Showing posts with label #foreign funding. Show all posts
Showing posts with label #foreign funding. Show all posts

FCRA Bill को ‘ईसाई संस्थानों की लूट’ बताने वाले बिशप जोसेफ डिसूजा के दावों की खुली पोल, द वायर ने फिर फैलाया वही नैरेटिव

                                   इंटरव्यू का स्क्रीनशॉट (फोटो साभार - YouTube/The Wire)
वामपंथी प्रोपेगेंडा पोर्टल द वायर ने शुक्रवार (7 अगस्त 2026)  को एक क्लिप शेयर की, जिसमें ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल (AICC) का अध्यक्ष और गुड शेफर्ड चर्च ऑफ इंडिया के प्राइमेट आर्कबिशप जोसेफ डिसूजा फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन अमेंडमेंट बिल, 2026 (FCRA Bill 2026) को ईसाई संस्थानों की लूट और चोरी और संघ परिवार का एजेंडा बताते हुए नजर आया।

जिस पॉडकास्ट में करण थापर ने जोसेफ डिसूजा का इंटरव्यू लिया था, वह 4 महीने पहले 2 अप्रैल 2026 को प्रसारित हुआ था। डिसूजा जो घोटाले का आरोपित और विदेशी फंडिंग प्राप्त ईसाई पादरी हैं, उसको द वायर बार-बार FCRA संशोधनों को लेकर मोदी सरकार को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल कर रहा है। ये संशोधन संदिग्ध और अवैध फंडिंग, अवैध धर्मांतरण और अन्य गतिविधियों पर शिकंजा कसेंगे।

क्लिप शेयर करके द वायर उन आरोपों और झूठ की मुहिम में शामिल हो गया, जिन्हें कई निहित स्वार्थ वाले समूह FCRA बिल के खिलाफ लगातार आगे बढ़ा रहे हैं। यह क्लिप डिसूजा द्वारा पत्रकार करण थापर को दिए गए एक इंटरव्यू से ली गई थी।

इंटरव्यू की शुरुआत थापर इस घोषणा के साथ करता हैं कि FCRA बिल में कठोर और देखने में असंवैधानिक उपाय शामिल हैं, जिस पर डिसूजा बिल को लेकर अपने खुद के निराधार दावे जोड़ता हैं।

द वायर पर घोटाले के आरोपित जोसेफ डिसूजा ने FCRA को कहा ईसाई संस्थानों की लूट और चोरी

थापर की बात से सहमति जताते हुए डिसूजा ने दावा किया कि अगर यह बिल पास हो जाता है, तो इससे वह संभव हो सकेगा जिसे भारतीय ईसाई समुदाय और वैश्विक ईसाई समुदाय की कानूनी लूट को बढ़ावा मिलेगा।
अपने गंभीर आरोप को समझाते हुए डिसूजा ने दावा किया कि यह बिल ईसाई संस्थानों की संपत्तियों और परिसंपत्तियों पर कब्जा करने की एक चाल है। उसने आगे दावा किया कि बिल के तहत प्रस्तावित डेजिग्नेटिड अथॉरिटी को उन संगठनों के विदेशी योगदान और संपत्तियों पर स्थायी नियंत्रण लेने की व्यापक शक्तियाँ दी गई हैं, जिनका विदेशी योगदान पंजीकरण रद्द, समर्पित या समाप्त हो जाता है।
जोसेफ डिसूजा ने आगे दावा किया कि यह बिल प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है, क्योंकि डेजिग्नेटिड अथॉरिटी के फैसले न्यायिक समीक्षा या न्यायिक जाँच के अधीन नहीं हैं।

ईसाई चर्च के प्रति RSS की ऐतिहासिक दुश्मनी

डिसूजा ने आरोप लगाया कि सरकार इस प्रावधान का गलत इस्तेमाल कर सकती है। वह किसी संगठन के नवीनीकरण आवेदन को समय पर मंजूर नहीं करके या उस पर कार्रवाई नहीं करके ऐसा कर सकती है, जिससे संगठन की संपत्तियाँ जब्त हो जाएँगी।
उसने FCRA बिल को अल्पसंख्यक अधिकारों पर सीधा हमला बताते हुए इसे देश के ईसाई संस्थानों को हड़पने के RSS के एजेंडे को आगे बढ़ाने वाला बताया।
उसने बिल लाने के पीछे सरकार की वैचारिक मंशा होने का आरोप लगाया। उसने दावा किया कि RSS की मदर टेरेसा और ईसाई चर्च के प्रति ऐतिहासिक दुश्मनी ही FCRA बिल के पीछे की वजह है।
बिल को अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए खतरा बताते हुए आर्कबिशप ने इसकी तुलना नाजी जर्मनी में बनाए गए यहूदी मामलों के कार्यालय, जिसे रेफरेट IV B4 कहा जाता था, से की। यह कार्यालय यहूदी लोगों की संपत्तियों, संस्थानों, सिनेगॉग और उनकी हर चीज को हड़पने के लिए बनाया गया था।

ईसाई समुदाय को कमजोर करना

आर्कबिशप ने आरोप लगाया कि सरकार की आर्थिक लूट करने और ईसाई समुदाय को कमजोर करने की साजिश को FCRA बिल का रूप दिया गया है। उसने विदेशी फंडिंग से जुड़ी राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंताओं को खारिज कर दिया और RSS पर आतंकवाद का आरोप लगाया।
उसने दावा किया कि ईसाई संगठनों की विदेशी फंडिंग की जाँच जरूरी नहीं है, क्योंकि ईसाई आतंकवादी गतिविधियों में शामिल नहीं हैं। डिसूजा ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि बिल का उद्देश्य चर्चों में आने वाले उस विदेशी धन और उससे होने वाली आय को नियंत्रित करना है, जिसका इस्तेमाल धर्मांतरण के लिए किया जाता है।
उसने आगे दावा किया कि भारत में ईसाई संगठन धर्मांतरण की गतिविधियों में शामिल होते हैं और सरकार को आधुनिक ईसाई धर्म की कोई समझ नहीं है। उसने धमकी दी कि बिल लाकर सरकार वैश्विक स्तर पर और संयुक्त राष्ट्र में एक बड़ा विवाद खड़ा कर देगी।
उसने कहा कि इस कार्रवाई के वैश्विक स्तर पर असर होंगे और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की ओर से प्रतिक्रिया और विरोध का सामना करना पड़ेगा। आर्कबिशप ने धमकी दी कि अगर बिल संसद में पास हो गया, तो ईसाई संगठन देश और दुनिया की अदालतों का रुख करेंगे, अपने वैश्विक साझेदारों को उनकी अदालतों में जाने देंगे।

जोसेफ डिसूजा – हिंदुओं के खिलाफ नफरत का अभियान चलाने वाला व्यक्ति, 296.6 करोड़ रुपए निजी बैंक खातों में डायवर्ट करने का आरोप

डिसूजा खुद को दलितों और हाशिए पर मौजूद समुदायों की आवाज के रूप में पेश करता हैं, लेकिन FCRA बिल पर चर्चा में वह कोई निष्पक्ष आवाज नहीं है। अतीत में उन्हें विदेशी फंडिंग और वित्तीय अनियमितताओं को लेकर जाँच का सामना करना पड़ा है।
वह और उसके पश्चिमी सहयोगी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह नैरेटिव आगे बढ़ाने के लिए कुख्यात है कि वो भारत के उन उत्पीड़ित, पिछड़े या अछूत समुदायों से आता है, जिन्होंने बाद में ईसाई धर्म अपना लिया।
गुड शेफर्ड चर्च और उससे जुड़े संगठनों के तहत स्कूलों, अस्पतालों और सामाजिक सेवा संगठनों समेत उसके संस्थानों के नेटवर्क को विदेशी फंडिंग मिलती है और हजारों अन्य NGO की तरह पिछले वर्षों में FCRA अनुपालन जाँच का सामना कर चुका है।
जोसेफ डिसूजा ने दलित फ्रीडम नेटवर्क की सह-स्थापना की थी, जिसका बाद में नाम बदलकर डिग्निटी फ्रीडम नेटवर्क (DFN) कर दिया गया। यह नेटवर्क अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और यूनाइटेड किंगडम में प्रमुख शाखाएँ संचालित करता है।
इन संगठनों से जुड़ी उसकी वेबसाइट और प्रचार सामग्री भारत की बेहद नकारात्मक तस्वीर पेश करती हैं और भारत में दलितों और ईसाइयों को कीड़ों की तरह मारा जा रहा है जैसे झूठ फैलाती हैं।
तेलंगाना CID और प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मनी लॉन्ड्रिंग और वित्तीय गबन से जुड़े गंभीर आरोपों के संबंध में आरोप लगाए जाने के बाद जोसेफ डिसूजा जाँच के घेरे में आया।
उस पर और उसके बेटे जोश लॉरेंस डिसूजा पर गरीब दलित बच्चों की मुफ्त शिक्षा और कल्याण के लिए जुटाए गए लगभग 296.6 करोड़ रुपए के विदेशी फंड को फर्जी बिलों और शेल कंपनियों के जरिए निजी बैंक खातों, फिक्स्ड डिपॉजिट और महंगी रियल एस्टेट में निवेश करने के लिए डायवर्ट करने का आरोप लगाया गया।
डिसूजा उन प्रमुख लोगों में से एक हैं, जिन्होंने भारत को बदनाम करने के लिए ईसाइयों के खिलाफ बढ़ती नफरत का झूठ फैलाया। ऑपइंडिया ने डिसूजा, उसके घोटाले और उसके विदेशी फंडिंग पर विस्तृत रिपोर्ट की है।

आर्कबिशप के झूठ का पर्दाफाश

FCRA बिल को लेकर डर फैलाने वाली बातें उन वर्गों की ओर से आ रही हैं, जिन्हें नए कानून के तहत वैध जाँच का सामना करना पड़ सकता है। हालाँकि वास्तविकता उन बातों से काफी अलग है, जिस तरह कुछ निहित स्वार्थ वाले समूह इसे पेश कर रहे हैं।
प्रस्तावित बिल स्पष्ट रूप से सभी पूजा स्थलों को सरकारी कब्जे, धर्मनिरपेक्षीकरण या किसी दूसरे उद्देश्य में बदले जाने से सुरक्षा देता है।
सरकार को चर्चों और धार्मिक संस्थानों पर कब्जा करने की व्यापक शक्तियाँ दिए जाने के दावों की सच्चाई का पता प्रस्तावित बिल को सीधे पढ़कर लगाया जा सकता है। प्रस्तावित बिल में एक प्रावधान इस प्रकार है:
“उप-धारा (6) में निहित किसी भी बात के बावजूद, नामित प्राधिकरण (डेजिग्नेटिड अथॉरिटी), जहाँ उसके पास स्थायी रूप से निहित कोई संपत्ति या उसका कोई हिस्सा पूजा स्थल है, वहाँ ऐसी संपत्ति या उसके हिस्से का प्रबंधन या संचालन ऐसे व्यक्ति को, ऐसे तरीके से और ऐसी शर्तों पर सौंपेगा, जो निर्धारित की जा सकती हैं और यह सुनिश्चित करेगा कि ऐसे पूजा स्थल का धार्मिक स्वरूप बरकरार रहे।“
डिसूजा के दावे के विपरीत, डेजिग्नेटिड अथॉरिटी  द्वारा पारित कोई भी आदेश प्रशासनिक समीक्षा और जिला न्यायाधीश के समक्ष न्यायिक अपील के अधीन रहेगा। इसके अलावा, केंद्र की पूर्व अनुमति के बिना राज्य स्तर की एजेंसियों को स्थानीय मुकदमे शुरू करने से रोक दिया गया है। यह मनमानी स्थानीय कार्रवाई के खिलाफ एक स्पष्ट सुरक्षा उपाय है।
FCRA बिल ईसाई धर्म समेत किसी भी धर्म के लिए विदेशी फंडिंग पर रोक नहीं लगाता। चर्च, मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारे समेत पूजा स्थल वास्तविक धार्मिक कार्यों के लिए विदेशी दान प्राप्त करते रहेंगे।

जोसेफ डिसूजा पर खुद अधिकारियों ने FCRA नियमों के उल्लंघन का लगाया है आरोप

जाँचकर्ताओं के अनुसार, गृह मंत्रालय (MHA) ने नेटवर्क से जुड़े प्रमुख संगठनों के FCRA लाइसेंस नियामकीय उल्लंघनों के कारण पहले निलंबित और बाद में रद्द कर दिए थे।
इसके बावजूद विदेशी फंड अप्रत्यक्ष माध्यमों से भारत में आते रहे। FCRA लाइसेंस रद्द होने का मतलब था कि संगठन सीधे विदेशी दान प्राप्त नहीं कर सकते थे। जाँचकर्ताओं ने आरोप लगाया कि इसके बाद डिसूजा ने अपनी व्यावसायिक इकाई OMBF (ओम बुक्स फाउंडेशन) का इस्तेमाल एक वैकल्पिक रास्ते के रूप में किया।
आरोपों के अनुसार, प्रिंटिंग और पब्लिशिंग सेवाओं के लिए बढ़े-चढ़े और फर्जी बिल तैयार किए गए और उन्हें विदेशों में मौजूद संबंधित या कथित रूप से संबद्ध संगठनों को भेजा गया।
इन लेनदेन को वैध व्यावसायिक गतिविधियों के रूप में पेश किया गया, जिससे यह दिखाया जा सके कि विदेशी संगठनों ने किताबों और प्रकाशनों का ऑर्डर दिया था। जाँचकर्ताओं का दावा है कि इस व्यवस्था का इस्तेमाल सीधे विदेशी योगदान पर लगी पाबंदियों के बावजूद विदेशी फंड को भारत में भेजते रहने के लिए किया गया।
जाँचकर्ताओं ने आरोप लगाया कि ऊपर बताई गई गतिविधियों के जरिए जुटाए गए लगभग 296.6 करोड़ रुपए को रियल एस्टेट और अन्य परिसंपत्तियों में निवेश के माध्यम से मनी लॉन्ड्रिंग की गई।
प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत जाँच करते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पाया कि जोसेफ डिसूजा, उसके बेटे जोश लॉरेंस डिसूजा और करीबी सहयोगियों ने इन गतिविधियों से जुड़े फंड का इस्तेमाल करके महंगे जमीन के टुकड़े, कमर्शियल संपत्तियाँ और लग्जरी विला खरीदे थे।
जिसे ED ने अपराध से अर्जित आय (proceeds of crime) के रूप में वर्गीकृत किया, उस पर कार्रवाई के तहत ED ने 12 प्रमुख अचल संपत्तियों को अटैच और फ्रीज किया। इनकी संयुक्त बाजार कीमत 15 करोड़ रुपए से अधिक आंकी गई थी।
इसके बाद इन फंड को कागजी लेनदेन और फर्जी बिलों के जरिए निजी संपत्तियों और ऐशो-आराम वाली जीवनशैली में डायवर्ट किया गया, बजाय इसके कि इनका इस्तेमाल उन लाभार्थियों के लिए किया जाता, जिनके लिए ये फंड जुटाए गए थे।

राजनीतिक संबंध, भारतीय लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम और कॉन्ग्रेस के साथ वैचारिक तालमेल

जोसेफ डिसूजा के आलोचकों का कहना है कि उसका प्रभाव मजहबी गतिविधियों से आगे तक फैला हुआ है और उसने भारत के राजनीतिक तथा मीडिया इकोसिस्टम के कुछ हिस्सों के साथ करीबी संबंध बनाए रखे हैं।
उसका दावा है कि जब भी वित्तीय आरोपों से जुड़ी कानूनी कार्रवाई तेज होती है, तो राजनीतिक समर्थन तंत्र ऐसी कार्रवाइयों को राजनीतिक या वैचारिक रूप से प्रेरित बताने के लिए सक्रिय हो जाते हैं। जोसेफ डिसूजा का वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेतृत्व के साथ संबंध कई वर्षों पुराना है।
2004 के आम चुनाव के बाद, जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार चुनाव हार गई और सोनिया गाँधी के नेतृत्व में यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस (UPA) सत्ता में आया, तब डिसूजा ने अमेरिका में चर्च नेटवर्क को पत्र लिखकर इस नतीजे को दैवीय न्याय (Divine Justice) और एक बड़ा चमत्कार बताया था।
उस समय डिसूजा ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल के वैश्विक अध्यक्ष के रूप में काम कर रहा था। ब्रेकिंग इंडिया  के अनुसार, इन दावों और संबंधित दस्तावेजों पर किताब के अध्याय 8 में चर्चा की गई है।
इस तरह के राजनीतिक बयान जोसेफ डिसूजा जैसे लोगों से जुड़ी ED और CID की चल रही जाँच को मजहबी उत्पीड़न के मुद्दे के रूप में पेश करने का काम करते हैं, जिससे एक राजनीतिक सुरक्षात्मक नैरेटिव तैयार होता है। हालाँकि यह स्थापित कानूनी निष्कर्ष के बजाय राजनीतिक व्याख्या और अलग-अलग दृष्टिकोणों का मामला है।
मूल रूप से, द वायर ने न केवल एक ऐसे बिशप को मंच दिया, बल्कि बार-बार उनके निराधार आरोपों और खुले झूठ को भी आगे बढ़ाया, जिन्होंने ईसाई उत्पीड़न को लेकर झूठ फैलाते हुए भारत विरोधी और हिंदू विरोधी अभियान चलाया, जिन पर करोड़ों रुपए के घोटाले का आरोप है और जिन्होंने खुद FCRA नियमों का उल्लंघन किया है। यह सब प्रस्तावित FCRA संशोधनों के बारे में झूठ फैलाने के लिए किया गया, जो उसके जैसे घोटालेबाजों पर शिकंजा कसेंगे।

जिस कांग्रेस ने बनाया FCRA, वही अब विदेशी फंडिंग को लेकर BJP सरकार को घेर रही: NGOs की अवैध फंडिंग रोकने पर क्यों मचा बवाल?

साभार 
कांग्रेस पार्टी इन दिनों मोदी सरकार पर विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम यानी FCRA के गलत इस्तेमाल का आरोप लगा रही है। कांग्रेस का कहना है कि सरकार FCRA के जरिए नागरिक समाज समूहों और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) पर दबाव बना रही है और राजनीतिक असहमति को रोकने की कोशिश कर रही है।

हालाँकि, FCRA का इतिहास काफी पुराना है। यह कानून पहली बार 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की सरकार के दौरान लाया गया था। इसके बाद राजीव गाँधी सरकार ने 1980 के दशक में इसमें बड़े बदलाव किए। 2010 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA सरकार ने नया FCRA कानून लागू किया, जिसने NGOs के विदेशी फंड पर निगरानी और सरकारी नियंत्रण को और बढ़ाया।

इंदिरा गाँधी के समय आया FCRA

FCRA की शुरुआत 1976 में हुई थी। उस समय देश में प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में आपातकाल लगा हुआ था। नागरिक स्वतंत्रताएं सीमित थीं, विपक्षी नेताओं को MISA यानी आंतरिक सुरक्षा रखरखाव अधिनियम के तहत जेल में रखा गया था और प्रेस पर भी कड़े प्रतिबंध थे।

इसी दौर में विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 1976 संसद में लाया गया। इसका उद्देश्य देश में आने वाले विदेशी पैसे और उसके इस्तेमाल को नियंत्रित करना था।

1976 के कानून के तहत साफ तौर पर इन लोगों के लिए विदेशी मेहमाननवाजी और विदेशी चंदे पर रोक लगा दी गई थी:

(a) चुनाव लड़ने वाला उम्मीदवार,
(b) पंजीकृत अखबार का संवाददाता, कॉलम लिखने वाला, कार्टूनिस्ट, संपादक, मालिक, प्रिंटर या प्रकाशक,
(c) न्यायाधीश, सरकारी कर्मचारी या किसी निगम का कर्मचारी,
(d) किसी भी विधानमंडल का सदस्य,
(e) राजनीतिक दल या उसका कोई पदाधिकारी।

पत्रकारों को कानून के तहत इस प्रतिबंधित सूची में शामिल किया जाना इंदिरा गाँधी की मंशा को साफ तौर पर दिखाता है। इसका उद्देश्य राजनीतिक विरोधियों, व्यंग्य लिखने वालों, स्वतंत्र पत्रकारों और नागरिक अधिकार समूहों को विदेशों से आर्थिक मदद मिलने से रोकना था। इस तरह आपातकाल के दौरान उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि सार्वजनिक जीवन में आर्थिक रूप से टिके रहने के लिए सरकार का नियंत्रण बना रहे।

राजीव गाँधी सरकार ने बढ़ाया सरकारी नियंत्रण

आपातकाल खत्म होने और जनता पार्टी सरकार के कार्यकाल के बाद कान्ग्रेस फिर सत्ता में लौटी। प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के समय 1985 में FCRA में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए।

इससे पहले संगठन कुछ परिस्थितियों में पूर्व सूचना या सामान्य अनुमति के आधार पर विदेशी योगदान ले सकते थे। लेकिन 1985 के संशोधन के बाद विदेशी फंड लेने वाले संगठनों के लिए गृह मंत्रालय (MHA) के साथ औपचारिक पंजीकरण जरूरी कर दिया गया।

इस बदलाव के बाद FCRA NGOs के लिए एक स्थायी और नौकरशाही आधारित निगरानी व्यवस्था बन गया। विदेशी फंड लेने वाले संगठनों को अब सरकार के सामने पंजीकरण और नियमों का पालन करना जरूरी था।

2010 में मनमोहन सिंह सरकार ने बनाया नया FCRA

FCRA में सबसे बड़ा बदलाव 2010 में हुआ। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA सरकार और तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम के कार्यकाल में विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 लागू किया गया।

इस कानून ने 1976 के पुराने FCRA को पूरी तरह खत्म कर उसकी जगह नया कानून लागू किया। नए कानून में NGOs और दूसरे संगठनों को मिलने वाले विदेशी फंड पर सरकार का नियंत्रण और बढ़ गया।

1976 के कानून के तहत FCRA पंजीकरण एक बार मिलने के बाद तब तक जारी रहता था, जब तक उसे रद्द नहीं किया जाता। लेकिन 2010 के कानून में पंजीकरण की अवधि 5 साल कर दी गई।

इसका मतलब था कि NGOs को अपना FCRA पंजीकरण समय-समय पर नवीनीकृत कराना पड़ता था। इससे सरकार के पास पंजीकरण को रोकने, उसमें देरी करने या उसे मंजूर नहीं करने का अधिकार और प्रभाव बढ़ गया।

2010 के FCRA की धारा 5 में ‘राजनीतिक प्रकृति के संगठन’ नाम की एक नई श्रेणी जोड़ी गई। इसके तहत सरकार को ऐसे संगठनों को विदेशी फंड लेने से रोकने की शक्ति मिली, जिन्हें राजनीतिक प्रकृति का माना जाता था। इसमें उन समूहों पर भी असर पड़ सकता था जो सरकारी नीतियों, बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स या दूसरी सरकारी योजनाओं के खिलाफ प्रदर्शन करते थे।

2010 के कानून की धारा 8 में विदेशी फंड के प्रशासनिक खर्च पर भी सीमा लगाई गई। इसके तहत किसी संगठन को मिले विदेशी योगदान का अधिकतम 50 प्रतिशत ही प्रशासनिक खर्च में इस्तेमाल किया जा सकता था। इसमें संगठन के संचालन, वेतन और रिसर्च जैसे खर्च शामिल थे। इस तरह सरकार ने NGOs के विदेशी फंड के इस्तेमाल पर एक और वित्तीय सीमा तय कर दी।

कुडनकुलम विवाद में FCRA का इस्तेमाल

2011 से 2013 के बीच तमिलनाडु में कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र और आनुवंशिक रूप से संशोधित यानी (जीएम) फसलों के फील्ड ट्रायल जैसे मुद्दों को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए।

कुडनकुलम में पीपुल्स मूवमेंट अगेंस्ट न्यूक्लियर एनर्जी यानी (PMANE) के नेतृत्व में बड़े स्तर पर परमाणु विरोधी आंदोलन हुआ। इन प्रदर्शनों के कारण रूस की मदद से बनाए जा रहे परमाणु रिएक्टरों को शुरू करने में देरी हुई।

उस समय UPA सरकार के कई वरिष्ठ अधिकारियों ने इन प्रदर्शनों के पीछे विदेशी फंडिंग को जिम्मेदार बताया।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक इंटरव्यू में कहा था कि कुडनकुलम में हो रहे विरोध प्रदर्शनों में विदेशी NGOs की भूमिका थी। उन्होंने कहा था कि इनमें से कई NGOs अमेरिका और स्कैंडिनेवियाई देशों से फंड प्राप्त करते हैं और भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरी तरह नहीं समझते।

करीब 4000 NGOs पर कार्रवाई

कुडनकुलम आंदोलन के दौरान गृह मंत्रालय ने करीब 4,000 NGOs के FCRA पंजीकरण रद्द किए थे। कुडनकुलम आंदोलन को फंड देने वाले बताए गए कुछ संगठनों के बैंक खाते फ्रीज किए गए और उनके वित्तीय रिकॉर्ड की जाँच भी कराई गई।

पर्यावरण से जुड़े कुछ विदेशी नागरिकों को भारत से बाहर भेजा गया या उन्हें वीजा देने से इनकार किया गया। सरकार का कहना था कि इन लोगों ने स्थानीय विकास विरोधी प्रदर्शनों में हिस्सा लेकर अपने वीजा नियमों का उल्लंघन किया था।

तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने भी कुडनकुलम आंदोलन के दौरान विदेशी फंड के इस्तेमाल को लेकर कार्रवाई की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि जाँच में धन के गलत इस्तेमाल की जानकारी सामने आई है और इसलिए FCRA के तहत मामले दर्ज करने का फैसला लिया गया।

आज कांग्रेस के विरोध के बीच पुराना इतिहास

आज कांग्रेस मोदी सरकार पर FCRA का इस्तेमाल NGOs और नागरिक समाज संगठनों को दबाने के लिए करने का आरोप लगा रही है। कान्ग्रेस FCRA संशोधन विधेयक का विरोध कर रही है और उसका कहना है कि इससे नागरिक संगठनों की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।

लेकिन FCRA का इतिहास बताता है कि विदेशी फंड पर सरकारी निगरानी किसी एक सरकार तक सीमित नहीं रही है। इसकी शुरुआत 1976 में इंदिरा गांधी सरकार के दौरान हुई। 1985 में राजीव गांधी सरकार ने इसमें महत्वपूर्ण बदलाव किए और 2010 में मनमोहन सिंह सरकार ने नया FCRA कानून लागू किया।

इसके बाद भाजपा सरकार के समय भी FCRA में बड़े बदलाव किए गए। इनमें 2020 और 2026 के महत्वपूर्ण संशोधन शामिल हैं। इन बदलावों का मुख्य उद्देश्य विदेशी सरकारों और संगठनों से मिलने वाले पैसे के जरिए भारत की घरेलू राजनीति, नीतिगत फैसलों या सामाजिक आंदोलनों को प्रभावित करने की संभावना को रोकना बताया गया है।

FCRA की निगरानी का एक तर्क यह भी है कि विदेशी फंड का इस्तेमाल देश में अस्थिरता पैदा करने वाली गतिविधियों, उग्रवाद, अवैध धार्मिक धर्मांतरण या कट्टरपंथी संगठनों को आर्थिक मदद देने के लिए न हो।

इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि FCRA को लेकर सरकारी नियंत्रण की व्यवस्था अचानक मोदी सरकार के समय शुरू नहीं हुई। यह कानून करीब 5 दशकों से अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल में लगातार बदलता और मजबूत होता रहा है। ऐसे में आज कांग्रेस द्वारा FCRA को लेकर उठाए जा रहे सवालों के साथ इस कानून के पुराने इतिहास को भी देखना जरूरी है।

‘धार्मिक गतिविधि’ के नाम पर धर्मांतरण कराने वालों की विदेशी फंडिंग पर मोदी सरकार ने किया प्रहार, बदल डाले FCRA के नियम

     धर्मांतरण को ‘धार्मिक गतिविधि’ बताकर अब नहीं मिलेगी विदेशी फंडिंग (प्रतीकात्मक तस्वीर साभार: AI-Dall-e)
केंद्र की मोदी सरकार ने विदेशी फंडिंग को लेकर लागू विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) नियमों में बड़ा बदलाव किया है। नए संशोधनों के तहत धर्मांतरण (proselytisation) को अब आस्था-आधारित गतिविधियों का हिस्सा नहीं माना जाएगा। सरकार के इस कदम का सीधा असर उन गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), धार्मिक संस्थाओं और चैरिटेबल संगठनों पर पड़ेगा जो विदेशी फंडिंग के जरिए धर्म परिवर्तन की साजिश रचते हैं।

सोमवार (22 जून 202) को गृह मंत्रालय द्वारा जारिए किए अधिसूचना में बताया गया कि नए नियमों में धार्मिक शिक्षा, पूजा-पाठ, प्रार्थना सभा, आध्यात्मिक कार्यक्रम, धार्मिक साहित्य का ज्ञान देना या समुदाय आधारित धार्मिक सेवाएँ तो आस्था-आधारित गतिविधियों की श्रेणी में रहेंगी, लेकिन किसी व्यक्ति को धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाना, प्रभावित करना या धर्म बदलने के लिए अभियान चलाना अब इस श्रेणी से बाहर माना जाएगा।

नए नियमों के अनुसार, रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन करने या सालाना रिटर्न दाखिल करने वाले संगठनों को अब अपनी आधिकारिक वेबसाइट और सोशल मीडिया अकाउंट की जानकारी देनी होगी। इन नियमों का मकसद ज़्यादा पारदर्शिता लाना भी है, खासकर तब जब पैसा ‘डोनर एड्वाइज़्ड फंड’ या पैसे भेजने के किसी दूसरे जरिए से आता है। ऐसे मामलों में, संगठन को असली दान देने वाले की पहचान, पता और ईमेल की जानकारी के साथ-साथ मिली हुई रकम की भी जानकारी देनी होगी।

नियमों में हुए इस बदलाव का मतलब यह है कि यदि कोई संस्था विदेशी फंड का उपयोग धर्म प्रचार या धर्म परिवर्तन से जुड़ी गतिविधियों में करती पाई जाती है, तो उसके खिलाफ FCRA के तहत कार्रवाई की जा सकती है। ऐसे मामलों में फंड के उपयोग की जाँच, लाइसेंस संबंधी कार्रवाई या अन्य कानूनी कदम उठाए जा सकते हैं।

सरकार ने कहा था कि विदेशी फंड का इस्तेमाल सामाजिक सेवा, शिक्षा, स्वास्थ्य और वास्तविक धार्मिक गतिविधियों के लिए किया जा सकता है, लेकिन धर्म परिवर्तन को बढ़ावा देने के लिए नहीं। इसी वजह से धर्मांतरण को आस्था-आधारित गतिविधियों की परिभाषा से अलग कर दिया गया है।

गृह मंत्रालय लंबे समय से यह कहता रहा है कि विदेशी धन का उपयोग जबरन, प्रलोभन या अन्य माध्यमों से धार्मिक परिवर्तन के लिए नहीं होना चाहिए। इसी संदर्भ में पहले भी FCRA नियमों को सख्त किया गया था। 2019 में भी सरकार ने नियमों में संशोधन करते हुए NGOs के प्रमुख पदाधिकारियों से यह घोषणा लेना अनिवार्य किया था कि वे धर्म परिवर्तन या सांप्रदायिक तनाव फैलाने जैसी गतिविधियों में शामिल नहीं रहे हैं।

हाल के FCRA संशोधन और संसद में हुई चर्चा के दौरान भी सरकार ने साफ संकेत दिए कि विदेशी फंड के कथित दुरुपयोग और धार्मिक परिवर्तन से जुड़े मामलों पर सख्त नजर रखी जाएगी। संसद में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा था कि सरकार विदेशी फंडिंग के दुरुपयोग और जबरन धार्मिक परिवर्तन जैसी गतिविधियों को बर्दाश्त नहीं करेगी।

वहीं नए नियमों में बदलावों के लागू होने से ठीक 10 दिन पहले अमेरिकी सांसदों ने हाल ही में भारत सरकार द्वारा FCRA नियमों में किए गए बदलावों पर चिंता जताई थी। सीनेट की विदेश संबंध समिति के प्रमुख जेम्स रिष ने एक बयान में कहा था कि FCRA में प्रस्तावित बदलावों का ‘सिविल सोसाइटी समूहों’ पर बुरा असर पड़ सकता है, जिनमें ईसाई संगठन भी शामिल हैं। उन्होंने इन बदलावों को ‘बेहद चिंताजनक’ बताया था।

CSDS: भारतीय लोकतंत्र के खिलाफ साजिश और विदेशी फंडिंग का जाल – विस्तृत रिसर्च में खुलासा

                                     CSDS और विदेशी फंडिंग वाले NGO की साजिश का खुलासा
यह रिसर्च सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज (CSDS: Centre for the Study of Developing Societies) के इतिहास, विचार, फंडिंग इकोसिस्टम और विदेशी संस्थाओं के साथ सहयोग की जाँच करता है। विश्लेषण की वजह ये है कि विदेशी फंडिंग वाले एनजीओ के साथ भारत के कथित थिंक टैंक और मीडिया के बीच सीएसडीएस एक गठजोड़ बनाता है, जो वैचारिक रूप से भारत, खासकर बहुसंख्यक हिंदुओं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली लोकतांत्रिक सरकार के खिलाफ है। इस रिसर्च में ऐसे कई रहस्योद्घाटन हुए हैं, जिससे पता चलता है कि भारत के राजनीतिक और सामाजिक विमर्श को प्रभावित करने, भारत के लोकतंत्र में विदेशी हस्तक्षेप को बढ़ावा देने और विदेशी शक्तियों के इशारे पर भारत की संप्रभुता को कमजोर करने की कोशिश की गई है। सीएसडीएस और उसके मददगारों ने कैसे दूसरे देशों की विदेश नीति के एजेंडे को आगे बढ़ाने की कोशिश की है, इसका भी पता चलता है।

CSDS की उत्पत्ति और विचार

सीएसडीएस की स्थापना 1963 में रजनी कोठारी ने की थी। कोठारी के क्रियाकलाप हिन्दू समाज को लेकर पूर्वाग्रह से ग्रसित थे। वह देश की धर्मनिरपेक्षता, जातिवाद और बहुसंख्यक विरोधी सोच का व्यक्ति रहा है। यह शोधपत्र सीएसडीएस की जड़ों को एशिया फाउंडेशन जैसी प्रायोजित विदेशी संस्थाओं से जोड़ता है, जो सीआईए का एक मुखौटा है। इससे साफ होता है कि संस्थान की स्थापना के पीछे ‘बाहरी प्रभाव’ था। सीएसडीएस के नेतृत्व में दशकों से ऐसे कार्यों को बढ़ावा मिला, जो भारत के बहुसंख्यक समुदाय को टारगेट करती है। अल्पसंख्यकों के झूठे उत्पीड़न की बात करती है और भारत की संप्रभुता और एकता को कमजोर करने वालों को ‘वैचारिक सोच’ प्रदान करती है।

विदेशी अनुदान का फैला जाल: नकदी, सामंजस्य और सोच

सीएसडीएस का परिचालन और अनुसंधान बजट न केवल भारत सरकार के अनुदानों (मुख्य रूप से इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च, ICSSR) के माध्यम से संचालित होता है, बल्कि विदेशी अनुदान पर इसकी निर्भरता भी लगातार बढ़ती जा रही है। 2016 से सीएसडीएस को FCRA के माध्यम से कम से कम ₹15.6 करोड़ प्राप्त हुए हैं। हालाँकि अधूरे खुलासों के कारण पूरी राशि का पता नहीं चल पाया है। अनुमान है कि ज्ञात स्रोतों से प्राप्त आमदनी से कहीं अधिक धनराशि इन्हें मिली है। सीएसडीएस की फंडिंग के मुख्य स्रोतों की बात करें तो वो निम्नलिखित हैं:

कोनराड एडेनॉयर स्टिफ्टंग (KAS: Konrad Adenauer Stiftung): जर्मन सरकार द्वारा फंडेड ये फाउंडेशन, सीधे तौर पर सत्तारूढ़ क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (सीडीयू) से संबद्ध है। इस फाउंडेशन ने 2016 से 2.6 करोड़ रुपए से अधिक का दान दिया है। केएएस जर्मन विदेश नीति और पश्चिमी लोकतांत्रिक मूल्यों को आगे बढ़ाती है, जो अक्सर टारगेट वाले देशों की राजनीतिक को कमजोर करता है या इसे ‘सुधारने’ के नाम पर सत्ता परिवर्तन को हवा देता है।

अंतर्राष्ट्रीय विकास अनुसंधान केंद्र (IDRC: International Development Research Centre): आईडीआरसी कनाडा की एक क्राउन कॉपोरेशन है, जो पिछले 8 सालों से अपने थिंक टैंक के माध्यम से सीएसडीएस के सालाना बजट का एक तिहाई भाग प्रदान करता आ रहा है। आईडीआरसी कनाडाई विदेश नीति का एक हिस्सा है। ये अलगाववाद को बढ़ावा देता है। खालिस्तानी अलगाववादियों को कनाडा का खुला संरक्षण इसका उदाहरण है।

सीमेनपू फ़ाउंडेशन (Siemenpuu Foundation): फिनलैंड के विदेश मंत्रालय की आर्थिक मदद ये चल रहा यह फिनिश एनजीओ, सीएसडीएस और उसकी ब्रांचों (विशेषकर एसएडीईडी) को मदद करता है। सीमेनपू फाउंडेशन भारत में ‘आदिवासियों के समर्थन’ के आस-पास केंद्रित हैं, लेकिन उनके नेटवर्क और संवाद मंच नक्सल-समर्थित और हिंदू-विरोधी कथित बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं को ‘नजरिया’ प्रदान करते हैं। ये अक्सर भारत में उत्पीड़न और बेदखल जैसे मुद्दों को बढ़ावा देती है।

बर्गग्रुएन इंस्टीट्यूट (BI: Berggruen Institute): बीआई का भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी विचार इसकी पत्रिका “नोएमा” के माध्यम से प्रसारित होता है। इसमें भारत को सत्तावादी, सांप्रदायिक और पिछड़ा बताया जाता है और अक्सर अति-वैचारिक और तथ्यात्मक रूप से चुनिंदा लेखकों के लेख छापती है। इन लेखकों में भारत-विरोधी पश्चिमी लॉबी से जुड़े लेखक भी शामिल हैं।

फोर्ड फाउंडेशन, हेनरी लूस फाउंडेशन, ओमिडयार, ओपन सोसाइटी फाउंडेशन (Ford Foundation, Henry Luce Foundation, Omidyar, Open Society Foundations): ये अमेरिकी संस्थाएँ सत्ता परिवर्तन, समाज के कथित सशक्तिकरण और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान की राजनीति को बढ़ावा देने के लिए धन मुहैया कराती हैं। सीएसडीएस को सीधे या अपने सहयोगियों (जैसे “भारतीय मुस्लिम परियोजना”) के माध्यम से मदद करती है। ये लोग भारत और उसकी सरकार से पीड़ित होने के नेरेटिव को बढ़ावा देते हैं।

साइंसेज पीओ/एफएनएसपी (Sciences Po/FNSP): फ्रांस के प्रमुख राजनीति विज्ञान संस्थान ने, एफएनएसपी के माध्यम से, सीएसडीएस को पर्याप्त वित्तीय योगदान दिया है। इसकी फैकल्टी, खास कर क्रिस्टोफ़ जाफ़रलॉट, ने नियमित रूप से हिंदू विरोधी राजनीति और मोदी सरकार की आलोचना करते हुए शोध प्रकाशित किए हैं।

पश्चिमी मीडिया, ‘खोजी’ नेटवर्क और सत्ता-पलट तत्वों की मिलीभगत

 शोध में विस्तार से बताया गया है कि कैसे सीएसडीएस और उसका शोध/पॉलिसी इकोसिस्टम—लोकनीति, एसएडीईडी और संबद्ध शिक्षाविद के साथ पश्चिमी मीडिया और ‘खोजी पत्रकारिता’ नेटवर्क (जैसे जीआईजेएन, ओसीसीआरपी, बेलिंगकैट, रिपोर्टर्स कलेक्टिव, आरएसएफ, और अन्य) जुड़े हुए हैं। ये गठजोड़ आकस्मिक नहीं है। नेटवर्क के इस जाल को अमेरिकी विदेश विभाग, एनईडी (सीआईए की सत्ता परिवर्तन कराने वाली कुख्यात शाखा), सोरोस की ओपन सोसाइटी और यूरोपीय सरकारी एजेंसियों का समर्थन है। इन चैनल्स के माध्यम से पश्चिमी खुफिया और राजनीतिक कर्ताधर्ता भारत की मीडिया और शोध विमर्श को तय करते हैं। साथ ही उन लोगों को आर्थिक मदद देते हैं, जो पश्चिमी नीतिगत प्राथमिकताओं और भारत की विफलता की बात करता है।

गठजोड़ बनाता फीडबैक लूप: विदेशी फंड पर निर्भर भारतीय शोधकर्ता भारत के लोकतंत्र, मीडिया और सांप्रदायिक स्थिति को लेकर खौफनाक रिपोर्ट तैयार करते हैं। फिर इन्हें वैश्विक स्तर पर मीडिया के माध्यम से फैलाया जाता है। इसको भारत में ‘कुछ लोग’ सही ठहराते हैं, जिनका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अर्बन नक्सल, अलगाववादियों और कट्टरपंथियों से संपर्क होता है।

बौद्धिक रणनीति: जातिगत सवाल, अल्पसंख्यक उत्पीड़न, हिंदू-विरोध और राष्ट्र-विरोध

सीएसडीएस के शोध, प्रकाशन और ‘सर्वेक्षण’ का उद्देश्य जाति, अल्पसंख्यक उत्पीड़न, हिंदू-विरोध और राष्ट्र-विरोध है। इसके इर्द-गिर्द इनकी रणनीतिक आगे बढ़ती है।

हिंदुओं का विभाजन: सीएसडीएस का शोध हिंदू विभाजन को और बढ़ाने की कोशिश करता है, खासकर दलितों, आदिवासियों और अन्य पिछड़े वर्गों को उनकी हिंदू पहचान से अलग करके, और राजनीतिक परिणामों को जातिगत उत्पीड़न और ‘बहुसंख्यक अत्याचार’ के चश्मे से देखकर। इस विभाजन को बनाए रखना और बढ़ाना ‘भारत-विरोधियों’ की रणनीति का अहम हिस्सा है।

दलित-मुस्लिम नरेटिव को प्रोत्साहित करना– सीएसडीएस बार-बार दलित और मुस्लिमों को एक साथ जोड़ने का प्रयास करता है। उसका दावा है कि दलित और मुस्लिम भारत और बहुसंख्यक हिंदुओं द्वारा पीड़ित हैं। इसलिए इनके बीच एकता ‘लोकतंत्र’ के लिए बेहद जरूरी है।

हिन्दुओं और भारत को विभत्स दिखाना- सीएसडीएस के कथित विद्वान, संबद्ध पत्रकार, आशीष नंदी- अनन्या वाजपेयी जैसे सहयोगी, साजिश के तहत हिंदुओं को फासीवादी, कट्टरपंथी और हिंसा फैलाने वाले के रूप में दिखाते हैं। ऐसा ये तब भी करते हैं, जब सबूत इन दावों के उलट होता है (उदाहरण के लिए, गोधरा 2002, दिल्ली हिंदू विरोधी दंगा 2020)। इनके शोध का इस्तेमाल भारतीय राष्ट्रवाद को अवैध ठहराने, बाहरी हस्तक्षेप को सही ठहराने और वैश्विक मीडिया में दुष्प्रचार के लिए किया जाता है।

भारतीय संप्रभुता को कमजोर करना: विदेशी फंडिंग वाला सीएसडीएस का शोध सत्ता विरोधी प्रदर्शन, आंदोलन और सोशल मीडिया पर ऐसे अभियानों का समर्थन करते हैं, जिससे देश की संप्रभुता और एकता कमजोर होती है। ये ऐसे तत्वों की बौद्धिक मदद भी करते हैं। देश में ऐसे बदलाव का समर्थन करते हैं, जिससे विदेशी हित साधा जा सके। ये बदलाव और नीतियाँ अक्सर लोकतांत्रिक निर्वाचित सरकार और बहुसंख्यक के खिलाफ होते हैं।

भारत विरोधी विदेशी संस्थानों के साथ गठजोड़

यह रिसर्च दर्शाता है कि सीएसडीएस का तंत्र न केवल वैचारिक रूप से भारत के खिलाफ है, बल्कि ऐसे संस्थाओं और व्यक्तियों को मदद करता है, जो इस विचार का समर्थन करते हैं और उसे संरक्षण देते हैं।

अमेरिकी डीप स्टेट के साथ जुड़ाव: सीएसडीएस के कई साझेदारों और आर्थिक मददगारों (एनईडी, आईडीआरसी, ओपन सोसाइटी, फोर्ड फाउंडेशन) की लैटिन अमेरिका, पूर्वी यूरोप और एशिया में सत्ता परिवर्तन अभियानों में सक्रिय रूप से जुड़े होने के प्रमाण मौजूद हैं।

खालिस्तान समर्थक, पाकिस्तान समर्थक, इस्लामवादी और वामपंथी समूहों से संबंध: आईडीआरसी से जुड़े लोग और मदद पाने वाले लोगों ने किसान विरोध प्रदर्शनों, सीएए, दिल्ली में हिन्दू विरोधी दंगों में हिस्सा लिया। सीएसडीएस या उसके सहयोगी गैर सरकारी संगठनों के अहम सदस्य नियमित रूप से अर्बन नक्सलियों, खालिस्तानी समर्थकों और भारत विरोधी लॉबी के साथ आंदोलनकारी समूहों में दिखाई देते रहे हैं।

चीन का प्रभाव: भारत विरोधी सक्रियता के लिए जाने जाने वाले कथित शिक्षाविदों और पत्रकारों (यहाँ तक ​​कि एक पूर्व पाकिस्तानी प्रधानमंत्री) की मेजबानी, वित्त पोषण या उनके साथ संबद्धता के माध्यम से, न सिर्फ पश्चिमी देशों से बल्कि चीन से वित्त पोषण होने वाले चैनल (बर्गग्रुएन इंस्टीट्यूट के माध्यम से) से संबंध इनकी तटस्थता के किसी भी दिखावे को और अधिक कमजोर कर देते हैं।

एक जैसा पैटर्न और मोटिवेशन

एक व्यवस्थित पैटर्न उभरता है: विदेशी संस्थाएँ और सरकारें, कथित भारतीय थिंक टैंकों और कार्यकर्ताओं के साथ सहयोग करती हैं। ये मिलकर भारत की सरकार, बहुसंख्यक समुदाय और राष्ट्र-निर्माण परियोजनाओं की आलोचना करते हैं। ये लोग संयुक्त रूप से वैश्विक स्तर पर नकारात्मक नैरेटिव को बढ़ावा देते हैं, ताकि भारत की नीतिगत दबाव डाल सकें। इसके अलावा आंतरिक सामाजिक विभाजन और राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने का प्रयास करते हैं।
रिसर्च में कहा गया है कि इस समन्वित अभियान का उद्देश्य भारत की संप्रभुता को नुकसान पहुँचाना, वैश्विक स्थिति को कमज़ोर करना और बुद्धिजीवियों, मीडिया और अन्य लोगों के माध्यम से सत्ता को प्रभावित करना है।
इसके अलावा, हिंदू विरोधी हिंसा, धर्मांतरण और भारतीय हितों को वैश्विक स्तर पर निशाना बनाने पर इन संगठनों की चुप्पी, जबकि किसी भी कथित या मनगढ़ंत अल्पसंख्यक मुद्दे पर ओवर एक्टिव होना, इनके पूर्वाग्रह को उजागर करता है।
This is the full spider web, or the mindmap of the network around CSDS. You can download the high resolution picture (6 MB size) of this mindmap by clicking here.
सीएसडीएस के इर्द-गिर्द फैले नेटवर्क का पूरा मकड़-जाल या माइंडमैप ऊपर दिया गया है। आप इस माइंडमैप का हाई रेजोल्यूशन चित्र (6 MB की फाइल है) यहाँ क्लिक करके डाउनलोड कर सकते हैं।
सीएसडीएस और इसके सहयोगी गैर-सरकारी संगठनों, मीडिया प्लेटफॉर्म और वित्तपोषकों का गठजोड़ भारत की संप्रभुता, सांस्कृतिक अखंडता और लोकतांत्रिक वैधता के लिए एक समन्वित वैचारिक चुनौती के रूप में काम करता है। विदेशी फंड व्यवस्थित रूप से अपने शोध, आउटरीच और सक्रियता को सरकारों और वैश्विक व्यवस्था परिवर्तन तथा सामाजिक इंजीनियरिंग में निवेश करने वाले अरबपति फाउंडेशनों से संचालित होते हैं। सीएसडीएस का केस स्टडी यह उजागर करता है कि कैसे “नागरिक समाज” और “शैक्षणिक” संस्थानों को लोकतांत्रिक राज्यों के खिलाफ नैरेटिव युद्ध के औजारों में बदला जा सकता है। भारत को अपनी स्वायत्तता और राष्ट्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए, ऐसे संगठनों के एजेंडे, वित्तीय स्रोतों और संबंधों की कड़ी जाँच, नियामक निगरानी और सार्वजनिक जवाबदेही के अधीन होना चाहिए।
रिसर्च टीम:
प्रमुख शोधकर्ता: नूपुर जे शर्मा
शोधकर्ता: आशीष नौटियाल, दिव्यांश तिवारी, प्रारब्ध राय, ध्रुव मिश्रा, रोहित कुमार पांडे, चंदन कुमार
                                                                                                                                      (साभार )

सोरोस के हाथ बिकाऊ विपक्ष वोट चोरी पर कर रहा उपद्रव; CSDS का ट्वीट, राहुल का वोट चोरी राग और विपक्षी नैरेटिव- क्या यह महज संयोग है! उठ रही है कार्रवाई की मांग


2014 में केंद्र में मोदी सरकार बनते ही सारा विपक्ष INDI गंठबंधन भारत विरोधी विदेशियों के हाथ बिकाऊ या कहें देशभक्त बन फिरने वाले हकीकत में गुलाम बन देश में उपद्रव कर जनता को गुमराह करते आ रहे हैं। पहले भी कई बार लिखा जा चुका है कि 
INDI गंठबंधन International भिखारी है। भारत विरोधियों से मिली भीख पर देश में उपद्रव करते रहते हैं। अब जब संजय कुमार ने गलत आंकड़े देकर इतने दिन संसद भंग करवाकर रोज कर करोड़ों रूपए बर्बाद कर उपद्रव करने के आरोप पर केंद्र सरकार ही नहीं चुनाव आयोग को सख्त कानूनी कार्यवाही करनी चाहिए। दूसरे, निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक को भारतीय का चोला ओढे इन जयचन्दों पर भी सख्ती से पेश आना चाहिए। वोट विश्लेषण में सिर्फ हिन्दुओं की जाति आधारित बखान किया जा जाता है लेकिन मुस्लिमों का नहीं कि अंसारी, शिया, सुन्नी, पठान, अहमदिया आदि अन्य मुस्लिम जातियों ने किस पार्टी को वोट दिया? यानि इन जयचन्दों को असली मकसद हिन्दुओं को ही जातियों में बाँटने की हिम्मत कर सकते हैं, लेकिन 
INDI गंठबंधन में किसी ने भी माँ का दूध नहीं पिया जो मुसलमानों का जाति आधारित विश्लेषण कर सके।  
      

 

 

चुनावी सर्वे और एग्जिट पोल के लिए चर्चित संस्था Centre for the Study of Developing Societies (CSDS- सीएसडीएस) एक बार फिर विवादों में है। मामला तब शुरू हुआ जब सीएसडीएस के प्रमुख संजय कुमार ने महाराष्ट्र चुनाव को लेकर चुनाव आयोग पर सवाल उठाते हुए एक ट्वीट किया, जिसे बाद में डिलीट कर दिया। लेकिन तब तक राहुल गांधी की कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने उसी ट्वीट को आधार बनाकर ‘वोट चोरी’ का नैरेटिव गढ़ दिया था। अब उसी नैरेटिव के आधार पर तमाम विपक्षी दल संसद से लेकर सड़क तक चुनाव आयोग के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी तो संसद से लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस और अब बिहार में वोटर अधिकार यात्रा तक चुनाव आयोग पर जमकर हमला बोल रहे हैं। राहुल चुनाव आयोग पर लगातार पक्षपाती रवैये का आरोप लगा रहे हैं। हाल ही में एक घंटे से ज्यादा चली प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने प्रेजेंटेशन के जरिए दावा किया कि बीजेपी के लिए वोट ट्रांसफर कराए गए। आयोग पर वोट चोरी का आरोप लगाते हुए उन्होंने यहां तक कहा कि उनकी सरकार बनने पर आयोग से जुड़े लोगों से निपट लिया जाएगा।

दरअसल में सीएसडीएस ने कुछ दिन पहले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट डाल चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए थे। यह ट्वीट कुछ ही घंटों में वायरल हो गया। कांग्रेस और आप समेत कई विपक्षी नेताओं ने इस पोस्ट को जमकर शेयर किया और कहा कि “ईवीएम से वोट चुराए गए हैं”। लेकिन हैरानी की बात ये रही कि जब बवाल बढ़ा, तो संजय कुमार ने चुपचाप वह ट्वीट डिलीट कर दिया। सवाल उठता है अगर ट्वीट में दम था तो हटाया क्यों गया? और अगर वह तथ्यहीन था, तो फिर उसे जारी ही क्यों किया था? क्या संजय कुमार ने वो ट्वीट कांग्रेस को राजनीतिक फायदा पहुंचाने के लिए पोस्ट किया था?

अब जब सीएसडीएस प्रमुख ने ट्वीट डिलीट कर दिया है, तब लोग सोशल मीडिया पर उनपर कांग्रेस के साथ राजनीतिक मिलीभगत कर देश को अराजकता में झोंकने का आरोप लगा रहे हैं। सोशल मीडिया पर कई लोग कह रहे हैं कि यह सब एक सोची-समझी रणनीति थी। पहले CSDS की ‘रिसर्च’ के नाम पर नैरेटिव गढ़ो, फिर विपक्ष के जरिए उसे विस्तार दो। सोशल मीडिया पर संजय कुमार को जमकर लताड़ लग रही है। लोग सरकार से सीएसडीएस के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

इस पूरे विवाद पर बीजेपी आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने सीधा हमला करते हुए कहा कि सीएसडीएस एक शोध संस्थान नहीं, बल्कि एजेंडा चलाने वाली संस्था है, जिसका मकसद समाज में जातीय दरारें फैलाकर राजनीतिक लाभ पहुंचाना है। सीएसडीएस का पूरा ध्यान हिंदू समाज की जातियों को बांटकर ओबीसी, दलित, सवर्ण जैसे वर्गों के वोट पैटर्न को उजागर करने पर रहता है, जबकि मुस्लिम समाज की भीतरी जातीय संरचना पर यह संस्था संपूर्ण चुप्पी साध लेती है।

उन्होंने आरोप लगाया कि CSDS को वर्षों से फोर्ड फाउंडेशन, आईडीआरसी और अन्य विदेशी एजेंसियों से फंडिंग मिलती रही है, जिनका इतिहास भारत में सामाजिक विघटन को बढ़ावा देने से जुड़ा रहा है। इसके अलावा, उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि सीएसडीएस के सर्वे वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित नहीं होते, फिर भी इन्हें “डेटा एनालिसिस” बताकर बड़े-बड़े मीडिया हाउसेज में छापा जाता है। बीते कुछ वर्षों में कई बार ऐसा हुआ है कि सीएसडीएस द्वारा चुनाव पूर्व या बाद में जारी किए गए अनुमान और विश्लेषण हकीकत से कोसों दूर निकले। लेकिन हर बार गलती मानने की बजाय यह कहा गया कि “राजनीतिक हवा आखिरी वक्त पर बदल गई।”

यह सिर्फ अनुमान की गलती नहीं है, बल्कि एक सुनियोजित एजेंडा है। “नतीजे जब कांग्रेस के पक्ष में हों, तो प्रचार करो; जब ना हों, तो ईवीएम और आयोग पर शक पैदा करो।”

अवलोकन करें:-

Fake Data देने वाले ने मांगी माफ़ी, राहुल कब मांगेगे? जो कल कह रहे थे- चुनाव आयोग ने पैर पर मारी कुल्हाड़
Fake Data देने वाले ने मांगी माफ़ी, राहुल कब मांगेगे? जो कल कह रहे थे- चुनाव आयोग ने पैर पर मारी कुल्हाड़
 

सीएसडीएस के पूर्व सहयोगी योगेंद्र यादव और वर्तमान प्रमुख संजय कुमार दोनों पर कांग्रेस के प्रति झुकाव के आरोप लग चुके हैं। अब जब CSDS का ट्वीट खुद विपक्षी रणनीति का हिस्सा बनता दिख रहा है, तो देश को यह जानने का हक है कि क्या ‘शोध’ की आड़ में समाज को तोड़ने का खेल खेला जा रहा है?

मुख्यमंत्री आवास के बाद AAP के दफ्तर में गुंडागर्दी : ‘टाइम्स नाउ’ के पत्रकारों से बदसलूकी, पीटा, धक्का दिया, कैमरे का स्क्रीन तोडा, गालियाँ बकी… 7 करोड़ रूपए की विदेशी फंडिंग पर पूछा था सवाल

                                       AAP के दफ्तर में 'टाइम्स नाउ' के पत्रकारों से बदसलूकी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बार-बार तानाशाह कहने वाला विपक्ष एक बार फिर से बेनकाब हो गया है। दिल्ली की सत्ताधारी ‘आम आदमी पार्टी’ (AAP) के दफ्तर में मीडिया संस्थान ‘टाइम्स नाउ’ के पत्रकारों के साथ मारपीट की गई है। ‘टाइम्स नाउ’ के क्रू में शामिल मीडियाकर्मियों को न सिर्फ थप्पड़ जड़े गए, बल्कि उनके साथ धक्कामुक्की भी की गई। असल में आकांक्षा खजुरिया AAP को लेकर ED (प्रवर्तन निदेशालय) की रिपोर्ट को लेकर कवर करने गई थीं।
अब चर्चा है कि 'क्या मुख्यमंत्री आवास के बाद पार्टी ऑफिस को गुंडागर्दी का अड्डा बनाया जा रहा है?' केजरीवाल कब तक सफेदपोशी गुंडागर्दी करते रहेंगे? क्या सुप्रीम कोर्ट ने इसी गुंडागर्दी के लिए केजरीवाल को interim bail दी है? इस गंभीर मुद्दे INDI गठबंधन को खुलकर आना चाहिए। स्वाति मालीवाल कांड से केजरीवाल ने अपनी पार्टी और परिवार को दुर्गति के दरवाजे पर पहुंचा दिया है, क्या INDI गठबंधन केजरीवाल का हाथ थाम अपनी पार्टियों का भी यही हाल करना चाहते हैं। चुनाव आएंगे जायेंगे, कोई जीतेगा कोई हारेगा, लेकिन क्या मोदी विरोध में INDI गठबंधन अराजक पार्टी का साथ देते रहेंगे? इतना तो तय है मतदान समाप्त होते ही, सब अपना-अपना रास्ता नाप लेंगे, चुनाव परिणाम तक कोई नहीं रुकने वाला।   

AAP के ‘चीफ मीडिया कोऑर्डिनेटर’ विकास कुमार ने इस करतूत को अंजाम दिया है। असल में ये पत्रकार विदेशी फंडिंग के मामले में सवाल पूछ रहे थे, जो AAP नेताओं को पसंद नहीं आया। पत्रकारों को गालियाँ भी बकी गईं। साथ ही कैमरा के स्क्रीन को तोड़ डाला गया। ये सब कैमरे में कैद हो गया। बता दें कि AAP को 2014-22 के बीच 7.08 करोड़ रुपए की विदेशी फंडिंग मिली है। ED ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को इस संबंध में रिपोर्ट भी भेज दी है।

 इस रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि अरविंद केजरीवाल की पार्टी ने FCRA (विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम) का उल्लंघन किया है। साथ ही लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1951 का भी उल्लंघन किया गया है। ‘टाइम्स नाउ’ की नाविका कुमार ने बताया कि दूसरी बार ऐसा हुआ है जब उनके चैनल के पत्रकारों के साथ ऐसा व्यवहार हुआ है। उन्होंने बताया कि ‘शीशमहल’ घोटाले को उजागर करने के बाद उनकी पत्रकार भावना किशोर को जेल में बंद कर दिया गया था।

अरविंद केजरीवाल ने अपने आधिकारिक आवास को चमकाने में सरकारी खजाने से 45 करोड़ रुपए खर्च किए थे, वो भी कोरोना महामारी के भीषण दौर में। नाविका कुमार ने अरविंद केजरीवाल से कहा कि वो अपनी पार्टी के गुंडों को नियंत्रण में रखें। उन्होंने कहा कि किसी भी रिपोर्टर या वीडियो जर्नलिस्ट को छुआ जाएगा तो दिल्ली की पूरी जनता के गुस्सा का सामना AAP को करना पड़ेगा। बता दें कि AAP को कनाडा, सऊदी अरब और ऑस्ट्रेलिया तक से फंडिंग आई है।

स्वाति मालीवाल कांड के पीछे घोटाले खोलने की धमकी तो नहीं? कनाडा, अमेरिका, अरब… AAP ने करोड़ों का लिया चंदा, लेकिन देने वालों की पहचान छिपा ली: ED का खुलासा, खालिस्तानी आतंकी पन्नू ने भी फंड देने का किया था दावा

जिस तरह प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा आम आदमी पार्टी द्वारा देश विरोधियों से चंदा वसूली का खुलासा कर रही है, उसने लोगों को स्वाति मालीवाल कांड को भी दूसरी नज़र से देखना शुरू कर दिया है। अपने वकील अभिषेक मनु सिंघवी को राज्य सभा पहुँचाने के लिए अरविन्द केजरीवाल द्वारा वर्षों से हमज़ुल्फ़ रही स्वाति मालीवाल द्वारा इस्तीफा देने का जोर देने पर संभावनाएं व्यक्त की जा रही है कि जबरदस्ती इस्तीफा मांगने पर मालीवाल ने घोटालों का राज खोलने की धमकी देने पर तो कही ये कांड तो नहीं हुआ? शायद इस बीच कुछ तीखी नोकचोक होने पर नौबत पिटाई तक पहुँच गयी हो। इस शंका में कितनी सच्चाई है यह तो गंभीर और गहन जाँच होने पर ही खुलासा हो सकता है। 

इस दौरान यह भी नोट करना जरुरी है कि मालीवाल से अधिक आम आदमी पार्टी की तरफ से ही बयान आ रहे हैं। मालीवाल को बीजेपी एजेंट बताना और बीजेपी की साज़िश बताना इस बात की ओर स्पष्ट संकेत कर रही है। अगर दिल्ली पुलिस बिभव कुमार और मालीवाल दोनों से सख्ती से पूछे कि इतनी भयंकर मारपीट की नौबत क्यों आयी? केजरीवाल के राजदार दोनों ही हैं। जिस दिन घोटालों की कलाई खुल गयी, केजरीवाल तो क्या केजरीवाल परिवार और पार्टी के पता नहीं तथाकथित नेताओं को जेल जाना पड़ सकता है। केजरीवाल की गिरफ़्तारी से जितना विदेशों में बैठे भारत विरोधी बेचैन है, भारतीय नेता नहीं। लोक सभा चुनाव संपन्न होने पर कितने मोदी विरोधी पार्टियां केजरीवाल पार्टी से किनारा कर सकती हैं। कांग्रेस ने तो शुरू कर भी दिया है। रोष विशेषकर इस बात पर हो रहा है कि मालीवाल अपनी माहवारी होने पर नहीं मारने को बोल रही थी, उसके बावजूद पेट के नीचे लातें मारना। घोटालों का राज खोलने की धमकी के पार्टी के बर्बाद होने के डर ने मामले को भयंकर रंग देने को मजबूर कर दिया हो। शंका का समाधान तो गंभीर और गहन जाँच ही कर सकती है।    

एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि आम आदमी पार्टी (AAP) ने विदेश से लिए गए करोड़ों के फंड के स्रोत की पहचान छुपाई हैं। प्रवर्तन निदेशालय (ED) की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि AAP को कनाडा, अमेरिका, न्यूजीलैंड और मध्यपूर्व के देशों से यह पैसा मिला है। विदेशी फंडिंग को AAP तक पहुँचाने के लिए कई गड़बड़ियाँ की गईं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, AAP को 2014 से 2022 के बीच ₹7.08 करोड़ की विदेशी फंडिंग मिली है। यह पैसा विदेशी फंडिंग कानून (FCRA) के नियमों का उल्लंघन करके ली गई है। ED ने इस फंडिंग को लेकर एक रिपोर्ट तैयार की है, इसे गृह मंत्रालय को भेजा गया है। इसके कुछ हिस्से बाहर आए हैं।

रिपोर्ट में बताया गया है कि AAP को यह फंडिंग देने वाले अलग-अलग लोगों ने एक ही पासपोर्ट नम्बर, एक ही मोबाइल नम्बर और एक ही क्रेडिट कार्ड की जानकारियाँ देते हुए यह धनराशि दी। यह सारी फंडिंग कनाडा, न्यूजीलैंड, USA और मध्य पूर्व के देशों से आई है।

इस अवैध फंडिंग के एक उदाहरण को भी रिपोर्ट में बताया गया है। विदेशों में रहने वाले 155 लोगों ने 55 पासपोर्ट का इस्तेमाल करके 1.04 करोड़ की धनराशि AAP को दी। ऐसा 404 मौकों पर किया गया। इस रिपोर्ट में यह भी आरोप लगाया गया कि AAP नेता दुर्गेश पाठक ने कनाडा में 2016 में AAP के लिए इकट्ठा किए गए फंड को अपने इस्तेमाल में लिया।

ED ने इस पूरी गड़बड़ी के सबूत में AAP पदाधिकारियों के बीच ईमेल में हुई बातचीत का भी ब्यौरा दिया है। यह बातचीत कुमार विश्वास, कपिल भारद्वाज, दुर्गेश पाठक और अनिकेत सक्सेना के बीच हुई। यह सभी तब AAP में महत्वपूर्ण पदों पर थे। इसके अलावा भी फंडिंग को लेकर कई खुलासे ED की इस रिपोर्ट में किए गए हैं।

आतंकी पन्नू भी कह चुका है AAP को फंडिंग की बात

खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू ने मार्च, 2024 में आरोप लगाया था कि भगवंत मान और केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी के लिए खालिस्तानियों से मोटी रकम ली है। पन्नू ने बताया था, “2014-2022 के बीच खालिस्तानियों ने AAP की सरकार बनाने के लिए 16 मिलियन डॉलर (₹133 करोड़) की मदद दी।”

देश के खिलाफ विद्रोह करने वालों को ऐसे छोड़ दिया जाता है ; देश के विरुद्ध साज़िशकर्ताओं पर मीलॉर्ड कब गंभीर होंगे?

सुभाष चन्द्र

मई 16 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने न्यायप्राणी पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर सुप्रीम कोर्ट पर भी प्रहार कर दिया, जिससे सुप्रीम कोर्ट में हड़कंप मचना स्वाभाविक है। जिस आधार पर अरविन्द केजरीवाल को interim bail दी, तिहाड़ में बंद अन्य मुख्यमंत्रियों/नेताओं को क्यों नहीं दी? अगर चुनाव केजरीवाल के लिए प्रमुख है अन्यों के लिए क्यों नहीं?

सुप्रीम कोर्ट ने कल(मई 15) Newsclick के editor प्रबीर पुरकायस्थ की UAPA में गिरफ्तारी अवैध कहते हुए रिहा कर दिया। जस्टिस बी आर गवई और संदीप मेहता ने उसका कारण बताया कि उसे गिरफ़्तारी के कारण लिख कर नहीं दिए गए। 

यानी 2021 जुलाई से पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने उसकी गिरफ़्तारी पर रोक लगाई थी और बड़ी मुश्किल से दिल्ली पुलिस के हाथ लगा था ये चीन पैसा लेकर भारत की Stability & Integrity के साथ खिलवाड़ करने वाला और उसे छोड़ कर जैसे उसके देश के खिलाफ सभी कामों को भी जैसे ठीक बता दिया। मीलॉर्ड ने कहा कि UAPA में गिरफ़्तारी के कारण बताना जरूरी है और नहीं बताए तो गिरफ़्तारी अवैध है।

लेखक 
चर्चित यूटूबर 
पुरकायस्थ पर चीन से 75 करोड़ रुपए मंगवाने का गंभीर आरोप है।

इसके अलावा सबसे खतरनाक आरोप इन पर था कि इसने उत्तर भारत के borders का ऐसा नक्शा बनाया जिसमें अरुणाचल प्रदेश और J&K को भारत का हिस्सा नहीं दिखाया लेकिन मीलॉर्ड ने इस पर कुछ ध्यान नहीं दिया और तकनीकी आधार पर रिहा कर दिया।

पुरकायस्थ 3 अक्टूबर, 2023 को गिरफ्तार हुआ था। तब मजिस्ट्रेट को इसे 7 दिन की रिमांड पर भेजते हुए यह देखना चाहिए था कि Grounds of Arrest बताये गए हैं या नहीं। तुषार मेहता ने हाई कोर्ट में कहा था कि UAPA guidelines में अरेस्ट के ग्राउंड के written copy देना जरूरी नहीं है वैसे मजिस्ट्रेट के सामने grounds बता दिए गए थे।

पुरकायस्था ने हाई कोर्ट में अपील की थी लेकिन हाई कोर्ट ने 10 अक्टूबर को उसकी अपील खारिज कर दी यह कहते हुए कि उसमे कोई Merit नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने उसकी रिहाई के लिए पंकज बंसल के केस का जिक्र किया है लेकिन वह केस UAPA का नहीं था बल्कि PMLA का था और दोनों कानून अलग है। वैसे भी वह फैसला दिसंबर, 2023 का था जबकि पुरकायस्था गिरफ्तार अक्टूबर, 23 में हुआ। उसको backdate में कैसे apply कर सकते हैं।

ये तो मतलब साफ़ हो गया कि सुप्रीम कोर्ट हर किसी को छोड़ने में आगे रहेगा चाहे वह देश का दुश्मन ही क्यों न हो। दूसरे शब्दों में जो भी मोदी सरकार के खिलाफ होगा, अदालत उसके साथ होगी जैसे केजरीवाल के साथ थी जिसे अनैतिक रूप से बेल दे दी गई। आज(मई 16) अमित शाह से सुन ही लिया न कि अदालत द्वारा उसे special Treatment दिया गया। एक गृह मंत्री इससे ज्यादा और सख्त नहीं कह सकता अदालत के आचरण पर। 

मजिस्ट्रेट ने परवाह नहीं की और न ही हाई कोर्ट ने परवाह नहीं की। आपको चिंता थी तो पुलिस को हिदायत दे सकते थे कि 2 दिन में उसको लिखित में गिरफ़्तारी के आधार बताये जाएं मगर आपने तो उसे छोड़ना ही बेहतर समझा।

आप उसे कह रहे हैं कि सबूतों के साथ छेड़छाड़ न करना। आपने कह दिया और उसने मान लिया, ऐसा होगा क्या? वो सारे पैसे और ख़ुफ़िया  जानकारी सात तालों में बंद कर छुपा कर चीन से मंगवा लाया और उससे आप उम्मीद कर रहे हो कि सबूतों से छेड़छाड़ न करे।

पुरकायस्थ तो मौका मिलते ही सबूतों को नष्ट कर देगा। इतना गंभीर केस सुप्रीम कोर्ट ने मिट्टी मिला दिया जिसका मतलब यह भी निकलता है कि ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट को इशारा है। सोच कर फैसले करना हम बैठे हैं ऊपर।