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FCRA Bill को ‘ईसाई संस्थानों की लूट’ बताने वाले बिशप जोसेफ डिसूजा के दावों की खुली पोल, द वायर ने फिर फैलाया वही नैरेटिव

                                   इंटरव्यू का स्क्रीनशॉट (फोटो साभार - YouTube/The Wire)
वामपंथी प्रोपेगेंडा पोर्टल द वायर ने शुक्रवार (7 अगस्त 2026)  को एक क्लिप शेयर की, जिसमें ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल (AICC) का अध्यक्ष और गुड शेफर्ड चर्च ऑफ इंडिया के प्राइमेट आर्कबिशप जोसेफ डिसूजा फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन अमेंडमेंट बिल, 2026 (FCRA Bill 2026) को ईसाई संस्थानों की लूट और चोरी और संघ परिवार का एजेंडा बताते हुए नजर आया।

जिस पॉडकास्ट में करण थापर ने जोसेफ डिसूजा का इंटरव्यू लिया था, वह 4 महीने पहले 2 अप्रैल 2026 को प्रसारित हुआ था। डिसूजा जो घोटाले का आरोपित और विदेशी फंडिंग प्राप्त ईसाई पादरी हैं, उसको द वायर बार-बार FCRA संशोधनों को लेकर मोदी सरकार को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल कर रहा है। ये संशोधन संदिग्ध और अवैध फंडिंग, अवैध धर्मांतरण और अन्य गतिविधियों पर शिकंजा कसेंगे।

क्लिप शेयर करके द वायर उन आरोपों और झूठ की मुहिम में शामिल हो गया, जिन्हें कई निहित स्वार्थ वाले समूह FCRA बिल के खिलाफ लगातार आगे बढ़ा रहे हैं। यह क्लिप डिसूजा द्वारा पत्रकार करण थापर को दिए गए एक इंटरव्यू से ली गई थी।

इंटरव्यू की शुरुआत थापर इस घोषणा के साथ करता हैं कि FCRA बिल में कठोर और देखने में असंवैधानिक उपाय शामिल हैं, जिस पर डिसूजा बिल को लेकर अपने खुद के निराधार दावे जोड़ता हैं।

द वायर पर घोटाले के आरोपित जोसेफ डिसूजा ने FCRA को कहा ईसाई संस्थानों की लूट और चोरी

थापर की बात से सहमति जताते हुए डिसूजा ने दावा किया कि अगर यह बिल पास हो जाता है, तो इससे वह संभव हो सकेगा जिसे भारतीय ईसाई समुदाय और वैश्विक ईसाई समुदाय की कानूनी लूट को बढ़ावा मिलेगा।
अपने गंभीर आरोप को समझाते हुए डिसूजा ने दावा किया कि यह बिल ईसाई संस्थानों की संपत्तियों और परिसंपत्तियों पर कब्जा करने की एक चाल है। उसने आगे दावा किया कि बिल के तहत प्रस्तावित डेजिग्नेटिड अथॉरिटी को उन संगठनों के विदेशी योगदान और संपत्तियों पर स्थायी नियंत्रण लेने की व्यापक शक्तियाँ दी गई हैं, जिनका विदेशी योगदान पंजीकरण रद्द, समर्पित या समाप्त हो जाता है।
जोसेफ डिसूजा ने आगे दावा किया कि यह बिल प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है, क्योंकि डेजिग्नेटिड अथॉरिटी के फैसले न्यायिक समीक्षा या न्यायिक जाँच के अधीन नहीं हैं।

ईसाई चर्च के प्रति RSS की ऐतिहासिक दुश्मनी

डिसूजा ने आरोप लगाया कि सरकार इस प्रावधान का गलत इस्तेमाल कर सकती है। वह किसी संगठन के नवीनीकरण आवेदन को समय पर मंजूर नहीं करके या उस पर कार्रवाई नहीं करके ऐसा कर सकती है, जिससे संगठन की संपत्तियाँ जब्त हो जाएँगी।
उसने FCRA बिल को अल्पसंख्यक अधिकारों पर सीधा हमला बताते हुए इसे देश के ईसाई संस्थानों को हड़पने के RSS के एजेंडे को आगे बढ़ाने वाला बताया।
उसने बिल लाने के पीछे सरकार की वैचारिक मंशा होने का आरोप लगाया। उसने दावा किया कि RSS की मदर टेरेसा और ईसाई चर्च के प्रति ऐतिहासिक दुश्मनी ही FCRA बिल के पीछे की वजह है।
बिल को अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए खतरा बताते हुए आर्कबिशप ने इसकी तुलना नाजी जर्मनी में बनाए गए यहूदी मामलों के कार्यालय, जिसे रेफरेट IV B4 कहा जाता था, से की। यह कार्यालय यहूदी लोगों की संपत्तियों, संस्थानों, सिनेगॉग और उनकी हर चीज को हड़पने के लिए बनाया गया था।

ईसाई समुदाय को कमजोर करना

आर्कबिशप ने आरोप लगाया कि सरकार की आर्थिक लूट करने और ईसाई समुदाय को कमजोर करने की साजिश को FCRA बिल का रूप दिया गया है। उसने विदेशी फंडिंग से जुड़ी राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंताओं को खारिज कर दिया और RSS पर आतंकवाद का आरोप लगाया।
उसने दावा किया कि ईसाई संगठनों की विदेशी फंडिंग की जाँच जरूरी नहीं है, क्योंकि ईसाई आतंकवादी गतिविधियों में शामिल नहीं हैं। डिसूजा ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि बिल का उद्देश्य चर्चों में आने वाले उस विदेशी धन और उससे होने वाली आय को नियंत्रित करना है, जिसका इस्तेमाल धर्मांतरण के लिए किया जाता है।
उसने आगे दावा किया कि भारत में ईसाई संगठन धर्मांतरण की गतिविधियों में शामिल होते हैं और सरकार को आधुनिक ईसाई धर्म की कोई समझ नहीं है। उसने धमकी दी कि बिल लाकर सरकार वैश्विक स्तर पर और संयुक्त राष्ट्र में एक बड़ा विवाद खड़ा कर देगी।
उसने कहा कि इस कार्रवाई के वैश्विक स्तर पर असर होंगे और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की ओर से प्रतिक्रिया और विरोध का सामना करना पड़ेगा। आर्कबिशप ने धमकी दी कि अगर बिल संसद में पास हो गया, तो ईसाई संगठन देश और दुनिया की अदालतों का रुख करेंगे, अपने वैश्विक साझेदारों को उनकी अदालतों में जाने देंगे।

जोसेफ डिसूजा – हिंदुओं के खिलाफ नफरत का अभियान चलाने वाला व्यक्ति, 296.6 करोड़ रुपए निजी बैंक खातों में डायवर्ट करने का आरोप

डिसूजा खुद को दलितों और हाशिए पर मौजूद समुदायों की आवाज के रूप में पेश करता हैं, लेकिन FCRA बिल पर चर्चा में वह कोई निष्पक्ष आवाज नहीं है। अतीत में उन्हें विदेशी फंडिंग और वित्तीय अनियमितताओं को लेकर जाँच का सामना करना पड़ा है।
वह और उसके पश्चिमी सहयोगी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह नैरेटिव आगे बढ़ाने के लिए कुख्यात है कि वो भारत के उन उत्पीड़ित, पिछड़े या अछूत समुदायों से आता है, जिन्होंने बाद में ईसाई धर्म अपना लिया।
गुड शेफर्ड चर्च और उससे जुड़े संगठनों के तहत स्कूलों, अस्पतालों और सामाजिक सेवा संगठनों समेत उसके संस्थानों के नेटवर्क को विदेशी फंडिंग मिलती है और हजारों अन्य NGO की तरह पिछले वर्षों में FCRA अनुपालन जाँच का सामना कर चुका है।
जोसेफ डिसूजा ने दलित फ्रीडम नेटवर्क की सह-स्थापना की थी, जिसका बाद में नाम बदलकर डिग्निटी फ्रीडम नेटवर्क (DFN) कर दिया गया। यह नेटवर्क अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और यूनाइटेड किंगडम में प्रमुख शाखाएँ संचालित करता है।
इन संगठनों से जुड़ी उसकी वेबसाइट और प्रचार सामग्री भारत की बेहद नकारात्मक तस्वीर पेश करती हैं और भारत में दलितों और ईसाइयों को कीड़ों की तरह मारा जा रहा है जैसे झूठ फैलाती हैं।
तेलंगाना CID और प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मनी लॉन्ड्रिंग और वित्तीय गबन से जुड़े गंभीर आरोपों के संबंध में आरोप लगाए जाने के बाद जोसेफ डिसूजा जाँच के घेरे में आया।
उस पर और उसके बेटे जोश लॉरेंस डिसूजा पर गरीब दलित बच्चों की मुफ्त शिक्षा और कल्याण के लिए जुटाए गए लगभग 296.6 करोड़ रुपए के विदेशी फंड को फर्जी बिलों और शेल कंपनियों के जरिए निजी बैंक खातों, फिक्स्ड डिपॉजिट और महंगी रियल एस्टेट में निवेश करने के लिए डायवर्ट करने का आरोप लगाया गया।
डिसूजा उन प्रमुख लोगों में से एक हैं, जिन्होंने भारत को बदनाम करने के लिए ईसाइयों के खिलाफ बढ़ती नफरत का झूठ फैलाया। ऑपइंडिया ने डिसूजा, उसके घोटाले और उसके विदेशी फंडिंग पर विस्तृत रिपोर्ट की है।

आर्कबिशप के झूठ का पर्दाफाश

FCRA बिल को लेकर डर फैलाने वाली बातें उन वर्गों की ओर से आ रही हैं, जिन्हें नए कानून के तहत वैध जाँच का सामना करना पड़ सकता है। हालाँकि वास्तविकता उन बातों से काफी अलग है, जिस तरह कुछ निहित स्वार्थ वाले समूह इसे पेश कर रहे हैं।
प्रस्तावित बिल स्पष्ट रूप से सभी पूजा स्थलों को सरकारी कब्जे, धर्मनिरपेक्षीकरण या किसी दूसरे उद्देश्य में बदले जाने से सुरक्षा देता है।
सरकार को चर्चों और धार्मिक संस्थानों पर कब्जा करने की व्यापक शक्तियाँ दिए जाने के दावों की सच्चाई का पता प्रस्तावित बिल को सीधे पढ़कर लगाया जा सकता है। प्रस्तावित बिल में एक प्रावधान इस प्रकार है:
“उप-धारा (6) में निहित किसी भी बात के बावजूद, नामित प्राधिकरण (डेजिग्नेटिड अथॉरिटी), जहाँ उसके पास स्थायी रूप से निहित कोई संपत्ति या उसका कोई हिस्सा पूजा स्थल है, वहाँ ऐसी संपत्ति या उसके हिस्से का प्रबंधन या संचालन ऐसे व्यक्ति को, ऐसे तरीके से और ऐसी शर्तों पर सौंपेगा, जो निर्धारित की जा सकती हैं और यह सुनिश्चित करेगा कि ऐसे पूजा स्थल का धार्मिक स्वरूप बरकरार रहे।“
डिसूजा के दावे के विपरीत, डेजिग्नेटिड अथॉरिटी  द्वारा पारित कोई भी आदेश प्रशासनिक समीक्षा और जिला न्यायाधीश के समक्ष न्यायिक अपील के अधीन रहेगा। इसके अलावा, केंद्र की पूर्व अनुमति के बिना राज्य स्तर की एजेंसियों को स्थानीय मुकदमे शुरू करने से रोक दिया गया है। यह मनमानी स्थानीय कार्रवाई के खिलाफ एक स्पष्ट सुरक्षा उपाय है।
FCRA बिल ईसाई धर्म समेत किसी भी धर्म के लिए विदेशी फंडिंग पर रोक नहीं लगाता। चर्च, मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारे समेत पूजा स्थल वास्तविक धार्मिक कार्यों के लिए विदेशी दान प्राप्त करते रहेंगे।

जोसेफ डिसूजा पर खुद अधिकारियों ने FCRA नियमों के उल्लंघन का लगाया है आरोप

जाँचकर्ताओं के अनुसार, गृह मंत्रालय (MHA) ने नेटवर्क से जुड़े प्रमुख संगठनों के FCRA लाइसेंस नियामकीय उल्लंघनों के कारण पहले निलंबित और बाद में रद्द कर दिए थे।
इसके बावजूद विदेशी फंड अप्रत्यक्ष माध्यमों से भारत में आते रहे। FCRA लाइसेंस रद्द होने का मतलब था कि संगठन सीधे विदेशी दान प्राप्त नहीं कर सकते थे। जाँचकर्ताओं ने आरोप लगाया कि इसके बाद डिसूजा ने अपनी व्यावसायिक इकाई OMBF (ओम बुक्स फाउंडेशन) का इस्तेमाल एक वैकल्पिक रास्ते के रूप में किया।
आरोपों के अनुसार, प्रिंटिंग और पब्लिशिंग सेवाओं के लिए बढ़े-चढ़े और फर्जी बिल तैयार किए गए और उन्हें विदेशों में मौजूद संबंधित या कथित रूप से संबद्ध संगठनों को भेजा गया।
इन लेनदेन को वैध व्यावसायिक गतिविधियों के रूप में पेश किया गया, जिससे यह दिखाया जा सके कि विदेशी संगठनों ने किताबों और प्रकाशनों का ऑर्डर दिया था। जाँचकर्ताओं का दावा है कि इस व्यवस्था का इस्तेमाल सीधे विदेशी योगदान पर लगी पाबंदियों के बावजूद विदेशी फंड को भारत में भेजते रहने के लिए किया गया।
जाँचकर्ताओं ने आरोप लगाया कि ऊपर बताई गई गतिविधियों के जरिए जुटाए गए लगभग 296.6 करोड़ रुपए को रियल एस्टेट और अन्य परिसंपत्तियों में निवेश के माध्यम से मनी लॉन्ड्रिंग की गई।
प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत जाँच करते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पाया कि जोसेफ डिसूजा, उसके बेटे जोश लॉरेंस डिसूजा और करीबी सहयोगियों ने इन गतिविधियों से जुड़े फंड का इस्तेमाल करके महंगे जमीन के टुकड़े, कमर्शियल संपत्तियाँ और लग्जरी विला खरीदे थे।
जिसे ED ने अपराध से अर्जित आय (proceeds of crime) के रूप में वर्गीकृत किया, उस पर कार्रवाई के तहत ED ने 12 प्रमुख अचल संपत्तियों को अटैच और फ्रीज किया। इनकी संयुक्त बाजार कीमत 15 करोड़ रुपए से अधिक आंकी गई थी।
इसके बाद इन फंड को कागजी लेनदेन और फर्जी बिलों के जरिए निजी संपत्तियों और ऐशो-आराम वाली जीवनशैली में डायवर्ट किया गया, बजाय इसके कि इनका इस्तेमाल उन लाभार्थियों के लिए किया जाता, जिनके लिए ये फंड जुटाए गए थे।

राजनीतिक संबंध, भारतीय लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम और कॉन्ग्रेस के साथ वैचारिक तालमेल

जोसेफ डिसूजा के आलोचकों का कहना है कि उसका प्रभाव मजहबी गतिविधियों से आगे तक फैला हुआ है और उसने भारत के राजनीतिक तथा मीडिया इकोसिस्टम के कुछ हिस्सों के साथ करीबी संबंध बनाए रखे हैं।
उसका दावा है कि जब भी वित्तीय आरोपों से जुड़ी कानूनी कार्रवाई तेज होती है, तो राजनीतिक समर्थन तंत्र ऐसी कार्रवाइयों को राजनीतिक या वैचारिक रूप से प्रेरित बताने के लिए सक्रिय हो जाते हैं। जोसेफ डिसूजा का वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेतृत्व के साथ संबंध कई वर्षों पुराना है।
2004 के आम चुनाव के बाद, जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार चुनाव हार गई और सोनिया गाँधी के नेतृत्व में यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस (UPA) सत्ता में आया, तब डिसूजा ने अमेरिका में चर्च नेटवर्क को पत्र लिखकर इस नतीजे को दैवीय न्याय (Divine Justice) और एक बड़ा चमत्कार बताया था।
उस समय डिसूजा ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल के वैश्विक अध्यक्ष के रूप में काम कर रहा था। ब्रेकिंग इंडिया  के अनुसार, इन दावों और संबंधित दस्तावेजों पर किताब के अध्याय 8 में चर्चा की गई है।
इस तरह के राजनीतिक बयान जोसेफ डिसूजा जैसे लोगों से जुड़ी ED और CID की चल रही जाँच को मजहबी उत्पीड़न के मुद्दे के रूप में पेश करने का काम करते हैं, जिससे एक राजनीतिक सुरक्षात्मक नैरेटिव तैयार होता है। हालाँकि यह स्थापित कानूनी निष्कर्ष के बजाय राजनीतिक व्याख्या और अलग-अलग दृष्टिकोणों का मामला है।
मूल रूप से, द वायर ने न केवल एक ऐसे बिशप को मंच दिया, बल्कि बार-बार उनके निराधार आरोपों और खुले झूठ को भी आगे बढ़ाया, जिन्होंने ईसाई उत्पीड़न को लेकर झूठ फैलाते हुए भारत विरोधी और हिंदू विरोधी अभियान चलाया, जिन पर करोड़ों रुपए के घोटाले का आरोप है और जिन्होंने खुद FCRA नियमों का उल्लंघन किया है। यह सब प्रस्तावित FCRA संशोधनों के बारे में झूठ फैलाने के लिए किया गया, जो उसके जैसे घोटालेबाजों पर शिकंजा कसेंगे।

न सरकार ने ‘CJP’ से साधा कोई संपर्क, न तय हुई कोई मुलाकात: साख बचाने के लिए झूठ बोल रहा सौरव दास; संसद तक पहुँची ‘कॉकरोचों’ की भीड़, पुलिस पर भी CJP समर्थकों ने किया हमला: देखें Videos

20 जुलाई को जंतर मंतर से लेकर पार्लियामेंट स्ट्रीट तक INDI गठबंधन के सहयोग से जो उपद्रव मचा उसे विपक्ष खासतौर से आम आदमी पार्टी अपनी जीत मान रहा है। जबकि उसने इस उपद्रव से बांग्लादेश और नेपाल में मची खुलेआम हुई गुंडागर्दी को अंजाम देने के मंसूबों को जाहिर कर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी दे मारी है। अंग्रेजी दैनिक 'द हिन्दू' भी आग में घी डालने से पीछे नहीं रहा। विपक्ष और 'द हिन्दू' ने यह भी साबित कर दिया कि भारत विरोधी ताकतों को हवा देकर भारत में उपद्रवियों की हर संभव मदद करने में पीछे नहीं रहेंगे। अभी तक यह सच्चाई भी सामने नहीं कि आखिर इस 'कॉकरोच जनता पार्टी' का संरक्षण कौन है?  

जिस तरह कांग्रेस की स्थापना उस विदेशी अंग्रेज़ ने की थी उसी तरह इस उपद्रवी पार्टी की स्थापना भी एक विदेशी ने ही की है। गौरतलब बात यह है कि जब विदेशी अंग्रेज़ द्वारा कांग्रेस की स्थापना की गयी थी ब्रिटिश सरकार ने उसे देश विरोधी नहीं कहा क्योकि कांग्रेस का गठन नेताजी सुभाष चंद्र बोस, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, चंद्रशेखर आज़ाद और भगतसिंह पार्टी द्वारा स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई लड़ी जा रही थी उससे लोगों का ध्यान भटकाने के लिए किया गया था। ठीक उसी तरह विकासशील भारत में अड़चने डालने के लिए इस उपद्रवी पार्टी का गठन किया गया है। देखना यह है कि क्या यह पार्टी अपने साथ विपक्ष को भी लेकर डूबेगी? यह भविष्य के गर्भ में छिपा है।

          

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने जुटे 'कॉकरोच जनता पार्टी' के समर्थक मार्च करते हुए सोमवार (20 जुलाई) को संसद तक पहुँच गए। इस दौरान कॉकरोचों ने न केवल पार्लिएमेंट में घुसने की कोशिश की, बल्कि बैरिकेडिंग को तोड़ने का प्रयास किया और पुलिस से भिड़ने की भी कोशिश की।

स्थिति बिगड़ते देख संसद भवन की सुरक्षा अत्यंत कड़ी कर दी गई है और सभी मुख्य प्रवेश द्वारों को बंद कर दिया गया। उपद्रवी भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े।

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों की पूर्व नियोजित रणनीति संसद परिसर के भीतर प्रवेश करने की थी। प्रदर्शन में शामिल सीजेपी समर्थक बयान दे रहे थे कि एकजुट होकर केंद्र की मोदी सरकार को गिरा दी जानी चाहिए। प्रदर्शन के दौरान समर्थकों के हाथों में भीम आर्मी के झंडे देखे गए। लोगों को ‘जय भीम’ के नारे लगाते हुए देखा गया

घटना के सामने आए वीडियो फुटेज में प्रदर्शनकारी पुलिस बल पर पथराव करते साफ नजर आ रहे हैं। इस दौरान उपद्रवियों को खुलेआम यह कहते सुना गया, “पत्थरबाजी तो होगी ही।”

कॉकरोच जनता पार्टी ने इस प्रदर्शन से पहले दावा किया था कि वह एक पीसफुल प्रोटेस्ट करेंगे। हालाँकि 20 जुलाई को दिखी तस्वीरों ने यह साफ कर दिया कि मंशा कुछ अलग है। इस प्रदर्शन में पत्रकारों से लेकर पुलिस पर हमला हुआ। तस्वीरें और वीडियोज सोशल मीडिया पर आ चुकी हैं। इस दौरान सुनियोजित ढंग से भीम आर्मी के एजेंडे को बढ़ाया गया।

न सरकार ने ‘CJP’ से साधा कोई संपर्क, न तय हुई कोई मुलाकात: साख बचाने के लिए झूठ बोल रहा सौरव दास, सरकारी सूत्रों ने मीडिया दावों को नकारा

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रवक्ता सौरव दास ने 20 जुलाई को केंद्र सरकार के साथ बातचीत का जो दावा कर सुर्खियाँ बटोरीं थी वो असल में फर्जी निकली हैं। सौरव दास ने X पर पोस्ट करके कहा था कि मोदी सरकार ने प्रदर्शनकारियों से बातचीत के लिए संपर्क किया है और वह और आशुतोष रंका CJP की ओर से केंद्रीय मंत्री जे पी नड्डा से मिलने जा रहे हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने सुबह ही उनसे बातचीत के लिए संपर्क किया था, युवाओं का बड़ा जमावड़ा उनके साथ है और पार्टी की माँगें पूरी तरह स्पष्ट हैं।

इस खबर को ‘द हिंदू’ की पत्रकार विजइता सिंह ने भी अपने सोशल मीडिया हैंडल पर प्रमुखता से आगे बढ़ाया।

उन्होंने अपने सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट किया कि नई दिल्ली के डीसीपी सचिन शर्मा केंद्र सरकार की ओर से CJP टीम से बातचीत कर रहे थे। साथ ही ये भी कहा कि CJP सदस्यों को पहले जिला मजिस्ट्रेट, फिर केंद्र सरकार के एक सचिव और उसके बाद राज्य मंत्री स्तर के अधिकारियों के साथ बातचीत का प्रस्ताव दिया गया था। मगर, CJP सदस्यों ने इन सभी प्रस्तावों को खारिज कर दिया क्योंकि उनकी माँग थी कि उनकी सीधी बातचीत केवल प्रधानमंत्री या किसी कैबिनेट मंत्री के साथ ही हो, और उन्होंने इसके लिए डीसीपी को मंत्रियों के नामों की एक सूची भी सौंपी थी।

हालाँकि, इस पूरे घटनाक्रम में तब नया मोड़ आया जब यह स्पष्ट हुआ कि सौरव दास और उनका समर्थन करने वाले पत्रकारों के ये दावे कथित रूप से असत्य थे। ऑपइंडिया को सरकारी सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार सौरव दास द्वारा किए गए सभी दावे पूरी तरह से बेबुनियाद और झूठे हैं।

सरकारी सूत्रों ने स्पष्ट किया कि मोदी सरकार की ओर से CJP या प्रदर्शनकारियों से बातचीत के लिए ऐसा कोई संपर्क नहीं साधा गया था और न ही केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और सौरव दास के बीच किसी भी प्रकार की कोई बैठक या मुलाकात तय थी।

गौरतलब हो कि पूरा सच सामने आने के बाद अब ये दावा हो रहा है कि प्रदर्शन की विफलता को देखते हुए जीत का झूठा दावा किया गया और अपनी साख बचाने के मकसद से यह अफवाह फैलाई गई थी।

अगर दलित-जाट-तमिल कोई नहीं है हिंदू…नोमानी बताओ कि शिया, सुन्नी, वहाबी, अहमदी, पठान और पासमांदा मुस्लिम हैं? अगर मुस्लिम है तो एक ही मस्जिद में नमाज क्यों नहीं पढ़ सकते? मौलाना सज्जाद नोमानी खुले में कर रहा भारतीयों को तोड़ने का प्रयास: सनातनियों से करता है घृणा, तालिबानियों को भेजता है सलाम

                                                   सज्जाद नोमानी (फोटो साभार - यूट्यूब/)
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से जुड़े मौलाना खलीलुर रहमान सज्जाद नोमानी का एक विवादित बयान की वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से शेयर हो रही है। वायरल हो रही एक वीडियो क्लिप में वह दावा करते हैं कि भारत में हिंदू अल्पसंख्यक हैं। किसी भी परिस्थिति में हिंदुओं को बहुसंख्यक नहीं माना जा सकता।

नोमानी जिस तरह हिन्दुओं को विभाजित करने की कोशिश कर रहा है उसके जवाब में हिन्दुओं को भी इन कट्टरपंथियों से पूछना चाहिए कि जब शिया, सुन्नी, वहाबी, अहमदी, पासमांदा आदि दूसरे फिरके मुस्लिम हैं तो एक मस्जिद में नमाज क्यों नहीं पढ़ सकते? क्यों नहीं एक ही कब्रिस्तान में मुर्दे को दफ़न किया जा सकता? इस कट्टरपंथी को मालूम है कि हिन्दू को जाति बांटकर विभाजित किया जा सकता है, लेकिन इन कट्टरपंथियों अपनी मुस्लिम कौम से सभी फिरकों को एक ही मस्जिद में नमाज पढ़ने और सभी के मुर्दे एक ही कब्रिस्तान में दफ़न होने चाहिए।

 

इतना ही नहीं, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के कुछ कालनेमि हिन्दू भी प्रोग्राम में शामिल थे,  क्योकि उनकी पार्टियों को इनके वोट चाहिए। वीडियो में देखिए कितनी मुस्लिम महिलाएं हिजाब, नकाब या बुर्के हैं। दूसरे, क्या शिया, सुन्नी और वहाबी आदि पचासों फिरकों के लिए अलग मस्जिद और कब्रिस्तान के लिए जगह क्या land jihad नहीं?               

मौलाना नोमानी ने अपने इस दावे के पीछे तर्क देते हुए देश के कई बड़े सामाजिक और क्षेत्रीय समूहों को हिंदू धर्म के दायरे से बाहर आते हैं। उन्होंने कहा, सिख, ईसाई और बौद्ध ये तो हिंदू हैं ही नहीं। इनके अलावा अनुसूचित जाति (SC), जाट और जनजातीय लोग भी हिंदू नहीं हैं। न ही तमिलनाडु के लोग और लिंगायत खुद को हिंदू मानते हैं। 

भाषण में नोमानी की दिखी हिंदू घृणा

अपने भाषण में नोमानी ने केवल सामाजिक वर्गीकरण ही नहीं किया, बल्कि देश की राजनीति और मुस्लिम समुदाय के रुख पर भी गहरी निराशा और हताशा व्यक्त की। उन्होंने कहा “हमने हिंदुओं को ‘सेकुलर’ (धर्मनिरपेक्ष) और ‘फासिस्ट’ (फासीवादी) श्रेणियों में बाँट दिया। हम राजनीतिक समर्थन के लिए सेकुलर हिंदुओं पर निर्भर रहे, लेकिन इन समूहों ने आखिरकार देश की कमान उन लोगों के हाथों में सौंप दी जिन्हें हम फासिस्ट हिंदू कहते हैं। दोनों ने ही मिलकर हमारे मकसद को नुकसान पहुँचाया।”

 सज्जान नोमानी का यह भाषण 2 फरवरी, 2026 को नई दिल्ली के इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में आयोजित ‘मिल्लत टाइम्स कॉन्क्लेव 2026’ के समापन सत्र के दौरान दिया गया था।

यह कार्यक्रम इस मीडिया हाउस की 10वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में रखा गया था। इस कार्यक्रम में कॉन्ग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर, सलमान खुर्शीद, इमरान प्रतापगढ़ी, समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन चौधरी और भाजपा नेता यासिर जिलानी जैसे कई बड़े राजनेता और पत्रकार शामिल थे।

मौलाना नोमानी ने जोर देकर कहा कि उनका यह बयान हवा-हवाई नहीं है, बल्कि देश भर में धार्मिक, जातिगत और आदिवासी पहचानों पर किए गए उनके तीन दशकों के सफर और शोध पर आधारित है।

पहले भी उगल चुका है हिंदुओं के लिए जहर

 हिंदुओं को तोड़ने और हिंदुओं को बाँटने की बात करने वाला सज्जाद नोमानी का ये पहला विवादित बयान नहीं है। ये वही सज्जाद नोमानी है जिसे तालिबान के आने पर खुशी हुई थी और जो बच्चियों की शिक्षा का विरोधी रहा है।

साल 2023 में नोमानी की वीडियो सामने आई थी। अपनी वीडियो में वह कहता सुनाई पड़ रहे थे, “पाक रमजान की रात में उन लोगों पर लानत भेजता हूँ जो अपनी बच्चियों को अकेले कोचिंग सेंटर या कॉलेज भेजते हैं। अल्लाह उन्हें जहन्नुम में भेजेगा।”

इतना ही नहीं साल 2021 में तालिबान ने जब अफगानिस्तान पर कब्जा किया था तब सज्जाद नोमानी ने भारत में इसका स्वागत किया था। मौलाना सज्जाद नोमानी ने तालिबान की तारीफों के पुल बाँधते हुए तालिबानियों को सलाम भेजा था।

सज्जाद नोमानी की हिंदू घृणा  और भारत को तोड़ने का प्रयास

अजीब बात है कि एक तरफ सज्जाद नोमानी खुलकर भारत के हिंदुओं के विरुद्ध अपनी घृणा जाहिर करता है, उन्हें बाँटने की बात करता है, उनके अस्तित्व पर सवाल उठाता है। दूसरी तरफ खुलकर तालिबान के लिए अपना समर्थन देता है, इस्लामी कट्टरपंथ की पैरवी करता है, बच्चियों की पढ़ाई को हराम बताता है, बड़े-बड़े नेता, लेखक, विचारक उसके भाषणों को सुनते हैं और स्वरा भास्कर जैसे लोग तो मुस्लिमों के बीच राजनीति करने के लिए अपना पहनावा तक बदलकर इनके आगे सरेंडर कर देते हैं। लेकिन फिर भी भारत के लिबरल उसे बुद्धिजीवी मानकर इतना बड़ा मंच देते हैं। उसे सुनने के लिए बड़ी तादाद में लोग आते हैं।

कहना गलत नहीं है कि जिन ‘सेकुलर हिंदुओं’ ने कभी अपनी उदारता दिखाने के लिए नोमानी को ‘महान स्कॉलर’ के रूप में स्थापित किया, आज वही स्कॉलर मंचों से खुलेआम हिंदुओं के अस्तित्व और उनकी जनसांख्यिकीको चुनौती दे रहे हैं। आज मंच से खुलेआम इवकी नफरत जगजाहिर हो रही है।

नोमानी का यह दावा कि भारत में हिंदू बहुसंख्यक नहीं हैं और जो खुद को हिंदू मानते हैं वो असल में अलग-अलग पहचानों में बंटे हैं… कोई साधारण बयान नहीं है।

ये हिंदुओं के लिए ही सीखने का समय है कि जब हम खुद को राजनीति जाति और क्षेत्रो में खुद को बाँटते हैं, तभी नोमानी जैसे लोग इसी कमजोरी को पकड़कर हम पर चोट करते हैं। खुलकर हम भारतीयों को तोड़ने का प्रयास करते हैं और ये संदेश देते हैं कि देश में हिंदू आबादी बहुसंख्यक नहीं है और जो लोग खुद को हिंदू मानते हैं वो अलग हैं। इसका सीधा उद्देश्य बहुसंख्यक समाज के भीतर एक ऐसा हीनभावना और भ्रम पैदा करना है जिससे वे अपनी सामूहिक ताकत को भूल जाएँ और कट्टरपंथी ताकतों का गजवा-ए-हिंद का रास्ता आसान हो सके।

समाजवादी पार्टी में बड़ी टूट, भाजपा में शामिल होने को तैयार बैठी है पूरी समाजवादी पार्टी; रामगोपाल यादव ने अमित शाह को सौंपी चिट्ठी


उत्तर प्रदेश में चुनाव होने से पहले ही लगता है चुनाव परिणाम घोषित हो गया है। राहुल गाँधी की छत्रसाया में रहने वाली एक और पार्टी अपने अंत की ओर चल पड़ी है। महाराष्ट्र में शिवसेना (UBT) और पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस(TMC) में टूट और दल-बदल चर्चाओं के बीच उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) को लेकर भी बड़ा दावा सामने आया है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के अध्यक्ष और योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने दावा किया है कि सपा में जल्द ही बड़ी टूट हो सकती है।

उन्होंने कहा, “समाजवादी पार्टी में बड़ी टूट होगी। राम गोपाल यादव ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह जी को चिट्ठी सौंपी है। खनन घोटाला और गोमती रिवर फ्रंट घोटाला का मास्टरमाइंड कौन है, पूरा उत्तर प्रदेश जानता है। शिकंजा कस रहा है तो सपा परेशान है। महाराष्ट्र बंगाल छोड़िए, समूची सपा, भाजपा में शामिल होने को तैयार बैठी है।”

एक बयान में राम गोपाल यादव ने कहा, “अब यूपी का नंबर है, राम गोपाल जी एक चिट्ठी अमित शाह को थमा दिए हैं और उनसे कह दिए हैं उनसे कि इतने लोगों का नाम है। इन लोगों को अपने पास ले लीजिए, हम लोगों की जान बचाकर रखिएगा।”

राजभर ने अपने बयान में कई घोटालों का भी जिक्र किया है जिसके बाद सियासी हलचल बढ़ना तय माना जा रहा है।

बंगाल में BJP सरकार आई तो डरकर दक्षिण में भाग रहे घुसपैठिए, कर्नाटक में 20 लाख+ अवैध बांग्लादेशी होने का दावा


कर्नाटक में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। राज्य के अलग-अलग हिस्सों से इसको लेकर लगातार रिपोर्टें सामने आ रही हैं। ऑर्गेनाइजर की रिपोर्ट के मुताबिक, हुबली के श्री सिद्धरूढ़ रेलवे स्टेशन के बाहर कुछ दिनों पहले हिंदू संगठनों ने प्रदर्शन किया और पश्चिम बंगाल व पूर्वी राज्यों से आने वाले लोगों की कड़ी निगरानी की माँग उठाई।

रिपोर्ट के अनुसार, श्रीराम सेना प्रमुख प्रमोद मुथालिक और संगठन के कार्यकर्ताओं ने यह विरोध प्रदर्शन उस आशंका के बीच किया कि पश्चिम बंगाल में शुभेंदु सरकार की कार्रवाई के बाद कई संदिग्ध बांग्लादेशी दक्षिण भारत के शहरों में शरण लेने पहुँच रहे हैं। हिंदू संगठनों का दावा है कि बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद ऐसे लोग पहचान छिपाने और काम की तलाश में कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों का रुख कर सकते हैं।

प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि फर्जी आधार कार्ड के सहारे लोगों को बिना पर्याप्त जाँच के यात्रा करने दी जा रही है। उनका कहना था कि रेलवे पुलिस ट्रेनों में संदिग्ध यात्रियों की केवल औपचारिक जाँच कर रही है। हाल ही में हुबली रेलवे स्टेशन पर पश्चिम बंगाल से आए करीब 10 संदिग्ध लोगों से पूछताछ की गई थी। उन्होंने खुद को बागलकोट जिले में मजदूरी के लिए जा रहा बताया और आधार कार्ड दिखाने के बाद उन्हें जाने दिया गया।

इस पर नाराजगी जताते हुए प्रदर्शनकारियों ने कहा कि सिर्फ आधार कार्ड नागरिकता का पर्याप्त प्रमाण नहीं हो सकता क्योंकि फर्जी दस्तावेज भी आसानी से बन जाते हैं। प्रमोद मुथालिक ने कहा कि केवल आधार कार्ड देखकर लोगों को छोड़ना ठीक नहीं है बल्कि गहराई से जाँच होनी चाहिए ताकि घुसपैठिए कर्नाटक में बस न सकें। उन्होंने पुलिस, रेलवे और खुफिया एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल की भी माँग की।

विरोध के बाद रेलवे स्टेशन पर खासकर पश्चिम बंगाल से आने वाली शालीमार एक्सप्रेस के यात्रियों की जाँच बढ़ाई गई लेकिन प्रदर्शनकारियों ने इसे कर्मचारियों की कमी के कारण केवल प्रतीकात्मक कार्रवाई बताया।

इस बीच जनवरी में आई एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि कर्नाटक में करीब 20 लाख बांग्लादेशी घुसपैठिए हो सकते हैं। खुफिया सूत्रों के हवाले से कहा गया कि इनमें से 70-80% लोगों के पास भारतीय पहचान पत्र हैं। अनुमान के मुताबिक, बेंगलुरु और आसपास के इलाकों में 5 से 6 लाख, मालनाड और तटीय क्षेत्रों में 8 से 10 लाख और बाकी उत्तर कर्नाटक व पुराने मैसूर क्षेत्र में रह रहे हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेशी घुसपैठिए खुद को पश्चिम बंगाल का निवासी बताकर कर्नाटक में अलग-अलग जगहों पर काम कर रहे हैं। बेंगलुरु, बेंगलुरु ग्रामीण और मालनाड क्षेत्रों में ये लोग निर्माण स्थलों, सुपारी और कॉफी बागानों, कबाड़ दुकानों समेत कई जगहों पर कम मजदूरी में काम करते हैं। सूत्रों के मुताबिक, स्थानीय मजदूरों की तुलना में ये 100 से 150 रुपए कम दिहाड़ी पर काम करने को तैयार हो जाते हैं और इसलिए इन्हें प्राथमिकता मिलती है।

राज्य में सबसे अधिक ऐसे लोग बेंगलुरु और उसके आसपास के इलाकों में रहने की बात कही गई है। यहाँ वे कूड़ा बीनने, निर्माण मजदूर, सैलून कर्मचारी, अस्पतालों में सफाई कर्मी, होटल-रेस्तराँ में कामगार और सड़क किनारे कपड़े व रोजमर्रा का सामान बेचने का काम करते हैं। वहीं, चिक्कमगलुरु, उडुपी, शिवमोग्गा, कोडागु, दक्षिण कन्नड़ और उत्तर कन्नड़ जैसे जिलों में कॉफी-सुपारी बागानों, रिसॉर्ट, एस्टेट और फार्महाउस में भी इनके काम करने की बात सामने आई है। कुछ लोग अपने परिवारों के साथ रहते पाए गए हैं।

रिपोर्ट में यह भी चिंता जताई गई कि तटीय और मालनाड क्षेत्रों में पिछले 15 वर्षों से रह रहे कई अवैध बांग्लादेशी भारतीय पहचान पत्र हासिल कर चुके हैं। इतना ही नहीं, कुछ लोगों ने लाखों रुपये की संपत्ति खरीदी और कथित तौर पर भारतीय पहचान के आधार पर पासपोर्ट बनवाकर 15-20 साल बाद दूसरे देशों तक में पहुँचे हैं।

7 अक्टूबर के हमले के मास्टरमाइंड को इजरायल ने किया ढेर, गाजा में हमास कमांडर इज-अल-दीन अल-हदाद पर बरसाए बम

                             हमास के सैन्य प्रमुख अल-हद्दाद का शव (फोटो साभार - टाइम्स नाउ)
इजरायल और हमास के बीच जारी संघर्ष के बीच इजरायल की सेना (IDF) ने गाजा सिटी में सटीक हवाई हमले किए। इन हमलों में हमास की सैन्य शाखा का कमांडर इज-अल-दीन अल-हदाद ढेर हो गया है।

यह कार्रवाई शुक्रवार (15 मई 2026) को की गई, जबकि इसकी पुष्टि IDF ने शनिवार (16 मई 2026) को की। अल-हदाद को 7 अक्टूबर 2023 के इजरायल पर हुए बड़े हमले का मास्टरमाइंड और हमास के सबसे वरिष्ठ सैन्य नेताओं में से एक माना जाता था।

इजरायल के अनुसार, वह हाल के समय में गाजा में हमास की सैन्य क्षमता को फिर से मजबूत करने और नए हमलों की योजना बनाने में लगा हुआ था।

इजरायली सेना प्रमुख ने इस कार्रवाई को एक महत्वपूर्ण ऑपरेशनल सफलता बताया है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और रक्षा मंत्री ने भी बयान जारी कर कहा कि यह हमला खुफिया जानकारी के आधार पर किया गया था और इसे योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया गया।

जानकारी के मुताबिक, हमले से पहले इजरायली वायुसेना ने एक डिसेप्शन ऑपरेशन भी चलाया ताकि हमास को किसी तरह की भनक न लगे। इजरायली सेना का दावा है कि अल-हदाद लंबे समय से बंधकों के नेटवर्क और हमास की सैन्य गतिविधियों को नियंत्रित कर रहा था और खुद को बचाने के लिए बंधकों को ढाल के रूप में इस्तेमाल करता था।

बंधकों, युद्ध और गाजा में जारी संघर्ष की स्थिति

इजरायल का कहना है कि अल-हदाद 1980 के दशक से हमास से जुड़ा था और 7 अक्तूबर 2023 के हमलों में उसकी अहम भूमिका थी, जिसमें लगभग 1200 लोग मारे गए थे और 250 से अधिक को बंधक बनाया गया था। वह मोहम्मद सिनवार की मौत के बाद हमास की सैन्य कमान संभाल रहा था। इस हमले में उसके परिवार के कुछ सदस्य भी मारे गए होने की खबर है।

पाकिस्तान में 80% Gay, 20% Bisexual: ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट हिना बलोच का दावा, कहा- इस मुल्क में कोई नहीं Straight, मजहबी दबाव में छिपाते हैं यौन पहचान


पाकिस्तान में ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट हिना बलूच ने एक हैरान करने वाला दावा किया है। हिना बलूच ने कहा कि पाकिस्तान की 80% आबादी ‘गे’ (Gay) है जबकि बाकी 20% ‘बाइसेक्शुअल’ (Bisexual) है। उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया और समाज में बहस तेज हो गई है।

हिना बलोच ने क्वीर ग्लोबल को दिए इंटरव्यू में कहा कि यह पाकिस्तान का ओपन सीक्रेट है। हिना के मुताबिक, लोग अपनी असली यौन पहचान छिपाते हैं और मजहब, संस्कृति व परिवार के दबाव की वजह से इसे खुलकर स्वीकार नहीं करते। उन्होंने यहाँ तक कहा कि पाकिस्तान में कोई भी पूरी तरह ‘स्ट्रेट’ (Straight) नहीं है।

हिना ने अपने निजी संघर्ष की बात करते हुए बताया कि बचपन में लिपस्टिक लगाने और लड़कियों जैसे कपड़े पहनने पर परिवार से मारपीट झेलनी पड़ी। उन्होंने पाकिस्तान में ‘ख्वाजा सिरा’ समुदाय की खराब हालत का भी जिक्र किया और कहा कि इस समुदाय को अक्सर भीख, नाच या सेक्स वर्क जैसे सीमित विकल्पों में धकेल दिया जाता है।

हिना बलोच सिंध मूरत मार्च की को-फाउंडर रही हैं और औरत मार्च में भी सक्रिय रही हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि ‘प्राइड झंडा’ उठाने के कारण उन्हें अगवा किया गया और प्रताड़ित किया गया, जिसके बाद उन्हें देश छोड़कर यूके में शरण लेनी पड़ी।

खतरनाक हैं ‘फॉस्फोरस बम’ जो इजरायल ने लेबनान पर दागे; गला देता है हड्डियाँ, हर तरफ फैलती है आग: UN ने किया है बैन

                                            इजरायल का फॉस्फोरस बम धमाका ( फोटो साभार-abp)
इजरायल ने ईरान के साथ लेबनान पर भी हमले किए हैं। इस बीच दावा किया जा रहा है कि इजरायल ने दक्षिणी लेबनान के योहमोर शहर के रिहायशी इलाकों में व्हाइट फॉस्फोरस से बने बमों का इस्तेमाल किया। ये बम रिहायशी इलाकों में इस्तेमाल नहीं किए जा सकते, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस पर प्रतिबंध लगा रखा है।

ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक, इजरायल की सेना ने 3 मार्च 2026 को दक्षिणी लेबनान के योहमोर शहर में घरों के ऊपर सफेद फॉस्फोरस से बने गोला बारूद का इस्तेमाल किया।

ह्यूमन राइट्स वॉच ने आठ तस्वीरों को वेरिफाई करने और उसकी लोकेशन की पुष्टि करने के बाद कहा कि शहर के एक रिहायशी हिस्से में सफेद फॉस्फोरस से बने बम गिराए गए। स्थानीय सुरक्षाकर्मी उस इलाके में कम से कम दो घरों और एक कार में लगी आग पर काबू पाने की कोशिश कर रहे थे।

ह्यूमन राइट्स वॉच के एनालिसिस से पता चलता है कि आग शायद सफेद फॉस्फोरस लगे फेल्ट वेजेज की वजह से लगी होगी, क्योंकि घर और कार उस इलाके के बहुत पास थे जहाँ विस्फोट हुए थे। जिससे पता चलता है कि सफेद फॉस्फोरस का इस्तेमाल आम लोगों पर गैर-कानूनी तरीके से किया गया था।

ह्यूमन राइट्स वॉच में लेबनान के रिसर्चर रामजी कैस ने कहा, “इज़राइली सेना का रिहायशी इलाकों में सफेद फॉस्फोरस का गैर-कानूनी इस्तेमाल बहुत चिंताजनक है और इसके आम लोगों के लिए गंभीर नतीजे होंगे।” “सफेद फॉस्फोरस की वजह से मौत का आँकड़ा बढ़ सकता है और गंभीर चोटें लग सकती हैं, जिसका असर जिंदगी भर रह सकता है।”

गाजा-लेबनान पर 2023 में इस्तेमाल का दावा

मानवाधिकार संगठन के मुताबिक, रिहायशी इलाके में कम से कम दो गोले ऐसे तोप से दागे गए जिसकी तस्वीरों से साफ था कि इनमें सफेद फॉस्फोरस का इस्तेमाल किया गया था, क्योंकि इस गोले के हवा में फटने से धूएँ का पैटर्न एम825-सीरीज के 155 एमएम तोपखाने के गोले के फटने से बनने वाले उंगली के जोड़ के शेप से मिलता जुलता था। ये तोपखाना सफेद फॉस्फोरस के इस्तेमाल के लिए जाना जाता है।

3 मार्च की सुबह 5:27 बजे इजरायल के अरबी मिलिट्री प्रवक्ता अविचाय अद्राई ने एक आदेश जारी किया, जिसमें कहा गया था कि योहमोर और 50 दूसरे गाँवों और कस्बों के रहने वाले तुरंत अपने घर खाली कर दें और गाँवों से कम से कम 1000 मीटर दूर खुली जगह पर चले जाएँ। अद्राई ने उसी दिन दोपहर 12:12 बजे फिर लोगों को घरों से दूर जाने के लिए कहा। ह्यूमन राइट्स वॉच ने यह वेरिफाई नहीं किया है कि उस इलाके में लोग थे या व्हाइट फॉस्फोरस के इस्तेमाल की वजह से उनकी मौत हो गई या बुरी तरह घायल हुए।

इससे पहले साल 2023 में ह्यूमन राइट्स वॉच ने इजरायल पर गाजा और लेबनान में सैन्य अभियान के दौरान सफेद फॉस्फोरस के इस्तेमाल का आरोप लगाया था। ह्यूमन राइट्स वॉच ने अक्टूबर 2023 और मई 2024 के बीच दक्षिणी लेबनान के बॉर्डर वाले गाँवों में इजराइली सेना के सफेद फॉस्फोरस के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के सबूत पेश किए थे। इस हमले में बड़े पैमाने पर जान-माल की क्षति हुई थी और आम लोगों बड़ी संख्या में घायल हुए और उन्हें बेघर होना पड़ा।तब इजरायली सिक्योरिटी फोर्सेज ने इन आरोपों का खंडन किया था।

क्या है सफेद फॉस्फोरस

सफेद फॉस्फोरस एक केमिकल अत्यधिक ज्वलनशील पदार्थ है। यह हवा में खुद ही तेजी से जल उठता है। ऑक्सीजन के संपर्क में आने पर इसका तापमान 815 डिग्री तक सेल्सियस तक पहुँच जाता है यानी यह 815 डिग्री तक गर्मी पैदा करता है। यह तब तक जलता रहता है, जब तक यह पूरी तरह खत्म न हो जाए। इसलिए जब तोप के गोले, बम और रॉकेट में इस्तेमाल किया जाता है, तो बम के फटते ही ये ऑक्सीजन के संपर्क में आ जाता है और तेजी से जलता है।

इससे आसपास के घरों, खेतों और लोगों के झुलसने की आशंका ज्यादा होती है। दरअसल ये स्किन को झुलसा कर शरीर के खून में मिल जाता है और अंगों को नुकसान पहुँचा सकता है। कई अंग काम करना बंद कर देती हैं और पैरालाइज होने का खतरा होता है। अगर फॉस्फोरस का अंश मात्र भी शरीर में रह गया है और वह भाग हवा के संपर्क में आ गया, तो फिर से झुलसा सकता है। फॉस्फोरस बम से लगी आग पानी से नहीं बुझती, बल्कि इस पर रेत आदि का इस्तेमाल किया जाता है।

प्रतिबंधित है सफेद फॉस्फोरस से बने बम का इस्तेमाल करना

इंटरनेशनल मानवाधिकार कानून के तहत, आबादी वाले इलाकों में सफेद फॉस्फोरस का इस्तेमाल धुआँ पैदा करने, रोशनी करने या टारगेट तक पहुँचने के दौरान बंकरों और इमारतों को जलाना, मिलिट्री के लोगों और सामान को छिपाना, निशान बनाना, सिग्नल देना या सीधे हमला करना शामिल है। लेकिन इसका इस्तेमाल रिहायशी इलाकों में नहीं किया जा सकता यानी यह सुनिश्चित करना होता है कि इसके इस्तेमाल से आम लोगों को नुकसान नहीं होगा।

संयुक्त राष्ट्र संघ ने ‘दी कन्वेंशन ऑन सर्टन कन्वेंशनल वेपन्स’यानी सीसीडब्लू में खास तरह के हथियारों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया गया है। इसमें कई युद्ध सामग्रियों के बारे में बताया गया है, जिसका सिर्फ सैन्य उद्देश्यों के लिए सीमित मात्रा में इस्तेमाल किया जा सकता है। इन्हें आम लोगों पर कभी भी इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। हालाँकि, संयुक्त राष्ट्र के इन शर्तों को इजरायल नहीं मानता। उसने इस प्रस्ताव पर साइन भी नहीं किए हैं।

दिल्ली को बूँद-बूँद पानी के लिए तरसाना चाहते थे कट्टरपंथी दंगाई : पुलिस ने बताया 2020 में दंगाइयों का प्लान; आखिर सुप्रीम कोर्ट दंगाइयों को जमानत देने की याचिका पर बहस में क्यों समय बर्बाद कर रही है?

                      दिल्ली दंगें के आरोपित शरजील इमाम और उमर खालिद (फोटो साभार : aajtak)
दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में 2020 के दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों की कथित बड़ी साजिश से जुड़े 6 आरोपितों की जमानत याचिकाओं का मंगलवार(18 नवंबर 2025) को जोरदार विरोध किया। पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि शरजील इमाम, उमर खालिद और अन्य आरोपित उन तीन सह-आरोपियों (नताशा नरवाल, देवांगना कलिता और आसिफ इकबाल तन्हा) से बराबरी की माँग नहीं कर सकते जिन्हें पहले हाई कोर्ट से जमानत मिली थी।

आखिर सुप्रीम कोर्ट दंगाइयों को जमानत देने की याचिका पर बहस में क्यों समय बर्बाद कर रही है? क्या सुप्रीम कोर्ट को नहीं मालूम कि किस तरह सीलमपुर में हिन्दुओं की सम्पत्तियों को आग के हवाले किया गया था? किस तरह पुलिस अधिकारी की हत्या कर गंदे नाले में फेंक दिया गया था? आखिर सुप्रीम कोर्ट क्या चाहता है? दूसरे, जिस तरह दिल्ली लाल किला के पास हुए ब्लास्ट के बाद से आज देश में आतंकवादियों को पकड़ा जा रहा है उस पर कोर्ट ने आँखों पर पट्टी बाँधी हुई है? जिन दलाल वकीलों के इशारे पर कोर्ट नाच रही है देश के लिए बहुत घातक है। कन्हैया के कातिलों को अब तक फांसी क्यों नहीं हुई? जब तक अदालतें दलाल वकीलों के चुंगल से बाहर नहीं आएगी देश में आतंकवाद और दंगाइयों को कोई रोकने वाला नहीं।    

जानकारी के अनुसार, सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता और एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस वी राजू ने जस्टिस अरविंद कुमार और एन वी अंजारिया की बेंच को बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही साफ कर दिया था कि उन तीन सह-आरोपितों को मिली जमानत को मिसाल नहीं माना जाएगा।

ASG राजू ने तर्क दिया कि उमर खालिद जैसे आरोपित पहले भी ‘बराबरी’ का मुद्दा उठा चुके हैं, जिसे कोर्ट खारिज कर चुका है। इसलिए, जब तक परिस्थितियों में कोई बड़ा बदलाव न हो, बार-बार वही मुद्दा उठाकर जमानत नहीं माँगी जा सकती।

अवलोकन करें:-

देश के गद्दारों को जमानत देने के लिए सुप्रीम कोर्ट और अन्य हाई कोर्ट तैयार रहते हैं, कभी आतंकियो
देश के गद्दारों को जमानत देने के लिए सुप्रीम कोर्ट और अन्य हाई कोर्ट तैयार रहते हैं, कभी आतंकियो
 

वहीं, SG मेहता ने कहा कि दंगे अचानक नहीं हुए थे, बल्कि सोची-समझी साजिश का हिस्सा थे। उन्होंने शरजील इमाम के बयानों का हवाला देते हुए कहा कि उनका मकसद देश के मुसलमानों को एकजुट करके शहरों को ठप करना और समाज को सांप्रदायिक आधार पर बाँटना था। इसके अलावा, दिल्ली में दूध-पानी की व्यवस्था भी रोक देना था। इस मामले में अगली सुनवाई 20 नवंबर को जारी रहेगी।

सिद्धारमैया को UK की जिस ‘लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ से मिला सर्टिफिकेट वो पहले से बंद, कर्नाटक सरकार ने खुद ही किया था आवेदन

                                                                      (साभार: Deccan Herald, एक्स @Siddaramiah)
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने मंगलवार (16 अक्टूबर 2025) को घोषणा की कि उनकी सरकार की ‘शक्ति योजना’, जो राज्य की महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा की सुविधा देती है, को लंदन  बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स (LBWR) ने दुनिया में सबसे अधिक महिलाओं द्वारा ली गई मुफ्त बस यात्राओं के लिए प्रमाणित किया है। इसके साथ ही, कर्नाटक राज्य सड़क परिवहन निगम (KSRTC) को भी LBWR ने मान्यता दी है।

हालाँकि, इस घोषणा के बाद लोगों में यह चर्चा शुरू हो गई कि क्या यह ‘वर्ल्ड रिकॉर्ड’ वास्तव में किसी विश्वसनीय संस्था द्वारा दिया गया है या सिर्फ एक प्रचार अभियान है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने X पर लिखा, “कर्नाटक ने दो ऐतिहासिक विश्व रिकॉर्ड के साथ वैश्विक मंच पर प्रवेश किया है, जिन्हें लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स द्वारा प्रमाणित किया गया है। शक्ति योजना: महिलाओं द्वारा सबसे ज्यादा मुफ्त बस यात्राओं का लाभ उठाया गया, 564.10 करोड़ यात्राएँ, रोजमर्रा की गतिशीलता को सशक्त बनाया।”

उन्होंने आगे कहा, “KSRTC: दुनिया का सबसे अधिक पुरस्कार विजेता सड़क परिवहन निगम, 1997 से अब तक 464 राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त कर चुका है। हमारी शासन दृष्टि सामाजिक न्याय, महिला सशक्तिकरण और विश्वस्तरीय जनसेवा पर आधारित है। ये मान्यताएँ इस बात का प्रतिबिंब हैं कि समावेशी और संवेदनशील नीति-निर्माण से क्या हासिल किया जा सकता है।”

मुख्यमंत्री द्वारा जारी एक्स पोस्ट में शक्ति योजना और केएसआरटीसी के लिए जारी किए गए ‘प्रमाण-पत्र’ भी शामिल हैं।

LBWR के प्रमाण-पत्र के अनुसार, “कर्नाटक में 11 जून 2023 को शुरू हुई ‘शक्ति योजना’ के तहत 30 सितंबर 2025 तक महिलाओं ने कुल 564.10 करोड़ मुफ्त बस यात्राएँ कीं। महिलाओं को मुफ्त सार्वजनिक परिवहन की सुविधा देकर सशक्त बनाने की इस पहल को लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स सामाजिक कल्याण और लैंगिक समानता में एक महत्वपूर्ण योगदान के रूप में मान्यता देती है।”

दूसरे प्रमाण-पत्र में कहा गया, “कर्नाटक राज्य सड़क परिवहन निगम (KSRTC) ने 1997 से लेकर 3 अक्टूबर 2025 तक कुल 464 राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार हासिल किए हैं। सार्वजनिक सड़क परिवहन सेवा में उत्कृष्टता और नवाचार के लिए यह उपलब्धि वैश्विक मानक स्थापित करती है।”

दोनों प्रमाणपत्रों पर डॉ अविनाश डी सकुंडे (LBWR के इंटरनेशनल चेयरमैन, भारत) और डॉ इवान गाचीना (यूरोपीय संघ प्रमुख, क्रोएशिया) के हस्ताक्षर हैं। हालाँकि, मुख्यमंत्री की इस घोषणा पर विपक्ष ने आलोचना की है।

विपक्ष का कहना है कि कॉन्ग्रेस सरकार मुफ्त योजनाओं जैसे ‘शक्ति योजना’ पर अधिक खर्च कर रही है, जबकि राज्य की परिवहन कंपनियाँ गंभीर वित्तीय संकट झेल रही हैं। कर्नाटक की चार परिवहन कंपनियाँ — KSRTC, BMTC, NWKRTC और KKRTC पर कुल 6,330.25 करोड़ रुपए का कर्ज है।

कौन है अविनाश सकुंडे और बाल्कनोफैंटास्टिका के अध्यक्ष इवान गैसीना?

मुख्यधारा की मीडिया ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के उस ऐलान को खूब कवर किया जिसमें उन्होंने बताया कि उन्हें लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स (London  Book of World Records – LBWR) से प्रमाणपत्र मिला है। लेकिन किसी ने यह नहीं देखा कि यह संस्था असल में है क्या और इसे चलाता कौन है।

OpIndia की जाँच में पता चला कि लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स वास्तव में एक निजी कंपनी थी, जिसे 15 जुलाई 2025 को यूके सरकार के रिकॉर्ड्स में भंग (dissolved) दिखाया गया है। कंपनी के कामकाज में इवेंट कैटरिंग, न्यूज एजेंसी गतिविधियाँ, किताबें प्रकाशित करना और मीडिया प्रतिनिधित्व सेवाएँ शामिल थीं।

दस्तावेजों के अनुसार, अविनाश धनंजय सकुंडे को 28 जून 2024 को इस कंपनी का डायरेक्टर नियुक्त किया गया था।

जब उनकी सोशल मीडिया इंस्टाग्राम और लिंक्डइन पर प्रोफाइल देखी गईं, तो पता चला कि अविनाश खुद को दिल्ली सरकार के Delhi Minorities Commission (DMC) की एक एडवाइजरी कमेटी के सदस्य बताते हैं। लेकिन DMC की आधिकारिक वेबसाइट पर उनका नाम कहीं दर्ज नहीं है।

अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर सकुंडे ने कई वीडियो पोस्ट किए हैं, जिनमें वे अलग-अलग लोगों को ‘लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ के सर्टिफिकेट देते हुए दिखते हैं। एक वीडियो में वे अभिनेता सोनू सूद को भी ऐसा सर्टिफिकेट देते नजर आए हैं और यह कार्यक्रम जयपुर (राजस्थान) में हुआ था।

अब बात करते हैं डॉ इवान गाचीना (Ivan Gacina) की, गाचीना का नाम मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के प्रमाणपत्र पर ‘European Union Head’ के रूप में लिखा था।

जाँच में पता चला कि उनके इंस्टाग्राम प्रोफाइल पर वे खुद को ‘HRHHE Pangeran Prince Love YM Dato Rdo Sri Academician Amb Prof Dr Kt Exp LM GM Genius’ बताते हैं। उनके एक पोस्ट के अनुसार, वे ‘President of Balkanofantastika’ भी हैं।

दिलचस्प बात यह है कि ‘Pangeran’ शब्द मलेशिया और इंडोनेशिया की भाषा में राजा और रानी के पुत्र के लिए प्रयोग होता है। उनका लिंक्डइन रिज्यूमे बताता है कि वे जादार (Zadar), क्रोएशिया के रहने वाले हैं।

उनके कामकाजी अनुभव में कंप्यूटर इंजीनियरिंग टीचर, फिजिक्स टीचर, एडल्ट एजुकेशन में गणित शिक्षक, कैशियर, और वेटर जैसी भूमिकाएँ शामिल हैं। वे खुद को कवि भी बताते हैं। उनकी ऑनलाइन मौजूदगी काफी अजीब है। ढेरों उपाधियाँ और सर्टिफिकेट्स लेकिन इंटरनेट पर उनकी कुछ ही असली तस्वीरें मिलती हैं।

इन संदिग्ध व्यक्तियों के अलावा, लंदन  बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के बारे में एक और बात ध्यान देने योग्य है। यह खुद को ‘UK-based’ बताता है, लेकिन इसका मुख्य कार्यालय (Head Office) दिल्ली के पहाड़ गंज में स्थित है।

इसकी वेबसाइट पर पता लिखा है: Hotel Superb, तिलक गली, चूना मंडी, पहाड़गंज, नई दिल्ली। इसके अलावा वेबसाइट पर यह भी लिखा है कि इसका ‘International Office (UK Branch)’ — 71–75 Shelton Street, London, United Kingdom, और ‘Registered Office (USA)’ — 30 N Gould St Ste R, Sheridan, WY 82801 बताया गया है।

अविनाश सकुंडे ने ऑपइंडिया को बताया: कर्नाटक सरकार ने प्रमाणपत्र के लिए किया आवेदन

OpIndia ने ‘London Book of World Records’ (LBWR) से संपर्क किया और इसके कामकाज को लेकर कई सवाल पूछे। वेबसाइट पर दिए संपर्क नंबर से बात करते हुए अविनाश सकुंडे ने बताया कि LBWR अलग-अलग क्षेत्रों, जैसे खेल, कला और मनोरंजन, सामाजिक सेवा आदि में काम करने वाले व्यक्तियों, समूहों या संस्थानों को उनके कार्यों के आधार पर सर्टिफिकेट देता है।

जब उनसे पूछा गया कि कर्नाटक सरकार और KRSTC को यह ‘वर्ल्ड रिकॉर्ड’ सर्टिफिकेट कैसे मिला, तो उन्होंने कहा कि सरकार ने खुद आवेदन किया था। सकुंदे ने बताया, “हमने कर्नाटक सरकार द्वारा भेजे गए दस्तावेज़ों के विश्लेषण के आधार पर उन्हें प्रशंसा पत्र दिया। यह उनके अच्छे कार्य की सराहना के रूप में था। हाल ही में हमने अभिनेता सोनू सूद को भी ऐसा सर्टिफिकेट दिया है।”

OpIndia ने उनसे इवान गाचिना (Ivan Gacina) की भूमिका के बारे में भी पूछा। इस पर सकुंदे ने कहा, “वो सिर्फ नाम के लिए हैं। असल में मैं ही सब कुछ सँभालता हूँ, प्रशासन मेरे नाम से चलता है।”

जब उनसे पूछा गया कि LBWR भारत में किस रूप में पंजीकृत है, NGO या निजी कंपनी और यूके में इसकी स्थिति क्या है, तो उन्होंने कहा, “हम भारत में NGO के रूप में रजिस्टर्ड हैं और यूके में यह एक प्राइवेट बुक पब्लिशिंग कंपनी के रूप में पंजीकृत है।”

यह जानना दिलचस्प है कि एक ‘बुक पब्लिशिंग’ कंपनी, जो भारत में NGO होने का दावा करती है, ‘वर्ल्ड रिकॉर्ड’ जैसे प्रमाणपत्र बाँट रही है। सबसे अहम बात, बातचीत के दौरान अविनाश सकुंडे ने एक बार भी यह नहीं बताया कि उनकी कंपनी लंदन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स यूके में इस साल जुलाई में आधिकारिक रूप से बंद (dissolved) हो चुकी है।

OpIndia की जाँच कई सवाल खड़े करती है। जैसे- आखिर कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने एक यूके-आधारित निजी कंपनी से ‘वर्ल्ड रिकॉर्ड’ सर्टिफिकेट के लिए आवेदन क्यों किया? (साभार)