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अगर दलित-जाट-तमिल कोई नहीं है हिंदू…नोमानी बताओ कि शिया, सुन्नी, वहाबी, अहमदी, पठान और पासमांदा मुस्लिम हैं? अगर मुस्लिम है तो एक ही मस्जिद में नमाज क्यों नहीं पढ़ सकते? मौलाना सज्जाद नोमानी खुले में कर रहा भारतीयों को तोड़ने का प्रयास: सनातनियों से करता है घृणा, तालिबानियों को भेजता है सलाम

                                                   सज्जाद नोमानी (फोटो साभार - यूट्यूब/)
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से जुड़े मौलाना खलीलुर रहमान सज्जाद नोमानी का एक विवादित बयान की वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से शेयर हो रही है। वायरल हो रही एक वीडियो क्लिप में वह दावा करते हैं कि भारत में हिंदू अल्पसंख्यक हैं। किसी भी परिस्थिति में हिंदुओं को बहुसंख्यक नहीं माना जा सकता।

नोमानी जिस तरह हिन्दुओं को विभाजित करने की कोशिश कर रहा है उसके जवाब में हिन्दुओं को भी इन कट्टरपंथियों से पूछना चाहिए कि जब शिया, सुन्नी, वहाबी, अहमदी, पासमांदा आदि दूसरे फिरके मुस्लिम हैं तो एक मस्जिद में नमाज क्यों नहीं पढ़ सकते? क्यों नहीं एक ही कब्रिस्तान में मुर्दे को दफ़न किया जा सकता? इस कट्टरपंथी को मालूम है कि हिन्दू को जाति बांटकर विभाजित किया जा सकता है, लेकिन इन कट्टरपंथियों अपनी मुस्लिम कौम से सभी फिरकों को एक ही मस्जिद में नमाज पढ़ने और सभी के मुर्दे एक ही कब्रिस्तान में दफ़न होने चाहिए।

 

इतना ही नहीं, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के कुछ कालनेमि हिन्दू भी प्रोग्राम में शामिल थे,  क्योकि उनकी पार्टियों को इनके वोट चाहिए। वीडियो में देखिए कितनी मुस्लिम महिलाएं हिजाब, नकाब या बुर्के हैं। दूसरे, क्या शिया, सुन्नी और वहाबी आदि पचासों फिरकों के लिए अलग मस्जिद और कब्रिस्तान के लिए जगह क्या land jihad नहीं?               

मौलाना नोमानी ने अपने इस दावे के पीछे तर्क देते हुए देश के कई बड़े सामाजिक और क्षेत्रीय समूहों को हिंदू धर्म के दायरे से बाहर आते हैं। उन्होंने कहा, सिख, ईसाई और बौद्ध ये तो हिंदू हैं ही नहीं। इनके अलावा अनुसूचित जाति (SC), जाट और जनजातीय लोग भी हिंदू नहीं हैं। न ही तमिलनाडु के लोग और लिंगायत खुद को हिंदू मानते हैं। 

भाषण में नोमानी की दिखी हिंदू घृणा

अपने भाषण में नोमानी ने केवल सामाजिक वर्गीकरण ही नहीं किया, बल्कि देश की राजनीति और मुस्लिम समुदाय के रुख पर भी गहरी निराशा और हताशा व्यक्त की। उन्होंने कहा “हमने हिंदुओं को ‘सेकुलर’ (धर्मनिरपेक्ष) और ‘फासिस्ट’ (फासीवादी) श्रेणियों में बाँट दिया। हम राजनीतिक समर्थन के लिए सेकुलर हिंदुओं पर निर्भर रहे, लेकिन इन समूहों ने आखिरकार देश की कमान उन लोगों के हाथों में सौंप दी जिन्हें हम फासिस्ट हिंदू कहते हैं। दोनों ने ही मिलकर हमारे मकसद को नुकसान पहुँचाया।”

 सज्जान नोमानी का यह भाषण 2 फरवरी, 2026 को नई दिल्ली के इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में आयोजित ‘मिल्लत टाइम्स कॉन्क्लेव 2026’ के समापन सत्र के दौरान दिया गया था।

यह कार्यक्रम इस मीडिया हाउस की 10वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में रखा गया था। इस कार्यक्रम में कॉन्ग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर, सलमान खुर्शीद, इमरान प्रतापगढ़ी, समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन चौधरी और भाजपा नेता यासिर जिलानी जैसे कई बड़े राजनेता और पत्रकार शामिल थे।

मौलाना नोमानी ने जोर देकर कहा कि उनका यह बयान हवा-हवाई नहीं है, बल्कि देश भर में धार्मिक, जातिगत और आदिवासी पहचानों पर किए गए उनके तीन दशकों के सफर और शोध पर आधारित है।

पहले भी उगल चुका है हिंदुओं के लिए जहर

 हिंदुओं को तोड़ने और हिंदुओं को बाँटने की बात करने वाला सज्जाद नोमानी का ये पहला विवादित बयान नहीं है। ये वही सज्जाद नोमानी है जिसे तालिबान के आने पर खुशी हुई थी और जो बच्चियों की शिक्षा का विरोधी रहा है।

साल 2023 में नोमानी की वीडियो सामने आई थी। अपनी वीडियो में वह कहता सुनाई पड़ रहे थे, “पाक रमजान की रात में उन लोगों पर लानत भेजता हूँ जो अपनी बच्चियों को अकेले कोचिंग सेंटर या कॉलेज भेजते हैं। अल्लाह उन्हें जहन्नुम में भेजेगा।”

इतना ही नहीं साल 2021 में तालिबान ने जब अफगानिस्तान पर कब्जा किया था तब सज्जाद नोमानी ने भारत में इसका स्वागत किया था। मौलाना सज्जाद नोमानी ने तालिबान की तारीफों के पुल बाँधते हुए तालिबानियों को सलाम भेजा था।

सज्जाद नोमानी की हिंदू घृणा  और भारत को तोड़ने का प्रयास

अजीब बात है कि एक तरफ सज्जाद नोमानी खुलकर भारत के हिंदुओं के विरुद्ध अपनी घृणा जाहिर करता है, उन्हें बाँटने की बात करता है, उनके अस्तित्व पर सवाल उठाता है। दूसरी तरफ खुलकर तालिबान के लिए अपना समर्थन देता है, इस्लामी कट्टरपंथ की पैरवी करता है, बच्चियों की पढ़ाई को हराम बताता है, बड़े-बड़े नेता, लेखक, विचारक उसके भाषणों को सुनते हैं और स्वरा भास्कर जैसे लोग तो मुस्लिमों के बीच राजनीति करने के लिए अपना पहनावा तक बदलकर इनके आगे सरेंडर कर देते हैं। लेकिन फिर भी भारत के लिबरल उसे बुद्धिजीवी मानकर इतना बड़ा मंच देते हैं। उसे सुनने के लिए बड़ी तादाद में लोग आते हैं।

कहना गलत नहीं है कि जिन ‘सेकुलर हिंदुओं’ ने कभी अपनी उदारता दिखाने के लिए नोमानी को ‘महान स्कॉलर’ के रूप में स्थापित किया, आज वही स्कॉलर मंचों से खुलेआम हिंदुओं के अस्तित्व और उनकी जनसांख्यिकीको चुनौती दे रहे हैं। आज मंच से खुलेआम इवकी नफरत जगजाहिर हो रही है।

नोमानी का यह दावा कि भारत में हिंदू बहुसंख्यक नहीं हैं और जो खुद को हिंदू मानते हैं वो असल में अलग-अलग पहचानों में बंटे हैं… कोई साधारण बयान नहीं है।

ये हिंदुओं के लिए ही सीखने का समय है कि जब हम खुद को राजनीति जाति और क्षेत्रो में खुद को बाँटते हैं, तभी नोमानी जैसे लोग इसी कमजोरी को पकड़कर हम पर चोट करते हैं। खुलकर हम भारतीयों को तोड़ने का प्रयास करते हैं और ये संदेश देते हैं कि देश में हिंदू आबादी बहुसंख्यक नहीं है और जो लोग खुद को हिंदू मानते हैं वो अलग हैं। इसका सीधा उद्देश्य बहुसंख्यक समाज के भीतर एक ऐसा हीनभावना और भ्रम पैदा करना है जिससे वे अपनी सामूहिक ताकत को भूल जाएँ और कट्टरपंथी ताकतों का गजवा-ए-हिंद का रास्ता आसान हो सके।

वर्जिन बच्चियों से निकाह के लिए तालिबान ने सुनाया फरमान, कहा- इनकी चुप्पी को ‘हाँ’ समझो: चुप्पी साधे बैठा रहा भारत का लिबरल गैंग

तालिबान सरकार ने वर्जिन लड़कियों की चुप्पी को माना मंजूरी, निकाह के लिए नया फरमान (फाइल फोटो साभार: The Conversation)
अफगानिस्तान में तालिबान सरकार ने एक नया फैमिली लॉ लागू किया है और इस कानून की एक लाइन को लेकर पूरी दुनिया में बहस शुरू हो गई है। इस नए नियम में कहा गया है कि अगर कोई ‘कुँवारी लड़की’ (वर्जिन लड़की) निकाह के प्रस्ताव पर कुछ नहीं बोलती, तो उसकी चुप्पी को ही उसकी मंजूरी यानी कंसेंट माना जाएगा। यही वजह है कि मानवाधिकार संगठन, महिला अधिकार कार्यकर्ता और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ इसे औरतों और बच्चियों की आजादी पर एक और बड़ा हमला बता रही हैं।

क्या है तालिबान का नया फैमिली लॉ?

तालिबान ने 31 आर्टिकल वाला एक नया फैमिली रेगुलेशन जारी किया है, जिसका नाम ‘प्रिंसिपल्स ऑफ सेपरेशन बिटवीन स्पाउसेस’ रखा गया है। इसे तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा ने मंजूरी दी है। यह कानून निकाह, तलाक, नाबालिगों का निकाह, मियां-बीवी के अलगाव और पारिवारिक विवादों से जुड़े नियम तय करता है। लेकिन सबसे विवादित हिस्सा वही है, जिसमें ‘कुँवारी लड़की’ की चुप्पी को उसकी मंजूरी माना गया है।

क्या है ‘खियार अल बुलूघ’ का नियम?

इस कानून में ‘खियार अल बुलूघ‘ नाम का एक इस्लामी कानूनी सिद्धांत भी शामिल किया गया है। इसका मतलब है ‘बालिग होने के बाद चुनने का अधिकार।’ इसके तहत अगर किसी बच्चे का निकाह कम उम्र में तय कर दिया गया है, तो वह बालिग होने के बाद उस निकाह को खत्म करने की माँग कर सकता है।
लेकिन यहाँ एक बड़ी शर्त भी रखी गई है। निकाह खत्म करने के लिए मजहबी अदालत की मंजूरी जरूरी होगी। यानी सिर्फ लड़की की इच्छा से निकाह खत्म नहीं होगा, बल्कि तालिबान की अदालत फैसला करेगी कि निकाह रद्द किया जाए या नहीं।
कानून में यह भी कहा गया है कि अगर शौहर निकाह के लिए सही नहीं माना जाता या दहेज को लेकर बहुत ज्यादा फर्क होता है, तो उस निकाह को मान्यता नहीं दी जाएगी। लेकिन आलोचकों का कहना है कि कौन ‘सही लड़का है’, इसका फैसला भी तालिबान की मजहबी अदालतें ही करेंगी।

नाबालिग बच्चों के निकाह को लेकर क्या कहता है कानून?

इस नए कानून में ‘बाल विवाह’ को लेकर कहा गया है कि कुछ परिस्थितियों में नाबालिग लड़के और लड़कियों के निकाह को मान्यता दी जा सकती है। कानून में अब्बा और दादा को बच्चों का निकाह तय करने का अधिकार दिया गया है। यानी परिवार के बड़े पुरुष यह फैसला कर सकते हैं कि लड़की का निकाह किससे और कब होगा।

कानून में यह भी कहा गया है कि अगर रिश्तेदारों द्वारा तय किए गए निकाह में लड़का ‘सामाजिक रूप से उपयुक्त’ माना जाता है और दहेज भी मजहबी मानकों के मुताबिक है, तो उस निकाह को वैध माना जा सकता है। आसान भाषा में कहें तो अगर परिवार और मजहबी अदालत को रिश्ता सही लगता है, तो कम उम्र में हुए निकाह भी स्वीकार किए जा सकते हैं।

निजी जिंदगी में भी बढ़ेगा तालिबान सरकार का दखल

इस कानून में सिर्फ निकाह ही नहीं बल्कि कई निजी मामलों में भी तालिबान की अदालतों को हस्तक्षेप का अधिकार दिया गया है। अगर किसी औरत पर व्यभिचार यानी अवैध संबंध का आरोप लगाता है, अगर कोई धर्म परिवर्तन करता है, अगर शौहर लंबे समय तक गायब रहता है या ‘जिहार’ जैसी स्थिति बनती है, तो तालिबानी जज फैसला ले सकेंगे।

‘जिहार’ इस्लामी कानून का एक पुराना सिद्धांत है जिसमें शौहर अपनी बीवी की तुलना ऐसी औरत रिश्तेदार से करता है जिससे निकाह करना मजहबी रूप से मना होता है। ऐसे मामलों में अदालत मियां-बीवी को अलग करने, जेल भेजने या दूसरी सजा देने का आदेश भी दे सकती है।

क्यों खतरनाक माना जा रहा कानून?

मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि किसी भी निकाह में लड़की की साफ और खुली सहमति जरूरी होती है। लेकिन अफगानिस्तान में औरतों की स्थिति पहले ही बहुत कमजोर हो चुकी है। 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद लड़कियों की पढ़ाई छठी क्लास के बाद बंद कर दी गई। औरतों को यूनिवर्सिटी जाने से रोक दिया गया। कई नौकरियों में औरतों के काम करने पर पाबंदी है और उनके अकेले यात्रा करने पर भी सख्त नियम लागू हैं।

ऐसे माहौल में अगर कोई लड़की डर, दबाव या परिवार की वजह से चुप रहती है, तो उसकी चुप्पी को ‘हाँ’ मान लेना जबरन निकाह का रास्ता खोल सकता है। जिस समाज में औरतों को खुलकर बोलने की आजादी ही नहीं हो, वहाँ ‘चुप्पी ही सहमति है’ जैसा नियम बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।

दुनिया भर में हो रही कानून की आलोचना

एमनेस्टी इंटरनेशनल समेत कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने इस कानून की आलोचना की है। उनका कहना है कि निकाह में सहमति हमेशा साफ, खुली और बिना दबाव के होनी चाहिए। किसी लड़की का डर या मजबूरी में चुप रहना सहमति नहीं माना जा सकता।

कई विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि तालिबान जिस तरह इन नियमों को मजहबी आधार पर सही ठहराने की कोशिश कर रहा है, वह इस्लाम की आधुनिक और व्यापक व्याख्याओं से मेल नहीं खाता। उनके मुताबिक मजहब के नाम पर औरतों की आवाज दबाना और उन्हें फैसले लेने के अधिकार से दूर रखना मानवाधिकारों के खिलाफ है।

यही कारण है कि तालिबान का यह नया कानून सिर्फ अफगानिस्तान तक सीमित मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि अब इसे दुनिया भर में औरतों की आजादी और अधिकारों से जुड़े बड़े सवाल के तौर पर देखा जा रहा है।

लड़कियों की ‘चुप्पी’ पर तालिबान का कानून, लेकिन लिबरल चेहरे खामोश क्यों?

यह कानून साफ तौर पर महिला विरोधी है। यह लड़कियों से उनका सबसे बुनियादी अधिकारी यानी उनकी शादी पर फैसला लेने का हक तक छीन लेता है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि भारत में खुद को लिबरल, प्रोग्रेसिव और महिला अधिकारों का समर्थक बताने वाले कई नामी इस्लामी अकाउंट्स और एक्टिविस्ट इस मुद्दे पर चुप हैं।

ये वही लोग हैं जो भारत में किसी भी मुद्द पर तुरंत ट्वीट करते हैं, लंबी पोस्ट लिखते हैं, सरकार की आलोचना करते हैं और नारीवाद की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। विदेशी मजहबी मुल्कों में मुस्लिमों से जुड़ा कोई भी मामला हो, तो सबसे पहले यही लोग आवाज उठाते नजर आते हैं। लेकिन अफगानिस्तान में लड़कियों की पढ़ाई बंद कर दी जाए, महिलाओं को घरों तक सीमित कर दिया जाए और अब लड़की की चुप्पी को ही शादी की मंजूरी मान लिया जाए, तब इनकी टाइमलाइन लगभग खाली नजर आती है।

न कोई बड़ा कैंपेन दिखता है, न लगातार ट्वीट्स, न रीट्वीट और न ही वैसी नाराजगी, जैसी भारत के मामलों में दिखाई जाती है। कहीं ‘सेव वूमेन’ की बात नहीं होती, कहीं ‘फेमिनिज्म’ की बहस नहीं होती और न ही महिलाओं की आजादी पर लंबे थ्रेड लिखे जाते हैं।

यही दोहरापन सबसे ज्यादा सवाल खड़े करता है। अगर महिलाओं के अधिकार सच में सबसे ऊपर हैं, तो फिर अफगानिस्तान की लड़कियाँ भी उतनी ही अहम होनी चाहिए जितनी भारत की महिलाएँ। लेकिन अक्सर ऐसा लगता है कि कुछ लोगों की एक्टिविज्म और नारीवाद की आवाज सिर्फ चुनिंदा मुद्दों तक सीमित रह जाती है।

पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में अस्पताल पर बरसाए बम, 400 की मौत और 250 घायल

                         पाकिस्तान ने अस्पताल को बनाया निशाना (साभार: X/ Hamdullah Fitrat)
मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष के बीच पाकिस्तान और अफगानिस्तान की जंग भी गंभीर रूप लेती जा रही है। पाकिस्तान ने सोमवार (16 मार्च 2026) की रात अफगानिस्तान में एयरस्ट्राइक की हैं और राजधानी काबुल के कई इलाकों को निशाना बनाया है। पाकिस्तान ने काबुल में एक अस्पताल को भी निशाना बनाया है जिसमें नशे के आदी लोगों का इलाज किया जाता था।

400 की मौत और 250 घायल

अफगानिस्तान की तालिबान सरकार के डिप्टी प्रवक्ता हमदुल्लाह फितरत ने X पर इस हमले से जुड़ी जानकारियाँ साझा की हैं। फितरत ने X पर लिखा, “पाकिस्तानी सैन्य शासन ने रात करीब 9 बजे ओमिद एडिक्शन ट्रीटमेंट हॉस्पिटल पर हवाई हमला किया। यह 2,000 बेड वाला अस्पताल था, जहाँ नशे की लत का इलाज किया जाता था।”

फितरत ने आगे बताया, “अब तक मरने वालों की संख्या 400 तक पहुँच चुकी है जबकि लगभग 250 लोग घायल बताए जा रहे हैं। हमले के कारण अस्पताल के बड़े हिस्से पूरी तरह नष्ट हो गए हैं और बड़ी संख्या में लोगों के हताहत होने की आशंका जताई जा रही है। फिलहाल बचाव दल मौके पर मौजूद हैं और आग पर काबू पाने के साथ-साथ मलबे से बाकी पीड़ितों के शव निकालने का काम कर रहे हैं।”

स्थानीय नागरिकों और समाचार एजेंसियों ने सोशल मीडिया पर इस हमले के बाद के भयावह वीडियो शेयर किए हैं जिनमें अस्पताल के भीतर भीषण आग दिखाई दे रही है।

मानवता के खिलाफ अपराध: भड़के तालिबान का पाकिस्तान पर निशाना

तालिबान सरकार के प्रवक्ता जबिहुल्लाह मुजाहिद ने इस हमले को लेकर पाकिस्तान पर तीखा हमला बोला है। मुजाहिद ने X पर लिखा, “पाकिस्तानी सैन्य शासन ने एक बार फिर अफगानिस्तान की हवाई सीमा का उल्लंघन करते हुए काबुल में स्थित एक नशा मुक्ति अस्पताल को निशाना बनाया। इस हमले में वहाँ इलाज करा रहे कई नशा पीड़ित लोगों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए। हम इस अपराध की कड़ी निंदा करते हैं और ऐसे कृत्य को मानवीय सिद्धांतों के खिलाफ और मानवता के खिलाफ अपराध मानते हैं।”

मुजाहिद ने X पर अस्पताल में इलाज कराने वाले लोगों की तस्वीर भी शेयर की है। उन्होंने लिखा, “पाकिस्तानी सैन्य हलकों की बमबारी के कारण कल रात 2,000 बेड वाले अस्पताल में बड़ी संख्या में बेगुनाह नागरिकों और नशे की लत से जूझ रहे मरीजों की मौत हो गई। हम अल्लाह के हैं और उसी की ओर हमें लौटकर जाना है।”

पाकिस्तान ने हमले से किया इनकार

इस मामले पर अब पाकिस्तान की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने आई है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के प्रवक्ता मोशर्रफ जैदी ने कहा कि अफगानिस्तान में किसी भी अस्पताल को निशाना नहीं बनाया गया है।

उन्होंने कहा कि हमले काबुल और नांगरहार प्रांत में मौजूद सैन्य ठिकानों, तकनीकी उपकरणों के भंडार और हथियारों के स्टोरेज स्थानों पर किए गए थे। पाकिस्तान का कहना है कि इन हमलों का मकसद केवल सैन्य ढाँचे को निशाना बनाना था, किसी अस्पताल या नागरिक संस्थान को नहीं।

एक ही जुर्म के लिए उलेमा को डाँट तो ‘निचले तबके’ को मौत, बच्चों-महिलाओं का यौन उत्पीड़न ‘माफ’: तालिबानी राज में लागू होने जा रहे ‘क्रिमिनल प्रोसीजर कोड’ के बारे में सबकुछ

                                               तालिबान का नया कानून ( साभार-x@visegrad24)
अफगानिस्तान में तालिबानी फरमान नए ‘क्रिमिनल प्रोसीजर कोड’ के तौर पर एक बार फिर सामने आया है। इसमें विरोध करने वालों के लिए मौत, ईशनिंदा के नाम पर कोड़े बरसाना, बच्चों और महिलाओं के यौन उत्पीड़न के बावजूद कोई कड़ी सजा का प्रावधान नहीं होना जैसी व्यवस्था है। धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ जबरदस्त भेदभाव किया गया है। जनता के बीच भी ‘न्याय’ एक समान नहीं है।

एक ही जुर्म के लिए अलग-अलग सजा

 अफगानिस्तान की अदालतें नए कानून को मानने के लिए बाध्य होंगी। नए ‘क्रिमिनल प्रोसीजर कोड‘ (दे महाकुमु जज़ाई ओसुलनामा) को सर्वोच्च नेता हिबतुल्ला अखुंदजादा ने मंजूरी दी है। 4 जनवरी 2026 को जारी क्रिमिनल प्रोसीजर कोड को तीन सेक्शन, 10 चैप्टर और 119 आर्टिकल हैं। कानून के तहत समाज को चार हिस्सों में बांटा गया है। एक ही जुर्म के लिए सोशल स्टेटस के हिसाब से अलग-अलग सजा का प्रावधान है।

यह कोड अफगानिस्तान की जनता को 4 भागों में बाँटता है। धार्मिक उलेमा या विद्वान, अशरफ यानी संपन्न वर्ग, मध्यम वर्ग और निचला तबका। धार्मिक जानकारों को सबसे ऊँची कैटेगरी में रखा गया है और उन्हें कड़ी सजा से छूट दी गई है। गलत काम करने पर सिर्फ डांटने का प्रावधान है।

दूसरी कैटेगरी में कबायली बुज़ुर्ग, मिलिट्री कमांडर और असरदार अमीर लोग शामिल हैं। इस ग्रुप के लोगों को बुलाया जा सकता है और चेतावनी दी जा सकती है, लेकिन उन्हें जेल या शारीरिक सजा नहीं दी जाएगी।

तीसरी कैटेगरी में मिडिल क्लास के लोग शामिल हैं, जिन्हें जेल हो सकती है। जबकि चौथी और सबसे निचली कैटेगरी में आम लोग शामिल हैं, जिन्हें उन्हीं जुर्मों के लिए जेल, कोड़े मारने और दूसरी कड़ी सजा मिलेगी। यानी सजा अपराधी के अपराध से तय नहीं होगा, बल्कि उसके स्टेटस से तय होगा।

यह कानून मानवाधिकार उल्लंघन और निष्पक्ष सुनवाई के बुनियादी सिद्धांतों के विपरीत है। इस कोड में धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव किया गया है और लोगों की बोलने की आजादी को रोकने से लेकर बेवजह गिरफ्तारी और सजा देने की व्यवस्था है।

सजा भी हर तबके के लिए अलग- अलग तय किया गया है। एक तरह से यह सरकारी दमन को कानूनी मान्यता देता है। इस क्रिमिनल प्रोसीजर कोड में कहीं भी बचाव पक्ष के वकील तक पहुँच की जरूरत ही महसूस नहीं की गई है। टॉर्चर करने, मनमानी तरीके से हिरासत में लेने का अधिकार है। किसी भी मामले में मुआवजा पाने का अधिकार नहीं है।

इसके अलावा, कोड में कम से कम और ज़्यादा से ज़्यादा सजा तय नहीं की गई है, और आपराधिक कामों को साबित करने के लिए स्वतंत्र जाँच की प्रक्रिया को खत्म करके, इसके बजाय ‘स्वीकारोक्ति’ और ‘गवाही’ को अपराध साबित करने के मुख्य तरीके के तौर पर लागू किया गया है।

धार्मिक भेदभाव वाला कानून

नया कानून ‘हनफी इस्लाम’ को मानता है। क्रिमिनल प्रोसीजर कोड के आर्टिकल 2 का क्लॉज़ 8, हनफी विचारधारा को मानने वालों को मुसलमान बताता है। हनफी इस्लाम के अंतर्गत शिया, इस्लाइली, अहल ए हदीस को रखा गया है। जो लोग इसका पालन नहीं करते, उन्हें काफिर कहा गया है।

हनफी मानने वालों को अपना धर्म बदलने का अधिकार नहीं है। ऐसा करने पर दो साल जेल की सजा का प्रावधान है।

एक ऐसे देश में जहाँ जाफ़री शिया, इस्माइली, और अहल-ए-हदीस जैसे दूसरे इस्लामी नजरिए के मानने वाले, साथ ही सिख और हिंदू जैसे गैर-मुस्लिम समेत कई धार्मिक अल्पसंख्यक रहते हैं, यह भेदभाव वाला वर्गीकरण सीधे तौर पर धर्म और विश्वास के आधार पर भेदभाव न करने के सिद्धांत का उल्लंघन करता है।

‘बदात या बिदअत’ का लेबल लगाना और तालिबान के न्यायिक संस्थानों को असीमित अधिकार देना, धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ बड़े पैमाने पर दमन, कानूनी सुरक्षा से वंचित करने और मनमानी सजा देने के हालात बनाता है।

इसके अलावा, क्रिमिनल प्रोसीजर कोड के आर्टिकल 14 में यह तय किया गया है कि ‘पब्लिक इंटरेस्ट’ के लिए, अपराधियों को मारना सही है। इसमें ईशनिंदा जैसे आरोप भी शामिल हैं। इसी तरह, आर्टिकल 17 के क्लॉज 2 में, इस्लामी फैसलों का ‘मजाक उड़ाना’ सजा के लायक माना गया है और अपराधियों के लिए दो साल की जेल की सजा तय की है। इसमें ये नहीं बताया गया है कि ‘मजाक उड़ाने’ को कैसे पहचाना जाएगा। एक तरह से जजों को अपने नजरिए से मनमाने तरीके से सजा देने का अधिकार होगा।

डांस-गानों पर पूरी तरह पाबंदी

नए कानून के आर्टिकल 59 के मुताबिक, डांस करने और उसे देखने वालों को अपराध घोषित किया गया है और उनके लिए सजा का प्रावधान है। यानी परंपरागत सांस्कृतिक कार्यक्रम भी इस कानून के लागू होने के बाद बंद रहेंगे और लोकल संस्कृति नष्ट हो जाएगी।

कोड का आर्टिकल 13 के तहत नैतिक भ्रष्टाचार की जगहों को खत्म करने की बात कही गई है। ये तय करने का अधिकार भी सरकार को होगा कि कौन सी जगह इस श्रेणी में आएगा। इसके बहाने ब्यूटी पार्लरों और ऐसे सार्वजनिक जगहों पर रोक लगाई जा सकती है, जहाँ महिलाएँ जाती हैं या लोग जमा होते हैं और बातचीत करते हैं। आर्टिकल 40 के अनुसार, कोई भी व्यक्ति जो ‘भ्रष्टाचारी’ हो, तो भी उसे अपराधी माना जाएगा और उसे सजा दी जा सकती है। इसमें ‘भ्रष्टाचार’ का मतलब भी साफ न हो।

‘गुलामी’ को मान्यता देता है कानून

रावदारी का कहना है कि तालिबान का क्रिमिनल कोड ‘गुलाम’ शब्द का बार-बार इस्तेमाल करके गुलामी को मान्यता देता है। कोड के आर्टिकल 15 और 4 गुलामी और उससे जुड़े अधिकारों के बारे में बताया गया है। इंटरनेशनल लॉ के तहत गुलामी अपने सभी रूपों को सिरे से खारिज किया गया है।

एक प्रोविज़न में कहा गया है: “किसी भी ऐसे जुर्म के लिए जिसके लिए कोई तय ‘हुदूद’ सज़ा तय नहीं है, अपनी मर्ज़ी से सज़ा दी जाएगी, चाहे अपराधी आजाद हो या गुलाम।”

कानून की नजर में बराबरी और गुलामी पर पूरी तरह रोक अंतर्राष्ट्रीय कानून और मानवाधिकार की बुनियादी नियमों में एक है। लेकिन तालिबानी शासन इसे नहीं मानता। ह्यूमन राइट्स के बुनियादी उसूलों और इंटरनेशनल लॉ के ज़रूरी नियमों में से है- बराबरी का अधिकार, लेकिन क्रिमिनल प्रोसीजर कोड ऑफ़ कोर्ट्स का आर्टिकल 9 समाज को असरदार तरीके से चार कैटेगरी में बाँटता है।

‘स्कॉलर’ (उलेमा), ‘एलीट’ (अशरफ), ‘मिडिल क्लास’ और ‘लोअर क्लास’। इस आर्टिकल के मुताबिक, एक ही जुर्म करने पर, सज़ा का टाइप और गंभीरता जुर्म के नेचर के आधार पर नहीं, बल्कि जुर्म करने वाले की सोशल हैसियत के आधार पर तय होती है। उदाहरण के लिए, अगर कोई जुर्म किसी धार्मिक जानकार ने किया है, तो उसके लिए सिर्फ सलाह दी जाती है।

अगर यह जुर्म किसी एलीट क्लास के किसी व्यक्ति ने किया है, तो इसके लिए कोर्ट में समन और सलाह दी जाती है। लेकिन, अगर वही जुर्म ‘मिडिल क्लास’ के लोगों ने किया है, तो उन्हें जेल होती है, और अगर समाज के ‘लोअर क्लास’ के लोगों ने किया है, तो जेल के अलावा, उन्हें शारीरिक सजा भी दी जाती है। यह फैसला न सिर्फ सामाजिक भेदभाव को मान्यता देता है, बल्कि कानून के सामने बराबरी के सिद्धांत, भेदभाव पर रोक के सिद्धांत, जुर्म और सज़ा के बीच बराबरी के सिद्धांत, और कोड़े मारने जैसे अमानवीय सजा को मान्यता देता है।

इसके अलावा, कोड ने कई सेक्शन में ‘गुलाम’ शब्द का जिक्र करके गुलामी को भी सही ठहराया गया है। जैसा कि आर्टिकल 15 में कहा गया है, “किसी भी ऐसे जुर्म के मामले में जिसके लिए ‘सजा तय’ नहीं की गई है, ताज़ीर (अपनी मर्ज़ी की सज़ा) तय की जाती है, चाहे अपराधी आजाद हो या गुलाम।” इसी तरह, आर्टिकल 4 के पैराग्राफ 5 में कहा गया है कि ‘हद’ की सजा ‘इमाम’ दे सकता है और ‘ताजीर की सजा’ ‘पति’ और “मालिक” दे सकते हैं।

इस क्रिमिनल प्रोसीजर कोड में लोगों को आजाद और गुलाम बताना, और ‘गुलाम’ शब्द का जिक्र करना अंतर्राष्ट्रीय कानून का खुल्मखुल्ला उल्लंघन है।

कोड शारीरिक सजा, जैसे सार्वजनिक कोड़े मारने को कानूनी मान्यता देता है और बढ़ाता है। इसे मानवाधिकारों के खिलाफ और अपमानजनक व्यवहार माना गया है, जो सिस्टम में हिंसा को स्थान देता है।

महिलाओं और बच्चों पर दमन की छूट

यह कोड महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह मिटाने के तालिबान के प्रयासों को और तेज करता है। इसमें महिलाओं के लिए कड़े ड्रेस कोड, पुरुष अभिभावक (महरम) की अनिवार्य उपस्थिति, और सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की आवाज सुनने पर भी सजा के प्रावधान शामिल हैं। ब्यूटी पार्लरों को बंद करने की कोशिश की जा रही है।

ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइज़ेशन रावदारी का कहना है कि तालिबान अपने क्रिमिनल कोर्ट के कोड ऑफ प्रोसीजर के तहत बच्चों की पिटाई को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा है। कोड के आर्टिकल 30 में सिर्फ शारीरिक हिंसा जैसे हड्डियों में फ्रैक्चर, स्किन का फटना शामिल किया गया है।

बच्चों के यौन उत्पीड़न, मानसिक शोषण वगैरह को इसमें कोई जगह नहीं दी गई है। आर्टिकल 48 में कहा गया है कि एक पिता अपने 10 साल के बेटे को नमाज़ न पढ़ने जैसे कामों के लिए सजा दे सकता है।

विरोध करने पर मिलेगी मौत की सजा

तालिबान कोर्ट के कोड के अनुसार, जिसकी एक कॉपी अफ़गानिस्तान इंटरनेशनल को मिली है, तालिबान ने ‘बागी’ बताए गए लोगों को मौत की सजा दी है। कोड में कहा गया है कि ‘बागी’ से जनता को नुकसान होता है और उसे मारे बिना ठीक नहीं किया जा सकता।

यह नियम कानूनी संस्थाओं को विरोधियों और आलोचकों को मौत की सजा देने का अधिकार देता है। आर्टिकल 4, क्लॉज 6, नागरिकों को किसी व्यक्ति को खुद सजा देने की इजाजत देता है अगर वे कोई ‘पाप’ करते हुए देखते हैं।

कोड में कहा गया है कि कोई भी मुसलमान जो किसी व्यक्ति को पाप करते हुए देखता है, उसे सजा देने का अधिकार है।

एक और नियम कहता है कि कोई भी व्यक्ति जो सिस्टम के विरोधियों को बैठक करते हुए देखता है या उसके बारे में जानता है, लेकिन संबंधित अधिकारियों को सूचित नहीं करता है, उसे अपराधी माना जाएगा और उसे दो साल जेल की सज़ा दी जाएगी।

इस आर्टिकल के तहत, सभी नागरिकों को तालिबान विरोधियों की गतिविधियों की सूचना अधिकारियों को देनी होगी या खुद सजा भुगतना पड़ेगा। यानी हर तरह के जुल्म के बावजूद विरोध करने का अधिकार कानून में नहीं दिया गया है।

टेक्सास में बैन हुआ राहुल गाँधी के ह्यूस्टन प्रोग्राम से जुड़ा आतंकी संगठन CAIR, हमास-अलकायदा से कनेक्शन: हिंदू और भारत विरोधी कामों से जुड़ाव

   टेक्सास के गवर्नर एबॉट ने राज्य कानून के तहत CAIR को एक विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित किया (फोटो साभार -     टेक्सास के गवर्नर एबॉट ने राज्य कानून के तहत सीएआईआर को एक विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित किया/                  सीएआईआर))
टेक्सास के गवर्नर ग्रेग एबॉट ने मंगलवार (18 नवंबर 2025) को काउंसिल ऑन अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशंस (CAIR) को राज्य कानून के तहत विदेशी आतंकवादी संगठन और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक संगठन घोषित कर दिया। इस घोषणा में CAIR को मुस्लिम ब्रदरहुड के साथ सूचीबद्ध किया गया है, जिसे एबॉट ने इसका उत्तराधिकारी संगठन बताया।

इस फैसले के बाद दोनों संगठनों पर टेक्सास में जमीन खरीदने-बेचने पर रोक लग गई है। इसके अलावा इन संगठनों की किसी भी तरह से मदद करने वालों के लिए कड़ी नागरिक और आपराधिक सजाओं का रास्ता भी खुल गया है।

                                                                                                                                    स्रोत: एक्स

घोषणा में क्या कहा गया है?

गवर्नर एबॉट के आदेश में सबसे पहले मुस्लिम ब्रदरहुड के इतिहास और विचारधारा का उल्लेख किया गया। इसमें इसे एक अंतरराष्ट्रीय इस्लामिस्ट आंदोलन बताया गया, जिसकी नींव हथियारबंद जिहाद और शरिया कानून लागू करने वाले वैश्विक खिलाफत के लक्ष्य पर रखी गई थी।

एबॉट ने इसके संस्थापक हसन अल-बन्ना और बाद में इसके सुप्रीम गाइड मोहम्मद बदी के बयानों का हवाला देकर कहा कि संगठन के उद्देश्यों में लगातार यही सोच बनी रही है। उन्होंने यह भी बताया कि मुस्लिम ब्रदरहुड का नेटवर्क दुनिया भर में फैला है, जिसमें हमास भी शामिल है, जो इसका फ़िलिस्तीनी शाखा के रूप में शुरू हुआ था।

इसके बाद आदेश में CAIR का जिक्र किया गया और इसे अमेरिका में मौजूद मुस्लिम ब्रदरहुड के नेटवर्क का हिस्सा बताया गया। एबॉट ने इसके लिए फेडरल जाँचों, होली लैंड फ़ाउंडेशन टेरर फाइनेंसिंग केस के कानूनी निष्कर्षों और कई शैक्षणिक अध्ययनों का हवाला दिया, जिनमें CAIR के हमास और उससे जुड़े ढाँचे के साथ संबंध बताए गए थे।

आदेश में यह भी कहा गया कि 2008 में FBI ने CAIR के साथ अपने आधिकारिक संबंध खत्म कर दिए थे, और 2023 में बाइडेन प्रशासन ने भी कुछ संघीय दस्तावेजों से CAIR से जुड़े उल्लेख हटा दिए थे।

घोषणा का सबसे बड़ा हिस्सा उन CAIR से जुड़े व्यक्तियों पर केंद्रित था, जिन्हें बाद में आतंकवाद से जुड़े अपराधों में पकड़ा गया या उजागर किया गया। एबॉट ने इन मामलों को उदाहरण के रूप में इस्तेमाल किया ताकि यह दिखाया जा सके कि CAIR सिर्फ विचारधारा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका ढाँचा चरमपंथी नेटवर्कों से परिचालन स्तर पर भी जुड़ा हुआ है।

घोषणा में CAIR से जुड़े व्यक्तियों का उल्लेख

घोषणा में कई ऐसे लोगों के नाम दर्ज किए गए जो कभी CAIR के नेतृत्व, स्टाफ या फंडरेज़िंग नेटवर्क का हिस्सा रहे थे और बाद में आतंकवाद से जुड़े मामलों में दोषी पाए गए या आरोपित हुए। एबॉट ने कहा कि यह एक लंबे समय से चल रहा पैटर्न है कि CAIR ऐसे लोगों को अपने संगठन में महत्वपूर्ण जगह देता रहा है जिनके आतंकवादी संगठनों से सक्रिय संबंध रहे हैं।
सबसे प्रमुख नाम घसान इलाशी का था, CAIR टेक्सास के संस्थापक बोर्ड सदस्य और होली लैंड फाउंडेशन के कोषाध्यक्ष। उन्हें 2009 में आतंक वित्तपोषण के लिए दोषी ठहराया गया था और 65 साल की सजा मिली थी।
दूसरा नाम अब्दुरहमान आलामूदी का था, जिसने CAIR द्वारा आयोजित एक रैली में भाषण दिया था और खुद को हमास और हिज्बुल्लाह का समर्थक बताया था। बाद में वह अल-कायदा को फंडिंग करने का दोषी पाया गया।
तीसरा नाम रैंडल टॉड रोयर का था, जो CAIR में कम्युनिकेशन स्पेशलिस्ट और सिविल-राइट्स कोऑर्डिनेटर था। उसे 2004 में अल-कायदा और तालिबान की मदद की साजिश के लिए 20 साल की जेल हुई।
इसके बाद नाम आया बासेम खाफागी का, जो CAIR में कम्युनिटी रिलेशंस डायरेक्टर था। उसने 2003 में बैंक और वीजा फ्रॉड की बात कबूल की थी और उस पर पैसा कट्टरपंथी संगठनों को भेजने और अमेरिका पर आत्मघाती हमलों को बढ़ावा देने वाली सामग्री प्रकाशित करने के आरोप थे।
घोषणा में रबीह हद्दाद का नाम भी था, जो CAIR के लिए फंड जुटाता था। उसे ग्लोबल रिलीफ फ़ाउंडेशन के मामले में गिरफ्तार किया गया और बाद में देश से निकाला गया। यह संगठन 2002 में अल-कायदा को फंडिंग के चलते बंद किया गया था।
सूची में मुथन्ना अल-हनूटी का नाम भी शामिल था, मिशिगन का CAIR डायरेक्टर, जिसे 2011 में इराक के दो लाख बैरल तेल लेने और सद्दाम हुसैन की मदद के लिए प्रतिबंधों का उल्लंघन करने के आरोप में दोषी ठहराया गया।
एक और बड़ा नाम सामी अल-अरियान का था, पीआईजे (पैलेस्टीनियन इस्लामिक जिहाद) का फाइनेंसर और दोषी आतंकवादी। CAIR ने उसे 2014 में ‘Promoting Justice Award’ दिया था और 2020 के एक कार्यक्रम में भी उसे मंच दिया, जहाँ उसने CAIR का समर्थन बढ़ाने की अपील की।
घोषणा में निहाद अवाद का जिक्र था, CAIR के लंबे समय से कार्यकारी निदेशक। उन्होंने 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले पर खुशी जताई थी। इन गंभीर आरोपों और नामों के जवाब में CAIR ने ग्रेग एबॉट को कोर्ट में घसीटने की धमकी दी और उन्हें इजराइल फर्स्ट राजनेता कहा, साथ ही आरोप लगाया कि वह अमेरिकी मुसलमानों को बदनाम करने के लिए महीनों से एंटी-मुस्लिम माहौल बना रहे हैं।
                                                                                                                                  स्रोत: एक्स

CAIR और उसका भारत विरोधी प्रचार

CAIR एक इस्लामिस्ट संगठन है, जिसने कई बार भारत और हिंदुओं के खिलाफ बयान दिए हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि CAIR के रिश्ते आतंकी संगठन हमास से जुड़े रहे हैं। यह संगठन लगातार हिंदू-विरोधी हिंदूफोबिक अभियान और प्रोपेगैंडा फैलाता रहा है। पहले भी CAIR ने अत्यंत हिंदूफोबिक ‘Dismantling Global Hindutva’ कॉन्फ़्रेंस का खुलकर समर्थन किया था।
CAIR ने जनवरी 2022 में राणा अय्यूब की रिपोर्ट के आधार पर हिंदू-विरोधी प्रोपेगैंडा चलाया। उन्होंने प्रेस रिलीज जारी कर हिंदी फिल्म ‘सूर्यवंशी’ को थिएटरों में रिलीज न करने की माँग की और फिल्म को घृणित और खतरनाक हिंदुत्व प्रेरित एंटी-मुस्लिम प्रोपेगैंडा तक बता दिया।
CAIR ने पाकिस्तानी आतंकी आफिया सिद्दीकी को भी रिहा करने की माँग की है, जो अमेरिकी सेना और FBI पर हमले के लिए 86 साल की सजा काट रही है।
उसी साल CAIR ने Still Suspect: The Impact of Structural Islamophobia नाम से रिपोर्ट जारी की और दावा किया कि अमेरिका में मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव बढ़ रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, CAIR को एक साल में 6,720 शिकायतें मिलीं, जिनमें इमिग्रेशन, यात्रा संबंधी भेदभाव, कानून प्रवर्तन, सरकारी दखल, स्कूल घटनाएँ और फ्री स्पीच जैसे मुद्दे शामिल थे।
CAIR का दावा है कि अमेरिकी सरकार का भेदभाव मुसलमानों को अधिक प्रभावित करता है। लेकिन विरोधाभास यह है कि जो CAIR अमेरिका में इस्लामोफोबिया की शिकायत करता है, वही भारत में हिंदू-विरोधी नैरेटिव को लगातार बढ़ावा देता है।
दिसंबर 2022 में भी CAIR ने न्यू जर्सी में एक मोबाइल ट्रक पर दिखाए गए 26/11 हमले के वीडियो और लश्कर-ए-तैयबा आतंकियों के नामों पर आपत्ति जताई और इसे नफरत फैलाने वाला कहा, जबकि वीडियो में सिर्फ सच दिखाया गया था।
CAIR कई बार आफिया सिद्दीकी जैसे आतंकवादियों के समर्थन में भी खड़ा रहा है। जून 2023 में, जब कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी अमेरिका गए, तो वह सुनीता विश्वनाथ के साथ एक चर्चा में बैठे दिखाई दिए। वह HfHR नामक कट्टर हिंदू-विरोधी संगठन की सह-संस्थापक है और CAIR तथा ICNA जैसे संगठनों के लिए कार्यक्रम आयोजित करती रही है।
इसके अलावा राहुल गाँधी ने 2024 में कट्टर इस्लामिस्ट और भारत-विरोधी अमेरिकी सांसद इल्हान ओमर से भी मुलाकात की। ओमर इस्लामिस्ट एजेंडे को बढ़ावा देती हैं, मुस्लिम अपराधियों पर हुई कार्रवाई को इस्लामोफोबिया बताती हैं और आतंकवाद पर सवाल उठाने से बचती हैं।
वह 9/11 हमले को भी हल्के में लेते हुए CAIR के एक कार्यक्रम में बोली थीं कि यह कुछ लोगों ने कुछ कर दिया और इसके कारण मुसलमान अमेरिका में अपने अधिकार खो रहे हैं। इन सभी घटनाओं से CAIR के विचार, नेटवर्क और उसके भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी रुख स्पष्ट रूप से सामने आते हैं।

इस्लामी आतंकवादी संगठन हमास के साथ संबंध

ध्यान देने वाली बात यह है कि CAIR के रिश्ते फ़िलिस्तीनी इस्लामिक कट्टरपंथी आतंकी संगठन हमास से जुड़े रहे हैं। हमास का मानवाधिकार उल्लंघन का लंबा इतिहास है। यूरोपीय संघ, अमेरिका, कनाडा, इजरायल, जापान, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन सहित कई देशों ने हमास को आधिकारिक तौर पर आतंकी संगठन घोषित किया हुआ है।

जिस नूर वली महसूद को पाक ने ‘मार गिराने’ का किया दावा, उसने वीडियो जारी कर खोल दी झूठ की पोल

                           तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान का लीडर नूर वली मेहसूद (साभार: द डिप्लोमेट)
पाकिस्तान की फौज ने 9 अक्टूबर 2025 को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर हवाई हमला किया और दावा किया कि उन्होंने तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के कुख्यात सरगना नूर वली महसूद को मार गिराया है।

 पाकिस्तानी मीडिया ने इसे बड़ी जीत बताया, लेकिन सिर्फ एक हफ्ते बाद गुरुवार (16 अक्टूबर 2025) को TTP ने ऐसा वीडियो जारी किया जिसने पूरे पाकिस्तान की पोल खोल दी। 7 मिनट 55 सेकंड के उस वीडियो में नूर वली न केवल जिंदा नजर आया, बल्कि उसने खुलकर कहा कि वो अफगानिस्तान में नहीं, पाकिस्तान की खैबर पहाड़ियों में रह रहा है।

उसने दावा किया कि खैबर पख्तूनख्वाह की कुकी खेल और कंबर खेल कबीले उसके साथ हैं। यानी पाकिस्तान ने झूठे इनपुट पर हमला किया, रिश्ते बिगाड़े और आखिर में अपनी ही नाकामी का तमाशा दुनिया के सामने कर दिया।

पाकिस्तानी खुफिया की सबसे बड़ी चूक

काबुल पर एयर स्ट्राइक पाकिस्तान के इंटेलिजेंस इनपुट पर की गई थी। फौज को यकीन था कि नूर वली महसूद काबुल में है और उसकी गाड़ी को निशाना बनाया गया।

पाकिस्तान ने इसे सटीक ऑपरेशन बताया, लेकिन जब नूर वली का वीडियो सामने आया तो साफ हुआ कि वो न तो अफगानिस्तान में था, न ही हमले में मरा। इस एक गलती से पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के साथ संबंध और भी खराब किए और खुद को अंतरराष्ट्रीय मंच पर हँसी का पात्र बना लिया।

नूर वली महसूद: जन्म, तालीम और शुरुआती जीवन

नूर वली महसूद का जन्म 26 जून 1978 को पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के दक्षिण वजीरिस्तान में तियारजा नामक गाँव में हुआ। वह पश्तून जनजाति के मेहसूद कबीले के मेचीखेल उपकबीले से ताल्लुक रखता है। उसने शुरुआती तालीम मदरसा सिद्दीकिया उस्पास में ली।

1990 के दशक में उसने फैसलाबाद, गुजरांवाला और कराची जैसे शहरों के अलग-अलग मदरसों में मजहबी तालीम ली। 1996-97 के दौरान उसने पढ़ाई बीच में छोड़ी और अफगानिस्तान चला गया, जहाँ उसने अफगान तालिबान के साथ रहकर अहमद शाह मसूद की नॉर्दर्न अलायंस के खिलाफ लड़ाई में हिस्सा लिया।

काबुल और मजार-ए-शरीफ के मोर्चों पर उसने तालिबान के साथ लड़ाई लड़ी। बाद में अब्बू हाजी गुल शाह खान की सलाह पर पाकिस्तान लौटकर 1999 में इस्लामी अध्ययन में स्नातक किया और मुफ्ती की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद उसने गोरगोराय में स्थित मदरसा इमदाद-उल-उलूम में 1999 से 2001 तक तालीम देने का भी कार्य किया।

तालिबान से जुड़ाव और नेतृत्व की ओर सफर

2003 में नूर वली महसूद ने पाकिस्तानी तालिबान (TTP) की मेहसूद शाखा में शामिल होकर सशस्त्र गतिविधियाँ शुरू कीं। उस समय पाकिस्तान फौज फाटा क्षेत्र में सैन्य अभियान चला रही थी, जिसे वह पश्तून परंपराओं और ‘पश्तूनवाली’ के खिलाफ मानता था। उसने इसे अमेरिका के प्रभाव के खिलाफ ‘रक्षात्मक जिहाद’ बताया।

2004 में वाना की लड़ाई के दौरान उसने पाकिस्तानी फौज पर कई हमले किए। जल्द ही वह बैतुल्लाह महसूद का भरोसेमंद साथी बना और संगठन में काजी (जज) के रूप में नियुक्त हुआ। बाद में उसे डिप्टी कमांडर का दर्जा भी मिला। बैतुल्लाह की मौत के बाद उसने गोरगोराय में एक प्रशिक्षण शिविर संचालित किया, उस वक्त उसके सिर पर 20 लाख रुपए का इनाम था।

2013 में उसे कराची चैप्टर का प्रमुख बनाया गया, जहाँ TTP ने फिरौती, अपहरण और बैंक लूट जैसी घटनाएँ अंजाम दीं। 2015 के बाद सुरक्षा अभियानों के कारण नेटवर्क कमजोर हुआ। इसके बावजूद नूर वली संगठन में प्रभावशाली बना रहा और खालिद महसूद का डिप्टी नियुक्त हुआ।

2018 में खालिद की मौत के बाद उसने मौलाना फजलुल्लाह के साथ काम किया और जून 2018 में फजलुल्लाह के मारे जाने के बाद उसे TTP का अमीर (मुखिया) घोषित किया गया उसके नेतृत्व में TTP ने अपनी रणनीति बदली। उसने आम नागरिकों को निशाना बनाना बंद किया और केवल सुरक्षा बलों पर हमले केंद्रित किए।

विचारधारा, लेखन और हाल की घटनाएँ

नूर वली महसूद मजहबी रूप से प्रशिक्षित विद्वान और सैन्य अनुभव रखने वाला कमांडर है। 9/11 के बाद उसने अफगान तालिबान का समर्थन किया। वह पहले TTP के प्रकाशन विभाग का प्रमुख था और 2007 में बेनजीर भुट्टो की हत्या का जिक्र अपनी लिखी किताब में किया।

2017 में उसने ‘इंकलाब-ए-मेहसूद: साउथ वजीरिस्तान फिरंगी राज से अमेरिकी सम्राज्य तक’ नाम की 690 पेज की किताब लिखी, जिसमें उसने संगठन के इतिहास, विचारधारा और वित्तीय नेटवर्क का वर्णन किया।

अमेरिका ने 2019 में उसे वैश्विक आतंकवादी घोषित किया और 2020 में संयुक्त राष्ट्र ने भी उसे प्रतिबंधित आतंकियों की सूची में शामिल किया। 2021 के बाद TTP ने अफगानिस्तान से पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाकों पर हमले तेज कर दिए। 9 अक्टूबर 2025 को संगठन ने एक हमला किया जिसमें 11 पाकिस्तानी फौजी मारे गए।

इसके जवाब में पाकिस्तान ने काबुल, खोस्त, जलालाबाद और पक्तिका में हवाई हमले किए। कहा गया कि इन हमलों में नूर वली को निशाना बनाया गया, लेकिन तालिबान और TTP दोनों ने उसकी मौत की खबरों को झूठा बताया। बाद में TTP ने उसका एक ऑडियो जारी कर दावा किया कि नूर वली महसूद जिंदा है और सुरक्षित है।

निष्कर्ष: जिंदा नूर वली, मुसीबत में पाकिस्तान

नूर वली महसूद का जिंदा होना पाकिस्तान के लिए सिर्फ खुफिया नाकामी नहीं, बल्कि सुरक्षा के लिए गंभीर खतरे का संकेत है। उसकी मौजूदगी ने यह साफ कर दिया है कि पाकिस्तान अपने ही देश में आतंक को खत्म करने में नाकाम रहा है। अब नूर वली महसूद सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि पाकिस्तान की असफल नीतियों और झूठे दावों का प्रतीक बन गया है।

अफगानी जनता को स्टेडियम में जमा किया, फिर हत्या के दोषी 4 लोगों को खड़ा कर सबके सामने गोलियों से भूना: तालिबान ने कहा- यह इस्लाम का हिस्सा, पश्चिमी कानूनों की नहीं जरूरत

                                   हिबतुल्लाह अखुँदजादा, तालिबानी नेता (साभार : indiatoday)
इस्लामी आतंकी संगठन तालिबान ने कहा है कि सजा के रूप में सरेआम हत्या करना इस्लाम का हिंसा है। तालिबान ने यह बात अफगानिस्तान में हाल ही में 4 लोगों को सरेआम गोलियों से भून कर सजा देने के बाद कही है। तालिबान ने कहा है कि उन्हें पश्चिमी देशों के कानूनों की कोई आवश्यकता नहीं है।

अफगानिस्तान इस्लामी अमीरात के मुख्य प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने इसको लेकर एक ऑडियो जारी किया है। यह ऑडियो तालिबान के मुखिया और अफगानिस्तान के अमीर हिबैतुल्लाह अखुँदजादा कहते हैं, “हमें सिर्फ नमाज या इबादत तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इस्लाम एक पूरा जीवन पद्धति है, जिसमें अल्लाह के सारे हुक्म शामिल हैं। इनमें सजाएँ देना भी जरूरी है।”

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फाँसी की आलोचना पर अखुँदज़ादा ने कहा कि अल्लाह ने लोगों को इबादत करने और सजा चुनने का आदेश दिया है। तालिबान का संघर्ष कभी सत्ता या धन के लिए नहीं था, बल्कि ‘इस्लामी कानून’ को लागू करने के लिए था। उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों के कानूनों की अफगानिस्तान में कोई जरूरत नहीं है।

ये बातें तालिबान मुखिया ने दक्षिणी कंधार प्राँत में हज प्रशिक्षकों के एक सेमिनार में 45 मिनट के भाषण के दौरान कहीं। उन्होंने ये भी कहा कि इस्लाम का एक भी आदेश अधूरा नहीं छोड़ा जाना चाहिए। गौरलतब है कि शुक्रवार (11 अप्रैल, 2025) को तालिबान ने 4 लोगों की फायरिंग करके हत्या कर दी थी। 

तालिबान ने अफगानिस्तान के तीन राज्यों में 4 लोगों को यह सजाएँ दी थीं। इनमें से बडघीस के काला-ए-नौ में 2 लोगों की गोली मार कर हत्या कर दी थी। इसके अलावा एक को निमरोज के जरांज और एक को फराह में मार दिया गया था। इन्हें 6-7 बार गोली मारी गई।

तालिबान ने यह सजाएँ दिखने के लिए यहाँ के लोगों को बुलाया भी था। यहाँ तक कि मृतकों के रिश्तेदारों को भी इस दौरान शामिल किया गया था। बताया गया है कि इन पर हत्या का आरोप सिद्ध हुआ था और तभी इन्हें मौत की सजा दी गई थी। इन लोगों ने माफी भी माँगी थी लेकिन कोई राहत नहीं दी गई थी।

राजीव गाँधी फाउंडेशन-सैम पित्रोदा को USAID से मिला पैसा; भारत को तोड़ने के लिए जॉर्ज सोरोस को मिले 5000 करोड़ रूपए?ऑपइंडिया ने जो सच बताया, संसद में उसी तूफान में घिरा गाँधी परिवार

                                                    USAID के जॉर्ज सोरोस और कॉन्ग्रेस से क्या लिंक
डोनाल्ड ट्रम्प की वापसी Deep State और Tool kit के लिए अभिशाप बनकर आयी है। ये वही Deep State और Tool kit है जिसने ट्रम्प को पिछला चुनाव हरवाया था। ये ही गैंग भारत में खूब हरकत में रहा। भारत और अमेरिका चुनावों में लगने वाले नारे भी एक ही थे। भारत में नरेंद्र मोदी तो अमेरिका में ट्रम्प ने इन्हे चारों खाने चित ही नहीं बल्कि ट्रम्प नितरोज इस गैंग को नेस्ताबूत कर रहे हैं। भारत में जो आए दिन हंगामे होते थे इसी गैंग की फंडिंग से होते थे। विपक्ष ने भारत को बहुत नीचा दिखाया।   
पिछली संसद में जितना शोर-शराबा देखा इस समय चल रही संसद में नहीं के बराबर, क्यों? क्योकि हंगामा करने के लिए नोट कौन देगा? Deep State और Tool kit से मिलने वाली भीख देश में धरने, प्रदर्शन और दंगे हुए। देखिए दिल्ली चुनाव ऐसा चुनाव है जिसमे विपक्ष ने EVM को नहीं कोसा।      
जब से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने USAID पर ताला लगाया है लगातार इसकी करतूतें बाहर आ रही है। भारत विरोधी ताकतों को यूनाइटेड स्टेट्स एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (USAID) से हुई फंडिंग का मामला 10 फरवरी 2025 को लोकसभा में बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने उठाया।

ट्विटर/एक्स पर एक पोस्ट में उन्होंने कहा है, “आजादी से लेकर अब तक कांग्रेस ने सिर्फ देश को तोड़ने का काम किया है। राजीव गाँधी फाउंडेशन सहित कई NGO ने USAID से पैसे लेकर देश विरोधी तत्वों को फायदा पहुँचाया। विपक्ष देश तोड़ना चाहता है।” इसके साथ ही उन्होंने लोकसभा की कार्रवाई का एक वीडियो भी शेयर किया है, जिसमें वे इससे जुड़े सवाल उठा रहे हैं।

ये सवाल क्या हैं इन्हें नीचे पढ़ा जा सकता है-

“USAID ने ओपन सोसायटी फाउंडेशन के जॉर्ज सोरोस को 5000 करोड़ रुपया भारत को तोड़ने के लिए दिया या नहीं दिया?”

“USAID ने राजीव गाँधी फाउंडेशन चैरिटेबल ट्रस्ट को पैसा दिया कि नहीं दिया?”

“ओवरसीज कांग्रेस के जो अध्यक्ष हैं सैम पित्रौदा उनको USAID ने पैसा दिया या नहीं दिया?”

“बांग्लादेश में मोहम्मद युनूस, जिन्होंने वहाँ के लोकतंत्र को बर्बाद किया, उसके साथ गाँधी परिवार के साथ क्या संबंध हैं?”

“राजीव गाँधी फाउंडेशन में जो विजय महाजन है, उनकी संस्था को USAID पैसा दे रही है या नहीं दे रही है? कांग्रेस ने उसे राजीव गाँधी फाउंडेशन में देश के टुकड़े रखने के लिए रखा है या नहीं रखा है?

“ग्रामीण विकास ट्रस्ट जो कि जातिगत जनगणना की बात करता है यूएस उसको पैसा देता है कि नहीं देता है?”

“तालिबान को यूएसएड ने पैसा दिया कि नहीं दिया?”

“नेपाल में जो नास्तिकता के लिए मूवमेंट चला उसके लिए यूएसएड ने पैसा दिया कि नहीं दिया?”

“सामंता पावर से आपकी मुलाकात हुई कि नहीं हुई?”

“फलाह-ए-पाकिस्तान, एल खिदमत जैसे आतंकी संगठनों को यूएसएड ने पैसा दिया कि नहीं दिया?”

“वक्फ एक्ट को जो जकात फाउंडेशन चला रहा है जिसको कांग्रेस सपोर्ट करती है उसको यूएसएड ने पैसा दिया कि नहीं दिया?”

USAID को लेकर ऑपइंडिया की रिपोर्ट

जिस यूएसएड को लेकर भाजपा सांसद द्वारा सवाल खड़े किए गए हैं उसे लेकर ऑपइंडिया लगातार रिपोर्ट कर रहा है। हम आपको पहले की रिपोर्टों में बता चुके हैं कि कैसे इस यूएसएड ने अमेरिकी करदाताओं के करोड़ों रुपए आतंकवादियों को पोसने वाले संगठनों को देने में और धर्मांतरण को बढ़ावा देने वाली संस्थाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए खर्च किया। नेपाल में नास्तिकता का मूवमेंट चलाना हो या देश-विदेश में LGBTQ के एक्टिविज्म को बढ़ाना हो… इन सब पर यूएसएड ने खुलकर डॉलर उड़ाए।
कहने को ये संगठन मानव भलाई की दिशा में काम करता है लेकिन हकीकत यह है कि इनका फायदा अफगानिस्तान में बैठे तालिबान, पाकिस्तान में बैठे लश्कर-ए-तैयबा, फलाह-ए-पाकिस्तान और गाजा में बैठे हमास जैसे आतंकी संगठनों को भी हुआ है।
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इसके अलावा यूएसएड का संबंध कांग्रेस से, गाँधी परिवार के करीबी सैम पित्रौदा से और जॉर्ज सोरोस से कैसे है इसे भी ऑपइंडिया अपनी रिपोर्ट में बता चुका है। 2024 में भी हमने ये खुलासा किया था कि सैम पित्रौदा की एनजीओ को USAID से फंड आता था। आज इसी मामले को निशिकांत दुबे ने फिर से उठाकर ताजा कर दिया है।

तालिबानियों ने परमाणु बम-एनर्जी बनाने वाले 17 पाकिस्तानियों को बंदूक से डरा कर किया अपहरण: खदान से यूरेनियम भी लूटा; शंका की जा रही है कि इनका अपहरण हुआ है या अपहरण का ड्रामा?

टीटीपी ने जारी की अपहृत लोगों की पहचान (फोटो साभार: X_JawadYousufxai)
आतंकवाद को पालने पोसने वाला पाकिस्तान आज खुद उसी आग में जलना शुरू हो गया है। जिस तरह तालिबानियों ने परमाणु बम-एनर्जी बनाने वाले 17 पाकिस्तानियों का अपहरण किया है। गौरतलब करने की बात है कि पाकिस्तान के नुक्लेयर वैज्ञानिक द्वारा ईरान को परमाणु बनाने की विधि को बेच दिया गया था। इस प्रकरण के याद आने पर शंका की जा रही है कि तालिबान ने परमाणु बनाने वालो का अपहरण किया है या मोटा धन मिलने के लालच में खुद ही चले गए हैं? 

पाकिस्तान अपने ही न्यूक्लियर साइंटिस्ट, इंजीनियरों को नहीं बचा पा रहा है। पाकिस्तान के तहरीक-ए-तालिबान-पाकिस्तान (TTP) ने उसके 17 साइंटिस्टों-इंजीनियरों-कामगारों को अगवा कर लिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के लक्की मरवत इलाके में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) ने पाकिस्तान एटॉमिक एनर्जी कमिशन के 17 कर्मचारियों को अगवा कर लिया। इन कर्मचारियों को कबूल खैल एटॉमिक एनर्जी माइनिंग प्रोजेक्ट में काम के दौरान किडनैप किया गया। इस दौरान टीटीपी के आतंकियों ने कर्मचारियों की गाड़ियाँ भी जला दीं। टीटीपी ने एक वीडियो जारी करते हुए दावा किया कि इन कर्मचारियों को तब तक रिहा नहीं किया जाएगा, जब तक पाकिस्तान की जेलों में बंद उनके कैदियों को छोड़ा नहीं जाता। वीडियो में अगवा कर्मचारी पाकिस्तान सरकार से अपनी रिहाई के लिए बातचीत करने की अपील करते नजर आए।

खास बात ये है कि पाकिस्तान सरकार ने पहले तो नकार दिया कि ऐसी कोई घटना भी हुई है, फिर कहा कि वो उसके आदमी ही नहीं थे… लेकिन तालिबान ने पाकिस्तानी सरकार को पूरी दुनिया के सामने बेपर्दा करते हुए अगवा किए कर्मचारियों के आईडी कार्ड तक जारी कर दिए, तब जाकर पाकिस्तान ने माना कि उसे तालिबान ने बड़ी चोट दी है। इसके बाद तालिबान ने 8 अगवा लोगों को रिहा कर दिया, तो पाकिस्तान ये दावा करते हुए खुद की पीठ थपथपाने लगा कि उसने 8 बंधकों को छुड़ा लिया है, लेकिन तालिबान ने पाकिस्तान को फिर से आईना दिखाते हुए कहा कि उसने खुद ही अगवा किए लोगों को छोड़ा है और महत्वपूर्ण लोगों को अपने पास रखा है, ताकि वो अपने लड़ाकों को पाकिस्तान की कैद से आजाद करा सके।

कुछ समय बाद पाकिस्तान सरकार ने दावा किया कि उन्होंने 17 में से 8 अगवा कर्मचारियों को बचा लिया है। इसमें कुछ घायल भी हैं। हालाँकि, टीटीपी ने इस दावे को खारिज कर दिया और कहा कि उसने खुद ही इन बंधकों को छोड़ा है। तालिबान ने सभी बंधकों की आईडी भी जारी की है। TTP ने ये भी है कि उसने इन लोगों को सिर्फ सौदेबाजी के लिए अपने पास रखा है, वो इन्हें नुकसान नहीं पहुँचाएगा।

अगवा लोगों में मजदूर और एटॉमिक एनर्जी कमिशन के अधिकारी शामिल हैं। बताया जा रहा है कि टीटीपी ने खदान से यूरेनियम भी लूटा है, तो परमाणु उर्जा-बम बनाने के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण खनिज है। लक्की मरवत इलाका अफगानिस्तान की सीमा से सटा हुआ है और टीटीपी की गतिविधियों का गढ़ माना जाता है।

बदले का ऐलान कर पाकिस्तानी सीमा में घुसे तालिबानी, मार गिराए 19 फौजी: अंग्रेजों की खींची डूरंड लाइन को भी सीमा मानने से किया इनकार

बोया पेड़ बबूल का आम कहाँ से होए यानि पाकिस्तान ने जिस आतंकवाद को पालापोसा आज वही आतंकवाद पाकिस्तान को बर्बाद करने को कमर कस चुका है। तालिबान जिस तरह पाकिस्तान पर हमले कर रहा है पाकिस्तानी आतंकवादियों की ही नींद हराम हो गयी। 
अफगानिस्तान में तालिबान शासन ने शनिवार (27 दिसंबर 2024) को पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाकों पर बड़े हमले किए, जिसमें अब तक 19 पाकिस्तानी फौजियों के मारे जाने की खबर है। तालिबान ने यह हमला पाकिस्तान द्वारा 26 दिसंबर को अफगान सीमा पर की गई बमबारी के जवाब में किया है। पाकिस्तानी हमलों में अफगानिस्तान के 46 लोगों की मौत हुई थी, जिनमें कई बच्चे भी शामिल थे। अपने एक आधिकारिक बयान में तालिबान ने खुल कर पाकिस्तान का नाम तो नहीं लिया लेकिन इशारों में परोक्ष तौर पर बताया कि उन्होंने सीमा पार हमले किए हैं।

अल जजीरा के मुताबिक, अफगानिस्तान के प्रवक्ता ने कथित ‘काल्पनिक रेखा’ (डूरंड लाइन) पर हमले की बात कबूली है। काल्पनिक रेखा नाम का यह शब्द अफगानिस्तान के अधिकारियों द्वारा उस बॉर्डर से संबंधित है जिसका विवाद पाकिस्तान से चल रहा है। तालिबान ने इन हमलों को सही ठहराते हुए कहा कि यह उनकी रक्षा और अफगान विरोधी ताकतों को खत्म करने के लिए जरूरी था।

तालिबान के प्रवक्ता इनायतुल्लाह खोवाराज़मी ने बयान देते हुए कहा, “हम इसे पाकिस्तान का क्षेत्र नहीं मानते। यह हमारी सैन्य कार्रवाई का हिस्सा था।” तालिबान डूरंड लाइन को काल्पनिक रेखा मानता है, जिसे 19वीं सदी में अंग्रेजों ने खींचा था। यह सीमा अफगानिस्तान और पाकिस्तान को अलग करती है, लेकिन तालिबान इसे कभी स्वीकार नहीं करता।

तालिबान ने कहा कि उनकी सैन्य कार्रवाई 26 दिसंबर को उनके इलाकों में पाकिस्तान की तरफ से की गई बमबारी का जवाब है। अफगानिस्तान के अधिकारियों का दावा है कि सीमा के उस पार बने ठिकानों पर कार्रवाई जरूरी थी क्योंकि ये अफगान विरोधी ताकतों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे थे। पाकिस्तानी फ़ौज के इन हमलों में अफगानिस्तान के 46 लोगों की मौत हुई थी।

पाकिस्तान ने साधी चुप्पी

इन हमलों में अब तक 19 पाकिस्तानी फौजियों की मौत का दावा किया जा रहा है। हालाँकि आधिकारिक आँकड़े अभी आना बाकी हैं। तालिबान की इस कार्रवाई के बाद पाकिस्तान की तरफ से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है। गौरतलब है कि डूरंड लाइन को लेकर अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच दशकों से विवाद जारी है।
तालिबान इसे मानने से इंकार करता है, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है। तालिबान का कहना है कि डूरंड लाइन के उस पार के क्षेत्र को वह पाकिस्तान का हिस्सा नहीं मानता। बहरहाल, यह हमला सीमा विवाद को और गहरा कर सकता है और अफगानिस्तान-पाकिस्तान संबंधों में नई मुश्किलें खड़ी कर सकता है।

इस्लाम में ये कैसा महिला सम्मान? : महिलाओं की आवाज ‘आवारा’, ‘औरतों की आवाज इबादत के वक्त भी सुनाई न पड़े’ : अल्लाह-हु-अकबर और सुभानाल्लाह कहने की भी आजादी नहीं: अफगान महिलाओं के लिए तालिबान मंत्री खालिद हनफी का फरमान

                                                       अफगान महिलाएँ (साभार: NBC)
अफगानिस्तान में साल 2021 में सत्ता सँभालने के बाद से तालिबान महिलाओं के खिलाफ एक के बाद एक फरमान जारी कर रहा है। स्कूल-कॉलेज एवं नौकरीपेशा से निकालने के बाद तालिबान ने एक और विचित्र फरमान जारी किया है। तालिबान ने कहा कि इबादत करते समय महिलाओं की आवाज सुनाई नहीं देनी चाहिए। तालिबान ने महिलाओं की आवाज को ‘आवारा’ बताया है।

तालिबान के मंत्री मोहम्मद खालिद हनफी ने अपने फरमान में कहा कि औरतों की आवाज को आवारा माना जाता है। इसलिए उन्हें छिपकर रहना चाहिए और सार्वजनिक स्थानों पर उनकी आवाज किसी के कानों में नहीं पड़नी चाहिए। महिलाओं के भी नहीं। इसलिए कुरान पढ़ते समय भी उनकी आवाज सुनाई नहीं देनी चाहिए। पूर्वी लोगार प्रांत में एक कार्यक्रम के दौरान मंत्री खालिद हनफी ने इसकी घोषणा की।

हनफी ने कहा, “जब एक वयस्क महिला प्रार्थना करती है और दूसरी महिला उसके पास से गुजरती है तो उसे इतनी ऊँची आवाज में प्रार्थना नहीं करनी चाहिए कि वह सुन सके।” म्यूजिक को लेकर उन्होंने आगे कहा, “अगर उन्हें प्रार्थना करते समय (एक-दूसरे की) आवाज सुनने की भी अनुमति नहीं है तो उन्हें गाने की अनुमति कैसे दी जा सकती है, किसी और चीज की तो बात ही छोड़िए।”

हनफी ने कहा, “एक महिला के लिए किसी अन्य वयस्क महिला के सामने कुरान की आयतें पढ़ना वर्जित है। यहाँ तक कि तकबीर (अल्लाह हु अकबर) के नारे लगाने की भी अनुमति नहीं है।” उन्होंने कहा कि वे सुभानाल्लाह भी नहीं कह सकतीं। एक महिला को अजान देने की अनुमति भी नहीं है। हनफी की टिप्पणी का ऑडियो मंत्रालय के सोशल मीडिया मंच पर साझा किया गया था, लेकिन बाद में हटा दिया गया।

मंत्री ने कहा कि नैतिकता कानूनों के तहत ये नए प्रतिबंध लगाए गए हैं और उन्हें इसका पालन करना होगा। इन कानूनों के तहत महिलाओं को घर के बाहर बिना बुर्के के निकलना, ऊँची आवाज में बात करना और अपना चेहरा दिखाने पर प्रतिबंध लगाया गया है। इसके अलावा, लड़कियों को छठी कक्षा के बाद पढ़ाई पर रोक और महिलाओं को नौकरियों से बाहर रखा गया है।

यह फरमान तालिबान द्वारा इस साल अगस्त में लागू किए गए उस नए कानून ठीक दो महीने बाद आया है, जिसमें महिलाओं को घर से बाहर निकलते समय चेहरे सहित पूरे शरीर को ढकने का आदेश दिया गया है। तालिबान के अधिकारी महिला स्वास्थ्य कर्मियों को बात करने से मना करते हैं, खासकर पुरुष रिश्तेदारों से।

हेरात में दाई का काम करने वाली एक महिला ने एक टीवी चैनल को कहा, “जब हम काम पर जाते हैं तो वे हमें चेकपॉइंट पर बात करने की भी अनुमति नहीं देते हैं और क्लीनिकों में हमें पुरुष रिश्तेदारों के साथ चिकित्सा मामलों पर चर्चा नहीं करने के लिए कहा जाता है।” दाई ने बताया कि उसने आठ सालों तक दूरदराज के स्वास्थ्य क्लीनिकों में काम किया है।

विदेश में रहने वाले अफगान कार्यकर्ताओं ने तालिबान के इस आदेश की निंदा की है। ऑस्ट्रेलियाई हजारा एडवोकेसी नेटवर्क की ज़ोहल अज़रा ने कहा, “पिछले महीने तालिबान द्वारा सार्वजनिक रूप से महिलाओं की आवाज़ और चेहरे पर प्रतिबंध लगाने के बाद स्थिति और खराब होने की कल्पना करना कठिन है। इस आदेश के साथ हमने देखा कि महिलाओं को नुकसान पहुँचाने की तालिबान की क्षमता की कोई सीमा नहीं है।”

अज़रा ने कहा, “अफगानिस्तान में सत्ता में लौटने के बाद से तालिबान ने 105 से अधिक आदेशों और फतवों को लागू करके महिलाओं और बच्चियों के सार्वजनिक जीवन को समाप्त कर दिया है। इन्हें हिंसक और मनमाने ढंग से लागू किया जाता है, जिसमें हिरासत, यौन शोषण, यातना और क्रूरता या अपमानजनक व्यवहार एवं दंड जैसे कि महिलाओं और लड़कियों को पत्थर मारना और कोड़े मारना शामिल हैं।”