इंटरव्यू का स्क्रीनशॉट (फोटो साभार - YouTube/The Wire) वामपंथी प्रोपेगेंडा पोर्टल द वायर ने शुक्रवार (7 अगस्त 2026) को एक क्लिप शेयर की, जिसमें ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल (AICC) का अध्यक्ष और गुड शेफर्ड चर्च ऑफ इंडिया के प्राइमेट आर्कबिशप जोसेफ डिसूजा फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन अमेंडमेंट बिल, 2026 (FCRA Bill 2026) को ईसाई संस्थानों की लूट और चोरी और संघ परिवार का एजेंडा बताते हुए नजर आया।
जिस पॉडकास्ट में करण थापर ने जोसेफ डिसूजा का इंटरव्यू लिया था, वह 4 महीने पहले 2 अप्रैल 2026 को प्रसारित हुआ था। डिसूजा जो घोटाले का आरोपित और विदेशी फंडिंग प्राप्त ईसाई पादरी हैं, उसको द वायर बार-बार FCRA संशोधनों को लेकर मोदी सरकार को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल कर रहा है। ये संशोधन संदिग्ध और अवैध फंडिंग, अवैध धर्मांतरण और अन्य गतिविधियों पर शिकंजा कसेंगे।
क्लिप शेयर करके द वायर उन आरोपों और झूठ की मुहिम में शामिल हो गया, जिन्हें कई निहित स्वार्थ वाले समूह FCRA बिल के खिलाफ लगातार आगे बढ़ा रहे हैं। यह क्लिप डिसूजा द्वारा पत्रकार करण थापर को दिए गए एक इंटरव्यू से ली गई थी।
इंटरव्यू की शुरुआत थापर इस घोषणा के साथ करता हैं कि FCRA बिल में कठोर और देखने में असंवैधानिक उपाय शामिल हैं, जिस पर डिसूजा बिल को लेकर अपने खुद के निराधार दावे जोड़ता हैं।
द वायर पर घोटाले के आरोपित जोसेफ डिसूजा ने FCRA को कहा ईसाई संस्थानों की लूट और चोरी
थापर की बात से सहमति जताते हुए डिसूजा ने दावा किया कि अगर यह बिल पास हो जाता है, तो इससे वह संभव हो सकेगा जिसे भारतीय ईसाई समुदाय और वैश्विक ईसाई समुदाय की कानूनी लूट को बढ़ावा मिलेगा।
अपने गंभीर आरोप को समझाते हुए डिसूजा ने दावा किया कि यह बिल ईसाई संस्थानों की संपत्तियों और परिसंपत्तियों पर कब्जा करने की एक चाल है। उसने आगे दावा किया कि बिल के तहत प्रस्तावित डेजिग्नेटिड अथॉरिटी को उन संगठनों के विदेशी योगदान और संपत्तियों पर स्थायी नियंत्रण लेने की व्यापक शक्तियाँ दी गई हैं, जिनका विदेशी योगदान पंजीकरण रद्द, समर्पित या समाप्त हो जाता है।
जोसेफ डिसूजा ने आगे दावा किया कि यह बिल प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है, क्योंकि डेजिग्नेटिड अथॉरिटी के फैसले न्यायिक समीक्षा या न्यायिक जाँच के अधीन नहीं हैं।
ईसाई चर्च के प्रति RSS की ऐतिहासिक दुश्मनी
डिसूजा ने आरोप लगाया कि सरकार इस प्रावधान का गलत इस्तेमाल कर सकती है। वह किसी संगठन के नवीनीकरण आवेदन को समय पर मंजूर नहीं करके या उस पर कार्रवाई नहीं करके ऐसा कर सकती है, जिससे संगठन की संपत्तियाँ जब्त हो जाएँगी।
उसने FCRA बिल को अल्पसंख्यक अधिकारों पर सीधा हमला बताते हुए इसे देश के ईसाई संस्थानों को हड़पने के RSS के एजेंडे को आगे बढ़ाने वाला बताया।
उसने बिल लाने के पीछे सरकार की वैचारिक मंशा होने का आरोप लगाया। उसने दावा किया कि RSS की मदर टेरेसा और ईसाई चर्च के प्रति ऐतिहासिक दुश्मनी ही FCRA बिल के पीछे की वजह है।
बिल को अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए खतरा बताते हुए आर्कबिशप ने इसकी तुलना नाजी जर्मनी में बनाए गए यहूदी मामलों के कार्यालय, जिसे रेफरेट IV B4 कहा जाता था, से की। यह कार्यालय यहूदी लोगों की संपत्तियों, संस्थानों, सिनेगॉग और उनकी हर चीज को हड़पने के लिए बनाया गया था।
ईसाई समुदाय को कमजोर करना
आर्कबिशप ने आरोप लगाया कि सरकार की आर्थिक लूट करने और ईसाई समुदाय को कमजोर करने की साजिश को FCRA बिल का रूप दिया गया है। उसने विदेशी फंडिंग से जुड़ी राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंताओं को खारिज कर दिया और RSS पर आतंकवाद का आरोप लगाया।
उसने दावा किया कि ईसाई संगठनों की विदेशी फंडिंग की जाँच जरूरी नहीं है, क्योंकि ईसाई आतंकवादी गतिविधियों में शामिल नहीं हैं। डिसूजा ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि बिल का उद्देश्य चर्चों में आने वाले उस विदेशी धन और उससे होने वाली आय को नियंत्रित करना है, जिसका इस्तेमाल धर्मांतरण के लिए किया जाता है।
उसने आगे दावा किया कि भारत में ईसाई संगठन धर्मांतरण की गतिविधियों में शामिल होते हैं और सरकार को आधुनिक ईसाई धर्म की कोई समझ नहीं है। उसने धमकी दी कि बिल लाकर सरकार वैश्विक स्तर पर और संयुक्त राष्ट्र में एक बड़ा विवाद खड़ा कर देगी।
उसने कहा कि इस कार्रवाई के वैश्विक स्तर पर असर होंगे और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की ओर से प्रतिक्रिया और विरोध का सामना करना पड़ेगा। आर्कबिशप ने धमकी दी कि अगर बिल संसद में पास हो गया, तो ईसाई संगठन देश और दुनिया की अदालतों का रुख करेंगे, अपने वैश्विक साझेदारों को उनकी अदालतों में जाने देंगे।
जोसेफ डिसूजा – हिंदुओं के खिलाफ नफरत का अभियान चलाने वाला व्यक्ति, 296.6 करोड़ रुपए निजी बैंक खातों में डायवर्ट करने का आरोप
डिसूजा खुद को दलितों और हाशिए पर मौजूद समुदायों की आवाज के रूप में पेश करता हैं, लेकिन FCRA बिल पर चर्चा में वह कोई निष्पक्ष आवाज नहीं है। अतीत में उन्हें विदेशी फंडिंग और वित्तीय अनियमितताओं को लेकर जाँच का सामना करना पड़ा है।
वह और उसके पश्चिमी सहयोगी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह नैरेटिव आगे बढ़ाने के लिए कुख्यात है कि वो भारत के उन उत्पीड़ित, पिछड़े या अछूत समुदायों से आता है, जिन्होंने बाद में ईसाई धर्म अपना लिया।
गुड शेफर्ड चर्च और उससे जुड़े संगठनों के तहत स्कूलों, अस्पतालों और सामाजिक सेवा संगठनों समेत उसके संस्थानों के नेटवर्क को विदेशी फंडिंग मिलती है और हजारों अन्य NGO की तरह पिछले वर्षों में FCRA अनुपालन जाँच का सामना कर चुका है।
जोसेफ डिसूजा ने दलित फ्रीडम नेटवर्क की सह-स्थापना की थी, जिसका बाद में नाम बदलकर डिग्निटी फ्रीडम नेटवर्क (DFN) कर दिया गया। यह नेटवर्क अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और यूनाइटेड किंगडम में प्रमुख शाखाएँ संचालित करता है।
इन संगठनों से जुड़ी उसकी वेबसाइट और प्रचार सामग्री भारत की बेहद नकारात्मक तस्वीर पेश करती हैं और भारत में दलितों और ईसाइयों को कीड़ों की तरह मारा जा रहा है जैसे झूठ फैलाती हैं।
तेलंगाना CID और प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मनी लॉन्ड्रिंग और वित्तीय गबन से जुड़े गंभीर आरोपों के संबंध में आरोप लगाए जाने के बाद जोसेफ डिसूजा जाँच के घेरे में आया।
उस पर और उसके बेटे जोश लॉरेंस डिसूजा पर गरीब दलित बच्चों की मुफ्त शिक्षा और कल्याण के लिए जुटाए गए लगभग 296.6 करोड़ रुपए के विदेशी फंड को फर्जी बिलों और शेल कंपनियों के जरिए निजी बैंक खातों, फिक्स्ड डिपॉजिट और महंगी रियल एस्टेट में निवेश करने के लिए डायवर्ट करने का आरोप लगाया गया।
डिसूजा उन प्रमुख लोगों में से एक हैं, जिन्होंने भारत को बदनाम करने के लिए ईसाइयों के खिलाफ बढ़ती नफरत का झूठ फैलाया। ऑपइंडिया ने डिसूजा, उसके घोटाले और उसके विदेशी फंडिंग पर विस्तृत रिपोर्ट की है।
आर्कबिशप के झूठ का पर्दाफाश
FCRA बिल को लेकर डर फैलाने वाली बातें उन वर्गों की ओर से आ रही हैं, जिन्हें नए कानून के तहत वैध जाँच का सामना करना पड़ सकता है। हालाँकि वास्तविकता उन बातों से काफी अलग है, जिस तरह कुछ निहित स्वार्थ वाले समूह इसे पेश कर रहे हैं।
Who is the kingpin of the lie about ‘Christian persecution in India? 🧵#OpIndia is going to reveal the nefarious designs of a scam tainted Christian pastor funded by the international Church network, now under the ED scanner, to defame India and Hindus.
प्रस्तावित बिल स्पष्ट रूप से सभी पूजा स्थलों को सरकारी कब्जे, धर्मनिरपेक्षीकरण या किसी दूसरे उद्देश्य में बदले जाने से सुरक्षा देता है।
सरकार को चर्चों और धार्मिक संस्थानों पर कब्जा करने की व्यापक शक्तियाँ दिए जाने के दावों की सच्चाई का पता प्रस्तावित बिल को सीधे पढ़कर लगाया जा सकता है। प्रस्तावित बिल में एक प्रावधान इस प्रकार है:
“उप-धारा (6) में निहित किसी भी बात के बावजूद, नामित प्राधिकरण (डेजिग्नेटिड अथॉरिटी), जहाँ उसके पास स्थायी रूप से निहित कोई संपत्ति या उसका कोई हिस्सा पूजा स्थल है, वहाँ ऐसी संपत्ति या उसके हिस्से का प्रबंधन या संचालन ऐसे व्यक्ति को, ऐसे तरीके से और ऐसी शर्तों पर सौंपेगा, जो निर्धारित की जा सकती हैं और यह सुनिश्चित करेगा कि ऐसे पूजा स्थल का धार्मिक स्वरूप बरकरार रहे।“
डिसूजा के दावे के विपरीत, डेजिग्नेटिड अथॉरिटी द्वारा पारित कोई भी आदेश प्रशासनिक समीक्षा और जिला न्यायाधीश के समक्ष न्यायिक अपील के अधीन रहेगा। इसके अलावा, केंद्र की पूर्व अनुमति के बिना राज्य स्तर की एजेंसियों को स्थानीय मुकदमे शुरू करने से रोक दिया गया है। यह मनमानी स्थानीय कार्रवाई के खिलाफ एक स्पष्ट सुरक्षा उपाय है।
FCRA बिल ईसाई धर्म समेत किसी भी धर्म के लिए विदेशी फंडिंग पर रोक नहीं लगाता। चर्च, मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारे समेत पूजा स्थल वास्तविक धार्मिक कार्यों के लिए विदेशी दान प्राप्त करते रहेंगे।
जोसेफ डिसूजा पर खुद अधिकारियों ने FCRA नियमों के उल्लंघन का लगाया है आरोप
जाँचकर्ताओं के अनुसार, गृह मंत्रालय (MHA) ने नेटवर्क से जुड़े प्रमुख संगठनों के FCRA लाइसेंस नियामकीय उल्लंघनों के कारण पहले निलंबित और बाद में रद्द कर दिए थे।
इसके बावजूद विदेशी फंड अप्रत्यक्ष माध्यमों से भारत में आते रहे। FCRA लाइसेंस रद्द होने का मतलब था कि संगठन सीधे विदेशी दान प्राप्त नहीं कर सकते थे। जाँचकर्ताओं ने आरोप लगाया कि इसके बाद डिसूजा ने अपनी व्यावसायिक इकाई OMBF (ओम बुक्स फाउंडेशन) का इस्तेमाल एक वैकल्पिक रास्ते के रूप में किया।
आरोपों के अनुसार, प्रिंटिंग और पब्लिशिंग सेवाओं के लिए बढ़े-चढ़े और फर्जी बिल तैयार किए गए और उन्हें विदेशों में मौजूद संबंधित या कथित रूप से संबद्ध संगठनों को भेजा गया।
इन लेनदेन को वैध व्यावसायिक गतिविधियों के रूप में पेश किया गया, जिससे यह दिखाया जा सके कि विदेशी संगठनों ने किताबों और प्रकाशनों का ऑर्डर दिया था। जाँचकर्ताओं का दावा है कि इस व्यवस्था का इस्तेमाल सीधे विदेशी योगदान पर लगी पाबंदियों के बावजूद विदेशी फंड को भारत में भेजते रहने के लिए किया गया।
जाँचकर्ताओं ने आरोप लगाया कि ऊपर बताई गई गतिविधियों के जरिए जुटाए गए लगभग 296.6 करोड़ रुपए को रियल एस्टेट और अन्य परिसंपत्तियों में निवेश के माध्यम से मनी लॉन्ड्रिंग की गई।
प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत जाँच करते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पाया कि जोसेफ डिसूजा, उसके बेटे जोश लॉरेंस डिसूजा और करीबी सहयोगियों ने इन गतिविधियों से जुड़े फंड का इस्तेमाल करके महंगे जमीन के टुकड़े, कमर्शियल संपत्तियाँ और लग्जरी विला खरीदे थे।
जिसे ED ने अपराध से अर्जित आय (proceeds of crime) के रूप में वर्गीकृत किया, उस पर कार्रवाई के तहत ED ने 12 प्रमुख अचल संपत्तियों को अटैच और फ्रीज किया। इनकी संयुक्त बाजार कीमत 15 करोड़ रुपए से अधिक आंकी गई थी।
इसके बाद इन फंड को कागजी लेनदेन और फर्जी बिलों के जरिए निजी संपत्तियों और ऐशो-आराम वाली जीवनशैली में डायवर्ट किया गया, बजाय इसके कि इनका इस्तेमाल उन लाभार्थियों के लिए किया जाता, जिनके लिए ये फंड जुटाए गए थे।
राजनीतिक संबंध, भारतीय लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम और कॉन्ग्रेस के साथ वैचारिक तालमेल
जोसेफ डिसूजा के आलोचकों का कहना है कि उसका प्रभाव मजहबी गतिविधियों से आगे तक फैला हुआ है और उसने भारत के राजनीतिक तथा मीडिया इकोसिस्टम के कुछ हिस्सों के साथ करीबी संबंध बनाए रखे हैं।
उसका दावा है कि जब भी वित्तीय आरोपों से जुड़ी कानूनी कार्रवाई तेज होती है, तो राजनीतिक समर्थन तंत्र ऐसी कार्रवाइयों को राजनीतिक या वैचारिक रूप से प्रेरित बताने के लिए सक्रिय हो जाते हैं। जोसेफ डिसूजा का वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेतृत्व के साथ संबंध कई वर्षों पुराना है।
2004 के आम चुनाव के बाद, जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार चुनाव हार गई और सोनिया गाँधी के नेतृत्व में यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस (UPA) सत्ता में आया, तब डिसूजा ने अमेरिका में चर्च नेटवर्क को पत्र लिखकर इस नतीजे को दैवीय न्याय (Divine Justice) और एक बड़ा चमत्कार बताया था।
उस समय डिसूजा ऑल इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल के वैश्विक अध्यक्ष के रूप में काम कर रहा था। ब्रेकिंग इंडिया के अनुसार, इन दावों और संबंधित दस्तावेजों पर किताब के अध्याय 8 में चर्चा की गई है।
इस तरह के राजनीतिक बयान जोसेफ डिसूजा जैसे लोगों से जुड़ी ED और CID की चल रही जाँच को मजहबी उत्पीड़न के मुद्दे के रूप में पेश करने का काम करते हैं, जिससे एक राजनीतिक सुरक्षात्मक नैरेटिव तैयार होता है। हालाँकि यह स्थापित कानूनी निष्कर्ष के बजाय राजनीतिक व्याख्या और अलग-अलग दृष्टिकोणों का मामला है।
मूल रूप से, द वायर ने न केवल एक ऐसे बिशप को मंच दिया, बल्कि बार-बार उनके निराधार आरोपों और खुले झूठ को भी आगे बढ़ाया, जिन्होंने ईसाई उत्पीड़न को लेकर झूठ फैलाते हुए भारत विरोधी और हिंदू विरोधी अभियान चलाया, जिन पर करोड़ों रुपए के घोटाले का आरोप है और जिन्होंने खुद FCRA नियमों का उल्लंघन किया है। यह सब प्रस्तावित FCRA संशोधनों के बारे में झूठ फैलाने के लिए किया गया, जो उसके जैसे घोटालेबाजों पर शिकंजा कसेंगे।
मोदी सरकार द्वारा विदेशी फंडिंग कानून (FCRA – Foreign Contribution Regulation Amendment Bill) को मजबूत और पारदर्शी बनाने के कदम से देश ही नहीं, बल्कि विदेशी ताकतों के पेट में दर्द शुरू हो गया है। जैसे ही सरकार ने भारत की संप्रभुता की सुरक्षा और संदिग्ध विदेशी पैसों के खेल पर लगाम लगाने के लिए शिकंजा कसा, भारत के विपक्षी दलों से लेकर अमेरिकी नेताओं और अंतरराष्ट्रीय लॉबी में हड़कंप मच गया है। सवाल यह उठ रहा है कि अगर फंडिंग साफ-सुथरी और राष्ट्रहित में है, तो आखिर इन विदेशी और देश विरोधी ताकतों को मोदी सरकार के कड़े नियमों से इतना डर क्यों लग रहा है?
दरअसल, FCRA में प्रस्तावित संशोधनों का मुख्य उद्देश्य भारत में आने वाले अरबों रुपये के विदेशी फंड के गलत इस्तेमाल, अवैध धर्मांतरण, और भारत विरोधी प्रोपेगैंडा को रोकना है। सालों से एनजीओ और चैरिटी के नाम पर आने वाले विदेशी पैसे का इस्तेमाल भारत की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप करने के लिए किया जा रहा था। जब मोदी सरकार ने इस संदिग्ध तंत्र की रीढ़ की हड्डी पर प्रहार किया, तो भारत के विपक्षी नेता और विदेशी लॉबिस्ट एक सुर में चिल्लाने लगे हैं। यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि सरकार का यह कदम बिल्कुल सही दिशा में है और इससे भारत विरोधी विदेशी तंत्र के नेटवर्क की परतें उधड़ रही हैं।
महा-खुलासा! अमित शाह ही क्यों हैं असली निशाना? क्या आपने कभी सोचा है कि हाल ही में जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शनों से लेकर संसद तक—शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांगने वालों का असली निशाना धर्मेंद्र प्रधान नहीं, बल्कि गृह मंत्री अमित शाह ही क्यों हैं? आइए, इस खेल की गहराई को समझते हैं।
कांग्रेस की यूपीए सरकार के दौरान 2005 से 2014 के बीच देश में 2,200 से ज्यादा प्रमाणित (verified) आतंकी हमले हुए थे। दिल्ली, मुंबई, जयपुर, पुणे जैसे प्रमुख शहरों में आए दिन बम धमाके होते थे और लोग बाजारों, बसों, ट्रेनों, सार्वजनिक कार्यक्रमों तथा मंदिरों में जाने से डरते थे। उस दौर को भारत का ‘Lost Decade‘ (2004 to 2014) माना जाता है।
लेकिन 2014 से 2026 के बीच जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में शांति का माहौल है और आतंकी घटनाओं में 70 प्रतिशत से ज्यादा की भारी कमी आई है। ऐसा इसलिए संभव हुआ क्योंकि गृह मंत्री अमित शाह ने पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल से लगी सीमाओं को पूरी तरह सील कर दिया, आतंकवादियों का सफाया किया, मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद का सफाया कर दिया और ड्रग सिंडिकेट की कमर तोड़ दी। अब जब अमित शाह ने अवैध धर्मांतरण और प्रोपेगैंडा फैलाने वाले FCRA फंडिंग पर सीधा प्रहार किया है, तो पूरा वामपंथी और लिबरल इकोसिस्टम बौखलाकर उन्हें अपना मुख्य निशाना बना रहा है।
FCRA के विरोध में कौन-कौन? विदेशी फंडिंग पर कड़ाई होते ही वही पुरानी ‘भारत विरोधी’ लॉबी और विपक्षी दल एक साथ गोलबंद हो गए हैं। इस राष्ट्रहित के कदम का विरोध कौन और क्यों कर रहा है:
FCRA को लेकर गोवा और छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी की सक्रियता सहानुभूति का नाटक करने वाली आम आदमी पार्टी (AAP) अब गोवा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में FCRA संशोधन के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश कर रही है। जिन राज्यों में धर्मांतरण और विदेशी एनजीओ के जरिए अंदरूनी नेटवर्क की शिकायतें आती रही हैं, वहां AAP का इस बिल के विरोध में कूदना उनकी वोट बैंक और विदेशी समर्थित एजेंडे की राजनीति को उजागर करता है।
केजरीवाल का गोवा दौरा और असल मकसद पर सवाल आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल इन दिनों गोवा के दौरे पर हैं। सवाल यह उठता है कि एक तरफ जहां संसद में FCRA संशोधन बिल लाए जाने की आहट तेज है, वहीं केजरीवाल ऐसी कौन सी आपात बैठकें करने गोवा पहुंचे हैं। हालांकि ऊपर से यह दिखाया जा रहा है कि वे उत्तरी गोवा के आजाद मैदान में ‘सेव करापुर’ आंदोलन में हिस्सा ले रहे हैं और 1,800 फ्लैटों की आवासीय परियोजना के खिलाफ नगर एवं ग्राम नियोजन अधिनियम की धारा 39ए को निरस्त करने की मांग कर रहे हैं, लेकिन अंदरखाने यह कयास लगाए जा रहे हैं कि इस दौरे का असल मकसद विदेशी फंडिंग से चलने वाले स्थानीय नेटवर्क को लामबंद करना है।
This evening, I addressed a large gathering of super-energetic Aam Aadmi Party volunteers in Cortalim, Goa.
Our volunteers have a huge responsibility on their shoulders. AAP is Goa’s hope. It is up to us to free our Goa from BJP's exploitation and loot. pic.twitter.com/p4KBbx28Hg
संजय सिंह की छत्तीसगढ़ में हलचल और राजनीतिक एजेंडे पर उठते सवाल इसी कड़ी में आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय सिंह छत्तीसगढ़ के दौरे पर हैं। दिखावे के लिए वे हसदेव के जंगलों में पेड़ों की कटाई जैसे स्थानीय मुद्दों पर राजनीति कर रहे हैं और सरकार पर निशाना साध रहे हैं, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस दौरे का एक उद्देश्य FCRA बिल के खिलाफ माहौल बनाना भी हो सकता है। चर्चा यह भी है कि विपक्षी नेता स्थानीय स्तर पर FCRA संशोधन से प्रभावित होने वाले संगठनों और धर्मांतरण/फंडिंग के आरोपों से घिरे नेटवर्कों को लामबंद करने की रणनीति बना रहे हैं।
#WATCH | Gariyaband, Chhattisgarh: On the FCRA Bill, AAP MP Sanjay Singh says, “Let the Bill first be introduced in the BAC (Business Advisory Committee)... What they are planning to do regarding UPI right now is quite dangerous. They are using the pretext of imposing taxes on… pic.twitter.com/x5P18n4oi1
अमेरिकी एंबेसडर की केरल यात्रा FCRA बिल की आहट के बीच ही अमेरिकी राजदूत का अचानक केरल दौरा कई सवाल खड़े करता है। केरल, जहां बड़ी संख्या में विदेशी फंडिंग पाने वाले संस्थान मौजूद हैं, वहां अमेरिकी दूतावास की यह हलचल दर्शाती है कि वाशिंगटन की नजरें भारत के इस आंतरिक सुरक्षा कानून पर टिकी हुई हैं।
#WATCH | Alappuzha, Keralam: US Ambassador to India Sergio Gor says, "I'm visiting this state for the first time. We had an absolutely incredible time visiting the backwaters here. It's a great place to visit. I highly encourage a lot of other people to here and visit. We only… https://t.co/KS42v95SUjpic.twitter.com/ghikEgzwCz
अमेरिकी सांसदों का खुला विरोध और ‘ईसाई विरोधी’ कार्ड अमेरिकी राजनीति में बैठे भारत विरोधी तत्व इस बिल को दबाने के लिए हर संभव दबाव बना रहे हैं। अमेरिकी सांसद राइली मूर (Riley Moore) ने खुलकर इस बिल का विरोध किया और इसे ‘ईसाई विरोधी’ बताकर एक पूरी तरह से प्रशासनिक सुरक्षा कानून को धार्मिक रंग देने की कोशिश की है।
Christians have been in India since St. Thomas the Apostle traveled to the Malabar Coast just decades after the resurrection of our Lord Jesus Christ.
But despite this long Christian history, India’s Parliament is considering amending Foreign Contribution Regulation Amendment…
चर्च के मिशनरी और JPC की मांग चर्च से जुड़े मिशनरी संगठन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर मांग कर रहे हैं कि इस बिल को वापस लिया जाए या इसे संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास ठंडे बस्ते में भेजने के लिए भेजा जाए। हालांकि गृह मंत्री अमित शाह स्पष्ट कर चुके हैं कि यह बिल पूरी तरह से धर्म-निरपेक्ष और पारदर्शी कानून है, जिससे किसी वैध धर्म या संस्था को डरने की जरूरत नहीं है।
ईसाई समुदाय के नेताओं ने गृह मंत्री AmitShah के लिए 'रेडलाइन' तय कीं
गृह मंत्री अमित शाह के साथ बैठक के दौरान ईसाई समुदाय के नेताओं ने कहा: "FCRA बिल वापस लें या JPC को भेजें
FCRA बिल से देश और विदेश के सारे कीटाणु बाहर आएगे भाजपा सरकार जो भी करती है देश हित मे ही करती है 🙏 pic.twitter.com/DXDXdpgEv1
अचानक केरल क्यों पहुंचे ट्रंप के दामाद माइकल बूलोस? FCRA संशोधन बिल की चर्चाओं और विदेशी फंडिंग पर कसते शिकंजे के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद और प्रमुख कारोबारी माइकल बूलोस का अचानक केरल पहुंचना भी गहरे राजनीतिक सवाल खड़े करता है। हालांकि आधिकारिक तौर पर इसे एक निजी यात्रा बताया जा रहा है, जहां भारी मानसूनी बारिश के बीच उन्होंने अलप्पुझा में हाउसबोट से बैकवॉटर का आनंद लिया और आगामी नेहरू ट्रॉफी बोट रेस से पहले पर्यटन को बढ़ावा मिला। लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे महज एक संयोग नहीं मान रहे हैं। जिस तरह से केरल में विदेशी फंडिंग और एनजीओ नेटवर्क पर गाज गिरने की आशंका है, ऐसे में अमेरिकी एंबेसडर के साथ-साथ ट्रंप के पारिवारिक और व्यावसायिक नेटवर्क से जुड़े व्यक्ति की केरल में मौजूदगी कई तरह की रणनीतिक लॉबिंग की ओर इशारा करती है।
कांग्रेस पार्टी का संसद में विरोध विदेशी फंडिंग की ढील से सबसे ज्यादा लाभ उठाने वाली कांग्रेस पार्टी इस बिल के खिलाफ आक्रामक है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और प्रमोद तिवारी जैसे नेताओं ने संसद में इस बिल को हर कीमत पर रोकने और सरकार को घेरने की घोषणा की है।
#WATCH | दिल्ली | कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने कहा, "FCRA पर हम इसे एक बड़े समुदाय के खिलाफ मानते हैं। ये देश के खिलाफ है, देश की शिक्षा, देश की प्रगति में जो एक संसाधन था उसकी कमी होगी। हम इसका विरोध करते हैं। जहां तक सवाल सदन के नहीं चलने का है पूरी जिम्मेदारी सरकार की है ये… pic.twitter.com/z4e8WFT9Dn
सुप्रिया सुले: हर फंडिंग को शक की निगाह से नहीं देखें एनसीपी (शरद पवार गुट) की कार्यकारी अध्यक्ष सुप्रिया सुले और वामपंथी (Left) दलों ने भी विदेशी फंडिंग के इस शिकंजे पर आपत्ति जताई है। सुप्रिया सुले का कहना है कि हर विदेशी फंडिंग को शक की निगाह से नहीं देखा जाना चाहिए, जबकि इतिहास गवाह है कि इसी फंडिंग के दम पर वामपंथी विचारधारा देश में जड़े जमाए बैठी थी।
VIDEO | NCP (SP) opposes the FCRA Bill in its current form; party leader Supriya Sule says the bill must be discussed and referred to a Joint Parliamentary Committee. pic.twitter.com/uaKOqUg7r3
इंडी गठबंधन की एकजुटता के पीछे छुपा एजेंडा संसद में विपक्षी दल ‘INDIA’ ब्लॉक के तहत इस बिल को रोकने के लिए व्हिप जारी कर रहे हैं। यह एकजुटता देश की सुरक्षा के बजाय उन संदिग्ध एनजीओ और संस्थानों के हितों की रक्षा के लिए दिख रही है जो चुनाव और जनमत को प्रभावित करने का काम करते हैं।
विदेशी एनजीओ और कॉरपोरेट लॉबी की छटपटाहट भारत में काम करने वाले कई बड़े अंतरराष्ट्रीय एनजीओ (जैसे एम्नेस्टी या ग्रीनपीस समर्थित नेटवर्क), जिन पर पहले भी बिना किसी जवाबदेही के भारत की विकास परियोजनाओं (जैसे माइनिंग, पावर प्रोजेक्ट्स) को रोकने का आरोप रहा है, वे भी पर्दे के पीछे से इस बिल के खिलाफ लॉबिंग कर रहे हैं।
राष्ट्रहित सर्वोपरि: संप्रभुता से कोई समझौता नहीं FCRA बिल पर मचा यह बवंडर इस बात की सबसे बड़ी पुष्टि है कि मोदी सरकार ने एक बार फिर देश की आंतरिक सुरक्षा के सबसे कमजोर चोर-दरवाजे पर ताला जड़ दिया है। जब विदेशी देश, अमेरिकी सांसद और देश का पूरा विपक्ष किसी कानून के खिलाफ एक साथ खड़े हो जाएं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह फैसला देश के हित में सबसे सही कदम है। भारत अपनी संप्रभुता और सीमाओं की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा, और किसी भी विदेशी ताकत को पैसों के दम पर देश के लोकतंत्र में हस्तक्षेप करने की इजाजत नहीं दी जाएगी। देश को सुरक्षित और महफूज रखने की यह जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की ही नहीं, बल्कि हम 140 करोड़ भारतीयों की भी है।