Showing posts with label violence. Show all posts
Showing posts with label violence. Show all posts

जंतर-मंतर हिंसा: शांतिपूर्ण आंदोलन के दावों के बीच लहूलुहान वर्दी का सच; आयोजकों को हिरासत में लेकर पूछा जाए "गुंडों को किसने बुलाया?"


देश की राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर, जो लंबे समय से जन-आंदोलनों और असहमति की आवाज़ उठाने का केंद्र रहा है, हाल ही में एक भीषण हिंसात्मक टकराव का गवाह बना। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने पेपर लीक को लेकर आयोजित इस विरोध-प्रदर्शन को पूरी तरह से शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक बताया था। हालांकि, ‘संसद चलो’ मार्च के दौरान उग्र हुई भीड़ और उसके बाद सामने आए तथ्यों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

जब तक आयोजकों को हिरासत में लेकर सख्ती से यह नहीं पूछा जाए कि छात्रों के प्रदर्शन में गुंडों का क्या काम था? किसके कहने पर गुंडे आए? दिल्ली हिन्दू दंगा के आरोपितों की रिहाई की आवाज़ किसके कहने पर उठी थी? ये प्रदर्शन NEET को लेकर हुआ था या इन आरोपियों की रिहाई के लिए? क्या ये प्रदर्शन सनातन को बदनाम करने के लिए था? क्योकि जिस तरह की हिंसा हुई वह कोई साधारण हिंसा नहीं थी, नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश में हुए हंगामे की तरह ही था। पुलिस तो अपना काम कर रही है लेकिन निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक को इस प्रायोजित हिंसा को हल्के में नहीं लेना चाहिए।     

प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए तैनात दिल्ली पुलिस के कई अधिकारियों और जवानों पर जानलेवा हमले हुए, जिनमें 180 से अधिक पुलिसकर्मी और दर्जनों प्रदर्शनकारी घायल हो गए। इस दौरान भारी सुरक्षा बैरिकेड्स तोड़े गए, पत्थरबाजी हुई और सरकारी वाहनों को नुकसान पहुँचाया गया। इस पूरी घटना ने उस समय एक नया और संवेदनशील मोड़ ले लिया, जब ड्यूटी पर घायल हुए पुलिसकर्मियों के परिजनों ने मीडिया के सामने आकर अपनी आपबीती साझा की।

 घायलों के परिजनों ने आरोप लगाया कि छात्रों के अधिकारों की आड़ में आए उपद्रवियों द्वारा ऑन-ड्यूटी सुरक्षा बलों पर बर्बर हमले किए गए और बाद में सोशल मीडिया पर पुलिस को ही खलनायक बनाकर पेश करने की कोशिश की गई। पीड़ितों के परिवारों का कहना है कि वर्दी पहनने का मतलब मानवाधिकारों का त्याग करना नहीं होता। इस मामले में अब पुलिस कर्मियों के परिवारों ने भी देश की सर्वोच्च अदालत का रुख किया है, जिससे इस मुद्दे ने सामाजिक, कानूनी और राजनीतिक रूप से एक बड़ा आकार ले लिया है।

घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों की आपबीती: “जब खून से लथपथ घर पहुंचे हमारे अपने”
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान परिजनों ने अपनी आपबीती साझा की। सेवानिवृत्त सैनिकों के बच्चों, अधिकारियों की पत्नियों और युवा छात्रों ने मीडिया के सामने घटना वाले दिन के जो संस्मरण रखे, वे दिल दहला देने वाले थे।

मरीन कमांडो रहे सब-इंस्पेक्टर की बेटी: “पिता की लिंचिंग की कोशिश की गई”
नेवी में 15 वर्षों तक मरीन कमांडो के रूप में देश सेवा करने के बाद दिल्ली पुलिस में कार्यरत सब-इंस्पेक्टर (SI) की बेटी ने भावुक होकर बताया कि उनके पिता मुख्य बैरिकेड्स पर तैनात थे। उन्होंने कहा: “मेरे पिता अक्सर कहते थे कि यह केवल छात्रों का आंदोलन नहीं रह गया है, इसमें कई असामाजिक तत्व शामिल हो चुके हैं। 25 तारीख को दोपहर लगभग 2 बजे जंतर-मंतर मंच के पास उग्र भीड़ ने मेरे पिता को घसीटा और उनकी लिंचिंग की कोशिश की। वह RML अस्पताल में चार घंटे तक बेहोश रहे और जब देर रात उनके साथी उन्हें घर लाए, तो उनकी वर्दी खून से सनी हुई थी… जब मैंने सोशल मीडिया खोला, तो देखा कि मेरे ही पिता को क्रिमिनल कहा जा रहा था। जिन लोगों ने उन पर हमला किया, वही सुप्रीम कोर्ट चले गए। इसलिए हमने भी न्याय के लिए सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया है।”

सब-इंस्पेक्टर की बेटी ने यह भी दोहराया कि उनके पिता अक्सर घर आकर यह चिंता जताते थे कि आंदोलन को उग्र तत्वों द्वारा हायजैक कर लिया गया है। 25 तारीख को हुए लिंचिंग के प्रयास और 4 घंटे तक बेहोश रहने के बाद जब उन्हें घर लाया गया, तो परिवार पूरी तरह सदमे में था।

घायल एसीपी (ACP) की पत्नी: “दो साल की बच्ची और मेरे लिए वह पल दर्दनाक था”
20 जुलाई की घटना का जिक्र करते हुए एक घायल एसीपी की पत्नी ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा: 20 जुलाई की देर रात जब मेरे पति घायल अवस्था में घर लौटे, तो वह क्षण मेरे और हमारी दो साल की बेटी के लिए बेहद दर्दनाक था। हम यहां अपने परिवार का दर्द साझा करने आए हैं क्योंकि पुलिसकर्मियों के परिवारों का भी इस देश में न्याय पाने का बराबर अधिकार है।”

युवा पीढ़ी की अपील: “हम भी जेन-जी हैं, हमारी बात भी सुनी जाए”
हिंसा में घायल जवानों के बच्चों, जो स्वयं छात्र और जेन-जी (Gen-Z) पीढ़ी का हिस्सा हैं, ने भी सार्वजनिक रूप से अपनी आवाज़ उठाई। उन्होंने देश के नागरिकों और मीडिया से अपील की कि वे हिंसा का शिकार हुए पुलिसकर्मियों के बच्चों का दर्द भी समझें।

1971 युद्ध के दिग्गज के पोते व ASI के बेटे का बयान: “अचानक हुआ जानलेवा पथराव”
चार वीरता पुरस्कार प्राप्त कर चुके एक एएसआई (ASI) के बेटे लक्ष्य सिंह बिष्ट ने बताया कि उनके दादाजी BSF में थे और उन्होंने 1971 के युद्ध में भाग लिया था। उन्होंने बताया: “मेरे पिता बैरिकेड्स पर तैनात थे। अचानक उग्र भीड़ ने बिना किसी उकसावे के पत्थरबाजी शुरू कर दी। जब वे अपने वरिष्ठ अधिकारियों को सुरक्षित स्थान पर ले जा रहे थे, तभी एक भारी पत्थर उनके सिर पर लगा। जब मैंने अस्पताल में उनकी तस्वीर देखी, तो उनके सिर पर चार टांके लगे थे।”

33 साल से सेवारत ASI की पत्नी: “गमले और कांच की बोतलें फेंकी गईं”
33 वर्षों से पुलिस सेवा में कार्यरत एक अन्य एएसआई की पत्नी ने बताया कि उनके पति 20 जुलाई को संसद की ओर बढ़ रही भीड़ को रोकने के लिए तैनात थे। “शाम को मुझे खबर मिली कि वे LNJP अस्पताल में भर्ती हैं। उन्होंने बताया कि भीड़ में शामिल उपद्रवियों ने पुलिसकर्मियों पर गमले, पत्थर, जूते और कांच की बोतलें फेंकी और सुरक्षा बैरिकेड्स तोड़ डाले।”

राहुल गांधी से पूछा गया सवाल, तो कहा: “आप बीजेपी से हैं”
घायल पुलिसकर्मियों के परिजनों द्वारा की गई प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद जब मीडियाकर्मियों ने कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से इस संबंध में प्रतिक्रिया जाननी चाही, तो एक नया विवाद खड़ा हो गया। परिजनों ने सवाल उठाया था कि जिस संसद की रक्षा करते हुए पुलिसकर्मी घायल हुए, उन्हें ‘गुंडे’ कैसे कहा जा सकता है। हालांकि, जब एक पत्रकार ने इस बाबत राहुल गांधी से सवाल किया, तो उन्होंने सवाल का जवाब देने के बजाय पत्रकार पर ही तंज कसते हुए कह दिया कि “आप बीजेपी से हैं।” आलोचकों और सोशल मीडिया पर यह तर्क दिया जा रहा है कि जब भी कोई सवाल राजनीतिक रूप से असुविधाजनक होता है, तो पत्रकारों पर किसी खास पार्टी का होने का ठप्पा लगा दिया जाता है। इस वाकये के बाद प्रेस की आजादी के बड़े-बड़े दावे करने वाली विपक्षी राजनीति और उनकी कार्यशैली पर भी सवाल उठने लगे हैं।

CJP का दावा बनाम पुलिस का पक्ष
जंतर-मंतर पर घटित इस घटनाक्रम ने आयोजकों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दावों और पुलिस प्रशासन द्वारा प्रस्तुत किए गए जमीनी तथ्यों के बीच एक बड़ा विरोधाभास पैदा कर दिया है।

CJP और आयोजकों का दावा: आयोजकों का तर्क है कि उनका आंदोलन परीक्षा प्रणाली में सुधारों और छात्र हितों को लेकर पूरी तरह अहिंसक और लोकतांत्रिक था। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस प्रशासन ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए अत्यधिक बल प्रयोग, लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले छोड़े, जिससे छात्र घायल हुए।

दिल्ली पुलिस प्रशासन का आधिकारिक पक्ष: पुलिस जांच और डिजिटल सर्विलांस के आंकड़ों के अनुसार, भीड़ की आड़ में कई उग्र तत्व शामिल थे। पुलिस का कहना है कि जब भीड़ ने संसद भवन की ओर जबरन बढ़ने और सुरक्षा घेरा तोड़ने का प्रयास किया, तब कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अनुपातिक बल प्रयोग अनिवार्य हो गया था।

सुरक्षा बलों के मानवाधिकार और सुप्रीम कोर्ट की कानूनी कार्यवाही
जंतर-मंतर हिंसा का मामला अब भारत के सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है। इस मामले ने सुरक्षा बलों के मानवाधिकारों पर एक राष्ट्रीय कानूनी बहस शुरू कर दी है:

अनुच्छेद 21 और ऑन-ड्यूटी जवानों के अधिकार: याचिका में कहा गया है कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 (जीवन और शारीरिक सुरक्षा का अधिकार) जितना आम नागरिकों पर लागू होता है, उतना ही ऑन-ड्यूटी पुलिस अधिकारियों पर भी लागू होता है। भीड़ द्वारा जानलेवा हमला करना उनके मौलिक अधिकारों का हनन है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश: मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया है कि घटना से जुड़े सभी सीसीटीवी (CCTV) फुटेज, ड्रोन फुटेज और बॉडी-वर्न कैमरों की रिकॉर्डिंग को सुरक्षित रखा जाए। इसके साथ ही कोर्ट ने हिंसा की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच पर जोर दिया है।

आयोजकों की जवाबदेही: कोर्ट इस पहलू पर भी विचार कर रहा है कि यदि अनुमति प्राप्त प्रदर्शन हिंसक रूप लेता है, तो आयोजकों की नागरिक व आपराधिक जवाबदेही तय की जानी चाहिए ताकि भविष्य में आंदोलनों की आड़ में कानून-व्यवस्था को नुकसान न पहुंचाया जा सके।

2873 संदिग्ध, 989 का आपराधिक रिकॉर्ड, 101 पर हत्या तो 284 पर डकैती-लूट के केस: CJP प्रदर्शन में शामिल चेहरों पर खुलासा, पुलिस ने हिंसा की जाँच की तेज

भारत के विरोधियों ने भारत की सांस्कृतिक पहचान नैतिकता और गरिमा को भीतर से खंडित किया है,भारत टूट रहा है,ऐसी बेहया और बदतमीज पीढ़ी का नेतृत्व करते हुए नेतृत्व का भी सिर शर्म से झुक गया है,कौन से माँ बाप को गर्व है ऐसी संतान पर ? आज भारत को शिक्षा से अधिक संस्कार और नैतिक मूल्यों को पुर्नजीवित करने की आवश्यकता है।
आहत है भारत माता की आत्मा !
दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में 20 जुलाई 2026 को संसद मार्च के दौरान हुई हिंसा और उसके बाद 20 से 25 जुलाई के बीच जंतर-मंतर पर चले प्रदर्शन को लेकर दिल्ली पुलिस की जाँच में बड़े खुलासे सामने आए हैं।

पुलिस के हवाले से खबरों में बताया जा रहा है कि प्रदर्शन स्थल पर मौजूद 2,873 ऐसे लोगों की पहचान की गई है जिनका आपराधिक रिकॉर्ड रहा है, जिनमें से 989 लोगों पर हत्या, हत्या के प्रयास, डकैती, लूट, दुष्कर्म, महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध, आर्म्स एक्ट, अपहरण, स्नैचिंग और NDPS जैसे गंभीर मामलों में केस दर्ज हैं।

पुलिस का कहना है कि इन लोगों की पहचान फेशियल रिकग्निशन सिस्टम (FRS), सीसीटीवी फुटेज, पुलिसकर्मियों और आम लोगों द्वारा बनाए गए वीडियो तथा अन्य तकनीकी माध्यमों से की गई है। जाँच में यह भी सामने आया कि कई आरोपित 20 से 25 जुलाई के बीच बार-बार प्रदर्शन स्थल पर लौटे।

पुलिस अब यह पता लगा रही है कि क्या इन्हीं लोगों ने जंतर-मंतर और नई दिल्ली के आसपास हुई हिंसा में सक्रिय भूमिका निभाई थी। पुलिस के मुताबिक, आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के खिलाफ गिरफ्तारी और जाँच की कार्रवाई जारी रहेगी, जबकि छात्रों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने की तैयारी है।

प्रदर्शन में मिले हत्या, डकैती, दुष्कर्म और पॉक्सो समेत कई गंभीर मामलों के आरोपित

दिल्ली पुलिस की जाँच के अनुसार, हिंसा में शामिल लोगों में 101 ऐसे आरोपित पाए गए जिन पर हत्या के मामले दर्ज हैं, जबकि 62 लोगों पर हत्या के प्रयास, 284 लोगों पर डकैती और लूट, 61 लोगों पर दुष्कर्म, 25 लोगों पर छेड़छाड़, 6 लोगों पर पॉक्सो (POCSO) अधिनियम के तहत मामले दर्ज हैं।
इसके अलावा 229 लोग आर्म्स एक्ट, 135 स्नैचिंग, 19 अपहरण और 67 लोग नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंस (NDPS) एक्ट के मामलों में आरोपित पाए गए। पुलिस के अनुसार, इन आरोपितों में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की भी है जो आदतन अपराधी हैं। हत्या के मामलों में शामिल 101 आरोपितों में से 42 पर दो या उससे अधिक आपराधिक मामले दर्ज हैं।
वहीं 12 लोगों का आपराधिक इतिहास 10 या उससे अधिक मामलों तक फैला हुआ है। हत्या के प्रयास के 62 आरोपितों में से 25 पर कई मामले दर्ज हैं। वहीं डकैती और लूट के 284 आरोपितों में से 155 पर दो या उससे अधिक केस हैं और 31 लोगों के खिलाफ 10 या उससे अधिक आपराधिक मामले दर्ज हैं।
दुष्कर्म के मामलों में शामिल 8 आरोपित, छेड़छाड़ के 6 आरोपित और NDPS के 9 आरोपित भी कई मामलों में पहले से आरोपित हैं।

FRS, CCTV और तकनीकी साक्ष्यों से हुई पहचान, पुलिस ने हिंसा में भूमिका की जाँच तेज की

दिल्ली पुलिस का कहना है कि संदिग्धों की पहचान फेशियल रिकग्निशन सिस्टम (FRS) कैमरों, सीसीटीवी फुटेज, पुलिसकर्मियों द्वारा रिकॉर्ड किए गए वीडियो और आम नागरिकों के वीडियो के आधार पर की गई। जाँच में कई संदिग्ध उन स्थानों पर दिखाई दिए, जहाँ हिंसा हुई थी।
पुलिस के अनुसार, ये लोग पथराव करते, पुलिसकर्मियों पर हमला करते, सरकारी वाहनों को नुकसान पहुँचाते और सार्वजनिक संपत्ति में तोड़फोड़ करते नजर आए। जाँच से स्पष्ट हुआ कि प्रदर्शन स्थल पर मौजूद लोगों में केवल ऐसे व्यक्ति नहीं थे जिनका एक-दो मामलों से संबंध रहा हो, बल्कि बड़ी संख्या में आदतन और बार-बार अपराध करने वाले लोग भी मौजूद थे।

जंतर-मंतर तक ही थी अनुमति, संसद मार्च पर नहीं: चेतावनी के बाद हुआ बल प्रयोग

पुलिस की रिपोर्ट के अनुसार, प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों को केवल जंतर-मंतर पर धरना देने की अनुमति दी थी, जबकि संसद तक मार्च निकालने की अनुमति नहीं दी गई थी। इसके बावजूद प्रदर्शनकारी बैरिकेड तोड़ते हुए संसद के बेहद करीब तक पहुँच गए, जिससे संसद की सुरक्षा व्यवस्था पर दबाव की स्थिति पैदा हो गई।
अवलोकन करें:-
 पुलिस वाले भी इंसान हैं, मार खाने के लिए नहीं हैं; पुलिस वालों का भी परिवार होता है जस्टिस साहब; व
nigamrajendra.blogspot.com
पुलिस वाले भी इंसान हैं, मार खाने के लिए नहीं हैं; पुलिस वालों का भी परिवार होता है जस्टिस साहब; व
सुभाष चन्द्र जुलाई 27 को सुप्रीम कोर्ट में जंतर मंतर पर पुलिस की कथित Exesses पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने ....
दिल्ली पुलिस का कहना है कि बल प्रयोग बार-बार चेतावनी दिए जाने के बाद ही किया गया, क्योंकि प्रदर्शनकारी लगातार एक के बाद एक बैरिकेड तोड़ते रहे। पुलिस के मुताबिक, हिंसा के दौरान कई वरिष्ठ अधिकारियों सहित अनेक पुलिसकर्मी घायल हुए, लेकिन इसके बावजूद पुलिस ने काफी देर तक संयम बरता।
घटना के बाद पूरे घटनाक्रम की समीक्षा शुरू की गई, जिसमें उन असामाजिक तत्वों की भूमिका की भी जाँच की जा रही है, जो पुलिस के अनुसार शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के बीच घुसकर हिंसा में शामिल हुए।

न सरकार ने ‘CJP’ से साधा कोई संपर्क, न तय हुई कोई मुलाकात: साख बचाने के लिए झूठ बोल रहा सौरव दास; संसद तक पहुँची ‘कॉकरोचों’ की भीड़, पुलिस पर भी CJP समर्थकों ने किया हमला: देखें Videos

20 जुलाई को जंतर मंतर से लेकर पार्लियामेंट स्ट्रीट तक INDI गठबंधन के सहयोग से जो उपद्रव मचा उसे विपक्ष खासतौर से आम आदमी पार्टी अपनी जीत मान रहा है। जबकि उसने इस उपद्रव से बांग्लादेश और नेपाल में मची खुलेआम हुई गुंडागर्दी को अंजाम देने के मंसूबों को जाहिर कर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी दे मारी है। अंग्रेजी दैनिक 'द हिन्दू' भी आग में घी डालने से पीछे नहीं रहा। विपक्ष और 'द हिन्दू' ने यह भी साबित कर दिया कि भारत विरोधी ताकतों को हवा देकर भारत में उपद्रवियों की हर संभव मदद करने में पीछे नहीं रहेंगे। अभी तक यह सच्चाई भी सामने नहीं कि आखिर इस 'कॉकरोच जनता पार्टी' का संरक्षण कौन है?  

जिस तरह कांग्रेस की स्थापना उस विदेशी अंग्रेज़ ने की थी उसी तरह इस उपद्रवी पार्टी की स्थापना भी एक विदेशी ने ही की है। गौरतलब बात यह है कि जब विदेशी अंग्रेज़ द्वारा कांग्रेस की स्थापना की गयी थी ब्रिटिश सरकार ने उसे देश विरोधी नहीं कहा क्योकि कांग्रेस का गठन नेताजी सुभाष चंद्र बोस, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, चंद्रशेखर आज़ाद और भगतसिंह पार्टी द्वारा स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई लड़ी जा रही थी उससे लोगों का ध्यान भटकाने के लिए किया गया था। ठीक उसी तरह विकासशील भारत में अड़चने डालने के लिए इस उपद्रवी पार्टी का गठन किया गया है। देखना यह है कि क्या यह पार्टी अपने साथ विपक्ष को भी लेकर डूबेगी? यह भविष्य के गर्भ में छिपा है।

          

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने जुटे 'कॉकरोच जनता पार्टी' के समर्थक मार्च करते हुए सोमवार (20 जुलाई) को संसद तक पहुँच गए। इस दौरान कॉकरोचों ने न केवल पार्लिएमेंट में घुसने की कोशिश की, बल्कि बैरिकेडिंग को तोड़ने का प्रयास किया और पुलिस से भिड़ने की भी कोशिश की।

स्थिति बिगड़ते देख संसद भवन की सुरक्षा अत्यंत कड़ी कर दी गई है और सभी मुख्य प्रवेश द्वारों को बंद कर दिया गया। उपद्रवी भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े।

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों की पूर्व नियोजित रणनीति संसद परिसर के भीतर प्रवेश करने की थी। प्रदर्शन में शामिल सीजेपी समर्थक बयान दे रहे थे कि एकजुट होकर केंद्र की मोदी सरकार को गिरा दी जानी चाहिए। प्रदर्शन के दौरान समर्थकों के हाथों में भीम आर्मी के झंडे देखे गए। लोगों को ‘जय भीम’ के नारे लगाते हुए देखा गया

घटना के सामने आए वीडियो फुटेज में प्रदर्शनकारी पुलिस बल पर पथराव करते साफ नजर आ रहे हैं। इस दौरान उपद्रवियों को खुलेआम यह कहते सुना गया, “पत्थरबाजी तो होगी ही।”

कॉकरोच जनता पार्टी ने इस प्रदर्शन से पहले दावा किया था कि वह एक पीसफुल प्रोटेस्ट करेंगे। हालाँकि 20 जुलाई को दिखी तस्वीरों ने यह साफ कर दिया कि मंशा कुछ अलग है। इस प्रदर्शन में पत्रकारों से लेकर पुलिस पर हमला हुआ। तस्वीरें और वीडियोज सोशल मीडिया पर आ चुकी हैं। इस दौरान सुनियोजित ढंग से भीम आर्मी के एजेंडे को बढ़ाया गया।

न सरकार ने ‘CJP’ से साधा कोई संपर्क, न तय हुई कोई मुलाकात: साख बचाने के लिए झूठ बोल रहा सौरव दास, सरकारी सूत्रों ने मीडिया दावों को नकारा

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रवक्ता सौरव दास ने 20 जुलाई को केंद्र सरकार के साथ बातचीत का जो दावा कर सुर्खियाँ बटोरीं थी वो असल में फर्जी निकली हैं। सौरव दास ने X पर पोस्ट करके कहा था कि मोदी सरकार ने प्रदर्शनकारियों से बातचीत के लिए संपर्क किया है और वह और आशुतोष रंका CJP की ओर से केंद्रीय मंत्री जे पी नड्डा से मिलने जा रहे हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने सुबह ही उनसे बातचीत के लिए संपर्क किया था, युवाओं का बड़ा जमावड़ा उनके साथ है और पार्टी की माँगें पूरी तरह स्पष्ट हैं।

इस खबर को ‘द हिंदू’ की पत्रकार विजइता सिंह ने भी अपने सोशल मीडिया हैंडल पर प्रमुखता से आगे बढ़ाया।

उन्होंने अपने सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट किया कि नई दिल्ली के डीसीपी सचिन शर्मा केंद्र सरकार की ओर से CJP टीम से बातचीत कर रहे थे। साथ ही ये भी कहा कि CJP सदस्यों को पहले जिला मजिस्ट्रेट, फिर केंद्र सरकार के एक सचिव और उसके बाद राज्य मंत्री स्तर के अधिकारियों के साथ बातचीत का प्रस्ताव दिया गया था। मगर, CJP सदस्यों ने इन सभी प्रस्तावों को खारिज कर दिया क्योंकि उनकी माँग थी कि उनकी सीधी बातचीत केवल प्रधानमंत्री या किसी कैबिनेट मंत्री के साथ ही हो, और उन्होंने इसके लिए डीसीपी को मंत्रियों के नामों की एक सूची भी सौंपी थी।

हालाँकि, इस पूरे घटनाक्रम में तब नया मोड़ आया जब यह स्पष्ट हुआ कि सौरव दास और उनका समर्थन करने वाले पत्रकारों के ये दावे कथित रूप से असत्य थे। ऑपइंडिया को सरकारी सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार सौरव दास द्वारा किए गए सभी दावे पूरी तरह से बेबुनियाद और झूठे हैं।

सरकारी सूत्रों ने स्पष्ट किया कि मोदी सरकार की ओर से CJP या प्रदर्शनकारियों से बातचीत के लिए ऐसा कोई संपर्क नहीं साधा गया था और न ही केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और सौरव दास के बीच किसी भी प्रकार की कोई बैठक या मुलाकात तय थी।

गौरतलब हो कि पूरा सच सामने आने के बाद अब ये दावा हो रहा है कि प्रदर्शन की विफलता को देखते हुए जीत का झूठा दावा किया गया और अपनी साख बचाने के मकसद से यह अफवाह फैलाई गई थी।