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‘इस्लाम की रोशनी’ पर ज्ञान देने से नहीं चला ओझा ‘सर’ का काम, अब देश में क्रांति के नाम पर कर रहे ‘मारने-काटने’ की बात: पूर्व AAP नेता का आतंकियों के बखान का रहा है इतिहास

UPSC एजुकेटर अवध प्रताप ओझा उर्फ ओझा सर ने देश में 'मार-काट' होने की भविष्यवाणी की (साभार: Salt by Lutyens)

जो न राजनीति में टिका, न शिक्षक के रूप में उसने आज तक ढंग की कोई बात कही। वह अब चला है देश का भविष्य तय करने। तो ये हैं हमारे UPSC एजुकेटर अवध प्रताप ओझा उर्फ ओझा सर। जिन्होंने फेमस होने के लिए, हिंदुओं के खिलाफ टिप्पणी भी की, इस्लाम की सराहना भी की, क्लासेज में सेक्सी-सेक्सी बातें भी कीं और यहाँ तक की आतंकवादी का बखान भी इन्होंने किया। लेकिन इतने विवादों के बाद भी करियर किसी क्षेत्र में सफल नहीं हुआ।
अरविन्द केजरीवाल ने राजनीति में कदम रखते ही कहा था कि "हाँ मै अराजक हूँ", जिसे उन्होंने अपनी कार्यशैली से एक बार नहीं कई बार साबित किया है। लेकिन महामूर्ख जनता मुफ्त रेवड़ियों के लालच में आम आदमी पार्टी को वोट देते रहते हैं। बिना इस्तीफा दिया बिना जेल में रहना, मुख्यमंत्री रहते किसी मंत्रालय का नहीं लेना लेकिन इसके हुक्म के बिना पार्टी में पत्ता नहीं हिलता। जाँच अधिकारीयों को लैपटॉप/मोबाइल का पासवर्ड नहीं बताना, अपनी ही महिला सांसद की अपने ही घर में पिटाई करवाना आदि आदि अराजकता के मुख्य प्रमाण हैं। ठीक यही हालत केजरीवाल पार्टी की है।      

इन सारे विवादित बयानों के बाद उन्होंने आम आदमी पार्टी (AAP) के टिकट पर दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 में हाथ आजमाया, यह सोचकर कि विवादों में ही सही, फेमस तो हुआ हूँ, लोग वोट कर ही देंगे। लेकिन लोगों को उनकी देश-विरोधी और हिंदू विरोधी बयानों की सच्चाई पता थी, तभी वह चुनाव हार गए। और अब दोबारा निकल पड़े हैं देश की तबाही की राह खोजने।

तो हाल ही में ओझा सर ने सॉल्ट बाय लुटियंस को इंटरव्यू दिया। इस इंटरव्यू का एक वीडियो क्लिप काफी चर्चा का विषय बना। वीडियो में ओझा सर ने US-इजरायल और ईरान के बीच जारी जंग का हवाला देते हुए भारत में ‘मार-काट’ होने की भविष्यवाणी कर दी। और बोला कि ऐसे में वह खुद चीन भाग जाएँगे।

ओझा सर के ‘मारकाट’ वाले बयान का संदर्भ

ओझा सर यह बात किस संदर्भ में कहते हैं उसे भी पहले जान लेना जरूरी है, क्योंकि यह बात एक शिक्षक की जुबान से सुनना काफी अटपटा लगता है। भारत में शिक्षा व्यवस्था को खराब बताते हुए ओझा कहते हैं, “यहाँ शिक्षा व्यवस्था ध्वस्त है। मेरी बेटियों के टीचर्स मुझसे शिकायत करते हैं कि पढ़ती नहीं हैं। हमने कहा कि क्या करोगे इतना पढ़ाकर… इंजीनियर, डॉक्टर हमें बनाना नहीं… हमें बनाना है नेता।”

यह बात वाकई में एक शिक्षक के जुबान से सुननी अटपटी लगती हैं। एक शिक्षक, जो छात्रों को बेहतर शिक्षा देकर एक बेहतर समाज तैयार करता है। अगर वह कहे कि पढ़ाई की क्या जरूरत, नेता बन जाओ। जैसे नेता तो पढ़े-लिखे होते ही नहीं, और अगर कुछ धारणाएँ और हकीकत ऐसी हैं भी। तो क्या इसे बदलना एक शिक्षक का कर्तव्य नहीं, या बच्चों के मन में ये भरना कि पढ़ो मत, नेता बन जाना। क्या इससे देश में कोई बदलाव आएगा?

ओझा सर शायद ही ऐसा सोच पाएँ, क्योंकि वह ठान कर बैठे हैं कि भारत माता को जय करने वाला हमारा देश एक ‘जंगल’ है। वह कहते हैं कि इस जंगल में या तो ‘शिकारी’ या फिर ‘शेर’ रहते हैं। एक शिक्षक की ऐसी भाषा न सिर्फ आक्रामक है, बल्कि पूरी व्यवस्था और समाज को नकारने वाली भी है। अगर एक शिक्षक ही देश के बारे में ऐसी सोच रखता है, तो वह छात्रों को क्या दिशा देगा।

अब ओझा सर की विशेष भविष्यवाणी

और बस यहीं ओझा सर क्रांति की बात शुरू करते हैं। भविष्यवाणी करते हैं कि शिक्षा व्यवस्था को ठीक करने के लिए एक क्रांति होगी। ओझा कहते हैं, “एक क्रांति होने जा रही है, भयंकर मार-काट होगी… इस देश में। इकोनॉमी और बैंकों का पतन होगा।”

इसके बाद खुद को दुनिया की राजनीति का ‘फर्जी’ एक्सपर्ट दिखाते हुए आगे कहते हैं, “ये ईरान और अमेरिका वाला युद्ध बढ़ जाए और गैस सिलेंडर की सप्लाई बंद हो जाए। तो ये दिल्ली, मुंबई, कोलकाता… यहाँ भूखा आदमी मरने से पहले मारेगा।”

ओझा सर ने यह तुलना फ्रांस और रूस की क्रांतियों से की, जब पहले विश्व युद्ध के दौरान 1917 में रूस में भूखमरी और खाद्यान्न की भारी कमी के कारण जनता ने विद्रोह किया था। ये ओझा सर की भविष्यवाणी कम और बददुआ ज्यादा नजर आती है। पहली बात तो भारत की स्थिति को उसी तराजू में रखना पूरी तरह गलत है, दूसरी बात ओझा सर को अंदाजा भी नहीं है कि ऐसी बातों से लोगों में कितना डर पैदा हो सकती है, जिनका कोई ठोस आधार तक नहीं है।

लेकिन ओझा सर ने ऐसे डर पैदा करने वाले बयान जानबूझ कर दिए हैं। यहाँ भी दो पहलू हो सकते हैं। पहली बात की वो फेमस होने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ते हैं, उन्हें अच्छा लगता है जब लोग उनकी बात करते हैं, उन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता कि ये बातें आलोचना हो या तारीफ। दूसरी बात कि यहाँ ओझा सर की भारत के खिलाफ घृणा साफ झलकती है, जो कि सिर्फ झलकने तक सीमित नहीं है, बल्कि इस देश को ‘तबाह’ करने की सोची-समझी मंशा है।

क्योंकि खुद तो वह चीन भागने की तैयारी में हैं। वह खुद कहते हैं, “मैं तो चीन निकल जाऊँगा, मेरा तो अपना है सारा व्यापार। दोस्त हैं, शोरूम हैं… वहाँ निकल जाएँगे।” यहाँ पूरे देशवासियों में डर पैदा करके ओझा सर ने अपना इंतजाम कर लिया है। भागने की बात कर रहे हैं, वो भी एक ऐसे देश में, जिसके साथ भारत की दुश्मनी है। ये तो वही हो गया, विजय माल्या ने देशवासियों के पैसे लूटे और बस गया ‘अंग्रेजों’ के बीच, जिन्होंने भारत पर 200 साल राज किया।

ये सभी लोग देश को बर्बाद करने के ख्वाब बुनते हैं और खुद विदेशी सहयोग के सहारे बैठे रहते हैं। कोई चौंकने वाली बात नहीं होगी, जब कल को ओझा सर का कोई विदेशी लिंक सामने आएगा, जिसमें कहा जाएगा कि ओझा सर को विदेशी फंडिंग मिल रही थी ये सब बेतुके और भद्दे बयान देने के लिए।

ओझा सर के इस्लाम और आतंकियों के बखान में प्रवचन

देश में ‘मार-काट’ हो जाने जैसा भारत-विरोधी और ‘आतंकी’ विचारधारा वाला बयान ओझा सर ने कोई पहली बार नहीं दिया है। ये वही ओझा सर हैं, जिनके इस्लाम और आतंकियों का बखान करते वीडियो वायरल होते हैं। और हिंदू धर्म के देवी-देवताओं को गाली देने में भी इनका नाम कुख्यात की लिस्ट में आता है।

कभी ये आतंकवादी ओसामा बिन लादेन ने अमेरिका में किए 9/11 हमले को महान उपलब्धि ठहरा देते हैं और उसके बहादुरी के किस्से छात्रों को सुनाते हैं। कभी इस्लाम की बड़ाई में चूर रहते हैं और कहते हैं कि इस्लाम ही पूरी दुनिया में रोशनी लेकर आया, इससे पहले तो अँधेरा था।

वहीं हिंदुओं की बात आती है तो अवध ओझा कड़वाहट के बोल निकालने शुरू कर देते हैं। श्रीकृष्ण पर लांछन लगाते हैं औऱ दावा करते हैं कि यादव लोग एक बार भगवान को मिलकर मारने वाले थे। इतना ही नहीं श्रीकृष्ण के चरित्र पर भी सरेआण बोलते हैं कि वे तो यादव की बीवियों के साथ नाचते थे।

और ऐसा नहीं है कि छात्र जानते नहीं है अवध ओझा की सच्चाई को। ओझा की क्लासेज अटेंड करने वाले छात्र कहते हैं कि ओझा सर कच्छा पहनकर क्लास में आते हैं और सेक्स की बातें करते हैं। कहने को ये UPSC एस्पिरेंट को पढ़ाने वाले शिक्षक हैं।

अगर ऐसी घटिया मानसिकता वाले शिक्षक से छात्र पड़ेगा, तो लाजमी है कि कल को परीक्षा में सफल होकर कोई छात्र देश के बड़े उच्च पदों पर बैठेगा, तो उसके विचार क्या होंगे? वो देश को किस नजरिए से देखेगा? और देश की तरक्की में योगदान देने के बजाए क्या वह भी ओझा सर की तरह चीन चला जाएगा?

ओझा सर खुद तो राजनीति में टिक नहीं पाए, और शिक्षक के तौर पर भी उनका करियर सफल हो नहीं सका। तो अब वे ऐसे भविष्य तैयार करने में निकल पड़े हैं, जो उनकी मानसिकता को पूरे देश में फैलाए। तो इसीलिए छात्र को समझना होगा कि ऐसे शिक्षक केवल देश को तबाह करने के बारे में सोचते हैं, न कि देश की तरक्की के बारे में।

X पर सक्रिय ट्रोल पर हुई कार्रवाई तो भड़क गई कांग्रेस, मोदी सरकार को बनाने लगे निशाना: इन हैंडल्स से फैलाया जा रहा था एंटी इंडिया प्रोपगैंडा

सुप्रिया श्रीनेत ने किया प्रेस कॉन्फ्रेंस (साभार: X_SupriyaShrinate)

केंद्र सरकार ने IT एक्ट की धारा 69ए का इस्तेमाल करते हुए बुधवार (18 मार्च 2026) को कई ऐसे एक्स हैंडल्स पर कार्रवाई की है, जिनके माध्यम से सोशल मीडिया पर एंटी-इंडिया प्रोपगैंडा फैलाया जा रहा था। ये एक्स हैंडल अधिककर विपक्षी पार्टियों और उसके इकोसिस्टम से जुड़े थे, जिन्हें भारत में अब ‘Withheld’ कर दिया गया है। इस कार्रवाई का मकसद ऐसे कटेंट का प्रसार रोकना है, जो समाज में अव्यवस्था और देश की सुरक्षा को खतरे में डाल सकते हैं।

इस घटना के तुरंत बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने सरकार पर अभिव्यक्ति की आजादी छीनने का आरोप लगाते हुए अभियान शुरू कर दिया। दिल्ली में पार्टी की सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म विभाग की प्रमुख सुप्रिया श्रीनेत ने इस मुद्दे पर प्रेस कॉन्फ्रेंस की।

श्रीनेत ने इस कदम को बढ़ती सेंसरशिप की संस्कृति बताया और केंद्र पर आरोप लगाया कि वो असहमति को दबा रही है डिजिटल चर्चा पर अपना कब्जा मजबूत कर रही है और अपनी नीतियों की आलोचना करने वालों पर हमला कर रही है। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने सभी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर स्वतंत्र असहमति वाली आवाजों को चुप कराने का पैटर्न अपनाया है।

श्रीनेत ने कहा कि ऐसे कदम दरअसल नौकरशाहों को खुली जानकारी तक पहुँचने के फैसले पर पावर दे देते हैं। सुप्रिया ने कहा, “यह सिर्फ कहानी गढ़ने की बात नहीं है बल्कि अभिव्यक्ति की आजादी की आत्मा पर हमला है।” उन्होंने यह भी दावा किया कि सरकार मुख्यधारा के मीडिया में दखल के बाद अब सोशल मीडिया की दुनिया में भी अपना दखल बढ़ा रही है।

श्रीनेत ने आगे लिखा, “जिन लोगों पर असर पड़ा है उनमें से कई कांग्रेस के साथ नहीं हैं। कुछ तो हमारी फैसलों की आलोचना भी करते हैं लेकिन हम उनके समर्थन में आवाज उठाते हैं। हमने राहुल गाँधी से सीखा है कि किसी भी अन्याय का सामना करने वाले का साथ दें चाहे वो हमारे खिलाफ रहे हों और वो हमारे आधिकारिक सिस्टम का हिस्सा न हों बावजूद इसके कि भाजपा और उसके ट्रोल्स क्या कहते हैं।”

श्रीनेत यहीं नहीं रुकी, बल्कि कहा कि अकाउंट्स ब्लॉक करने से सवाल नहीं रुकेंगे। उन्होंने यह भी शिकायत की कि यह मुद्दा एक बड़ी समस्या का हिस्सा है और सरकार को बढ़ते संसदीय आर्थिक चुनौतियों और विदेश नीति की कमियों से ध्यान हटाने का आरोप लगाया।

श्रीनेत ने इसी तरह के तर्कों वाला एक वीडियो भी अपलोड किया और बैन किए गए अकाउंट्स के समर्थन में ट्वीट किया जिसमें उन्होंने फैसले को ‘अस्वीकार्य’ बताया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘कायर’ कहा।

दिलचस्प बात यह है कि यह पुरानी बड़ी पार्टी असहमति कुचलने का लंबा इतिहास रखती है और अक्सर अभिव्यक्ति की आजादी का उल्लंघन करती रही है। फिर भी वह इन लोगों के पीछे खड़ी हो गई है न कि ऊँचे आदर्शों की सच्ची चिंता से बल्कि इसलिए कि वे विपक्ष की कहानी फैलाते हैं। बेशक यह उनके खिलाफ कार्रवाई का एकमात्र कारण नहीं हो सकता क्योंकि उनकी ऑनलाइन गतिविधियों में काफी कुछ शामिल है।

फेक न्यूज फैलाने में माहिर हैं ये अकाउंट

नेहर_हू 2 लाख 42 हजार 300 फॉलोअर्स वाला एक पॉपुलर अकाउंट है जो इस्लामो-लिबरल गुट का है जिस पर रोक लगी है। इसने बार-बार न सिर्फ झूठी खबरें फैलाईं बल्कि नस्लवाद दिखाया और भारतीय सेना पर आरोप लगाए। उसने न्यायपालिका की भी निंदा की क्योंकि उसने मशहूर जिम मालिक ‘मोहम्मद’ दीपक कुमार को सुरक्षा नहीं दी जो पहलगाम आतंकी हमले के शिकारों का मजाक उड़ा रहा था और कह रहा था ‘केवल भारत में हीरो को विलेन बना दिया जाता है।’

उसने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर का भाषण शेयर किया जिसमें ब्रिटेन की विविधता का जश्न था और कहा कि ‘भारत में ठीक उलटा है’ देश की निंदा करने का कोई मौका नहीं छोड़ा भले ही झूठ बोलकर। यह अकाउंट ‘अल्पसंख्यक खतरे में’ वाली बनाई गई कहानियाँ फैलाने में सबसे आगे रहा जबकि हिंदुओं पर हमलों को साफ कर दिया या उनके नरसंहार का मजाक उड़ाया।

साल 2024 में उसने ओपइंडिया के हिंदूफोबिया ट्रैकर का हवाला देकर कहा कि कश्मीर में हिंदू उत्तर प्रदेश से ज्यादा सुरक्षित हैं ताकि अपनी आश्चर्यजनक अपमानजनक और असंवेदनशील सोच दिखा सके। वह कश्मीरी पंडितों के जिहादियों के कारण पलायन को जानता है लेकिन फिर भी उनके दर्द का मजाक उड़ाता है।

इसी महीने अमेरिका के भारत राजदूत सर्जियो गोर और इंडो-पैसिफिक कमांड के कमांडर सैमुअल जे पापारो भारत की वेस्टर्न आर्मी कमांड के चंडीगढ़ मुख्यालय गए। बातचीत पश्चिमी थिएटर की गंभीर सुरक्षा मुद्दों पर केंद्रित थी जो पाकिस्तान से सैन्य गतिरोध और दुश्मनी के कारण महत्वपूर्ण है।

लेकिन इस मीटिंग का इस्तेमाल प्रधानमंत्री मोदी को समझौता करने का आरोप लगाने के लिए किया गया जो कांग्रेस पार्टी अक्सर लगाती है और इससे रक्षा बलों की ईमानदारी पर सवाल उठाए गए।

नेहर_हू ने बिहार के लोगों पर उनके वोटिंग चॉइस के लिए नस्लवादी हमला किया और कहा ‘टॉयलेट में माइग्रेशन का मजा लो अगले 5 साल’ मेहनतकश मजदूर वर्ग का अपमान करने के लिए सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होंने उसकी पसंदीदा पार्टियों को वोट नहीं दिया।

“उत्तर प्रदेश और बिहार से लाखों प्रवासी त्योहार पर घर जाने के लिए भयानक तकलीफ झेलते हैं। कुछ तो मर भी जाते हैं” उसने 2024 में इसी तरह कहा और उन्हें केसरिया पार्टी को सपोर्ट करने के लिए कोसा और आरोप लगाया कि उसकी सरकार ने वंदे भारत अमीरों के लिए शुरू किया। उसने इसमें ‘जैसा बोया वैसा काटा’ जैसे तंज भी खुशी खुशी जोड़े। इस आदमी ने लगातार राज्य और उसके रहने वालों को स्वच्छता और दूसरी चीजों पर नीचा दिखाया है।

एक महिला ने बताया कि उसने उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में समाजवादी पार्टी को वोट दिया था लेकिन उसे भाजपा का स्लिप मिल गया। हालाँकि उसने ये भी कहा कि मेरे साथ छोटा बच्चा था वोटिंग के समय जिस वजह से गलत बटन दब गया और मुझे ईवीएम से कोई समस्या नहीं है।” लेकिन उसकी झूठी बात का इस्तेमाल करके उसने भारत के चुनाव आयोग की निंदा की।

उसने और अल्ट न्यूज के मोहम्मद जुबैर ने पत्रकार निशा पाल को निशाना बनाने की कोशिश की क्योंकि उन्होंने पहलगाम आतंकी घटना ऑपरेशन सिंदूर और इजराइल-हमास युद्ध के बारे में कुछ मुस्लिम बच्चों से सवाल पूछे थे।

उसने एक वीडियो भी अपलोड किया जिसमें कथित पाकिस्तानी आदमी भारतीय क्रिकेट टीम की जीत का जश्न मना रहा था और कह रहा था कि इस्लामिक रिपब्लिक भारत से बेहतर देश है जबकि अपने देश के खिलाफ आतंकवाद समेत सभी बड़े अपराधों को नजरअंदाज कर रहा था।

मोदी सरकार के खिलाफ नाराजगी के रूप में छिपा एंटी इंडिया प्रोपगैंडा

डॉ निमो यादव 2.0 एक और प्रमुख अकाउंट जो भारत में बैन हो गया है उसने दो केंद्रीय मंत्रियों को राष्ट्र विरोधी गतिविधियों से जोड़ने तक की हद पार कर दी। उसने कहा, “क्या यह सच है कि एन सीतारमण का ऑफिस और राजीव चंद्रशेखर ट्विटर पर उस व्यक्ति को फॉलो कर रहे थे जो भारत में आतंकियों को ट्रेनिंग दे रहा था।” इसने इन नेताओं की जाँच NIA से कराने की डिमांड तक रख डाली।

इस बीच जिन पार्टियों को ये लोग सपोर्ट करते हैं वे वोट बैंक के लिए माफिया और गैंगस्टरों को बढ़ावा दे रही हैं और अपनी एजेंडा थोपने के लिए मानवीय सीमाओं को पार कर रही हैं। उसने भारतीय सेना के अधिकारियों के दिखने पर मजाक भी किया और कहा, “यह तब होता है जब मिड-डे मील में अंडे बैन कर दो।” इस तरह से वो वर्दीधारी सैनिकों का सम्मान करता है, जिन्होंने युद्धक्षेत्र में पाकिस्तान और चीन जैसे दुश्मनों से लड़ते हुए अद्भुत शौर्य का प्रदर्शन किया।

इन हैंडल्स पर निखिल गुप्ता की गिरफ्तारी पर मजा लिया जो खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू के असफल हत्या षड्यंत्र में शामिल था और चाहा कि उसकी कहानी धुरंधर 2 में दिखाई जाए, जिसमें आर माधवन भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का रोल करते हैं। यह भारतीय खुफिया एजेंसियों का मजाक उड़ाने का उसका दयनीय प्रयास था।

डॉ निमो यादव 2.0 ने एक और पोस्ट में दावा किया कि ‘भारत के लिए चीजें अच्छी नहीं लग रही’ क्योंकि ‘रूस ने पाकिस्तान को सस्ते दाम पर कच्चा तेल ऑफर किया’ जिसे उसने सरकार की बड़ी असफलता बताया। दूसरी तरफ भारत रूस से बहुत सस्ते दाम पर तेल खरीद रहा है खासकर 2022 में अमेरिका की धमकियों और टैरिफ के बावजूद।

वह जानता है कि रूस का पाकिस्तान को ऑफर भारत की इजराइल से निकटता की तरह दोनों देशों के रिश्तों में बाधा नहीं डालता फिर भी उसने अपनी प्रचार से मुँह नहीं मोड़ा।

अलग-अलग अकाउंट्स लेकिन काम एक जैसा

इसी तरह की पाबंदी मनीष आरजे के अकाउंट पर भी लगी है। उसने दावा किया था कि बिहारी वोटरों ने अपनी आत्मा 10 हजार में बेच दी क्योंकि उन्होंने भाजपा को सपोर्ट किया। यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया इस गुट को तभी स्वीकार्य लगती है जब उनकी पसंदीदा पार्टियाँ जीतती हैं।

उसने भी बाकियों की तरह झूठी जानकारी फैलाने से खुद को नहीं रोका और इजराइल को ‘फादरलैंड’ कहा गलत तरीके से प्रधानमंत्री मोदी को इसका श्रेय देते हुए जबकि मोदी ने भारतीय यहूदियों के बारे में कहा था कि वे पश्चिम एशिया के उस देश को अपना पिता मानते हैं जबकि भारत को मातृभूमि।

आरजे ने कोलकाता मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में हुई भयानक बलात्कार और हत्या की घटना में पीड़िता की माँ को भी अपनी छोटी राजनीति में घसीट लिया और आरोप लगाया कि न्याय की उनकी गुहार दरअसल भाजपा टिकट पर चुनाव लड़ने की इच्छा से थी। उसने शोक संतप्त महिला की बेइज्जती की, जबकि उसे सत्तारूढ़ तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार से जवाब माँगना चाहिए था।

उसने लगातार उन पोस्ट्स को रीट्वीट किया जो भू-राजनीतिक संकट से भारतीयों पर पड़ने वाले नुकसान का मजाक उड़ाती हैं।

‘एक्टिविस्ट और सोशल वर्कर’ संदीप सिंह लिस्ट में एक और नाम है जो कांग्रेस का खासकर हरियाणा यूनिट का खुलकर समर्थन कर रहा है कई पोस्ट्स के जरिए जो श्रीनेत के दावे का खंडन करता है कि ये अकाउंट उनकी पार्टी को सपोर्ट नहीं करते।

इसके अलावा वह भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध चाहता है जैसा कि हालिया विवादित रिपोर्ट में अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने कहा है धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर और भेदभाव रोकने के लिए। रिपोर्ट ने रिसर्च एंड एनालिसिस विंग पर टारगेटेड सैंक्शंस की भी सिफारिश की।

डॉ रंजन जिनके अकाउंट का भी यही हाल हुआ। उसने एक कार्यक्रम का वीडियो पोस्ट किया और गलत दावा किया कि मोदी सरकार के प्रभाव में भारतीय मीडिया नागरिकों से संकट और आपदाएँ छिपा रही है। उसका साफ मकसद है लोगों में डर पैदा करना और सरकार के खिलाफ नफरत भड़काना, बिना देश पर पड़ने वाले असर को सोचे।

उसने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बयान को भी तोड़ मरोड़ कर पोस्ट किया और जातीय विभाजन पैदा करने की कोशिश की।

कुछ लोगों ने घटना के बाद अपने ट्वीट्स लॉक कर लिए जिससे कई सवाल उठे।

ये वही लोग हैं, जो हिंदू एक्टिविस्ट विजय पटेल के अकाउंट सस्पेंड होने पर खुश थे और मालाबार गोल्ड चाहता था कि उन्हें जेल भेजा जाए क्योंकि उन्होंने उनके पाकिस्तानी इन्फ्लुएंसर्स को हायर करने की आलोचना की थी जो ऑपरेशन सिंदूर की निंदा कर रहे थे। वे ‘सेंसरशिप’ का मजा लेते हैं जब तक वो उनके विरोधियों पर अन्यायपूर्ण तरीके से लगे। पाखंड और दोहरे मापदंड वाकई हैरान करने वाले हैं।

अप्रैल 2024 में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले अमित शाह ने कांग्रेस को उसके एडिटेड वीडियो का इस्तेमाल करने के लिए फटकार लगाई जिसमें आरोप था कि भाजपा की सत्ता आने पर आरक्षण खत्म हो जाएगा। यह वीडियो कांग्रेस के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन और उनके पूरे नेटवर्क द्वारा असली बताकर फैलाया गया था। इस तरह नुकसान पहुँचाने के इरादे से गलत सूचना फैलाने को हल्के में नहीं लिया जा सकता। ठीक वैसे ही देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी जो ऐसी तकनीकें इस्तेमाल करती रही है उसके इन अकाउंट्स के खिलाफ कार्रवाई के बाद नाराज होना आश्चर्य की बात नहीं है।

जॉर्ज सोरोस की फंडिंग वाली RSF ने ‘ऑपइंडिया’ को बनाया निशाना, ‘प्रेस की आजादी’ के नाम पर प्रोपेगेंडा: विदेशी फेक न्यूज फैक्ट्रियों के निशाने पर भारत की राष्ट्रवादी आवाज

                                                                                           प्रतिकात्मक तस्वीर ( फोटो साभार-chatgpt)
जॉर्ज सोरोस जितना पैसा भारत को अस्थिर करने में बर्बाद कर रहा है अगर यही पैसा गरीबों पर खर्च करता इतिहास में स्वर्णमयी अक्षरों में नाम लिखा जाता, लेकिन सोरोस देशों को अस्थिर करने में अपनी शान समझ रहा है। जब भारतीय नेताओं को फंडिंग कर उसको उतनी मदद नहीं मिल रही तो राष्ट्रवादी पत्रकारिता को निशाने पर ले रहा है। जिसे देख लगता है बुढ़ापे में अपनी दुर्गति करवाकर ही दुनिया से जाएगा। आखिर 
हिंदू राष्ट्रवादी न्यूज़ आउटलेट OpIndia को क्यों निशाने पर लिया जा रहा है? अगर RSF ने राष्ट्रवादी पत्रकारिता पर हमला करना बंद नहीं किया इसके बहुत भयंकर अंजाम होंगे।   

2025 के आखिर में अचानक एक मोड़ आया, जब RSF ने भारत के हिंदू राष्ट्रवादी न्यूज़ आउटलेट OpIndia को अपनी सालाना ‘प्रेस फ्रीडम प्रिडेटर्स’ लिस्ट में एलन मस्क और अडानी ग्रुप जैसे ग्लोबल कॉर्पोरेट दिग्गजों के साथ शामिल किया। इस की वजह से RSF की न्यूट्रैलिटी और पॉलिटिकल एजेंडा पर बड़े पैमाने पर चर्चा हुई। OpIndia राष्ट्रवादी और सॉवरेन नैरेटिव का एक घोर समर्थक है।

कई लोगों ने OpIndia को शामिल करने को राष्ट्रवादी आवाजों को बदनाम करने की बड़ी योजना के रूप में देख रहे हैं। यह लिस्टिंग RSF की पिछली रिपोर्टों की वजह से हुआ है। इनमें राष्ट्रवादियों को प्रेस की आजादी के लिए खतरा बताया गया था और मोदी सरकार के दौरान मीडिया के माहौल की आलोचना की गई थी।

UK की टेलीग्राफ ने बताया कि कैसे RSF ने दुनिया को भारत के डेमोक्रेटिक माहौल और प्रेस लैंडस्केप को बताया। इसमें दुनिया भर में आलोचना के साथ अलग-अलग भारतीय मीडिया और कॉर्पोरेट हस्तियों के गठबंधन को हाईलाइट किया गया।

यह रिसर्च RSF के फाइनेंसिंग सोर्स को ट्रैक करके इसकी जाँच करती है। इनमें से ज्यादातर पश्चिमी सरकारी संगठनों और शासन परिवर्तन से जुड़े फाउंडेशन हैं। जैसे- US कांग्रेस द्वारा फंडेड नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी (NED)।

यह बेलिंगकैट (Bellingcat) जैसे जाँच संगठनों के साथ RSF के कनेक्शन की भी जाँच करता है। स्टडी से पता चलता है कि RSF स्वतंत्र पत्रकारिता का निष्पक्ष संरक्षक नहीं है, बल्कि भारत की संप्रभुता और लोकतंत्र पर दुनिया भर में चल रही वैचारिक लड़ाई को हवा देता है।

RSF: इमेज बनाम इकोसिस्टम

RSF द्वारा पब्लिश वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स (WPFI) की चर्चा पश्चिमी सरकारों, मल्टीलेटरल संगठनों और लेगेसी मीडिया द्वारा किया जाता है। RSF खुद को एक इंटरनेशनल NGO के रूप में पेश करता है, जो दुनिया भर में प्रेस फ्रीडम का बचाव करता है।

यह इंडेक्स बिना किसी जानकारी के, सोच-समझकर किए गए सर्वे पर निर्भर करता है। इसमें जवाब देने वालों का नाम नहीं बताया जाता और कैटेगरी के हिसाब से स्कोरिंग नहीं होती। भारत के ऑफिशियल पॉलिसी थिंक टैंक नीति आयोग ने भी इसकी जानकारी दी है।

 भारत और दूसरी जगहों के आलोचकों के मुताबिक, ऐसा इंडेक्स एक न्यूट्रल असेसमेंट के बजाय एक जियोपॉलिटिकल टूल बनने का खतरा रहता है। यह एक सब्जेक्टिव सवालों के जवाबों पर आधारित होता है।

असल में RSF देशों के नैरेटिव अक्सर पश्चिमी ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइज़ेशन और उनसे जुड़े मीडिया की बातों को दिखाते हैं। खासकर जब बात भारत, हंगरी और दूसरे देशों की आती है, जिन्हें ‘इलीबरल’ या ‘नेशनलिस्ट’ माना जाता है। कॉर्पोरेट कंसोलिडेशन, इंटेलिजेंस लीक और सर्विलांस स्कैंडल जैसी पश्चिमी स्ट्रक्चरल समस्याओं को आम तौर पर छोटी-मोटी गड़बड़ियाँ बताया जाता है। RSF अक्सर भारत के हिंदू राष्ट्रवाद को जर्नलिज़्म के लिए खतरा बताते हैं।

फंडिंग: पश्चिमी सरकारें, NED और शासन बदलने वाली समाज सेवा

RSF को पश्चिमी सरकारों और डेमोक्रेसी को बढ़ावा देने वाले संगठनों से मदद मिलती है। OpIndia-CSDS डॉक्यूमेंट में बताई गई रिसर्च बताती है कि RSF को इनसे फंडिंग मिली है:

  1. फ्रांस की सरकारी एजेंसियां, जिनमें फ्रेंच डेवलपमेंट एजेंसी (AFD), विदेश मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, गृह मंत्रालय, संस्कृति मंत्रालय और बेयूक्स शहर शामिल हैं।
  2. यूरोपियन कमीशन का यूरोपियन इंस्ट्रूमेंट फॉर डेमोक्रेसी एंड ह्यूमन राइट्स (EIDHR)।
  3. इसी तरह के यूरोप के मदद करने वाले संगठन, जैसे स्वीडिश इंटरनेशनल डेवलपमेंट एजेंसी (SIDA)।
  4. नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी (NED), जिसे US कांग्रेस से फंड मिलता है। यह संगठन स्पष्ट तौर पर बताता है कि यह डेमोक्रेसी को बढ़ावा देता है। इसे मुख्य रूप से US सरकार का सपोर्ट है।
फोर्ड फाउंडेशन जैसे बड़े US फाउंडेशन, जिनका भारत में पॉलिटिकल एक्शन और लॉबिंग को सपोर्ट करने का लंबा और विवादित इतिहास रहा है। इसमें वे संगठन भी शामिल हैं, जिन पर बाद में फाइनेंशियल गड़बड़ियों और भारत विरोधी कैंपेन के आरोप लगे, वे भी RSF से जुड़े हैं। ऑपइंडिया पेपर में बताई गई इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग के मुताबिक, RSF ने US-EU के रिजीम चेंज इनिशिएटिव्स के टारगेटेड सरकारों, जैसे वेनेजुएला के खिलाफ लगातार सख्त रुख अपनाया है। उन देशों में US फंडेड ऑर्गनाइजेशन्स और अमीरों के मालिकाना हक वाले विपक्षी मीडिया को सपोर्ट किया है।
यह डोनर प्रोफाइल साफ तौर पर RSF को जाने-माने ‘डेमोक्रेसी प्रमोशन’ नेटवर्क में रखती है। NGOs, मीडिया इनिशिएटिव्स, इंडेक्स और लॉबिंग कैंपेन जो वेस्टर्न जियोपॉलिटिकल पसंद के खिलाफ सरकारों में ‘अथॉरिटेरियनिज्म’ को खास तौर पर हाईलाइट करते हैं, जिनमें से भारत भी एक है। उन्हें वेस्टर्न सरकारों और उनसे जुड़े इंस्टीट्यूशन्स द्वारा फंड दिया जाता है।

वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स का विवादास्पद तरीका

RSF के इंडेक्स की तीन मुख्य समस्याएँ हैं – ओपेसिटी, सब्जेक्टिविटी और सेलेक्टिव एम्फेसिस, जो कई इंडियन और इंटरनेशनल समीक्षा पर आधारित हैं।
ओपेसिटी: यह ऑडिट करना मुश्किल है कि भारत के लिए खास स्कोर कैसे बनाए गए? वैसी ही स्थिति वाले देशों से कैसे की जाए, क्योंकि RSF सवाल के हिसाब से स्कोर या अपने जवाब देने वालों की पहचान और इंस्टीट्यूशनल लोकेशन नहीं बताता है।
सब्जेक्टिविटी: इंडेक्स सोच पर आधारित है। ‘एक्सपर्ट्स’ ‘ओनरशिप प्रेशर’, ‘हेट कैंपेन’, और ‘सेल्फ-सेंसरशिप’ जैसे मुद्दों पर सर्वे पूरा करते हैं। एक्सपर्ट्स का यह ग्रुप ज़्यादातर लिबरल-प्रोग्रेसिव, वेस्टर्न सोच वाले होते हैं। खासकर कंजर्वेटिव या नेशनलिस्ट सरकारों के विरोध में इनकी राय होती है।
सिलेक्टिव : आलोचकों का कहना है कि जहाँ भारत जैसे देशों को ‘हिंदू नेशनलिस्ट प्रेशर’ और सोशल मीडिया ट्रोलिंग जैसे नैरेटिव की वजह से कड़ी सज़ा मिलती है, वहीं गंभीर स्ट्रक्चरल दिक्कतों वाले वेस्टर्न डेमोक्रेसी में मीडिया ओनरशिप, सिक्योरिटी कानूनों का अग्रेसिव इस्तेमाल और इंटेलिजेंस मिलीभगत काफी ज्यादा है।
भारत सरकार के एक डिस्कशन पेपर के मुताबिक, RSF का तरीका पॉलिसी बेंचमार्क के तौर पर काफ़ी नहीं है, क्योंकि इसमें ‘प्रेस की आज़ादी की आम सहमति वाली परिभाषा की कमी है।’ ‘सैंपल साइज बहुत कम है,’ ‘पैरामीटर्स का नॉन-ट्रांसपेरेंट वेटिंग है।’
इनको देखते हुए ऑपइंडिया ने इंडेक्स को ‘ग्लोबल लेफ्ट की कहानी को फैलाने के लिए बनाया गया एक बायस्ड टूल’ बताया है। दरअसल RSF का पुराना डेटा बताता है कि कॉन्ग्रेस के सालों में भारत का मीडिया माहौल गिरा, लेकिन यह बहस मोदी सरकार के कार्यकाल पर ज्यादा हमला करती है।

RSF और भारत: राष्ट्रवादी राजनीति के खिलाफ मनगढ़ंत बातें बनाना

RSF की भारत फैक्ट शीट और प्रेस रिलीज में अक्सर एक तय टेम्पलेट को हाईलाइट किया जाता है। ‘हिंदू राष्ट्रवादी भीड़,’ ‘मोदी समर्थक,’ ‘भक्त’ और ‘राइट-विंग इकोसिस्टम’ को पत्रकारों के सामने आने वाले मुख्य खतरों के तौर पर हाईलाइट किया जाता है।
स्थानीय या राष्ट्रवादी बैकग्राउंड के पत्रकारों के खिलाफ हिंसा को ज़्यादातर उन घटनाओं और कहानियों के पक्ष में नजरअंदाज कर दिया जाता है, जिन्हें अंग्रेजी भाषा की लिबरल साइटों के एक खास ग्रुप द्वारा मजबूत किया जाता है। इनमें से कई पश्चिमी फाउंडेशन से जुड़ी हैं।
लगभग ‘कब्जा किए गए मीडिया’ की इमेज के साथ मेल न खाने के बावजूद, भारत के मीडिया में स्ट्रक्चरल वैरायटी, हजारों पत्रकारों, सैकड़ों चैनलों और कई बड़े प्लेटफॉर्म पर मोदी सरकार की तीखी आलोचना वाली कवरेज इन्हें कम दिखता है।
CSDS-लोकनीति की ‘इंडियन मीडिया, ट्रेंड्स और पैटर्न’ पर रिपोर्ट को OpIndia ने अपने रिसर्च में शामिल किया है। भारतीय मीडिया की आज़ादी के बारे में RSF नकारात्मक वर्णन करता है। इसमें यह दावा किया जाता है कि ज्यादातर पत्रकारों का मानना ​​है कि मीडिया आउटलेट सत्ताधारी BJP को सपोर्ट करते हैं। हालाँकि, सर्वे के नतीजे, जैसे कि ‘85% महिला पत्रकारों को मेंटल हेल्थ की दिक्कतें’ थीं और 1.4 बिलियन की आबादी वाले देश में से 206 पत्रकारों के एक छोटे से सैंपल से लिए गए थे।
OpIndia के अनुसार, ग्लोबल इंडेक्स भारत की बुराई करता है, एक घरेलू विदेशी फंडेड थिंक टैंक इंडेक्स पर आधारित है और फिर ‘मीडिया में लोकतंत्र की कमी’ के तौर पर पेश करता है। यह फीडबैक लूप RSF की सब्जेक्टिव स्टोरी और CSDS के कम डेटा की वजह से होता है।
RSF OpIndia को एक ‘हिंदू राष्ट्रवादी वेबसाइट’ बताता है जो सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों को ‘बदनाम’ करती है। ये तकनीक या विचारधारा पर की गई आपत्ति को प्रेस की आजादी से जोड़कर देखती है। यह एक स्ट्रैटेजी है, जिसमें इंडेक्स को चुनौती देने वालों को पत्रकारिता का दुश्मन बताया जाता है, जिससे असल में असली मुद्दा कहीं खो जाता है।

बेलिंगकैट: OSINT, NED का पैसा और इंटेलिजेंस शैडो

नीदरलैंड्स का एक ‘ओपन सोर्स इन्वेस्टिगेशन’ ग्रुप माना जाता है बेलिंगकैट। इसकी रूस, सीरिया जैसे देशों में काम करने को लेकर वेस्टर्न मीडिया ने तारीफ़ की है। यह OpIndia-CSDS स्टडी में बताए गए नेटवर्क का एक ज़रूरी हिस्सा है।
पब्लिक रिकॉर्ड के मुताबिक, बेलिंगकैट को नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी (NED) से डोनेशन मिला है। यह एक US कॉन्ग्रेस फंडिंग संगठन है, जिसे खास तौर पर उन संगठन की मदद के लिए बनाया गया है, जो विदेशों में US के हितों को बढ़ावा देते हैं। इसके अलावा, इसे कई पश्चिमी सरकार से जुड़े संस्थानों से फंडिंग मिलती है। खासकर यूरोपियन और ब्रिटिश सोर्स से।
यहाँ तक ​​कि इनके प्रति हमदर्दी रखने वाले सोर्स भी मानते हैं कि इस तरह की फंडिंग अक्सर उन स्टडीज़ को बढ़ावा देने के लिए दी जाती है, जो पश्चिम की विदेश नीति के हिसाब से हों, जैसे- रूस में सेना की मूवमेंट को ट्रैक करना या सीरिया में केमिकल हथियारों के आरोप। ये आरोप आसानी से NATO की बातों से मेल खाते हैं।
इसलिए, क्रिटिकल ऑब्ज़र्वर NED को US विदेश नीति के लिए एक ‘फ्रंट’ मानते हैं, जिसे खुले तौर पर वही करने के लिए बनाया गया था, जो CIA कभी चुपके से करती थी। बेलिंगकैट उस इकोसिस्टम का हिस्सा है, जो पश्चिमी स्ट्रेटेजिक मैसेजिंग के लिए फायदेमंद जानकारी के फ्लो को बढ़ाता और ढोता है। बेलिंगकैट पर रूसी सरकार और दूसरों ने सीधे तौर पर पश्चिमी इंटेलिजेंस का पिछलग्गू होने का आरोप लगाया है। इन देशों ने ऐसे उदाहरण भी दिए हैं।
ग्लोबल इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म नेटवर्क (GIJN), OCCRP, फॉरबिडन स्टोरीज, इंटरन्यूज, ICIJ, DRFLab, फ्रीडम हाउस, NED, और दूसरे संगठन जिन्हें पश्चिमी सरकारों, सोरोस के ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, ओमिडयार नेटवर्क, फोर्ड फाउंडेशन और इसी तरह के दूसरे लोगों से फंडिंग मिलती है।
ये सभी जानकारी OpIndia–CSDS पेपर में शामिल हैं। विदेशी फंडेड स्टोरी को ‘इंडिपेंडेंट इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म’ की आड़ में चलाया जाता है। इसकी वजह ये भी है कि उनमें से कई भारतीय मीडिया आउटलेट्स और एक्टिविस्ट्स के साथ मिलकर काम किया गया होता है, जो मोदी सरकार और हिंदुत्व के सख्त खिलाफ हैं।
इस तरह, बेलिंगकैट उस बड़े इकोसिस्टम के लिए एक मॉडल का काम करता है। यह एक ऑफिशियली मान्यता प्राप्त गैर सरकारी संगठन है। यह काफी हद तक वेस्टर्न सिक्योरिटी और फॉरेन पॉलिसी एजेंडा के हिसाब से है। इसे अक्सर वही वेस्टर्न मीडिया आउटलेट्स निष्पक्ष जानकारी वाले सोर्स के तौर पर पेश करते हैं। साथ ही इसे फंड करते हैं।

RSF का सीरियाई मीडिया प्रोजेक्ट्स और नैरेटिव

ऑपइंडिया रिपोर्ट में सीरिया केस स्टडी दिखाती है कि कैसे RSF जैसे संगठन विवादित क्षेत्रों में वेस्टर्न देशों के साथ मिलकर काम करते हैं। दस्तावेज के मुताबिक, कैनाल फ्रांस इंटरनेशनल (CFI), एक फ्रेंच मीडिया-सपोर्ट संगठन है, जिसे फ्रेंच फॉरेन मिनिस्ट्री का सपोर्ट है।
यह रेडियो रोज़ाना को फंडिंग देता है। यह एक सीरियाई चैनल है, जिसे RSF ने ‘इंडिपेंडेंट’ बताया। डेनमार्क, स्वीडन और नॉर्वे की सरकारें इंटरनेशनल मीडिया सपोर्ट के लिए फंडिंग देती हैं। RSF खुद दूसरे वेस्टर्न डोनर्स के साथ मिलकर फंडिंग करता है।
रेडियो रोज़ाना ने आरा पैसिस इनिशिएटिव के ‘सीरियाज़ा’ नैरेटिव प्रोजेक्ट के साथ मिलकर काम किया है। इसे खास तौर पर इटैलियन फॉरेन मिनिस्ट्री ने फंड किया था और इटैलियन सरकार और प्रेसिडेंसी के समर्थन में ऑपरेट किया गया था।
सीरिया में और उसके बारे में लोगों की राय को प्रभावित करने के लिए ‘नैरेटिव’ और ‘स्टोरीटेलिंग’ बनाने का जिक्र प्रोजेक्ट में किया गया है।
जब इसे पूरा देखा जाए, तो यह एक मॉडल दिखाता है। पश्चिमी सरकारें RSF और CFI जैसे बिचौलियों के जरिए मीडिया आउटलेट्स को फाइनेंस करती हैं, फिर उन पत्रकारों के लिए कंटेंट और ‘कैपेसिटी बिल्डिंग’ करती हैं, जिनका काम उनके नेरेटिव से मेल खाता है।
आम तौर पर इसमें ‘टारगेट की गई सरकार’ और ‘तानाशाह शासक’ होते हैं, जबकि पश्चिमी देशों के समर्थन वाली विपक्षी ताकतें डेमोक्रेट होती हैं।
ऐसे देशों में RSF ‘प्रेस की आज़ादी’ की घोषणा करता है, तो वह असल में उन जानकारियों का मूल्यांकन कर रहा होता है, जहाँ डोनर का हित हो।

भारत में काम करने वाला नेटवर्क: CSDS, KAS, RSF और GIJN

OpIndia रिसर्च से पता चलता है कि RSF का भारत के एक बड़ा नेटवर्क है। ये कई संस्थानों को फंडिंग करती है और उसकी पार्टनर है या विचारधारा को शेयर करती हैं।
*पेपर में कहा गया है कि दिल्ली का थिंक टैंक कहलाने वाला CSDS और उसका प्रोग्राम अक्सर पश्चिमी संगठनों और सरकार से जुड़े डोनर्स के साथ मिलकर ‘हिंदू बहुसंख्यकवाद,’ दलित-मुस्लिम जुड़ाव और जाति विभाजन की बातों को सिस्टमैटिक तरीके से बढ़ाता है।
*कोनराड एडेनॉयर स्टिफ्टंग (KAS) एक जर्मन फाउंडेशन है जो CDU से राजनीतिक तौर पर जुड़ा हुआ है। यह लगभग पूरी तरह से जर्मन पब्लिक फंड से स्पॉन्सर है और इसने 2016 से CSDS को ₹2.6 करोड़ से ज़्यादा की ‘सहायता’ दी। यह एक खास ‘मीडिया प्रोग्राम एशिया’ भी चलाता है जो युवाओं और इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज़्म पर केन्द्रित है।
*’अनकवरिंग एशिया’ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज़्म कॉन्फ्रेंस के स्पॉन्सर GIJN, OCCRP, फोर्ड फाउंडेशन, ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, ओक फाउंडेशन समेत कई थे। इसमें शामिल होने वाले भारतीय लोगों में वे पत्रकार और मीडिया आउटलेट थे, जो लगातार मोदी सरकार और हिंदुत्व की बुराई करते रहे हैं।
स्टडी के मुताबिक, RSF इस वेब के लिए एक अच्छा सोर्स है। इंटरनेशनल इन्वेस्टिगेटिव नेटवर्क एक-दूसरे के काम को क्रॉस-प्रमोट करते हैं। इंटरनेशनल डोनर्स इनकी फंडिंग के लिए एक ही पूल का इस्तेमाल करते हैं। CSDS इंडियन मीडिया के पतन पर RSF का रेफरेंस देता है, और RSF वेस्टर्न-फंडेड इंडियन आउटलेट्स के नैरेटिव्स पर निर्भर रहता है।
इनका एक छोटा सा सर्किट है, जिसमें वेस्टर्न-फंडेड संगठन प्रश्नावली तैयार करते हैं। स्टोरी गढ़ते हैं, डेटा को एनालाइज करते हैं, और फिर एक-दूसरे को रैंकिंग और रिवॉर्ड देते हैं। इनका इस्तेमाल घरेलू पॉलिटिकल डिस्कशन और इंटरनेशनल डिप्लोमेसी दोनों में हथियार के तौर पर किया जाता है।

नैरेटिव इम्पैक्ट: नेशनलिस्ट इंडिया को गलत साबित करना

मुद्दा यह नहीं है कि RSF इंडिया की आलोचना करता है, बल्कि यह लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को कमज़ोर करता है। इसके लिए वह मुश्किल मीडिया इकोसिस्टम को ‘साहसी लिबरल जर्नलिस्ट्स’ और ‘अथॉरिटेरियन हिंदू नेशनलिस्ट्स’ के बीच एक मोरैलिटी प्ले में बदल देता है।
यह उन जर्नलिस्ट्स के खिलाफ धमकियों और हिंसा के कामों को नजरअंदाज करता है या उसे कम करके आँकता है, जिन्हें राष्ट्रवादी, हिंदुत्व समर्थक या ग्लोबल लिबरल नैरेटिव्स की आलोचना करने वाला माना जाता है।
इसे वही वेस्टर्न मीडिया भी बढ़ावा देता है। किसान आंदोलन, CAA, कश्मीर और ‘ अल्पसंख्यकों पर ज़ुल्म’ जैसे टॉपिक पर भारत की आलोचना करता है और अक्सर RSF, फ्रीडम हाउस और ऐसे ही दूसरे इंडेक्स को आधार बनाकर ‘लोकतंत्र कमजोर’ होने की दुहाई देता है।
यह सिर्फ एक चर्चा नहीं है, जैसा कि OpIndia-CSDS रिपोर्ट में बताया गया है। जब इंडेक्स दिखाते हैं कि भारत तानाशाही की ओर बढ़ रहा है, तो इसे सही ठहराना आसान हो जाता है।
1.भारतीय कानूनों और नीतियों का विरोध करने वाले एक्टिविस्ट नेटवर्क और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के लिए विदेशी फंडिंग में बढ़ोतरी।
2.इंटरनेशनल फोरम पर, डिप्लोमैटिक दबाव और ‘नाम लेकर शर्मिंदा करना’।
3.भारत की इंटरनेशनल इमेज को जानबूझकर कमजोर करने की कोशिशें, खासकर तब जब नई दिल्ली रूस, चीन, क्लाइमेट या व्यापार के मुद्दे पर अलग स्टेंड लेती है और पश्चिमी देशों के रुख को चुनौती देती है। US-EU अलायंस के संबंध में स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी का दावा करती है।
दूसरे शब्दों में कहें तो, भारत पर RSF की कवरेज असल में एक ‘जियोपॉलिटिकल’ टूल है। यह भारत को एक कट्टर, गैर-उदारवादी , बहुसंख्यक देश के रूप में दिखाने की कोशिश करता है, जिसे लगातार पश्चिमी गाइडेंस और ‘सिविल सोसाइटी करेक्शन’ की जरूरत है।
जब इन बातों को एक चश्मे से देखा जाता है, तो एक अलग पैटर्न नजर आता है। पश्चिमी सरकारी संस्थाएँ और NED जैसे US-स्टाइल डेमोक्रेसी को बढ़ावा देने वाले संगठन और शासन परिवर्तन से जुड़े बड़े फाउंडेशन RSF की ज्यादातर फंडिंग को बढ़ावा देते हैं।
OpIndia–CSDS स्टडी RSF को एक बड़े नेटवर्क में रखती है, जिसमें CSDS, KAS, IDRC, सोरोस से जुड़े फ़ाउंडेशन, और भारतीय एक्टिविस्ट या पत्रकार ग्रुप शामिल हैं। ये सभी संगठन एक ही लक्ष्य के लिए काम कर रहे हैं, जो है हिंदू पहचान, भारतीय लोकतंत्र और राष्ट्रवादी राजनीति के बारे में लगातार खराब खबरें फैलाना।
एक राष्ट्रवादी भारतीय नजरिए से, RSF प्रेस की आज़ादी का एक निष्पक्ष रखवाला कम और एक ट्रांसनेशनल स्टोरी फैलाने वाले सिस्टम का एक जरूरी हिस्सा है। इसके रिसोर्स, पार्टनरशिप और प्रोडक्ट लगातार भारत की चुनी हुई सरकार और सभ्यता के खिलाफ काम करते हैं।

टेक्सास में बैन हुआ राहुल गाँधी के ह्यूस्टन प्रोग्राम से जुड़ा आतंकी संगठन CAIR, हमास-अलकायदा से कनेक्शन: हिंदू और भारत विरोधी कामों से जुड़ाव

   टेक्सास के गवर्नर एबॉट ने राज्य कानून के तहत CAIR को एक विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित किया (फोटो साभार -     टेक्सास के गवर्नर एबॉट ने राज्य कानून के तहत सीएआईआर को एक विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित किया/                  सीएआईआर))
टेक्सास के गवर्नर ग्रेग एबॉट ने मंगलवार (18 नवंबर 2025) को काउंसिल ऑन अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशंस (CAIR) को राज्य कानून के तहत विदेशी आतंकवादी संगठन और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक संगठन घोषित कर दिया। इस घोषणा में CAIR को मुस्लिम ब्रदरहुड के साथ सूचीबद्ध किया गया है, जिसे एबॉट ने इसका उत्तराधिकारी संगठन बताया।

इस फैसले के बाद दोनों संगठनों पर टेक्सास में जमीन खरीदने-बेचने पर रोक लग गई है। इसके अलावा इन संगठनों की किसी भी तरह से मदद करने वालों के लिए कड़ी नागरिक और आपराधिक सजाओं का रास्ता भी खुल गया है।

                                                                                                                                    स्रोत: एक्स

घोषणा में क्या कहा गया है?

गवर्नर एबॉट के आदेश में सबसे पहले मुस्लिम ब्रदरहुड के इतिहास और विचारधारा का उल्लेख किया गया। इसमें इसे एक अंतरराष्ट्रीय इस्लामिस्ट आंदोलन बताया गया, जिसकी नींव हथियारबंद जिहाद और शरिया कानून लागू करने वाले वैश्विक खिलाफत के लक्ष्य पर रखी गई थी।

एबॉट ने इसके संस्थापक हसन अल-बन्ना और बाद में इसके सुप्रीम गाइड मोहम्मद बदी के बयानों का हवाला देकर कहा कि संगठन के उद्देश्यों में लगातार यही सोच बनी रही है। उन्होंने यह भी बताया कि मुस्लिम ब्रदरहुड का नेटवर्क दुनिया भर में फैला है, जिसमें हमास भी शामिल है, जो इसका फ़िलिस्तीनी शाखा के रूप में शुरू हुआ था।

इसके बाद आदेश में CAIR का जिक्र किया गया और इसे अमेरिका में मौजूद मुस्लिम ब्रदरहुड के नेटवर्क का हिस्सा बताया गया। एबॉट ने इसके लिए फेडरल जाँचों, होली लैंड फ़ाउंडेशन टेरर फाइनेंसिंग केस के कानूनी निष्कर्षों और कई शैक्षणिक अध्ययनों का हवाला दिया, जिनमें CAIR के हमास और उससे जुड़े ढाँचे के साथ संबंध बताए गए थे।

आदेश में यह भी कहा गया कि 2008 में FBI ने CAIR के साथ अपने आधिकारिक संबंध खत्म कर दिए थे, और 2023 में बाइडेन प्रशासन ने भी कुछ संघीय दस्तावेजों से CAIR से जुड़े उल्लेख हटा दिए थे।

घोषणा का सबसे बड़ा हिस्सा उन CAIR से जुड़े व्यक्तियों पर केंद्रित था, जिन्हें बाद में आतंकवाद से जुड़े अपराधों में पकड़ा गया या उजागर किया गया। एबॉट ने इन मामलों को उदाहरण के रूप में इस्तेमाल किया ताकि यह दिखाया जा सके कि CAIR सिर्फ विचारधारा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका ढाँचा चरमपंथी नेटवर्कों से परिचालन स्तर पर भी जुड़ा हुआ है।

घोषणा में CAIR से जुड़े व्यक्तियों का उल्लेख

घोषणा में कई ऐसे लोगों के नाम दर्ज किए गए जो कभी CAIR के नेतृत्व, स्टाफ या फंडरेज़िंग नेटवर्क का हिस्सा रहे थे और बाद में आतंकवाद से जुड़े मामलों में दोषी पाए गए या आरोपित हुए। एबॉट ने कहा कि यह एक लंबे समय से चल रहा पैटर्न है कि CAIR ऐसे लोगों को अपने संगठन में महत्वपूर्ण जगह देता रहा है जिनके आतंकवादी संगठनों से सक्रिय संबंध रहे हैं।
सबसे प्रमुख नाम घसान इलाशी का था, CAIR टेक्सास के संस्थापक बोर्ड सदस्य और होली लैंड फाउंडेशन के कोषाध्यक्ष। उन्हें 2009 में आतंक वित्तपोषण के लिए दोषी ठहराया गया था और 65 साल की सजा मिली थी।
दूसरा नाम अब्दुरहमान आलामूदी का था, जिसने CAIR द्वारा आयोजित एक रैली में भाषण दिया था और खुद को हमास और हिज्बुल्लाह का समर्थक बताया था। बाद में वह अल-कायदा को फंडिंग करने का दोषी पाया गया।
तीसरा नाम रैंडल टॉड रोयर का था, जो CAIR में कम्युनिकेशन स्पेशलिस्ट और सिविल-राइट्स कोऑर्डिनेटर था। उसे 2004 में अल-कायदा और तालिबान की मदद की साजिश के लिए 20 साल की जेल हुई।
इसके बाद नाम आया बासेम खाफागी का, जो CAIR में कम्युनिटी रिलेशंस डायरेक्टर था। उसने 2003 में बैंक और वीजा फ्रॉड की बात कबूल की थी और उस पर पैसा कट्टरपंथी संगठनों को भेजने और अमेरिका पर आत्मघाती हमलों को बढ़ावा देने वाली सामग्री प्रकाशित करने के आरोप थे।
घोषणा में रबीह हद्दाद का नाम भी था, जो CAIR के लिए फंड जुटाता था। उसे ग्लोबल रिलीफ फ़ाउंडेशन के मामले में गिरफ्तार किया गया और बाद में देश से निकाला गया। यह संगठन 2002 में अल-कायदा को फंडिंग के चलते बंद किया गया था।
सूची में मुथन्ना अल-हनूटी का नाम भी शामिल था, मिशिगन का CAIR डायरेक्टर, जिसे 2011 में इराक के दो लाख बैरल तेल लेने और सद्दाम हुसैन की मदद के लिए प्रतिबंधों का उल्लंघन करने के आरोप में दोषी ठहराया गया।
एक और बड़ा नाम सामी अल-अरियान का था, पीआईजे (पैलेस्टीनियन इस्लामिक जिहाद) का फाइनेंसर और दोषी आतंकवादी। CAIR ने उसे 2014 में ‘Promoting Justice Award’ दिया था और 2020 के एक कार्यक्रम में भी उसे मंच दिया, जहाँ उसने CAIR का समर्थन बढ़ाने की अपील की।
घोषणा में निहाद अवाद का जिक्र था, CAIR के लंबे समय से कार्यकारी निदेशक। उन्होंने 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले पर खुशी जताई थी। इन गंभीर आरोपों और नामों के जवाब में CAIR ने ग्रेग एबॉट को कोर्ट में घसीटने की धमकी दी और उन्हें इजराइल फर्स्ट राजनेता कहा, साथ ही आरोप लगाया कि वह अमेरिकी मुसलमानों को बदनाम करने के लिए महीनों से एंटी-मुस्लिम माहौल बना रहे हैं।
                                                                                                                                  स्रोत: एक्स

CAIR और उसका भारत विरोधी प्रचार

CAIR एक इस्लामिस्ट संगठन है, जिसने कई बार भारत और हिंदुओं के खिलाफ बयान दिए हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि CAIR के रिश्ते आतंकी संगठन हमास से जुड़े रहे हैं। यह संगठन लगातार हिंदू-विरोधी हिंदूफोबिक अभियान और प्रोपेगैंडा फैलाता रहा है। पहले भी CAIR ने अत्यंत हिंदूफोबिक ‘Dismantling Global Hindutva’ कॉन्फ़्रेंस का खुलकर समर्थन किया था।
CAIR ने जनवरी 2022 में राणा अय्यूब की रिपोर्ट के आधार पर हिंदू-विरोधी प्रोपेगैंडा चलाया। उन्होंने प्रेस रिलीज जारी कर हिंदी फिल्म ‘सूर्यवंशी’ को थिएटरों में रिलीज न करने की माँग की और फिल्म को घृणित और खतरनाक हिंदुत्व प्रेरित एंटी-मुस्लिम प्रोपेगैंडा तक बता दिया।
CAIR ने पाकिस्तानी आतंकी आफिया सिद्दीकी को भी रिहा करने की माँग की है, जो अमेरिकी सेना और FBI पर हमले के लिए 86 साल की सजा काट रही है।
उसी साल CAIR ने Still Suspect: The Impact of Structural Islamophobia नाम से रिपोर्ट जारी की और दावा किया कि अमेरिका में मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव बढ़ रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, CAIR को एक साल में 6,720 शिकायतें मिलीं, जिनमें इमिग्रेशन, यात्रा संबंधी भेदभाव, कानून प्रवर्तन, सरकारी दखल, स्कूल घटनाएँ और फ्री स्पीच जैसे मुद्दे शामिल थे।
CAIR का दावा है कि अमेरिकी सरकार का भेदभाव मुसलमानों को अधिक प्रभावित करता है। लेकिन विरोधाभास यह है कि जो CAIR अमेरिका में इस्लामोफोबिया की शिकायत करता है, वही भारत में हिंदू-विरोधी नैरेटिव को लगातार बढ़ावा देता है।
दिसंबर 2022 में भी CAIR ने न्यू जर्सी में एक मोबाइल ट्रक पर दिखाए गए 26/11 हमले के वीडियो और लश्कर-ए-तैयबा आतंकियों के नामों पर आपत्ति जताई और इसे नफरत फैलाने वाला कहा, जबकि वीडियो में सिर्फ सच दिखाया गया था।
CAIR कई बार आफिया सिद्दीकी जैसे आतंकवादियों के समर्थन में भी खड़ा रहा है। जून 2023 में, जब कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी अमेरिका गए, तो वह सुनीता विश्वनाथ के साथ एक चर्चा में बैठे दिखाई दिए। वह HfHR नामक कट्टर हिंदू-विरोधी संगठन की सह-संस्थापक है और CAIR तथा ICNA जैसे संगठनों के लिए कार्यक्रम आयोजित करती रही है।
इसके अलावा राहुल गाँधी ने 2024 में कट्टर इस्लामिस्ट और भारत-विरोधी अमेरिकी सांसद इल्हान ओमर से भी मुलाकात की। ओमर इस्लामिस्ट एजेंडे को बढ़ावा देती हैं, मुस्लिम अपराधियों पर हुई कार्रवाई को इस्लामोफोबिया बताती हैं और आतंकवाद पर सवाल उठाने से बचती हैं।
वह 9/11 हमले को भी हल्के में लेते हुए CAIR के एक कार्यक्रम में बोली थीं कि यह कुछ लोगों ने कुछ कर दिया और इसके कारण मुसलमान अमेरिका में अपने अधिकार खो रहे हैं। इन सभी घटनाओं से CAIR के विचार, नेटवर्क और उसके भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी रुख स्पष्ट रूप से सामने आते हैं।

इस्लामी आतंकवादी संगठन हमास के साथ संबंध

ध्यान देने वाली बात यह है कि CAIR के रिश्ते फ़िलिस्तीनी इस्लामिक कट्टरपंथी आतंकी संगठन हमास से जुड़े रहे हैं। हमास का मानवाधिकार उल्लंघन का लंबा इतिहास है। यूरोपीय संघ, अमेरिका, कनाडा, इजरायल, जापान, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन सहित कई देशों ने हमास को आधिकारिक तौर पर आतंकी संगठन घोषित किया हुआ है।

भारत विरोधी प्रोपेगेंडा का चेहरा डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार पीटर नवारो ने 50 फीसदी टैरिफ को लेकर फैलाया झूठ, रूसी तेल से उठा रहे US-EU


अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगाए जाने को सलाहकार पीटर नवारो ने एक के बाद एक 9 ट्वीट कर भारत पर झूठे आरोप लगाए। उनके झूठ की कलई खुल गई है।

नवारो ने भारत के रूस से तेल खरीदने का मुद्दा उठाया। साथ ही, कहा कि भारत राष्ट्रपति पुतिन की ‘युद्ध मशीनरी’ को ताकत दे रहा है।

यूक्रेन युद्ध को ‘मोदी का युद्ध’ कहने वाले नवारो ने कहा कि भारतीय कंपनियाँ रूस के लिए ‘मनी लॉन्ड्रिंग’ कर रही हैं। उन्होंने 9 ट्वीट का एक थ्रेड लिखा, जिसमें भारत पर लगाए गए 50 फीसदी टैरिफ का समर्थन किया गया।

नवारो ने दावा किया, “ये केवल भारत के व्यापार के बारे में नहीं है, बल्कि ये पुतिन के युद्ध मशीन को भारत द्वारा दी गई आर्थिक जीवनरेखा को काटने के बारे में है।”

ये बताना जरूरी है कि रूस दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल उत्पादक और निर्यातक देश है। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद, कच्चे तेल की कीमतें 137 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गई हैं।

लगभग 1.4 अरब की आबादी वाले भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना था। ईरानी तेल और वेनेज़ुएला के तेल पर संयुक्त राज्य अमेरिका, जी-7 देशों और यूरोपीय संघ (ईयू) ने प्रतिबंध लगाई है, जबकि रूसी तेल पर प्रतिबंध नहीं लगाई है। इनलोगों ने रूसी तेल पर ‘प्राइस कैप’ लगाई है, जो रूसी कच्चे तेल को अंतरराष्ट्रीय कीमत को कम रखने रखने में मदद करता है।

भारत ने रूसी तेल की खरीद के माध्यम से किसी भी अंतर्राष्ट्रीय मानदंड का उल्लंघन नहीं किया, क्योंकि उसने ‘प्राइस कैप’ का पालन किया है।

भारत अगर रूसी तेल नही खरीदता है, तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच सकती हैं। इसका असर सिर्फ भारत पर ही नहीं, बल्कि दुनिया के बाकी देशों पर भी पड़ेगा।

मोदी सरकार के इस फैसले से वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें स्थिर और संतुलित बनी रहीं। और इस तथ्य को कम से कम तीन अमेरिकी अधिकारियों ने स्वीकार किया है, जिनमें अमेरिकी वित्त मंत्री जेनेट येलेन, राजदूत एरिक गार्सेटी और राजनयिक ज्योफ्री पायट शामिल हैं।

एक दूसरे ट्वीट में पीटर नवारो ने आरोप लगाया, ‘‘भारत हमारे डॉलर का इस्तेमाल रियायती दर पर रूसी कच्चा तेल खरीदने के लिए करता है।”

वास्तविकता में, भारत तीसरे देशों से रूसी कच्चा तेल खरीदता है, जहाँ लेन-देन अमेरिकी डॉलर में नहीं, बल्कि संयुक्त अरब अमीरात के दिरहम (एईडी) जैसी मुद्राओं में किया जाता है।

ये बात भी सच है कि अमेरिका ने पहले कभी भी रूसी तेल की खरीद पर आपत्ति नहीं जताई थी, क्योंकि इससे भारत के तेल खरीदने से कच्चे तेल की कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ने से रुकी थीं।

यदि अमेरिका चाहता कि अन्य देश रूसी तेल खरीदना बंद कर दें, तो वह रूसी कच्चे तेल पर प्रतिबंध लगा सकता था, जैसा उसने वेनेजुएला और ईरान के मामले में किया था।

पीटर नवारो ने दावा किया, “भारतीय रिफाइनिंग कंपनियाँ, अपने रूसी साझेदारों के साथ मिलकर, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बड़े मुनाफे के लिए तेल को रिफाइन करके बेचती हैं। इससे रूस को युद्ध के लिए पैसा जुटाने में मदद मिल रही है।”

रूसी कच्चे तेल को ‘काला बाजारी तेल’ कहना भी गलत है, क्योंकि इसकी खरीद पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। सिर्फ ‘प्राइस कैप’ यानी अधिकतम कीमत तय की गई है। भारत सभी अंतरराष्ट्रीय ढाँचों का पालन करता है और रूस में प्रतिबंधित परियोजनाओं से एलएनजी और एलपीजी नहीं खरीदता है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के व्यापार और विनिर्माण मामलों के वरिष्ठ सलाहकार ने दावा किया कि भारत द्वारा रूसी तेल का आयात ‘घरेलू मांग’ से प्रेरित नहीं है, बल्कि अवैध मुनाफाखोरी से प्रेरित है।

इस दावे का कोई सबूत नहीं है। भारत को अपनी 1.4 अरब आबादी के ऊर्जा खर्च को वहन करना है। रूस-यूक्रेन युद्ध छिड़ने के बाद, कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया।

भारत में तेल लोक सेवा उपक्रमों (PSU) ने रूसी तेल खरीदा। अप्रैल 2022 से जनवरी 2023 तक तीन PSUs की कुल हानि Rs 21,000 करोड़ रुपए यानी 2.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर था। ये घाटा सिर्फ इसलिए उठाया गया ताकि घरेलू बाजार में ईंधन की कीमतें स्थिर रहें।

मोदी सरकार ने ऐसे नियम बनाए, जिनके तहत निजी रिफाइनिंग कंपनियों को अपने निर्यात किए गए पेट्रोल का कम से कम 50% घरेलू बाजार में वापस बेचना अनिवार्य कर दिया गया । डीजल के निर्यात पर भी 30% की सीमा लगा दी गई।

साथ ही, बड़े पैमाने पर मुनाफाखोरी को रोकने के लिए निर्यात पर टैक्स लगाया गया। इन रणनीतिक फैसलों से न केवल भारत में, बल्कि दुनिया भर में ईंधन की कीमतों को स्थिर रखने में मदद मिली।

यह बताना जरूरी है कि उस समय ओपेक+ देशों ने कच्चे तेल के उत्पादन में 58.6 लाख बैरल प्रतिदिन की कटौती की थी। भारत के समय पर हस्तक्षेप करने और अहम फैसलों ने ईंधन की कीमत नियंत्रित रखने में मदद की।

अपने एक ट्वीट में पीटर नवारो ने दावा किया, “भारत की बड़ी तेल लॉबी ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को क्रेमलिन के लिए एक विशाल रिफाइनिंग केंद्र और तेल मनी लॉन्ड्रोमेट में बदल दिया है।”

सच तो यह है कि भारत 2022 से नहीं, बल्कि कई दशकों से पेट्रोलियम उत्पादों का चौथा सबसे बड़ा रिफाइनकर्ता और निर्यातक रहा है। भारत 150 देशों को पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात करता है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि रूस से ‘रियायती कीमतों’ पर खरीदे गए अधिकांश कच्चे तेल को देश की 23 रिफाइनरियों में से एक में संसाधित करने के बाद घरेलू स्तर पर ही खपत कर लिया गया।

यह सच है कि यूरोप, अफ्रीका और एशिया ने भारत से परिष्कृत कच्चा तेल और ईंधन खरीदा। लेकिन, देशों के बीच के लेन-देन को ‘लॉन्ड्रिंग’ नहीं कहा जा सकता।

अपने एक ट्वीट में पीटर नवारो ने दावा किया, “भारत की बड़ी तेल लॉबी ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को क्रेमलिन के लिए एक विशाल रिफाइनिंग केंद्र और तेल मनी लॉन्ड्रोमेट में बदल दिया है।”

सच तो यह है कि भारत 2022 से नहीं, बल्कि कई दशकों से पेट्रोलियम उत्पादों का चौथा सबसे बड़ा रिफाइनर और निर्यातक रहा है। भारत 150 देशों को पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात करता है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि रूस से ‘रियायती कीमतों’ पर खरीदे गए अधिकांश कच्चे तेल को देश की 23 रिफाइनरियों में से एक में संसाधित करने के बाद घरेलू स्तर पर ही खपत कर लिया गया।

यह सच है कि यूरोप, अफ्रीका और एशिया ने भारत से परिष्कृत कच्चा तेल और ईंधन खरीदा, लेकिन वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में शामिल होने के नाते उन्होंने अपनी इच्छा से ऐसा किया। इसलिए, देशों के बीच के लेन-देन को ‘लॉन्ड्रिंग’ नहीं कहा जा सकता।

एक अन्य ट्वीट में पीटर नवारो ने दावा किया, ” भारत अब प्रतिदिन 1 मिलियन बैरल से अधिक रिफाइन पेट्रोलियम का निर्यात करता है, जो कि रूस से मँगाए गए कच्चे तेल की मात्रा के आधे से भी अधिक है।"

भारत के कुल तेल आयात में रूसी तेल का लगभग 30-35% हिस्सा है। और सभी रिफाइन पेट्रोलियम उत्पादों का 70% घरेलू माँग को पूरा करने के लिए उपयोग किया जाता है। इसलिए, व्यापार और विनिर्माण मामलों के वरिष्ठ सलाहकार के दावों में सच्चाई नहीं है।

हालाँकि, परिष्कृत रूसी कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के फिर से बेचने या निर्यात पर कभी भी ‘कीमत कवर’ नहीं लगाई गई थी। हाल ही में जुलाई 2025 में रूसी कच्चे तेल से परिष्कृत उत्पादों पर कुछ प्रतिबंध लगाए गए थे।

वित्तीय वर्ष 2024-2025 में यूरोपीय संघ ने भारत से पेट्रोलियम उत्पादों का आयात बढ़ा दिया। ये करीब 221 मिलियन मीट्रिक टन (एमएमटी) हो गया है। यूरोपीय संघ रूसी कच्चे तेल से रिफाइन ईंधन के आयात को निलंबित कर सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। फ्रांस, नीदरलैंड और बेल्जियम भारत से पेट्रोलियम उत्पादों के शीर्ष आयातक बने हुए हैं।

पीटर नवारो ने भारत विरोधी बयानबाजी के माध्यम से सोशल मीडिया पर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए ‘व्यापार घाटे’ का मुद्दा उठाया।

उन्होंने बेशर्मी से कहा,  "भारत के साथ हमारा 50 अरब डॉलर का व्यापार घाटा है—और वे हमारे डॉलर का इस्तेमाल रूसी तेल खरीदने के लिए कर रहे हैं। वे खूब पैसा कमा रहे हैं और यूक्रेन के लोग मर रहे हैं।"

सच तो यह है कि अमेरिका यूरोपीय संघ, मेक्सिको और यहाँ तक कि ‘कट्टर प्रतिद्वंद्वी’ चीन के साथ भी बड़ा व्यापार घाटा झेल रहा है। जैसा कि पहले बताया गया है, भारत रूसी तेल खरीदने के लिए अमेरिकी डॉलर का इस्तेमाल नहीं करता (क्योंकि यह तेल तीसरे देशों की रिफाइनरियों द्वारा खरीदा जाता है)।

विडंबना यह है कि संयुक्त राज्य अमेरिका रूस से संवर्धित यूरेनियम खरीदता है और पीटर नवारो के संदिग्ध तर्क के अनुसार, यह देश पुतिन के युद्ध कोष को ‘आर्थिक मदद’ है।

रूस से अमेरिका का वर्तमान आयात 2024 में 3 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अगस्त 2025 में दावा किया है कि अमेरिका के साथ देश का द्विपक्षीय व्यापार 20% बढ़ गया है।

पीटर नवारो ने भारत पर ‘रणनीतिक मुफ्तखोरी’ का आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया, “भारत रूसी हथियार खरीदना जारी रखे हुए है, जबकि माँग कर रहा है कि अमेरिकी कंपनियाँ संवेदनशील सैन्य तकनीक हस्तांतरित करें और भारत में संयंत्र स्थापित करें।”

एक संप्रभु देश होने के नाते, भारत किसी भी साझेदार देश से हथियार खरीदने का विकल्प चुन सकता है। रूस भारत का एक विश्वसनीय सहयोगी रहा है। इसलिए हथियारों और गोला-बारूद का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है।

भारत फ्रांस, इजराइल और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देशों से भी हथियार खरीदता है। भारत एशिया की एकमात्र बड़ी शक्ति है जो सैन्य रूप से चीन के खतरे का मुकाबला कर सकती है।

भारत और अमेरिका क्वाड और हिंद-प्रशांत रक्षा सहयोग का हिस्सा हैं। चूँकि कूटनीति और व्यापार में कुछ भी मुफ्त नहीं होता, इसलिए भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों में ‘रणनीतिक मुफ्तखोरी’ की कोई अवधारणा नहीं है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के व्यापार एवं विनिर्माण मामलों के वरिष्ठ सलाहकार ने भारत से अमेरिकी आयात पर लगाए गए 50% टैरिफ को सही ठहराया है।

उन्होंने कहा, ” यूक्रेन में शांति का रास्ता नई दिल्ली से होकर गुजरता है। ” सच्चाई यह है कि भारत ने लगातार यूक्रेन और रूस के बीच शांति का आह्वान किया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद एक साक्षात्कार में कहा है , “रूस और यूक्रेन, दोनों के साथ मेरे घनिष्ठ संबंध हैं।” उन्होंने कहा, “मैं राष्ट्रपति पुतिन के साथ बैठकर कह सकता हूँ कि यह युद्ध का समय नहीं है। मैं राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की से भी दोस्ताना अंदाज में कह सकता हूँ कि भाई, दुनिया में चाहे कितने भी लोग आपके साथ खड़े हों, युद्ध के मैदान में कभी कोई समाधान नहीं निकलेगा।”

भारत और उसकी सरकार ने हमेशा शांति और कूटनीति की वकालत की है। विडंबना यह है कि जो अमेरिका रूस से यूरेनियम खरीदता है, वही अमेरिका उसी देश से कच्चा तेल खरीदने और वैश्विक बाजारों को स्थिर रखने के लिए भारत पर 50% टैरिफ लगा रहा है।

यह कुछ और नहीं बल्कि ट्रम्प प्रशासन का झूठा बहाना है और भारत को बलि का बकरा बनाने की एक सोची समझी साजिश है। 

जिस ‘इंटरन्यूज’ को अमेरिकी एजेंसी ने दिए 4100+ रूपए करोड़, उससे प्रशांत भूषण की ‘संभावना’ का रिश्ता; रवीश कुमार, प्रतीक सिन्हा… लेफ्ट-लिबरल गैंग के ‘अड्डे’ पर भी USAID की छाया

                      रवीश कुमार, प्रतीक सिन्हा और प्रशांत भूषण (फोटो साभार: द वायरल और विकिपीडिया)
कहते हैं जख्मी शेर बहुत खतरनाक होता है। जिसे सही साबित कर रहे हैं भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प। दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद से ट्रम्प का हर कदम सिर्फ अमेरिका ही नहीं विश्व के लिए फायदेमंद हो रहा है। इन जनविरोधी संस्थाओं पर कुठाराघात करने का असर भारत में भी देखा जा सकता है। आन्दोलनजीवी भी बिलों में छुप गए। पिछली लोकसभा में जो विपक्ष उनके विरुद्ध एक भी शब्द बोलते ही कोहराम मचा देता था, आज वही विपक्ष और वही संसद सत्तारूढ़ पक्ष एक से बढ़कर एक प्रहार विपक्ष पर प्रहार कर रहा है कोई कोहराम नहीं। क्योकि कोहराम करने की कीमत देने वाला कोई नहीं। ट्रम्प के कठोर कदमों का अभी असर दिखना बाकी है।   

आतंकवादियों की फांसी रुकवाने आधी रात को सुप्रीम कोर्ट खुलवाना, दंगाइयों और घुसपैठियों के बचाव में पैरवी करना, उनको निर्दोष साबित करने समाचार लिखना, अपने चैनल पर प्रसारित करना ये सब USAID की फंडिंग से हो रहा था क्या?  

गौरतलब यह है कि आज उन मुस्लिम कट्टरपंथियों --जो अयोध्या, काशी और मथुरा आदि तीर्थों का विरोध करते है,-- द्वारा कहा जा रहा है कि इस बार मुसलमानों ने बीजेपी को वोट दिया और हमारा मीडिया भी इसे खूब प्रसारित कर रहा है। जबकि आंकड़े विपरीत दिखा रहे हैं। अगर हिन्दू मुसलमानों की तरह एकजुट होकर बीजेपी को वोट नहीं देता दिल्ली बीजेपी नहीं आती। सबसे बड़ा सबूत दिल्ली दंगों का आरोपित 33000+ वोट कैसे ले गया?     

USAID के फंडिंग वाले विवाद में अब प्रोपगेंडाबाज प्रशांत भूषण का नाम उजागर हुआ है। X यूजर ‘द स्टोरी टेलर’ ने खुलासा किया है कि प्रशांत भूषण अपने संस्थान ‘Sambhaavnaa Institute of Public Policy and Politics’ के माध्यम से उस ‘इंटरन्यूज’ से जुड़े थे जिसे USAID फायदा दे रहा था।

इस Internews का काम दिखाने को दुनिया भर में ‘स्वतंत्र मीडिया’ को बढ़ावा देना है लेकिन हकीकत में ये फैलाता प्रोपगेंडा है। अगस्त 2024 में भी ये भारत विरोधी गुटों के साथ मिलकर सत्ता परिवर्तन के उद्देश्य से काम कर रहा था। इसके अलावा इसका उद्देश्य अलग-अलग मीडिया आउटलेट को पैसा देकर Fact Check  के नाम पर सोशल मीडिया पर सेंसरशिप करना और सूचनाओं को नियंत्रित करना है।

वहीं भूषण के Sambhaavnaa Institute of Public Policy and Politics की बात करें तो 20 साल पहले इसकी स्थापना Kumud Bhushan Education Society के अंतर्गत हुई थी। इसका उद्देश्य दिखाया जाता है कि ये संस्थान अन्याय से निपटने और उस पर चिंतन करने का काम करते हैं, लेकिन अगर इसकी परतें खंगालेंगे तो वामपंथी इकोसिस्टम का असर यहाँ पर पूरा-पूरा दिखेगा।

हिमाचल प्रदेश के कंगरा जिले के पालमपुर के कंदबारी गाँव में संगठन के लिए जगह ली गई थी, लेकिन बाद में ये अड्डा बना वामपंथियों का। जहाँ अक्सर योगेंद्र यादव, हर्ष मंदर, मेधा पाटकर, प्रतीक सिन्हा, नंदिनी राव, रवीश कुमार जैसे वामपंथी जुड़े रहते हैं। इसके अलावा प्रणजॉय गुहा, रवलीन कौर, मनु मुदगिन, नीतू सिंह, भाषा सिंह, स्वाति पाठक, अतुल चौरसिया, अपूर्वानंद झा जैसे पत्रकार प्रशांत भूषण के संगठन से प्रत्यक्ष तौर पर जुड़े हुए हैं। अब सबसे खास बात। अगस्त 2024 में इसी जगह एक वर्कशॉप हुई थी जिसे सपोर्ट कर रहा था वही इंटरन्यूज जिसे न सिर्फ जोर्ज सोरोस वाली Open Society Foundation  से फंड मिलता है बल्कि USAID भी इसे भारी मात्रा में फंडिंग देती है।

इंटरन्यूज और USAID का संबंध

विकीलिक्स द्वारा दी जानकारी के अनुसार, बता दें कि USAID ने इस Internews को करीबन 472.6 मिलियन डॉलर (4106 करोड़ रुपए) दिए हुए हैं और यही Internews भारत में Dead Leads के अंतर्गत चलने वाले ‘फैक्ट शाला’ के साथ काम करता है, जिसके प्रमुख चेहरे The Print के शेखर गुप्ता, The Quient की ऋतु कपूर और Beat root News के फाय डिसूजा हैं। इन कनेक्शन्स से समझा जा सकता है कि कैसे भारत में फैक्ट चेकिंग और मीडिया लिटरेसी के नाम पर सूचनाओं को सेंसर करने में USAID का पीछे से हाथ है।
इतना ही नहीं इसी USAID ने उस वार्षिक अंतर्राष्ट्रीय भ्रष्टाचार विरोधी सम्मेलन (आईएसीसी) को भी वित्त पोषित किया है जिसने साल 2022 में भारत विरोधी दिशा रवि को बोलने के लिए मंच दिया था। दिशा रवि वही हैं जिनका नाम 2021 में भारत विरोधी टूलकिट में आया था और दिल्ली पुलिस ने उन्हें पकड़ा था। आईसीसी की लिस्ट में एक संजय प्रधान भी थे जो ओपन गवर्नमेंट पार्टनरशिप के अंबेसडर हैं। यही ओजीपी उस ‘वी-डेम इंस्टिट्यूट’ को फंड देते हैं जो बेबुनियाद डेटा देकर भारत विरोधी प्रोपगेंडा फैलाने का काम करता है।

इक्वेलिटी लैब्स और इंटरन्यूज कनेक्शन

एक यूजर तापेश यादव ने इंटरन्यूज और इक्वेलिटी लैब्स के बीच फंड देने के कनेक्शन को भी उजागर किया है। ये इक्वेलिटी लैब्स अपने आपको दलित नागरिक अधिकार संगठन के रूप में बताता है, लेकिन हकीकत में ये जातिगत रंगभेद, इस्लामोफोबिया और धार्मिक असहिष्णुता पर केंद्रित एजेंडे को बढ़ाने का काम करता है।
इसी ने अन्य संगठनों के साथ मिलकर ‘संयुक्त राज्य अमेरिका में जाति: दक्षिण एशियाई अमेरिकियों के बीच जाति का सर्वेक्षण’ नामक रिपोर्ट तैयार की थी। इसके अलावा ट्विटर पर जब सीईओ जैक डोर्सी ने ‘ब्राह्माणवादी पितृसत्ता को तोड़ो’ लिखा अभियान चलाया था और बाद में पता चला था कि उसे डिजाइन करने वाले इक्वालिटी लैब्स के कार्यकारी निदेशक थेनमोझी सुंदरराजन ही थे।
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USAID का प्रोपगेंडा नेटवर्क अभी भी पूरी तरह से एक्सपोज नहीं हुआ है, ये किस संस्था को फंड देते थे, वो संस्था किससे जुड़ी थी, उस संस्था के लोग कैसे नैरेटिव बनाते थे और USAID द्वारा दी धनराशि का प्रयोग किन कामों में होता था… इन सबका खुलासा अभी और भी होना बाकी है। दशकों से USAID ने अमेरिकियों के पैसों का गलत इस्तेमाल किया है और अब धीरे-धीरे सबका पता चला रहा है।