तालिबान का नया कानून ( साभार-x@visegrad24)
अफगानिस्तान में तालिबानी फरमान नए ‘क्रिमिनल प्रोसीजर कोड’ के तौर पर एक बार फिर सामने आया है। इसमें विरोध करने वालों के लिए मौत, ईशनिंदा के नाम पर कोड़े बरसाना, बच्चों और महिलाओं के यौन उत्पीड़न के बावजूद कोई कड़ी सजा का प्रावधान नहीं होना जैसी व्यवस्था है। धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ जबरदस्त भेदभाव किया गया है। जनता के बीच भी ‘न्याय’ एक समान नहीं है।
एक ही जुर्म के लिए अलग-अलग सजा
अफगानिस्तान की अदालतें नए कानून को मानने के लिए बाध्य होंगी। नए ‘क्रिमिनल प्रोसीजर कोड‘ (दे महाकुमु जज़ाई ओसुलनामा) को सर्वोच्च नेता हिबतुल्ला अखुंदजादा ने मंजूरी दी है। 4 जनवरी 2026 को जारी क्रिमिनल प्रोसीजर कोड को तीन सेक्शन, 10 चैप्टर और 119 आर्टिकल हैं। कानून के तहत समाज को चार हिस्सों में बांटा गया है। एक ही जुर्म के लिए सोशल स्टेटस के हिसाब से अलग-अलग सजा का प्रावधान है।
यह कोड अफगानिस्तान की जनता को 4 भागों में बाँटता है। धार्मिक उलेमा या विद्वान, अशरफ यानी संपन्न वर्ग, मध्यम वर्ग और निचला तबका। धार्मिक जानकारों को सबसे ऊँची कैटेगरी में रखा गया है और उन्हें कड़ी सजा से छूट दी गई है। गलत काम करने पर सिर्फ डांटने का प्रावधान है।
दूसरी कैटेगरी में कबायली बुज़ुर्ग, मिलिट्री कमांडर और असरदार अमीर लोग शामिल हैं। इस ग्रुप के लोगों को बुलाया जा सकता है और चेतावनी दी जा सकती है, लेकिन उन्हें जेल या शारीरिक सजा नहीं दी जाएगी।
तीसरी कैटेगरी में मिडिल क्लास के लोग शामिल हैं, जिन्हें जेल हो सकती है। जबकि चौथी और सबसे निचली कैटेगरी में आम लोग शामिल हैं, जिन्हें उन्हीं जुर्मों के लिए जेल, कोड़े मारने और दूसरी कड़ी सजा मिलेगी। यानी सजा अपराधी के अपराध से तय नहीं होगा, बल्कि उसके स्टेटस से तय होगा।
यह कानून मानवाधिकार उल्लंघन और निष्पक्ष सुनवाई के बुनियादी सिद्धांतों के विपरीत है। इस कोड में धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव किया गया है और लोगों की बोलने की आजादी को रोकने से लेकर बेवजह गिरफ्तारी और सजा देने की व्यवस्था है।
सजा भी हर तबके के लिए अलग- अलग तय किया गया है। एक तरह से यह सरकारी दमन को कानूनी मान्यता देता है। इस क्रिमिनल प्रोसीजर कोड में कहीं भी बचाव पक्ष के वकील तक पहुँच की जरूरत ही महसूस नहीं की गई है। टॉर्चर करने, मनमानी तरीके से हिरासत में लेने का अधिकार है। किसी भी मामले में मुआवजा पाने का अधिकार नहीं है।
इसके अलावा, कोड में कम से कम और ज़्यादा से ज़्यादा सजा तय नहीं की गई है, और आपराधिक कामों को साबित करने के लिए स्वतंत्र जाँच की प्रक्रिया को खत्म करके, इसके बजाय ‘स्वीकारोक्ति’ और ‘गवाही’ को अपराध साबित करने के मुख्य तरीके के तौर पर लागू किया गया है।
धार्मिक भेदभाव वाला कानून
नया कानून ‘हनफी इस्लाम’ को मानता है। क्रिमिनल प्रोसीजर कोड के आर्टिकल 2 का क्लॉज़ 8, हनफी विचारधारा को मानने वालों को मुसलमान बताता है। हनफी इस्लाम के अंतर्गत शिया, इस्लाइली, अहल ए हदीस को रखा गया है। जो लोग इसका पालन नहीं करते, उन्हें काफिर कहा गया है।
हनफी मानने वालों को अपना धर्म बदलने का अधिकार नहीं है। ऐसा करने पर दो साल जेल की सजा का प्रावधान है।
The Taliban has introduced a new law which divides society into four classes, with different punishments prescribed for the same crime depending on social status.
— Visegrád 24 (@visegrad24) January 24, 2026
Religious scholars are placed in the highest category and are exempt from severe punishment, with admonition deemed… pic.twitter.com/LEv5z75mw9
एक ऐसे देश में जहाँ जाफ़री शिया, इस्माइली, और अहल-ए-हदीस जैसे दूसरे इस्लामी नजरिए के मानने वाले, साथ ही सिख और हिंदू जैसे गैर-मुस्लिम समेत कई धार्मिक अल्पसंख्यक रहते हैं, यह भेदभाव वाला वर्गीकरण सीधे तौर पर धर्म और विश्वास के आधार पर भेदभाव न करने के सिद्धांत का उल्लंघन करता है।
‘बदात या बिदअत’ का लेबल लगाना और तालिबान के न्यायिक संस्थानों को असीमित अधिकार देना, धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ बड़े पैमाने पर दमन, कानूनी सुरक्षा से वंचित करने और मनमानी सजा देने के हालात बनाता है।
इसके अलावा, क्रिमिनल प्रोसीजर कोड के आर्टिकल 14 में यह तय किया गया है कि ‘पब्लिक इंटरेस्ट’ के लिए, अपराधियों को मारना सही है। इसमें ईशनिंदा जैसे आरोप भी शामिल हैं। इसी तरह, आर्टिकल 17 के क्लॉज 2 में, इस्लामी फैसलों का ‘मजाक उड़ाना’ सजा के लायक माना गया है और अपराधियों के लिए दो साल की जेल की सजा तय की है। इसमें ये नहीं बताया गया है कि ‘मजाक उड़ाने’ को कैसे पहचाना जाएगा। एक तरह से जजों को अपने नजरिए से मनमाने तरीके से सजा देने का अधिकार होगा।
डांस-गानों पर पूरी तरह पाबंदी
नए कानून के आर्टिकल 59 के मुताबिक, डांस करने और उसे देखने वालों को अपराध घोषित किया गया है और उनके लिए सजा का प्रावधान है। यानी परंपरागत सांस्कृतिक कार्यक्रम भी इस कानून के लागू होने के बाद बंद रहेंगे और लोकल संस्कृति नष्ट हो जाएगी।
कोड का आर्टिकल 13 के तहत नैतिक भ्रष्टाचार की जगहों को खत्म करने की बात कही गई है। ये तय करने का अधिकार भी सरकार को होगा कि कौन सी जगह इस श्रेणी में आएगा। इसके बहाने ब्यूटी पार्लरों और ऐसे सार्वजनिक जगहों पर रोक लगाई जा सकती है, जहाँ महिलाएँ जाती हैं या लोग जमा होते हैं और बातचीत करते हैं। आर्टिकल 40 के अनुसार, कोई भी व्यक्ति जो ‘भ्रष्टाचारी’ हो, तो भी उसे अपराधी माना जाएगा और उसे सजा दी जा सकती है। इसमें ‘भ्रष्टाचार’ का मतलब भी साफ न हो।
‘गुलामी’ को मान्यता देता है कानून
रावदारी का कहना है कि तालिबान का क्रिमिनल कोड ‘गुलाम’ शब्द का बार-बार इस्तेमाल करके गुलामी को मान्यता देता है। कोड के आर्टिकल 15 और 4 गुलामी और उससे जुड़े अधिकारों के बारे में बताया गया है। इंटरनेशनल लॉ के तहत गुलामी अपने सभी रूपों को सिरे से खारिज किया गया है।
एक प्रोविज़न में कहा गया है: “किसी भी ऐसे जुर्म के लिए जिसके लिए कोई तय ‘हुदूद’ सज़ा तय नहीं है, अपनी मर्ज़ी से सज़ा दी जाएगी, चाहे अपराधी आजाद हो या गुलाम।”
कानून की नजर में बराबरी और गुलामी पर पूरी तरह रोक अंतर्राष्ट्रीय कानून और मानवाधिकार की बुनियादी नियमों में एक है। लेकिन तालिबानी शासन इसे नहीं मानता। ह्यूमन राइट्स के बुनियादी उसूलों और इंटरनेशनल लॉ के ज़रूरी नियमों में से है- बराबरी का अधिकार, लेकिन क्रिमिनल प्रोसीजर कोड ऑफ़ कोर्ट्स का आर्टिकल 9 समाज को असरदार तरीके से चार कैटेगरी में बाँटता है।
‘स्कॉलर’ (उलेमा), ‘एलीट’ (अशरफ), ‘मिडिल क्लास’ और ‘लोअर क्लास’। इस आर्टिकल के मुताबिक, एक ही जुर्म करने पर, सज़ा का टाइप और गंभीरता जुर्म के नेचर के आधार पर नहीं, बल्कि जुर्म करने वाले की सोशल हैसियत के आधार पर तय होती है। उदाहरण के लिए, अगर कोई जुर्म किसी धार्मिक जानकार ने किया है, तो उसके लिए सिर्फ सलाह दी जाती है।
अगर यह जुर्म किसी एलीट क्लास के किसी व्यक्ति ने किया है, तो इसके लिए कोर्ट में समन और सलाह दी जाती है। लेकिन, अगर वही जुर्म ‘मिडिल क्लास’ के लोगों ने किया है, तो उन्हें जेल होती है, और अगर समाज के ‘लोअर क्लास’ के लोगों ने किया है, तो जेल के अलावा, उन्हें शारीरिक सजा भी दी जाती है। यह फैसला न सिर्फ सामाजिक भेदभाव को मान्यता देता है, बल्कि कानून के सामने बराबरी के सिद्धांत, भेदभाव पर रोक के सिद्धांत, जुर्म और सज़ा के बीच बराबरी के सिद्धांत, और कोड़े मारने जैसे अमानवीय सजा को मान्यता देता है।
इसके अलावा, कोड ने कई सेक्शन में ‘गुलाम’ शब्द का जिक्र करके गुलामी को भी सही ठहराया गया है। जैसा कि आर्टिकल 15 में कहा गया है, “किसी भी ऐसे जुर्म के मामले में जिसके लिए ‘सजा तय’ नहीं की गई है, ताज़ीर (अपनी मर्ज़ी की सज़ा) तय की जाती है, चाहे अपराधी आजाद हो या गुलाम।” इसी तरह, आर्टिकल 4 के पैराग्राफ 5 में कहा गया है कि ‘हद’ की सजा ‘इमाम’ दे सकता है और ‘ताजीर की सजा’ ‘पति’ और “मालिक” दे सकते हैं।
इस क्रिमिनल प्रोसीजर कोड में लोगों को आजाद और गुलाम बताना, और ‘गुलाम’ शब्द का जिक्र करना अंतर्राष्ट्रीय कानून का खुल्मखुल्ला उल्लंघन है।
कोड शारीरिक सजा, जैसे सार्वजनिक कोड़े मारने को कानूनी मान्यता देता है और बढ़ाता है। इसे मानवाधिकारों के खिलाफ और अपमानजनक व्यवहार माना गया है, जो सिस्टम में हिंसा को स्थान देता है।
महिलाओं और बच्चों पर दमन की छूट
यह कोड महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह मिटाने के तालिबान के प्रयासों को और तेज करता है। इसमें महिलाओं के लिए कड़े ड्रेस कोड, पुरुष अभिभावक (महरम) की अनिवार्य उपस्थिति, और सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की आवाज सुनने पर भी सजा के प्रावधान शामिल हैं। ब्यूटी पार्लरों को बंद करने की कोशिश की जा रही है।
ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइज़ेशन रावदारी का कहना है कि तालिबान अपने क्रिमिनल कोर्ट के कोड ऑफ प्रोसीजर के तहत बच्चों की पिटाई को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा है। कोड के आर्टिकल 30 में सिर्फ शारीरिक हिंसा जैसे हड्डियों में फ्रैक्चर, स्किन का फटना शामिल किया गया है।
बच्चों के यौन उत्पीड़न, मानसिक शोषण वगैरह को इसमें कोई जगह नहीं दी गई है। आर्टिकल 48 में कहा गया है कि एक पिता अपने 10 साल के बेटे को नमाज़ न पढ़ने जैसे कामों के लिए सजा दे सकता है।
विरोध करने पर मिलेगी मौत की सजा
तालिबान कोर्ट के कोड के अनुसार, जिसकी एक कॉपी अफ़गानिस्तान इंटरनेशनल को मिली है, तालिबान ने ‘बागी’ बताए गए लोगों को मौत की सजा दी है। कोड में कहा गया है कि ‘बागी’ से जनता को नुकसान होता है और उसे मारे बिना ठीक नहीं किया जा सकता।
यह नियम कानूनी संस्थाओं को विरोधियों और आलोचकों को मौत की सजा देने का अधिकार देता है। आर्टिकल 4, क्लॉज 6, नागरिकों को किसी व्यक्ति को खुद सजा देने की इजाजत देता है अगर वे कोई ‘पाप’ करते हुए देखते हैं।
कोड में कहा गया है कि कोई भी मुसलमान जो किसी व्यक्ति को पाप करते हुए देखता है, उसे सजा देने का अधिकार है।
एक और नियम कहता है कि कोई भी व्यक्ति जो सिस्टम के विरोधियों को बैठक करते हुए देखता है या उसके बारे में जानता है, लेकिन संबंधित अधिकारियों को सूचित नहीं करता है, उसे अपराधी माना जाएगा और उसे दो साल जेल की सज़ा दी जाएगी।
इस आर्टिकल के तहत, सभी नागरिकों को तालिबान विरोधियों की गतिविधियों की सूचना अधिकारियों को देनी होगी या खुद सजा भुगतना पड़ेगा। यानी हर तरह के जुल्म के बावजूद विरोध करने का अधिकार कानून में नहीं दिया गया है।
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