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CSDS: भारतीय लोकतंत्र के खिलाफ साजिश और विदेशी फंडिंग का जाल – विस्तृत रिसर्च में खुलासा

                                     CSDS और विदेशी फंडिंग वाले NGO की साजिश का खुलासा
यह रिसर्च सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज (CSDS: Centre for the Study of Developing Societies) के इतिहास, विचार, फंडिंग इकोसिस्टम और विदेशी संस्थाओं के साथ सहयोग की जाँच करता है। विश्लेषण की वजह ये है कि विदेशी फंडिंग वाले एनजीओ के साथ भारत के कथित थिंक टैंक और मीडिया के बीच सीएसडीएस एक गठजोड़ बनाता है, जो वैचारिक रूप से भारत, खासकर बहुसंख्यक हिंदुओं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली लोकतांत्रिक सरकार के खिलाफ है। इस रिसर्च में ऐसे कई रहस्योद्घाटन हुए हैं, जिससे पता चलता है कि भारत के राजनीतिक और सामाजिक विमर्श को प्रभावित करने, भारत के लोकतंत्र में विदेशी हस्तक्षेप को बढ़ावा देने और विदेशी शक्तियों के इशारे पर भारत की संप्रभुता को कमजोर करने की कोशिश की गई है। सीएसडीएस और उसके मददगारों ने कैसे दूसरे देशों की विदेश नीति के एजेंडे को आगे बढ़ाने की कोशिश की है, इसका भी पता चलता है।

CSDS की उत्पत्ति और विचार

सीएसडीएस की स्थापना 1963 में रजनी कोठारी ने की थी। कोठारी के क्रियाकलाप हिन्दू समाज को लेकर पूर्वाग्रह से ग्रसित थे। वह देश की धर्मनिरपेक्षता, जातिवाद और बहुसंख्यक विरोधी सोच का व्यक्ति रहा है। यह शोधपत्र सीएसडीएस की जड़ों को एशिया फाउंडेशन जैसी प्रायोजित विदेशी संस्थाओं से जोड़ता है, जो सीआईए का एक मुखौटा है। इससे साफ होता है कि संस्थान की स्थापना के पीछे ‘बाहरी प्रभाव’ था। सीएसडीएस के नेतृत्व में दशकों से ऐसे कार्यों को बढ़ावा मिला, जो भारत के बहुसंख्यक समुदाय को टारगेट करती है। अल्पसंख्यकों के झूठे उत्पीड़न की बात करती है और भारत की संप्रभुता और एकता को कमजोर करने वालों को ‘वैचारिक सोच’ प्रदान करती है।

विदेशी अनुदान का फैला जाल: नकदी, सामंजस्य और सोच

सीएसडीएस का परिचालन और अनुसंधान बजट न केवल भारत सरकार के अनुदानों (मुख्य रूप से इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च, ICSSR) के माध्यम से संचालित होता है, बल्कि विदेशी अनुदान पर इसकी निर्भरता भी लगातार बढ़ती जा रही है। 2016 से सीएसडीएस को FCRA के माध्यम से कम से कम ₹15.6 करोड़ प्राप्त हुए हैं। हालाँकि अधूरे खुलासों के कारण पूरी राशि का पता नहीं चल पाया है। अनुमान है कि ज्ञात स्रोतों से प्राप्त आमदनी से कहीं अधिक धनराशि इन्हें मिली है। सीएसडीएस की फंडिंग के मुख्य स्रोतों की बात करें तो वो निम्नलिखित हैं:

कोनराड एडेनॉयर स्टिफ्टंग (KAS: Konrad Adenauer Stiftung): जर्मन सरकार द्वारा फंडेड ये फाउंडेशन, सीधे तौर पर सत्तारूढ़ क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (सीडीयू) से संबद्ध है। इस फाउंडेशन ने 2016 से 2.6 करोड़ रुपए से अधिक का दान दिया है। केएएस जर्मन विदेश नीति और पश्चिमी लोकतांत्रिक मूल्यों को आगे बढ़ाती है, जो अक्सर टारगेट वाले देशों की राजनीतिक को कमजोर करता है या इसे ‘सुधारने’ के नाम पर सत्ता परिवर्तन को हवा देता है।

अंतर्राष्ट्रीय विकास अनुसंधान केंद्र (IDRC: International Development Research Centre): आईडीआरसी कनाडा की एक क्राउन कॉपोरेशन है, जो पिछले 8 सालों से अपने थिंक टैंक के माध्यम से सीएसडीएस के सालाना बजट का एक तिहाई भाग प्रदान करता आ रहा है। आईडीआरसी कनाडाई विदेश नीति का एक हिस्सा है। ये अलगाववाद को बढ़ावा देता है। खालिस्तानी अलगाववादियों को कनाडा का खुला संरक्षण इसका उदाहरण है।

सीमेनपू फ़ाउंडेशन (Siemenpuu Foundation): फिनलैंड के विदेश मंत्रालय की आर्थिक मदद ये चल रहा यह फिनिश एनजीओ, सीएसडीएस और उसकी ब्रांचों (विशेषकर एसएडीईडी) को मदद करता है। सीमेनपू फाउंडेशन भारत में ‘आदिवासियों के समर्थन’ के आस-पास केंद्रित हैं, लेकिन उनके नेटवर्क और संवाद मंच नक्सल-समर्थित और हिंदू-विरोधी कथित बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं को ‘नजरिया’ प्रदान करते हैं। ये अक्सर भारत में उत्पीड़न और बेदखल जैसे मुद्दों को बढ़ावा देती है।

बर्गग्रुएन इंस्टीट्यूट (BI: Berggruen Institute): बीआई का भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी विचार इसकी पत्रिका “नोएमा” के माध्यम से प्रसारित होता है। इसमें भारत को सत्तावादी, सांप्रदायिक और पिछड़ा बताया जाता है और अक्सर अति-वैचारिक और तथ्यात्मक रूप से चुनिंदा लेखकों के लेख छापती है। इन लेखकों में भारत-विरोधी पश्चिमी लॉबी से जुड़े लेखक भी शामिल हैं।

फोर्ड फाउंडेशन, हेनरी लूस फाउंडेशन, ओमिडयार, ओपन सोसाइटी फाउंडेशन (Ford Foundation, Henry Luce Foundation, Omidyar, Open Society Foundations): ये अमेरिकी संस्थाएँ सत्ता परिवर्तन, समाज के कथित सशक्तिकरण और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान की राजनीति को बढ़ावा देने के लिए धन मुहैया कराती हैं। सीएसडीएस को सीधे या अपने सहयोगियों (जैसे “भारतीय मुस्लिम परियोजना”) के माध्यम से मदद करती है। ये लोग भारत और उसकी सरकार से पीड़ित होने के नेरेटिव को बढ़ावा देते हैं।

साइंसेज पीओ/एफएनएसपी (Sciences Po/FNSP): फ्रांस के प्रमुख राजनीति विज्ञान संस्थान ने, एफएनएसपी के माध्यम से, सीएसडीएस को पर्याप्त वित्तीय योगदान दिया है। इसकी फैकल्टी, खास कर क्रिस्टोफ़ जाफ़रलॉट, ने नियमित रूप से हिंदू विरोधी राजनीति और मोदी सरकार की आलोचना करते हुए शोध प्रकाशित किए हैं।

पश्चिमी मीडिया, ‘खोजी’ नेटवर्क और सत्ता-पलट तत्वों की मिलीभगत

 शोध में विस्तार से बताया गया है कि कैसे सीएसडीएस और उसका शोध/पॉलिसी इकोसिस्टम—लोकनीति, एसएडीईडी और संबद्ध शिक्षाविद के साथ पश्चिमी मीडिया और ‘खोजी पत्रकारिता’ नेटवर्क (जैसे जीआईजेएन, ओसीसीआरपी, बेलिंगकैट, रिपोर्टर्स कलेक्टिव, आरएसएफ, और अन्य) जुड़े हुए हैं। ये गठजोड़ आकस्मिक नहीं है। नेटवर्क के इस जाल को अमेरिकी विदेश विभाग, एनईडी (सीआईए की सत्ता परिवर्तन कराने वाली कुख्यात शाखा), सोरोस की ओपन सोसाइटी और यूरोपीय सरकारी एजेंसियों का समर्थन है। इन चैनल्स के माध्यम से पश्चिमी खुफिया और राजनीतिक कर्ताधर्ता भारत की मीडिया और शोध विमर्श को तय करते हैं। साथ ही उन लोगों को आर्थिक मदद देते हैं, जो पश्चिमी नीतिगत प्राथमिकताओं और भारत की विफलता की बात करता है।

गठजोड़ बनाता फीडबैक लूप: विदेशी फंड पर निर्भर भारतीय शोधकर्ता भारत के लोकतंत्र, मीडिया और सांप्रदायिक स्थिति को लेकर खौफनाक रिपोर्ट तैयार करते हैं। फिर इन्हें वैश्विक स्तर पर मीडिया के माध्यम से फैलाया जाता है। इसको भारत में ‘कुछ लोग’ सही ठहराते हैं, जिनका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अर्बन नक्सल, अलगाववादियों और कट्टरपंथियों से संपर्क होता है।

बौद्धिक रणनीति: जातिगत सवाल, अल्पसंख्यक उत्पीड़न, हिंदू-विरोध और राष्ट्र-विरोध

सीएसडीएस के शोध, प्रकाशन और ‘सर्वेक्षण’ का उद्देश्य जाति, अल्पसंख्यक उत्पीड़न, हिंदू-विरोध और राष्ट्र-विरोध है। इसके इर्द-गिर्द इनकी रणनीतिक आगे बढ़ती है।

हिंदुओं का विभाजन: सीएसडीएस का शोध हिंदू विभाजन को और बढ़ाने की कोशिश करता है, खासकर दलितों, आदिवासियों और अन्य पिछड़े वर्गों को उनकी हिंदू पहचान से अलग करके, और राजनीतिक परिणामों को जातिगत उत्पीड़न और ‘बहुसंख्यक अत्याचार’ के चश्मे से देखकर। इस विभाजन को बनाए रखना और बढ़ाना ‘भारत-विरोधियों’ की रणनीति का अहम हिस्सा है।

दलित-मुस्लिम नरेटिव को प्रोत्साहित करना– सीएसडीएस बार-बार दलित और मुस्लिमों को एक साथ जोड़ने का प्रयास करता है। उसका दावा है कि दलित और मुस्लिम भारत और बहुसंख्यक हिंदुओं द्वारा पीड़ित हैं। इसलिए इनके बीच एकता ‘लोकतंत्र’ के लिए बेहद जरूरी है।

हिन्दुओं और भारत को विभत्स दिखाना- सीएसडीएस के कथित विद्वान, संबद्ध पत्रकार, आशीष नंदी- अनन्या वाजपेयी जैसे सहयोगी, साजिश के तहत हिंदुओं को फासीवादी, कट्टरपंथी और हिंसा फैलाने वाले के रूप में दिखाते हैं। ऐसा ये तब भी करते हैं, जब सबूत इन दावों के उलट होता है (उदाहरण के लिए, गोधरा 2002, दिल्ली हिंदू विरोधी दंगा 2020)। इनके शोध का इस्तेमाल भारतीय राष्ट्रवाद को अवैध ठहराने, बाहरी हस्तक्षेप को सही ठहराने और वैश्विक मीडिया में दुष्प्रचार के लिए किया जाता है।

भारतीय संप्रभुता को कमजोर करना: विदेशी फंडिंग वाला सीएसडीएस का शोध सत्ता विरोधी प्रदर्शन, आंदोलन और सोशल मीडिया पर ऐसे अभियानों का समर्थन करते हैं, जिससे देश की संप्रभुता और एकता कमजोर होती है। ये ऐसे तत्वों की बौद्धिक मदद भी करते हैं। देश में ऐसे बदलाव का समर्थन करते हैं, जिससे विदेशी हित साधा जा सके। ये बदलाव और नीतियाँ अक्सर लोकतांत्रिक निर्वाचित सरकार और बहुसंख्यक के खिलाफ होते हैं।

भारत विरोधी विदेशी संस्थानों के साथ गठजोड़

यह रिसर्च दर्शाता है कि सीएसडीएस का तंत्र न केवल वैचारिक रूप से भारत के खिलाफ है, बल्कि ऐसे संस्थाओं और व्यक्तियों को मदद करता है, जो इस विचार का समर्थन करते हैं और उसे संरक्षण देते हैं।

अमेरिकी डीप स्टेट के साथ जुड़ाव: सीएसडीएस के कई साझेदारों और आर्थिक मददगारों (एनईडी, आईडीआरसी, ओपन सोसाइटी, फोर्ड फाउंडेशन) की लैटिन अमेरिका, पूर्वी यूरोप और एशिया में सत्ता परिवर्तन अभियानों में सक्रिय रूप से जुड़े होने के प्रमाण मौजूद हैं।

खालिस्तान समर्थक, पाकिस्तान समर्थक, इस्लामवादी और वामपंथी समूहों से संबंध: आईडीआरसी से जुड़े लोग और मदद पाने वाले लोगों ने किसान विरोध प्रदर्शनों, सीएए, दिल्ली में हिन्दू विरोधी दंगों में हिस्सा लिया। सीएसडीएस या उसके सहयोगी गैर सरकारी संगठनों के अहम सदस्य नियमित रूप से अर्बन नक्सलियों, खालिस्तानी समर्थकों और भारत विरोधी लॉबी के साथ आंदोलनकारी समूहों में दिखाई देते रहे हैं।

चीन का प्रभाव: भारत विरोधी सक्रियता के लिए जाने जाने वाले कथित शिक्षाविदों और पत्रकारों (यहाँ तक ​​कि एक पूर्व पाकिस्तानी प्रधानमंत्री) की मेजबानी, वित्त पोषण या उनके साथ संबद्धता के माध्यम से, न सिर्फ पश्चिमी देशों से बल्कि चीन से वित्त पोषण होने वाले चैनल (बर्गग्रुएन इंस्टीट्यूट के माध्यम से) से संबंध इनकी तटस्थता के किसी भी दिखावे को और अधिक कमजोर कर देते हैं।

एक जैसा पैटर्न और मोटिवेशन

एक व्यवस्थित पैटर्न उभरता है: विदेशी संस्थाएँ और सरकारें, कथित भारतीय थिंक टैंकों और कार्यकर्ताओं के साथ सहयोग करती हैं। ये मिलकर भारत की सरकार, बहुसंख्यक समुदाय और राष्ट्र-निर्माण परियोजनाओं की आलोचना करते हैं। ये लोग संयुक्त रूप से वैश्विक स्तर पर नकारात्मक नैरेटिव को बढ़ावा देते हैं, ताकि भारत की नीतिगत दबाव डाल सकें। इसके अलावा आंतरिक सामाजिक विभाजन और राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने का प्रयास करते हैं।
रिसर्च में कहा गया है कि इस समन्वित अभियान का उद्देश्य भारत की संप्रभुता को नुकसान पहुँचाना, वैश्विक स्थिति को कमज़ोर करना और बुद्धिजीवियों, मीडिया और अन्य लोगों के माध्यम से सत्ता को प्रभावित करना है।
इसके अलावा, हिंदू विरोधी हिंसा, धर्मांतरण और भारतीय हितों को वैश्विक स्तर पर निशाना बनाने पर इन संगठनों की चुप्पी, जबकि किसी भी कथित या मनगढ़ंत अल्पसंख्यक मुद्दे पर ओवर एक्टिव होना, इनके पूर्वाग्रह को उजागर करता है।
This is the full spider web, or the mindmap of the network around CSDS. You can download the high resolution picture (6 MB size) of this mindmap by clicking here.
सीएसडीएस के इर्द-गिर्द फैले नेटवर्क का पूरा मकड़-जाल या माइंडमैप ऊपर दिया गया है। आप इस माइंडमैप का हाई रेजोल्यूशन चित्र (6 MB की फाइल है) यहाँ क्लिक करके डाउनलोड कर सकते हैं।
सीएसडीएस और इसके सहयोगी गैर-सरकारी संगठनों, मीडिया प्लेटफॉर्म और वित्तपोषकों का गठजोड़ भारत की संप्रभुता, सांस्कृतिक अखंडता और लोकतांत्रिक वैधता के लिए एक समन्वित वैचारिक चुनौती के रूप में काम करता है। विदेशी फंड व्यवस्थित रूप से अपने शोध, आउटरीच और सक्रियता को सरकारों और वैश्विक व्यवस्था परिवर्तन तथा सामाजिक इंजीनियरिंग में निवेश करने वाले अरबपति फाउंडेशनों से संचालित होते हैं। सीएसडीएस का केस स्टडी यह उजागर करता है कि कैसे “नागरिक समाज” और “शैक्षणिक” संस्थानों को लोकतांत्रिक राज्यों के खिलाफ नैरेटिव युद्ध के औजारों में बदला जा सकता है। भारत को अपनी स्वायत्तता और राष्ट्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए, ऐसे संगठनों के एजेंडे, वित्तीय स्रोतों और संबंधों की कड़ी जाँच, नियामक निगरानी और सार्वजनिक जवाबदेही के अधीन होना चाहिए।
रिसर्च टीम:
प्रमुख शोधकर्ता: नूपुर जे शर्मा
शोधकर्ता: आशीष नौटियाल, दिव्यांश तिवारी, प्रारब्ध राय, ध्रुव मिश्रा, रोहित कुमार पांडे, चंदन कुमार
                                                                                                                                      (साभार )

‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ के लिए भारत को ‘कुर्बान’ करना चाहती हैं सोनिया गाँधी, चाहती हैं इजरायल-ईरान जंग में देश बने पार्टी; पहलगाम; पहलगाम, मुर्शिदाबाद, मुंबई हमला और कश्मीरी पंडितों पर हो रहे अत्याचारों पर सोनिया का ज्ञान कहां था?

अली हुसैनी खामनेई, सोनिया गाँधी और बेंजामिन नेतान्याहू (साभार: ऑपइंडिया अंग्रेजी)
आखिर कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण के मकड़जाल से कब बाहर आएगी? आखिर कब तक मुस्लिम तुष्टिकरण कर मुसलमानों को बदनाम करती रहेगी? क्या मुसलमानों का कोई आत्मसम्मान नहीं? क्यों नहीं मुसलमानों को मुख्य धारा में जुड़ने के लिए काम करती? मुस्लिम कट्टरपंथियों का दामन छोड़ो वरना अब दिन भी ज्यादा दूर नहीं जब कांग्रेस एक इतिहास बन जाएगी।      

राजघाट पर कांग्रेस के धरने में भारत को मुस्लिम राष्ट्र बनाने की मांग 

कांग्रेस ने ईरान का समर्थन करके अपने ‘मुस्लिम वोट बैंक’ को खुश करने की कोशिश की है। उसने मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि वह इजरायल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष में किसी का भी पक्षकार नहीं बन रही, बल्कि वो तठस्थ है। यानी वो ईरान या इजरायल में से किसी एक पक्ष का भी साथ नहीं दे रही। कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने शनिवार (21 जून 2025) को ‘द हिंदू’ अखबार में एक लेख लिखा, जिसमें उन्होंने ईरान को समर्थन दिया और मोदी सरकार की निष्पक्ष नीति की आलोचना की।

यह कदम कांग्रेस की अध्यक्ष ने अपने घरेलू ‘मुस्लिम वोट बैंक’ को खुश करने के लिए उठाया, जो ‘उम्माह’ (मुस्लिम समुदाय) के हित में ईरान के साथ खड़ा है और इस बात को नजरअंदाज कर रहा है कि ईरान एक शिया-बहुल देश है, जब बात इजरायल के साथ संघर्ष की आती है।

सोनिया गाँधी ने अपने लेख में ईरान को पश्चिमी देशों और इजरायल की आक्रामकता का शिकार बताया। उन्होंने यह भी दावा किया कि अली होसैनी खामेनेई के नेतृत्व वाला इस्लामी गणराज्य भारत का ‘लंबे समय का दोस्त’ रहा है।

अपने दावों को सही साबित करने के लिए कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष ने लिखा, “1994 में ईरान ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में कश्मीर के मुद्दे पर भारत के खिलाफ एक प्रस्ताव को रोकने में मदद की थी।” लेकिन सोनिया ने यह नहीं बताया कि ईरान ने कश्मीर पर कई बार अपना रुख बदला है और उसके सुप्रीम लीडर ने सोशल मीडिया पर भारत के खिलाफ कई बार गलत बयान दिए हैं।

 ईरान ने ‘ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन’ (OIC) के कश्मीर संपर्क समूह में कश्मीरियों के ‘आत्मनिर्णय के अधिकार’ का समर्थन किया है, जिससे पाकिस्तान के रुख को बल मिलता है। अली होसैनी खामेनेई ने भी जम्मू-कश्मीर, जो भारत का अभिन्न हिस्सा है, उस पर अपनी इस्लामी गणराज्य की स्थिति को साफ कर दिया है।

साल 2017 से ईरान के सुप्रीम लीडर ने कई बयानों और सोशल मीडिया पोस्ट में कश्मीर को ‘स्वतंत्र क्षेत्र’ दिखाने की कोशिश की है। उन्होंने बदनाम तरीके से कहा था, “हर किसी को यमन, बहरीन और कश्मीर के लोगों का खुलकर समर्थन करना चाहिए।”

अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के तुरंत बाद अली होसैनी खामेनेई ने ट्वीट किया, “हम कश्मीर में मुसलमानों की स्थिति को लेकर चिंतित हैं। हमारे भारत के साथ अच्छे संबंध हैं, लेकिन हम उम्मीद करते हैं कि भारत सरकार कश्मीर के सम्मानित लोगों के प्रति निष्पक्ष नीति अपनाए और इस क्षेत्र में मुसलमानों पर अत्याचार और दमन को रोके।”

                                                  अली होसैनी खामेनेई के ट्वीट का स्क्रीनग्रैब

मार्च 2020 में एक और ऐसा ही ट्वीट आया – “दुनियाभर के मुसलमानों के दिल भारत में मुसलमानों के नरसंहार से दुखी हैं। भारत सरकार को कट्टर हिंदुओं और उनकी पार्टियों का सामना करना चाहिए और मुसलमानों का नरसंहार रोकना चाहिए, ताकि भारत इस्लामी दुनिया से अलग-थलग न पड़े।”

पिछले साल खामेनेई ने पोस्ट किया, “इस्लाम के दुश्मन हमेशा हमें हमारी साझा इस्लामी पहचान के प्रति उदासीन बनाने की कोशिश करते हैं। हम खुद को मुसलमान नहीं मान सकते अगर हम म्यांमार, गाजा, भारत या किसी अन्य जगह पर एक मुसलमान के दुख से बेखबर रहें।”

इससे साफ है कि ईरान भारत का ‘लंबे समय का दोस्त’ नहीं है, खासकर जब बात जम्मू-कश्मीर की आती है। दूसरी ओर इजरायल ने हमेशा भारत का खुलकर समर्थन किया है और पाकिस्तान के खिलाफ युद्धों में हमारी मदद की है।

                                                अली होसैनी खामेनेई के ट्वीट का स्क्रीनग्रैब

सोनिया गाँधी का ‘द हिंदू’ में लिखा लेख, जिसमें इजरायल को बदनाम किया गया और ईरान की तारीफ की गई है। इसका कूटनीति से कम और देश के भीतर अपने मुख्य वोट बैंक (इस्लामी) के साथ वैचारिक तालमेल से ज्यादा लेना-देना है, खासकर चुनावों से पहले।

इजरायल-ईरान संघर्ष ने कॉन्ग्रेस को अपने मुस्लिम समर्थकों को यह संदेश देने का मौका दिया कि यह पुरानी पार्टी ‘यहूदी’ इजरायल के खिलाफ उम्माह के साथ खड़ी है। यही कारण है कि कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी वाड्रा ने इस साल मार्च में इजरायली सरकार पर हमला बोला था।

सोनिया गाँधी ने अपने लेख में मोदी सरकार पर इजरायल-ईरान संघर्ष में किसी का पक्ष न लेने का आरोप लगाया।

सोनिया ने लिखा, “इस मानवीय आपदा के सामने, नरेंद्र मोदी सरकार ने भारत की लंबे समय से चली आ रही और सिद्धांतवादी नीति को लगभग छोड़ दिया है, जिसमें एक स्वतंत्र, संप्रभु फिलिस्तीन की कल्पना की जाती थी, जो इजरायल के साथ आपसी सुरक्षा और सम्मान के साथ शांति में रहे।”

सोनिया ने आगे लिखा, “गाजा में तबाही और अब ईरान के खिलाफ बिना उकसावे की आक्रामकता पर नई दिल्ली की चुप्पी हमारी नैतिक और कूटनीतिक परंपराओं से एक परेशान करने वाला विचलन है। यह न केवल आवाज की हानि है, बल्कि मूल्यों का समर्पण भी है। अभी भी देर नहीं हुई है। भारत को स्पष्ट बोलना चाहिए, जिम्मेदारी से काम करना चाहिए और पश्चिमी एशिया में तनाव कम करने और बातचीत की ओर लौटने के लिए हर कूटनीतिक रास्ते का इस्तेमाल करना चाहिए।”

मोदी सरकार का वैश्विक संघर्षों पर रुख

कॉन्ग्रेस पार्टी के उलट, जो अपने घरेलू वोट बैंक को खुश करने के लिए कूटनीतिक संबंधों को खतरे में डालने को तैयार है, मोदी सरकार ने वैश्विक संघर्षों में सावधानी, संयम और रणनीतिक संतुलन दिखाया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार-बार कहा है कि भारत शांति के पक्ष में है। यूक्रेन-रूस युद्ध के दौरान भारत ने किसी भी देश का पक्ष नहीं लिया, भले ही पश्चिमी देश यूक्रेन को हथियार देकर युद्ध को बढ़ावा दे रहे थे।

शांति और तनाव कम करने की बार-बार अपील के कारण रूस ने वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत को सस्ते दामों पर कच्चा तेल दिया। भारत ने रूस और यूक्रेन दोनों में फँसे भारतीय नागरिकों के लिए सुरक्षित रास्ते बनाए और ‘ऑपरेशन गंगा‘ के तहत उन्हें हवाई जहाज से घर वापस लाया।

इजरायल-हमास युद्ध के दौरान भी भारत ने यही रास्ता अपनाया। भारत ने आतंकी संगठन हमास और इजरायली नागरिकों पर उसके क्रूर हमले की कड़ी निंदा की, लेकिन फिलिस्तीनी लोगों के लिए मानवीय सहायता भी भेजी।

भारत ने इस संघर्ष पर किसी भी प्रस्ताव पर वोट नहीं दिया और भारतीय संसद में पूछे गए सवाल के जवाब में अपनी स्थिति साफ की।

फरवरी 2024 में मोदी सरकार ने कहा, “भारत की फिलिस्तीन नीति लंबे समय से चली आ रही और सुसंगत है। हमने एक बातचीत के जरिए दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन किया है, जिसमें एक स्वतंत्र, संप्रभु और व्यवहार्य फिलिस्तीन की स्थापना हो, जो सुरक्षित और मान्यता प्राप्त सीमाओं के भीतर इजरायल के साथ शांति में रहे।”

सरकार ने आगे कहा, “भारत ने 7 अक्टूबर 2023 को इजरायल पर हुए आतंकी हमलों और इजरायल-हमास संघर्ष में नागरिकों की मौत की कड़ी निंदा की है। हमने संयम और तनाव कम करने की अपील की है और बातचीत और कूटनीति के जरिए शांतिपूर्ण समाधान पर जोर दिया है। हमने बचे हुए बंधकों की रिहाई की भी माँग की है। प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री ने कई नेताओं से बात की है, जिनमें इजरायल के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री, और फिलिस्तीन के राष्ट्रपति और विदेश मंत्री शामिल हैं। विदेश मंत्री ने 20 जनवरी 2024 को कंपाला में फिलिस्तीनी विदेश मंत्री से मुलाकात की और दो-राष्ट्र समाधान के लिए भारत के समर्थन को दोहराया।”

ईरान-इजरायल संघर्ष के बीच भी भारत ने शानदार संतुलन दिखाया और ‘ऑपरेशन सिंधु’ के तहत दोनों देशों में फँसे भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकाला।

भारत ने इजरायल के साथ मजबूत रक्षा, खुफिया और व्यापार संबंध बनाए रखा है, जिसमें हर साल 2 बिलियन डॉलर से ज्यादा के सैन्य उपकरण (मिसाइल, ड्रोन, निगरानी उपकरण) आयात होते हैं। साथ ही भारत ईरान के साथ भी महत्वपूर्ण रणनीतिक और आर्थिक परियोजनाओं पर काम कर रहा है, जैसे कि इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) और चाबहार बंदरगाह। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ा रहा है।

मिडिल-ईस्ट का संघर्ष कई पहलुओं वाला, जटिल और पेचीदा है। बाहरी दबाव के बावजूद, मोदी सरकार की निष्पक्ष और कूटनीतिक नीति की वजह से भारत को सभी पक्षों से फायदा मिल रहा है।

उदाहरण के लिए मिडिल ईस्ट के 8 इस्लामी देशों – सऊदी अरब, अफगानिस्तान, फिलिस्तीन, मालदीव, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, मिस्र और कुवैत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने उच्च नागरिक सम्मानों से सम्मानित किया है। इनमें शामिल हैं-

  • किंग अब्दुलअजीज़ का ऑर्डर (2016) – सऊदी अरब का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान
  • अमानुल्लाह खान का ऑर्डर (2016) – अफगानिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान
  • फिलिस्तीन राज्य का ऑर्डर (2018) – फिलिस्तीन का सर्वोच्च नागरिक सम्मान
  • इज्जुद्दीन का ऑर्डर (2019) – मालदीव का विदेशी गणमान्य व्यक्तियों को दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान
  • ज़ायद का ऑर्डर (2019) – संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का सर्वोच्च नागरिक सम्मान
  • रेनेसाँ का ऑर्डर (2019) – बहरीन का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान
  • नाइल का ऑर्डर (2023) – मिस्र का सर्वोच्च नागरिक सम्मान
  • मुबारक द ग्रेट का ऑर्डर (2024) – कुवैत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान
ये सम्मान मोदी सरकार की कूटनीतिक संतुलन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मजबूत व्यक्तित्व और विश्व व्यवस्था में भारत के बढ़ते प्रभाव का सबूत हैं।
अगर भारत ने वैश्विक संघर्षों में सक्रिय रूप से पक्ष लिया होता और पक्षपात किया होता, तो हमें व्यापार संबंधों में नुकसान, मित्र देशों से दूरी और उन युद्धों में अनजाने में उलझने की कीमत चुकानी पड़ती, जो हमने शुरू नहीं किए।
कॉन्ग्रेस भले ही मोदी सरकार पर इजरायल-ईरान संघर्ष या इजरायल-हमास युद्ध में पक्ष न लेने का आरोप लगाए, लेकिन पीछे देखें तो यह भारत के लिए सबसे सही फैसला था, है और रहेगा।