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FCRA बिल से भारत में ‘टुकड़े-टुकड़े’ गैंग से लेकर अमेरिका तक हड़कंप!

साभार 
मोदी सरकार द्वारा विदेशी फंडिंग कानून (FCRA – Foreign Contribution Regulation Amendment Bill) को मजबूत और पारदर्शी बनाने के कदम से देश ही नहीं, बल्कि विदेशी ताकतों के पेट में दर्द शुरू हो गया है। जैसे ही सरकार ने भारत की संप्रभुता की सुरक्षा और संदिग्ध विदेशी पैसों के खेल पर लगाम लगाने के लिए शिकंजा कसा, भारत के विपक्षी दलों से लेकर अमेरिकी नेताओं और अंतरराष्ट्रीय लॉबी में हड़कंप मच गया है। सवाल यह उठ रहा है कि अगर फंडिंग साफ-सुथरी और राष्ट्रहित में है, तो आखिर इन विदेशी और देश विरोधी ताकतों को मोदी सरकार के कड़े नियमों से इतना डर क्यों लग रहा है?

दरअसल, FCRA में प्रस्तावित संशोधनों का मुख्य उद्देश्य भारत में आने वाले अरबों रुपये के विदेशी फंड के गलत इस्तेमाल, अवैध धर्मांतरण, और भारत विरोधी प्रोपेगैंडा को रोकना है। सालों से एनजीओ और चैरिटी के नाम पर आने वाले विदेशी पैसे का इस्तेमाल भारत की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप करने के लिए किया जा रहा था। जब मोदी सरकार ने इस संदिग्ध तंत्र की रीढ़ की हड्डी पर प्रहार किया, तो भारत के विपक्षी नेता और विदेशी लॉबिस्ट एक सुर में चिल्लाने लगे हैं। यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि सरकार का यह कदम बिल्कुल सही दिशा में है और इससे भारत विरोधी विदेशी तंत्र के नेटवर्क की परतें उधड़ रही हैं।

महा-खुलासा! अमित शाह ही क्यों हैं असली निशाना?
क्या आपने कभी सोचा है कि हाल ही में जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शनों से लेकर संसद तक—शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांगने वालों का असली निशाना धर्मेंद्र प्रधान नहीं, बल्कि गृह मंत्री अमित शाह ही क्यों हैं? आइए, इस खेल की गहराई को समझते हैं।

कांग्रेस की यूपीए सरकार के दौरान 2005 से 2014 के बीच देश में 2,200 से ज्यादा प्रमाणित (verified) आतंकी हमले हुए थे। दिल्ली, मुंबई, जयपुर, पुणे जैसे प्रमुख शहरों में आए दिन बम धमाके होते थे और लोग बाजारों, बसों, ट्रेनों, सार्वजनिक कार्यक्रमों तथा मंदिरों में जाने से डरते थे। उस दौर को भारत का ‘Lost Decade‘ (2004 to 2014) माना जाता है।

लेकिन 2014 से 2026 के बीच जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में शांति का माहौल है और आतंकी घटनाओं में 70 प्रतिशत से ज्यादा की भारी कमी आई है। ऐसा इसलिए संभव हुआ क्योंकि गृह मंत्री अमित शाह ने पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल से लगी सीमाओं को पूरी तरह सील कर दिया, आतंकवादियों का सफाया किया, मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद का सफाया कर दिया और ड्रग सिंडिकेट की कमर तोड़ दी। अब जब अमित शाह ने अवैध धर्मांतरण और प्रोपेगैंडा फैलाने वाले FCRA फंडिंग पर सीधा प्रहार किया है, तो पूरा वामपंथी और लिबरल इकोसिस्टम बौखलाकर उन्हें अपना मुख्य निशाना बना रहा है।

FCRA के विरोध में कौन-कौन?
विदेशी फंडिंग पर कड़ाई होते ही वही पुरानी ‘भारत विरोधी’ लॉबी और विपक्षी दल एक साथ गोलबंद हो गए हैं। इस राष्ट्रहित के कदम का विरोध कौन और क्यों कर रहा है:

FCRA को लेकर गोवा और छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी की सक्रियता
सहानुभूति का नाटक करने वाली आम आदमी पार्टी (AAP) अब गोवा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में FCRA संशोधन के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश कर रही है। जिन राज्यों में धर्मांतरण और विदेशी एनजीओ के जरिए अंदरूनी नेटवर्क की शिकायतें आती रही हैं, वहां AAP का इस बिल के विरोध में कूदना उनकी वोट बैंक और विदेशी समर्थित एजेंडे की राजनीति को उजागर करता है।

केजरीवाल का गोवा दौरा और असल मकसद पर सवाल
आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल इन दिनों गोवा के दौरे पर हैं। सवाल यह उठता है कि एक तरफ जहां संसद में FCRA संशोधन बिल लाए जाने की आहट तेज है, वहीं केजरीवाल ऐसी कौन सी आपात बैठकें करने गोवा पहुंचे हैं। हालांकि ऊपर से यह दिखाया जा रहा है कि वे उत्तरी गोवा के आजाद मैदान में ‘सेव करापुर’ आंदोलन में हिस्सा ले रहे हैं और 1,800 फ्लैटों की आवासीय परियोजना के खिलाफ नगर एवं ग्राम नियोजन अधिनियम की धारा 39ए को निरस्त करने की मांग कर रहे हैं, लेकिन अंदरखाने यह कयास लगाए जा रहे हैं कि इस दौरे का असल मकसद विदेशी फंडिंग से चलने वाले स्थानीय नेटवर्क को लामबंद करना है।

संजय सिंह की छत्तीसगढ़ में हलचल और राजनीतिक एजेंडे पर उठते सवाल
इसी कड़ी में आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय सिंह छत्तीसगढ़ के दौरे पर हैं। दिखावे के लिए वे हसदेव के जंगलों में पेड़ों की कटाई जैसे स्थानीय मुद्दों पर राजनीति कर रहे हैं और सरकार पर निशाना साध रहे हैं, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस दौरे का एक उद्देश्य FCRA बिल के खिलाफ माहौल बनाना भी हो सकता है। चर्चा यह भी है कि विपक्षी नेता स्थानीय स्तर पर FCRA संशोधन से प्रभावित होने वाले संगठनों और धर्मांतरण/फंडिंग के आरोपों से घिरे नेटवर्कों को लामबंद करने की रणनीति बना रहे हैं।

अमेरिकी एंबेसडर की केरल यात्रा
FCRA बिल की आहट के बीच ही अमेरिकी राजदूत का अचानक केरल दौरा कई सवाल खड़े करता है। केरल, जहां बड़ी संख्या में विदेशी फंडिंग पाने वाले संस्थान मौजूद हैं, वहां अमेरिकी दूतावास की यह हलचल दर्शाती है कि वाशिंगटन की नजरें भारत के इस आंतरिक सुरक्षा कानून पर टिकी हुई हैं।

अमेरिकी सांसदों का खुला विरोध और ‘ईसाई विरोधी’ कार्ड
अमेरिकी राजनीति में बैठे भारत विरोधी तत्व इस बिल को दबाने के लिए हर संभव दबाव बना रहे हैं। अमेरिकी सांसद राइली मूर (Riley Moore) ने खुलकर इस बिल का विरोध किया और इसे ‘ईसाई विरोधी’ बताकर एक पूरी तरह से प्रशासनिक सुरक्षा कानून को धार्मिक रंग देने की कोशिश की है।

चर्च के मिशनरी और JPC की मांग
चर्च से जुड़े मिशनरी संगठन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर मांग कर रहे हैं कि इस बिल को वापस लिया जाए या इसे संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास ठंडे बस्ते में भेजने के लिए भेजा जाए। हालांकि गृह मंत्री अमित शाह स्पष्ट कर चुके हैं कि यह बिल पूरी तरह से धर्म-निरपेक्ष और पारदर्शी कानून है, जिससे किसी वैध धर्म या संस्था को डरने की जरूरत नहीं है।

अचानक केरल क्यों पहुंचे ट्रंप के दामाद माइकल बूलोस?
FCRA संशोधन बिल की चर्चाओं और विदेशी फंडिंग पर कसते शिकंजे के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद और प्रमुख कारोबारी माइकल बूलोस का अचानक केरल पहुंचना भी गहरे राजनीतिक सवाल खड़े करता है। हालांकि आधिकारिक तौर पर इसे एक निजी यात्रा बताया जा रहा है, जहां भारी मानसूनी बारिश के बीच उन्होंने अलप्पुझा में हाउसबोट से बैकवॉटर का आनंद लिया और आगामी नेहरू ट्रॉफी बोट रेस से पहले पर्यटन को बढ़ावा मिला। लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे महज एक संयोग नहीं मान रहे हैं। जिस तरह से केरल में विदेशी फंडिंग और एनजीओ नेटवर्क पर गाज गिरने की आशंका है, ऐसे में अमेरिकी एंबेसडर के साथ-साथ ट्रंप के पारिवारिक और व्यावसायिक नेटवर्क से जुड़े व्यक्ति की केरल में मौजूदगी कई तरह की रणनीतिक लॉबिंग की ओर इशारा करती है।

कांग्रेस पार्टी का संसद में विरोध
विदेशी फंडिंग की ढील से सबसे ज्यादा लाभ उठाने वाली कांग्रेस पार्टी इस बिल के खिलाफ आक्रामक है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और प्रमोद तिवारी जैसे नेताओं ने संसद में इस बिल को हर कीमत पर रोकने और सरकार को घेरने की घोषणा की है।

सुप्रिया सुले: हर फंडिंग को शक की निगाह से नहीं देखें
एनसीपी (शरद पवार गुट) की कार्यकारी अध्यक्ष सुप्रिया सुले और वामपंथी (Left) दलों ने भी विदेशी फंडिंग के इस शिकंजे पर आपत्ति जताई है। सुप्रिया सुले का कहना है कि हर विदेशी फंडिंग को शक की निगाह से नहीं देखा जाना चाहिए, जबकि इतिहास गवाह है कि इसी फंडिंग के दम पर वामपंथी विचारधारा देश में जड़े जमाए बैठी थी।

इंडी गठबंधन की एकजुटता के पीछे छुपा एजेंडा
संसद में विपक्षी दल ‘INDIA’ ब्लॉक के तहत इस बिल को रोकने के लिए व्हिप जारी कर रहे हैं। यह एकजुटता देश की सुरक्षा के बजाय उन संदिग्ध एनजीओ और संस्थानों के हितों की रक्षा के लिए दिख रही है जो चुनाव और जनमत को प्रभावित करने का काम करते हैं। 

विदेशी एनजीओ और कॉरपोरेट लॉबी की छटपटाहट
भारत में काम करने वाले कई बड़े अंतरराष्ट्रीय एनजीओ (जैसे एम्नेस्टी या ग्रीनपीस समर्थित नेटवर्क), जिन पर पहले भी बिना किसी जवाबदेही के भारत की विकास परियोजनाओं (जैसे माइनिंग, पावर प्रोजेक्ट्स) को रोकने का आरोप रहा है, वे भी पर्दे के पीछे से इस बिल के खिलाफ लॉबिंग कर रहे हैं।

राष्ट्रहित सर्वोपरि: संप्रभुता से कोई समझौता नहीं
FCRA बिल पर मचा यह बवंडर इस बात की सबसे बड़ी पुष्टि है कि मोदी सरकार ने एक बार फिर देश की आंतरिक सुरक्षा के सबसे कमजोर चोर-दरवाजे पर ताला जड़ दिया है। जब विदेशी देश, अमेरिकी सांसद और देश का पूरा विपक्ष किसी कानून के खिलाफ एक साथ खड़े हो जाएं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह फैसला देश के हित में सबसे सही कदम है। भारत अपनी संप्रभुता और सीमाओं की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा, और किसी भी विदेशी ताकत को पैसों के दम पर देश के लोकतंत्र में हस्तक्षेप करने की इजाजत नहीं दी जाएगी। देश को सुरक्षित और महफूज रखने की यह जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की ही नहीं, बल्कि हम 140 करोड़ भारतीयों की भी है।