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बंगाल में भी शंखनाद हुआ इतिहास के भूल सुधार का; ‘सुहरावर्दी एवेन्यू’ के ‘गोपाल मुखर्जी रोड’ बनने से लगी कांग्रेसियों के ‘अंग विशेष’ में आग: ‘बंगाल के कसाई’ और नेहरु से खास कनेक्शन

   कोलकाता में सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम बदला, अब वीर गोपाल मुखर्जी रोड से जाना जाएगा, प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)
पश्चिम बंगाल की राजनीति में ‘नाम बदलने’ के एक फैसले ने देशव्यापी बहस छेड़ दी है। कोलकाता की ऐतिहासिक और बेहद व्यस्त सड़कों में से एक ‘सुहरावर्दी एवेन्यू’ (Suhrawardy Avenue) का नाम अब बदलकर ‘गोपाल मुखर्जी रोड’ (
Gopal Mukherjee Road) कर दिया गया है। कोलकाता नगर निगम (KMC) द्वारा जारी इस आधिकारिक नोटिफिकेशन के बाद जहाँ भारतीय जनता पार्टी (BJP) इसे ‘ऐतिहासिक न्याय’ और ‘हिंदुओं के स्वाभिमान की बहाली’ बताकर जश्न मना रही है, वहीं कांग्रेस और वामपंथी खेमे में इसके खिलाफ तीखा विरोध देखा जा रहा है।
पूरी दुनिया में भारत ही ऐसा अनोखा देश है जहाँ की जनता अपने ही गौरवशाली इतिहास से अज्ञान है। और महाज्ञानी गलत इतिहास को सही बताने का ज्ञान पेल अपनी गुलामी मानसिकता का प्रमाण देते नज़र आते हैं। दरअसल कांग्रेस और वामपंथ गठजोड़ ने भारतीय इतिहास को इतना अधिक धूमिल कर दिया कि असली इतिहास बताने वाले को फिरकापरस्त/हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे का दुश्मन/गंगा-जमुनी तहजीब का दुश्मन आदि आदि सभी जानते हैं कि कितना उनको कलंकित किया जाता है। देखिए(संलग्न) मेरा प्रकाशित स्तम्भ। सिकंदर जिसके भारत की पुण्यभूमि पर कदम पड़ते ही हिन्दू सम्राट पोरस ने ऐसा पेला जिंदगी में भारत की तरफ देखने की हिम्मत नहीं हुई। हिन्दू सम्राट पोरस के गौरवशाली इतिहास को धूमिल कर पढ़ाया गया 'दुनिया को फ़तेह करने वाला मुकद्दर का सिकंदर'
। 
फिर जिस अजमेर दरगाह पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक हर प्रधानमंत्री चादर भेजते रहे उसका क्या है इतिहास? फिर दिल्ली में गोलचा सिनेमा के पीछे तिराहा बहराम खान है, क्या है बहराम खान का इतिहास? कांग्रेस और वामपंथी गठजोड़ ने ऐसा जहरीला जाल बिछाया कि भारतवासी अपने वास्तविक इतिहास से अज्ञान है। देश में ऐसा कोई राज्य नहीं जहां मुग़ल आक्रांताओं के नाम पर सड़कों के नाम रखे हुए हैं, क्यों? ये कालनेमि हिन्दुओं ने भी बहुत गंद मचाया हुआ है। पहुँच जाते हैं कब्रों को पूजने। अपने देवी-देवताओं को पूजा नहीं जाता, त्यौहार ठंग से मनाए जाते। उन्हें बोझा समझते हैं। देखों पागल कालनेमि हिन्दुओं का पागलपन, दिल्ली में अशोक विहार फ्लाईओवर पर कट्टरपंथियों ने कब्र बना दी हर बृहस्पतिवार को पूजना कर दिया शुरू। अब तो कोर्ट के आदेश से उसे हटा दिया गया है।

कांग्रेस इस फैसले को भाजपा की ‘ध्रुवीकरण की राजनीति’ करार दे रही है और सोशल मीडिया पर आम हिंदुओं को भाजपा कार्यकर्ता बताकर उनका मजाक उड़ा रही है। कांग्रेस का तर्क है कि यह सड़क ‘बंगाल के कसाई’ कहे जाने वाले हुसैन शहीद सुहरावर्दी के नाम पर नहीं, बल्कि उसके चाचा और कलकत्ता विश्वविद्यालय के पहले मुस्लिम कुलपति (VC) डॉ. हसन सुहरावर्दी के नाम पर थी।

लेकिन क्या वाकई इतिहास इतना सीधा और साफ है? क्या सिर्फ नाम का अंतर होने से एक देशद्रोही और अंग्रेजों के मददगार परिवार का दाग धुल जाता है? क्या कांग्रेस का इस सुहरावर्दी परिवार से लगाव सिर्फ आज का है या इसके तार देश के बंटवारे, जवाहरलाल नेहरू और पूर्व कार्यवाहक राष्ट्रपति हिदायतुल्लाह तक जुड़े हुए हैं? आइए इस पूरी कड़वी हकीकत, दफन इतिहास और ‘गोपाल पाठा’ के शौर्य की कहानी को विस्तार से समझते हैं।

कौन था हसन सुहरावर्दी? अंग्रेजों की चाटुकारिता और ‘सर’ की उपाधि का सच

कांग्रेस का इकोसिस्टम आज चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है कि सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम साल 1933 में डॉ. हसन सुहरावर्दी के सम्मान में रखा गया था, जो एक बड़े सर्जन और शिक्षाविद थे। लेकिन इतिहास के पन्नों को पलटें तो समझ आता है कि हसन सुहरावर्दी को अंग्रेजों ने ‘सर’ (Sir) की उपाधि और यह सड़क उनके किसी ‘अकादमिक योगदान’ के लिए नहीं, बल्कि भारत की एक महान बेटी और स्वतंत्रता सेनानी के साथ गद्दारी करने के इनाम में दी थी।
बात 6 फरवरी 1932 की है। कलकत्ता विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह (Convocation) चल रहा था। मंच पर ब्रिटिश गवर्नर सर स्टेनली जैक्सन (Sir Stanley Jackson) भाषण दे रहा था। उसी समय 21 साल की एक निडर बंगाली स्वतंत्रता सेनानी बीना दास (Bina Das) अपनी डिग्री लेने के बहाने वहाँ पहुँचीं। उनके पास एक रिवॉल्वर थी, जिसे उन्होंने अपनी पोशाक में छुपा रखा था। भारत माँ को गुलामी की जंजीरों से आजाद कराने के संकल्प के साथ बीना दास ने गवर्नर स्टेनली जैक्सन पर एक के बाद एक 5 गोलियाँ दाग दीं।
गवर्नर जैक्सन ने किसी तरह झुककर अपनी जान बचाई। इसी दौरान वहाँ मौजूद विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति डॉ. हसन सुहरावर्दी ने देशभक्त बीना दास को पीछे से दबोच लिया और उन्हें ब्रिटिश पुलिस के हवाले कर दिया।
इतिहास की गवाही: हसन सुहरावर्दी ने एक क्रूर ब्रिटिश अधिकारी की जान बचाने के लिए अपने ही देश की एक क्रांतिकारी बेटी को अंग्रेजों के क्रूर शिकंजे में सौंप दिया। इस ‘वफादारी’ से खुश होकर ब्रिटिश हुकूमत ने हसन सुहरावर्दी को ‘सर’ (Knighthood) की उपाधि से नवाजा और साल 1933 में उनके घर के सामने वाली सड़क का नाम ‘सुहरावर्दी एवेन्यू’ रख दिया।
इस घटना के बाद बीना दास को 9 साल की कठोर जेल हुई। उनके साथ जुड़ीं अन्य महिला क्रांतिकारियों, जैसे कमला दासगुप्ता (जिन्होंने रिवॉल्वर का इंतजाम किया था), को लंबे समय तक जेल की कालकोठरी में यातनाएँ सहनी पड़ीं। कांग्रेस आज जिस हसन सुहरावर्दी के नाम का बचाव कर रही है, वह असल में अंग्रेजों का वो पिट्ठू था जिसने भारतीय क्रांतिकारियों के खून और आंसुओं की कीमत पर ब्रिटिश सरकार से जागीरें और सम्मान पाया था। इतना ही नहीं, हसन सुहरावर्दी मुस्लिम लीग और ‘द्वि-राष्ट्र सिद्धांत’ (Two-Nation Theory) का कट्टर समर्थक था और उसकी बेटी बाद में पाकिस्तान जाकर वहाँ की राजनीति में सक्रिय हो गई।

‘बंगाल के कसाई’ हुसैन सुहरावर्दी से क्या था हसन का रिश्ता?

भाजपा और राष्ट्रवादी विचारकों का कहना है कि सुहरावर्दी चाहे ‘हसन’ हो या ‘हुसैन’ दोनों एक ही कट्टरपंथी और भारत-विरोधी सुहरावर्दी परिवार के सदस्य थे। हसन सुहरावर्दी रिश्ते में हुसैन शहीद सुहरावर्दी (Huseyn Shaheed Suhrawardy) का सगा चाचा था। और यह हुसैन शहीद सुहरावर्दी कौन था? इसे इतिहास ‘बंगाल का कसाई’ (Butcher of Bengal) के नाम से जानता है।
साल 1946 में जब मोहम्मद अली जिन्ना ने भारत के टुकड़े करने के लिए ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ (प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस) का आह्वान किया, तब बंगाल का मुख्यमंत्री यही हुसैन शहीद सुहरावर्दी था। 16 अगस्त 1946 को कोलकाता की सड़कों पर हिंदुओं का जो कत्लेआम हुआ, उसकी पूरी स्क्रिप्ट इसी हुसैन सुहरावर्दी ने लिखी थी।
हुसैन ने मुख्यमंत्री रहते हुए पुलिस को बैरकों में रहने का आदेश दिया और मुस्लिम लीग के गुंडों को खुली छूट दे दी। देखते ही देखते कोलकाता की सड़कें हिंदुओं की लाशों से पट गईं, माताओं-बहनों की अस्मत लूटी गई और घरों को फूंक दिया गया। इस नरसंहार के पीछे इसी सुहरावर्दी परिवार का हाथ था।

नेहरू का ‘सुहरावर्दी प्रेम’ और कांग्रेस का पुराना तुष्टिकरण

अब सवाल उठता है कि कांग्रेस को इस सुहरावर्दी परिवार से इतनी हमदर्दी क्यों है? आर्काइवल रिकॉर्ड्स और ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि हसन सुहरावर्दी जब इंग्लैंड में पढ़ाई कर रहा था, तब उसकी मुलाकात जवाहरलाल नेहरू से हुई थी। दोनों के बीच गहरी दोस्ती थी जो जीवनभर रही।
यही वजह थी कि जब दिसंबर 1948 में यानी देश के बँटवारे और कोलकाता नरसंहार के दो साल बाद जब ‘बंगाल के कसाई’ हुसैन शहीद सुहरावर्दी पर भारत सरकार ने इनकम टैक्स (आयकर) की देनदारी का शिकंजा कसा, तो प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू खुद उसके बचाव में उतर आए। नेहरू ने तत्कालीन वित्त मंत्री जॉन मथाई और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री डॉ. बी.सी. रॉय को व्यक्तिगत रूप से पत्र लिखे। नेहरू ने चिंता जताई कि सुहरावर्दी पर कार्रवाई करने से ‘राजनीतिक परिणाम’ खराब हो सकते हैं, इसलिए मामले को रफा-दफा किया जाए या ढील दी जाए।
यह वही हुसैन सुहरावर्दी था जो भारत में करोड़ों की संपत्ति और अपनी काली यादें छोड़कर बाद में पाकिस्तान भाग गया और वहाँ का प्रधानमंत्री बना। कांग्रेस के इसी सुहरावर्दी प्रेम के कारण दशकों तक कोलकाता के दिल में हिंदुओं के हत्यारों और स्वतंत्रता सेनानियों के गद्दारों के परिवार का नाम चमकता रहा।

हिदायतुल्लाह कनेक्शन: कार्यवाहक राष्ट्रपति और पाकिस्तान जाने वाला परिवार

कांग्रेस के शासनकाल में तुष्टिकरण की जड़ें कितनी गहरी थीं, इसका एक और उदाहरण मोहम्मद हिदायतुल्लाह (M. Hidayatullah) का देश के शीर्ष पदों पर बैठना है। हिदायतुल्लाह भारत के मुख्य न्यायाधीश और बाद में कांग्रेस सरकार के दौरान देश के कार्यवाहक राष्ट्रपति (Acting President) भी बने।
यहाँ हिदायतुल्लाह और सुहरावर्दी परिवार के तार जोड़ना महत्वपूर्ण है। हसन सुहरावर्दी की बेटी शाइस्ता सुहरावर्दी का निकाह मोहम्मद इकरामुल्लाह से हुआ था। शाइस्ता सुहरावर्दी मोरक्को में पाकिस्तान की राजदूत रही थी। उसके शौहर मोहम्मद इकरामुल्लाह पाकिस्तान के लिए लगा और मोहम्मद अली जिन्नाह का बहुत करीबी था। हिदायतुल्लाह इसी इकारामुल्लाह का सगा छोटा भाई था।
एक तरफ इकरामुल्लाह पाकिस्तान का पहला विदेश सचिव था और बाद में कनाडा, फ्रांस, पुर्तगाल और यूके में पाकिस्तान का राजदूत था और 1963 में मरा, तो दूसरी तरफ मोहम्मद हिदायतुल्लाह यहाँ भारत में न्यापालिका में सीढ़ियाँ चढ़ता रहा। आज़ादी से पहले वो सेंट्रल प्रोविंस का जज था और 1954 में वो नागपुर हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस बना, जो उस समय देश का सबसे कम उम्र का चीफ जस्टिस था।
साल 1956 में वो एमपी का चीफ जस्टिस बना और 1968 में भारत का चीफ जस्टिस। इसके बाद 1969 में वो कार्यवाहक राष्ट्रपति रहा, जब देश में इंदिरा गाँधी की सरकार थी और फिर CJI पद से रिटायर होने के बाद 1979 में देश का उप राष्ट्रपति भी बना। इस बीच 1982 में कुछ समय वो देश का कार्यवाहक राष्ट्रपति एक बार फिर से बना। तब भी केंद्र में इंदिरा गाँधी की ही सरकार थी। सोचिए सुहरावर्दी परिवार की जड़ें देश में कहाँ से कहाँ तक फैली रही और कांग्रेस कैसे उसे पालती-पोसती रही। आज के जमाने में भी सवाल पूछ लिए जाए तो शायद कांग्रेस के पास कोई ढंग का जवाब न हो।
हकीकत यह है कि हिदायतुल्लाह का परिवार भी उसी सुहरावर्दी नेटवर्क और मुस्लिम लीग की विचारधारा से गहराई से प्रभावित था। देश के विभाजन के बाद हिदायतुल्लाह के परिवार के कई करीबी लोग और रिश्तेदार भारत छोड़कर पाकिस्तान चले गए थे और वहाँ बड़े पदों पर आसीन हुए। लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस ने उन्हें भारत के सर्वोच्च संवैधानिक पदों तक पहुँचाया। यही कारण है कि आज जब सुहरावर्दी के नाम पर चोट होती है, तो कांग्रेस के पूरे इकोसिस्टम को दर्द होता है।

कौन थे गोपाल पाठा? जिन्होंने कोलकाता के हिंदुओं को कटने से बचाया

अब बात करते हैं उस महानायक की, जिनके नाम पर अब इस सड़क का नाम ‘गोपाल मुखर्जी रोड’ रखा गया है। कोलकाता के लोग उन्हें आदर और गर्व से ‘गोपाल पाठा’ (Gopal Patha) कहते हैं। ‘पाठा’ बांग्ला शब्द है जिसका अर्थ होता है बकरा। गोपाल जी का कॉलेज स्ट्रीट पर मीट का पारिवारिक व्यवसाय था, इसलिए लोग उन्हें प्यार से इस नाम से बुलाते थे।
16 अगस्त 1946 को जब हुसैन शहीद सुहरावर्दी के गुंडों ने हिंदुओं का सामूहिक संहार शुरू किया, तब हिंदू समाज नेतृत्वविहीन और असहाय था। उस समय महज 5 फीट 4 इंच के कद वाले गोपाल पाठा हिंदुओं के रक्षक बनकर सामने आए। उन्होंने नारा दिया, “अगर वो हमारा एक मारेंगे, तो हम उनके दस मारेंगे। हम कायरों की तरह नहीं मरेंगे।”
गोपाल पाठा ने स्थानीय युवाओं को एकजुट किया और ‘भारतीय जातीय वाहिनी’ (Indian National Force) नाम का एक संगठन बनाया। उन्होंने कसाई सुहरावर्दी के दंगाइयों को करारा जवाब दिया। गोपाल पाठा और उनके साथियों के इसी पराक्रम का परिणाम था कि मुस्लिम लीग का कोलकाता को पूरी तरह से पाकिस्तान में मिलाने और हिंदुओं को खदेड़ने का मंसूबा मिट्टी में मिल गया। उन्होंने अपनी जान पर खेलकर हजारों हिंदू परिवारों, माताओं और बहनों की रक्षा की।
सितंबर 1946 में महात्मा गाँधी कोलकाता आए। उन्होंने दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया और हिंदू-मुस्लिम दोनों पक्षों से शांति की अपील करते हुए अपने-अपने हथियार उनके चरणों में सरेंडर करने को कहा। मुस्लिम लीग के गुंडों ने अपने कुछ जंग लगे हथियार गाँधी जी के सामने रख दिए।
जब गाँधी जी के दूत गोपाल पाठा के पास पहुँचे और उनसे हथियार डालने को कहा, तो गोपाल पाठा ने गाँधी जी के सामने जाने से साफ मना कर दिया। उन्होंने संदेश भिजवाया, “मैं अपने हथियार गाँधी जी के चरणों में क्यों रखूँ? जब हम पर हमले हो रहे थे, हमारी महिलाओं को उठाया जा रहा था, तब गाँधी जी कहाँ थे? क्या गाँधी जी हमारी महिलाओं की सुरक्षा की गारंटी लेंगे? अगर कोई अपराधी मेरी बहन पर हाथ उठाएगा, तो मैं उसकी कलाई काट दूँगा, यह मेरी नजर में हिंसा नहीं, मेरा धर्म है। मैं हथियार नहीं डालूँगा।”
गोपाल पाठा ने अंत तक हथियार सरेंडर नहीं किए, क्योंकि वे जानते थे कि कायरता से शांति नहीं खरीदी जा सकती।

गोपाल मुखर्जी रोड हिंदुओं के सम्मान की बहाली, ये बीजेपी सरकार का साहसिक कदम

दशकों तक पश्चिम बंगाल में वामपंथियों और तृणमूल कांग्रेस (TMC) का राज रहा, जिन्होंने तुष्टिकरण की राजनीति के चलते गोपाल पाठा जैसे नायक को इतिहास की किताबों से गायब कर दिया और गद्दारों के नाम पर बनी सड़कों को सहेज कर रखा।

लेकिन पश्चिम बंगाल की वर्तमान भाजपा सरकार और मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने कोलकाता नगर निगम के माध्यम से ‘सुहरावर्दी एवेन्यू’ का नाम बदलकर ‘गोपाल मुखर्जी रोड’ करके एक ऐतिहासिक भूल को सुधारा है।

मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने इस फैसले पर ट्वीट करते हुए लिखा, “दशकों तक हमारे शहर की एक मुख्य सड़क का नाम उस व्यक्ति (या परिवार) के नाम पर रहा जिसने राजनीतिक लाभ के लिए निर्दोष नागरिकों के नरसंहार की साजिश रची और सत्ता का दुरुपयोग किया। वीर गोपाल मुखर्जी के नाम पर इस सड़क का नामकरण कर, जिन्होंने हजारों मासूमों की जान बचाई, आखिरकार इतिहास के साथ न्याय किया गया है। यह समय पश्चिम बंगाल के असली नायकों को याद करने और उन्हें सम्मान देने का है।”

नाम बदलना क्यों है हिंदुओं का वास्तविक सम्मान?

कांग्रेस आज भले ही ‘हसन’ और ‘हुसैन’ के नाम का तकनीकी खेल खेलकर हिंदुओं का मजाक उड़ाए, लेकिन सच यही है कि हसन सुहरावर्दी ने देश की बेटी बीना दास को गिरफ्तार करवाकर अंग्रेजों से वफादारी निभाई थी, और उसी के परिवार ने भारत मां के टुकड़े किए थे। ऐसे किसी भी व्यक्ति या परिवार का नाम स्वतंत्र भारत की सड़कों पर होना देश के स्वतंत्रता सेनानियों और विभाजन के शिकार हुए लाखों निर्दोष हिंदुओं का अपमान था।

भाजपा सरकार ने गोपाल पाठा के नाम पर सड़क का नाम रखकर यह साबित किया है कि अब देश अपने रक्षकों का सम्मान करेगा, न कि भक्षकों और गद्दारों का। यह फैसला केवल एक सड़क का नाम बदलना नहीं है, बल्कि यह बंगाली हिंदुओं के खोए हुए गौरव, पराक्रम और आत्मसम्मान को वापस लौटाने वाला एक क्रांतिकारी कदम है, जिसके लिए वर्तमान सरकार निश्चित रूप से बधाई की पात्र है।

‘अगर हम नहीं रहे, तो एक सेकेंड लगेगा…’: हिंदुओं को बीजेपी का साथ देने पर मुस्लिमों के हमले की ममता ने दी थी धमकी, कोलकाता में FIR दर्ज


पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ शुक्रवार (12 जून 2026) को कोलकाता में FIR दर्ज की गई। यह मामला उनके मार्च 2026 के उस भाषण से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने बंगाली हिंदुओं को चेतावनी दी थी कि अगर वे BJP को वोट देकर उन्हें सत्ता से बाहर कर देंगे, तो मुस्लिम उन्हें निशाना बना सकता है।

ममता की इस धमकी के बाद भी बीजेपी को सत्ता में लाकर योगी आदित्यनाथ की बात "बटोगे तो कटोगे" सच साबित कर दी। हिन्दुओं पर वामपंथी सरकार से कहीं ज्यादा हमले ममता के राज में हुए। जिन गुंडों के दम पर ममता उछल रही थी आज सब भीगी बिल्ली बन छुपे फिर रहे हैं, तो कहीं परेड निकाली जा रही है। 

मुसलमानों को भी ममता और इसे समर्थन देने वालों से होशियार रहने की जरुरत है। जिस तरह अपनी कुर्सी की खातिर हिन्दुओं को मुसलमानों का डर दिखाया जा रहा है मानों मुसलमान इंसान नहीं कोई गुंडा या मवाली हो।   

ममता बनर्जी ने यह बयान स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के विरोध में आयोजित एक प्रदर्शन रैली के दौरान दिया था। रिपोर्ट के अनुसार, ममता बनर्जी ने कहा था, “हम (TMC) हैं इसलिए आप (हिंदू) सब अच्छे से हैं। जिस दिन हम नहीं रहेंगे, एक सेकंड लगेगा।”

इसके बाद उन्होंने कहा, “अगर एक खास समुदाय (मुस्लिम) एकजुट होकर आपको घेर ले, तो एक सेकंड लगेगा, वे आपको पूरी तरह खत्म कर देंगे।” 20 मई 2026 को कोलकाता निवासी तुषार कांती दास ने दक्षिण कोलकाता के नेताजी नगर पुलिस स्टेशन में ममता बनर्जी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी।

शिकायतकर्ता का आरोप था कि ममता बनर्जी का यह बयान उस समय चुनावी माहौल वाले राज्य में डर, गलतफहमी और तनाव पैदा कर सकता था। इसी शिकायत के आधार पर कोलकाता पुलिस ने शुक्रवार (12 जून 2026) को FIR दर्ज की।

ममता बनर्जी पर BNS की धारा 351(2) (आपराधिक धमकी), धारा 196 (धर्म, जाति, भाषा या अन्य आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी या नफरत फैलाने) समेत अन्य संबंधित धाराओं में मामला दर्ज किया गया है।

कोलकाता : सुरेंद्रनाथ कॉलेज में TMC छात्र परिषद के ऑफिस से दीमक लगी भारी नकदी बरामद, नोटों को कुतर चुके थे दीमक: ट्रॉली में भरे मिले बंडल के बंडल

                                                                                                                           साभार: ABP न्यूज
पश्चिम बंगाल में नकदी बरामदगी से जुड़े मामलों की सूची में अब कोलकाता के सुरेंद्रनाथ कॉलेज का नाम भी जुड़ गया है। कॉलेज परिसर में स्थित तृणमूल कांग्रेस छात्र परिषद (TMCP) के यूनियन रूम से लाखों या संभवतः करोड़ों रुपए तक की नकदी बरामद होने का दावा किया जा रहा है।

नोटों का बड़ा हिस्सा दीमकों और कीड़ों द्वारा पूरी तरह नष्ट किया जा चुका है। मामला उस समय सामने आया जब लंबे समय से बंद पड़े यूनियन रूम को प्रशासनिक निर्देशों के तहत खोला गया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, छात्रसंघ चुनाव न होने के कारण हाईकोर्ट के निर्देश पर कॉलेज के यूनियन रूम को वर्षों पहले बंद कर दिया गया था।

हाल ही में सफाई और रखरखाव कार्य के दौरान अधिकारियों ने कमरे के भीतर मौजूद एक अलमारी को खुलवाया। अलमारी में TMC के बैनर और पोस्टर के साथ दो ट्रॉली बैग भी रखे मिले। जब बैग खोले गए तो उनमें 500 और 100 रुपए के नोटों के बंडल भरे हुए थे, लंबे समय तक आलमारी में पड़े रहने के कारण अधिकांश नोट दीमकों की भेंट चढ़ चुके थे।

BJP विधायक सजल घोष ने TMC पर निशाना साधते हुए कहा, “इस जीवन में मुझे और क्या देखना चाहिए? हमने पार्थ बाबू के घर में पैसों के पहाड़ देखे। तृणमूल नेता के जूट के खेत में पैसा। आज मैंने देखा कि तृणमूल के छात्र नेता… साठ साल से अधिक उम्र के होने के बावजूद, यूनियन रूम की अलमारी में लाखों रुपए रखे हैं और वह पैसा भी बर्बाद कर दिया गया है।

बंगाल : ‘मुसलमानो, गायों की कुर्बानी मत देना’ : भाजपा आने के बाद नखोदा मस्जिद के इमाम ने बकरीद से पहले की अपील, कहा- पहले अलग थी बात, अब बदल गई है सरकार

                          बकरीद से पहले मौलाना की अपील (फोटो साभार- डेली हिंदी, नवभारत टाइम्स और किसान तक)
बंगाल में पशु वध अधिनियम को लेकर हुई सख्ती के बाद नखोदा मस्जिद के इमाम मौलाना मोहम्मद शफीक कासमी ने मुसलमानों से अपील की है कि बकरीद पर गायों की कुर्बानी न दी जाए।

इमाम की इस अपील साफ शब्दों में बता रही है कि बंगाल में ममता के राज में किस तरह गौ हत्या करना आम बात थी। लेकिन सरकार बदलते ही अब तेवर बदलने शुरू हो गए हैं। इस अपील से यह भी जाहिर होता है कि किस तरह ममता के राज में सनातन का खुलेआम क़त्ल हो रहा है। अब देखना यह है कि खुले में किसी भैसे, बैल या ऊंट की कुर्बानी दे जाएगी या नहीं।   

उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार ने जो पशु वध को लेकर नए नियम जारी किए हैं उसके बाद गाय की कुर्बानी देना व्यावहारिक रूप से मुश्किल हो गया है। ऐसे में मुस्लिम समुदाय के लोग गाय की नहीं बल्कि बकरियों की कुर्बानी को प्राथमिकता दें।

मौलाना कासमी ने मुस्लिम समुदाय के लोगों को समझाया कि पहले की सरकार की बात अलग थी इस सरकार की बात अलग है। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम 1950 से लागू है, लेकिन मौजूदा सरकार इसे पहले की तुलना में अधिक सख्ती से लागू कर रही है। उन्होंने कहा कि पिछली सरकारों ने मुसलमानों को छूट तो दी, लेकिन स्थायी समाधान नहीं निकाला।

कासमी ने सरकार के लिए भी अपनी राय दी। उन्होंने कहा कि सरकार यदि पशु वध के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा उपलब्ध नहीं करा सकती, तो उसे गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित कर देशभर में गोवध और गोमांस निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध लगा देना चाहिए। उन्होंने माँग की कि हर इलाके में आधुनिक बूचड़खाने बनाए जाएँ और बाजारों में पशु चिकित्सकों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।

पश्चिम बंगाल सरकार ने हाल ही में पशु वध को लेकर नई अधिसूचना जारी की है। इसके तहत बिना सरकारी स्वास्थ्य प्रमाण पत्र के किसी भी पशु के वध पर रोक लगा दी गई है। अधिकारियों को प्रमाण पत्र जारी करने से पहले पशुओं की उम्र और उनकी शारीरिक स्थिति की जांच करनी होगी।

बंगाल भी पहुंच गया योगी बुलडोज़र; कोलकाता में BJP कार्यकर्ता की पीट-पीटकर हत्या, भीड़ ने TMC दफ्तर पर चलाया बुलडोजर: संदेशखाली में केंद्रीय बलों पर फायरिंग

                              कोलकाता में अवैध टीएमसी दफ्तर पर बुलडोजर एक्शन (साभार : Aajtak)
कोलकाता के न्यू मार्केट में मंगलवार (5 मई 2026) रात लोगों की भीड़ ने बुलडोजर चलाकर TMC का यूनियन ऑफिस ढहा दिया। स्थानीय लोगों का दावा है कि यह दफ्तर अवैध कब्जे की जमीन पर बना था। घटना के बाद इलाके में भारी पुलिस बल तैनात है। न्यू मार्केट इलाके में TMC का ऑफिस जमींदोज कर दिया गया। 

स्थानीय लोगों के अनुसार यह दफ्तर एक दुकानदार से जबरन छीनी गई जमीन पर बना था। लंबे समय से लोग इस अवैध कब्जे से नाराज थे। चुनावी नतीजों के बाद उत्साहित लोगों की भीड़ ने बुलडोजर बुलाकर इसे हटा दिया। मौके पर मौजूद लोग इसे जनता का इंसाफ बता रहे हैं।

बंगाल में हो रहे उपद्रव को मुख्य चुनाव आयोग ने बंगाल गृह सचिव को उपद्रवियों से सख्ती से निपटने के आदेश दिए हैं। 

TMC का हंगामा और बीजेपी कार्यकर्ता की मौत

अचानक हुए इस एक्शन से न्यू मार्केट में भगदड़ मच गई। डर के मारे दुकानदारों ने अपने शटर गिरा दिए। ऐतिहासिक हॉग मार्केट के पास व्यापारियों में काफी खौफ देखा गया। हालात बिगड़ते देख पुलिस की कई टीमें मौके पर पहुँचीं। फिलहाल पूरे इलाके में सुरक्षा बढ़ा दी गई है और गश्त जारी है।

राज्य के अन्य हिस्सों में TMC समर्थकों पर हिंसा के आरोप लगे हैं। न्यू टाउन में BJP कार्यकर्ता मधु मंडल की कथित तौर पर TMC समर्थकों ने पिटाई कर दी, जिससे उनकी मौत हो गई। कई जगहों पर BJP कार्यकर्ताओं के घरों पर भी हमले हुए हैं। हावड़ा में भी एक कार्यकर्ता की मौत की खबर है, जिसकी पत्नी ने TMC समर्थकों पर आरोप लगाए हैं।

प्रशासन ने माँगी रिपोर्ट

TMC नेताओं ने इस बुलडोजर एक्शन को गलत बताया है। वहीं, राज्य के अलग-अलग हिस्सों में हुई तोड़फोड़ और आगजनी पर चुनाव आयोग सख्त है। आयोग ने पुलिस से पूरी रिपोर्ट तलब की है। पुलिस ने साफ किया है कि कानून हाथ में लेने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा।

TMC का विरोध पड़ा महँगा? पार्टी की गुंडागर्दी पर रील बनाने वाले इन्फ्लुएंसर की गिरफ्तारी पर विवाद

                                     शमिक अधिकारी (साभार: Instagram/yournonsane)
कोलकाता पुलिस ने 25 साल के सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर शमिक अधिकारी को यौन उत्पीड़न के आरोप में गिरफ्तार किया है। शमिक को ऑनलाइन ‘नॉनसेन’ के नाम से जाना जाता है। उन्हें गुरुवार (5 फरवरी 2026) को दमदम से पकड़ा गया। पहले उन्हें गलत तरीके से कैद करने, हमला करने और महिला की इज्जत से खिलवाड़ करने के आरोप में पकड़ा किया गया था, लेकिन बाद में 22 साल की पीड़िता के बयान के आधार पर पुलिस ने रेप का केस भी जोड़ दिया।

शमिक को शुक्रवार (6 फरवरी 2026) को कोर्ट में पेश किया गया और अब उन्हें 16 फरवरी 2026 तक पुलिस कस्टडी में रखा गया है। पुलिस के मुताबिक, महिला ने शिकायत की थी कि शमिक ने उसे 2 फरवरी 2026 की रात करीब साढ़े नौ बजे से अगले दिन शाम 5 बजे तक अपने बेहाला वाले घर में जबरन रोका रखा।

इस दौरान महिला का आरोप है कि उसे मारा-पीटा गया, धमकाया गया। उसने कहा कि शमिक ने उसे गलत तरीके से छुआ, कपड़े खींचे और फिर जबरन यौन हमला किया।

पुलिस ने कोर्ट को बताया कि पीड़िता का मेडिको-लीगल टेस्ट एमआर बांगुर अस्पताल में हुआ। एक महिला पुलिस अधिकारी ने उसका बयान दर्ज किया और इसके बाद भारतीय न्याय संहिता की रेप वाली धारा FIR में जोड़ी गई। पीड़िता के शरीर पर चोट के निशान मिले और वह काफी आघात में थी, इसलिए शिकायत करने में देरी हुई।

पुलिस ने आगे कहा कि शमिक ने पीड़िता को अश्लील फोटो भेजकर धमकाया था। जाँचकर्ताओं के मुताबिक टावर लोकेशन से पता चला कि शिकायत में बताए समय पर दोनों आरोपित और पीड़िता अपराध वाली जगह पर मौजूद थे।

शमिक की तरफ से कहा गया कि दोनों पुराने दोस्त हैं और लंबे समय से जानते हैं। उस रात गलतफहमी हुई थी, लेकिन कोई जबरदस्ती नहीं की गई। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर जाँच में कुछ बचा ही नहीं है तो पुलिस कस्टडी की क्या जरूरत है।

वायरल रील जिसने छेड़ दी राजनीतिक बहस

शमिक कोई आम इंफ्लुएंसर नहीं हैं। इंस्टाग्राम पर उनके करीब 4.20 लाख और फेसबुक पर 4 लाख से ज्यादा फॉलोअर्स हैं। लेकिन राजनीतिक सुर्खियों में तब आए जब उन्होंने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट ‘@yournonsane’ पर 21 जनवरी को एक रील पोस्ट की। पश्चिम बंगाल में आने वाले चुनाव से सिर्फ दो महीने पहले की बात है।

यह रील वायरल हो गई, 30 लाख से ज्यादा व्यूज और 3.5 लाख से ज्यादा लाइक्स आए। इसमें शमिक ने टीएमसी सरकार पर तीखा हमला किया था। वीडियो में वे खुद को आम वोटर दिखाते हैं जो वोट डालने जा रहा है। वहाँ एक लोकल टीएमसी गुंडा वोटरों को सिर्फ सत्ताधारी पार्टी को वोट देने का दबाव डालता है और नहीं मानने पर धमकी देता है।

वीडियो में आगे राज्य की स्थिति दिखाने वाले फ्लैशबैक थे। इसमें 26 हजार सरकारी टीचर्स की नौकरी जाने और उसका भावनात्मक असर दिखाया गया। रात में अकेली चलती महिला को कुछ लोग पीछे चल रहे हैं।

रील में आरजी कर रेप-मर्डर केस का भी जिक्र था। उस केस में कोलकाता कोर्ट ने दोषी संजय रॉय को उम्रकैद की सजा सुनाई और राज्य सरकार को पीड़िता के माता-पिता को 17 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया, हालाँकि पीड़िता के माता-पिता ने कहा कि उन्हें न्याय चाहिए, मुआवजा नहीं।

वीडियो ने सीधे सत्ताधारी सरकार को निशाना बनाया और चुनाव से ठीक पहले आया, इसलिए कई लोगों ने इसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील माना। वायरल होने के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ आने लगीं।

TMC ने BJP से लिंक का किया दावा

रील वायरल होने के बाद कई टीएमसी लीडर्स और सपोर्टर्स ने दावा किया कि शमिक का बीजेपी से लिंक है। उनका कहना था कि वह सिर्फ कंटेंट क्रिएटर नहीं, राजनीतिक रूप से प्रेरित हैं।

TMC प्रवक्ता रिजू दत्ता ने सोशल मीडिया पर कड़ा बयान दिया और शमिक को ‘बीजेपी यूट्यूबर’ कहा। पोस्ट में उन्होंने कहा कि वही शख्स जो पश्चिम बंगाल सरकार पर महिलाओं की सुरक्षा में नाकाम होने का आरोप लगा रहा था, अब खुद महिला की इज्जत से खिलवाड़ और मारपीट के केस में फंसा है।

दत्ता ने केस में दर्ज धाराओं का जिक्र किया और बताया कि पीड़िता ने करीब 12 घंटे कैद रखने, मारपीट और धमकी देने का आरोप लगाया है। एक विवादास्पद टिप्पणी में उन्होंने शमिक को बीजेपी आईटी सेल चीफ अमित मालवीय से जोड़ा और कहा कि महिलाओं का गलत इस्तेमाल करने वाले बीजेपी में शामिल हो जाते हैं।

अब टीएमसी की बात है कि यह सीधा-सादा क्रिमिनल मामला है और विपक्ष अनावश्यक रूप से राजनीतिक रंग दे रहा है।

गिरफ्तारी पर उठे सवाल, झूठे मामले में फँसाने का शक

दूसरी तरफ बीजेपी सपोर्टर्स और कई इंफ्लुएंसर्स ने गिरफ्तारी के समय पर सवाल उठाए हैं। कई लोगों ने इशारा किया कि यह राजनीतिक बदले की कार्रवाई हो सकती है, खासकर क्योंकि शमिक की रील ने राज्य सरकार की कड़ी आलोचना की थी।

कुछ सोशल मीडिया यूजर्स तो यहाँ तक कह रहे हैं कि यौन उत्पीड़न की शिकायत झूठी बनाई गई है ताकि उन्हें चुप कराया जाए। उनका तर्क है कि वायरल वीडियो के ठीक बाद और चुनाव से पहले गिरफ्तारी हुई, जिससे शक पैदा होता है।

बीजेपी आईटी सेल चीफ अमित मालवीय ने ममता बनर्जी की सरकार पर कड़ा हमला बोला। सोशल मीडिया पोस्ट में उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल ‘तानाशाही शासन’ बन गया है जहाँ आलोचकों को झूठे और दुर्भावनापूर्ण FIR से निशाना बनाया जाता है।

मालवीय ने लिखा, “यह टीएमसी का शासन मॉडल है: अभिव्यक्ति की आजादी को दबाओ, आलोचकों को डराओ, पुलिस का इस्तेमाल करो और सत्ता में बने रहने के लिए प्रतिष्ठा बर्बाद करो। लेकिन बंगाल देख रहा है। और बंगाल चुप नहीं रहेगा। बीजेपी हर उस शख्स के साथ खड़ी है जो ममता बनर्जी के शासन का शिकार बना है।”

उन्होंने आगे कहा, “पश्चिम बंगाल के लोगों के साथ मिलकर हम डर को हराएँगे, सत्ता के दुरुपयोग को बेनकाब करेंगे और लोकतंत्र बहाल करेंगे। यह न्याय नहीं है। यह राजनीतिक उत्पीड़न है। और इसका अंत होगा।”

साथी इंफ्लुएंसर्स ने किया शमिक का समर्थन

शमिक को कुछ साथी कंटेंट क्रिएटर्स और सोशल मीडिया यूजर्स का भी समर्थन मिला है। एक एक्स यूजर ने सवाल उठाया कि पश्चिम बंगाल में सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर बोलने वाले इंफ्लुएंसर्स के खिलाफ क्यों केस हो रहे हैं। उन्होंने पूछा कि ऐसे मामलों में सार्वजनिक आक्रोश क्यों नहीं होता।

समर्थकों का कहना है कि शासन और महिलाओं की सुरक्षा पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है और इसके लिए कानूनी परेशानी नहीं होनी चाहिए। हालाँकि दूसरे लोग कहते हैं कि क्रिमिनल आरोपों को गंभीरता से लेना चाहिए और राजनीतिक बहस से अलग जाँच होनी चाहिए।

फिलहाल शमिक अधिकारी ने कोई सार्वजनिक बयान नहीं दिया है। आने वाले दिनों में कोर्ट की कार्यवाही और जाँच के नतीजे इस मुद्दे में बड़ी भूमिका निभाएँगे।

केस एक अपराध की शिकायत से शुरू हुआ था, लेकिन अब यह राजनीतिक बहस बन गया है जो आरोपी पर लगे आरोपों के साथ-साथ अभिव्यक्ति की आजादी, राजनीतिक दुश्मनी और चुनाव के समय सोशल मीडिया की भूमिका पर सवाल उठा रहा है।

आखिर किस गोली या गोले के डर से ममता बनर्जी ने UTurn लेकर वक़्फ़ कानून लागू किया?

                                                                         साभार: सोशल मीडिया       
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सरकार ने आखिर केंद्र का नया वक्फ कानून राज्य में लागू कर दिया है। केंद्र के नए वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 का ममता बनर्जी ने महीनों तक विरोध किया। उन्होंने यहां तक कहा था कि गोली मार दो लेकिन मैं पश्चिम बंगाल में वक्फ कानून लागू नहीं होने दूंगी। फिर अब अचानक उन्होंने गुपचुप तरीके से इस कानून को लागू कर दिया। 82,000 वक्फ संपत्तियों की जानकारी 5 दिसंबर की समय सीमा तक केंद्रीय पोर्टल पर अपलोड करने के निर्देश जारी किए हैं।

SIR करने वाले BLOs पर कम समय में काम पूरा करने का दबाव का शोर मचाने वाली बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इतने कम में यानि 5 दिसम्बर तक 82,000 वक्फ संपत्तियों को केंद्रीय पोर्टल पर अपलोड करने के निर्देश जारी करने से क्या अधिकारियों और कर्मचारियों पर अधिक काम का बोझ नहीं पड़ेगा? आखिर वह कौनसी गोली या गोले के डर ने ममता को U Turn लेने के लिए मजबूर किया?     

पश्चिम बंगाल में 8 महीने विरोध के बाद ममता सरकार ने नए वक्फ संशोधन कानून को लागू किया और 8063 वक्फ संपत्तियों की जानकारी 6 दिसंबर तक UMID पोर्टल पर अपलोड करने के निर्देश दिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कानून की संवैधानिकता पर रोक नहीं लगाई, केवल तीन बदलावों पर स्टे लगाया था।
केंद्र सरकार ने वक्फ बोर्डों और मुतवल्लियों की जवाबदेही बढ़ाई, इसलिए ममता सरकार कानूनी विवाद से बचने के लिए कानून लागू करने को राजी हुई।

वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 इस साल अप्रैल में संसद के दोनों सदनों ने पारित किया था। गुरुवार शाम को सभी जिलाधिकारियों को लिखे एक पत्र में पश्चिम बंगाल अल्पसंख्यक विकास विभाग के सचिव पीबी सलीम ने राज्य की वक्फ संपत्तियों की जिलेवार जानकारी निर्धारित समय सीमा तक केंद्रीय पोर्टल, umeedminority.gov.in पर अपलोड करने के निर्देश जारी किए। ममता बनर्जी ने किया था खुलकर विरोध किया था।

राजनीतिक रूप से क्यों अहम?

इस फैसले को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस कानून का खुलेआम विरोध किया था। उन्होंने सार्वजनिक रूप से घोषणा की थी कि वह राज्य में नए अधिनियम को लागू नहीं होने देंगी। इसके अलावा, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार द्वारा विधेयक पेश किए जाने के बाद राज्य में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए थे।

ममता बनर्जी ने दी थी खुलेआम चुनौती

कानून पारित होने के कुछ दिनों बाद 9 अप्रैल को जैन समुदाय के एक कार्यक्रम में बोलते हुए मुख्यमंत्री ने कहा था कि मैं बंगाल में वक्फ संशोधन अधिनियम को लागू नहीं होने दूंगी। मैं उन्हें फूट डालो और राज करो की इजाज़त नहीं दूंगी। यहां 33 प्रतिशत मुसलमान हैं। वे सदियों से यहां रह रहे हैं। उनकी रक्षा करना मेरा कर्तव्य है। उन्होंने कहा था कि मुझे गोली मार दो, फिर भी बंगाल में वक्फ कानून लागू नहीं होने दूंगी।

नया वक्फ कानून क्या?

संशोधित कानून के अनुसार वक्फ बोर्ड और न्यायाधिकरणों में गैर-मुस्लिम सदस्य होंगे। अगर किसी संपत्ति पर वक्फ होने का दावा किया जाता है, तो इस संबंध में अंतिम निर्णय सरकार लेगी। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस सरकार इस कानून के खिलाफ अदालत भी गई, लेकिन उसे अनुकूल फैसला नहीं मिला। संशोधित अधिनियम की धारा 3बी में कहा गया है कि देश भर में सभी पंजीकृत वक्फ संपत्तियों की जानकारी छह महीने (5 दिसंबर, 2025) के भीतर केंद्रीय पोर्टल पर अपलोड की जानी चाहिए। 

अहमदाबाद : इस्लाम के नाम पर लूट रहा मुसलमान; मस्जिद से गाजा के नाम पर किया जमकर चंदा, सीरियाई नागरिक सब हजम कर गए; अली मेघत अल-अजहर को एलिसब्रिज इलाके के एक होटल से गिरफ्तार

     गुजरात में गाजा राहत कोष घोटाले में एक सीरियाई नागरिक गिरफ्तार, पुलिस ने नकदी बरामद की(साभार - डैल-ई)
मुसलमान मजहब के इतना अंधा है कि इस्लाम के नाम पर पीड़ितों के लिए तिजोरियां खोल देता है। यूँ कहता है गरीब हैं। कट्टरपंथी अपनी तिजोरियां भरने के लिए मुसलमानों को पागल बना रहे हैं। याद है, गुजरात 2002 दंगों में क्या हुआ था, मोदी ने मुसलमानों को बर्बाद कर दिया, मरवा दिया उनकी मदद करने के लिए तीस्ता सीतलवाड़ ने करोड़ों रूपए जमा कर लाखों का पर्स ख़रीदा और ऐश कर रही है। इमदाद करने वाले किसी भी मुसलमान उससे और उसके आकाओं से नहीं पूछा कि पीड़ितों तक इमदाद क्यों नहीं पहुंचाई? आखिर मजहब के नाम पर मुसलमान कब तक अपने आपको लुटवाता रहेगा?  
   
गुजरात पुलिस ने एक बड़े फर्जीवाड़े का पर्दाफाश किया है। इसमें चार सीरियाई नागरिकों पर आरोप है कि उन्होंने गाजा पीड़ितों के नाम पर चंदा इकट्ठा किया और उस पैसे को अपनी आलीशान जिंदगी पर खर्च किया। पुलिस ने इनमें से दमिश्क के रहने वाले एक आरोपित अली मेघत अल-अजहर को अहमदाबाद के एलिसब्रिज इलाके के एक होटल से गिरफ्तार किया है। उसके पास से 3,600 अमेरिकी डॉलर और 25,000 रुपए नकद बरामद हुए हैं।

बाकी तीन आरोपित जकारिया हैथम अलजार, अहमद अलहबाश और यूसुफ अल-जहर फिलहाल फरार हैं। ये सभी उसी होटल में ठहरे हुए थे। पुलिस ने उनके खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी कर दिए हैं ताकि वे भारत से भाग न सकें। संयुक्त पुलिस आयुक्त (क्राइम ब्राँच) शरद सिंघल ने बताया कि जाँच जारी है और बाकी आरोपितों की तलाश की जा रही है।

कोलकाता के रास्ते प्रवेश और संदिग्ध गतिविधियाँ

जाँच में सामने आया है कि यह चारों टूरिस्ट वीजा पर भारत आए थे। वे 22 जुलाई को कोलकाता उतरे और 2 अगस्त को अहमदाबाद पहुँच गए। यहाँ आरोपित ने मस्जिदों में जाकर गाजा में भूखे परिवारों के वीडियो दिखाकर चंदा इकट्ठा किया।

पुलिस को अब तक ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है कि यह पैसा गाजा भेजा गया हो। पीटीआई से बातचीत में शरद सिंघल ने कहा कि यह जाँच का विषय है कि वे पहले कोलकाता क्यों गए और फिर अहमदाबाद आए।

यह भी पता लगाया जा रहा है कि वे वास्तव में चंदा इकट्ठा कर रहे थे या किसी और मकसद से भारत आए थे। उन्होंने बताया कि अमेरिकी डॉलर की बरामदगी और कुछ डिजिटल लेन-देन भी शक पैदा करते हैं। पुलिस अब उनकी गतिविधियों और संपर्कों को समझने के लिए सीसीटीवी फुटेज खंगाल रही है। शुरुआती जाँच में यह भी सामने आया है कि आरोपित कुछ संदिग्ध लोगों के संपर्क में थे।

आतंकवाद विरोधी एजेंसियाँ ​​जाँच में शामिल

गुजरात एंटी-टेररिज़्म स्क्वॉड (ATS) और राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने भी इस मामले की जाँच शुरू कर दी है, ताकि आरोपित के असली इरादों का पता लगाया जा सके और यह जाना जा सके कि इकट्ठा किया गया पैसा कहाँ भेजा गया।

पुलिस सीसीटीवी फुटेज खंगाल रही है ताकि उनके नेटवर्क और संपर्कों का पता चल सके। पूछताछ में गिरफ्तार आरोपित ने माना है कि यह पैसा उन्होंने अपनी शानो-शौकत वाली जिंदगी पर खर्च किया। पुलिस के मुताबिक, दान इकट्ठा कर उन्होंने अपने वीजा नियमों का उल्लंघन किया है। सरकार ने अब उन्हें ब्लैकलिस्ट और डिपोर्ट करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

गाजा में इजराइल-हमास युद्ध

आतंकवादी संगठन हमास ने 7 अक्टूबर 2023 को इजरायल पर हमला किया, जिसमें लगभग 1,300 इजरायली और विदेशी नागरिक मारे गए और सैकड़ों लोग घायल हुए। कई इजरायली और विदेशी नागरिकों को हमास बंधक बनाकर ग़ाज़ा ले आया था।  

इसके बाद इजराइल ने हमास को खत्म करने के लिए बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान शुरू किया। इस दौरान गाजा में हजारों लोगों की मौत हुई है। कहा जाता है कि हमास ने कई बार स्थानीय फिलिस्तीनियों को बाहर निकलने से रोका और दुनिया भर से भेजी गई खाद्य सामग्री और दवाओं जैसी मानवीय मदद को भी बाधित किया। इससे हालात और बिगड़ गए।

विशेषज्ञों के अनुसार, हमास का मकसद यह दिखाना है कि गाजा में अकाल और संकट के लिए इजरायल जिम्मेदार है। अगर हमास बंधकों को रिहा कर देता तो युद्ध खत्म हो सकता था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, और यही वजह है कि इजरायल-हमास युद्ध लगभग दो साल से जारी है।

पश्चिम बंगाल : बीजेपी शासित राज्य में कोई अप्रिय घटना होने पर चील-कौओं की चिल्लाने वाला मीडिया और विपक्ष खामोश क्यों? नहीं रुक रही दरिंदगी, कोलकाता में डॉक्टर और वकील के बाद फिर महिला की लूटी आबरू, ममता बनर्जी मौन

बीजेपी शासित किसी भी राज्य में कोई भी अप्रिय घटना होने पर मीडिया से लेकर सारा विपक्ष चील-कौओं की चिल्लाता रहता है, लेकिन बंगाल में हो रहे महिला अत्याचारों पर मातम क्यों पसरा? क्या सारी नैतिकता सिर्फ बीजेपी को ही सिखानी आती है गैर-बीजेपी राज्यों को नहीं, क्यों? अब इसे दोगलापन, नौटंकीबाज़ी और      
पश्चिम बंगाल में संदेशखाली से राजधानी कोलकाता तक महिलाओं का लगातार योन शोषण होने के बावजूद ममता बनर्जी सरकार चुप्पी साधे बैठी है। आरजी कर मेडिकल कॉलेज और लॉ कालेज में बर्बर रेप-मर्डर की दर्दनाक यादें अभी धूमिल भी नहीं हुईं है कि कोलकाता में महिला से दरिंदगी के फिर एक मामले ने राजधानी को शर्मसार कर दिया है। तृणमूल सरकार के महिलाओं के शोषण के प्रति हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने का ही दुष्परिणाम है कि इस बार तो दुष्कर्म होने के एक महीने तक पुलिस भी सोती रही और दुष्कर्मी खुलेआम छुट्टे घूमता रहा। संदेशखाली यौन शोषण से लेकर कोलकाता के रेप के दोनों मामलों में तृणमूल कांग्रेस के नेताओं की संलिप्तता सामने आई थी। बेशर्मी की हदें पार करते हुए सरकार दुष्कर्म जैसे घिनौने मामलों में भी अपने नेताओं, कार्यकर्ताओं को बचाने की कोशिश करती रही। कोलकाता में हुए रेप के इस मामले में अब पुलिस जांच कर रही है कि इसमें भी तो टीएमसी कनेक्शन नहीं है। पीड़िता पहले इसलिए डरी-छुपी रही, क्योंकि दुष्कर्मी ने उसका अश्लील वीडियो बना लिया था और उसे वायरल करने की धमकियां दे रहा था। कोलकाता में लगातार रेप की घटनाओं के बाद यह भी सवाल उठ रहे हैं कि राहुल-प्रियंका को ऐसे भयावह मामलों के बाद भी कोलकाता जाने की फुर्सत क्यों नहीं मिल रही है?

इतनी दरिंदगी के बाद राहुल-प्रियंका को कोलकाता आने से कौन रोक रहा है
पश्चिम बंगाल की राजधानी में मेडिकल कॉलेज की ट्रेनी डॉक्टर, लॉ कालेज के छात्रा और अब विवाहिता के साथ हुई रेप और हत्या की घटना के बाद देशभर में गुस्से का माहौल है। महिला मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के रहते बंगाल में महिलाओं के साथ हो रही घटनाओं से देश दहल रहा है। ऐसी घिनौनी घटनाओं को लेकर लोग अपना आक्रोश जाहिर कर रहे हैं, लेकिन आपको हैरानी होगी कि कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी मामले पर अब तक चुप्पी साधे हुए हैं। ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ का नारा देने वाली प्रियंका गांधी वाड्रा भी इस पर कुछ नहीं बोल रही हैं। लोग पूछ रहे हैं कि हाथरस कांड पर ये कहने वाले कि ‘दुनिया की कोई भी ताकत मुझे हाथरस के इस दुखी परिवार से मिलकर उनका दर्द बांटने से नहीं रोक सकती’ आखिर इंडी गठबंधन के शासन वाले ममता बनर्जी के बंगाल जाने से उन्हें कौन रोक रहा है? इसे आप दोगलापन नहीं तो क्या कहेंगे कि बीजेपी शासित राज्य में कुछ हो तो दौड़ पर चले जाने वाले कांग्रेस सांसद राहुल गांधी, प्रियंका वाड्रा आखिर बंगाल की घटना पर एक शब्द तक बोल भी नहीं पा रहे हैं।

रेप की घटनाओं से पश्चिम बंगाल लॉ एंड ऑर्डर पर सवाल खड़े हो रहे

ममता बनर्जी के राज में आरजी कर मेडिकल कॉलेज में ट्रेनी महिला डॉक्टर के साथ रेप और मर्डर की घटना हुई थी। इस नृशंस घटना के देशभर में सुर्खियां बनने के बाद भी ममता बनर्जी सरकार ने कोई सबक नहीं लिया। इसके बाद कोलकाता के लॉ कॉलेज में गैंगरेप की घटना हो गई, जिसमें मुख्य आरोपी तृणमूल कांग्रेस से ही जुड़ा है। अब फिर कोलकाता में विवाहित महिला के साथ दरिंदगी होने की घटना को लेकर राज्य में लॉ एंड ऑर्डर पर सवाल खड़े हो रहे हैं। इस बार मामला कोलकाता के पार्क स्ट्रीट पुलिस स्टेशन का है। जहां महिला ने लगभग एक महीने पहले बलात्कार होने की शिकायत दर्ज कराई थी। पहले तो पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही और मामले को रफा-दफा करना चाहती थी, लेकिन महिला के थाने पहुंचकर विरोध दर्ज करने के बाद आखिरकार पुलिस को रिपोर्ट दर्ज कर जांच के लिए मजबूर होना पड़ा। पश्चिम बंगाल पुलिस की ऐसी लापरवाह कार्यशैली कई सवाल खड़े करती है।

 कोलकाता के पार्क स्ट्रीट थाने की पुलिस एक माह बाद जागी

अब दुष्कर्म का नया मामला कोलकाता के पार्क स्ट्रीट पुलिस स्टेशन का है। जहां महिला ने लगभग एक महीने पहले बलात्कार होने की शिकायत दर्ज कराई थी। पहले तो पुलिस काफी समय तक मामले को रफा-दफा करने में लगी रही, लेकिन जब दबाव पड़ा तो उसे एक्शन लेने को मजबूर होना पड़ा। एक माह पहले की उसी शिकायत के आधार पर पार्क स्ट्रीट पुलिस स्टेशन के अधिकारियों ने आरोपी को गिरफ्तार किया है। पुलिस जांच कर रही है कि पहले के दुष्कर्म मामलों को तरह आरोपी का कनेक्शन तृणमूल कांग्रेस से तो नहीं है। राजधानी में लगातार दरिंदगी की वारदातें होने से महिलाओं में खौफ और लोगों में आक्रोश व्याप्त है।
बलात्कार का एक वीडियो बनाकर कर रहा महिला को ब्लैकमेल
इस मामले में संबंधित पुलिस अधिकारी ने पीटीआई को बताया कि आरोपी ने महिला के सामने खुद को एक सैन्यकर्मी बताया था। और फिर उसने महिला को जेल में बंद उसके पति की रिहाई के लिए कानूनी मदद दिलाने का वादा किया था। आरोपी ने बलात्कार का एक वीडियो भी बना लिया था, जिसे दिखाकर वो महिला को ब्लैकमेल कर रहा था। उसने महिला को धमकी दी कि अगर उसने पुलिस से संपर्क किया तो वीडियो को वायरल कर देगा। महिला ने करीब एक माह पहले कोलकाता के पार्क स्ट्रीट थाने में लिखित शिकायत दर्ज कराई थी।
विवाहिता से कई बार दुष्कर्म करके दरिंदे ने पैसे भी ऐंठे
पीड़ित महिला ने आरोप लगाया कि जेल में बंद उसके पति को छुड़वाने के नाम पर खुद को सैन्यकर्मी बताने वाले दरिंदे ने उसके साथ अनेक बार दुष्कर्म किया। साथ ही पैसे भी ऐंठ लिए। शिकायत के बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू की और आरोपी सैन्यकर्मी को गिरफ्तार कर लिया। उसका आरोप है कि पति को जमानत दिलाने के नाम पर आरोपी कई बार उसे अलग-अलग जगहों पर भी ले गया और उसके साथ दुष्कर्म किया। पुलिस आरोपी से पूछताछ कर रही है। पता चला है कि वह किसी और राज्य में नौकरी पर है, लेकिन हाल वक्त कोलकाता में रह रहा है।

फिदायीन हमलावर भेजकर कोलकाता पर करो कब्जा : बांग्लादेशी मौलाना अब्दुल कुद्दूस फारूकी ने उगला जहर, कहा, ‘मुझे पता है वे (हिंदू) खून देखकर काँप जाते हैं’


बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार हटने के बाद कट्टरपंथी के हौसले बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। ऐसी ही एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है, जिसमें जहर उगलने वाला मौलाना अब्दुल कुद्दूस फारूकी खुलेआम कोलकाता पर कब्जा करने की बात कर रहा है। इसके अलावा हिंदुओं को लेकर भी आपत्तिजनक टिप्पणी की।

फारूकी ने भड़काऊ बयान देते हुए कहा, “अगर बांग्लादेशी फौज मुझसे कोलकाता पर कब्जा करने के लिए कहती है, तो मैं एक प्लान बनाऊँगा। 70 फाइटर जेट का इस्तेमाल करना तो दूर की बात है, मैं कोलकाता पर कब्जा करने के लिए 7 प्लेन का भी इस्तेमाल नहीं करूँगा।”

आगे कहता है कि उसे 70 प्लेन की जरूरत नहीं है। कोलकाता में फिदायीन हमलावर भेजकर ही कब्जा कर सकता है। वीडियो में आगे फारूकी हिंदुओ के खिलाफ नफरत की भाषा बोलते हुए कहा, “मुझे पता है कि उनका पसंदीदा खाना क्या है – गंदगी। मुझे पता है कि वे कितने कमजोर हैं, खून देखकर कैसे डर जाते हैं। मूर्ति पूजक खून से काँप उठते हैं।”

दरअसल, यह वीडियो 8 मार्च 2025 को ‘हसन मीडिया’ नाम के यूट्यूब चैनल पर अपलोड किया गया था। इसी वीडियो की क्लिप अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है।

‘हिन्दू डॉक्टर ने मरीज को मुस्लिम जानकर इलाज से किया इनकार’: पहलगाम अटैक के बाद ‘विक्टिम मुस्लिम’ नैरेटिव गढ़ने को The Quint ने परोसी फर्जी कहानी

                            द क्विंट' ने हिन्दू डॉक्टर चंपाकली सरकार को किया बदनाम (साभार: ऑपइंडिया इंग्लिश)
सोशल मीडिया पर रविवार (26 अप्रैल ,2025) को ‘मुस्लिम पीड़ित’ की झूठी कहानी फैलाई गई, जिसमें दावा किया गया कि कोलकाता की एक स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ चंपाकली सरकार ने एक मुस्लिम मरीज का इलाज करने से इनकार कर दिया। आरोप था कि कस्तूरी दास मेमोरियल सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में कार्यरत डॉक्टर चंपाकली ने कंगकोना खातून नामक महिला को उसके मजहब के चलते चिकित्सा सेवा देने से मना कर दिया।

रिपोर्ट में डॉ सरकार को विलेन दिखाने के लिए एक अपुष्ट कॉल रिकॉर्डिंग भी पेश की गई। यह उल्लेख करना ज़रूरी है कि उस ऑडियो क्लिप की अब तक कोई फॉरेंसिक जाँच नहीं हुई है और उसकी असलियत की पुष्टि नहीं हो सकी है।

हालाँकि, यह दावा पूरी तरह झूठा और भ्रामक निकला। यह घटना पहलगाम आतंकी हमले के बाद सामने आई उन कई फर्जी खबरों में से एक है, जो सोशल मीडिया और कुछ मीडिया संस्थानों द्वारा फैलाई जा रही हैं। इसके पीछे की मंशा इस्लामी आतंकवादियों द्वारा किए गए हिंदुओं के नरसंहार जैसे गंभीर मुद्दों से ध्यान भटकाना और हिंदुओं को गलत तरीके से खलनायक के रूप में प्रस्तुत करना प्रतीत होता है।

‘द क्विंट’ और कुछ अन्य मीडिया संस्थानों द्वारा इन फर्जी कहानियों को पुनः प्रकाशित कर तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया, जिससे सांप्रदायिक तनाव और गलतफहमियों को बढ़ावा मिला।

वामपंथी प्रोपेगेंडा आउटलेट ‘द क्विंट’ ने डॉ चंपाकली सरकार के हवाले से यह बयान दिया, “आपके मजहब के लोग मेरे धर्म के लोगों को मार रहे हैं, आप लोग हत्यारे हैं।”

                                                     ‘द क्विंट’ की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

इसमें आगे आरोप लगाया गया है, “डॉक्टर ने कहा – आपके पति को हिंदुओं द्वारा मार दिया जाना चाहिए ताकि आप उस दर्द को महसूस कर सकें जो हिंदुओं ने झेला है। आपको अपने इलाज के लिए केवल मदरसों और मस्जिदों में जाना चाहिए, जहाँ मुस्लिमों को आतंकवादी बनना सिखाया जाता है।”

डिजिटल मीडिया पोर्टल ‘द क्विंट’ के हवाले से, ये बात सामने आई है जिसमें डॉ सरकार को एक कथित कॉल रिकॉर्डिंग के आधार पर खलनायक के रूप में दिखाया गया है। आरोप है कि यह रिकॉर्डिंग असत्यापित है और इसे बिना पुष्टि के रिपोर्ट में प्रमुखता दी गई। रिपोर्ट में कंगकोना खातून, उनके पति और भाभी महफूजा (जो पेशे से वकील हैं) के बयानों को गलत रूप में प्रस्तुत किया गया है। 

वहीं, डॉ सरकार के पक्ष को बहुत ही सीमित जगह दी गई, जबकि पूरी रिपोर्ट उन्हीं के इर्द-गिर्द केंद्रित थी। रिपोर्ट के अनुसार, पत्रकार अलीज़ा नूर ने इस ख़बर को लिखा, जिन पर पहले भी ‘मुस्लिम पीड़ित’ की कहानी को स्थापित करने के लिए एक फर्जी खबर फैलाने के आरोप लग चुके हैं।

                                                   ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की रिपोर्टस के अनुसार, डॉक्टर को मरीज के मजहब का पता नहीं था और उसके सरनेम ‘खातून’ की जानकारी मिलने के बाद डॉक्टर नाराज हो गई।

शिकायत के अनुसार, डॉक्टर पिछले 7 महीनों से महिला का इलाज कर रही थी, डॉक्टर मरीज का पहला नाम कोंकणा से जानती थी। आरोप लगाया गया है कि उसका सरनेम ‘खातून’ देखकर डॉक्टर ने कथित तौर पर कहा की वो मुस्लिम महिला का इलाज नहीं करेंगी। बकौल रिपोर्ट, डॉक्टर ने हाल ही में पहलगाम में हुए आतंकी हमले का हवाला दिया और मजहबी कट्टरता के आरोप लगाए।

इस फर्जी खबर को मुस्लिम मिरर, डेक्कन क्रॉनिकल, मकतूब मीडिया और सियासत जैसी इस्लामी प्रचार साइटों द्वारा प्रोपेगंडा के तहत फैलाने का काम किया गया।

दावे बनाम सच्चाई, क्या था असल मामला?

कंगकोना खातून पिछले 7 महीने से अपनी नियमित जाँच के लिए डॉ सरकार के पास जा रही थीं। इतने लंबे समय तक इलाज के दौरान डॉक्टर को मरीज की मजहबी पहचान का पता न चलना असंभव सा लगता है। यदि डॉक्टर पूर्वाग्रही होतीं, तो शुरुआत से ही इलाज करने से इनकार कर देतीं। खातून का कहना है कि डॉक्टर को उसके उपनाम के बारे में हाल ही में जानकारी मिली और तभी से उनके व्यवहार में बदलाव आया।

दिलचस्प बात यह है कि यह खुलासा पहलगाम आतंकी हमले के दो दिन बाद हुआ। उसके मुताबिक, गुरुवार (24 अप्रैल, 2025) को डॉक्टर ने उसका इलाज करने से मना कर दिया, जिसके बाद 25 अप्रैल को उसने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। हालाँकि, जब जाँच शुरू हुई और तथ्य सामने आए, तो उसके आरोपों की बुनियाद कमजोर पड़ गई।

                                  डॉक्टर को महिला के पूरे नाम से ही जा रहा था पेमेंट, देख सकते हैं सरनेम

कोलकाता के प्रसिद्ध एनेस्थेसियोलॉजिस्ट डॉ प्रमोद रंजन रॉय ने गुरुवार (24 अप्रैल 2025) को सोशल मीडिया पर एक स्क्रीनशॉट साझा किया, जिसमें दिखाया गया था कि कंगकोना खातून ने डॉ चंपाकली सरकार को परामर्श शुल्क का भुगतान किया था। यह स्क्रीनशॉट उसी दिन का था जिस दिन खातून ने आरोप लगाया था कि उनका उचित इलाज नहीं किया गया और उनके साथ अभद्र व्यवहार किया गया।

यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब किसी तरह का इलाज किया ही नहीं गया, तो मरीज ने डॉक्टर को जाँच के लिए परामर्श शुल्क क्यों अदा किया?

इस मुद्दे पर अब और भी स्पष्टता आ गई है। मंगलवार, (29 अप्रैल, 2025) को ‘पश्चिम बंगाल डॉक्टर्स फोरम’ (WBDF) द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया कि उन्होंने डॉ चंपाकली सरकार द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों की समीक्षा की है, और उस समीक्षा के आधार पर उनके बयान को सही और विश्वसनीय माना है।

                                                         WBDF द्वारा प्रेस विज्ञप्ति

WBDF ने अपने बयान में कहा, “संबंधित डॉक्टर से सीधे संपर्क करने और तथ्यों की पुष्टि करने के बाद, हमने पाया कि बताए गए तथ्य प्रसारित किए जा रहे आरोपों के विपरीत हैं। वास्तव में, जिस मरीज़ की बात हो रही है, उसे मरीज़ के अनुरोध पर डॉक्टर ने उसके घर पर देखा था। सबूत के तौर पर, हमने परामर्श शुल्क की ऑनलाइन भुगतान रसीद की पुष्टि की है, जिस पर उचित समय और दिनांक अंकित है, जो बताता है कि परामर्श वास्तव में हुआ था।” WBDF के बयान ने कंगकोना खातून के झूठ की हवा निकाल दी।

यह बताया गया है कि खातून ने डॉ चंपक और सरकार के बीच एक निजी बातचीत सुनी थी, जो उनके खातून से संबंधित नहीं थी।

इसमें यह भी बताया गया है कि पहले भी डॉक्टरों को झूठे आरोपों के तहत इसी तरह निशाना बनाया गया है। ऑपइंडिया ने इस मामले को लेकर ‘पश्चिम बंगाल डॉक्टर्स फोरम’ (WBDF) के सदस्य डॉ. कौशिक चाकी से संपर्क किया, जिन्होंने प्रेस विज्ञप्ति की प्रामाणिकता की पुष्टि की।

डॉ चंपाकली सरकार का क्या कहना है

डॉ प्रमोद रंजन रॉय द्वारा शेयर किए गए वीडियो में पीड़िता डॉ चंपाकली सरकार ने अपना बयान दिया है।
उन्होंने अपने बयान में लिखा, “मैं डॉ CK सरकार हूँ। मैं पिछले 30 सालों से बेहाला, साउथ 24 परगना में प्रैक्टिशनर हूँ। मैं मेडिकल नैतिकता में विश्वास रखती हूँ। मेरे लिए सभी मरीज एक समान हैं। मैं अपने सभी मरीजों को समान प्राथमिकता देती हूँ। मेरी नजर में जाति, धर्म और नस्ल का कोई महत्व नहीं है। मैं मरीजों का सही और नैतिक तरीके से इलाज करने की पूरी कोशिश करती हूँ। कुछ लोगों को मुझसे दिक्कत थी। आप लोग अफवाहों पर ध्यान न दें। मेरे करियर को बर्बाद करने की कोशिश की गई है। मुझे सोशल मीडिया और न्यूज रिपोर्ट से जानकारी मिली है। संकट के समय में इस तरह की अफवाहें फैलाई जाती हैं। मुझे उम्मीद है कि आप लोग इस पर विश्वास नहीं करेंगे।”
साथ ही, डॉक्टर ने निजी कारणों से अपने 3 दशक लंबे करियर को बर्बाद करने की कोशिश करने के लिए खातून के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की बात भी कही है।
डॉ चंपाकली सरकार ने ‘द टेलीग्राफ’ को बताया, “मेरे 80 प्रतिशत मरीज़ मुस्लिम हैं। क्या मैं कुछ ऐसा कहूँगी जिससे मुझे सबसे ज़्यादा दुःख पहुँचे? मैंने परनाश्री पुलिस स्टेशन में शिकायत भी दर्ज कराई है कि मुझे बदनाम किया जा रहा है।”
डॉक्टर ने यह भी कहा की यह असत्यापित ऑडियो कॉल रिकॉर्डिंग फ़र्जी है। उन्होंने ‘द क्विंट’ से कहा, “नहीं, यह सब फ़र्ज़ी है, यह मेरी कॉल रिकॉर्डिंग नहीं है।”
यह हिंदू समुदाय को बदनाम करने का पहला प्रयास नहीं है। हाल ही में हुए पहलगाम आतंकी हमले के बाद, ऐसी साजिशों की कोशिश हुई हैं जिनका इस्तेमाल आकर आतंकी हमलों के पीछे मजहबी घृणा वाली वास्तविकता से ध्यान बँटाया जा सके, कश्मीरियों और मुस्लिमों को हिन्दुओं द्वारा निशाना बनाए जाने की झूठी कहानी गढ़ी जा सके।
इस रणनीति के तहत ‘मुस्लिम पीड़ित’ कार्ड का इस्तेमाल किया गया, ताकि बहस का केंद्र आतंकवाद से हटकर सांप्रदायिक पीड़ाओं की ओर मोड़ा जा सके। इसी सिलसिले में, एक और फ़र्ज़ी खबर सोशल मीडिया पर फैलाई गई, जिसमें दावा किया गया कि बेंगलुरु में एक मुस्लिम कॉर्पोरेट कर्मचारी की मौत उसके हिंदू सहकर्मियों द्वारा ‘गायत्री मंत्र’ ज़बरदस्ती जपवाने और पहलगाम हमले पर प्रतिक्रिया न देने के कारण हुई।
इस फर्जी खबर का पर्दाफाश ऑपइंडिया ने किया। यह कहानी मूल रूप से एक लिंक्डइन यूजर इशान सक्सेना की मनगढ़ंत पोस्ट पर आधारित थी, जिसे तथाकथित पत्रकार अलीजा नूर ने बिना किसी तथ्य की जाँच के रिपोर्ट किया। इस खबर को वामपंथी मीडिया प्लेटफॉर्म ‘द क्विंट‘ ने प्रमुखता से प्रकाशित किया, लेकिन जब सच्चाई सामने आई, तो बिना किसी माफ़ीनामे के चुपचाप हटा दिया गया। यह दिखाता है कि किस तरह तथ्यों की पुष्टि किए बिना ‘नैरेटिव’ गढ़ने की कोशिश की जाती है, और जब वो फिट नहीं बैठती, तो उसे दबा दिया जाता है।
नूर, जिन्होंने पहले कोलकाता के डॉक्टर की कहानी लिखी थी, अब ताज़ा खुलासे के बाद अपने एक्स (Twitter) और इंस्टाग्राम अकाउंट डिलीट कर चुकी हैं। इसी प्रोपेगेंडा तंत्र ने जामिया मिलिया इस्लामिया की एक कश्मीरी छात्रा के साथ छेड़छाड़ की घटना को भी बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया था। लेकिन जब बाद में मामला  सामने आया कि आरोपित मेवात का मोहम्मद आबिद है, तो यह पूरा नैरेटिव अचानक शांत हो गया।

बंगाल : जिस कॉलेज से पढ़ी ममता बनर्जी, वहाँ सरस्वती पूजा के लिए हाई कोर्ट को देना पड़ा दखल: कहा- छात्रों को सुरक्षा दो, TMC नेता शब्बीर अली दे रहा था रेप-मर्डर की धमकी

                                                   शब्बीर अली (बाएँ) TMC नेता 
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में एक प्रसिद्ध लॉ कॉलेज में छात्रों को सरस्वती पूजा का आयोजन नहीं करने दिया गया। छात्र-छात्राओं का आरोप है कि सात्ताधारी TMC का एक नेता लगातार उन्हें अब धमका रहा है। उन्हें रेप-मर्डर तक की धमकी दिए जाने का आरोप है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पश्चिम बंगाल तृणमूल कॉन्ग्रेस छात्र परिषद (TMC का छात्र संगठन) के महासचिव शब्बीर अली ने जोगेश चंद्र चौधरी लॉ कॉलेज में छात्र-छात्राओं को सरस्वती पूजा का आयोजन करने से रोका। पूजा आयोजन करने पर रेप-मर्डर तक की धमकी छात्र-छात्राओं को दी गई।

उन्होंने अब चारूमार्केट पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई है। पीड़ित छात्र-छात्राओं ने कॉलेज के प्रिंसिपल पंकज रॉय को भी शिकायत दी है। उन्होंने TMC नेता मोहम्मद शब्बीर अली पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं। विडंबना की बात ये है कि पश्चिम बंगाल की वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी इसी कॉलेज से पढ़ी हुई हैं।

एक छात्रा ने बताया, “ये बाहरी लोग जबरन वसूली करने आते हैं। वे चाहते हैं कि हम सरस्वती पूजा का आयोजन न करें। उन्होंने हमें गलियाँ दी और मारपीट की, उन्होंने रेप की धमकी तक दी।”

एक अन्य छात्रा ने कहा, “हमें पूजा आयोजित करने का अधिकार है। आखिर हमें क्यों रोका जा रहा है? हमसे कहा गया है कि अगर हमने सरस्वती पूजा का आयोजन किया तो वह हमेंअनवर शाह रोड से गुजरते समय मार देगा। वे लोग यहाँ वसूली कर रहे हैं।”

TMC नेता मोहम्मद शब्बीर अली पर आरोप लगाया गया है कि वह लड़कियों के हॉस्टल में छात्रों में भजने कि धमकी देता है। आरोप है शब्बीर ने छात्राओं को उनके हॉस्टल में भी सरस्वती पूजा आयोजन करने से मना किया। इस कॉलेज में बाहरी लोगों का प्रवेश वर्जित है।

छात्राओं का आरोप है कि शब्बीर अली और TMC के बाकी गुंडे यहाँ घुस कर उत्पात मचाते रहते हैं। डर का इतना माहौल ऐसा है कि प्रिंसिपल खुद सरकारी कॉलेज में जाने से डरते हैं। प्रिंसिपल पंकज रॉय ने बताया, “पिछले साल कॉलेज में घुसते समय मुझे परेशान किया गया था। मैंने अपने 40 साल के करियर में कभी नहीं देखा।”

उन्होंने टीएमसी के गुंडों द्वारा चलाए जा रहे जबरन वसूली रैकेट की तरफ भी इशारा किया। रॉय ने कहा, “उन्हें या तो पैसे दो, या फिर मुसीबत झेलो।” प्रिंसिपल रॉय ने बताया है कि TMC के गुंडों ने पहले कॉलेज प्रशासन के अनुमति ना देने की अफवाह फैलाई थी। उन्होंने कहा कि उन्होंने इस घटनाक्रम के बारे में राज्य सरकार और केंद्र सरकार को पत्र लिखा है।

इस मामले में कोलकाता हाई कोर्ट ने पश्चिम बंगाल पुलिस से सुरक्षा प्रदान करने को कहा है।