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जिस कांग्रेस ने बनाया FCRA, वही अब विदेशी फंडिंग को लेकर BJP सरकार को घेर रही: NGOs की अवैध फंडिंग रोकने पर क्यों मचा बवाल?

साभार 
कांग्रेस पार्टी इन दिनों मोदी सरकार पर विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम यानी FCRA के गलत इस्तेमाल का आरोप लगा रही है। कांग्रेस का कहना है कि सरकार FCRA के जरिए नागरिक समाज समूहों और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) पर दबाव बना रही है और राजनीतिक असहमति को रोकने की कोशिश कर रही है।

हालाँकि, FCRA का इतिहास काफी पुराना है। यह कानून पहली बार 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की सरकार के दौरान लाया गया था। इसके बाद राजीव गाँधी सरकार ने 1980 के दशक में इसमें बड़े बदलाव किए। 2010 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA सरकार ने नया FCRA कानून लागू किया, जिसने NGOs के विदेशी फंड पर निगरानी और सरकारी नियंत्रण को और बढ़ाया।

इंदिरा गाँधी के समय आया FCRA

FCRA की शुरुआत 1976 में हुई थी। उस समय देश में प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में आपातकाल लगा हुआ था। नागरिक स्वतंत्रताएं सीमित थीं, विपक्षी नेताओं को MISA यानी आंतरिक सुरक्षा रखरखाव अधिनियम के तहत जेल में रखा गया था और प्रेस पर भी कड़े प्रतिबंध थे।

इसी दौर में विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 1976 संसद में लाया गया। इसका उद्देश्य देश में आने वाले विदेशी पैसे और उसके इस्तेमाल को नियंत्रित करना था।

1976 के कानून के तहत साफ तौर पर इन लोगों के लिए विदेशी मेहमाननवाजी और विदेशी चंदे पर रोक लगा दी गई थी:

(a) चुनाव लड़ने वाला उम्मीदवार,
(b) पंजीकृत अखबार का संवाददाता, कॉलम लिखने वाला, कार्टूनिस्ट, संपादक, मालिक, प्रिंटर या प्रकाशक,
(c) न्यायाधीश, सरकारी कर्मचारी या किसी निगम का कर्मचारी,
(d) किसी भी विधानमंडल का सदस्य,
(e) राजनीतिक दल या उसका कोई पदाधिकारी।

पत्रकारों को कानून के तहत इस प्रतिबंधित सूची में शामिल किया जाना इंदिरा गाँधी की मंशा को साफ तौर पर दिखाता है। इसका उद्देश्य राजनीतिक विरोधियों, व्यंग्य लिखने वालों, स्वतंत्र पत्रकारों और नागरिक अधिकार समूहों को विदेशों से आर्थिक मदद मिलने से रोकना था। इस तरह आपातकाल के दौरान उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि सार्वजनिक जीवन में आर्थिक रूप से टिके रहने के लिए सरकार का नियंत्रण बना रहे।

राजीव गाँधी सरकार ने बढ़ाया सरकारी नियंत्रण

आपातकाल खत्म होने और जनता पार्टी सरकार के कार्यकाल के बाद कान्ग्रेस फिर सत्ता में लौटी। प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के समय 1985 में FCRA में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए।

इससे पहले संगठन कुछ परिस्थितियों में पूर्व सूचना या सामान्य अनुमति के आधार पर विदेशी योगदान ले सकते थे। लेकिन 1985 के संशोधन के बाद विदेशी फंड लेने वाले संगठनों के लिए गृह मंत्रालय (MHA) के साथ औपचारिक पंजीकरण जरूरी कर दिया गया।

इस बदलाव के बाद FCRA NGOs के लिए एक स्थायी और नौकरशाही आधारित निगरानी व्यवस्था बन गया। विदेशी फंड लेने वाले संगठनों को अब सरकार के सामने पंजीकरण और नियमों का पालन करना जरूरी था।

2010 में मनमोहन सिंह सरकार ने बनाया नया FCRA

FCRA में सबसे बड़ा बदलाव 2010 में हुआ। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA सरकार और तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम के कार्यकाल में विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 लागू किया गया।

इस कानून ने 1976 के पुराने FCRA को पूरी तरह खत्म कर उसकी जगह नया कानून लागू किया। नए कानून में NGOs और दूसरे संगठनों को मिलने वाले विदेशी फंड पर सरकार का नियंत्रण और बढ़ गया।

1976 के कानून के तहत FCRA पंजीकरण एक बार मिलने के बाद तब तक जारी रहता था, जब तक उसे रद्द नहीं किया जाता। लेकिन 2010 के कानून में पंजीकरण की अवधि 5 साल कर दी गई।

इसका मतलब था कि NGOs को अपना FCRA पंजीकरण समय-समय पर नवीनीकृत कराना पड़ता था। इससे सरकार के पास पंजीकरण को रोकने, उसमें देरी करने या उसे मंजूर नहीं करने का अधिकार और प्रभाव बढ़ गया।

2010 के FCRA की धारा 5 में ‘राजनीतिक प्रकृति के संगठन’ नाम की एक नई श्रेणी जोड़ी गई। इसके तहत सरकार को ऐसे संगठनों को विदेशी फंड लेने से रोकने की शक्ति मिली, जिन्हें राजनीतिक प्रकृति का माना जाता था। इसमें उन समूहों पर भी असर पड़ सकता था जो सरकारी नीतियों, बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स या दूसरी सरकारी योजनाओं के खिलाफ प्रदर्शन करते थे।

2010 के कानून की धारा 8 में विदेशी फंड के प्रशासनिक खर्च पर भी सीमा लगाई गई। इसके तहत किसी संगठन को मिले विदेशी योगदान का अधिकतम 50 प्रतिशत ही प्रशासनिक खर्च में इस्तेमाल किया जा सकता था। इसमें संगठन के संचालन, वेतन और रिसर्च जैसे खर्च शामिल थे। इस तरह सरकार ने NGOs के विदेशी फंड के इस्तेमाल पर एक और वित्तीय सीमा तय कर दी।

कुडनकुलम विवाद में FCRA का इस्तेमाल

2011 से 2013 के बीच तमिलनाडु में कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र और आनुवंशिक रूप से संशोधित यानी (जीएम) फसलों के फील्ड ट्रायल जैसे मुद्दों को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए।

कुडनकुलम में पीपुल्स मूवमेंट अगेंस्ट न्यूक्लियर एनर्जी यानी (PMANE) के नेतृत्व में बड़े स्तर पर परमाणु विरोधी आंदोलन हुआ। इन प्रदर्शनों के कारण रूस की मदद से बनाए जा रहे परमाणु रिएक्टरों को शुरू करने में देरी हुई।

उस समय UPA सरकार के कई वरिष्ठ अधिकारियों ने इन प्रदर्शनों के पीछे विदेशी फंडिंग को जिम्मेदार बताया।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक इंटरव्यू में कहा था कि कुडनकुलम में हो रहे विरोध प्रदर्शनों में विदेशी NGOs की भूमिका थी। उन्होंने कहा था कि इनमें से कई NGOs अमेरिका और स्कैंडिनेवियाई देशों से फंड प्राप्त करते हैं और भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरी तरह नहीं समझते।

करीब 4000 NGOs पर कार्रवाई

कुडनकुलम आंदोलन के दौरान गृह मंत्रालय ने करीब 4,000 NGOs के FCRA पंजीकरण रद्द किए थे। कुडनकुलम आंदोलन को फंड देने वाले बताए गए कुछ संगठनों के बैंक खाते फ्रीज किए गए और उनके वित्तीय रिकॉर्ड की जाँच भी कराई गई।

पर्यावरण से जुड़े कुछ विदेशी नागरिकों को भारत से बाहर भेजा गया या उन्हें वीजा देने से इनकार किया गया। सरकार का कहना था कि इन लोगों ने स्थानीय विकास विरोधी प्रदर्शनों में हिस्सा लेकर अपने वीजा नियमों का उल्लंघन किया था।

तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने भी कुडनकुलम आंदोलन के दौरान विदेशी फंड के इस्तेमाल को लेकर कार्रवाई की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि जाँच में धन के गलत इस्तेमाल की जानकारी सामने आई है और इसलिए FCRA के तहत मामले दर्ज करने का फैसला लिया गया।

आज कांग्रेस के विरोध के बीच पुराना इतिहास

आज कांग्रेस मोदी सरकार पर FCRA का इस्तेमाल NGOs और नागरिक समाज संगठनों को दबाने के लिए करने का आरोप लगा रही है। कान्ग्रेस FCRA संशोधन विधेयक का विरोध कर रही है और उसका कहना है कि इससे नागरिक संगठनों की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।

लेकिन FCRA का इतिहास बताता है कि विदेशी फंड पर सरकारी निगरानी किसी एक सरकार तक सीमित नहीं रही है। इसकी शुरुआत 1976 में इंदिरा गांधी सरकार के दौरान हुई। 1985 में राजीव गांधी सरकार ने इसमें महत्वपूर्ण बदलाव किए और 2010 में मनमोहन सिंह सरकार ने नया FCRA कानून लागू किया।

इसके बाद भाजपा सरकार के समय भी FCRA में बड़े बदलाव किए गए। इनमें 2020 और 2026 के महत्वपूर्ण संशोधन शामिल हैं। इन बदलावों का मुख्य उद्देश्य विदेशी सरकारों और संगठनों से मिलने वाले पैसे के जरिए भारत की घरेलू राजनीति, नीतिगत फैसलों या सामाजिक आंदोलनों को प्रभावित करने की संभावना को रोकना बताया गया है।

FCRA की निगरानी का एक तर्क यह भी है कि विदेशी फंड का इस्तेमाल देश में अस्थिरता पैदा करने वाली गतिविधियों, उग्रवाद, अवैध धार्मिक धर्मांतरण या कट्टरपंथी संगठनों को आर्थिक मदद देने के लिए न हो।

इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि FCRA को लेकर सरकारी नियंत्रण की व्यवस्था अचानक मोदी सरकार के समय शुरू नहीं हुई। यह कानून करीब 5 दशकों से अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल में लगातार बदलता और मजबूत होता रहा है। ऐसे में आज कांग्रेस द्वारा FCRA को लेकर उठाए जा रहे सवालों के साथ इस कानून के पुराने इतिहास को भी देखना जरूरी है।

भारत में घुसपैठ पर 900 करोड़ रूपए साल खर्च करते हैं बांग्लादेशी, 1000 घाटों पर चलता अवैध कारोबार: शुभेंदु सरकार आई तो बंद हुआ बिचौलियों का धंधा

घुसपैठ को नासूर बनाने वाली हमारी भारत सरकार ही है। सियासतखोर नेता और उनकी पार्टियां कुछ काम करने की बजाए हिन्दू-मुसलमान कर जनता को गुमराह कर कुर्सी पर बैठते रहे। घुसपैठियों को घर में घुसाकर दामादों की तरह पाल अपने ही देश की अर्थव्यवस्था को चोट पहुँचाने का काम होता रहा है। जबकि दुनिया में कोई ऐसा देश नहीं जहां घुसपैठियों को चोर रास्ते से घर में घुसा दामादों की तरह लालन-पालन करे। रोहिंग्या जिन्हे कोई मुस्लिम देश तक रखने को तैयार नहीं लेकिन भारत में सियासतखोर नेता और उनकी पार्टियां दामादों की तरह उनका बचाव करती हैं। क्या ऐसी पार्टियां देशहित में कोई काम कर सकती हैं? अपने आपको राष्ट्रवादी कहने वाली बीजेपी भी इस गंभीर मसले पर ज्यादा सख्त नहीं। हाँ, कुछ मुख्यमंत्री जरूर सख्ती से काम कर रहे हैं।       
घुसपैठियों को निकालने पर कट्टरपंथी और उनको समर्थन देने वाली पार्टियां दुष्प्रचार कर रही हैं कि भारत में मुसलमान सुरक्षित नहीं और मुसलमान भी इसे सच मान मोदी सरकार की कार्य क्षमता पर शक कर रहा है। 

कहने को पाकिस्तान कंगाली के दौर से गुजर रहा है। हाथ में कटोरा लिए घूम रहा है लेकिन आतंकवाद और भारत में दंगे/जेहाद पर खूब पैसा खर्च कर रहा है। बांग्लादेश जिसे भारत सरकार हर साल करोडो रुपया मानवीय सहायता देती है, क्यों? भारत में घुसपैठी भेजने पर जो पैसा खर्च हो रहा है कहाँ से आ रहा है? इस पर भी मोदी सरकार को गंभीरता से चिंतन करना होगा।     

भारत-बांग्लादेश सीमा पर घुसपैठ को लेकर सामने आई एक विस्तृत पड़ताल में एक पूर्व बिचौलिए ने कई बड़े दावे किए हैं। उसके मुताबिक, वर्षों तक सीमा पार लोगों की आवाजाही कराने वाला एक संगठित नेटवर्क सक्रिय था, जिसका सालाना कारोबार करीब 800 से 900 करोड़ रुपए तक था।

उत्तर 24 परगना के सीमा क्षेत्र से जुड़े इस बिचौलिए ने दावा किया कि इस नेटवर्क में सीमा के दोनों ओर मौजूद एजेंट, स्थानीय संपर्क, डिजिटल भुगतान व्यवस्था और फर्जी दस्तावेज तैयार कराने वाले लोग शामिल थे।

सत्ता के गलियारों में यह चर्चा भी गर्म है कि जिस तरह मुख्यमंत्री शुभेन्दु हरकत में हैं कभी भी उन सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों पर गाज गिर सकती जिन्होंने घुसपैठियों को राशन कार्ड, पहचान पत्र और दूसरी सरकारी सुविधाएं दिलवाई। दस्तावेज ऐसे ही नहीं बन गए। सबने अपनी-अपनी कमीशन जरूर ली होगी। जो इनके बैंक खातों की जाँच होने पर ही सामने आ पाएगा।  

TMC में बिखराव ऐसे ही नहीं हुआ है, इसके पीछे भी बहुत गहरा षड़यंत्र है। शक है कि इन घुसपैठियों को दामाद मान आबाद करवाने में इन लोगों का भी हाथ है। आज अपने आपको दूध का धुला साबित करने और मुख्यमंत्री के प्रकोप से बचने के लिए सब ममता का साथ छोड़ रहे हैं। और शायद यही कारण है कि बीजेपी ने इन बागियों को अपनी पार्टी में शामिल नहीं करने की बजाए त्रिपुरा की पार्टी में शामिल होने को कहा है।    

हालाँकि नवंबर 2025 में राज्य में मतदाता सूची के SIR अभियान शुरू होने और पिछले महीने भाजपा सरकार के आने से परिस्थितियाँ बदल गईं, जिसके चलते यह कारोबार लगभग बंद होने की स्थिति में पहुँच गया।

‘घाट’ और ‘लाइनमैन’ के जरिए होती थी घुसपैठ

आनंदबाजार पत्रिका में पूर्व बिचौलिए के हवाले से दावा किया गया कि भारत-बांग्लादेश सीमा से जुड़े कई इलाकों में ऐसे ‘घाट’ (1000 घाट) मौजूद थे, जहाँ से लोगों को सीमा पार कराया जाता था। उसके अनुसार, यह तय किया जाता था कि किस स्थान पर कब निगरानी कम है और उसी के आधार पर गतिविधियाँ संचालित होती थीं।

दावे के मुताबिक, भारतीय सीमा क्षेत्र में खेतों और झाड़ियों के बीच छिपकर बैठे कुछ लोग निगरानी करते थे और सीमा सुरक्षा बल की गश्त की जानकारी दूसरी ओर पहुँचाते थे। जब रास्ता सुरक्षित माना जाता, तब सीमापार आवाजाही कराई जाती थी। रिपोर्ट के अनुसार, यह प्रक्रिया केवल रात तक सीमित नहीं थी, बल्कि अवसर मिलने पर दिन में भी की जाती थी।

फोन, Sim और भुगतान के जरिए चलता था संपर्क

बिचौलिए ने दावा किया कि सीमा के दोनों ओर मौजूद लोगों के बीच लगातार संपर्क बना रहता था। इसके लिए भारतीय और बांग्लादेशी सिम कार्ड का इस्तेमाल किया जाता था। कई बार डिजिटल माध्यमों से पैसों का लेनदेन भी होने का दावा किया गया।

रिपोर्ट के अनुसार, सीमा पार पहुँचने के बाद लोगों को नजदीकी बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन तक पहुँचाने की जिम्मेदारी स्थानीय नेटवर्क संभालता था। इसके बाद उन्हें बड़े शहरों तक भेजने के लिए अलग व्यवस्था की जाती थी। इस पूरी प्रक्रिया में अलग-अलग स्तर पर भुगतान तय रहता था।

कमाई का मॉडल और सुरक्षा एजेंसियों को लेकर दावे

दावों के अनुसार, सीमा पार कराने के बदले प्रति व्यक्ति तय रकम ली जाती थी और उसका बंटवारा नेटवर्क से जुड़े अलग-अलग लोगों के बीच होता था। बिचौलिए का दावा है कि कुछ सीमावर्ती हिस्सों में प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग लाए जाते थे और इसी आधार पर पूरे कारोबार का आकार काफी बड़ा हो गया था।

रिपोर्ट में कुछ स्थानीय लोगों के हवाले से यह भी दावा किया गया कि सीमा पार के कुछ तत्वों को आर्थिक लाभ देकर गतिविधियों को आसान बनाया जाता था। वहीं यह भी कहा गया कि पिछले कुछ वर्षों में निगरानी बढ़ने और हालिया सत्यापन प्रक्रियाओं के बाद इस तरह की गतिविधियों में गिरावट आई है।

फर्जी दस्तावेजों का नेटवर्क और स्थानीय स्तर पर मिलीभगत के आरोप

पड़ताल में यह भी दावा किया गया कि सीमा पार आने के बाद पहचान स्थापित करने के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार कराने का समानांतर तंत्र मौजूद था। आरोप लगाए गए कि कुछ मामलों में जन्म प्रमाणपत्र, निवास प्रमाणपत्र, आधार, वोटर ID और PAN कार्ड जैसे दस्तावेज हासिल कराने के लिए स्थानीय स्तर पर संपर्कों का इस्तेमाल किया जाता था। रिपोर्ट में कुछ पूर्व स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक तंत्र से जुड़े लोगों पर भी आरोप लगाए गए हैं कि वे ऐसे दस्तावेज तैयार कराने में मदद करते थे।

बंगाल : आज़ादी के बाद पहली बार मना ‘पश्चिम बंग दिवस’; मोदी बोले- अब बेड़ियों से मिली मुक्ति, राज्य को दी 820 करोड़ की सौगात

   मोदी ने ‘पश्चिम बंगाल दिवस’ पर बाबा तारकेश्वर की धरती से  दी 820 करोड़ की सौगात (साभार: नवभारत टाइम्स, एक्स @narendramodi)
जनसभाओं से लेकर राष्ट्रीय मंचों तक देश को आज़ादी दिलवाने के कसीदे पढ़ने वाली कांग्रेस और इसकी समर्थक वामपंथी पार्टी से लेकर ममता बनर्जी की TMC ने इतने साल बंगाल में राज किया, लेकिन कभी बंगाल
 का ‘पश्चिम बंग दिवस’ नहीं मनाया। फिर देशभक्ति की दुहाई देते फिरते हैं। धीरे-धीरे भारत विरोधियों की कठपुतली बनी पार्टियों की कलई खुलनी शुरू से बिलबिला रहे हैं। जो पार्टी राज्य का पावन  ‘पश्चिम बंग दिवस’ नहीं मनाए वह देशभक्त पार्टी नहीं हो सकती।   

पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार के आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहली बार 2 दिवसीय दौरे पर राज्य पहुँचे। उनके दौरे की शुरुआत हुगली जिले के धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व वाले तारकेश्वर से हुई। यहाँ पहली बार आधिकारिक तौर पर आयोजित ‘पश्चिम बंग दिवस’ कार्यक्रम में PM मोदी ने हिस्सा लिया।

इस दौरान राज्यपाल आरएन रवि और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी भी मंच पर मौजूद रहे। PM मोदी ने राज्य के लिए विकास परियोजनाओं का शुभारंभ किया, किसानों के खातों में PM-किसान योजना की राशि जारी की और राजनीतिक व ऐतिहासिक संदर्भों पर भी अपनी बात रखी।

पहली बार आधिकारिक तौर पर मनाया गया ‘पश्चिम बंग दिवस’, इतिहास से जोड़ा गया आयोजन

नई राज्य सरकार ने 20 जून को आधिकारिक ‘पश्चिम बंग दिवस’ के रूप में मनाने का फैसला किया। यह तारीख इसलिए महत्वपूर्ण मानी गई क्योंकि 20 जून 1947 को बंगाल विधानसभा में विभाजन संबंधी प्रस्ताव पारित हुआ था। कार्यक्रम के लिए तारकेश्वर को चुना गया, जिसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया।

 अपने संबोधन में PM मोदी ने कहा, “इस बार पश्चिम बंग दिवस की यह तारीख और भी खास है। आजादी के बाद बंगाल के उज्जवल भविष्य के लिए जो सपना देखा गया था, बंगाल की महान आत्माओं ने जो परिकल्पना की थी। आज पहली बार हम पश्चिम बंग दिवस पर उन सपनों को सच्चाई में बदलते देख रहे हैं।”

मोदी ने आगे कहा, “यह ऐतिहासिक तारीख पश्चिम बंगाल के विकास की प्रेरणा बने, हम एक नया और गौरवशाली इतिहास रचे। आज भाजपा-NDA सरकार में विकास के महाअभियान की शुरुआत हो रही है। मैं कामना करता हूँ कि ऐतिहासिक ‘पश्चिम बंगाल दिवस’ राज्य के विकास के लिए प्रेरणा बने।”

तारकेश्वर मंदिर में पूजा, 820 करोड़ की परियोजनाएँ और रेलवे को बड़ा पैकेज

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तारकेश्वर स्थित बाबा तारकनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना की और इसके बाद राज्य के लिए लगभग 820 करोड़ रुपए की विभिन्न विकास परियोजनाओं की शुरुआत की। इनमें रेलवे अवसंरचना पर विशेष जोर दिया गया और करीब 590 करोड़ रुपए रेलवे परियोजनाओं के लिए निर्धारित किए गए।

इसी क्रम में हावड़ा में 99 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले 300 बेड के नए डिवीजनल रेलवे अस्पताल का शिलान्यास भी किया गया। सरकार के अनुसार, यह अस्पताल रेलवे कर्मचारियों के साथ-साथ आम नागरिकों को भी आधुनिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराएगा।

पीएम ने कहा, “बंगाल में दशकों तक पहले लेफ्ट और फिर TMC ने जो गड्ढे बनाए, उन्हें भरने के लिए डबल इंजन सरकार ने सुपरफास्ट गति से काम करना शुरू कर दिया है। बिजली की रफ्तार से फैसले हो रहे हैं। रुकी हुई योजनाओं पर काम आगे बढ़ रहा है। इसी कड़ी में आज यहाँ सैकड़ों करोड़ की विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास हुआ है।”

किसानों को पीएम-किसान की किस्त और नवद्वीप-पुरी रेल सेवा का शुभारंभ

कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री ने पीएम-किसान सम्मान निधि योजना की 23वीं किस्त भी जारी की। इसके तहत देश के 9.44 करोड़ से अधिक किसानों के खातों में कुल 18,880 करोड़ रुपए सीधे डीबीटी के माध्यम से ट्रांसफर किए गए। इनमें पश्चिम बंगाल के 45 लाख से अधिक किसानों को 900 करोड़ रुपए से ज्यादा की राशि मिली।
इसके साथ ही प्रधानमंत्री ने पश्चिम बंगाल के नवद्वीप और ओडिशा के पुरी के बीच नई सीधी रेल सेवा का भी उद्घाटन किया। माना जा रहा है कि इससे धार्मिक पर्यटन और दोनों राज्यों के बीच संपर्क को मजबूती मिलेगी।

कॉन्ग्रेस, लेफ्ट और TMC पर हमला

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में कॉन्ग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए कहा, “उस कठिन समय में कॉन्ग्रेस ने मजबूती से खड़े होने के बजाय घुटने टेक दिए थे। “उन्होंने आरोप लगाया कि स्वतंत्रता के समय बंगाल को भारत से अलग करने की कोशिश हुई थी और उस दौर की घटनाओं को देश नहीं भूल सकता।
उन्होंने कहा, “बीजेपी की जीत के बाद राज्य में बदलाव साफ दिखाई देने लगा है, अब बंगाल विकास, निवेश और भविष्य के निर्माण की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।” सभा में उन्होंने कहा, “बंटवारे के समय कॉन्ग्रेस ने बंगाल को अनाथ छोड़ दिया था और स्वतंत्रता के बाद तुष्टीकरण की राजनीति की।”
प्रधानमंत्री ने आगे कहा, “गुलामी के दौर में हमारे बंगाल ने क्या कुछ नहीं सहा, कितने बलिदान दिए, कितने त्याग सहे, 1946 में, कोलकाता में हुई हिंसा, कितने निर्दोष बंगाली लोग उसकी भेंट चढ़ गए। बंगाल ने रक्तपात सहा, अपनों को खोया, अपनी मातृभूमि के टुकड़े होते देखे लेकिन बंगाल ने अपनी अस्मिता, पहचान को नष्ट नहीं होने दिया।”
उन्होंने कहा, “इसी का परिणाम था कि जब पूरे बंगाल को भारत से अलग करने की साजिश हो रही थी, तब अलग पश्चिम बंगाल बनाकर उन मंसूबों को कामयाब नहीं होने दिया गया। पश्चिमबंग दिवस के रूप में हम केवल एक तारीख को याद नहीं कर रहे, बल्कि पूरे इतिहास को याद कर रहे हैं।”
अंत में उन्होंने योग दिवस का भी उल्लेख करते हुए कहा, “कल देश, दुनिया में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाना है। इस बार मैं बंगाल में ही योग दिवस का हिस्सा बनूँगा। स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविंद जैसे योगियों की भूमि से जो संदेश जाएगा उससे पूरे विश्व का मार्गदर्शन होगा। मैं चाहूँगा कि इस बार बंगाल के कोने-कोने में योग दिवस के आयोजन हो।”

बंगाल में BJP सरकार आई तो डरकर दक्षिण में भाग रहे घुसपैठिए, कर्नाटक में 20 लाख+ अवैध बांग्लादेशी होने का दावा


कर्नाटक में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। राज्य के अलग-अलग हिस्सों से इसको लेकर लगातार रिपोर्टें सामने आ रही हैं। ऑर्गेनाइजर की रिपोर्ट के मुताबिक, हुबली के श्री सिद्धरूढ़ रेलवे स्टेशन के बाहर कुछ दिनों पहले हिंदू संगठनों ने प्रदर्शन किया और पश्चिम बंगाल व पूर्वी राज्यों से आने वाले लोगों की कड़ी निगरानी की माँग उठाई।

रिपोर्ट के अनुसार, श्रीराम सेना प्रमुख प्रमोद मुथालिक और संगठन के कार्यकर्ताओं ने यह विरोध प्रदर्शन उस आशंका के बीच किया कि पश्चिम बंगाल में शुभेंदु सरकार की कार्रवाई के बाद कई संदिग्ध बांग्लादेशी दक्षिण भारत के शहरों में शरण लेने पहुँच रहे हैं। हिंदू संगठनों का दावा है कि बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद ऐसे लोग पहचान छिपाने और काम की तलाश में कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों का रुख कर सकते हैं।

प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि फर्जी आधार कार्ड के सहारे लोगों को बिना पर्याप्त जाँच के यात्रा करने दी जा रही है। उनका कहना था कि रेलवे पुलिस ट्रेनों में संदिग्ध यात्रियों की केवल औपचारिक जाँच कर रही है। हाल ही में हुबली रेलवे स्टेशन पर पश्चिम बंगाल से आए करीब 10 संदिग्ध लोगों से पूछताछ की गई थी। उन्होंने खुद को बागलकोट जिले में मजदूरी के लिए जा रहा बताया और आधार कार्ड दिखाने के बाद उन्हें जाने दिया गया।

इस पर नाराजगी जताते हुए प्रदर्शनकारियों ने कहा कि सिर्फ आधार कार्ड नागरिकता का पर्याप्त प्रमाण नहीं हो सकता क्योंकि फर्जी दस्तावेज भी आसानी से बन जाते हैं। प्रमोद मुथालिक ने कहा कि केवल आधार कार्ड देखकर लोगों को छोड़ना ठीक नहीं है बल्कि गहराई से जाँच होनी चाहिए ताकि घुसपैठिए कर्नाटक में बस न सकें। उन्होंने पुलिस, रेलवे और खुफिया एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल की भी माँग की।

विरोध के बाद रेलवे स्टेशन पर खासकर पश्चिम बंगाल से आने वाली शालीमार एक्सप्रेस के यात्रियों की जाँच बढ़ाई गई लेकिन प्रदर्शनकारियों ने इसे कर्मचारियों की कमी के कारण केवल प्रतीकात्मक कार्रवाई बताया।

इस बीच जनवरी में आई एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि कर्नाटक में करीब 20 लाख बांग्लादेशी घुसपैठिए हो सकते हैं। खुफिया सूत्रों के हवाले से कहा गया कि इनमें से 70-80% लोगों के पास भारतीय पहचान पत्र हैं। अनुमान के मुताबिक, बेंगलुरु और आसपास के इलाकों में 5 से 6 लाख, मालनाड और तटीय क्षेत्रों में 8 से 10 लाख और बाकी उत्तर कर्नाटक व पुराने मैसूर क्षेत्र में रह रहे हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेशी घुसपैठिए खुद को पश्चिम बंगाल का निवासी बताकर कर्नाटक में अलग-अलग जगहों पर काम कर रहे हैं। बेंगलुरु, बेंगलुरु ग्रामीण और मालनाड क्षेत्रों में ये लोग निर्माण स्थलों, सुपारी और कॉफी बागानों, कबाड़ दुकानों समेत कई जगहों पर कम मजदूरी में काम करते हैं। सूत्रों के मुताबिक, स्थानीय मजदूरों की तुलना में ये 100 से 150 रुपए कम दिहाड़ी पर काम करने को तैयार हो जाते हैं और इसलिए इन्हें प्राथमिकता मिलती है।

राज्य में सबसे अधिक ऐसे लोग बेंगलुरु और उसके आसपास के इलाकों में रहने की बात कही गई है। यहाँ वे कूड़ा बीनने, निर्माण मजदूर, सैलून कर्मचारी, अस्पतालों में सफाई कर्मी, होटल-रेस्तराँ में कामगार और सड़क किनारे कपड़े व रोजमर्रा का सामान बेचने का काम करते हैं। वहीं, चिक्कमगलुरु, उडुपी, शिवमोग्गा, कोडागु, दक्षिण कन्नड़ और उत्तर कन्नड़ जैसे जिलों में कॉफी-सुपारी बागानों, रिसॉर्ट, एस्टेट और फार्महाउस में भी इनके काम करने की बात सामने आई है। कुछ लोग अपने परिवारों के साथ रहते पाए गए हैं।

रिपोर्ट में यह भी चिंता जताई गई कि तटीय और मालनाड क्षेत्रों में पिछले 15 वर्षों से रह रहे कई अवैध बांग्लादेशी भारतीय पहचान पत्र हासिल कर चुके हैं। इतना ही नहीं, कुछ लोगों ने लाखों रुपये की संपत्ति खरीदी और कथित तौर पर भारतीय पहचान के आधार पर पासपोर्ट बनवाकर 15-20 साल बाद दूसरे देशों तक में पहुँचे हैं।

बंगाल : अब ‘नो कोर्ट, सीधा डिपोर्ट’: मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने अवैध बांग्लादेशियों को BSF को सौंपने का दिया आदेश, बोले- अदालत ना ले जाएँ

       शुभेंदु अधिकारी और अवैध बांग्लादेशी प्रवासी, BSF को सौंपने का आदेश (फोटो साभार : NDTV & Jagran)
बंगाल में सत्ता परिवर्तन होने पर बीजेपी सरकार ने घुसपैठ पर अब तक का सबसे बड़ा फैसला लिया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने एलान किया है कि राज्य में पकड़े गए अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को अब कोर्ट में पेश नहीं किया जाएगा, बल्कि सीधे बॉर्डर पर सीमा सुरक्षा बल (BSF) को सौंपकर वापस भेजा जाएगा। ‘पता लगाओ, हटाओ और देश-निकाला दो’ अभियान के तहत यह नया नियम 20 मई से लागू हो चुका है।

जिन बांग्लादेशियों को अपनी कुर्सी की खातिर ममता बनर्जी दामाद बनाकर पाल रही थी, अब दामादों को जिस तरह देश-निकाला किया जा रहा है, हर बीजेपी राज्य को शुभेंदु के रास्ते पर चलना होगा। ये अवैध घुसपैठियों की वजह से भारतीयों को मिलने वाली सुविधाएं बाधित हो रही है। जब तक देश से घुसपैठियों- पाकिस्तानी, बांग्लादेशी और रोहिंग्या- को बाहर नहीं किया जाएगा देश में असुरक्षा का डर हमेशा बना रहेगा। इन घुसपैठियों का समर्थन करने वाली पार्टियों से पूछना चाहिए कि जिन रोहिंग्यों को जब कोई मुस्लिम मुल्क रखने को तैयार नहीं फिर क्यों भारत में रखने के लिए हिन्दू-मुसलमान कर माहौल ख़राब कर रहे हो? क्या ये घुसपैठिये तुम्हारे दामाद हैं?         

अब कोर्ट के चक्कर नहीं, सीधे बॉर्डर पर ‘नो एंट्री’

मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने हावड़ा में साफ कहा कि पुलिस और रेलवे सुरक्षा बल (RPF) को कड़े निर्देश दे दिए गए हैं। हावड़ा स्टेशन या राज्य में कहीं भी कोई अवैध बांग्लादेशी पकड़ा जाता है, तो उसे अदालत ले जाने की जरूरत नहीं है। पुलिस पहले उसे अच्छे से खाना खिलाएगी और फिर सीधे उत्तर 24 परगना के पेट्रापोल या बशीरहाट बॉर्डर पर BSF के हवाले कर देगी, जहाँ से उन्हें वापस बांग्लादेश भेज दिया जाएगा।

किसे मिलेगी राहत और कौन होगा बाहर?

इस नए नियम से उन लोगों को अलग रखा गया है जो नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के दायरे में आते हैं। बांग्लादेश से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई शरणार्थी अगर प्रताड़ना की वजह से भारत आए हैं, तो वे CAA के तहत नागरिकता का दावा कर सकते हैं। लेकिन जो इस दायरे में नहीं आते और अवैध रूप से रह रहे हैं, उन्हें तुरंत डिपोर्ट किया जाएगा। हर हफ्ते ऐसे लोगों की रिपोर्ट पुलिस महानिदेशक (DGP) के जरिए मुख्यमंत्री दफ्तर भेजी जाएगी।

2025 के नए कानून से मिला सरकार को पावर

अब तक का नियम था कि बिना कागजात मिलने वाले विदेशी नागरिक को ‘विदेशी अधिनियम 1946’ के तहत गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया जाता था। यह अदालती प्रक्रिया सालों चलती थी। लेकिन अब सरकार संसद से अप्रैल 2025 में पास हुए ‘प्रवासन और विदेशियों अधिनियम, 2025’ के तहत कार्रवाई कर रही है। मुख्यमंत्री ने बताया कि केंद्र सरकार ने 14 मई को ही इस संबंध में आदेश जारी किया था, जिसका बंगाल सरकार पालन कर रही है।

गैर-मुस्लिमों पर हिंसा के लिए उकसाती थी जो Islamic Ethics of Warfare मजहबी किताब, दिल्ली की रेखा सरकार ने जब्त करवाया

      दिल्ली सरकार ने 'इस्लामिक एथिक्स ऑफ वॉरफेयर' नाम की किताब को किया जब्त (साभार: ANI/Amazon)
"चलो देर आए दुरुस्त आए" यानि जो काम कई साल हो जाना चाहिए था चलो उसकी शुरुआत हो गयी है। दिल्ली की बीजेपी सरकार ने इस्लामिक कट्टरपंथी और उनके आकाओं पर जो कुठाराघात करने का काम किया है वह ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर है। जिन बातों का उल्लेख मुस्लिम लेखक अनवर शेख ने अपनी किताबों में किया था Islamic Ethics of Warfare तो सिर्फ एक हल्की-सी झांकी है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता अभी फिल्म का ट्रेलर और पूरी फिल्म बाकी है। 

अयातुल्लाह खेमैनी सलमान रुश्दी के खिलाफ तो फतवा देने की हिम्मत कर सका लेकिन अनवर शेख पर नहीं। जबकि खेमानी की जिंदगी में अनवर ने 2 या 3 किताबों का प्रकाशन कर दिया था। अगर भारत एवं अन्य सरकारों ने अनवर को गंभीरता से लिया होता शायद आतंकवाद नहीं होता। गैर-मुस्लिमों पर अत्याचार नहीं होते। लेकिन सभी तुष्टिकरण कर मालपुए खाने में लगे रहे। उसी का अंजाम है कि आतंकवाद एक नासूर बन चूका है। बस संक्षेप में इतना ही कहना है कि अनवर शेख के अधूरे काम को पूरा कर रही है अली सीना की किताब Understanding Mohammad And Muslim, इसके खिलाफ भी फतवा देने की किसी में अब तक हिम्मत नहीं। मेरे अनुभव से अली सीना की किताब अनवर शेख की किताबों का संकलन है। किताब के Preface में सीना का कहना है कि किताब पढ़कर मुसलमान इस्लाम छोड़ रहे हैं जबकि कहा ये जा रहा है कि अनवर शेख को पढ़कर। 

खैर, इस अति गंभीर मुद्दे पर सरकार को बहुत काम करना है। बहुत छापेमारी भी करनी है। जब मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने भिड़ के छत्ते को छेड़ा है तो केन्द्रीय गृह मंत्री और सुप्रीम कोर्ट को पत्थरबाजों पर blind firing के आदेश और इसके खिलाफ खड़े होने वाले दलाल वकीलों पर भी सख्त आदेश देने के लिए बोलिए।       

दिल्ली की बीजेपी सरकार ने ‘इस्लामिक एथिक्स ऑफ वॉरफेयर’ नाम की किताब को जब्त करने के आदेश दिए हैं। सरकार का कहना है कि यह किताब मुस्लिमों को कट्टरपंथी बनाती है और सशस्त्र विद्रोह करने को उकसाती है। सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए किताब को जब्त किया है। 

दिल्ली सरकार के गृह विभाग से जारी आदेश में कहा गया, “सरकार के ध्यान में बात आई है कि ‘इस्लामिक एथिक्स ऑफ वॉरफेयर’ नाम की किताब लोगों, खासकर विशेष समुदायों के लोगों को हथियार उठाने और हिंसक सोच की तरफ भड़काती है। यह किताब कट्टर विचारधारा को बढ़ावा देती है, जिससे देश की सुरक्षा और जनता की शांति को खतरा हो सकता है।”

आदेश में यह भी कहा गया है कि सबूतों और जाँच में यह साफ पता चला है कि इस किताब में मजहबी बातों का गलत इस्तेमाल करके हिंसा को सही ठहराने की कोशिश की गई है, इसीलिए तुरंत कार्ऱवाई करना जरूरी है। इसीलिए दिल्ली सरकार ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 98 के तहत किताब और इसकी सारी कॉपियों को जब्त किया है।

किताब में क्या लिखा?

दिल्ली सरकार के आदेश के मुताबिक, यह किताब सिर्फ इस्लाम को सबसे श्रेष्ठ मानती है और दूसरे धर्मों के खिलाफ लड़ाई की बात करती है। इसमें दूसरे धर्मों की मान्यताओं पर हमला करके अलग-अलग धार्मिक समुदायों के बीच नफरत और दुश्मनी फैलाई गई है। साथ ही इस किताब में लोगों को कट्टर बनाने के लिए कुरान और अन्य मजहबी किताबें को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है। इससे लोगों में अलगाव की भावना पैदा की गई और हिंसा व आतंकवाद की सोच को बढ़ावा दिया गया है।

इसके अलावा यह भी पाया गया कि यह किताब भारत की एकता, अखंडता, संप्रभुता और सुरक्षा के खिलाफ गलत और भ्रामक जानकारी फैलाती है। इसीलिए किताब पर BNS, 2023 की धारा 196, 197(1)(c), 197(1)(d) भी लागू की गई है।

दिल्ली ब्लास्ट पर जश्न मनाने वाले आतंक के समर्थकों पर कार्रवाई जरूरी, असम की हिमंता सरकार ने कायम की मिसाल


दिल्ली में लाल किला के पास हुए कार ब्लास्ट में 12 लोगों की मौत हो गई। इस ब्लास्ट का कनेक्शन पाकिस्तान के आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और जम्मू-कश्मीर के कई प्रतिबंधित संगठनों से जुड़े हैं। इस ब्लास्ट ने जहाँ पूरे देश को झकझोर दिया। वहीं सोशल मीडिया पर इस घटना का जश्न मनाने वाले कुछ लोग हमें यह याद दिला गए कि आतंकवाद सिर्फ बम-गोला नहीं बल्कि विचारधारा से भी पनपता है।

राजधानी में हुई इतने बड़े धमाके के बाद जब पूरा देश शोक में था तब कुछ इस्लामी कट्टरपंथी खुशियों में व्यस्त थे। ऐसे लोगों की पहचान कर असम की बीजेपी सरकार ने उन्हें गिरफ्तार किया है। राज्य के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने भी ऐसे लोगों को साफ संदेश दिया है।

असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा का बयान

सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा था, “दिल्ली बम विस्फोट की घटना निंदनीय है। वहीं कुछ लोगों ने फेसबुक पर इस तरह की घटना पर बधाई दी या खुशी वाले इमोजी पोस्ट किए। इस तरह की प्रतिक्रिया से पता चलता है कि वे लोग वास्तव में आतंकवाद का समर्थन करते हैं। हम कल (10 नवंबर 2025) रात से इन लोगों की पृष्ठभूमि की जाँच कर रहे हैं। जरूरत पड़ने पर हम इनमें से कुछ लोगों को गिरफ्तार भी करेंगे।”

सीएम ने आगे कहा, “असम में हम आतंकवाद को बढ़ावा देने और किसी भी तरह का समर्थन करने की अनुमति नहीं देंगे। हम इसके लिए बहुत सख्त हैं। कल से हमने देखा है कि घटना की खबर मिलने के बाद कुछ लोग बहुत खुश हैं। कोई इस खबर से खुश है, तो कोई किसी की मौत से खुश। मुझे लगता है कि वे लोग भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आतंकवाद का समर्थन कर रहे हैं। मैंने DGP से उन लोगों की पृष्ठभूमि की जाँच करने को कहा है, अगर वे असम के नागरिक हैं तो हमें उन्हें गिरफ्तार करेंगे।”

दिल्ली ब्लास्ट पर आपत्तिजनक पोस्ट करने वालों की गिरफ्तारी

असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने जो कहा वो किया। सोशल मीडिया पर दिल्ली में हुए ब्लास्ट के खिलाफ आपत्तिजनक और भड़काऊ पोस्ट करने वाले 5 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। सीएम हिमंता ने एक्स पर पोस्ट कर यह जानकारी दी। उन्होंने यह भी लिखा कि असम पुलिस की यह कार्रवाई जारी रहेगी।

सीएम हिमंता ने बताया कि सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक पोस्ट करने वाले राज्यभर से 5 लोगों में दारांग के मत्तीउर रहमान, गोलपाड़ा के हसन अली मंडल, चिरांग के अब्दुल लतीफ, कामरूप के वजहुल कमाल और बोंगाईगांव के नूर अमीन अहमद को गिरफ्तार किया गया है। सीएम हिमंता ने चेतावनी भी देते हुए कहा, “असम पुलिस नफरत फैलाने या आतंक का महिमामंडन करने के लिए सोशल मीडिया का दुरुपयोग करने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ तेजी से और दृढ़ता से कार्रवाई करना जारी रखेगी।”

दिल्ली ब्लास्ट और फरीदाबाद आतंकी मॉड्यूल

फिर बात करें दिल्ली ब्लास्ट के तारों की और फरीदाबाद में सामने आए आतंकी मॉड्यूल की तो इस ब्लास्ट में इस्तेमाल हुई कार, विस्फोट और संदिग्ध गतिविधियों से जुड़ी जाँच में यह साफ हुआ है कि यह एक बड़ा नेटवर्क था। जाँच एजेंसियों को फरीदाबाद, सहारनपुर, लखनऊ समेत कुछ जिलों से 2900 किलो विस्फोटक सामग्री बरामद हुई, जो सीधे दिल्ली ब्लास्ट से जुड़ रही है।

इसके अलावा जिस i20 कार से ब्लास्ट हुआ, उसमें बैठा डॉक्टर मोहम्मद उमर नबी के तार भी आतंकी मॉड्यूल से जुड़े। उसके दोस्त सज्जाद अहमद और परिवार वालों से पूछताछ की गई तो सामने आया कि वह संदिग्ध आतंकी गतिविधियों में शामिल था। जाँच एजेंसियों को यह भी शक है कि फरीदाबाद से गिरफ्तार आतंकी मुजम्मिल की गर्लफ्रेंड डॉ. शाहीना का भी दिल्ली ब्लास्ट में बड़ा रोल हो सकता है। डॉ. शाहीना पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद (JeM) की महिला ट्रेनर थी, उसके पास से एके-47 और हथियार बरामद हुए।

ये सारी जानकारी इस बात का सबूत है कि दिल्ली ब्लास्ट कोई आम नहीं बल्कि सोची-समझी साजिश हो सकती है, जो एक बड़े आतंकी नेटवर्क ने अंजाम दी है। जाँच एजेंसियाँ इस आतंकी नेटवर्क का भंडाफोड़ कर चुकी हैं, उनकी कार्रवाई आगे भी जारी है।

असम में गिरफ्तारी आतंकी विचारधारा पर लगाम

ऐसे में असम सरकार की कार्रवाई का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि आतंक केवल उतना नहीं है जब बम धमाके होते हैं। आतंकवाद की विचारधारा को सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर डाली गई गलीज टिप्पणियों, इमोजी में खुशी मनाने, पोस्टों में देश में हुए निंदनीय ब्लास्ट पर समर्थन दिए जाने से ही पनपने का मौका मिलता है।
जब सरकार उन तक पहुँचती है और ऐसे लोगों को कानून के दायरे में लाती है तो यह एक स्पष्ट संदेश देती हैं कि आतंक का समर्थन करना अपराध है, सिर्फ आतंक करना नहीं बल्कि उसे बढ़ावा देना, महिमामंडन करना, चुप्पी सहना भी वैध नहीं है। यह एक तरह से उदाहरण सेट करता है कि आतंक की विचारधारा रखने वालों पर भी कार्रवाई होगी।
ऐसे मामलों में तुरंत और निष्पक्ष कार्रवाई से यह भी साबित होता है कि कानून सिर्फ बड़े हमलावरों के लिए नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए भी है जो इन धमाकों की खुशी मनाकर ‘दूसरी पंक्ति’ बनते हैं।

हिमंता बिस्वा सरमा का ब्लास्ट पर खुशी मनाने वालों को कड़ा संदेश

और आखिर में हिमंता बिस्वा सरमा के बयान पर लौटते हैं। उन्होंने घोषणा की कि असम पुलिस इन सोशल मीडिया पोस्ट करने वालों की पृष्ठभूमि की जाँच कर रही है और जरूरत पड़े तो गिरफ्तार करेगी। यह बयान सिर्फ कड़ी भाषा नहीं, कार्रवाई होने तक का ‘डर’ है। जब एक प्रदेश का मुख्यमंत्री इस तरह स्पष्ट शब्दों में कहता है, “अगर ये लोग असम के नागरिक हैं तो उन्हें नहीं बख्शा जाएगा।” तो यह एक तरह से सरकार की नीति को दर्शाता है कि कैसे आतंक की विचारधारा को पनपने से पहले दबा दिया जाना चाहिए।
सोशल मीडिया पर खुशियाँ मनाने वाले इस्लामी कट्टरपंथियों जैसे लोगों को डर होना चाहिए कि उनकी हर ऑनलाइन पर नजर रखी जा रही है। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी है लेकिन जब वो आजादी आतंकी विचारधारा में बदल जाए तो कार्रवाई जरूरी हो जाती है। हिमंता बिस्वा सरमा का यह रवैया न सिर्फ गंभीर है बल्कि समय की माँग भी है।

मोदी और भाजपा सरकार के खिलाफ राहुल गांधी बार-बार बना रहे Fake Narrative, हर बार हुए फेल; मुसलमानों की भी सारी जातियां सामने आने से डरने लगे


नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की अगुवाई में उनकी पार्टी हार का शतक लगाने के करीब है। हार-दर-हार से सबक लेने के बजाए राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के खिलाफ झूठे नैरेटिव गढ़ने में लगे हैं। यह जानते हुए भी कि हर बार राहुल गांधी के झूठे नैरेटिव की पोल खुल जाती है। गांधी परिवार के साथ-साथ लेफ्ट लिबरल गैंग और इंडी गठबंधन उसकी झूठ की हां में हां मिलाने में जुटा है। राहुल गांधी की नफरत का तो यह आलम में कि उन्हें अपने इन फैक नैरेटिव के लिए कोर्ट तक से फटकार लग चुकी है, लेकिन वे अपनी ‘बालक-बुद्धि’ वाली हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। केंद्र में जब से मोदी सरकार आई है, वे तब से उनके खिलाफ झूठ का पिटारा लिए घूम रहे हैं। लेकिन जनता-जनार्दन के सामने कांग्रेस और इंडी गठबंधन की पोल खुल चुकी है। इसलिए उसने लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री के रूप में पीएम मोदी को चुना है।

चोर कह रहे – वोट चोर, गद्दी छोड़

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी जैसे एक के बाद एक चुनाव में हार का स्वाद चख रहे हैं, वैसे ही उनके और विपक्षी नेताओं के जनता को भ्रमित करने वाले नैरेटिव भी फुस्स हो रहे हैं। एक दर्जन से ज्यादा नैरेटिव फेल होने के बाद अब बिहार विधानसभा चुनाव से पहले वे नया शिगूफा लाए हैं- वोट चोरी। वे बार-बार प्रेस कांफ्रेंस करके वोट चोरी का नैरेटिव गढ़ते हैं और हर बार पहले चुनाव आयोग और फिर जिनको उन्होंने वोट चोरी का पीड़ित बताकर पेश किया, वे ही खुद मीडिया में कहते हैं कि उनका वोट चोरी नहीं हुआ है। कर्नाटक, बिहार और मध्य प्रदेश के वोटर ने राहुल गांधी के फेक नैरेटिव का पर्दाफाश किया है। पहले राहुल गांधी ने महाराष्ट्र में वोट चोरी के खुलेआम आरोप लगाए और इसके पक्ष में सीएसडीएस के डेटा देकर यह साबित करने का प्रयास किया कि महाराष्ट्र चुनाव में कितनी धांधली हुई है। यह अलग बात है कि जिस CSDS के डेटा के आधार पर आरोप लगाए थे, उसी ने अपनी गलती और बड़ी गड़बड़ी के लिए माफी मांग ली। राहुल की बहन प्रियंका भी वोट चोरी के आरोप के लिए जिस महिला की टी-शर्ट पहनी थी। उसी ने प्रियंका गांधी को झूठा साबित कर दिया। इधर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव भी ‘वोट चोरी’ के झूठा नैरेटिव में फंस गए। उनका वायरल वीडियो निकला एडिटेड निकला और चुनाव आयोग पर विपक्ष की साजिश बेनकाब कर दिया।

जातिगण जनगणना में भी हुई बोलती बंद

इस साल के शुरू में राहुल गांधी जातिगत जनगणना का शिगूफा लेकर आए। जातिगण जनगणना कराओ। राहुल गांधी ने कांग्रेस शासित राज्यों में खुद जातिगत जनगणना नहीं कराया, लेकिन मोदी सरकार कराए, इसका नैरेटिव जरूर बनाया। प्रधानमंत्री मोदी की सरकार ने सोचा कि जातिगत जनगणना के पीछे अपनी तो कोई गलत मंशा है नहीं, चलो करवा ही लेते हैं। और जैसे ही पीएम मोदी ने बोला, तो राहुल गांधी समेत सब पीछे भाग गए। आज किसी ने कहीं जातिगत जनगणना कराने के बारे में किसी कांग्रेसी को बोलते देखा है।

सारे INDI गठबंधन में मातम मनना शुरू हो गया है क्योकि जातिगत जनगणना मुसलमानों की भी होने की चर्चा है। हिन्दुओं को जातियों में बांट हिन्दुओं से कहीं ज्यादा जातियां मुसलमानों में है फिर भी उनको सिर्फ एक मुसलमान बता हिन्दुओं को डराने का इनका घिनौना खेल बंद होने वाला है।    

चुनाव के लिए बोले, संविधान खतरे में है!

लोकसभा और विधानसभा चुनावों में लगातार हार रहे राहुल गांधी ने पिछले लोकसभा चुनाव में नैरेटिव गढ़ा- संविधान को खतरा है। मोदी सरकार फिर आई तो ये लोग संविधान को बदल देंगे। भाजपा ने इस बार 400 पार का नारा क्या दिया, राहुल गांधी और इंडी गठबंधन के लोग डराने लगे कि ये संविधान बदल देंगे। आरक्षण खत्म कर देंगे। हारने के बाद विपक्षी दलों का ईवीएम का नैरेटिव तो अक्सर चलता ही है। आज कोई राहुल गांधी से पूछे क्या संविधान ख़त्म हो गया? क्या भारत में संविधान नहीं बचा हैं? जिसकी बुनियाद पर कांग्रेसी झूठ बोल रहे थे। लोगों को भ्रमित कर रहे थे।

लोकतंत्र खतरे में है!

एक ओर पीएम मोदी दुनियाभर को यह गौरवशाली संदेश देते हैं कि भारत ‘मदर ऑफ डेमोक्रेसी’ है। दूसरी ओर राहुल गांधी यह नैरेटिव बनाने में लगे हैं कि देश में लोकतंत्र खतरे में है। वो लोकतंत्र बचाने के अगुआ बनने लगे हैं। एक नया नाम दिया गया तो पता चल गया कि ये सिर्फ अल्पसंख्यकों के लिए काम करते हैं। बोले की अम्ब्रेला बदलो, इसका नाम इंडिया करो। जो हम इंडिया अलायंस कहते हैं। भले ही काम सब वही करो। सनातन धर्म को भी खत्म करो। मणिपुर का एक वायरल वीडियो भला कैसे भूला जा सकता है, जिसमें भारत माता की हत्या का नैरेटिव बनाया गया। ये सारे नैरेटिव फेल फुस्स हो गए। पीएम मोदी ने लोकसभा में कहा हमारा देश ना केवल सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं, बल्कि हम लोकतंत्र की जननी भी हैं। पीएम मोदी ने कहा, “भारत का लोकतंत्र भारत का गणतांत्रिक अतीत बहुत ही समृद्ध रहा है, विश्व के लिए प्रेरक रहा है और तभी तो भारत आज ‘मदर ऑफ डेमोक्रेसी’ के रूप में जाना जाता है। असलियत में राहुल गांधी को पहले अपनी पार्टी में लोकतंत्र की चिंता करनी चाहिए।

पेगासस जासूसी को लेकर फिर झूठ

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने 2022 में पेगासस जासूसी कांड को लेकर एक देशद्रोही का नैरेटिव बनाने की कोशिश की। पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में छात्रों के एक समूह से कहा कि भारतीय लोकतंत्र खतरे में है और इजरायली स्पाइवेयर पेगासस का उपयोग करके उनके सहित कई विपक्षी नेताओं की जासूसी की जा रही है। इसके अलावा राहुल गांधी ने संसद भवन के पास विजय चौक पर संवाददाताओं से कहा, ‘पेगासस एक हथियार है जिसका उपयोग आतंकवादियों और अपराधियों के खिलाफ किया जाता है। लेकिन हमारे यहां इसका उपयोग भारत की संस्थाओं और लोकतंत्र के खिलाफ किया जा रहा है। लेकिन यह भी मनगढ़ंत नैरेटिव ही साबित हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने पेगासस जासूसी मामले में तकनीकी पैनल की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की मांग को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि देश की सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़ी किसी भी रिपोर्ट का खुलासा नहीं किया जाएगा।

किसान आंदोलन की आग को और भड़काया

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी और विपक्ष के बार-बार फेल हो रहे नैरेटिव के बीच 2021 में किसान आंदोलन में मानों अंधे के हाथ बटेर लग गई। कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने किसान आंदोलन की आग को और भड़काने में सारी कोशिशें कीं। यहां तक कि खालिस्तानी आतंकियों की मदद से आंदोलन को मजबूती देने के प्रयास भी हुए। आज किसानों को भी अफसोस होता है कि उनके भले के लिए आए तीन किसान कानून अगर होते, तो आज किसानों का कितना भला हो रहा होता। पीएम मोदी अपने अन्नदाताओं के फायदे के लिए ही ट्रंप टैरिफ के खिलाफ लड़ रहे हैं। आज पूरी दुनिया नीचे जा रही है, लेकिन भारत ऊपर जा रहा है। पूरी दुनिया में महंगाई ऊपर जा रही है, लेकिन भारत में यह लगातार नीचे है।

CAA -NRC पर बोले नागरिकता चली जाएगी

साल 2020 में CAA-NRC आने के बाद कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष को लगा कि इसमें बहुत मसाला है। मोदी सरकार को नया नैरेटिव गढ़कर इसमें लपेट दिया जाए। विपक्ष ने इसके लिए क्या-क्या नहीं किया। मुसलमानों को फिर डराया गया कि इसके आते ही तुम्हारी नागरिकता चली जाएगी। तुमको देश से बाहर फेंक दिया जाएगा। तुम कहीं के नहीं रहोगे। इस झूठे नैरेटिव के साथ देश के लोगों को भ्रमित करके शाहीन बाग का एक नया मॉडल ही खड़ा किया गया। लेकिन झूठ की बुनियाद पर खड़े नैरेटिव ज्यादा दिन चल नहीं पाते। मोदी सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया था कि CAA-NRC नागरिकता छीनने का नहीं, बल्कि नागरिकता देने का कानून है। कांग्रेस और वामियों की प्रोपेगेंडा फैलाने की सारी कोशिशें पानी में चली गईं।

कोरोना वैक्सीन पर भ्रम और ‘मोविड’

इसी साल भारत समेत पूरी दुनिया को कोरोना महामारी ने अपनी चपेट में लिया। ऐसी विकराल महामारी के बीच भी राहुल गांधी और अखिलेश यादव समेत कई विपक्षी नेता राजनीति करने से बाज नहीं आए। राहुल गांधी ने तो शर्मनाक हरकत करते हुए कोविड महामारी को प्रधानमंत्री मोदी से जोड़कर इसे ‘मोविद’ बता दिया। यानी इसके लिए भी पीएम मोदी को जिम्मेदार बताया। दूसरी ओर उनके सहयोगी अखिलेश यादव ने देश की वैक्सीन को भाजपा की वैक्सीन बताकर लगवाने से इनकार करके हुए यूपी में लोगों को भड़काने की नाकाम कोशिश की। दूसरी ओर असलियत यह थी पीएम मोदी की दूरदर्शिता के चलते ही भारत ने ना सिर्फ कोरोना वैक्सीन बनाई, बल्कि दुनियाभर के 100 के अधिक देशों की हमने इस महामारी में मदद भी की। ये देश उस वैश्विक महामारी में मदद करने के लिए आज भी पीएम मोदी का आभार जताते थकते नहीं हैं। इस वैक्सीन से देशवासियों के साथ-साथ कई देशों के लोगों में यह विश्वास बढ़ा कि विकट आपदा के समय पीएम मोदी संकटमोचक बनते हैं।

देश का चौकीदार चोर है

2019 के लोकसभा चुनाव से पहले ऐसे ही फेक नैरेटिव को आगे बढ़ाते हुए राहुल गांधी और कांग्रेस ने चौकीदार चोर है का नैरेटिव गढ़ा। गली-गली में पर्चे बांटे गए। उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी ने तो बच्चों तक से नारे लगवा दिए- गली गली में शोर है, देश का चौकीदार चोर है। सीएम-पीएम के रूप में इतने साल साल से नरेन्द्र मोदी की साफ-सुथरी राजनीति देख रही देश की जनता इस झूठे नैरेटिव को समझ गई। जनता इस बात को महसूस किया और पीएम मोदी का साथ दिया। इतना ही नहीं तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को चौकीदार चोर है बयान पर अदालत से फटकार लगने के बाद सुप्रीम कोर्ट से बिना शर्त माफी मांगनी पड़ी। राहुल ने अवमानना के मामले में पहले दायर किए गए दो हलफनामों में सिर्फ खेद जताया था। इस पर कोर्ट ने उन्हें फटकार लगाई थी। इसके बाद कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने माफी मांगी और इनका यह नैरेटिव भी बुरी तरह से फेल हो गया।

राफेल खरीद में घोटाले का शिगूफा

राहुल गांधी 2018 में राफेल का नया शिगूफा लेकर आए। उन्होंने ये झूठा नैरेटिव बनाने की कोशिश की कि राफेल खरीद में घोटाला हुआ है। राहुल गांधी ने झूठी-झूठी कहानियों के जरिए कभी अनिल अंबानी, कभी मनोहर परिकर, तो कभी कभी फ्रांस सरकार के नाम पर मोदी सरकार को बदनाम करने का नैरेटिव चलाया। इससे एक तबके में ये विश्वास पैदा होने लगा कि कहीं ये सरकार चली ना जाए। लेकिन मोदी सरकार में विश्नास तब और पुख्ता हो गया जब वे हर प्लेटफार्म, हर हर अदालत में बेदाग साबित होते रहे। विपक्ष ने अटल सरकार में भी ताबूत घोटाले का जिन्न खड़ा किया था। बाद में पता चला की ताबूत घोटाला तो है ही नहीं। ऐसे ही क्लीन चिट मिलने के बाद राफेल खरीद का नैरेटिव भी फुस्स साबित हो गया। अब ऑपरेशन सिंदूर में राफेल ने भी पाकिस्तान को घुटने टेकने पर मजबूर किया तो राफेल को मुद्दा बनाने वालों का सिर शर्म में झुका होगा!

जीएसटी को बताया गब्बर सिंह टैक्स

राहुल गांधी का जब नोटबंदी का नैरेटिव नहीं चला तो इसी साल दूसरा नैरेटिव लेकर आ गए। दरअसल, मोदी सरकार ने देशहित में 1 जुलाई 2017 को जीएसटी लागू किया। राहुल गांधी ने इसके नाम पर मध्यम वर्ग को भड़काने की पूरी कोशिश की। जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स नाम दिया। उन्होंने कहा कि जीएसटी देश के मध्यम वर्ग की जेब पर चोट है, लेकिन मध्यम वर्ग तो इंडी गठबंधन नहीं, पीएम मोदी के साथ है। वो इनके नैरेटिव के बहकावे में नहीं आया। क्योंकि उनको पता था कि जीएसटी आने वाले समय में उनके लिए बहुत बड़ी राहत लेकर आएगा। और 2025 में ऐसा हो गया। जीएसटी की वजह से आम आदमी को बड़ी राहत मिली। पूरा देश गदगद है। आंकड़े गवाह हैं कि जहां-जहां जीएसटी का इम्प्लिमेंटेशन हुआ, उन सरकारों को मुश्किलों का सामना करना पड़ा। लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ा। लेकिन इस देश के लोगों ने समझा कि प्रधानमंत्री मोदी सच्ची नीयत से काम कर रहे हैं, इसलिए वे उनके साथ खड़े नजर आए। 2019 में उन्हें प्रचंड बहुमत से दोबारा प्रधानमंत्री बनाया। इसके साथ ही राहुल गांधी का नैरेटिव फेल हो गया।