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बंगाल में BJP सरकार आई तो डरकर दक्षिण में भाग रहे घुसपैठिए, कर्नाटक में 20 लाख+ अवैध बांग्लादेशी होने का दावा


कर्नाटक में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। राज्य के अलग-अलग हिस्सों से इसको लेकर लगातार रिपोर्टें सामने आ रही हैं। ऑर्गेनाइजर की रिपोर्ट के मुताबिक, हुबली के श्री सिद्धरूढ़ रेलवे स्टेशन के बाहर कुछ दिनों पहले हिंदू संगठनों ने प्रदर्शन किया और पश्चिम बंगाल व पूर्वी राज्यों से आने वाले लोगों की कड़ी निगरानी की माँग उठाई।

रिपोर्ट के अनुसार, श्रीराम सेना प्रमुख प्रमोद मुथालिक और संगठन के कार्यकर्ताओं ने यह विरोध प्रदर्शन उस आशंका के बीच किया कि पश्चिम बंगाल में शुभेंदु सरकार की कार्रवाई के बाद कई संदिग्ध बांग्लादेशी दक्षिण भारत के शहरों में शरण लेने पहुँच रहे हैं। हिंदू संगठनों का दावा है कि बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद ऐसे लोग पहचान छिपाने और काम की तलाश में कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों का रुख कर सकते हैं।

प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि फर्जी आधार कार्ड के सहारे लोगों को बिना पर्याप्त जाँच के यात्रा करने दी जा रही है। उनका कहना था कि रेलवे पुलिस ट्रेनों में संदिग्ध यात्रियों की केवल औपचारिक जाँच कर रही है। हाल ही में हुबली रेलवे स्टेशन पर पश्चिम बंगाल से आए करीब 10 संदिग्ध लोगों से पूछताछ की गई थी। उन्होंने खुद को बागलकोट जिले में मजदूरी के लिए जा रहा बताया और आधार कार्ड दिखाने के बाद उन्हें जाने दिया गया।

इस पर नाराजगी जताते हुए प्रदर्शनकारियों ने कहा कि सिर्फ आधार कार्ड नागरिकता का पर्याप्त प्रमाण नहीं हो सकता क्योंकि फर्जी दस्तावेज भी आसानी से बन जाते हैं। प्रमोद मुथालिक ने कहा कि केवल आधार कार्ड देखकर लोगों को छोड़ना ठीक नहीं है बल्कि गहराई से जाँच होनी चाहिए ताकि घुसपैठिए कर्नाटक में बस न सकें। उन्होंने पुलिस, रेलवे और खुफिया एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल की भी माँग की।

विरोध के बाद रेलवे स्टेशन पर खासकर पश्चिम बंगाल से आने वाली शालीमार एक्सप्रेस के यात्रियों की जाँच बढ़ाई गई लेकिन प्रदर्शनकारियों ने इसे कर्मचारियों की कमी के कारण केवल प्रतीकात्मक कार्रवाई बताया।

इस बीच जनवरी में आई एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि कर्नाटक में करीब 20 लाख बांग्लादेशी घुसपैठिए हो सकते हैं। खुफिया सूत्रों के हवाले से कहा गया कि इनमें से 70-80% लोगों के पास भारतीय पहचान पत्र हैं। अनुमान के मुताबिक, बेंगलुरु और आसपास के इलाकों में 5 से 6 लाख, मालनाड और तटीय क्षेत्रों में 8 से 10 लाख और बाकी उत्तर कर्नाटक व पुराने मैसूर क्षेत्र में रह रहे हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेशी घुसपैठिए खुद को पश्चिम बंगाल का निवासी बताकर कर्नाटक में अलग-अलग जगहों पर काम कर रहे हैं। बेंगलुरु, बेंगलुरु ग्रामीण और मालनाड क्षेत्रों में ये लोग निर्माण स्थलों, सुपारी और कॉफी बागानों, कबाड़ दुकानों समेत कई जगहों पर कम मजदूरी में काम करते हैं। सूत्रों के मुताबिक, स्थानीय मजदूरों की तुलना में ये 100 से 150 रुपए कम दिहाड़ी पर काम करने को तैयार हो जाते हैं और इसलिए इन्हें प्राथमिकता मिलती है।

राज्य में सबसे अधिक ऐसे लोग बेंगलुरु और उसके आसपास के इलाकों में रहने की बात कही गई है। यहाँ वे कूड़ा बीनने, निर्माण मजदूर, सैलून कर्मचारी, अस्पतालों में सफाई कर्मी, होटल-रेस्तराँ में कामगार और सड़क किनारे कपड़े व रोजमर्रा का सामान बेचने का काम करते हैं। वहीं, चिक्कमगलुरु, उडुपी, शिवमोग्गा, कोडागु, दक्षिण कन्नड़ और उत्तर कन्नड़ जैसे जिलों में कॉफी-सुपारी बागानों, रिसॉर्ट, एस्टेट और फार्महाउस में भी इनके काम करने की बात सामने आई है। कुछ लोग अपने परिवारों के साथ रहते पाए गए हैं।

रिपोर्ट में यह भी चिंता जताई गई कि तटीय और मालनाड क्षेत्रों में पिछले 15 वर्षों से रह रहे कई अवैध बांग्लादेशी भारतीय पहचान पत्र हासिल कर चुके हैं। इतना ही नहीं, कुछ लोगों ने लाखों रुपये की संपत्ति खरीदी और कथित तौर पर भारतीय पहचान के आधार पर पासपोर्ट बनवाकर 15-20 साल बाद दूसरे देशों तक में पहुँचे हैं।

महिलाओं के बाद अब उद्योगों की दुश्मन बनी ममता सरकार, तीन दशक पुरानी रियायतें छीनी


पश्चिम बंगाल कभी पूरे भारत के कारोबार का प्रमुख केंद्र माना जाता था, लेकिन आज ममता बनर्जी सरकार की गलत नीतियों के चलते यह उद्योगों की कब्रगाह बनता जा रहा है। एक तो वहां पहले से ही उद्योगों के आने में मुश्किलें दिख रही हैं और अब पश्चिम बंगाल सरकार ने एक ऐसा कानून बना दिया है, जिसके बाद कोई भी उद्योगपति वहां अपनी इंडस्‍ट्री लगाने से पहले 100 बार सोचेगा। हालात इतने खराब हो गए हैं कि अल्‍ट्राटेक, ग्रासिम और डालमिया सहित कई कंपनियां ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ कोलकाता हाईकोर्ट पहुंच चुकी हैं। उनका कहना है कि इस कानून से उद्योगों पर गहरा असर पड़ेगा। दरअसल, पश्चिम बंगाल सरकार ने हाल में एक बिल पास किया है, जो कंपनियों को मिलने वाले अनुदान और प्रोत्‍साहन योजनाओं को खत्‍म करता है। इस कानून को सदन में पास भी किया जा चुका है। यह एक्‍ट कंपनियों को मिलने वाले सभी प्रोत्‍साहन को न सिर्फ खत्‍म करता है, बल्कि इसे साल 1993 से ही खत्‍म मान रहा है और तब से अब तक मिले सभी तरह की छूट और प्रोत्‍साहनों को वापस लौटाना होगा। इसका मतलब है कि पिछले 32 साल में जितनी भी स्‍कीम के तहत कंपनियों को छूट मिली होगी, सब सरकार को वापस करनी होंगी।

पहले नारीशक्ति को शोषण, अब उद्योगों को कब्रिस्तान बनाने वाला फैसला
महिला मुख्यमंत्री होने के बावजूद ममता बनर्जी के राज में महिलाओं के खिलाफ तो खूब ज्यादतियां हो ही रही हैं। अब ये सरकार उद्यमियों के खिलाफ भी मैदान में उतर आई है। सरकार ने उद्योग-धंधों की कब्रिस्तान बनाने वाला यह फैसला इस सच्चाई के बाद जानबूझकर लिया है कि ममता राज के 14 साल में 6500 सौ से ज्यादा कंपनियों ने बंगाल को ‘बाय-बाय’ बोल दिया है। कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय के मुताबिक वर्ष 2011-12 से वर्ष 2024-25 के बीच पश्चिम बंगाल से 6688 कंपनियां राज्य छोड़ कर चली गई हैं। मंत्रालय के अनुसार, इनमें से एक तिहाई यानी 2200 से अधिक कंपनियां वर्ष 2019 के बाद से राज्य छोड़ कर गई हैं। यह आंकड़े भले ही चौंकाने वाले हों, लेकिन उद्योग-धंधों का पलायन और पश्चिम बंगाल का पुराना रिश्ता है। देश के बड़े कारोबारी घरानों के अपना मुख्यालय शिफ्ट करने से बड़े ब्रांड्स के फैक्ट्री बंद करने तक यही हाल बीते कई सालों से है। इसमें एक कारण ममता बनर्जी सरकार का उद्योग विरोधी रुख और राज्य की खस्ताहाल कानून-व्यवस्था है।

देश आगे बढ़ रहा, बंगाल में साढ़े छह हजार कंपनियों का पलायन 
राज्य के उद्योगों के खिलाफ ममता बनर्जी का यह रुख पहली बार नजर नहीं आया है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में राज्य औद्योगिक बदहाली के कगार पर है। कभी देश के औद्योगिक परिदृश्य में अग्रणी रहा पश्चिम बंगाल आज गहरे आर्थिक संकट से जूझ रहा है। ममता राज में 2011 से 2025 के बीच सिर्फ 14 वर्षों में राज्य से 6,688 कंपनियां या तो बंद हो चुकी हैं या अन्य राज्यों में चली गई हैं। इन कंपनियों में 110 ऐसी भी थीं, जो देश के प्रमुख स्टॉक एक्सचेंजों में लिस्टेड थीं। यह केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि राज्य के औद्योगिक पतन की दयनीय गाथा है। सवाल उठता है कि आज जब पूरा देश प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीतियों के कारण आर्थिक विकास और रोजगार सृजन की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। भारत दुनिया की सबसे बड़ी चौथी अर्थव्यवस्था बन चुका है, तब आखिर पश्चिम बंगाल क्यों लगातार पिछड़ता जा रहा है? आखिर ऐसा क्या हुआ कि जो राज्य कभी उद्योगों का केंद्र था, वह आज मजदूरों और पूंजीपतियों दोनों के लिए असुरक्षित और अव्यवहारिक बन गया है।

उद्योग-धंधों के खिलाफ कानून 32 साल पहले से लागू माना जाएगा
पश्चिम बंगाल के सिंगूर और नंदीग्राम की घटना तो याद ही होगी, जहां टाटा कंपनी के प्‍लांट के लिए भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलन शुरू हो गया था। अब एक बार फिर पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने एक ऐसा कानून पास किया है, जिससे उद्योगों पर निश्चित रूप से बड़ा असर पड़ने वाला है। इसलिए कंपनियों और उद्यमियों ने इस कानून को असंवैधानिक बताया है। उनका आरोप है कि सरकार ने कानून बनाया अभी है, लेकिन इसे लागू कर रही है 32 साल पहले से यानी रेट्रोस्‍पेक्टिव से कर रही है, जो पूरी तरह असंवैधानिक है। क्योंकि पश्चिम बंगाल सरकार ने हाल में जो बिल पास किया है, जो कंपनियों को मिलने वाले अनुदान और प्रोत्‍साहन योजनाओं को खत्‍म करता है। यह एक्‍ट कंपनियों को मिलने वाले सभी प्रोत्‍साहन को न सिर्फ खत्‍म करता है, बल्कि इसे साल 1993 से ही खत्‍म मान रहा है और तब से अब तक मिले सभी तरह की छूट और प्रोत्‍साहनों को वापस लौटाना होगा। इसका मतलब है कि करीब तीन दशक में जितनी भी स्‍कीम के तहत कंपनियों को छूट मिली है, सब सरकार को वापस लौटानी पड़ेगी।

वामपंथियों के बाद ममता सरकार लिख रही उद्योगों के अवसान की पटकथा
कभी एशिया की बड़ी औद्योगिक ताकतों में से एक गिने जाने वाले कोलकाता के अवसान की यह पटकथा ममता बनर्जी खुद अपने हाथों से लिख रही हैं। हालांकि वामपंथियों ने भी ऐसा करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी। इसी कारण राज्य में तृणमूल कांग्रेस की सरकार आई। लेकिन ममता बनर्जी ने मुख्यमंत्री बनने के बाद इस पटकथा को अंतिम रूप दिया है और उद्योग-धंधों में इजाफा करने के बजाय उनके ताबूत में आखिरी कील ठोंकने की कसर पूरी कर दी है। राज्‍य सरकार के अधिकारियों के अनुसार, पहले कंपनियों को टैक्‍स, भूमि अधिग्रहण, बिजली, ब्‍याज के भुगतान आदि पर सब्सिडी मिलती थी। अब प्रदेश में औद्योगिक इकाइयों को कोई भी प्रोत्‍साहन, वित्‍तीय लाभ, सब्सिडी, ब्‍याज माफी, शुल्‍क या टैक्‍स में छूट आदि नहीं दी जाएगी। अब किसी भी कंपनी को अपने किसी भी तरह के बकाया राशि पर दावा करने का कोई अधिकार नहीं रहेगा।

डालमिया, अल्ट्राटेक, ग्रासिम जैसी कई कंपनियां हाइकोर्ट पहुंची
पश्चिम बंगाल में एक बार फिर उद्योगों और ममता बनर्जी सरकार के बीच टकराव गहरा गया है। राज्य सरकार ने हाल ही में एक ऐसा कानून पारित किया है जो उद्योग और उद्यमियों के खिलाफ है। इस फैसले के खिलाफ कई कंपनियों को कोलकाता हाईकोर्ट में याचिका लगानी पड़ी है। राज्य सरकार के मुताबिक अब किसी भी औद्योगिक इकाई को टैक्स छूट, ब्याज माफी, बिजली या भूमि अधिग्रहण पर सब्सिडी और किसी भी प्रकार का वित्तीय प्रोत्साहन नहीं दिया जाएगा। कंपनियों को किसी भी बकाया राशि पर दावा करने का अधिकार भी समाप्त कर दिया गया है। सरकार के इस कानून के खिलाफ अल्‍ट्राटेक सीमेंट, इलेक्‍ट्रोस्‍टील कास्टिंग लिमिटेड, ग्रासिम इंडस्‍ट्रीज, नुवोको विस्‍टास और डालमिया सीमेंट ने कलकत्‍ता हाईकोर्ट में अपील दाखिल की है। सभी कंपनियों ने इसके खिलाफ अलग-अलग अपील दाखिल की है, लेकिन हाईकोर्ट इन सभी पर 7 नवंबर को सुनवाई करेगी। कंपनियों का कहना है कि यह कानून उद्योग-विरोधी है और प्रावधान यह कहता है कि इसे पूरी तरह निरस्‍त किया जाए।

कंपनियों को तीन दशक में मिली छूट सरकार को वापस देनी पड़ेगी
इस कानून को पारित करते समय सरकार ने दावा किया था कि इसका मकसद राज्‍य में चल रही तमाम कल्‍याणकारी योजनाओं को वित्‍तीय मदद उपलब्‍ध कराना है। लेकिन असल में राज्य सरकार ने इस कानून को लाकर उद्यमियों को मिल रही कल्याणकारी योजनाओं का रास्ता ही बंद कर दिया है। सरकार ने कंपनियों को छूट और रियायत बंद करते उद्योगों और उद्यमियों के पेट पर लात मारी है। उद्योग मामले एक वरिष्‍ठ अधिकारी का कहना है कि बिल पास होने के बाद कंपनियों ने इससे कारोबार में समस्‍या आने की बात कही थी। तब सरकार ने उन्‍हें बताया कि वह इस समस्‍या को हल करने के लिए नई औद्योगिक नीति बना रही है। लेकिन इंडस्ट्री फ्रेंडली कोई नीति लाने के बजाए उद्योग-विरोधी कानून को लागू कर दिया गया। जब सरकार ने उद्यमियों की कोई बात नहीं सुनी, तो मजबूरन उन्हें कोर्ट जाना पड़ा है।

बंगाल : स्कूल शिक्षक भर्ती घोटाले में ममता सरकार फिर एक्सपोज, शिक्षा मंत्री के बाद अब एक और TMC विधायक लपेटे में आया

                                                                                                                                          साभार 
पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी के पाप एक के बाद एक सामने आ रहे हैं। स्कूल शिक्षक भर्ती घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने ममता बनर्जी के करीबी शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी के बाद अब एक और टीएमसी जीवन कृष्ण साहा को गिरफ्तार किया है। इससे पहले टीएमसी विधायक माणिक भट्टाचार्य भी ईडी के फंदे में फंस चुके हैं। प्रवर्तन निदेशालय ने स्कूल भर्ती घोटाले मामले में TMC विधायक जीवन कृष्ण साहा को गिरफ्तार कर लिया। ED की टीम रेड के लिए पहुंची थी, लेकिन विधायक को इसकी जानकारी मिल गई। वे रेड के पहले दीवार फांदकर भागने की कोशिश करने लगे। इस दौरान साहा ने मोबाइल फोन भी नाले में फेंक दिया, जिसे ED ने बरामद कर लिया है। विधायक की गिरफ्तारी के समय की कुछ तस्वीरें सामने आई हैं। एक फोटो में कीचड़ में सने नजर आ रहे हैं। जीवन कृष्ण साहा मुर्शिदाबाद के बुरवान से विधायक हैं।

ममता बनर्जी की घोटालों की सरकार की कलई खुलने लगी

पश्चिम बंगाल में घोटाले का यह कोई पहला मामला नहीं है। ममता बनर्जी की घोटालों की सरकार की कलई खुलने लगी है। बंगाल में बनर्जी के सीएम रहते शारदा स्कैम, रोज वैली स्कैम, नारदा स्कैम, पोंजी स्कैम और रिक्रूटमेंट स्कैम जैसे कई घोटाले हुए हैं। हाला यह हैं कि एक भी रिक्रूटमेंट प्रोसेस भ्रष्टाचार के बिना पूरी नहीं हुआ। ताजा रिक्रूटमेंट घोटाले में पश्चिम बंगाल के उद्योग और वाणिज्य मंत्री रहे पार्थ चटर्जी, उनकी करीबी अर्पिता मुखर्जी, शिक्षा राज्य मंत्री परेश सी अधिकारी, विधायक और पश्चिम बंगाल प्राथमिक शिक्षा बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष माणिक भट्टाचार्य के नाम सामने आए हैं। मंत्री और अर्पिता जेल में बंद हैं और दूसरे घोटालों की हाईकोर्ट जांच कर रहा है।
एजेंसियां पता लगा रहीं कि ममता बनर्जी ने किन-किन पर अपनी ‘ममता’ लुटाई
ममता के करीबी मंत्री के बाद अब सीएम के भाइयों पर करोड़ों कमाने और आय से अधिक संपत्ति के आरोप लगे हैं। ममता के बेहद खास कहे जाने वाले और कभी तृणमूल कांग्रेस में नंबर-2 की हैसियत रखने वाले पार्थ चटर्जी की सहयोगी अर्पिता मुखर्जी के घर से 51 करोड़ रुपए बरामद हो चुके हैं। टीचर्स रिक्रूटमेंट स्कैम में पार्थ और अर्पिता जेल में बंद हैं। अब कोलकाता हाईकोर्ट में लगी पिटीशन में साफ-साफ कहा गया है कि तृणमूल कांग्रेस के 2011 में सत्ता में आने के बाद से बनर्जी परिवार की संपत्ति बेहिसाब बढ़ी। सीएम ममता बनर्जी के पांच भाइयों और एक भाभी पर आय से ज्यादा संपत्ति जमा करने के आरोप लगे हैं। हाईकोर्ट ने सभी आरोपियों को 11 नवंबर तक एफिडेविट जमा करने के आदेश दिए हैं।
तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद से बनर्जी परिवार की संपत्ति में बेशुमार इजाफा
कोलकाता हाईकोर्ट में लगी एक नई पिटीशन में अब सीएम ममद बनर्जी का परिवार ही निशाने पर है। पिटीशन में ममता के भाइयों पर आरोप है कि तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद से बनर्जी परिवार की संपत्ति में बेशुमार इजाफा होकर यह कई गुना बढ़ी है। पिटीशन में कहा गया है कि कोलकाता की हरीश चटर्जी स्ट्रीट पर ज्यादातर प्रॉपर्टी बनर्जी परिवार की हैं। ममता की भाभी कजरी बनर्जी पर कई प्रॉपर्टी मार्केट रेट से कम कीमत में खरीदने का आरोप है। भतीजे अभिषेक बनर्जी कई कंपनियों में डायरेक्टर हैं।
ममता बनर्जी के CM बनने के बाद बंगाल में स्कैम की बाढ़ 
पिटीशन में ममता और उनके परिवार पर लगे आरोप लगे हैं कि 2011 से ममता बनर्जी बंगाल की मुख्यमंत्री हैं। इस दौरान शारदा स्कैम, रोज वैली स्कैम, नारदा स्कैम, पोंजी स्कैम और रिक्रूटमेंट स्कैम हुए। एक भी रिक्रूटमेंट प्रोसेस भ्रष्टाचार के बिना पूरी नहीं हुआ। इन घोटालों में तृणमूल कांग्रेस के कई नेता अरेस्ट भी हुए। पॉलिटिकल लीडर्स और मीडिया ने ममता बनर्जी के फैमिली मेंबर्स की बेहिसाब संपत्ति पर खुलासे किए। गनाशक्ति नाम के बांग्ला अखबार ने दावा किया कि कोलकाता की हरीश चटर्जी स्ट्रीट पर ज्यादातर प्रॉपर्टी बनर्जी परिवार की हैं।
पार्थ ने भ्रष्टाचार के पैसे से अर्पिता को थाइलैंड और फुकेट घुमाकर खूब ऐश कराई

पश्चिम बंगाल के रिक्रूटमेंट घोटाले के मास्टरमाइंड ममता के मंत्री और अर्पिता के बारे में जांच एजेंसी ईडी ने नए खुलासे किए हैं। पार्थ ने सारे नियम-कानूनों को किनारे रखकर अपनी करीबी अर्पिता पर करोड़ों रुपये न्यौछावर कर दिए। इतना ही नहीं पार्थ ने अपनी.पत्नी के करोड़ों के शेयर भी अर्पिता को अर्पित कर दिए। उसे भ्रष्टाचार के पैसे से थाइलैंड और फुकेट घुमाकर खूब ऐश कराई। विदेश यात्रा से वापस आकर उसने अर्पिता को दो लग्जरी गाड़ियां भी दीं। घोटालेबाज मंत्री अर्पिता पर इतना मेहरबान था कि उसकी बहन को सरकारी नौकरी तक दिला दी।

 तृणमूल कांग्रेस महासचिव पार्थ चटर्जी घोटाले का मास्टरमाइंड

कई घोटालों में लिप्त पश्चिम बंगाल सरकार का यह करोड़ों रूपये का घोटाला है। इसकी जांच कर रही प्रवर्तन निदेशालय की टीम ने पुख्ता इनपुट मिलने के बाद ममता बनर्जी सरकार में शिक्षा मंत्री और तृणमूल कांग्रेस महासचिव पार्थ चटर्जी को गिरफ्तार किया। तब घोटाले के मास्टरमाइंड पार्थ चटर्जी की करीबी अर्पिता मुखर्जी के दो घरों से करीब 50 करोड़ रपये कैश बरामद किए गए थे। छापे में उस समय इसके साथ ही 5 किलो से ज्यादा सोना और दस्तावेज भी मिले थे। इतनी बड़ी धनराशि कहां से आई, इसके सोर्स के बारे में पार्थ और अर्पिता कुछ भी सही-सही नहीं बता पाए थे। उनसे पूछताछ के बाद ईडी ने टीएमसी विधायक माणिक भट्टाचार्य से गिरफ्तार कर लिया। माणिक भट्टाचार्य स्कूल शिक्षक भर्ती घोटाले के मामले में गिरफ्तार होने वाले ममता बनर्जी की पार्टी के दूसरे नेता हैं।
मनी लॉन्ड्रिंग केस में भी TMC विधायक साहा व रिश्तेदार आरोपी
अब ईडी की जांच से रडार पर टीएमसी के एक और विधायक जीवन कृष्ण साहा भी आ गए। ईडी की तरफ से दर्ज किए गए मनी लॉन्ड्रिंग केस में TMC विधायक साहा, उनके रिश्तेदार और सहयोगी आरोपी हैं। ईडी की टीम एक व्यक्ति को लेकर साहा के घर पहुंची थी। स्कूल शिक्षक भर्ती घोटाले से जुड़े बीरभूम के एक व्यक्ति ने पैसों की लेन-देन की सूचना मिलने के बाद साहा के परिसरों की तलाशी ली। ED की टीम ने बीरभूम के उस व्यक्ति के साथ साहा के घर पर छापा मारा। इससे पहले, ED ने साहा की पत्नी से भी पूछताछ की थी। साहा को विशेष अदालत में पेश किया जाएगा और आगे की जांच के लिए उनकी हिरासत मांगी जाएगी।
शिक्षक भर्ती घोटाला केस में ED दायर कर चुकी 4 चार्जशीट
साहा को CBI ने भी 2023 में इसी घोटाले से जुड़े आरोप में गिरफ्तार किया था और बाद में रिहा कर दिया गया था। यह मामला CBI की उस FIR से उठा, जिसे कलकत्ता हाईकोर्ट ने 9वीं से 12वीं के सहायक शिक्षकों और प्राइमरी टीचर्स की भर्ती में अनियमितताओं की जांच करने का निर्देश दिया था। ED ने इससे पहले पश्चिम बंगाल के पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी, उनकी सहयोगी अर्पिता मुखर्जी, टीएमसी विधायक और पश्चिम बंगाल प्राथमिक शिक्षा बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष माणिक भट्टाचार्य के अलावा कुछ अन्य लोगों को भी इस मामले में गिरफ्तार किया था।
नौकरी के बदले रिश्वत लेकर घोटालेबाजों ने करोड़ों कमाए
गिरफ्तारी के बाद चटर्जी को टीएमसी ने निलंबित कर दिया था। इस मामले में अब तक ईडी 4 चार्जशीट दाखिल कर चुके हैं। ईडी ने पहली चार्जशीट 19 सितंबर 2022 को दाखिल की थी। इसमें पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी और उनकी करीबी सहयोगी अर्पिता मुखर्जी का नाम शामिल था। चार्जशीट के अनुसार, इन दोनों के पास 103.10 करोड़ रुपए की नकदी, गहने और अचल संपत्ति (जमीन-जायदाद) का पता लगा था। कहा गया कि यह राशि इन्होंने भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग से बनाई गई थी। जांच में नौकरी के बदले रिश्वत लेने की बात भी सामने आई थी।


फिदायीन हमलावर भेजकर कोलकाता पर करो कब्जा : बांग्लादेशी मौलाना अब्दुल कुद्दूस फारूकी ने उगला जहर, कहा, ‘मुझे पता है वे (हिंदू) खून देखकर काँप जाते हैं’


बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार हटने के बाद कट्टरपंथी के हौसले बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। ऐसी ही एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है, जिसमें जहर उगलने वाला मौलाना अब्दुल कुद्दूस फारूकी खुलेआम कोलकाता पर कब्जा करने की बात कर रहा है। इसके अलावा हिंदुओं को लेकर भी आपत्तिजनक टिप्पणी की।

फारूकी ने भड़काऊ बयान देते हुए कहा, “अगर बांग्लादेशी फौज मुझसे कोलकाता पर कब्जा करने के लिए कहती है, तो मैं एक प्लान बनाऊँगा। 70 फाइटर जेट का इस्तेमाल करना तो दूर की बात है, मैं कोलकाता पर कब्जा करने के लिए 7 प्लेन का भी इस्तेमाल नहीं करूँगा।”

आगे कहता है कि उसे 70 प्लेन की जरूरत नहीं है। कोलकाता में फिदायीन हमलावर भेजकर ही कब्जा कर सकता है। वीडियो में आगे फारूकी हिंदुओ के खिलाफ नफरत की भाषा बोलते हुए कहा, “मुझे पता है कि उनका पसंदीदा खाना क्या है – गंदगी। मुझे पता है कि वे कितने कमजोर हैं, खून देखकर कैसे डर जाते हैं। मूर्ति पूजक खून से काँप उठते हैं।”

दरअसल, यह वीडियो 8 मार्च 2025 को ‘हसन मीडिया’ नाम के यूट्यूब चैनल पर अपलोड किया गया था। इसी वीडियो की क्लिप अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है।

पश्चिम बंगाल : ‘TMC को वोट क्यों देना? BJP को वोट करना बेहतर’: अधीर रंजन चौधरी, कांग्रेस नेता ने खेल दिया खेला


वरिष्ठ कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी ने बुधवार (01 मई 2024) को पश्चिम बंगाल के बेरहामपुर में एक राजनीतिक रैली में बीजेपी के लिए वोटिंग की अपील कर दी। वायरल वीडियो में अधीर रंजन चौधरी वीडियो में कहते दिख रहे हैं, ‘टीएमसी को वोट देने के बजाय बीजेपी को वोट देना चाहिए।”

पश्चिम बंगाल के बहरामपुर लोकसभा सीट से पाँच बार के लोकसभा सांसद अधीर रंजन चौधरी ममता बनर्जी के तीखे आलोचकों में से एक हैं। वो बहरामपुर में लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार करते समय मंच पर थे, तभी उन्होंने बंगाली में कहा, “टीएमसी को वोट क्यों दें, बीजेपी को वोट देना बेहतर है।” अधीर रंजन चौधरी का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार पल्लवी घोष ने ये वीडियो एक्स पर शेयर करते हुए लिखा, “अधीर रंजन चौधरी बोल रहे हैं कि टीएमसी की जगह बीजेपी को वोट दें, ऐसे में इंडी अलायंस का क्या होगा?”

भले ही कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल ‘INDI’ गठबंधन के बैनर तले “एकता” का दावा कर रहे हैं, लेकिन ज़मीनी स्थिति उस बात से बहुत दूर है, जिस पर विपक्ष देश को विश्वास दिलाना चाहता है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और टीएमसी के बीच टकराव चल रहा है, खासकर ममता बनर्जी द्वारा इंडी गठबंधन को मामूली 2 सीटों की पेशकश के बाद, जिससे दोनों राजनीतिक दलों के बीच बातचीत खत्म हो गई। इसके बाद टीएमसी ने पश्चिम बंगाल की सभी 42 लोकसभा सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर दी।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर चौधरी द्वारा लगातार विरोध ने इंडी गठबंधन से हटने के फैसले को महत्वपूर्ण माना जाता है। हालाँकि इस बीच टीएमसी नेता सुस्मिता देव ने अधीर रंजन चौधरी पर जोरदार हमला बोला है। उन्होंने अधीर रंजन चौधरी को बंगाल में ‘बीजेपी का स्टार कैंपेनर’ बताया है।

पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी टीएमसी पहले इंडी गठबंधन में शामिल थी, लेकिन लोकसभा चुनाव के लिए सीटों के बँटवारे में वो इंडी गठबंधन से निकल गई। दोनों ही पक्ष एक-दूसरे को बीजेपी का सहयोगी बताते हैं। अधीर रंजन चौधरी के सामने टीएमसी ने पूर्व क्रिकेट यूसुफ पठान को मैदान में उतारा है। अधीर रंजन चौधरी बहरामपुर लोकसभा सीट से पाँच बार के सांसद हैं, लेकिन इस बार उनकी राह कठिन नजर आ रही है।