाएंगे। मोदी सरकार ने पहलगाम का बदला इसलिए लिया था कि आतंकी पाकिस्तान से थे? लेकिन अपने घर में जो आतंकी पल रहे उन पर क्यों नहीं कार्यवाही की जाती? ये जेहादी मोदी सरकार को वोट नहीं देने वाले, मोदी सरकार इस ग़लतफ़हमी नहीं रहे कि इनके वोट मिल जाएंगे। कितने समय से हिन्दू त्योहारों पर अड़चने डाली जा रही है और सरकारें खामोश बैठी है। जो कार्यवाही होती है उसे कार्यवाही नहीं मुंह पोंछना कहते हैं। मुस्लिम तुष्टिकरण करने वाला विपक्ष पता नहीं किस मातम में है। सब के सब अब सूरदास बने बैठे हैं। अगर स्थिति विपरीत देखों किस तरह कालनेमि सियापा कर रहे होते। सड़क से लेकर संसद तक चील-कौओं की तरह चीख-चीखकर विधवा विलाप कर रहे होते। अब सब बेशर्म हिन्दू विरोधियों के घरों में मातम हो रहा है क्या?      

पुणे के कैंप इलाके में हिन्दुओं में काफी गुस्सा है। दरअसल 21 जून को साल में एक बार निकलने वाली आषाढ़ी वारी तीर्थयात्रा निकली थी। इस दौरान 57 साल की नसीम शेख ने तीर्थयात्रियों पर हड्डियाँ और माँस के टुकड़े फेंक दिए।

नसीम शेख सोलापुर रोड पर मम्मा देवी चौक के पास गैबीपीर दरगाह के पास अपनी झोपड़ी के बाहर खड़ी थी। सालाना आषाढ़ी वारि इस रास्ते से होकर गुजरता है जो पंढरपुर तक जाता है। इसे पंढरपुर आषाढ़ी वारि भी कहा जाता है। महाराष्ट्र में इस जुलूस का हिन्दुओं के लिए काफी महत्व है। सदियों पुरानी इस परंपरा में भक्त संत तुकाराम और संत ज्ञानेश्वर की पालकी लेकर जाते हैं। इसका समापन आषाढ़ी एकादशी के दिन भगवान विट्ठल मंदिर में होता है।

नसीम शेख के खिलाफ छत्रपति संभाजीनगर के रहने वाले अक्कलवंत राठौड ने एफआईआर दर्ज कराई है। एफआईआर के मुताबिक, ” ये घटना दिनदहाड़े हुई जब जुलूस इलाके से गुजर रहा था। राठौड़ ने बताया कि माया धूमल नाम की भक्त जुलूस में शामिल थी जिसे नसीम शेख की फेंकी गई एक पोटली से चोट लगी। इसमें हड्डियाँ और माँस के टुकड़े थे। जब राठौड़ ने शेख से बात की तो वह गालियाँ देने लगी और कहा, ” जो चाहो करो, मैं डरने वाली नहीं हूँ। ” इस घटना से भक्तों में काफी गुस्सा है।

महाराष्ट्र सरकार ने आषाढ़ी वारि जुलूस के लिए कई नियम लागू किए हैं। इस दौरान जुलूस के गुजरने वाले क्षेत्र में माँस और शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसके अलावा पंढरपुर में भी माँस-मदिरा की बिक्री बंद है।

वारि जुलूस में दूर-दूर से आकर लोग शामिल होते हैं। हर समुदाय में लोकप्रिय इस जुलूस पर सुरक्षा व्यवस्था का खास ख्याल रखा जाता है। लेकिन नसीम शेख के फेंके गए माँस और हड्डियों के टुकड़े ने लोगों को उकसाने का काम किया है।

पिछले कई सालों से इस तरह की घटनाएँ सामने आई हैं, जहाँ हिन्दू मंदिरों के बाहर या धार्मिक कार्यक्रम में माँस, हड्डियाँ, गाय के सिर फेंके गए। असम के धुबरी जिले में मुस्लिम कट्टरपंथियों ने इस साल बकरीद के दौरान दो बार हनुमान मंदिर के बाहर गाय के सिर फेंके गए। घटना के बाद राज्य सरकार ने देखते ही गोली मारने के आदेश देने पड़े। बदरपुर और लखीपुर के शिव मंदिरों के पास भी माँस के टुकड़े मिले थे। इसके बाद कई मुस्लिम कट्टरपंथियों को गिरफ्तार किया गया था।

यूपी के लखनऊ, प्रयागराज, अमेठी और सोनभद्र के मंदिरों के बाहर भी ऐसी ही घटनाएँ सामने आईं। इसके बाद इलाके में तनाव फैल गया। इस साल मार्च में भी महाकुंभ मेले के बाद हिन्दू घरों के बाहर गाय के कटे सिर मिले, जो सोची-समझी साजिश की ओर इशारा करती है।

ये पूरा पैटर्न यूपी से असम तक फैल गया है। राजस्थान, दिल्ली, मध्यप्रदेश और झारखंड के पास हिन्दू समारोह में माँस फेंकने की खबरें आई हैं। कई बार सीसीटीवी फुटेज में पुलिस ने आरोपियों को ऐसा कर बाइक या पैदल भागते हुए देखा गया।

दरअसल कुछ इस्लामिक कट्टरपंथी संगठन लगातार हिन्दू धार्मिक स्थलों, समारोहों को अपवित्र करने और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने की साजिश कर रहे हैं। बार-बार ऐसी होने वाली घटनाओं के बावजूद सख्ती बरतने में राजनीतिक हिचकिचाहट ऐसे तत्वों को बढ़ावा देता है।

तमिलनाडु : हिंदू महिला से परमिशन के बिना घुसा दिया कॉपर-टी… ताकि जनसंख्या न बढ़े

जबरन कॉपर टी लगाना हिन्दुओं की आबादी घटाने की साजिश बताने वाला हिंदूवादी नेता तमिलनाडु में गिरफ्तार (चित्र साभार- X/@EvaRomonov)
तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले में पुलिस ने रविवार (5 जनवरी 2025) को हिन्दू मुन्नानी संगठन के प्रदेश सचिव के कुट्रालनाथन को गिरफ्तार कर लिया है। उन पर सोशल मीडिया पर भ्रामक खबर फैलाने का आरोप लगाया गया है। के कुट्रालनाथन ने तिरुनेलवेली मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों पर आरोप लगाया था कि उन्होंने एक हिन्दू महिला की मर्जी के खिलाफ कॉपर टी लगा दी। कुट्रालनाथन ने इसे हिन्दुओं की आबादी कम करने की साजिश करार दिया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मूल रूप से मदुरै की रहने वाली 31 वर्षीया एक महिला नवंबर 2024 में तिरुनेलवेली मेडिकल कॉलेज अस्पताल (टीवीएमसीएच) में भर्ती हुई थी। 25 नवंबर को उसने एक बच्चे को जन्म दिया। बाद में महिला के पिता एस मारुथुपंडियन ने आरोप लगाया था कि उनकी बेटी की मर्जी के बिना कॉपर टी लगा दिया गया। महिला के पिता का यह भी दावा था कि कॉपर टी लगाने के दौरान उनकी बेटी को ब्लीडिंग हुई जिससे सेहत पर बुरा असर पड़ा।

महिला के पिता ने मेडिकल कॉलेज के स्टाफ पर हिन्दू महिलाओं से भेदभाव के आरोप लगाया था। उनका दावा था कि अस्पताल में किसी गैर हिन्दू महिला को कॉपर टी नहीं लगाई गई। इस बाबत उन्होंने एक शिकायती पत्र भी दिया। शिकायत में उन्होंने बताया कि उनकी बेटी को इतना खून निकला कि उसी के साथ कॉपर टी भी बाहर निकल आई। महिला के पिता की इसी शिकायत को हिन्दू मुन्नानी के प्रदेश सचिव कुट्रालनाथन ने सोशल मीडिया पर शेयर किया था।

के कुट्रालनाथन ने तिरुनेलवेली मेडिकल कॉलेज अस्पताल के डॉक्टरों की इस हरकत को हिन्दुओं की आबादी कम करने की साजिश करार दे डाला। उन्होंने अस्पताल के स्टाफ के खिलाफ जाँच और पीड़िता को मुआवजा देने की माँग उठाई। माँगों के पूरा न होने पर के कुट्रालनाथन ने TVMCH के आगे प्रदर्शन का भी ऐलान किया था। हिन्दू मुन्नानी के पदाधिकारी के इन आरोपों को अस्पताल प्रशासन ने बेबुनियाद बताया और पुलिस में शिकायत दर्ज करवा दी।

अस्पताल प्रशासन की इस शिकायत पर पुलिस ने के कुट्रालनाथन के खिलाफ FIR दर्ज कर ली। उन पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) में भ्रामक सूचना देने और अशाँति फैलाने की धाराओं 192, 196(1) और 352 के तहत कार्रवाई की गई है। रविवार को के कुट्रालनाथन को गिरफ्तार कर लिया गया। उनकी गिरफ्तारी के बाद हिंदू मुन्नानी और भाजपा के सदस्यों ने टीवीएमसीएच पुलिस स्टेशन के सामने विरोध प्रदर्शन किया। बाद में के कुट्रालनाथन को जमानत मिल गई।

इस बीच पीड़िता महिला ने भी टीवीएमसीएच के डीन और डॉक्टरों के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई है। अपनी शिकायत में पीड़िता ने बताया कि उन्हें बिना उनकी मर्जी के कॉपर टी लगाई गई है। इसी दौरान अस्पताल के कुछ कर्मचारियों ने पीड़िता से एक खाली फॉर्म पर दस्तखत भी करवा लिए थे। पुलिस ने इस शिकायत का संज्ञान ले कर जाँच शुरू कर दी है।

हिंदुओं से ये कैसी नफरत TOI-HT? : 15 साल की दलित नौकरानी की हत्या में गिरफ्तार हुआ मोहम्मद निशाद और उसकी बीवी, लेकिन मीडिया ने ‘दीवाली’ को घसीटा

   मार डाली गई नाबालिग नौकरानी की खबर में मीडिया घुसेड़ रही दीपावली का एंगल (प्रतीकात्मक चित्र- AI/LightX)
चेन्नई पुलिस ने 3 नवंबर 2024 को मोहम्मद निशाद और उसकी पत्नी नासिया को उनकी 15 साल की दलित नौकरानी की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया। कथित तौर पर मियाँ-बीवी नाबालिग नौकरानी को प्रताड़ित करते थे। गर्म तवा और सिगरेट से दाग देते थे। बुरी तरह पिटाई करते थे।

प्रताड़ना से जब नाबालिग दलित की मौत हो गई तो मुस्लिम दंपती घर छोड़कर भाग गया। पुलिस ने नाबालिग की लाश उनके घर के बाथरूम से बरामद की। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) और हिंदुस्तान टाइम्स (HT) जैसे मीडिया संस्थान इस घटना में भी ‘दीपावली’ को घसीटकर लाने में पीछे नहीं रहे। नाबालिग की लाश 31 अक्टूबर को बरामद की गई थी और इसी दिन दीपावली भी थी।

मीडिया ने हत्या को दीपावली से जोड़ा

TOI ने इस घटना के बारे में अपने सोशल मीडिया पोस्ट में ‘दीवाली’ शब्द को प्रमुखता से छापा है। इस पोस्ट में कहीं भी आरोपितों का नाम नहीं लिखा गया। टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने लिखा, “दीवाली के दिन 15 वर्षीया घरेलू सहायिका की उसके मालिकों द्वारा बेरहमी से पिटाई किए जाने के बाद मौत हो गई है। दंपती ने उसे सिगरेट से दागने सहित कई गंभीर चोटें पहुँचाई और मरने के लिए शौचालय में बंद कर दिया।”

                                                                    साभार- X/TOI

इसी रिपोर्ट में TOI ने आरोपितों के नाम दूसरे और तीसरे पैराग्राफ में बताए हैं।

                                                                     साभार- TOI

कमोबेश ऐसी ही हरकत हिंदुस्तान टाइम्स ने भी की है। HT मीडिया ने अपनी रिपोर्ट के शुरुआती पैराग्राफ में आरोपितों के नाम का कहीं भी जिक्र नहीं किया है। लेकिन इसी रिपोर्ट की शुरुआत में ही जोर-शोर से दीपावली का जिक्र किया गया है। बाद में इस रिपोर्ट में एक अलग सेक्शन बना कर आरोपितों के नाम खोले गए हैं। 

                                                      साभार- Hindustan Times

क्या है घटनाक्रम

यह घटना तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई के अमिनजीकराई थानाक्षेत्र की है। यहाँ मेहता नगर में 35 वर्षीय मोहम्मद निशाद और उनकी 30 साल की पत्नी नासिया ने 15 साल की नाबालिग लड़की को नौकरानी बना कर रखा था। निशाद और नासिया आए दिन लड़की को मारते-पीटते थे। कई बार उसे ये दोनों सिगरेट और गर्म तवे से जला चुके थे। मृतका के गले पर एक निशान भी मिला है, जिससे लगता है कि उसका गला घोंटा गया था।
नाबालिग लड़की मूलतः तंजावुर की रहने वाली है। उसके पिता की मौत हो चुकी है। वह अपनी विधवा माँ की मदद घरों में काम कर के कर रही थी। 31 अक्टूबर को भी नसिया और मोहम्मद निशाद ने नाबालिग को पीटा था। पिटाई से लड़की की मौत हो गई। दोनों ने लड़की के शव को बाथरूम में बंद कर दिया और फिर एक दोस्त के घर भाग गए।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतका को प्रताड़ित किए जाने का खुलासा हुआ है। नासिया और मोहम्मद निशाद की गिरफ्तारी के साथ पुलिस ने 4 अन्य लोगों को भी हिरासत में ले कर पूछताछ की है। इन चारों में एक भाई-बहन हैं, जिन्होंने पीड़िता को मोहम्मद निशाद के घर पर काम करने के लिए रखवाया था। इसके अलावा 2 अन्य वो पति-पत्नी हैं जिनके घर मोहम्मद निशाद और नासिया भागकर गए थे। आरोपितों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं के साथ पॉक्सो एक्ट में कार्रवाई की गई है।

52 साल में IAS बनने वाली शैलबाला मार्टिन: मंदिर के भजन से दिक्कत, स्कूल में ईसाई प्रार्थना से प्यार, मिशनरियों के धर्मांतरण का करती हैं बचाव

                  शैलबाला मार्टिन (बाएँ) को मंदिर के लाउडस्पीकरों से दिक्कत (फोटो साभार: न्यूज18/जागरण)
शैलबाला मार्टिन, मध्य प्रदेश की एक प्रमोटी आईएएस अधिकारी, पिछले कुछ समय से अपने ट्वीट्स और बयानों के कारण चर्चा में रही हैं। उन्हें मंदिर पर लगे लाउडस्पीकर ध्वनि प्रदूषण की वजह लगते हैं। मंदिर पर आवाज उठाने वाली शैलबाला मार्टिन ने क्या कभी मस्जिद के लाउडस्पीकर या चर्च में होने वाली गतिविधियों पर सवाल उठाए हैं? आइए, इस रिपोर्ट में हम उनके बयानों और सार्वजनिक जीवन पर एक नजर डालते हैं।

शैलबाला मार्टिन के हिंदू विरोधी बयान

शैलबाला मार्टिन अपने ट्वीट्स और सार्वजनिक बयानों के कारण कई बार विवादों में आ चुकी हैं। विशेषकर, हिंदू त्योहारों और मंदिरों के खिलाफ उनके ट्वीट्स पर लोगों में गुस्सा भर रहा है। हाल ही में उन्होंने मंदिरों पर लगे लाउडस्पीकरों को ध्वनि प्रदूषण फैलाने वाला बता दिया। शैलबाला ने लिखा, “मंदिरों पर लगे लाउडस्पीकर, जो कई कई गलियों में दूर तक स्पीकर्स के माध्यम से ध्वनि प्रदूषण फैलाते हैं, जो आधी-आधी रात तक बजते हैं, उनसे किसी को डिस्टर्बेंस नहीं होता?”
धार्मिक संवेदनशीलता के इस मुद्दे को लेकर कई लोग मानते हैं कि शैलबाला ने हिंदू मंदिरों में लाउडस्पीकर के उपयोग को निशाना बनाया, जबकि उन्होंने ईसाई प्रार्थनाओं और धार्मिक अनुष्ठानों पर कभी सवाल नहीं उठाया।
शैलबाला के इस ट्वीट पर लोगों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। विष्णु झा ने लिखा, “ईसाई मिशनरियों के टुकड़े पे पली बढ़ी औरत से क्या उम्मीद की जानी चाहिए। क्या ये औरत इस्लाम की कुरीतियों पे बोल सकती है। हिंदू धर्म को टारगेट करना सबसे आसान काम लगता है। इस मिशनरी औरत से हिजाब, हलाला, मुस्लिम बहुविवाह, ट्रिपल तलाक पे तो आज तक बोलते नहीं दिखा। ऐसी मिशनरी औरत तो…”
विष्णु झा के तीखे हमले को शैलबाला बर्दाश्त नहीं कर पाई और तुरंत ही मिशनरियों के बचाव में उतर गई। उसे अपनी परवरिश से जोड़ते हुए शैलबाला ने लिखा, “कम से कम मेरे माता पिता और मिशनरियों ने मुझे सभ्य भाषा का इस्तेमाल करना और निष्पक्ष रूप से बोलना तो सिखाया है। इसका मुझे गर्व है। अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने वालों के लिए यहाँ कोई जगह नहीं है। इसलिए आपको बाइज़्ज़त यहाँ से रवाना किया जा रहा है।”
यही नहीं, ईसाई मिशनरियों का गुणगान करने वाली शैलबाला मौका मिलते ही हिंदुओं पर हमला बोलना शुरू कर देती है, संदर्भ चाहे कितना भी अलग क्यों न हो। राजस्थान के सीकर में बलात्कार के मामले को सदफ अफरीन नाम की मुस्लिम आईडी से एक्स पर शेयर किया गया, तुरंत ही शैलबाला ने उस पर तंज कस दिया। शैलबाला ने तंज कसते हुए लिखा, “भेष देख मत भूलये, बुझि लीजिये ज्ञान। बिना कसौटी होत नहिं, कंचन की पहिचान।।” उनका तंज सीधे-सीधे भगवा वस्त्रों और हिंदू संतों की तरफ था।
हालाँकि बाबा बालकनाथ गिरफ्तार हो चुका है और उसका हिंदुओं ने जमकर विरोध किया है, लेकिन शैलबाला को सिर्फ हिंदुओं पर उंगली उठानी थी, तो उठा लिया और ईसाई मिशनरियों के कुकृत्यों पर चुप्पी साध ली। वो अलग बात है कि शैलबाला हिंदुओं पर तंज कसती हैं, तो उन्हीं के राज्य एमपी में कुछ समय पहले ही क्रिश्चियन मिशनरी के खेल बेनकाब हो रहे थे। ये मामला डिंडोरी जिले के समनापुर थाना क्षेत्र के जुनवानी गाँव का था, जहाँ रोमन कैथोलिक समुदाय के एक स्कूल की 8 छात्राओं से स्कूल के प्रिंसिपल, गेस्ट टीचर समेत कई लोगों पर छेड़छाड़ व अश्लीलता का आरोप लगा था।
स्कूल जबलपुर डायोकेसन एजुकेशन सोसाइटी (जेडीईएस) द्वारा चलाया जाता है। इस पूरे मामले का राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग ने भी संज्ञान लिया था, लेकिन शैलबाला मार्टिन के मुँह से एक शब्द भी नहीं निकला था। भले ही वो अप्रैल 2022 से एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर सक्रिय हैं, लेकिन ईसाई स्कूलों में रेप, धर्मांतरण जैसे मामलों पर वो खामोशी की चादर ओढ़ लेती हैं।

ईसाई मिशनरियों के मतांतरण का करती हैं बचाव

शैलबाला मार्टिन अपने ईसाई धर्म पर गर्व व्यक्त करती रही हैं और इस संबंध में उन्होंने कई विवादित बयान दिए हैं। उनका मानना है कि ईसाई मिशनरियाँ केवल शिक्षा और सेवा कार्यों के लिए जानी जाती हैं और उनके ऊपर लगे धर्मांतरण के आरोप निराधार हैं।
उन्होंने एक ट्वीट में लिखा, “अगर क्रिश्चियन स्कूलों में धर्मांतरण करवाया जाता तो आज हमारी आबादी का एक बड़ा हिस्सा क्रिश्चियन होता। क्रिश्चियन आबादी की यह वृद्धि आँकड़ों में परिलक्षित नहीं होती है।”
यह बयान मिशनरियों के बारे में फैले मिथकों और पूर्वाग्रहों का विरोध करने का उनका प्रयास था। ये अलग बात है कि क्रिश्चियर मिशनरी स्कूलों में शिक्षा देने के नाम पर मतांतरण की साजिशों के जाल गहरे तक फैले हैं। अभी हाल ही में मथुरा से एक मामला सामने आया, जिसमें मिशनरी स्कूल के लोग बड़े पैमाने पर मतांतरण करा रहे थे, खासकर स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के परिजनों और परिवार के। ऐसे अनगिनत मामले खंडवा से लेकर जबलपुर तक सामने आते रहे हैं।
ऑपइंडिया ने अपनी स्पेशल रिपोर्ट में बताया था कि किस तरह से मध्य प्रदेश के कोरबा में क्रिश्चियन मिशनरी और कॉन्ग्रेसी नेताओं की मिलीभगत से पूरा इलाका ही लैंड जिहाद का शिकार हो गया।
मतांतरण का बचाव करने वाली शैलबाला ने यूपी की एक घटना को लेकर फिर से मिशनरी स्कूलों को सही ठहराने की कोशिश की। ये घटना स्कूल के प्रिंसिपल द्वारा बच्ची के यौन शोषण से जुड़ी थी, जिस पर शैलबाला ने लिखा, “यही घटना अगर किसी कॉन्वेंट में हो गई होती तो नंगा नाच शुरू हो जाता।”

शैलबाला मार्टिन ने मिशनरी स्कूलों को क्लीनचिट तो दे दी, साथ ही हिंदुओं पर निशाना भी साध लिया। लेकिन वो इस बात पर चुप्पी साधे रखी कि मिशनरी स्कूलों में खुलेआम यौन शोषण, पैसों का लालच देकर मतांतरण जैसे अनेकों मामले सामने आ चुके हैं। ऑपइंडिया ने अपनी रिपोर्ट में साल 2022 में 15 ऐसे मामलों को सामने रखा था, जहाँ बच्चों को दबाव में ईसाई बनाया गया और उनका यौन शोषण भी किया गया।
ऐसा ही मामला दमोह से भी सामने आया, जहाँ क्रिश्चियन मिशनरी द्वारा संचालित स्कूल में मतांतरण के लिए दबाव डाले जाने की रिपोर्ट्स आई।
ये वही आईएएस हैं, जिन्हें मंदिर के लाउडस्पीकर से ध्वनि प्रदूषण की समस्या होती है, लेकिन शैक्षणिक संस्थान में जहाँ बच्चे पढ़ाई करते हैं, उसे शैलबाला मार्टिन जायज मानती हैं। उन्हें इसाई मिशनरियों की गाथा गाने से ही शायद फुरसत नहीं मिली, इसलिए इतनी बड़ी घटनाओं का ये कहकर बचाव करती रही, कि क्रिश्चियन प्रार्थना अपराध नहीं है। हालाँकि दोनों ही मामलों का संदर्भ अलग था, लेकिन ये शैलबाला की हिप्पोक्रेसी को जानने के लिए काफी है।

सरकारी सेवा में रहकर राजनीतिक बयानबाजी की भी आदत

यही नहीं, सरकारी सेवा में रहते हुए भी शैलबाला मार्टिन न सिर्फ सरकार की, बल्कि देश के बलिदानी अमर जवानों के बलिदान का भी मजाक उड़ाती रही हैं। पूर्व सीडीएस जनरल बिपिन रावत के बलिदान को लेकर किए गए ट्वीट पर जवाब देते हुए शैलबाला ने लिखा, “वैसे भी आदरणीय मिश्राजी शहीद तो अरबी भाषा का शब्द है। ये लोग इसे कैसे इस्तेमाल कर रहे हैं?” यह टिप्पणी एक ऐसे संदर्भ में आई थी जब सीडीएस बिपिन रावत के बलिदान पर चर्चा हो रही थी।
शैलबाला मार्टिन के ट्वीट्स और उनके विचारों ने उन्हें एक विशेष धार्मिक विचारधारा का समर्थक दिखाया है। खासकर सोशल मीडिया पर उनके कुछ पोस्ट्स को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि वे एक सरकारी अधिकारी होते हुए भी अपने धर्म के प्रति अत्यधिक लगाव और अन्य धर्मों के प्रति विरोधाभासी दृष्टिकोण रखती हैं। यह स्थिति तब और जटिल हो जाती है जब वे अपने ईसाई धर्म का बचाव करती हैं और ईशू के विचारों को एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर शेयर भी करती हैं।

कौन हैं शैलबाला मार्टिन?

शैलबाला मार्टिन का जन्म 9 अप्रैल 1965 को मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले में एक ईसाई परिवार में हुआ था। उनके माता-पिता धार्मिक और सामाजिक सेवाओं से जुड़े रहे, जिससे उनकी परवरिश में धार्मिक शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान रहा। शैलबाला ने अपनी शिक्षा इंदौर के होल्कर साइंस कॉलेज से प्राप्त की, जहाँ उन्होंने मास्टर ऑफ आर्ट्स (एम.ए.) की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने 2009 में मध्य प्रदेश राज्य सेवा में प्रवेश किया, जहाँ से 2017 में वे प्रमोट होकर भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में शामिल हुईं। वर्तमान में वे मध्य प्रदेश सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग में कार्यरत हैं।
इस मुद्दे पर संस्कृति बचाव मंच के अध्यक्ष पंडित चंद्रशेखर तिवारी ने शैलबाला मार्टिन पर सवाल उठाते हुए कहा कि मंदिरों में सुरीली आवाज में आरती और मंत्रों का उच्चारण होता है ना कि दिन में 5 बार लाउडस्पीकर पर अजान की तरह बोला जाता है। मेरा शैलबाला मार्टिन जी से सवाल है कि उन्होंने कब किसी मोहर्रम के जुलूस पर पथराव होते हुए देखा? जबकि हिन्दुओं के जुलूस पर पथराव हो रहा है और इसलिए मार्टिन मैडम आपको हिंदू धर्म की भावनाओं को ठेस पहुँचाने का कोई अधिकार नहीं है।

उत्तर प्रदेश ; #Boycott Coca Cola : अयोध्या की कोका-कोला फैक्ट्री में हिंदू कर्मचारियों को कलावा काटने को किया मजबूर, Video वायरल

                अयोध्या स्थित कोका कोला की फैक्ट्री में हिन्दू स्टाफ का कलावा काटा (चित्र साभार- बिजनेस टुडे)
जब से समाजवादी पार्टी ने फैज़ाबाद लोकसभा जीती है, जिसमे अयोध्या भी आती है, तब से INDI गठबंधन भाजपा पर कीजड़ फेंक रही है कि अयोध्या ने भी बीजेपी को हरा दिया। लेकिन इसके आलावा अब अयोध्या के इस पावन क्षेत्र में हिन्दू विरोधी गतिविधियों का चलन शुरू हो रहा है, जिस ओर केवल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनकी सरकार को ही नहीं जनता को भी सचेत होने की जरुरत है।  
 

उत्तर प्रदेश के अयोध्या जिले में स्थित कोका-कोला की फैक्ट्री ‘अमृत बॉटलर्स’ का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो में एक सुरक्षा गार्ड पर फैक्ट्री में काम करने वाले हिंदू कर्मचारियों के कलावे काटने का आरोप लगाया जा रहा है।

यह मामला सोमवार (23 सितंबर 2024) को सामने आया और इसे लेकर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। वीडियो में देखा जा सकता है कि गार्ड कर्मचारियों के हाथों में बंधे कलावे काटते हुए नजर आ रहा है। इसके चलते फैक्ट्री प्रबंधन पर धार्मिक भावनाओं के अपमान का आरोप लग रहा है।

यह घटना अयोध्या जिले के थानाक्षेत्र पूरा कलंदर स्थित कोका-कोला की फैक्ट्री में घटी। वीडियो में दिखाया गया है कि कई कर्मचारियों के हाथों से गार्ड ने कलावे काट दिए। कलावा, जिसे हिंदू धर्म में धार्मिक पहचान और आस्था का प्रतीक माना जाता है, को काटे जाने से वहाँ के कर्मचारियों में रोष फैल गया। वीडियो में कर्मचारियों और गार्ड के बीच हुई बहस को भी देखा जा सकता है, जिसमें कर्मचारियों ने अपने धार्मिक अधिकारों के उल्लंघन की बात की है।

वहीं, वीडियो में कलावा काटते दिख रहे सिक्योरिटी गार्ड ने जवाब दिया कि “ऊपर से ऑर्डर आता है, जिसका वो पालन करता है।” इस बीच लोगों ने सुपरवाइजर को बुलाने की बात कही। सुपरवाइजर के आने के बावजूद समाधान नहीं निकला। वीडियो बनाने वाले एक व्यक्ति ने गुस्से में कहा, “जहाँ हिन्दू धर्म का अपमान हो रहा हो, वहाँ मुझे काम ही नहीं करना। मैं चंद पैसों के लिए अपना धर्म भ्रष्ट नहीं कर सकता।” उन्होंने यह भी साफ किया कि वे नौकरी छोड़ने को भी तैयार हैं लेकिन अपने धार्मिक प्रतीकों का अनादर नहीं सहेंगे।

जैसे ही यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, फैक्ट्री प्रबंधन को सफाई देने के लिए सामने आना पड़ा। फैक्ट्री के जनसंपर्क अधिकारी अर्जुन दास ने मीडिया से बातचीत में कहा कि कलावा काटने का आदेश गुणवत्ता बनाए रखने के लिए दिया गया था। उन्होंने बताया कि फैक्ट्री में स्वच्छता और सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन किया जाता है, ताकि उत्पाद में किसी प्रकार की अशुद्धि न आए।

अर्जुन दास के अनुसार, यदि कलावा या कोई धागा गलती से बोतल में चला जाता है, तो यह कम्पनी के लिए हानिकारक साबित हो सकता है। फैक्ट्री के अधिकारियों ने यह भी दावा किया है कि इस वीडियो को वायरल कर संस्थान की बदनामी करने की कोशिश की गई है। अर्जुन दास का कहना है कि इस वीडियो के पीछे कुछ लोग हैं जो कंपनी की छवि को नुकसान पहुँचाना चाहते हैं।

उन्होंने यह भी बताया कि इस नियम के तहत कर्मचारियों को घड़ी, अंगूठी, और अन्य पहनावे भी हटाने पड़ते हैं। लेकिन कर्मचारियों का कहना था कि सिर्फ उन लोगों का सामान हटाया जाए जो सीधे तौर पर मशीनों के पास काम करते हैं, सभी कर्मचारियों पर यह नियम लागू करना उचित नहीं है।

विवाद बढ़ता देख फैक्ट्री प्रबंधन ने तुरंत कार्रवाई करते हुए सुरक्षा गार्ड को बर्खास्त कर दिया। फैक्ट्री के मुख्य सुरक्षा अधिकारी सच्चिदानंद तिवारी ने कहा कि वे खुद सनातनी हैं और कंपनी में सभी धर्मों का पूरा सम्मान किया जाता है। उन्होंने कहा कि यह घटना गलतफहमी की वजह से बढ़ी है और इसका उद्देश्य किसी भी धर्म का अपमान नहीं था। फिलहाल, अब तक इस मामले में किसी प्रकार की पुलिस कार्रवाई नहीं की गई है।