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US की अगुवाई में गाजा की ‘पीस व्यवस्था’ संभालेगी इंटरनेशनल फोर्स, हमास समेत सभी आतंकी संगठन डालेंगे हथियार: डोनाल्ड ट्रंप ने किया ऐलान

                               बोर्ड ऑफ पीस की बैठक में डोनाल्ड ट्रंप (फाइल फोटो साभार: AFP)
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार (31 जुलाई 2026) को दावा किया कि उनके नेतृत्व में बने ‘बोर्ड ऑफ पीस’ ने गाजा में हमास और बाकी सभी आतंकी संगठनों के पूर्ण निरस्त्रीकरण को लेकर एक ‘ऐतिहासिक समझौता’ कर लिया है। ट्रंप ने इसे मिडिल ईस्ट में स्थायी शांति की दिशा में अब तक का सबसे बड़ा कदम बताया। हालाँकि, इस समझौते को लेकर अभी कई सवाल बने हुए हैं, क्योंकि न तो इजरायल ने आधिकारिक मंजूरी दी है और न ही हमास ने ट्रंप के दावे की पूरी तरह पुष्टि की है।

ट्रंप ने यह घोषणा अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर की। उन्होंने लिखा, “आज बोर्ड ऑफ पीस ने गाजा में हमास और अन्य सभी हथियारबंद समूहों के पूर्ण निरस्त्रीकरण पर ऐतिहासिक समझौता किया है। यह स्थायी शांति और सुरक्षा की दिशा में एक बेहद बड़ा कदम है।”

ट्रंप ने बताया कि इस समझौते के बाद गाजा पर अब हमास का शासन नहीं रहेगा। इसकी जगह एक नई फिलिस्तीनी सरकार बनाई जाएगी, जो बोर्ड ऑफ पीस के साथ मिलकर काम करेगी और गाजा के लोगों के लिए प्रशासन चलाएगी। ट्रंप ने कहा कि इससे एक तरफ फिलिस्तीनियों को नया प्रशासन मिलेगा, वहीं दूसरी तरफ इजरायल को वह सुरक्षा मिलेगी जिसकी वह लंबे समय से माँग करता रहा है। उनका कहना है कि अब गाजा का इस्तेमाल इजरायल पर आतंकी हमलों के लिए नहीं होने दिया जाएगा।

कई चरणों में लागू होगा पूरा प्लान

ट्रंप ने बताया कि यह समझौता एक साथ लागू नहीं होगा, बल्कि इसे कई चरणों में पूरा किया जाएगा। जैसे-जैसे हमास और बाकी संगठनों का निरस्त्रीकरण पूरा होगा, वैसे-वैसे IDF यानी इजरायली सेना गाजा से अपनी वापसी शुरू करेगी।

इसके बाद गाजा की सुरक्षा की जिम्मेदारी एक इंटरनेशनल स्टेबिलाइजेशन फोर्स (International Stabilization Force) और नई बनाई जाने वाली फिलिस्तीनी पुलिस के हाथों में जाएगी। इन दोनों का काम होगा कि गाजा अपने नागरिकों और पड़ोसी देशों के लिए सुरक्षित बना रहे।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रस्तावित योजना के तहत हमास के हथियार, रॉकेट, भारी हथियार, सुरंगों और सैन्य ढाँचे को चरणबद्ध तरीके से खत्म किया जाएगा। पूरा निरस्त्रीकरण लगभग 200 से 350 दिनों के भीतर पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। हालाँकि, इसके लिए अभी कोई डेडलाइन तय नहीं मानी जा रही है।

ट्रंप ने इसे बताया ‘Trump 20-Point Plan’ का बड़ा पड़ाव

ट्रंप ने कहा कि यह समझौता उनके ‘Trump 20-Point Plan’ को लागू करने की दिशा में एक अहम पड़ाव है। यह वही योजना है, जिसे गाजा युद्ध खत्म करने, वहाँ नई सरकार बनाने, सुरक्षा व्यवस्था बदलने और बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण के लिए तैयार किया गया था।

उन्होंने कहा कि एक साल पहले गाजा में भीषण युद्ध चल रहा था, मानवीय संकट चरम पर था और बंधकों को कैद करके रखा गया था। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। हालाँकि ट्रंप ने यह भी माना कि अभी ‘बहुत काम बाकी है।’

मिस्र, कतर और तुर्किये का किया आभार

ट्रंप ने इस समझौते के लिए मिस्र, कतर और तुर्किये की मध्यस्थता की खुलकर सराहना की। उन्होंने कहा कि इन देशों ने बातचीत आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। साथ ही उन्होंने अपनी बातचीत करने वाली टीम की भी तारीफ करते हुए कहा कि उनकी लगातार मेहनत की वजह से यह ऐतिहासिक सफलता मिली।

7 अक्टूबर जैसे हमले दोबारा नहीं होंगे: ट्रंप

अपने बयान में ट्रंप ने 7 अक्टूबर 2023 के हमले का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा, “7 अक्टूबर को गाजा से जो खतरा पैदा हुआ था, उसे दोबारा कभी खड़ा नहीं होने दिया जाएगा।”

उन्होंने कहा कि समझौते के बाद गाजा पूरी तरह ऐसी नई फिलिस्तीनी सरकार के हाथ में होगा, जो वहाँ के लोगों के लिए काम करेगी, न कि आतंकवादी गतिविधियों के लिए।

अंत में ट्रंप ने इस समझौते के लिए सभी को बधाई दी और अपने विरोधियों को जवाब देते हुए कहा, “जिसके बारे में सब कहते थे कि इसे कभी हासिल नहीं किया जा सकता।”

इजरायल और हमास की मंजूरी नहीं

हालाँकि ट्रंप ने इसे ऐतिहासिक सफलता बताया है, लेकिन इस समझौते को लेकर अभी कई सवाल बने हुए हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि हमास ने अभी तक ट्रंप के दावे को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया है। Reuters को हमास के सूत्रों ने बताया कि यह अभी एक मसौदा है और किसी भी तरह का निरस्त्रीकरण तभी शुरू होगा, जब इजरायल पहले गाजा से सेना हटाएगा।

दूसरी तरफ, इजरायल ने भी इस समझौते पर आधिकारिक सहमति नहीं दी है। इजरायल के एक अधिकारी ने Reuters को बताया कि इस समझौते को लेकर ट्रंप के ऐलान से पहले इजरायल इस प्रस्ताव को खारिज कर चुका है।

इजरायली अधिकारियों का कहना है कि उनकी माँग हमास के सैन्य ढाँचे को पूरी तरह खत्म करना है और ट्रंप जिस 15 सूत्रीय दस्तावेज की बात कर रहे हैं, उसमें इन माँगों का जवाब नहीं दिया गया है और इसीलिए इजरायल इसे नहीं मान रहा है।

मोदी को गोली मारने वाले, इजरायल को उड़ाने वाले ‘Time Bomb’ नहीं लेकिन योगी को खिलौना देने वाली बच्ची ‘हिंदू आतंकी’: क्यों वामपंथी-इस्लामी कट्टरपंथियों का निशाना बनी यशस्विनी

                       योगी बच्ची संग (बाएँ), प्रोपेगेंडाई क्वीन आरफा (दाएँ), (साभार : PTI & crickettimes)
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और एक 5 साल की बच्ची यशस्विनी के बीच की मासूम बातचीत ने सोशल मीडिया पर ‘लिबरल ब्रिगेड’ के पेट में दर्द कर दिया है। जहाँ एक ओर सीएम योगी ने उस बच्ची को खिलौने के रूप में छोटा सा बुलडोजर वापस कर पढ़ाई पर ध्यान देने की प्रेरणा दी, वहीं दूसरी ओर आरफा खानुम जैसी प्रोपेगेंडाई पत्रकार और उनके वामपंथी समर्थकों ने इसे ‘हिंदू कट्टरपंथ’ का नाम दे दिया। यह उस दोहरे मापदंड का पर्दाफाश करती है जो खिलौने में तो ‘आतंकवाद’ देख लेता है, लेकिन वास्तविक घृणा और अश्लीलता पर आँखें मूँद लेता है।

बुलडोजर से ‘शिक्षा’ की सीख: जब योगी ने नन्ही यशस्विनी को चॉकलेट और संस्कार दिए

गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर से एक बेहद भावुक और प्रेरक Video सामने आया। कानपुर की 5 साल की बच्ची यशस्विनी अपने परिवार के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलने पहुँची थी। वह अपने साथ उपहार स्वरूप एक छोटा सा ‘खिलौना बुलडोजर’ लेकर आई थी। मुख्यमंत्री ने बड़ी आत्मीयता से बच्ची का स्वागत किया, उसे चॉकलेट दी और खिलौना हाथ में लिया। लेकिन कहानी यहाँ खत्म नहीं हुई… सीएम योगी ने वह बुलडोजर बच्ची को वापस लौटाते हुए बड़े प्रेम से कहा, “इसे अपने पास रखो, इससे खेलो और खूब मन लगाकर पढ़ाई करो।”

मुख्यमंत्री का यह संदेश साफ था। कानून व्यवस्था के प्रतीक बुलडोजर को खिलौने के तौर पर स्वीकारना अलग बात है, लेकिन एक बच्चे के लिए उसका भविष्य उसकी ‘शिक्षा’ में है। योगी जी ने उस बच्ची को कट्टरपंथी बनाने के बजाय एक जिम्मेदार नागरिक बनने और पढ़ने-लिखने के लिए प्रेरित किया। यह Video देखते ही देखते सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और लोगों ने मुख्यमंत्री के इस सहज और अभिभावक वाले रूप की जमकर तारीफ की।

आरफा खानुम का जहरीला एजेंडा: खिलौने में खोज लिया ‘हिंदू आतंकवाद’

लेकिन जहाँ दुनिया को इस Video में मासूमियत और सकारात्मकता दिखी, वहीं आरफा खानुम और उनके वामपंथी सहयोगियों को इसमें ‘खतरा’ नजर आया। आरफा ने इस Video को शेयर करते हुए लिखा, “इस तरह वे हिंदू बच्चों की पूरी पीढ़ी को कट्टरपंथी बना रहे हैं। वह भी मासूम छोटी लड़कियों को। हृदयविदारक और अत्यंत खतरनाक।”

आरफा के इस जहर के बाद उनके वामपंथी समर्थकों ने भी सुर में सुर मिलाया। यासिर कलाम ने लिखा, “वे बच्चों का ब्रेनवॉश कर रहे हैं और उन्हें भविष्य के लिए हिंदू आतंकवादी बनाने की कोशिश कर रहे हैं, यह इस सरकार की नीति है। अद्भुत।”

वहीं, जावेद भट ने उपहास करते हुए लिखा, “सनातनियों का बहुत कम उम्र से ब्रेनवॉश हो रहा है।”

एक अन्य हैंडलर फरहान खान ने तो माता-पिता पर ही निशाना साधते हुए कहा, “इन बच्चों को क्या हो गया है, माता-पिता को शर्म आनी चाहिए है।”

इन टिप्पणियों से साफ है कि एक मासूम खिलौना और मुख्यमंत्री की ‘पढ़ने’ की सलाह इन लोगों के लिए ‘आतंकवाद’ है, जबकि असली कट्टरपंथ में इनको ‘शांति’ दिखती है।

जब कट्टरपंथ की असली तस्वीर पर प्रोपेगेंडाई क्वीन आरफा आँख मूँद लेती हैं

ऑर्गेनाइजर की एक रिपोर्ट इस बात का खुलासा करती है कि कैसे कट्टरपंथ की असली जड़ों को छोटी उम्र से ही सीजा जाता है। रिपोर्ट बताती है कि कैसे छोटे बच्चों को ‘हम बनाम वे’ और ‘काफिर बनाम मोमिन’ के चश्मे से दुनिया देखना सिखाया जाता है। उन्हें आधुनिक और वैज्ञानिक शिक्षा से दूर रखकर मदरसों में ऐसी जिहादी सोच वाली शिक्षा दी जाती है जो उनके दिमाग को केवल मजहबी दायरे तक सीमित कर देती है।

यही कारण है कि जब वे बड़े होते हैं, तो वे एक अच्छे नागरिक बनने बजाय एक कट्टरपंथी सोच के साथ विकसित होते हैं। इनका पहला प्रेम देश नहीं बल्कि मजहब होता है। यह वही मानसिकता है जो स्पेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे विकसित देशों में भी ‘पत्थरबाजी’ और अस्थिरता का कारण बन रही है।

आरफ़ा खानुम की ‘चुनिंदा’ चुप्पी और मासूमियत की आड़ में कट्टरपंथ का जहर

सोशल मीडिया पर वायरल हुए ये दो Video सोचने को मजबूर कर देते हैं कि इस उम्र में इस तरह की सोच और बोली कैसे पैदा हो सकती है। और तथाकथित लिबरल पत्रकारों, विशेषकर आरफा खानुम शेरवानी के दोहरे मापदंडों की पोल खोलते हैं। जब एक मुस्लिम बच्चा हाथ में खिलौने की जगह नफरत की भाषा और सीने में चक्कू घोंपने की बात करता है, जब वह अपने देश के प्रधानमंत्री से ज्यादा दूसरे मुल्क के मजहबी नेता खामेनेई के लिए आँसू बहाता है, तो यह स्पष्ट है कि इन मुस्लिम बच्चों के दिमाग में बचपन से ही ‘राष्ट्रवाद’ के बजाय ‘मजहबी कट्टरपंथ’ का जहर घोल दिया जाता है।

आरफा खानुम, जो अक्सर मानवाधिकारों और लोकतंत्र की दुहाई देकर सरकार को कोसने का कोई मौका नहीं छोड़तीं, इन Video पर अपनी आँखें मूंद लेती हैं। उनकी ‘निष्पक्ष’ पत्रकारिता को तब लकवा मार जाता है जब मुस्लिम बच्चे सरेआम योगी आदित्यनाथ को धमकी देते हैं और राम मंदिर गिराकर मस्जिद बनाने या पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हैं। यह चुप्पी न केवल खतरनाक है, बल्कि उन ताकतों को शह देती है जो भारत की अगली पीढ़ी को मुख्यधारा से काटकर नफरत की भट्टी में झोंक रही हैं। सवाल यह है कि क्या आरफ़ा खानुम में इतनी हिम्मत है कि वे इस ‘कट्टरपंथी परवरिश’ पर सवाल उठा सकें।

बरेली का शर्मनाक सच: गाँधी प्रतिमा के साथ अश्लीलता और आरफा का ‘चुनिंदा मौन’

आरफा खानुम के कट्टरपंथ वाले दावे की पोल तब खुलती है जब हम बरेली (उत्तर प्रदेश) में ईद के दौरान हुई घटना को देखते हैं। ईद के मौके पर कुछ मुस्लिम युवकों और बच्चों का एक Video Viral हुआ, जिसमें वे महात्मा गाँधी की प्रतिमा के साथ अत्यंत घृणित और अश्लील हरकतें करते हैं। वीडियो में देखा जा सकता है कि कैसे ये बच्चे प्रतिमा के मुँह में उँगलियाँ डाल रहे थे, उन्हें थप्पड़ मार रहे थे और और गुप्तांगों से जुड़ी अश्लील हरकतें कर रहे हैं।
यह घटना उस नफरत का जीवंत प्रमाण है जो बच्चों के दिमाग में महापुरुषों और देश के प्रतीकों के खिलाफ भरी जा रही है। लेखक रतन शारदा ने इस पर सटीक टिप्पणी करते हुए कहा कि यह गाँधी जी को कट्टरपंथियों की ‘श्रद्धांजलि’ है, जिन्होंने उन्हें भारत में बनाए रखने के लिए संघर्ष किया था। लेकिन आरफा खानुम इस Video पर चुप क्यों हैं? क्या महात्मा गाँधी की प्रतिमा का अपमान ‘कट्टरपंथ’ की श्रेणी में नहीं आता? क्या अश्लीलता कर रहे उन मुस्लिम बच्चों के अम्मी-अब्बू को शर्मिंदा करने के लिए आरफा ने कोई ट्वीट किया था?

आरफा खानुम, अपनी कुंठा का इलाज कराइए

आरफा खानुम की पत्रकारिता नहीं, बल्कि यह ‘एजेंडा’ की दुकान है। सीएम योगी ने उस बच्ची को पढ़ाई की प्रेरणा दी, जो राष्ट्र निर्माण का काम है। लेकिन आरफा को इसमें ‘आतंक’ नजर आया क्योंकि खानुम की अपनी सोच घटिया, कुंठित और नफरत से भरी हुई है। जब मुस्लिम बच्चे देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ जहर उगलते हैं, भारत में रहकर पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हैं, मंदिर तोड़कर मस्जिद बनवाने की बात करते हैं, गाँधी जी की मूर्ति का अपमान करते हैं या हाथ में पत्थर उठाते हैं, तब खानुम का ‘हृदयविदारक’ दर्द कहीं गायब हो जाता है, तब मुँह से ना तो एक शब्द निकलता है और ना ही पोस्ट की जाती है।

आरफा जैसे लोग ही समाज के असली दुश्मन हैं, जो एक तरफ तो हिंदू प्रतीकों को गाली देते हैं और दूसरी तरफ अपनी कौम की बुराइयों को ‘अल्पसंख्यक अधिकार’ के नाम पर छुपाते हैं। योगी जी ने बच्ची को ‘किताब’ पकड़ने को कहा, जो खानुम को चुभ गया। असल में आरफा खानुम जैसे वामपंथियों को डर है कि अगर बच्चे पढ़-लिख गए तो इन जैसों की नफरत की दुकान बंद हो जाएगी। आपकी ये जमात है, जो एक मासूम खिलौने पर तो चिल्लाती है, लेकिन असली जिहाद और अश्लीलता पर मुँह में दही जमाकर बैठ जाती है।

पश्चिम बंगाल : बीजेपी शासित राज्य में कोई अप्रिय घटना होने पर चील-कौओं की चिल्लाने वाला मीडिया और विपक्ष खामोश क्यों? नहीं रुक रही दरिंदगी, कोलकाता में डॉक्टर और वकील के बाद फिर महिला की लूटी आबरू, ममता बनर्जी मौन

बीजेपी शासित किसी भी राज्य में कोई भी अप्रिय घटना होने पर मीडिया से लेकर सारा विपक्ष चील-कौओं की चिल्लाता रहता है, लेकिन बंगाल में हो रहे महिला अत्याचारों पर मातम क्यों पसरा? क्या सारी नैतिकता सिर्फ बीजेपी को ही सिखानी आती है गैर-बीजेपी राज्यों को नहीं, क्यों? अब इसे दोगलापन, नौटंकीबाज़ी और      
पश्चिम बंगाल में संदेशखाली से राजधानी कोलकाता तक महिलाओं का लगातार योन शोषण होने के बावजूद ममता बनर्जी सरकार चुप्पी साधे बैठी है। आरजी कर मेडिकल कॉलेज और लॉ कालेज में बर्बर रेप-मर्डर की दर्दनाक यादें अभी धूमिल भी नहीं हुईं है कि कोलकाता में महिला से दरिंदगी के फिर एक मामले ने राजधानी को शर्मसार कर दिया है। तृणमूल सरकार के महिलाओं के शोषण के प्रति हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने का ही दुष्परिणाम है कि इस बार तो दुष्कर्म होने के एक महीने तक पुलिस भी सोती रही और दुष्कर्मी खुलेआम छुट्टे घूमता रहा। संदेशखाली यौन शोषण से लेकर कोलकाता के रेप के दोनों मामलों में तृणमूल कांग्रेस के नेताओं की संलिप्तता सामने आई थी। बेशर्मी की हदें पार करते हुए सरकार दुष्कर्म जैसे घिनौने मामलों में भी अपने नेताओं, कार्यकर्ताओं को बचाने की कोशिश करती रही। कोलकाता में हुए रेप के इस मामले में अब पुलिस जांच कर रही है कि इसमें भी तो टीएमसी कनेक्शन नहीं है। पीड़िता पहले इसलिए डरी-छुपी रही, क्योंकि दुष्कर्मी ने उसका अश्लील वीडियो बना लिया था और उसे वायरल करने की धमकियां दे रहा था। कोलकाता में लगातार रेप की घटनाओं के बाद यह भी सवाल उठ रहे हैं कि राहुल-प्रियंका को ऐसे भयावह मामलों के बाद भी कोलकाता जाने की फुर्सत क्यों नहीं मिल रही है?

इतनी दरिंदगी के बाद राहुल-प्रियंका को कोलकाता आने से कौन रोक रहा है
पश्चिम बंगाल की राजधानी में मेडिकल कॉलेज की ट्रेनी डॉक्टर, लॉ कालेज के छात्रा और अब विवाहिता के साथ हुई रेप और हत्या की घटना के बाद देशभर में गुस्से का माहौल है। महिला मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के रहते बंगाल में महिलाओं के साथ हो रही घटनाओं से देश दहल रहा है। ऐसी घिनौनी घटनाओं को लेकर लोग अपना आक्रोश जाहिर कर रहे हैं, लेकिन आपको हैरानी होगी कि कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी मामले पर अब तक चुप्पी साधे हुए हैं। ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ का नारा देने वाली प्रियंका गांधी वाड्रा भी इस पर कुछ नहीं बोल रही हैं। लोग पूछ रहे हैं कि हाथरस कांड पर ये कहने वाले कि ‘दुनिया की कोई भी ताकत मुझे हाथरस के इस दुखी परिवार से मिलकर उनका दर्द बांटने से नहीं रोक सकती’ आखिर इंडी गठबंधन के शासन वाले ममता बनर्जी के बंगाल जाने से उन्हें कौन रोक रहा है? इसे आप दोगलापन नहीं तो क्या कहेंगे कि बीजेपी शासित राज्य में कुछ हो तो दौड़ पर चले जाने वाले कांग्रेस सांसद राहुल गांधी, प्रियंका वाड्रा आखिर बंगाल की घटना पर एक शब्द तक बोल भी नहीं पा रहे हैं।

रेप की घटनाओं से पश्चिम बंगाल लॉ एंड ऑर्डर पर सवाल खड़े हो रहे

ममता बनर्जी के राज में आरजी कर मेडिकल कॉलेज में ट्रेनी महिला डॉक्टर के साथ रेप और मर्डर की घटना हुई थी। इस नृशंस घटना के देशभर में सुर्खियां बनने के बाद भी ममता बनर्जी सरकार ने कोई सबक नहीं लिया। इसके बाद कोलकाता के लॉ कॉलेज में गैंगरेप की घटना हो गई, जिसमें मुख्य आरोपी तृणमूल कांग्रेस से ही जुड़ा है। अब फिर कोलकाता में विवाहित महिला के साथ दरिंदगी होने की घटना को लेकर राज्य में लॉ एंड ऑर्डर पर सवाल खड़े हो रहे हैं। इस बार मामला कोलकाता के पार्क स्ट्रीट पुलिस स्टेशन का है। जहां महिला ने लगभग एक महीने पहले बलात्कार होने की शिकायत दर्ज कराई थी। पहले तो पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही और मामले को रफा-दफा करना चाहती थी, लेकिन महिला के थाने पहुंचकर विरोध दर्ज करने के बाद आखिरकार पुलिस को रिपोर्ट दर्ज कर जांच के लिए मजबूर होना पड़ा। पश्चिम बंगाल पुलिस की ऐसी लापरवाह कार्यशैली कई सवाल खड़े करती है।

 कोलकाता के पार्क स्ट्रीट थाने की पुलिस एक माह बाद जागी

अब दुष्कर्म का नया मामला कोलकाता के पार्क स्ट्रीट पुलिस स्टेशन का है। जहां महिला ने लगभग एक महीने पहले बलात्कार होने की शिकायत दर्ज कराई थी। पहले तो पुलिस काफी समय तक मामले को रफा-दफा करने में लगी रही, लेकिन जब दबाव पड़ा तो उसे एक्शन लेने को मजबूर होना पड़ा। एक माह पहले की उसी शिकायत के आधार पर पार्क स्ट्रीट पुलिस स्टेशन के अधिकारियों ने आरोपी को गिरफ्तार किया है। पुलिस जांच कर रही है कि पहले के दुष्कर्म मामलों को तरह आरोपी का कनेक्शन तृणमूल कांग्रेस से तो नहीं है। राजधानी में लगातार दरिंदगी की वारदातें होने से महिलाओं में खौफ और लोगों में आक्रोश व्याप्त है।
बलात्कार का एक वीडियो बनाकर कर रहा महिला को ब्लैकमेल
इस मामले में संबंधित पुलिस अधिकारी ने पीटीआई को बताया कि आरोपी ने महिला के सामने खुद को एक सैन्यकर्मी बताया था। और फिर उसने महिला को जेल में बंद उसके पति की रिहाई के लिए कानूनी मदद दिलाने का वादा किया था। आरोपी ने बलात्कार का एक वीडियो भी बना लिया था, जिसे दिखाकर वो महिला को ब्लैकमेल कर रहा था। उसने महिला को धमकी दी कि अगर उसने पुलिस से संपर्क किया तो वीडियो को वायरल कर देगा। महिला ने करीब एक माह पहले कोलकाता के पार्क स्ट्रीट थाने में लिखित शिकायत दर्ज कराई थी।
विवाहिता से कई बार दुष्कर्म करके दरिंदे ने पैसे भी ऐंठे
पीड़ित महिला ने आरोप लगाया कि जेल में बंद उसके पति को छुड़वाने के नाम पर खुद को सैन्यकर्मी बताने वाले दरिंदे ने उसके साथ अनेक बार दुष्कर्म किया। साथ ही पैसे भी ऐंठ लिए। शिकायत के बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू की और आरोपी सैन्यकर्मी को गिरफ्तार कर लिया। उसका आरोप है कि पति को जमानत दिलाने के नाम पर आरोपी कई बार उसे अलग-अलग जगहों पर भी ले गया और उसके साथ दुष्कर्म किया। पुलिस आरोपी से पूछताछ कर रही है। पता चला है कि वह किसी और राज्य में नौकरी पर है, लेकिन हाल वक्त कोलकाता में रह रहा है।

दूसरे मजहबों पर Times of India ने बनाया ऐसा कार्टून तो जीवन से हो जाएँगे ‘आज़ाद’: उज्जैन में रेप पर हिन्दू घृणा वाला प्रोपेगंडा, मदरसों में यौन शोषण पर कभी बनाया मस्जिद को निशाना?

रेप के बाद सड़क पर भटकती रही बच्ची (बाएँ/प्रतीकात्मक चित्र साभार: Bing AI), TOI का हिन्दू विरोधी कार्टून (दाएँ, फोटो साभार: X/CartoonistSan)
उज्जैन का जो वीडियो सामने आया है और जिस प्रकार उस बच्ची को अपने अंगों को ढककर इतने किलोमीटर चलना पड़ा, उससे हर कोई स्तब्ध है। हर कोई जैसे प्रश्न पूछ रहा है कि आखिर यह क्या था और यह क्यों है? इस मामले में जो सबसे अधिक सीमा पार की है, वह की है कथित सेक्युलर लोगों ने, क्योंकि एक तो नगरी है महाकाल की उज्जैन और दूसरा वहाँ पर भाजपा की सरकार है। जहाँ पर भारतीय जनता पार्टी की सरकार होती है, वहाँ के अपराधों पर शोर और गैर-भाजपा सरकारों के यहाँ हो रहे अपराधों पर चुप्पी इनकी विशेषता होती है।

हाल ही में केरल में एक नहीं बल्कि 2 बच्चियों के साथ बलात्कार की घटना हुई। एक की हत्या कर दी गई मगर एक बच गई। फिर भी मीडिया में इन घटनाओं की चर्चा नहीं है और दोनों ही घटनाओं में आरोपित पहले भी अपराधों के कारण जेल जा चुके थे। फिर भी मीडिया में इन मामलों को लेकर शोर नहीं होता। शोर केवल तभी होता है जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार वाला राज्य हो। जैसे ही इस घटना का वीडियो वायरल हुआ, उसके बाद ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के कार्टूनिस्ट ने हिन्दुओं को लेकर एक निहायत ही अपमानजनक कार्टून पोस्ट किया।

इसमें हिन्दुओं को गौमाता की पूजा करते हुए और बच्ची को एक तरफ जाते हुए दिखाया गया था। ऐसा दिखाया था जैसे कि हिन्दुओं की पूजा के कारण ही इस बच्ची के साथ यह हुआ हो। इस कार्टून के बाद लोगों ने प्रश्न किया कि पहले जाँच तो लेते? यह कार्टून पूरी तरह से हिन्दुओं के प्रति घृणा से भरा कार्टून था। मगर इससे क्या फर्क पड़ता है! क्या उज्जैन में केवल हिन्दू ही रहते हैं? या फिर महाकाल की नगरी होने के कारण ऐसा किया गया?

खैर, यह कथित सेक्युलर कलाकारों की चाल होती है। सभी को कठुआ वाला मामला याद होगा, जिसमें कला का प्रयोग बच्ची को न्याय दिलाने के स्थान पर महादेव के विकृत चित्र साझा करने आरम्भ कर दिए गए थे। यह भी देखा जाना चाहिए कि जो शोर मचा रहे हैं क्या वह वास्तव में न्याय के लिए है या फिर राजनीतिक अकाउंट सेटल करने के लिए? राजस्थान में एक बच्ची को भट्ठी में मारकर डाल दिया गया था, परन्तु न्याय के लिए शोर मचाने वाले लोग उधर नहीं पहुँचे थे।

मदरसों में यौन शोषण के इतने मामले आते हैं, मगर क्या कभी किसी कार्टूनिस्ट ने या किसी कलाकार ने मस्जिद को निशाना बनाया? क्या उनके मजहबी यकीनों पर कार्टून बनाए? नहीं बनाए! और न ही बनाएँगे! क्योंकि हिन्दू धर्म के अतिरिक्त किसी और धार्मिक मत पर कुछ कहने का, अपमान करने का परिणाम उन्हें पता है। उन्हें पता है कि जिस अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात वह दिनभर करते हुए हिन्दू धर्म को कोसते हैं, उसे यदि किसी और मत के लिए प्रयोग कर लिया तो वह जीवन से ही कहीं आजाद न हो जाएँ।

क्रान्ति का अर्थ केवल हिन्दू धर्म को कोसा जाना न हो कर रह जाए, यह सुनिश्चित करना होगा और हिन्दू धर्म से घृणा करने वाले लोग अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी केवल हिन्दुओं तक ही सीमित न करें, यह आवाज बार-बार उठानी होगी।