Showing posts with label #democracy. Show all posts
Showing posts with label #democracy. Show all posts

विदेश में राहुल गाँधी का भारत विरोधी अभियान जारी, अब कोलंबिया में देश के लोकतंत्र को बताया खतरा: अमेरिका से बहरीन तक फैला चुके हैं प्रोपेगेंडा

                                      कोलंबिया में राहुल गाँधी  (साभार- X@rahulgandhi)

विदेशी धरती से नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने एक बार फिर देश को शर्मसार किया है। उन्होंने देश के लोकतंत्र पर सवाल उठाए हैं और ‘भारत विरोधी’ बातें की हैं। अमेरिका, यूके, बहरीन, मलेशिया जहाँ-जहाँ राहुल गाँधी गए, वहीँ से मोदी सरकार के खिलाफ बोलते-बोलते ‘देश विरोधी’ बयान भी दे दिया।

देश में परिवारवाद का पर्याय बने राहुल गाँधी जब लोकतंत्र की बात करते हैं, तो जनता को नेहरू, इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी, सत्ता के पीछे सत्तासीन सोनिया गाँधी और अब प्रियंका गाँधी का चेहरा भी याद आता है। आपातकाल का वो दौर भी याद आता है, जब लोकतंत्र को कुचला गया था।

राहुल जी जिसके घर शीशे के होते हैं दूसरों के घर पत्थर नहीं फेंकते। जिस पार्टी में ही लोकतंत्र नहीं राहुल किस मुंह से भारत में लोकतंत्र को खतरा बता रहे हैं? जब से सोनिया गाँधी को अध्यक्ष बनाने के लिए दलित अध्यक्ष सीताराम केसरी को पार्टी ऑफिस से बाहर पटक दिया गया था तब से आज स्वतंत्र अध्यक्ष नहीं मिला। घूम-फिरकर अध्यक्ष पद परिवार के हाथ रहा हो तो कांग्रेस में लोकतंत्र है? जनता को पागल बनाने मल्लिकार्जुन खड़के को अध्यक्ष तो बना दिया लेकिन गाँधी परिवार की इजाजत के बिना कुछ कर नहीं सकते।       

दिलचस्प बात ये है कि लैटिन अमेरिकी देश कोलंबिया में कभी लोकतंत्र अपनी मजबूत जड़ें जमा ही नहीं पाया। यहां कभी स्थिर सरकार नहीं रही। दुनिया भर में ड्रग्स सप्लाई का केन्द्र रहा ये देश, वहाँ से लोकतंत्र की दुहाई दी जा रही है।

राहुल के बयान पर बीजेपी ने कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की। भाजपा ने कहा कि राहुल विदेश में बैठकर भारत को बदनाम कर रहे हैं, उनका रिमोट कंट्रोल विदेशियों के हाथों में है। वे मोदी-भाजपा का विरोध करते-करते भारत और यहाँ की संस्थाओं के विरोध में उतर आए हैं।

बीजेपी प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने कहा, “राहुल गाँधी कह रहे हैं कि लोकतांत्रिक संरचना पर हमला हो रहा है। हमला कौन कर रहा है। परिवारतंत्र ही तो संविधान तंत्र पर हमला करता आ रहा है। 50 साल पहले इंदिरा गाँधी और अब पोता राहुल गाँधी संविधान को परिवार से नीचे रख रहे हैं।”

क्या कहा राहुल गाँधी ने कोलंबिया में

कोलंबिया के ईआईए विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में बोलते हुए, राहुल गाँधी ने कहा कि ‘लोकतंत्र पर हमला’ भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा है।

उन्होंने कहा, “सबसे बड़ा खतरा भारत में हो रहे लोकतंत्र पर हमले का है। भारत वास्तव में अपने सभी लोगों के बीच संवाद का एक केंद्र है… विभिन्न परंपराओं, धर्मों, विचारों को जगह की ज़रूरत होती है। और उस जगह को बनाने का सबसे अच्छा तरीका लोकतांत्रिक व्यवस्था है। वर्तमान में, लोकतांत्रिक व्यवस्था पर व्यापक हमला हो रहा है। इसलिए यह एक खतरा है।”

उन्होंने भाजपा पर भारत के लोकतांत्रिक ताने-बाने को कमजोर करने का आरोप लगाया। गुरुवार (2 अक्टूबर 2025) को एक संवाद कार्यक्रम में बोलते हुए, राहुल गाँधी ने कहा कि वह भारत की सांस्कृतिक विविधता, तकनीकी मजबूती और स्वास्थ्य सेवा प्रणाली के कारण ‘भारत को लेकर बहुत आशावादी’ हैं। लेकिन देश ‘गंभीर खतरों’ का सामना कर रहा है।

चीन के साथ भी उन्होंने भारत की तुलना की और कहा, “हम चीन जैसा नहीं कर सकते, जो लोगों का दमन करता है और एक सत्तावादी व्यवस्था चलाता है। हमारी व्यवस्था इसे स्वीकार नहीं करेगी।”

नेता विपक्ष ने 2016 के नोटबंदी से लेकर 2025 तक के सरकार की तमाम योजनाओं को विफल करार दिया। उन्होंने कहा कि सरकार ने नोटबंदी लागू की इस सोच के साथ की नकदी खत्म हो जाएगी, लेकिन एक नीति के तौर पर ये विफल रही। सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए कहा, “भारत में अब बहुत ही केंद्रीकृत स्तर पर भ्रष्टाचार व्याप्त है। तीन-चार कंपनियां पूरी अर्थव्यवस्था पर कब्जा कर रही हैं, जिनका प्रधानमंत्री से सीधा संबंध है। भारत में (अब) भ्रष्टाचार व्याप्त है।”

राहुल गाँधी ने कब-कब बताया ‘खतरे में है लोकतंत्र’

यह पहली बार नहीं है जब कांग्रेस नेता ने विदेशी धरती से पीएम मोदी के नेतृत्व वाली सरकार पर हमला किया हो। 2014 के बाद जब भी मौका मिलता है, राहुल गाँधी भारत के खिलाफ जहर उगलते नजर आते हैं। बार-बार विदेशी मंचों का इस्तेमाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए करते हैं।

2024 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में, राहुल गाँधी ने कहा था कि भारत में ‘लोकतंत्र पर हमले’ हो रहे हैं। लगातार तीन लोकसभा चुनाव में धूल चाटने के बाद राहुल गाँधी को कभी ‘वोट चोरी’ नजर आती है तो कभी ‘लोकतंत्र पर हमला’ नजर आता है। देश के बाहर झूठे आरोप लगाकर देश को बदनाम करने की कोशिश का वह कोई मौका हाथ से जाने नहीं देते।

लंदन में एक कार्यक्रम में मई 2022 में उन्होंने दावा किया था कि ‘भारत की आत्मा पर हमला हो रहा है’। सीबीआई और ईडी जैसी संस्थाओं का दुरुपयोग करने का आरोप लगाया। भारत की तुलना पाकिस्तान से करते हुए कहा कि ‘डीप स्टेट’ भारत को धीरे- धीरे खा रहा है।

यूके और जर्मनी की यात्रा के दौरान राहुल गाँधी ने 2018 में, पीएम मोदी की तुलना तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से की थी। राहुल ने कहा कि देश में व्याप्त ‘बेरोजगारी’ पर लोगों के गुस्सा था, इसका राजनीतिक फायदा उठाया गया। उन्होंने पीए मोदी को ‘देशद्रोही’ तक कह डाला।

2018 में ही मलेशिया के दौरे के दौरान नोटबंदी की प्रक्रिया का मजाक उड़ाते हुए कहा था कि अगर वह प्रधानमंत्री होते, तो इसे ‘कूड़ेदान में फेंक देते’। सिंगापुर में उन्होंने ‘डराने-धमकाने’ के साथ-साथ मोदी सरकार पर ‘विभाजनकारी राजनीति’ करने का आरोप लगाया।

कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद 2018 में बहरीन पहुँचे राहुल गाँधी ने एनआरआई को संबोधित करते हुए मोदी सरकार पर ‘समुदायों के बीच भय और घृणा’ फैलाने का आरोप लगाया।

2017 में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के एक समारोह में राहुल गाँधी ने ‘अहिंसा के विचार पर हमला’ होने की बात कही थी। साथ ही प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली सरकार पर केवल देश की शीर्ष 100 कंपनियों पर ध्यान देने का आरोप लगाया।

अमेरिका से लेकर लंदन तक और कोलंबिया से लेकर मलेशिया तक जब भी राहुल गाँधी को मौका मिला उन्होंने भारत पर आरोप लगाए। देश में संविधान की प्रति हाथ में लेकर रैली करने वाले राहुल गाँधी संवैधानिक संस्थानों पर आरोप लगाने से नहीं चूकते। कोलंबिया में भी उन्होंने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बोलते हुए सत्ता के विकेन्द्रीकरण को भ्रष्टाचार की वजह बता दिया।

भारत के लोकतंत्र की मिसाल पूरी दुनिया देती है, लेकिन राहुल गाँधी को भारत का लोकतंत्र खतरे में नजर आता है। संविधान के अंतर्गत उन्हें नेता प्रतिपक्ष का पद मिला है। उनकी सुरक्षा से लेकर गाड़ी- बंगले हर चीज लोकतांत्रिक ढाँचे के तहत मिले अधिकार की वजह से हैंं। सरकार इन पर करोड़ों रुपए खर्च करती है, लेकिन उन्हें लोकतंत्र खतरे में नजर आता है।

अवलोकन करें:-

क्या LoP राहुल गाँधी लोकतंत्र का विभीषण है? कुत्तों को बोलने की आज़ादी चाहिए, चाहे देश में देश के खि
सुभाष चन्द्र अभी
 

राहुल गाँधी की भाषा पाकिस्तान को पसंद आती है। वहाँ की मीडिया की राहुल गाँधी चहेते चेहरे हैं और उनके बयान ‘भारत विरोध’ को दिखाने के काम आते हैं। विदेश जाकर भारत विरोधी बयान देकर भारत के लोकतांत्रिक ताने- बाने को वे कमजोर कर रहे हैं, सरकार नहीं।

CSDS: भारतीय लोकतंत्र के खिलाफ साजिश और विदेशी फंडिंग का जाल – विस्तृत रिसर्च में खुलासा

                                     CSDS और विदेशी फंडिंग वाले NGO की साजिश का खुलासा
यह रिसर्च सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज (CSDS: Centre for the Study of Developing Societies) के इतिहास, विचार, फंडिंग इकोसिस्टम और विदेशी संस्थाओं के साथ सहयोग की जाँच करता है। विश्लेषण की वजह ये है कि विदेशी फंडिंग वाले एनजीओ के साथ भारत के कथित थिंक टैंक और मीडिया के बीच सीएसडीएस एक गठजोड़ बनाता है, जो वैचारिक रूप से भारत, खासकर बहुसंख्यक हिंदुओं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली लोकतांत्रिक सरकार के खिलाफ है। इस रिसर्च में ऐसे कई रहस्योद्घाटन हुए हैं, जिससे पता चलता है कि भारत के राजनीतिक और सामाजिक विमर्श को प्रभावित करने, भारत के लोकतंत्र में विदेशी हस्तक्षेप को बढ़ावा देने और विदेशी शक्तियों के इशारे पर भारत की संप्रभुता को कमजोर करने की कोशिश की गई है। सीएसडीएस और उसके मददगारों ने कैसे दूसरे देशों की विदेश नीति के एजेंडे को आगे बढ़ाने की कोशिश की है, इसका भी पता चलता है।

CSDS की उत्पत्ति और विचार

सीएसडीएस की स्थापना 1963 में रजनी कोठारी ने की थी। कोठारी के क्रियाकलाप हिन्दू समाज को लेकर पूर्वाग्रह से ग्रसित थे। वह देश की धर्मनिरपेक्षता, जातिवाद और बहुसंख्यक विरोधी सोच का व्यक्ति रहा है। यह शोधपत्र सीएसडीएस की जड़ों को एशिया फाउंडेशन जैसी प्रायोजित विदेशी संस्थाओं से जोड़ता है, जो सीआईए का एक मुखौटा है। इससे साफ होता है कि संस्थान की स्थापना के पीछे ‘बाहरी प्रभाव’ था। सीएसडीएस के नेतृत्व में दशकों से ऐसे कार्यों को बढ़ावा मिला, जो भारत के बहुसंख्यक समुदाय को टारगेट करती है। अल्पसंख्यकों के झूठे उत्पीड़न की बात करती है और भारत की संप्रभुता और एकता को कमजोर करने वालों को ‘वैचारिक सोच’ प्रदान करती है।

विदेशी अनुदान का फैला जाल: नकदी, सामंजस्य और सोच

सीएसडीएस का परिचालन और अनुसंधान बजट न केवल भारत सरकार के अनुदानों (मुख्य रूप से इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च, ICSSR) के माध्यम से संचालित होता है, बल्कि विदेशी अनुदान पर इसकी निर्भरता भी लगातार बढ़ती जा रही है। 2016 से सीएसडीएस को FCRA के माध्यम से कम से कम ₹15.6 करोड़ प्राप्त हुए हैं। हालाँकि अधूरे खुलासों के कारण पूरी राशि का पता नहीं चल पाया है। अनुमान है कि ज्ञात स्रोतों से प्राप्त आमदनी से कहीं अधिक धनराशि इन्हें मिली है। सीएसडीएस की फंडिंग के मुख्य स्रोतों की बात करें तो वो निम्नलिखित हैं:

कोनराड एडेनॉयर स्टिफ्टंग (KAS: Konrad Adenauer Stiftung): जर्मन सरकार द्वारा फंडेड ये फाउंडेशन, सीधे तौर पर सत्तारूढ़ क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (सीडीयू) से संबद्ध है। इस फाउंडेशन ने 2016 से 2.6 करोड़ रुपए से अधिक का दान दिया है। केएएस जर्मन विदेश नीति और पश्चिमी लोकतांत्रिक मूल्यों को आगे बढ़ाती है, जो अक्सर टारगेट वाले देशों की राजनीतिक को कमजोर करता है या इसे ‘सुधारने’ के नाम पर सत्ता परिवर्तन को हवा देता है।

अंतर्राष्ट्रीय विकास अनुसंधान केंद्र (IDRC: International Development Research Centre): आईडीआरसी कनाडा की एक क्राउन कॉपोरेशन है, जो पिछले 8 सालों से अपने थिंक टैंक के माध्यम से सीएसडीएस के सालाना बजट का एक तिहाई भाग प्रदान करता आ रहा है। आईडीआरसी कनाडाई विदेश नीति का एक हिस्सा है। ये अलगाववाद को बढ़ावा देता है। खालिस्तानी अलगाववादियों को कनाडा का खुला संरक्षण इसका उदाहरण है।

सीमेनपू फ़ाउंडेशन (Siemenpuu Foundation): फिनलैंड के विदेश मंत्रालय की आर्थिक मदद ये चल रहा यह फिनिश एनजीओ, सीएसडीएस और उसकी ब्रांचों (विशेषकर एसएडीईडी) को मदद करता है। सीमेनपू फाउंडेशन भारत में ‘आदिवासियों के समर्थन’ के आस-पास केंद्रित हैं, लेकिन उनके नेटवर्क और संवाद मंच नक्सल-समर्थित और हिंदू-विरोधी कथित बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं को ‘नजरिया’ प्रदान करते हैं। ये अक्सर भारत में उत्पीड़न और बेदखल जैसे मुद्दों को बढ़ावा देती है।

बर्गग्रुएन इंस्टीट्यूट (BI: Berggruen Institute): बीआई का भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी विचार इसकी पत्रिका “नोएमा” के माध्यम से प्रसारित होता है। इसमें भारत को सत्तावादी, सांप्रदायिक और पिछड़ा बताया जाता है और अक्सर अति-वैचारिक और तथ्यात्मक रूप से चुनिंदा लेखकों के लेख छापती है। इन लेखकों में भारत-विरोधी पश्चिमी लॉबी से जुड़े लेखक भी शामिल हैं।

फोर्ड फाउंडेशन, हेनरी लूस फाउंडेशन, ओमिडयार, ओपन सोसाइटी फाउंडेशन (Ford Foundation, Henry Luce Foundation, Omidyar, Open Society Foundations): ये अमेरिकी संस्थाएँ सत्ता परिवर्तन, समाज के कथित सशक्तिकरण और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान की राजनीति को बढ़ावा देने के लिए धन मुहैया कराती हैं। सीएसडीएस को सीधे या अपने सहयोगियों (जैसे “भारतीय मुस्लिम परियोजना”) के माध्यम से मदद करती है। ये लोग भारत और उसकी सरकार से पीड़ित होने के नेरेटिव को बढ़ावा देते हैं।

साइंसेज पीओ/एफएनएसपी (Sciences Po/FNSP): फ्रांस के प्रमुख राजनीति विज्ञान संस्थान ने, एफएनएसपी के माध्यम से, सीएसडीएस को पर्याप्त वित्तीय योगदान दिया है। इसकी फैकल्टी, खास कर क्रिस्टोफ़ जाफ़रलॉट, ने नियमित रूप से हिंदू विरोधी राजनीति और मोदी सरकार की आलोचना करते हुए शोध प्रकाशित किए हैं।

पश्चिमी मीडिया, ‘खोजी’ नेटवर्क और सत्ता-पलट तत्वों की मिलीभगत

 शोध में विस्तार से बताया गया है कि कैसे सीएसडीएस और उसका शोध/पॉलिसी इकोसिस्टम—लोकनीति, एसएडीईडी और संबद्ध शिक्षाविद के साथ पश्चिमी मीडिया और ‘खोजी पत्रकारिता’ नेटवर्क (जैसे जीआईजेएन, ओसीसीआरपी, बेलिंगकैट, रिपोर्टर्स कलेक्टिव, आरएसएफ, और अन्य) जुड़े हुए हैं। ये गठजोड़ आकस्मिक नहीं है। नेटवर्क के इस जाल को अमेरिकी विदेश विभाग, एनईडी (सीआईए की सत्ता परिवर्तन कराने वाली कुख्यात शाखा), सोरोस की ओपन सोसाइटी और यूरोपीय सरकारी एजेंसियों का समर्थन है। इन चैनल्स के माध्यम से पश्चिमी खुफिया और राजनीतिक कर्ताधर्ता भारत की मीडिया और शोध विमर्श को तय करते हैं। साथ ही उन लोगों को आर्थिक मदद देते हैं, जो पश्चिमी नीतिगत प्राथमिकताओं और भारत की विफलता की बात करता है।

गठजोड़ बनाता फीडबैक लूप: विदेशी फंड पर निर्भर भारतीय शोधकर्ता भारत के लोकतंत्र, मीडिया और सांप्रदायिक स्थिति को लेकर खौफनाक रिपोर्ट तैयार करते हैं। फिर इन्हें वैश्विक स्तर पर मीडिया के माध्यम से फैलाया जाता है। इसको भारत में ‘कुछ लोग’ सही ठहराते हैं, जिनका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अर्बन नक्सल, अलगाववादियों और कट्टरपंथियों से संपर्क होता है।

बौद्धिक रणनीति: जातिगत सवाल, अल्पसंख्यक उत्पीड़न, हिंदू-विरोध और राष्ट्र-विरोध

सीएसडीएस के शोध, प्रकाशन और ‘सर्वेक्षण’ का उद्देश्य जाति, अल्पसंख्यक उत्पीड़न, हिंदू-विरोध और राष्ट्र-विरोध है। इसके इर्द-गिर्द इनकी रणनीतिक आगे बढ़ती है।

हिंदुओं का विभाजन: सीएसडीएस का शोध हिंदू विभाजन को और बढ़ाने की कोशिश करता है, खासकर दलितों, आदिवासियों और अन्य पिछड़े वर्गों को उनकी हिंदू पहचान से अलग करके, और राजनीतिक परिणामों को जातिगत उत्पीड़न और ‘बहुसंख्यक अत्याचार’ के चश्मे से देखकर। इस विभाजन को बनाए रखना और बढ़ाना ‘भारत-विरोधियों’ की रणनीति का अहम हिस्सा है।

दलित-मुस्लिम नरेटिव को प्रोत्साहित करना– सीएसडीएस बार-बार दलित और मुस्लिमों को एक साथ जोड़ने का प्रयास करता है। उसका दावा है कि दलित और मुस्लिम भारत और बहुसंख्यक हिंदुओं द्वारा पीड़ित हैं। इसलिए इनके बीच एकता ‘लोकतंत्र’ के लिए बेहद जरूरी है।

हिन्दुओं और भारत को विभत्स दिखाना- सीएसडीएस के कथित विद्वान, संबद्ध पत्रकार, आशीष नंदी- अनन्या वाजपेयी जैसे सहयोगी, साजिश के तहत हिंदुओं को फासीवादी, कट्टरपंथी और हिंसा फैलाने वाले के रूप में दिखाते हैं। ऐसा ये तब भी करते हैं, जब सबूत इन दावों के उलट होता है (उदाहरण के लिए, गोधरा 2002, दिल्ली हिंदू विरोधी दंगा 2020)। इनके शोध का इस्तेमाल भारतीय राष्ट्रवाद को अवैध ठहराने, बाहरी हस्तक्षेप को सही ठहराने और वैश्विक मीडिया में दुष्प्रचार के लिए किया जाता है।

भारतीय संप्रभुता को कमजोर करना: विदेशी फंडिंग वाला सीएसडीएस का शोध सत्ता विरोधी प्रदर्शन, आंदोलन और सोशल मीडिया पर ऐसे अभियानों का समर्थन करते हैं, जिससे देश की संप्रभुता और एकता कमजोर होती है। ये ऐसे तत्वों की बौद्धिक मदद भी करते हैं। देश में ऐसे बदलाव का समर्थन करते हैं, जिससे विदेशी हित साधा जा सके। ये बदलाव और नीतियाँ अक्सर लोकतांत्रिक निर्वाचित सरकार और बहुसंख्यक के खिलाफ होते हैं।

भारत विरोधी विदेशी संस्थानों के साथ गठजोड़

यह रिसर्च दर्शाता है कि सीएसडीएस का तंत्र न केवल वैचारिक रूप से भारत के खिलाफ है, बल्कि ऐसे संस्थाओं और व्यक्तियों को मदद करता है, जो इस विचार का समर्थन करते हैं और उसे संरक्षण देते हैं।

अमेरिकी डीप स्टेट के साथ जुड़ाव: सीएसडीएस के कई साझेदारों और आर्थिक मददगारों (एनईडी, आईडीआरसी, ओपन सोसाइटी, फोर्ड फाउंडेशन) की लैटिन अमेरिका, पूर्वी यूरोप और एशिया में सत्ता परिवर्तन अभियानों में सक्रिय रूप से जुड़े होने के प्रमाण मौजूद हैं।

खालिस्तान समर्थक, पाकिस्तान समर्थक, इस्लामवादी और वामपंथी समूहों से संबंध: आईडीआरसी से जुड़े लोग और मदद पाने वाले लोगों ने किसान विरोध प्रदर्शनों, सीएए, दिल्ली में हिन्दू विरोधी दंगों में हिस्सा लिया। सीएसडीएस या उसके सहयोगी गैर सरकारी संगठनों के अहम सदस्य नियमित रूप से अर्बन नक्सलियों, खालिस्तानी समर्थकों और भारत विरोधी लॉबी के साथ आंदोलनकारी समूहों में दिखाई देते रहे हैं।

चीन का प्रभाव: भारत विरोधी सक्रियता के लिए जाने जाने वाले कथित शिक्षाविदों और पत्रकारों (यहाँ तक ​​कि एक पूर्व पाकिस्तानी प्रधानमंत्री) की मेजबानी, वित्त पोषण या उनके साथ संबद्धता के माध्यम से, न सिर्फ पश्चिमी देशों से बल्कि चीन से वित्त पोषण होने वाले चैनल (बर्गग्रुएन इंस्टीट्यूट के माध्यम से) से संबंध इनकी तटस्थता के किसी भी दिखावे को और अधिक कमजोर कर देते हैं।

एक जैसा पैटर्न और मोटिवेशन

एक व्यवस्थित पैटर्न उभरता है: विदेशी संस्थाएँ और सरकारें, कथित भारतीय थिंक टैंकों और कार्यकर्ताओं के साथ सहयोग करती हैं। ये मिलकर भारत की सरकार, बहुसंख्यक समुदाय और राष्ट्र-निर्माण परियोजनाओं की आलोचना करते हैं। ये लोग संयुक्त रूप से वैश्विक स्तर पर नकारात्मक नैरेटिव को बढ़ावा देते हैं, ताकि भारत की नीतिगत दबाव डाल सकें। इसके अलावा आंतरिक सामाजिक विभाजन और राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने का प्रयास करते हैं।
रिसर्च में कहा गया है कि इस समन्वित अभियान का उद्देश्य भारत की संप्रभुता को नुकसान पहुँचाना, वैश्विक स्थिति को कमज़ोर करना और बुद्धिजीवियों, मीडिया और अन्य लोगों के माध्यम से सत्ता को प्रभावित करना है।
इसके अलावा, हिंदू विरोधी हिंसा, धर्मांतरण और भारतीय हितों को वैश्विक स्तर पर निशाना बनाने पर इन संगठनों की चुप्पी, जबकि किसी भी कथित या मनगढ़ंत अल्पसंख्यक मुद्दे पर ओवर एक्टिव होना, इनके पूर्वाग्रह को उजागर करता है।
This is the full spider web, or the mindmap of the network around CSDS. You can download the high resolution picture (6 MB size) of this mindmap by clicking here.
सीएसडीएस के इर्द-गिर्द फैले नेटवर्क का पूरा मकड़-जाल या माइंडमैप ऊपर दिया गया है। आप इस माइंडमैप का हाई रेजोल्यूशन चित्र (6 MB की फाइल है) यहाँ क्लिक करके डाउनलोड कर सकते हैं।
सीएसडीएस और इसके सहयोगी गैर-सरकारी संगठनों, मीडिया प्लेटफॉर्म और वित्तपोषकों का गठजोड़ भारत की संप्रभुता, सांस्कृतिक अखंडता और लोकतांत्रिक वैधता के लिए एक समन्वित वैचारिक चुनौती के रूप में काम करता है। विदेशी फंड व्यवस्थित रूप से अपने शोध, आउटरीच और सक्रियता को सरकारों और वैश्विक व्यवस्था परिवर्तन तथा सामाजिक इंजीनियरिंग में निवेश करने वाले अरबपति फाउंडेशनों से संचालित होते हैं। सीएसडीएस का केस स्टडी यह उजागर करता है कि कैसे “नागरिक समाज” और “शैक्षणिक” संस्थानों को लोकतांत्रिक राज्यों के खिलाफ नैरेटिव युद्ध के औजारों में बदला जा सकता है। भारत को अपनी स्वायत्तता और राष्ट्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए, ऐसे संगठनों के एजेंडे, वित्तीय स्रोतों और संबंधों की कड़ी जाँच, नियामक निगरानी और सार्वजनिक जवाबदेही के अधीन होना चाहिए।
रिसर्च टीम:
प्रमुख शोधकर्ता: नूपुर जे शर्मा
शोधकर्ता: आशीष नौटियाल, दिव्यांश तिवारी, प्रारब्ध राय, ध्रुव मिश्रा, रोहित कुमार पांडे, चंदन कुमार
                                                                                                                                      (साभार )

तेलंगाना : कांग्रेस सरकार के ‘नंगा नाच’ पर भड़का सुप्रीम कोर्ट, कहा- हम शक्तिहीन नहीं


सुप्रीम कोर्ट ने 2 अप्रैल 2025 को BRS (भारत राष्ट्र समिति) के विधायकों की अयोग्यता की याचिकाओं पर नोटिस जारी करने में लगभग 10 महीने लगाने पर तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष से सवाल पूछा है। ये विधायक BRS छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए थे। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के बयान की आलोचना की और उसे 10वीं अनुसूची का मजाक बताया।

कांग्रेस नेता एवं तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने विधानसभा में कहा था कि विधायकों के पाला बदलने पर भी उपचुनाव नहीं होंगे। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने मुख्यमंत्री के बयान पर आपत्ति जताई। दरअसल, संविधान की 10वीं अनुसूची दल बदलने से संबंधित अयोग्यता के प्रावधानों से संबंधित है।

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष द्वारा अयोग्यता से संबंधित आवेदिन पर निर्णय लेने में देरी से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था। एक याचिका में तीन विधायकों की अयोग्यता से संबंधित तेलंगाना हाई कोर्ट के नवंबर 2024 के आदेश को चुनौती दी गई थी। वहीं, दूसरी याचिका में दल बदलने वाले सात अन्य विधायकों के खिलाफ कार्रवाई की माँग की गई थी।

दल बदलने वाले विधायकों को लेकर BRS ने हाई कोर्ट में याचिका दी थी। इस याचिका पर सुनवाई करने के बाद तेलंगाना हाई कोर्ट की एकल पीठ ने 9 सितंबर 2024 को विधानसभा सचिव को निर्देश किया था। इस निर्देश में कहा गया था कि वे विधायकों की अयोग्यता याचिकाओं को विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष रखें तथा चार सप्ताह के भीतर सुनवाई निर्धारित करें।

इसको लेकर कांग्रेस ने अपील की। इसके बाद पिछले साल नवंबर में हाई कोर्ट की दो जजों की पीठ ने सुनवाई की। इस सुनवाई में दो जजों की खंडपीठ ने कहा था कि विधानसभा अध्यक्ष को तीनों विधायकों के खिलाफ अयोग्यता याचिकाओं पर ‘उचित समय’ के भीतर फैसला करना चाहिए। उचित समय को लेकर स्पष्ट नहीं था। इसको लेकर BRS ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

विधानसभा अध्यक्ष के कार्यालय की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि पहली अयोग्यता याचिका 18 मार्च 2024 को दायर की गई थी। उसके बाद 2 अप्रैल और 8 अप्रैल को दो और याचिकाएँ दायर की गईं। हाई कोर्ट में याचिका 10 अप्रैल 2024 को दायर की गई थी। रोहतगी ने कहा, “क्या यह उचित समय तक इंतजार करना है?”

अयोग्यता याचिकाओं पर नोटिस देने में इतना समय लगने के सवाल पर मुकुल रोहतगी ने कहा कि यह मामला हाई कोर्ट में लंबित था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने विधानसभा अध्यक्ष की ओर से पेश मुकुल रोहतगी से पूछा, “तो फिर जब मामला हमारे संज्ञान में था, तब आपने नोटिस क्यों जारी किया? क्या हमें अब अवमानना ​​का नोटिस जारी करना चाहिए?”

इस पर रोहतगी ने कहा कि हाई कोर्ट की खंडपीठ के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका 15 जनवरी 2025 को सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई थी और स्पीकर ने अगले दिन नोटिस जारी किया था। पीठ ने इस कदम की आलोचना करते हुए कहा कि जब मामला हाई कोर्ट में था तो स्पीकर ने कार्रवाई करने से परहेज किया, लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा तो उन्होंने कार्रवाई की।

जस्टिस गवई ने कहा कि हाई कोर्ट की एकल पीठ ने सिर्फ 4 सप्ताह के भीतर शेड्यूल तय करने का निर्देश दिया था, ना कि उस समय सीमा में पूरे मामले का निपटारा करने के लिए कहा था। सर्वोच्च अदालत ने पूछा, “यदि अध्यक्ष कोई कार्रवाई नहीं करते हैं तो इस देश की अदालतें, जिनके पास न केवल शक्ति है, बल्कि संविधान के संरक्षक के रूप में उनका कर्तव्य भी है, शक्तिहीन हो जाएँगी?”

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि न्यायिक समीक्षा केवल निर्णय की सत्यता की जाँच करने के लिए लागू होती है। उन्होंने कहा, “चूँकि इस मामले में कोई निर्णय नहीं हुआ है तो क्या न्यायालय को सिर्फ खड़े होकर लोकतंत्र के नंगा नाच को देखते रहना चाहिए?” कोर्ट ने कहा कि उसके निर्देशों की अवहेलना की जाती है तो वह शक्तिहीन है।

अदालत ने सवाल किया, “हम शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का सम्मान करते हैं, लेकिन जब कोई संवैधानिक प्रावधान किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए बनाया जाता है तो क्या अदालतों को उसे निरस्त करने की अनुमति देनी चाहिए?” सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एकल पीठ के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं था।

इससे पहले 25 मार्च को बीआरएस नेता पाडी कौशिक रेड्डी का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता सीए सुंदरम ने तर्क दिया था कि मुख्य मुद्दा यह है कि क्या संवैधानिक न्यायालय के पास संवैधानिक प्राधिकरण को अपने आदेश के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य करने का अधिकार है। उन्होंने तर्क दिया कि न्यायालयों को ऐसी शक्ति से वंचित करना ‘न्याय की पूर्ण विफलता’ होगी।

इस मामले में 4 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना सरकार और अन्य से जवाब माँगा था, जिसमें इस बात पर जोर दिया गया था कि समय पर निर्णय लेना महत्वपूर्ण है। कोर्ट ने ऐसी स्थिति के खिलाफ चेतावनी दी थी कि ‘ऑपरेशन सफल हो जाए, लेकिन मरीज मर जाए’ का कोई फायदा नहीं है। कोर्ट ने विधायक दानम नागेंदर, वेंकटराव तेलम और कडियम श्रीहरि से भी जवाब माँगा था।

जर्मनी जाकर विदेश मंत्री एस जयशंकर ने लगा दी पश्चिमी देशों की क्लास, दो टूक बोले- हमारा लोकतंत्र खतरे में नहीं, अपना मॉडल न थोपें

                                           पैनलिस्ट के साथ एस जयशंकर (साभार: एनडीटीवी)
महापुरुषों ने कथन कोई कंचे खेलकर नहीं बनाए, अपनी योग्यता और अनुभव के आधार पर बताए। महापुरुषों का कहना है कि शक्तिशाली देश को ख़त्म करने के लिए सबसे पहले उसकी सभ्यता को नष्ट कर दो, देश अपने आप बर्बादी की राह पर चला जाएगा। दूसरे, भोजन, पूजा, मिलन परदे के पीछे होने चाहिए। लेकिन भारत में पिछले कुछ वर्षों से सेकुलरिज्म के लॉलीपॉप से सनातन धर्म की मान्यताओं और विशेषताओं को सेकुलरिज्म के मीठे जहर से सनातन विरोधियों ने रूढ़िवादी और दकियानूसी मानसिकता बताकर धूमिल कर पश्चिमी सभ्यता को लाद दिया। 

अभी कुछ दिन पहले पश्चिमी सभ्यता में पागल हुए लोगों ने valentine day, hug day और kiss day मनाया। जो काम परदे के पीछे होने चाहिए खुलेआम हो रहे हैं। लेकिन इन पागलों को नहीं मालूम कि पश्चिमी देशों में केवल दो अथवा तीन त्यौहार होते हैं, लेकिन व्यापार करने के लिए इस तरह के day मनाये जाते हैं। जबकि सनातन पद्धति में ये days मकर संक्रांति से लेकर होली और श्राद्धों से लेकर गंगा नहान तक होते हैं। करवाचौथ पर ऊलजलूल बातें कही जाती हैं क्योकि इन्हे इस त्यौहार तो क्या किसी भी त्यौहार की क, ख और ग तक नहीं मालूम होती। इनका काम किसी न किसी तरह सनातन को अपमानित करना है। जबकि हर हिन्दू त्यौहार का पारिवारिक दृष्टि से लेकर संसारिक, पर्यावरण और आध्यात्मिक महत्व होता है। 

आज जब सनातन मुखर होना शुरू हुआ सारे सनातन विरोधी देश को लोकतंत्र खतरे में, संविधान खतरे में, दूसरे मजहबों का अस्तित्व खतरे में आदि ऊलजलूल बातों से गुमराह कर अपनी दुकान चला रहे है। सच्चाई यह है कि जितना सनातन मुखर होगा इनकी दुकानें बंद होती जाएंगी।     

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पश्चिमी देशों को लोकतंत्र को लेकर आइना दिखाया और कहा भारत में यह समय के साथ और भी जीवंत होते जा रहा है। उन्होंने ‘खतरे में लोकतंत्र’ की बात करने वाले पश्चिमी देशों पर बांग्लादेश का नाम लिए बिना कटाक्ष किया। विदेश मंत्री ने कहा कि पश्चिम ने ग्लोबल साउथ में गैर-लोकतांत्रिक ताकतों को प्रोत्साहित किया। वे बाकी दुनिया पर अपने लोकतंत्र का मॉडल थोपने में लगे रहते हैं।

विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा कि पश्चिमी देशों को भी पश्चिम के बाहर के सफल मॉडलों को अपनाना चाहिए। उन्होंने मतदान के दौरान अंगुली पर लगी स्याही को दिखाते हुए कहा, “हमारे लिए लोकतंत्र केवल एक सिद्धांत नहीं, बल्कि एक डिलीवर किया गया वादा है।” उन्होंने पश्चिमी देशों को बताया कि बीतते समय के साथ भारत में लोकतंत्र और भी जीवंत होते जा रहा है।

जयशंकर ने कहा, “भारत ने आजादी के बाद लोकतंत्र को इसलिए अपनाया, क्योंकि यह हमारे परामर्शात्मक (consultative) और बहुलवादी (pluralistic) समाज के मूल्यों से मेल खाता था।” पश्चिमी देशों की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि अतीत में पश्चिम ने लोकतंत्र को सिर्फ अपने तक सीमित रखा और ग्लोबल साउथ में गैर-लोकतांत्रिक शक्तियों को समर्थन दिया।

जयशंकर ने शुक्रवार (14 फरवरी 2025) को जर्मनी की राजधानी म्यूनिख में आयोजित सुरक्षा सम्मेलन में भाग लिया। इस दौरान कुछ वक्ताओं ने दुनिया में लोकतंत्र का भविष्य खतरे में बताया। हालाँकि, भारतीय विदेश मंत्री जयशंकर ने इसे खारिज कर दिया और कहा, “मैं लोकतंत्र को लेकर आशावान हूँ। मैं अभी अपने राज्य के चुनाव में हिस्सा लेकर आया हूँ।”

उन्होंने आगे बताया, “बीते साल हमारे देश में राष्ट्रीय चुनाव हुए और कुल मतदाताओं में से करीब दो तिहाई ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया।” उन्होंने अंगुली पर मतदान वाली स्याही को दिखाते हुए कहा, “मैं एक अपेक्षाकृत निराशावादी पैनल में आशावादी व्यक्ति हूँ। मैं अपनी अंगुली उठाकर शुरू करूँगा। इसे बुरा मत मानिएगा। जो निशान आप मेरे नाखून पर देख रहे हैं, वह अभी-अभी हुए मतदान का निशान है।”

जयशंकर ने बताया कि राष्ट्रीय चुनावों में लगभग 90 करोड़ मतदाताओं में लगभग 70 करोड़ मतदाताओं ने मतदान किया। उन्होंने बताया, “हम एक ही दिन में इन सभी वोटों की गिनती करते हैं। जब परिणाम घोषित होता है तो कोई भी उस पर विवाद नहीं करता। हम अच्छे से मतदान कर रहे हैं और हमारे लोकतंत्र की दिशा के बारे में आशावादी हैं।

इससे जुड़ा तर्क देते हुए उन्होंने कहा, “आधुनिक युग में जब से हमने मतदान करना शुरू किया है, तब से लेकर आज जो मतदान हो रहा है, उसमें 20 प्रतिशत अधिक लोग मतदान कर रहे हैं। इसलिए, पहला संदेश यह है कि लोकतंत्र पर कोई संकट नहीं है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र के लिए चुनौतियाँ भी हैं। अलग-अलग देशों में हालात अलग-अलग हैं, लेकिन कई देशों में लोकतंत्र अच्छे से काम कर रहा है।

वक्ताओं में शामिल अमेरिकी सीनेटर एलिसा स्लोटकिन ने कहा कि लोकतंत्र ‘खाने की मेज पर भोजन नहीं रखता’। इस पर जयशंकर ने कहा कि भारत 80 करोड़ लोगों को पोषण सहायता देता है। उन्होंने कहा कि दुनिया के कुछ ऐसे हिस्से हो सकते हैं जहाँ ऐसा नहीं होता हो, लेकिन कुछ ऐसे हिस्से भी हैं, जहाँ ये सब हो रहा है और इनमें भारत भी शामिल है।

क्या कबीलों के दखल से चलती है खाड़ी मुल्कों की सरकारें, शासक देते हैं सब्सिडी?

विद्वानों की माने तो अरबी प्रायद्वीप का समाज प्राथमिक रूप से ‘क़बीला’ से बना हुआ समाज है। आज भी खाड़ी देशों में ये कबीले राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। हम देखेंगे कि कैसे इन खाड़ी देशों में राजनीतिक जीवन अविकसित रही है और इसमें कबीलों की क्या भूमिका रही है। राज्य-निर्माण और राष्ट्रीय पहचान विकसित करने में इन कबीलों की पहचान और क़बीलावाद की भूमिका अद्वितीय और महत्वपूर्ण रही है।

इराक़, लीबिया, और यमन जैसे देशों में, आधुनिक राज्य गृहयुद्ध और अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेपों से असफल रहें हैं। वहाँ इस राजनीतिक शून्य को इन कबीलों ने बहुत तेज़ी से कब्जाया है। राज्य के पतन के समय क़बीलों का फिर से उभरना खाड़ी देशों में इनके महत्व को बखूबी दर्शाता है। चौदहवीं शताब्दी के अरब मुस्लिम इतिहासकार, इब्न खलदुन को कबीलों और राज्य के बीच संबंधों के पहले विस्तृत विवरण के लिए जाना जाता है।

वो लिखते है कि ‘असबिय्या’ माने एक तरह का ‘समूह एकजुटता’ जो केवल साझा पारिवारिक पृष्ठभूमि और रक्त के महत्व को ही प्रदर्शित नहीं करता, बल्कि आपसी समाजीकरण का भी महत्व रखता है। वो आगे कहते है कि सामान्य वंश के आधार पर ‘असबिय्या’ एक स्थिर और सुरक्षित शासन को मजबूत करने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने अरबी क्षेत्रों में मजहब और सगोत्रता (Kinship) से मिश्रित सरकार सबसे ज़्यादा मजबूत सरकार मानी है।

इसलिए, लोकतांत्रिक मूल्य या लोकतांत्रिक सरकार यहाँ की राजनीतिक संस्कृति (Political Culture) का कभी हिस्सा ही नहीं रही। ऐसे में इन देशों में लोकतंत्र का आना बहुत कठिन हो जाता है। एक तरीक़े से देखें तो क़बीला और राज्य वैचारिक तौर पर एक दूसरे से विपरीत हैं। पहचान, राजनीतिक निष्ठा और व्यवहार के आधार के रूप में, क़बीला सगोत्रता (Kinship) और पितृवंशीय वंश के संबंधों को प्रमुखता देती है, जबकि राज्य सभी व्यक्तियों की एक केंद्रीय सत्ता के प्रति वफादारी पर जोर देता है, चाहे उनका एक-दूसरे से कोई संबंध क्यों न हो।

क़बीला व्यक्तिगत, नैतिक और अनुवांशिक कारकों पर जोर देती है, वहीं राज्य अवैयक्तिक है, और उपलब्धि को मान्यता देता है। क़बीला सामाजिक रूप से सजातीय, समतावादी और खंडीय है, वहीं राज्य विजातीय और श्रेणीबद्ध है। जनजाति व्यक्ति के भीतर की भावना है; राज्य बाहरी है। ऐसे में अरबी समाज की राजनीति समझना थोड़ा कठिन हो जाता है क्योंकि यहाँ क़बीला और राज्य एक दूसरे पर आश्रित है। भले ही इन क़बीलों की वास्तविक संरचना पहले जैसी नहीं हो, लेकिन वो अभी भी अपने सामाजिक और राजनीतिक भूमिका को बना कर रखते हैं।

क़बीलों का प्रभाव इन देशों के राजनीतिक तंत्र (Political System) में साफ़ देखने को मिलता है। ऐसे में अरबी समाज में लोकतांत्रिक मूल्यों का आना कठिन हो जाता है। अरबी क्षेत्र में तेल मिलने के बाद से बड़ा बदलाव आया है। तेल से आने वाले राजस्व (Revenues) सरकार को पर्याप्त धन प्रदान करती है। अरब प्रायद्वीप के शासक परिवार अपने प्रति वफादारी बनाए रखने के लिए शक्तिशाली क़बीलों को लंबे समय से सब्सिडी देते रहे हैं।

खाड़ी मुल्क अपनी जनता को बहुत सारी सामाजिक कल्याणकारी नीतियों द्वारा सहायता करते हैं। इनमें विधवा, गरीब, अनाथ और दिव्यंगों के लिए पेंशन और आर्थिक सहायता भी शामिल है। ऐसे में सरकार सामाजिक समूहों के गठन जो राजनीतिक अधिकारों की माँग करने की कोशिश करती है, उन्हें दबा देती है। आर्थिक अधिकारों का पूरा होना और क़बीले या ‘सामूहिक भावना’ के कारण अपने राजनीतिक अधिकारों में कमी बर्दाश्त कर लेना, लोकतांत्रिक मूल्यों को इन देशों में आने से रोक देता है।

इन देशों के जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा प्रवासी लोगों का है। वो वहाँ अच्छी नौकरी के अवसर में जाते हैं। उनमें कुछ वही बस जाते हैं और कुछ काम कर के अपने देश लौट जाते हैं। ज़्यादातर प्रवासी मज़दूर इन देशों में निचले स्तर के काम जैसे, ड्राइवरी, घरेलू कामकाज, पेट्रोल पम्प पर तेल बेचना, साफ़-सफ़ाई इत्यादि करते है। इसके कारण इन देशों में स्थानीय लोग लोअर क्लास में नहीं आते और ये प्रवसी मज़दूर इनका जगह ले लेते है।

ऐसे में यहाँ की स्थानीय जनता सुखी और संपन्न रूप से अपना जीवन यापन करती है। बुनियादी ज़रूरत और आर्थिक स्वतंत्रता पूरा होने के कारण यहाँ के लोग अपने राजनीतिक अधिकारों में कटौती स्वीकार कर लेते है।