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मुस्लिमों को खुश करने के लिए नेहरू ने जिस इजरायल को किया परेशान; नेहरू नहीं मौलाना आज़ाद तय करते थे भारत की मिडिल-ईस्ट पॉलिसी

भारत की मिडिल-वास्त पॉलिसी पर जवाहर लाल नेहरू के समय में मौलाना अबुल कलम आज़ाद का प्रभाव था (फोटो साभार: Getty Images)
हमास के आतंकियों ने 7 अक्टूबर, 2023 को इजरायल पर हमला बोल दिया। इजरायल में जल, थल और नभ के माध्यम से घुसे इन आतंकियों ने डेढ़ हजार लोगों का कत्लेआम किया। यहूदी राष्ट्र पर 5000 मिसाइलों से वार किया गया। एक महिला की हत्या के बाद उसकी नग्न लाश का ‘अल्लाहु अकबर’ नारे के साथ हथियारबंद इस्लामी आतंकियों द्वारा परेड कराए जाने का वीडियो भी सामने आया। क्या बच्चे, क्या बुजुर्ग, क्या निरीह पशु – इस्लामी आतंकियों ने सबको अपनी गोलियों का शिकार बनाया।

भारत ने इस्लामी आतंकियों की निंदा की। उधर इजरायल ने इस नरसंहार के बाद हमास के कब्जे वाले गाजा पट्टी पर हमला कर वहाँ अपना नियंत्रण स्थापित किया। लेकिन, इसी बीच दुनिया भर का वामपंथी और इस्लामी गिरोह उग्र हो उठा और उसने इजरायल की निंदा करनी शुरू कर दी। अपने लोगों की रक्षा कर रहे एक छोटे से देश को गाली देते हुए फिलिस्तीनी बच्चों की चिंता जताई जाने लगी। ये अलग बात है कि हमास ने खुद फिलिस्तीनी बच्चों और महिलाओं को खुद को बचाने के लिए ढाल बनाया।

इजरायल हमेशा से भारत के साथ रहा है, चाहे हथियारों के माध्यम से युद्ध के दौरान हमारी मदद करनी हो या फिर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर साथ देना हो – इजरायल ने कभी भारत का साथ नहीं छोड़ा। इसके उलट हमें जानने की ज़रूरत है कि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का इजरायल के प्रति रुख क्या था। जवाहरलाल नेहरू की प्राथमिकता थी – अरब देशों को खुश करना। ये अलग बात है कि अरब ने जहाँ भी बात इस्लाम की आई वहाँ भारत के खिलाफ जाने से भी गुरेज नहीं किया।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी की कुलपति, राज्यसभा की उप-सभापति और राज्यपाल रहीं नज़मा हेपतुल्ला ने अपनी पुस्तक ‘Indo-West Asian Relations: The Nehru Era‘ में लिखा है कि अपने गठन के साथ ही पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र में इजरायल के खिलाफ फिलिस्तीन और फ्रांस के खिलाफ मोरक्को और ट्यूनीशिया का साथ देना शुरू कर दिया था (दोनों देश कभी फ्रेंच नियंत्रण में हुआ करते थे)। और हाँ, इन मामलों में उसे भारत का साथ भी मिलता था। पाकिस्तान ने अपने गठन के साथ ही ‘उम्माह’ का नेता बनने के लिए प्रयास शुरू कर दिया था।

इजरायल का पूरा प्रयास था कि भारत एक देश के रूप में उसे मान्यता दे और इसके लिए उसने महात्मा गाँधी और जवाहरलाल नेहरू को मनाने की पूरी कोशिश की। उस समय तक अमेरिका, UK और सोवियत रूस तक ने इजरायल को मान्यता दे दी थी, लेकिन मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने नहीं दी। जवाहरलाल नेहरू का कहना था कि इजरायल के संबंध में भारत को न सिर्फ आदर्शवादी विमर्शों को ध्यान में रखना चाहिए, बल्कि वास्तविक परिस्थियों से उपजी चेतावनियों को भी ध्यान में रखना चाहिए।

खुद जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि भारत की नीति इतिहास में सामान्यतः अरब के प्रति झुकाव वाली रही है और साथ ही उन्होंने ये भी सफाई दी थी कि हम यहूदियों के खिलाफ नहीं हैं। उन्होंने माना था कि उनके समय में भी यही नीति चली आ रही है। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि भारत ने इजरायल को मान्यता नहीं दी है। साथ ही वो UN के अंतिम निर्णय के बाद इस पर पुनर्विचार की बातें भी करते थे। याद दिलाते चलें कि 4 मई, 1949 को UN ने उसे मान्यता देने संबंधी याचिका स्वीकार की थी।

इसके एक सप्ताह बाद ही संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इजरायल को मान्यता देने संबंधी याचिका को पारित कर दिया। आप जानते हैं उस समय वोटिंग के दौरान नेहरू सरकार का रुख क्या था? तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आदेश दिया कि भारत इजरायल को मान्यता दिए जाने के खिलाफ वोट करे, क्योंकि हमारी नीति अरब के साथ सहयोग वाली रही है। उन्होंने कहा था कि वैसे इजरायल को मान्यता नहीं दी जा सकती जो बातचीत के माध्यम से नहीं, बल्कि हथियारों के बल से स्थापित हुआ है।

जवाहरलाल नेहरू इसके बाद भी इजरायल को मान्यता दिए जाने का विरोध करते रहे। 17 सितंबर, 1950 को आखिरकार नेहरू सरकार ने इजरायल को मान्यता दी। इसका कारण था कि बगल में पाकिस्तान खुद को इस्लाम का रहनुमा बना कर पेश कर रहा था और अरब देशों की उससे घनिष्ठता थी। लेकिन, इजरायल को मजबूरी में मान्यता दिए जाने के बाद भी नेहरू का जोर अरब और इस्लाम को खुश करने में लगा रहा। उन्होंने अरब को सफाई दी कि भारत फिलिस्तीनी शरणाथियों की माँगों का समर्थन करता रहेगा।

साथ ही उन्होंने अरब को भरोसा दिलाया कि जेरुसलम और सीमान्त क्षेत्रों में इजरायल के नियंत्रण को भारत मान्यता नहीं देता है। आज की तरह ही भारत की आज़ादी के बाद भी यहाँ के मुस्लिम इजरायल के विरोधी हुआ करते थे। यहाँ की सोशलिस्ट पार्टियाँ इजरायल के लेबर मूवमेंट के कारण यहूदी राष्ट्र का समर्थन करती थीं। वहीं जनसंघ भी इजरायल के साथ संबंध सुधारने के पक्ष में थे। लेकिन, नेहरू सरकार प्रशिक्षित मानव संसाधन की कमी और बिगड़ी आर्थिक स्थितियों का हवाला देते हुए कूटनीतिक संबंध स्थापित करने में देरी करती रही।

इजरायली भी नेहरू सरकार के इस रुख से निराश थे। इजरायल के प्रथम प्रधानमंत्री डेविड बेन गुरियन ने कहा था कि वो समझ ही नहीं पा रहे हैं कि इजरायल को लेकर नेहरू की नीति आखिर कैसे गाँधी की वैश्विक मित्रता के सिद्धांत के अनुरूप है। उन्होंने कहा था कि 8 साल पहले आश्वासन दिए जाने के बावजूद नेहरू ने कूटनीतिक संबंध स्थापित करने की ओर कोई कदम नहीं बढ़ाया। उन्होंने नेहरू को अपनी बात पर कायम न रहने वाला व्यक्ति करार दिया था।

कई बार इजरायल का प्रतिनिधिमंडल भारत आया, लेकिन राजनयिक संबंध बनाने की अनुमति नेहरू ने नहीं दी। उनका खुद कहना था कि चीजों को बैलेंस करने के लिए ये नीति अपनाई गई है। उन्होंने कहा था कि इजरायल के साथ राजनयिक संबंध बनाना ठीक नहीं होगा। अब बात करते हैं कि इस नीति पर मौलाना अबुल कलम आज़ाद का क्या प्रभाव था। मौलाना उस समय भारत के शिक्षा मंत्री हुआ करते थे और एक मुस्लिम होने के कारण बताने की ज़रूरत नहीं है कि वो किसके साथ थे।

कनाडा के राजनीतिक वैज्ञानिक माइकल ब्रेचर, जो भारत को लेकर कई पुस्तकें लिख चुके हैं, उन्होंने इस बारे में बात की है। मैक्गिल यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर रहे माइकल ब्रेचर ने लिखा है कि मौलाना आज़ाद नेहरू के करीबी मित्र थे और उन्होंने बलपूर्वक इजरायल नीति में हस्तक्षेप किया था। वो मानते हैं कि 1958 में अपने निधन तक वो भारत की मिडिल-ईस्ट पॉलिसी पर प्रभाव रखते रहे। माइकल ब्रेचर लिखते हैं कि मौलाना आज़ाद एक मुस्लिम होने के कारण स्वाभाविक रूप से प्रो-अरब थे।

उन्हें डर था कि अगर भारत इजरायल के साथ जाता है तो अरब का क्या रुख होगा। उस समय कश्मीर मुद्दे पर अरब के समर्थन के लिए पाकिस्तान के साथ भारत प्रतिद्वंद्विता के शिखर पर था। उन्होंने लिखा है कि नेहरू और आज़ाद को इसका भी भय था कि भारत की सबसे बड़ी अल्पसंख्यक आबादी ‘असुरक्षित’ मुस्लिमों पर इजरायल के प्रति सकारात्मक रवैया रखने का क्या असर पड़ेगा। डर था कि भारत में सांप्रदायिक घृणा बढ़ेगी और पाकिस्तान इसका फायदा उठा कर हिंसा को अंजाम देगा।

नेहरू-आज़ाद को डर था कि विभाजन और दंगों के बाद भारतीय मुस्लिमों की वफादारी कहीं बदल न जाए। इजरायल के विदेश मंत्रालय के डायरेक्टर जनरल रहे वालटर एटन ने इस संबंध में एक कड़वी सच्चाई लिखी है। उन्होंने लिखा था, “भारत की विदेश नीति में जितना नेहरू का प्रभाव है, दुनिया के किसी भी देश में किसी एक व्यक्ति का नहीं है। उनका प्रभाव इतना अधिक है कि भारत की विदेश नीति को लोग नेहरू की व्यक्तिगत नीति मानते हैं। उन्होंने इतनी ताकत से इसमें अपने विचार और अपना व्यक्तित्व भर दिया है कि भारत की विदेश नीति को नेहरू की प्राइवेट मोनोपोली (निजी एकाधिकार) मानी जा सकती है।”

उनका मानना था कि इसमें सरकार वल्लभभाई पटेल तक की नहीं चलती थी, जो उस समय भारत के विदेश मंत्री हुआ करते थे। जवाहरलाल नेहरू इजरायल को सकारात्मक जवाब दे चुके थे और भारत में नई सरकार के गठन के साथ ही उसे मान्यता देने का भरोसा दे चुके थे, लेकिन इसके बावजूद कुछ नहीं हुआ तो इसमें मौलाना आज़ाद का प्रभाव भी माना जा सकता है। 1948 में बिहार में कुछ प्रभावशाली मुस्लिम नेताओं ने फिलिस्तीन के लिए चंदा इकट्ठा करना भी शुरू कर दिया था।

उस समय जेद्दाह अरब की युद्ध गतिविधियों का केंद्र था और ये रुपए वहीं भेजे जाने थे। इतना ही नहीं, हैदराबाद का निजाम भी रुपए इकट्ठे कर रहा था। उसने 1.40 करोड़ पाउंड अरब वालों को भेजा था, ताकि फिलिस्तीन वाले इन पैसों से इजरायल से लड़ने के लिए हथियार खरीद सकें। नेहरू की बातों से ऐसा लगता है कि इजरायल को समर्थन न देने के पीछे अरब को खुश करने का कम और भारतीय मुस्लिमों के बीच विद्रोह का डर ज़्यादा था।

वहीं आज का समय देखिए। भारत की जनता खुल कर इजरायल के साथ है, हमास आतंकियों द्वारा की गई हिंसा की खुल कर यहाँ निंदा हो रही है। ऐसा नहीं है कि भारतीय मुस्लिमों ने अपना रुख बदल लिया है, बल्कि हिन्दू पुनरुत्थान के दौर में लोगों ने अपने मित्र और दुश्मन को पहचानने की क्षमता विकसित कर ली है। सोचिए, इजरायल का खुल कर साथ दिया गया होता शुरू से तो हथियारों से लेकर विज्ञान तक के क्षेत्र में भारत का कितना अधिक विकास होता।

एक और बात जानने लायक है, जब भारत पर 1962 में चीन ने हमला किया तो इसी इजरायल ने भारत की मदद की। भारत के निवेदन पर इजरायल ने हथियारों की सप्लाई की। इजरायल के प्रधानमंत्री डेविड बेन गुरियन ने स्पष्ट लिखा कि इस युद्ध में इजरायल भारत के साथ है। उस समय नेहरू ही भारत के प्रधानमंत्री थे। बाद में 1999 में जब कारगिल युद्ध हुआ तब भी इजरायल के भारत की मदद की। ऐसे देश को नेहरू मान्यता देने और राजनयिक संबंध स्थापित करने के लिए बार-बार परेशान करते रहे थे।


क्या कबीलों के दखल से चलती है खाड़ी मुल्कों की सरकारें, शासक देते हैं सब्सिडी?

विद्वानों की माने तो अरबी प्रायद्वीप का समाज प्राथमिक रूप से ‘क़बीला’ से बना हुआ समाज है। आज भी खाड़ी देशों में ये कबीले राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। हम देखेंगे कि कैसे इन खाड़ी देशों में राजनीतिक जीवन अविकसित रही है और इसमें कबीलों की क्या भूमिका रही है। राज्य-निर्माण और राष्ट्रीय पहचान विकसित करने में इन कबीलों की पहचान और क़बीलावाद की भूमिका अद्वितीय और महत्वपूर्ण रही है।

इराक़, लीबिया, और यमन जैसे देशों में, आधुनिक राज्य गृहयुद्ध और अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेपों से असफल रहें हैं। वहाँ इस राजनीतिक शून्य को इन कबीलों ने बहुत तेज़ी से कब्जाया है। राज्य के पतन के समय क़बीलों का फिर से उभरना खाड़ी देशों में इनके महत्व को बखूबी दर्शाता है। चौदहवीं शताब्दी के अरब मुस्लिम इतिहासकार, इब्न खलदुन को कबीलों और राज्य के बीच संबंधों के पहले विस्तृत विवरण के लिए जाना जाता है।

वो लिखते है कि ‘असबिय्या’ माने एक तरह का ‘समूह एकजुटता’ जो केवल साझा पारिवारिक पृष्ठभूमि और रक्त के महत्व को ही प्रदर्शित नहीं करता, बल्कि आपसी समाजीकरण का भी महत्व रखता है। वो आगे कहते है कि सामान्य वंश के आधार पर ‘असबिय्या’ एक स्थिर और सुरक्षित शासन को मजबूत करने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने अरबी क्षेत्रों में मजहब और सगोत्रता (Kinship) से मिश्रित सरकार सबसे ज़्यादा मजबूत सरकार मानी है।

इसलिए, लोकतांत्रिक मूल्य या लोकतांत्रिक सरकार यहाँ की राजनीतिक संस्कृति (Political Culture) का कभी हिस्सा ही नहीं रही। ऐसे में इन देशों में लोकतंत्र का आना बहुत कठिन हो जाता है। एक तरीक़े से देखें तो क़बीला और राज्य वैचारिक तौर पर एक दूसरे से विपरीत हैं। पहचान, राजनीतिक निष्ठा और व्यवहार के आधार के रूप में, क़बीला सगोत्रता (Kinship) और पितृवंशीय वंश के संबंधों को प्रमुखता देती है, जबकि राज्य सभी व्यक्तियों की एक केंद्रीय सत्ता के प्रति वफादारी पर जोर देता है, चाहे उनका एक-दूसरे से कोई संबंध क्यों न हो।

क़बीला व्यक्तिगत, नैतिक और अनुवांशिक कारकों पर जोर देती है, वहीं राज्य अवैयक्तिक है, और उपलब्धि को मान्यता देता है। क़बीला सामाजिक रूप से सजातीय, समतावादी और खंडीय है, वहीं राज्य विजातीय और श्रेणीबद्ध है। जनजाति व्यक्ति के भीतर की भावना है; राज्य बाहरी है। ऐसे में अरबी समाज की राजनीति समझना थोड़ा कठिन हो जाता है क्योंकि यहाँ क़बीला और राज्य एक दूसरे पर आश्रित है। भले ही इन क़बीलों की वास्तविक संरचना पहले जैसी नहीं हो, लेकिन वो अभी भी अपने सामाजिक और राजनीतिक भूमिका को बना कर रखते हैं।

क़बीलों का प्रभाव इन देशों के राजनीतिक तंत्र (Political System) में साफ़ देखने को मिलता है। ऐसे में अरबी समाज में लोकतांत्रिक मूल्यों का आना कठिन हो जाता है। अरबी क्षेत्र में तेल मिलने के बाद से बड़ा बदलाव आया है। तेल से आने वाले राजस्व (Revenues) सरकार को पर्याप्त धन प्रदान करती है। अरब प्रायद्वीप के शासक परिवार अपने प्रति वफादारी बनाए रखने के लिए शक्तिशाली क़बीलों को लंबे समय से सब्सिडी देते रहे हैं।

खाड़ी मुल्क अपनी जनता को बहुत सारी सामाजिक कल्याणकारी नीतियों द्वारा सहायता करते हैं। इनमें विधवा, गरीब, अनाथ और दिव्यंगों के लिए पेंशन और आर्थिक सहायता भी शामिल है। ऐसे में सरकार सामाजिक समूहों के गठन जो राजनीतिक अधिकारों की माँग करने की कोशिश करती है, उन्हें दबा देती है। आर्थिक अधिकारों का पूरा होना और क़बीले या ‘सामूहिक भावना’ के कारण अपने राजनीतिक अधिकारों में कमी बर्दाश्त कर लेना, लोकतांत्रिक मूल्यों को इन देशों में आने से रोक देता है।

इन देशों के जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा प्रवासी लोगों का है। वो वहाँ अच्छी नौकरी के अवसर में जाते हैं। उनमें कुछ वही बस जाते हैं और कुछ काम कर के अपने देश लौट जाते हैं। ज़्यादातर प्रवासी मज़दूर इन देशों में निचले स्तर के काम जैसे, ड्राइवरी, घरेलू कामकाज, पेट्रोल पम्प पर तेल बेचना, साफ़-सफ़ाई इत्यादि करते है। इसके कारण इन देशों में स्थानीय लोग लोअर क्लास में नहीं आते और ये प्रवसी मज़दूर इनका जगह ले लेते है।

ऐसे में यहाँ की स्थानीय जनता सुखी और संपन्न रूप से अपना जीवन यापन करती है। बुनियादी ज़रूरत और आर्थिक स्वतंत्रता पूरा होने के कारण यहाँ के लोग अपने राजनीतिक अधिकारों में कटौती स्वीकार कर लेते है।