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आतंकियों की छवि सुधारने में लगी वामपंथी मीडिया, Al Jazeera-Guardian-CNN ने भी साधी इस्लामी टेरर पर चुप्पी: ‘भगवा’ को बदनाम करने वालों ने क्यों बदला दिल्ली ब्लास्ट पर अपना चश्मा

                       दिल्ली ब्लास्ट पर विदेशी मीडिया और भारतीय मीडिया ने अपना-अपना नैरेटिव गढ़ा
दिल्ली के लाल किले के पास हुए आतंकी कार ब्लास्ट ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। वहीं दूसरी ओर इस निंदनीय आतंकी घटना पर वामपंथी मीडिया अपना नैरेटिव चला रही है। टाइम्स ऑफ इंडिया, द वायर जैसे मीडिया पोर्टल दिल्ली बम धमाके में संदिग्ध मुस्लिमों के प्रति सहानुभूति दिखाकर उनकी छवि सुधारने में लगी हुई है।

उधर, CNN, अल जजीरा(Al Jazeera), द गार्जियन( The Guardian), डॉन (Dawn) जैसे विदेशी मीडिया संस्थानों ने दिल्ली में हुए कार ब्लास्ट को ‘घातक’ नाम देने में बिल्कुल नहीं हिचकिचाए। लेकिन यही विदेशी मीडिया संस्थानों ने धड़ल्ले से रिपोर्ट्स छापी कि कैसे भारत की सरकार दिल्ली ब्लास्ट के पीछे ‘साजिश’ तलाश रही है। इन रिपोर्ट्स में तीन एजेंडे साफ नजर आए-

  1. भारत सरकार जबरन मुस्लिमों को दिल्ली ब्लास्ट का आरोपित साबित करने में लगी है।
  2. दिल्ली में हुए कार ब्लास्ट जैसे ‘घातक’ हमले से पूरा भारत ‘डर’ गया है, यहाँ मोदी सरकार की नाकामी को दर्शाया गया।
  3. सवाल उठाए गए कि क्या भारत अप्रैल में हुए पहलगाम हमले के बाद तय की गई दुश्मन को सीधा जवाब देने वाली नीति पर कायम रहेगा?
इन सवाल और आरोपों के माध्यम से विदेशी मीडिया ने भारत सरकार को जमकर घेरा। यह विदेशी मीडिया का आम तरीका है भारत में मुस्लिम-पीड़ित को साबित करने का और वही घिसा-पीटा मोदी सरकार को ‘भगवा राजनीतिवाद’ दिखाने को और यह दर्शाने का कि मोदी सरकार ने जिन्हें बम धमाके का संदिग्ध बनाया है, इसका कारण केवल उनकी मुस्लिम पहचान है।

वामपंथी मीडिया का आतंकियों की छवि सुधारने का प्रोपेगेंडा

देश की वामपंथी मीडिया ने दिल्ली में आतंकी ब्लास्ट के संदिग्ध डॉक्टर मोहम्मद उमर नबी की छवि को सुधारने के मिशन पर उतर गई। जैसे उमर नबी एक सीधा व्यक्ति है और उसने अनजाने में दिल्ली में इतना बड़ा ब्लास्ट कर दिया हो।
द वायर ने अपने लेख में पुलवामा में रहने वाले उमर नबी के परिवार की पीड़ा प्रस्तुत की। यह लेख इस तरह लिखा गया है कि पढ़ने पर यह एहसास होता है मानो लेखक आतंक के आरोपों में शामिल लोगों को ‘पीड़ित’ के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहा हो।
                                                              The Wire का लेख

उमर नबी के परिवार में उसके अब्बू के कथनों को प्रमुखता देकर यह दिखाया गया है कि वे अन्याय और दुख झेल रहे हैं, जबकि यह तथ्य नजरअंदाज कर दिया गया है कि इन्हीं का बेटा दिल्ली धमाके का संदिग्ध है।

टाइम्स ऑफ इंडिया के इस रिपोर्ट की लेखन शैली का अंदाज साफतौर पर दिखाता है कि दिल्ली धमाके का संदिग्ध डॉक्टर मुजम्मिल अहमद ‘पीड़ित’ है। रिपोर्ट में डॉ. मुजम्मिल की कॉलेज सीनियर डॉ. मोनिका लांघेह की प्रतिक्रिया दिखाई गई, वह मुजम्मिल के बारे में जानकर स्तब्ध हुईं हैं और कहती हैं, “एक श्रेष्ठ पद के व्यक्ति को गिरते देखा।” यह रिपोर्ट एक तरह से पाठक में मुजम्मिल के प्रति सहानुभूति जगाती है।

                                                        टाइम्स ऑफ इंडिया का लेख

उधर, भारत की मीडिया में दिल्ली ब्लास्ट में शामिल आतंकी उमर नबी की भाभी और आतंकी मुजम्मिल की अम्मी की ‘विक्टिम कार्ड’ वीडियो भी खूब प्रसारित की।

                                                               हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट

जहाँ उमर नबी की भाभी मुजमिल ने उमर नबी के बचपन और पढाई पर बात करते हुए उसे एक बेहतर बेटे और इंसान के रूप में पेश किया। यह माहौल बनाती है कि लोग सोच सकें- “ऐसा शांत-स्वभाव का व्यक्ति कैसे इतने बड़े आतंक जगत में शामिल हो गया?”

वहीं फरीदाबाद में 360 किलो विस्फोटक और हथियार के साथ पकड़े गए डॉ. मुजम्मिल, जो दिल्ली ब्लास्त का संदिग्ध भी है, उसकी अम्मी ने बेटे को बेगुनाह होने की बाते कहीं और आतंक के आरोपों को पूरी तरह नकारा। इस बयान के हवाले से Mint ने अपनी रिपोर्ट में आंतकी के परिवार को ‘बेबस’ और ‘अन्याय’ झेलने रूप में दर्शाया।

                                                               LiveMint की रिपोर्ट

आतंकी की अम्मी के दुख और भरोसे को, “मेरा बेटा ऐसा नहीं कर सकता, हमें तो किसी ने बताया कि उसे पकड़ लिया गया” जैसे बातें लिखकर पाठक के सामने आतंकी की छवि को साफ सुथरी प्रदर्शित करने की कोशिश की गई।

दिल्ली ब्लास्ट पर विदेशी मीडिया का प्रोपेगेंडा

दिल्ली ब्लास्ट पर विदेशी मीडिया ने भी अपने नैरेटिव को आगे बढ़ाया। तमाम तरीके के प्रोपेगेंडा चलाकर ब्लास्ट के दिल्ली धमाके को भारत की नाकामी दर्शाया गया। लेकिन मुस्लिम पहचान वाले संदिग्ध आरोपितों की बात तक नहीं की गई। यहाँ विदेशी मीडिया का इस्लामी कट्टरपंथी सोच सामने आती है। Dawn से लेकर अल जजीरा और द गार्जियन ने धड़ल्ले से दिल्ली ब्लास्ट को कवर करते हुए ऐसी रिपोर्ट्स छापी हैं।

द गार्जियन की इस रिपोर्ट में दिल्ली ब्लास्ट को एक बेहद घातक और डरावना हमला बताया गया है, जिससे पूरे भारत में दहशत फैल गई। लेख की शुरुआत ही इस तरह की भाषा से होती है कि यह घटना भारत की राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

                                                              द गार्जियन की रिपोर्ट

अल जजीरा की इस रिपोर्ट में सवाल उठाए गए कि कैसे भारत की मोदी सरकार दिल्ली ब्लास्ट पर इतने आनन-फानन में आरोप लगाने में जुटी हुई है। रिपोर्ट में पीएम मोदी का पहलगाम हमले के बाद दिए गए बयान- आतंकी हमले को ‘युद्ध की कार्रवाई’ माना जाएगा का हवाला देते हुए सवाल किया कि भारत ने पाकिस्तान के साथ संघर्ष शुरू किए बिना कथित अपराधियों को दोषी ठहरा दिया है।

                                                                  अल जजीरा की रिपोर्ट

इस रिपोर्ट में दिल्ली ब्लास्ट को लेकर डर और असुरक्षा का माहौल उभारने की कोशिश की गई है। लेख में कहा गया, “दिल्ली धमाका ने पूरे देश को सतर्क कर दिया है।” यानी इस विस्पोट से पूरा देश सतर्क और डर गया है। इस तरह का वाक्य भारत को एक डर से घिरे देश के रूप में दिखाने की कोशिश है और भारत की सुरक्षा व्यवस्था को नाकाम बताने जैसा दावा है।

                                                                 अल जजीरा की रिपोर्ट

अमेरिकन मीडिया CNN ने अपनी इस रिपोर्ट में दिल्ली में आतंकी ब्लास्ट और अगले ही दिन पाकिस्तान के इस्लामाबाद में हुए ब्लास्ट को समान बताने की कोशिश की गई। जबकि असलियत यह है कि दिल्ली ब्लास्ट में गिरफ्तार संदिग्धों के सीधे संबंध पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से पाए गए हैं। इसके बावजूद भारत ने अब तक पाकिस्तान को बिना ठोस सबूत के दोषी नहीं ठहराया है।

                                                                CNN की रिपोर्ट

उधर, आतंक को पनाह देने वाले पाकिस्तान के इस्लामाबाद में जो ब्लास्ट हुआ वह एक सुसाइड बॉम्बिंग है। जिसके तार अब तक भारत से दूर-दूर तक जुड़ने के कोई सबूत नहीं है। तब भी पाकिस्तान ने बिना तथ्यों के सीधा भारत पर हमले के आरोप लगा डाले।

दिल्ली ब्लास्ट और फरीदाबाद आतंकी मॉड्यूल

फिर बात करें दिल्ली ब्लास्ट के तारों की और फरीदाबाद में सामने आए आतंकी मॉड्यूल की तो इस ब्लास्ट में इस्तेमाल हुई कार, विस्फोट और संदिग्ध गतिविधियों से जुड़ी जाँच में यह साफ हुआ है कि यह एक बड़ा आतंकी नेटवर्क था। जाँच एजेंसियों को फरीदाबाद, सहारनपुर, लखनऊ समेत कुछ जिलों से 2900 किलो विस्फोटक सामग्री बरामद हुई, जो सीधे दिल्ली ब्लास्ट से जुड़ रही है।

इसके अलावा जिस i20 कार से ब्लास्ट हुआ, उसमें बैठा डॉक्टर मोहम्मद उमर नबी के तार भी आतंकी मॉड्यूल से जुड़े। उसके दोस्त सज्जाद अहमद और परिवार वालों से पूछताछ की गई तो सामने आया कि वह संदिग्ध आतंकी गतिविधियों में शामिल था। जाँच एजेंसियों को यह भी शक है कि फरीदाबाद से गिरफ्तार आतंकी मुजम्मिल की गर्लफ्रेंड डॉ. शाहीना का भी दिल्ली ब्लास्ट में बड़ा रोल हो सकता है। डॉ. शाहीना पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद (JeM) की महिला ट्रेनर थी, उसके पास से एके-47 और हथियार बरामद हुए।

यहाँ तक कि भारत सरकार ने दिल्ली ब्लास्ट की घटना को आतंकी हमला बताने में कोई संकोच नहीं किया। सरकार ने कहा कि यह हमला निंदनीय था और पीएम मोदी ने भूटान के मंच से चेतावनी दी कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।

दिल्ली ब्लास्ट पर सरकार की कार्रवाई और इस्लामी कट्टरपंथ सोच

दिल्ली ब्लास्ट पर भारत की मोदी सरकार की कार्यवाही जारी है। जाँच एजेंसिया अब तक दोषियों के काफी करीब पहुँच चुकी है। यहाँ तक कि दिल्ली ब्लास्ट के फिदायीन उमर नबी और उसके परिवार पर भी जाँच एजेंसियों ने शिकंजा कसा है। हमले की जाँच में रोजाना नई परते खुल रही हैं। लखनऊ के सहारनपुर से गिरफ्तार डॉ. शाहीन को लेकर भी जाँच एजेंसियाँ बड़ा शक जता रही हैं क्योंकि वह जैश-ए-मोहम्मद की महिला विंग की कमांडर है।

इन सब सबूतों और जाँच से साफ स्पष्ट होता है कि भारत सरकार आतंक के खिलाफ कार्रवाई को लेकर कितनी सक्रिय है। वहीं अब तक कि जाँच से यह भी साफ है कि संदिग्ध आरोपितों की कौम एक ही है। सभी पकड़े गए लोगों की पहचान मुस्लिम ही है। वैसे ये कोई चौंकने वाली बात नहीं है क्योंकि भारत में अब तक जो भी आतंकी हमले या ब्लास्ट हुए हैं उसके पीछे इस्लामी कट्टरपंथी की विचारधारा ही है। फर्क सिर्फ यह है कि इस बार हमला देश के भीतर बैठे इस्लामी कट्टरपंथों के जरिए किया गया है।

विदेशी मीडिया की इस्लामी कट्टरपंथ पर चुप्पी

अब वापस आते हैं विदेशी मीडिया की दिल्ली ब्लास्ट को लेकर छापी गई रिपोर्ट्स पर। यहाँ बड़े-बड़े विदेशी मीडिया संस्थानों ने दिल्ली ब्लास्ट को लेकर बेहतर तरीके से खबरें छापीं और पाठकों को हर मिनट अपडेट किया लेकिन यह सब अपना नैरेटिव ध्यान में रखते हुए किया गया। कहीं दिल्ली ब्लास्ट को ‘घातक’ हमला करार दिया गया तो कहीं भारत की मोदी सरकार पर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े किए गए। लेकिन संदिग्धा आरोपितों पर कोई खबरें नहीं छापी गईं, क्योंकि उनकी पहचान ‘मुस्लिम’ थी।

ये बिल्कुल वैसा ही है, जैसे विदेशी मीडिया हमेशा से करती आई है। एक बार फिर विदेशी मीडिया की इस्लामी कट्टरपंथी विचारधारा उजागर हुई है। ये मीडिया CAA, NRC और आर्टिकल 370 को मुस्लिमों के खिलाफ कार्यवाही बताने में नहीं हिचकिचाती है। तब भारत में मोदी सरकार की ‘भगवा राजनीति’ पर बड़े-बड़े लेख लिखे जाते हैं। लेकिन अब जब भारत की राजधानी में आतंकी हमला हुआ और आरोपित मुस्लिम हैं तो वे चुप्पी साधे बैठे हैं।

आरोप लगाए गए कि मोदी सरकार पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद अपनी नई नीति को साबित करने के लिए पाकिस्तान पर आरोप लगाने में जल्दबाजी कर रहा है। बता दें जिस नीति की बात हुई वह भारत की आतंकी हमले पर ‘युद्ध की कार्रवाई’ के कड़े संदेश हैं। तो विदेशी मीडिया को जान लेना चाहिए कि भारत अब चुप नहीं बैठता है, यह बयान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी दिया जा चुका है। आतंकवाद के खिलाफ लड़ने की बात आएगी तो भारत सबसे आगे रहेगा। इसका उदाहरण भारत की मोदी सरकार URI स्ट्राइक, ऑपरेशन सिंदूर और अन्य ऑपरेशन चलाकर दे चुकी है और आगे भी देती रहेगी।

भारत की वामपंथी मीडिया का दोहरा रवैया

यहाँ सिर्फ विदेशी मीडिया तक बात सीमित नहीं हो जाती है। बल्कि भारत के कुछ वामपंथी मीडिया संस्थान भी अपना नैरेटिव गढ़ने के लिए दिल्ली में हुए निंदनीय आतंकी धमाके पर प्रोपेगेंडा फैलाना शुरू कर देते हैं। इन मीडिया संस्थानों ने दिल्ली ब्लास्ट के संदिग्ध आरोपितों की छवि सुधारने को लेकर खबरें छापी। लोगों को इस भ्रम में डाला गया कि डॉ. मुजम्मिल और डॉ. उमर नबी जैसे आतंकी है तो आम इंसान ही लेकिन पता नहीं कैसे उन्होंने दिल्ली में ब्लास्ट कर दिया।

आतंकियों की छवि बदलने के लिए छापी गई खबरों का उद्देश्य साफतौर पर पारदर्शी था। वामपंथी मीडिया केवल यह साबित करने में लगी हुई थी कि इस्लामी कट्टरपंथी जैसा कुछ नहीं होता है और मुस्लिम को आतंकी बताना गलत है। इन मीडिया संस्थानों ने यहाँ जाँच एजेंसियों के उन पुख्ता सबूतों को नजरअंदाज किया, जिसमें साफ कहा गया है कि दिल्ली ब्लास्ट एक आतंकी महला था और इतना ही नहीं पकड़े गए आतंकियों ने भी कबूला कि वे इससे भी बड़ी साजिश रच रहे थे।

अब इतना तो साफ हो गया है कि चाहे भारत पर आतंकी हमला हो या युद्ध की स्थिति क्यों न आ जाए। देश का वामपंथी मीडिया अपना मुस्लिम पीड़ित वाला नैरेटिव गढ़ने के लिए आतंकियों को भी सफेद चोला पहनाने में नहीं कतराएगा। वहीं विदेशी मीडिया भी लगातार तथ्यों को जाँचे बिना भारत पर हमलावर रहेगा और इस्लामी कट्टरपंथी की विचारधारा को आगे बढ़ाता रहेगा।

BJP बनाएगी कर्नल कुरैशी- विंग कमांडर सिंह को चेहरा: Times of India में छपी फर्जी खबर की भाजपा ने खोली पोल, बताया- मीडिया ने तोड़-मरोड़ के पेश किया बयान

भारतीय जनता पार्टी ने कर्नल सोफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह को अपने अभियान का चेहरा बनाने की खबरें खारिज की हैं। भाजपा ने इन्हें फर्जी खबर करार दिया है। पार्टी ने कहा है कि वह ऐसी कोई योजना पर काम नहीं कर रही है। मीडिया में चलाया गया था कि ऐसा भाजपा महिलाओं में पैठ बढ़ाने के लिए करेगी।

भाजपा के आईटी सेल के मुखिया अमित मालवीय ने एक्स (पहले ट्विटर) पर यह दावा करने वाली खबरों को लेकर लिखा। उन्होंने कहा, “यह फेक न्यूज है। भाजपा की कर्नल सोफिया कुरैशी या विंग कमांडर व्योमिका सिंह को अभियान का चेहरा बनाने की कोई योजना नहीं है।”

आगे उन्होंने बताया, “भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष जमाल सिद्दीकी के बयान को गलत तरीके से पेश किया गया है। उन्होंने कर्नल कुरैशी को समुदाय के भीतर एक सशक्त मुस्लिम महिला के उदाहरण के रूप में दिखाने को लेकर बात कही थी।”

यह खबर Times मीडिया समूह के अखबारों ने प्रमुखता से छापी थी। टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपी इस खबर में बताया गया था कि 9 जून, 2025 को भाजपा को मोदी सरकार के 11 वर्ष पूरे होने पर भाजपा महिलाओं को केंद्र में रख कर यह अभियान चलाएगी।

खबर में बताया गया था कि इस काम की जिम्मेदारी भाजपा के अल्पसंख्यक मोर्चा को सौंपी गई है। इस खबर में बताया गया था कि मोर्चा को मस्जिदों, दरगाहों और बाकी जगहों पर ऐसी चौपालें आयोजित करने का आदेश भाजपा की तरफ से दिया गया है।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की खबर में यह भी दावा किया गया था कि पार्टी इससे अल्पसंख्यक समुदाय में अपनी पैठ बढ़ाना चाहती है। हालाँकि, भाजपा ने इस खबर को पूरी तरह फर्जी बताया है। गौरतलब है कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान विश्व के सामने जानकारी देने वाला चेहरा कर्नल सोफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह ही थीं।

इससे पहले भाजपा ने दैनिक भास्कर की उस रिपोर्ट को खारिज किया था जिसमे पार्टी के घर-घर सिंदूर भेजने के अभियान चलाने का दावा किया गया था। भाजपा ने बताया था कि उसकी ऐसी कोई योजना नहीं है।

80 साल की हिंदू महिला से रेप, आँखें निकालने की कोशिश… फिरकापरस्त मीडिया ने नहीं बताया कि दरिंदा ‘छोटू आलम’ है, पर हेडलाइन में होली ठूँसना नहीं भूली

                                                   बुजुर्ग महिला का शोषण, मीडिया छिपाने में जुटा
बिहार के गोपालगंज जिले में 80 साल की दलित महिला से रेप का मामला सामने आया है। घटना 14 मार्च 2025 की है। बुजुर्ग महिला अपने गेहूँ के खेतों में घास काटने गई थी। उसी समय ‘छोटे आलम’ नाम का आरोपित वहाँ आया और महिला को दबोचकर रेप किया। उसके बाद उसने बुजुर्ग की आँखें निकालने की भी कोशिश की और उसे आखिर में मरा हुआ समझकर वहाँ से फरार हो गया।

जानकारी के मुताबिक, पूरी घटना 14 मार्च शाम करीब 4:30 बजे की है। इस संबंध में महिला के परिजनों ने शिकायत दर्ज कराई है। शिकायत में बताया गया कि महिला अधमरी अवस्था में एक गाँव की लड़की को मिली थी। उसी ने पीड़िता के बारे में सबको बताया और आखिर में महिला को घर लाया गया, फिर डॉक्टर बुलवाकर प्राथमिक इलाज हुआ।

पीड़ित बुजुर्ग की हालत इतनी ज्यादा खराब थी कि उन्हें होश 19 घंटे बाद जाकर आया। उन्होंने चेत अवस्था में जब सबको आपबीती बताई तो सब हैरान रह गए। वहीं उनका लड़का घटना के बाद सैयद अली के घर गया, मगर वहाँ- सैयद अली, बबुद्दीन, शहाबुद्दीन, सद्दाम, हशमत और जुम्मादीन ने उन्हें धक्का मारकर बाहर कर दिया।

इस दौरान उन्हें गालियाँ भी दी गईं- “सा%$, चम@$ सियार, हमारे दरवाजे पर आकर शिकायत करने आ गया…. भागो, नहीं तो यहीं चम@$ सियार, माद$^$ जान से मार देंगे।”

पुलिस ने इस मामले में मुख्य आरोपित के अलावा चार उसके परिजनों के विरुद्ध भी केस को दर्ज किया है। बैकुंठपुर थाने के एसएचओ का कहना है कि इस मामले में अब तक एक गिरफ्तारी हो गई है जबकि मुख्य आरोपित अब भी फरार है।

वहीं आजतक की रिपोर्ट के अनुसार, सदर एसडीपीओ अभय कुमार रंजन ने बताया कि पीड़िता को मेडिकल परीक्षण के लिए ले जाया गया है और मेडिकल रिपोर्ट में रेप की बात सामने नहीं आई है। हालाँकि शारीरिक शोषण की पुष्टि हुई है। अधिकारी ने यह भी बताया कि मुख्य आरोपित गिरफ्तार हो चुका है।

मीडिया ने छिपाया आरोपित का नाम

बिहार की इस घटना को कई मीडिया संस्थानों ने कवर किया, लेकिन कुछ ने बहुत चालाकी से अपनी रिपोर्ट में आरोपित का नाम छिपा लिया। इसमें टाइम्स ऑफ इंडिया, ईटीवी भारत और द ऑब्जर्वर पोस्ट जैसे संस्थान शामिल हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया वाली रिपोर्ट में मुस्लिम आरोपित का नाम छिपाकर इसे एक होली पर हुई हिंसा और रेप की घटना की तरह प्रदर्शित किया गया।
रिपोर्ट में लिखा गया। 14 मार्च को होली पर गोपालगंज जिले में एक 80 साल की दलित महिला के साथ कथिततौर पर रेप हुई। हेडलाइन दी गई- होली पर बुजुर्ग महिला के साथ रेप।
इसी प्रकार ईटीवी भारत में भी ऐसे ही दिखाया गया कि दलित महिला के साथ होली पर रेप हुआ और उसकी आँख निकालने की कोशिश हुई। हालाँकि यहाँ भी मुस्लिम आरोपित का नाम छिपाया गया।
इसके बाद इस्लामी नैरेटिव को बढ़-चढ़कर आगे बढ़ाने वाला ‘ऑब्जर्वर पोस्ट’ भी इस घटना के नाम पर होली त्योहार को बदनाम करते देखा गया। उसने ये तो बताया कि दलित परिवार को गालियाँ दी गईं, लेकिन ये गालियाँ किसने दी, ये नहीं बताया गया।
अजीब बात ये है कि जब शिकायत में पूरी तरह आरोपित का नाम बताया गया है तो फिर आखिर क्यों इन मीडिया संस्थानों ने अपनी खबरों से आरोपित को नाम छिपाया और पाठकों को ये दिखाया कि होली पर दलित के साथ अत्याचार हुआ। खैर, ऑब्जर्वर पोस्ट और टाइम्स ऑफ इंडिया में ऐसे भ्रामक हेडलाइन दिखना कोई हैरान करने वाला भी नहीं है। पूर्व में कई ऐसे मामले हुए हैं जब आरोपित की पहचान छिपाते हुए इन मीडिया हैंडल्स पर रिपोर्ट प्रकाशित हुई।

राजस्थान : Times of India ने फैलाया झूठ; न मामला ऊँच-नीच का, न दलित दूल्हे को घोड़ी पर चढ़ने से रोका

                            दूल्हे को नहीं उतारा गया घोड़ी से, TOI ने छापी गलत जानकारी (फोटो साभार)
राजस्थान के अजमेर के लवेरा गाँव में दलित दूल्हे की बारात को लेकर भारत के जाने-माने मीडिया संस्थान टाइम्स ऑफ इंडिया ने झूठ फैलाने का काम किया है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपनी खबर में बताया कि लवेरा में एक अनुसूचित जाति के दूल्हे की बारात में भारी पुलिस बल (100 से अधिक) साथ-साथ था क्योंकि गाँव में ऊँची जाति के लोगों ने उसके घोड़ी चढ़ने का विरोध किया था…।

 देख सकते हैं कि टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपनी खबर को शेयर करते हुए ट्वीट में भी यही लिखा। अब सच्चाई असल में क्या है आइए बताते हैं।

लवेरा गाँव में जिस दूल्हे की बारात में पुलिस की मौजूदगी को लेकर टाइम्स ऑफ इंडिया ने झूठ फैलाया है, उस दूल्हे का नाम विजय रैगर है, जिनकी शादी लवेरा गाँव के रहने वाले नारायण खोरवाल की बेटी अरुणा से 21 जनवरी 2025 को हुई।

विजय की बारात में पुलिस की मौजूदगी का कारण ये नहीं था कि गाँव में किसी ऊँची जाति वाले ने उन्हें घोड़ी पर बैठने से रोका, बल्कि ये मामला तो ऊँची-नीची जाति का था ही नहीं।

रिपोर्टों के अनुसार, गाँव की बहुल आबादी गुर्जरों की है यानी ओबीसी समुदाय की। सबसे दिलचस्प बात ये है कि खबरें भी यही बताती हैं कि गुर्जर समाज ने दूल्हे को घोड़ी से नहीं उतारा। उलटा उसका ऐसा स्वागत किया कि गुर्जर समाज के पंच पटेल व ग्रामीण खुद उसकी बारात में शामिल हो गए। वहीं दुल्हन को भी इसी समुदाय के लोगों ने ऐसे विदा किया जैसे वो इनकी अपनी बेटी हो।

अब रही बात पुलिस कर्मियों की मौजूदगी की… तो बारात में पुलिस वाले सिर्फ इसलिए शामिल थे ताकि किसी भी तरह के विवाद की आशंका न रहे। ये आशंका भी इसलिए क्योंकि 20 साल पहले गाँव में ऐसी घटना हुई थी। साल 2005 में नारायण की बहन सुनीता की शादी खरवा निवासी दिनेश के साथ हो रही थी, मगर ग्रामीणों ने बारात आने पर विरोध कर दिया था।

बताया जा रहा है कि तब दिनेश को चूँकि घोड़ी पर बैठने नहीं दिया गया था, इसलिए पुलिस उसे जीप से लेकर आई थी। उस वक्त भी शादी में जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन मौजूद था। इसी घटना को देखते हुए विजय रैगर की बारात में विवाद की आशंका उठी। अरुणा के पिता ने पुलिस प्रशासन से अपील की और पुलिस सुरक्षा लिहाज से बारात के साथ रही।

हालाँकि, बाद में दुल्हन के पिता ने खुद ये बोला कि उन्हें डर था कि कहीं ऐसा विवाद न हो, लेकिन बारात वाले दिन किसी ने कुछ नहीं कहा।बारात 2:30 बजे लवेरा गाँव के राजकीय आयुर्वेद औषधालय पहुँची। वहाँ से 5 ढोल वालों के साथ बारात में शामिल लोग नाचते गाते अलग-अलग मार्ग से होते हुए वधू के घर पहुँचे और फिर शादी रीति-रिवाज से संपन्न हुई।

खबरों से स्पष्ट है कि 20 साल पहले हुए विवाद के कारण पुलिस ने एहतियातन कदम उठाए थे लेकिन न तो 20 साल पहले हुए विवाद में इसमें ऊँची जाति के लोग इसमें शामिल थे और न अब उनके कारण ऐसी कोई आशंका थी… जैसा कि टाइम्स ऑफ इंडिया ने ऊँची जाति लिखकर पाठकों को भ्रमित करने की कोशिश की।

हिंदुओं से ये कैसी नफरत TOI-HT? : 15 साल की दलित नौकरानी की हत्या में गिरफ्तार हुआ मोहम्मद निशाद और उसकी बीवी, लेकिन मीडिया ने ‘दीवाली’ को घसीटा

   मार डाली गई नाबालिग नौकरानी की खबर में मीडिया घुसेड़ रही दीपावली का एंगल (प्रतीकात्मक चित्र- AI/LightX)
चेन्नई पुलिस ने 3 नवंबर 2024 को मोहम्मद निशाद और उसकी पत्नी नासिया को उनकी 15 साल की दलित नौकरानी की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया। कथित तौर पर मियाँ-बीवी नाबालिग नौकरानी को प्रताड़ित करते थे। गर्म तवा और सिगरेट से दाग देते थे। बुरी तरह पिटाई करते थे।

प्रताड़ना से जब नाबालिग दलित की मौत हो गई तो मुस्लिम दंपती घर छोड़कर भाग गया। पुलिस ने नाबालिग की लाश उनके घर के बाथरूम से बरामद की। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) और हिंदुस्तान टाइम्स (HT) जैसे मीडिया संस्थान इस घटना में भी ‘दीपावली’ को घसीटकर लाने में पीछे नहीं रहे। नाबालिग की लाश 31 अक्टूबर को बरामद की गई थी और इसी दिन दीपावली भी थी।

मीडिया ने हत्या को दीपावली से जोड़ा

TOI ने इस घटना के बारे में अपने सोशल मीडिया पोस्ट में ‘दीवाली’ शब्द को प्रमुखता से छापा है। इस पोस्ट में कहीं भी आरोपितों का नाम नहीं लिखा गया। टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने लिखा, “दीवाली के दिन 15 वर्षीया घरेलू सहायिका की उसके मालिकों द्वारा बेरहमी से पिटाई किए जाने के बाद मौत हो गई है। दंपती ने उसे सिगरेट से दागने सहित कई गंभीर चोटें पहुँचाई और मरने के लिए शौचालय में बंद कर दिया।”

                                                                    साभार- X/TOI

इसी रिपोर्ट में TOI ने आरोपितों के नाम दूसरे और तीसरे पैराग्राफ में बताए हैं।

                                                                     साभार- TOI

कमोबेश ऐसी ही हरकत हिंदुस्तान टाइम्स ने भी की है। HT मीडिया ने अपनी रिपोर्ट के शुरुआती पैराग्राफ में आरोपितों के नाम का कहीं भी जिक्र नहीं किया है। लेकिन इसी रिपोर्ट की शुरुआत में ही जोर-शोर से दीपावली का जिक्र किया गया है। बाद में इस रिपोर्ट में एक अलग सेक्शन बना कर आरोपितों के नाम खोले गए हैं। 

                                                      साभार- Hindustan Times

क्या है घटनाक्रम

यह घटना तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई के अमिनजीकराई थानाक्षेत्र की है। यहाँ मेहता नगर में 35 वर्षीय मोहम्मद निशाद और उनकी 30 साल की पत्नी नासिया ने 15 साल की नाबालिग लड़की को नौकरानी बना कर रखा था। निशाद और नासिया आए दिन लड़की को मारते-पीटते थे। कई बार उसे ये दोनों सिगरेट और गर्म तवे से जला चुके थे। मृतका के गले पर एक निशान भी मिला है, जिससे लगता है कि उसका गला घोंटा गया था।
नाबालिग लड़की मूलतः तंजावुर की रहने वाली है। उसके पिता की मौत हो चुकी है। वह अपनी विधवा माँ की मदद घरों में काम कर के कर रही थी। 31 अक्टूबर को भी नसिया और मोहम्मद निशाद ने नाबालिग को पीटा था। पिटाई से लड़की की मौत हो गई। दोनों ने लड़की के शव को बाथरूम में बंद कर दिया और फिर एक दोस्त के घर भाग गए।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतका को प्रताड़ित किए जाने का खुलासा हुआ है। नासिया और मोहम्मद निशाद की गिरफ्तारी के साथ पुलिस ने 4 अन्य लोगों को भी हिरासत में ले कर पूछताछ की है। इन चारों में एक भाई-बहन हैं, जिन्होंने पीड़िता को मोहम्मद निशाद के घर पर काम करने के लिए रखवाया था। इसके अलावा 2 अन्य वो पति-पत्नी हैं जिनके घर मोहम्मद निशाद और नासिया भागकर गए थे। आरोपितों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं के साथ पॉक्सो एक्ट में कार्रवाई की गई है।

‘माफीनामे से भर दो अख़बार का पहला पन्ना’: ‘इंडियन एक्सप्रेस’, TOI और भास्कर को हाईकोर्ट की फटकार, अल्पसंख्यक संस्थानों को लेकर की थी गलत रिपोर्टिंग

                                                                गुजरात हाई कोर्ट
गुजरात हाई कोर्ट ने सोमवार (2 सितंबर 2024) तीन अखबारों टाइम्स ऑफ इंडिया (टीओआई), इंडियन एक्सप्रेस और दिव्य भास्कर के माफीनामे को खारिज कर दिया। ये माफीनामा कोर्ट की कार्यवाही की गलत रिपोर्टिंग के लिए प्रकाशित किया गया था, जिसे छापने का आदेश गुजरात हाईकोर्ट ने दिया था। गुजरात हाई कोर्ट ने कहा कि ये माफीनामे काफी अस्पष्ट और छोटे थे। ऐसे में 3 दिन के समय में फिर से माफीनामे छापे जाएँ, वो भी सही हेडलाइन और बड़े अक्षरों में, पहले पूरे पन्ने पर। इस दौरान उस पन्ने पर कोई खबर नहीं होनी चाहिए।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, गुजरात हाई कोर्ट की चीफ जस्टिस सुनीता अग्रवाल और जस्टिस प्रणव त्रिपेदी की बेंच ने ये आदेश दिया। दरअसल, गुजरात हाई कोर्ट मे 22 अगस्त को आदेश दिया था कि टाइम्स ऑफ इंडिया (टीओआई), इंडियन एक्सप्रेस और दिव्य भास्कर अगले ही दिन यानी 23 अगस्त को माफीनामा प्रकाशित करें। तीनों अखबारों ने ऐसा किया भी, लेकिन बहुत छोटी सी जगह पर माफीनामा प्रकाशित कर दिया। इसके बाद हाई कोर्ट में एफिडेविट फाइल कर दिया गया।

                                        TOI और इंडियन एक्सप्रेस द्वारा प्रकाशित माफ़ीनामा

इस मामले में सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट की चीफ जस्टिस सुनीता अग्रवाल ने वकील से साफ तौर पर पूछा, “आपने इन माफीनामों को मोटे अक्षरों में क्यों नहीं प्रकाशित किया।” इस पर वकील ने कहा कि ऐसा ही किया गया है। लेकिन चीफ जस्टिस ने साफ कहा कि ये पर्याप्त नहीं है। इसे कोई नहीं पढ़ सकता। इसके बाद चीफ जस्टिस ने कहा, “आपको पूरी हेडलाइन देनी चाहिए थी कि माफी किस संबंध में है। कौन समझेगा कि माफी किस बात के लिए है… आपको कहना चाहिए कि गलत रिपोर्ट के लिए माफी। यह बात सामने आनी चाहिए। माफी के साथ रिपोर्ट भी होनी चाहिए।” साथ ही कोर्ट ने इन माफीनामों को रिजेक्ट कर दिया और तीनों अखबारों को नए सिरे से माफीनामा प्रकाशित करने के लिए 3 दिन का समय दिया।

सोमवार (2 सितंबर 2024) को हाई कोर्ट ने निर्देश दिया, “हम उन्हें तीन दिन का अतिरिक्त समय देते हैं कि वे अपने द्वारा प्रकाशित समाचार पत्रों के प्रथम पृष्ठ पर मोटे अक्षरों में सार्वजनिक रूप से माफी मांगें, जिससे आम जनता को स्पष्ट रूप से सूचित किया जा सके कि इस मामले की सुनवाई के बारे में 13 अगस्त, 2024 को प्रकाशित समाचार पत्रों में उनके द्वारा की गई गलत रिपोर्टिंग के बारे में जानकारी दी गई है।” बता दें कि हाई कोर्ट ने 13 अगस्त 2024 को टाइम्स ऑफ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस और दिव्य भास्कर के संपादकों को नोटिस जारी कर उनसे सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक संस्थानों के अधिकारों से संबंधित मामले में कोर्ट की कार्यवाही का “झूठा और अधूरी जानकारी” देने के लिए सफाई माँगी थी।

चीफ जस्टिस ने कहा, “यह कोई मज़ाक नहीं है। आप कोर्ट की प्रतिष्ठा के साथ खेल रहे हैं, आप कोर्ट की कार्यवाही के साथ खेल रहे हैं। आप ऐसा नहीं कर सकते। समाचार पत्रों में कोर्ट की कार्यवाही की रिपोर्टिंग जिस तरह से की जा रही है, उस पर हमें कड़ी आपत्ति है।”

वकील द्वारा न्यायालय से ताजा माफीनामा प्रकाशित करने के लिए एक और अवसर देने के अनुरोध पर, मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि ताजा माफीनामा समाचार के साथ बड़े आकार में, मोटे अक्षरों में होना चाहिए तथा उसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख होना चाहिए कि माफीनामा संपादकों द्वारा पेश किया जा रहा है। इसके बाद कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि अगली बार माफीनामा मुख्य पन्ने पर और बड़ी जगह पर प्रकाशित होनी चाहिए। यही नहीं, इस माफीनामे के अलावा पन्ने पर कुछ और नहीं होना चाहिए।

दिव्य भास्कर की ओर से पेश हुए वकील ने सफाई दी थी कि रिपोर्टर बार और बेंच के बीच के संवाद को गलत समझ लिया होगा। इस पर कोर्ट ने कहा कि रिपोर्टर कोई आम आदमी नहीं है। अगर उन्हें इतनी भी समझ नहीं है, तो उन्हें कोर्ट की रिपोर्टिंग करने से रोका जाए, यानी उनकी रिपोर्टिंग पर बैन लगाई जानी। इस दौरान कोर्ट ने पूछा कि कोर्ट का समय जितना लगा है, उसकी भरपाई कौन करेगा, इसके बाद वकील ने कोर्ट से माफी माँगी और कोर्ट के निर्देशों को पूरा करने पर सहमति जताई। इस मामले में सीनियर वकील देवांग नानवती इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स ऑफ इंडिया की ओर से पेश हुए, तो वकील एसपी मजूमदार इंडियन एक्सप्रेस की ओर से और गरिमा मल्होत्रा ​​टाइम्स ऑफ इंडिया की ओर से पेश हुए। वहीं, दिव्य भास्कर की ओर से वकील मौलिक जी नानावटी पेश हुए।

वाह Times of India इमराना का घाव दिखा, उसकी देश में आग लगाने की मानसिकता नहीं; अगर मुज़फ्फरनगर दंगे की सही रिपोर्टिंग की होती, तब घाव नहीं, दोषी दिखाई देती

                 जावेद को इमराना बेगम ने दिया था टाइम बम का ऑर्डर, हिन्दुओं से लेना चाहती थी बदला
मुजफ्फरनगर में बैठकर टाइम बोतल बम बनाने वाले जावेद की गिरफ्तारी के बाद पुलिस को जिस इमराना की तलाश थी, वो इमराना उत्तर प्रदेश एसटीएफ द्वारा पकड़ ली गई है। शनिवार (17 फरवरी 2024) की शाम को पुलिस ने उसे उसके घर से गिरफ्तार किया और अब उससे पूछताछ जारी है। एसटीएफ के बाद दिल्ली की आईबी की टीम भी इमराना से पूछताछ करेगी।

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, अभी तक की पड़ताल में सामने आया है कि इमराना 15 साल पहले तक भट्टी पर मजदूरी का काम करती थी आज उसके पास कई मकान और प्लाट हैं। साथ ही वो महंगी गाड़ियों में भी घूमती है।

पुलिस एक ओर पता लगा रही है कि उसके पास इतना पैसा कहाँ से आया। वहीं दूसरी ओर ये ज्ञात हुआ है कि उसने बम इसलिए बनवाए थे कि ताकि जब लोकसभा चुनाव से पहले सीएए लागू करने की घोषणा हो, तब वह उन बमों का इस्तेमाल कर सके। बताया जा रहा है कि इमराना ने ऐसा ऑर्डर दिल्ली के किसी शख्स के कहने पर दिया था। ये शख्स कौन है इसके बारे में आगे जानकारी आएगी।

उत्तर प्रदेश पुलिस की एसटीएफ इमराना की गिरफ्तारी के बाद अब उसके नेटवर्क के बारे में सूचना जुटा रही है। पता लगाया जा रहा है कि इमराना के पीछे किन संगठनों का हाथ है, उनकी मंशा क्या है। इसके अलावा ये भी मालूम हुआ है कि इमराना और जावेद एक दूसरे के संपर्क में कैसे आए।

लोग उसे इमराना बाबा के नाम से भी जानते थे क्योंकि वो काला जादू वगैरह का काम भी करती थी। जावेद की गिरफ्तारी के बाद से ही एसटीएफ और पुलिस इमराना की तलाश कर रही थी। उसके बारे में पता चला है कि शामली जिले की रहने वाली है, लेकिन मुजफ्फरनगर के मुस्लिम बहुल खालापार इलाके में रहती थी। जावेद की गिरफ्तारी के बाद जब जाँच एजेंसी ने उसके घर रेड मारी थी, तो वो पहले ही फरार हो गई थी।

अब इमराना की बेटी रूकसार ने बताया कि उन्होंने अपनी अम्मी को पुलिस को सौंप दिया है। वहीं पुलिस ने कहा कि बताया कि इमराना से गहनता के साथ पूछताछ की जाएगी। इसके बाद ही कुछ कहा जा सकेगा। जावेद ने इसी इमराना के कहने पर टाइम बोतल बम तैयार किए थे। इन बमों को बनाने के लिए उसने गन पाउडर-999, लोहे की छोटी गोलियाँ, रुई, पीओपी आदि का इस्तेमाल किया। उसने डॉक्टरों से ग्लूकोज की बोतलें और साइकिल की दुकानों से आयरन की गोलियाँ और घड़ी की दुकानों से घड़ी की मशीनें खरीदी थीं।

भारत की मीडिया की एक विशेषता है, जब भी किसी आतंकी के बारे में कुछ खबर आती है तो उसके ‘मानवीय पक्ष’ को ज़रूर खँगाला जाता है। बड़े से बड़े आतंकवादी को व्हाइटवॉश करने की कला भारत की मीडिया के पास है। ‘The Quint’ के लिए अलकायदा का संस्थापक ओसामा बिन लादेन ‘एक अच्छा पिता और पति’ बन जाता है, तो वहीं बरखा दत्त के लिए कश्मीर के आतंकी बुरहान वानी ‘प्रधानाध्यापक का बेटा’ हो जाता है। हर आतंकी के इस पक्ष को बेचने की कला भारत की मीडिया के पास है।

जिस मुज़फ्फरनगर दंगे ने इमराना को घाव दिया, Times of India ने अगर उस दंगे की निष्पक्ष रिपोर्टिंग की होती, तब शायद ToI को पता लगता कि दंगा भी करो और निर्दोष बनते फिरो, खाला जी का बाड़ा नहीं। ये victim card का धंधा पुराना हो गया है, भारत ही नहीं अब विश्व भी, विशेषकर मुस्लिम देश, इन दंगाइयों की मानसिकता समझ चुका है। उस समय एक हिन्दी पाक्षिक को सम्पादित करते देखिए(पृष्ठ) क्या प्रकाशित किया था। 

उत्तर प्रदेश में होते दंगों की होती जाँच पर मुख्यमंत्री योगी से मुज़फ्फरनगर दंगे की फाइल खोलने पर लेखों में लिखा। किसके इशारे पर हुआ था मुज़फ्फरनगर दंगा? कहाँ से आयी थी AK47, पिस्तौल, छुरे-चाकू, गरारियाँ? किसने धार्मिक स्थलों में असला जमा किया था और किसके कहने पर? तब किसी बीजेपी की नहीं बल्कि अखिलेश यादव की सरकार थी। लेकिन सरकार आज़म खान के इशारे पर चलती थी। मौका है इमराना केस के चलते योगी सरकार उस फाइल को खोल दे। आज़म खान की मुश्किलों तो बढ़ेंगी ही, लेकिन अखिलेश यादव भी बच नहीं पाएंगे। मुलायम सिंह परिवार अपनी सुरक्षित सीटों से जीत पायेगा, कहना मुश्किल है। 

उस दंगे में मुलायम सिंह ने किस मुस्लिम पुलिस अधिकारी की पीठ थप-थपाई थी और क्यों? इस बात का उल्लेख "मुज़फ्फरनगर दंगा-एक सच" चर्चा में मुस्लिम नेता शाहबुद्दीन गौरी ने अपने भाषण में किया था। जो शब्द उस मुस्लिम अधिकारी ने बोले थे, अगर किसी हिन्दू पुलिस कर्मी ने ही बोल दिए होते, Times of India जैसे कितने मीडिया उस हिन्दू पुलिस कर्मी को निलंबित करवा दिए होते। आज जितने भी मीडिया आज हिन्दुत्व के पक्ष में बोल रहे है, किसी ने उस दंगे की सच्चाई सामने लाने का साहस नहीं किया? आज तो बड़े आराम और मजे कह दिया जाता है गोदी-मीडिया, उस समय किसी ने नहीं कहा मुलायम/कांग्रेस मीडिया।    

वैसे ये ट्रेंड नया नहीं है। जैसा हमने फिल्मों में देखा है कि कैसे कोई पुलिस अधिकारी किसी बड़े आतंकी के पीछे लगा रहता है, आतंकी एक के बाद एक वारदातों को अंजाम देता चला जाता है, फिर उसके इतिहास को सामने लाया जाता है कि आखिर वो आतंकी कैसे बना, इसके लिए सरकार या हिन्दू समाज को दोषी ठहरा दिया जाता है और उन्हें पश्चाताप से भरने की कोशिश की जाती है, फिर वो पुलिस अधिकारी भी ये कहानी सुन कर रोता है – इस तरह आतंकी के व्हाइटवॉश की प्रक्रिया पूरी होती है।

ताज़ा मामला उत्तर प्रदेश का है और इस बार किसी आतंकी के ‘दर्द’ को दिखाने का बीड़ा देश के सबसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में से एक ‘टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI)’ ने उठाया है। हुआ यूँ कि मुजफ्फरनगर पुलिस ने इमराना बेगम नाम की एक 60 वर्षीय महिला को गिरफ्तार किया। गिरफ़्तारी का कारण – वो पूरे शहर को दहलाना चाहती थी और इसके लिए उसने जावेद नामक एक शख्स के पास कई टाइम बम भी रखे हुए थे। उसने बड़ी मात्रा में टाइम बम का ऑर्डर दिया था। आइए, बताते हैं कि मामला क्या है।

मुजफ्फरनगर: इमराना बेगम ने ऑर्डर किया टाइम बम

इमराना बेगम को रविवार (18 फरवरी, 2024) को गिरफ्तार किया गया था। इमराना बेगम शामली की रहने वाली है। उसने जावेद नामक शख्स को टाइम बम बनाने का टास्क दिया था। जावेद ने यूट्यूब पर वीडियो देख-देख कर टाइम बम बनाना सीखा और फिर उसने कई बम बना डाले। बम के साथ टाइमर भी उसने बनाया था। लेकिन, गुरुवार (15 फरवरी, 2024) को मजफ्फरनगर की काली नदी के पास से उत्तर प्रदेश STF (स्पेशल टास्क फ़ोर्स) को उसे दबोचने में कामयाबी मिली।
जावेद इमराना के किसी परिचित का बेटा था और इमराना को पता था कि वो विस्फोटक बना सकता है। जावेद पहले भी ये काम कर चुका था। इमराना का कहना है वो भविष्य में अगर कोई दंगा हो तो अपनी सुरक्षा के लिए ये सब कर रही थी। IED बनाने के लिए उसने जावेद को 10,000 रुपए एडवांस में दिए थे। डिलीवरी के समय 40,000 रुपए और भुगतान करने का वादा किया गया था। हालाँकि, डिलीवरी के दौरान ही वो पकड़ा गया।
इमराना बेगम को IPC की धारा 286 और विस्फोटक अधिनियम की धारा 4/5 के तहत जेल भेज दिया गया है। आगे की पूछताछ के लिए उसे पुलिस की हिरासत में लिया जाएगा। क्योंकि, टाइम बम बनाने के पीछे क्या मकसद था इस संबंध में उसने जो कुछ भी बताया है उसकी पुष्टि करनी आवश्यक है। जावेद और उसका बेटा जरीफ पटाखा बनाने का काम करते थे। उसने 10 बम का ऑर्डर दिया था, लेकिन 5 ही बन सके थे। एक दशक पहले भी इमराना ने बम बनाने का ऑर्डर दिया था।

TOI को दिखा इमराना का ‘घाव’
                                                      TOI को दिखा इमराना का ‘घाव’

अब इस घटना पर ‘टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI)’ की खबर का शीर्षक देखिए, ‘2013 के दंगों से आहत 60 वर्षीय महिला ने टाइम बम का ऑर्डर दिया, गिरफ्तार’। TOI ने अपने शीर्षक में ये बताना ज़रूरी समझा कि उक्त महिला ‘घाव से पीड़ित’ है और वो ‘घाव’ है 2013 के दंगों का। महिला का कहना है कि उन दंगों में उसका घर जला दिया गया था और इसीलिए वो अपनी सुरक्षा के लिए ये बम बनवा रही थी। जबकि मीडिया रिपोर्ट्स में ये भी बताया गया है कि वो हिन्दुओं से बदला लेना चाहती थी।
जावेद के कुछ रिश्तेदार नेपाल में भी रहते हैं, ऐसे में आतंकनिरोधी दस्ता (ATS) भी इस मामले की जाँच कर रहा है। इसके तार कहाँ से जुड़ेंगे, अभी जाँच में सामने आएगा। लेकिन, मीडिया एक बार फिर से अपने धंधे की विशेषता दिखाने में लग गया है। कहने का तात्पर्य ये है – ‘हिन्दुओं ने महिला का घर जलाया, इसीलिए पीड़ित महिला अपनी सुरक्षा के लिए टाइम बम बनवा रही थी।’ क्या टाइम बम आत्मरक्षा का हथियार है? IED जैसे खतरनाक विस्फोटक का आत्मरक्षा के लिए इस्तेमाल किए जाने का कोई उदाहरण है अपने पास?
खासकर के इस खतरनाक विस्फोटक का इस्तेमाल कर के 10 टाइम बम बनाने का ऑर्डर देना, ये तो कहीं से भी आत्मरक्षा के लिए किया गया काम नहीं लगता। जाँच में चीजें सामने आएँगी, लेकिन अभी तो ऐसा ही लगता है कि इमराना बेगम हिन्दुओं से बदला लेना चाहती थी, खुन्नस पाले बैठी थी। हल्द्वानी में हमने देखा कि कैसे मुस्लिमों के छतों से पत्थर चले, पत्थरबाजों में बच्चों से लेकर महिलाएँ तक शामिल थीं। जाँच तो इसकी भी होनी चाहिए कि मुजफ्फरनगर दंगों में इमराना बेगम की क्या भूमिका थी, कहीं उसका घर लॉन्चपैड तो नहीं था?

मुजफ्फरनगर दंगों में क्या हुआ था

अगस्त-सितंबर 2013 में हुए मुजफ्फरनगर के दंगों से उत्तर प्रदेश में हालात ऐसे बिगड़े थे कि भारतीय सेना को तैनात करना पड़ा था। तब राज्य में अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे, समाजवादी पार्टी की सरकार थी। इस घटना में अधिकतर जाट हिन्दू समाज के लोग ही पीड़ित थे। कवाल गाँव में मुस्लिमों द्वारा जाट लड़कियों से छेड़खानी के बाद ही ये मामला शुरू हुआ था। ममेरे भाइयों सचिन और गौरव की हत्या के साथ दंगे भड़के थे, इसमें हिन्दू समाज का क्या दोष था?
क्या आपको पता है कि जहाँ सचिन के शरीर पर पोस्टमॉर्टम के दौरान 17 और गौरव के शरीर पर 15 गहरे घाव मिले थे? उनकी हत्या निर्मम तरीके से की गई थी। गोली या धारदार हथियारों का इस्तेमाल नहीं किया गया था, बल्कि लाठी-डंडों से पीटा गया था, सिर और मुँह को पत्थरों से कुचला गया था और सरिये से मार-मार कर मौत के घाट उतार दिया गया था। जाहिर है, फिर दो पक्ष दंगों में भिड़ते हैं तो क्षति हर तरफ से होती है। मुजफ्फरनगर हो, मेवात हो, या हल्द्वानी हो – हर जगह हमने इस्लामी भीड़ को समान पैटर्न पर काम करते देखा है।
90 के दशक में कश्मीरी पंडितों के साथ जो हुआ, उसके बाद उनमें से एक भी आतंकी क्यों नहीं बना? उनकी महिलाओं से बलात्कार हुआ, निर्मम हत्याएँ हुईं और पलायन के बाद वो अपने ही देश में शरणार्थी बन गए, लेकिन उनके पास से टाइम बम क्यों नहीं मिलते? मीडिया आखिर हर आतंकी, पत्थरबाज, बमबाज या अपराधी को व्हाइटवॉश करने के लिए कहानियाँ लेकर क्यों आता है? क्या इसका मकसद होता है कि लोगों में उसके प्रति सहानुभूति पैदा की जाए।

दूसरे मजहबों पर Times of India ने बनाया ऐसा कार्टून तो जीवन से हो जाएँगे ‘आज़ाद’: उज्जैन में रेप पर हिन्दू घृणा वाला प्रोपेगंडा, मदरसों में यौन शोषण पर कभी बनाया मस्जिद को निशाना?

रेप के बाद सड़क पर भटकती रही बच्ची (बाएँ/प्रतीकात्मक चित्र साभार: Bing AI), TOI का हिन्दू विरोधी कार्टून (दाएँ, फोटो साभार: X/CartoonistSan)
उज्जैन का जो वीडियो सामने आया है और जिस प्रकार उस बच्ची को अपने अंगों को ढककर इतने किलोमीटर चलना पड़ा, उससे हर कोई स्तब्ध है। हर कोई जैसे प्रश्न पूछ रहा है कि आखिर यह क्या था और यह क्यों है? इस मामले में जो सबसे अधिक सीमा पार की है, वह की है कथित सेक्युलर लोगों ने, क्योंकि एक तो नगरी है महाकाल की उज्जैन और दूसरा वहाँ पर भाजपा की सरकार है। जहाँ पर भारतीय जनता पार्टी की सरकार होती है, वहाँ के अपराधों पर शोर और गैर-भाजपा सरकारों के यहाँ हो रहे अपराधों पर चुप्पी इनकी विशेषता होती है।

हाल ही में केरल में एक नहीं बल्कि 2 बच्चियों के साथ बलात्कार की घटना हुई। एक की हत्या कर दी गई मगर एक बच गई। फिर भी मीडिया में इन घटनाओं की चर्चा नहीं है और दोनों ही घटनाओं में आरोपित पहले भी अपराधों के कारण जेल जा चुके थे। फिर भी मीडिया में इन मामलों को लेकर शोर नहीं होता। शोर केवल तभी होता है जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार वाला राज्य हो। जैसे ही इस घटना का वीडियो वायरल हुआ, उसके बाद ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के कार्टूनिस्ट ने हिन्दुओं को लेकर एक निहायत ही अपमानजनक कार्टून पोस्ट किया।

इसमें हिन्दुओं को गौमाता की पूजा करते हुए और बच्ची को एक तरफ जाते हुए दिखाया गया था। ऐसा दिखाया था जैसे कि हिन्दुओं की पूजा के कारण ही इस बच्ची के साथ यह हुआ हो। इस कार्टून के बाद लोगों ने प्रश्न किया कि पहले जाँच तो लेते? यह कार्टून पूरी तरह से हिन्दुओं के प्रति घृणा से भरा कार्टून था। मगर इससे क्या फर्क पड़ता है! क्या उज्जैन में केवल हिन्दू ही रहते हैं? या फिर महाकाल की नगरी होने के कारण ऐसा किया गया?

खैर, यह कथित सेक्युलर कलाकारों की चाल होती है। सभी को कठुआ वाला मामला याद होगा, जिसमें कला का प्रयोग बच्ची को न्याय दिलाने के स्थान पर महादेव के विकृत चित्र साझा करने आरम्भ कर दिए गए थे। यह भी देखा जाना चाहिए कि जो शोर मचा रहे हैं क्या वह वास्तव में न्याय के लिए है या फिर राजनीतिक अकाउंट सेटल करने के लिए? राजस्थान में एक बच्ची को भट्ठी में मारकर डाल दिया गया था, परन्तु न्याय के लिए शोर मचाने वाले लोग उधर नहीं पहुँचे थे।

मदरसों में यौन शोषण के इतने मामले आते हैं, मगर क्या कभी किसी कार्टूनिस्ट ने या किसी कलाकार ने मस्जिद को निशाना बनाया? क्या उनके मजहबी यकीनों पर कार्टून बनाए? नहीं बनाए! और न ही बनाएँगे! क्योंकि हिन्दू धर्म के अतिरिक्त किसी और धार्मिक मत पर कुछ कहने का, अपमान करने का परिणाम उन्हें पता है। उन्हें पता है कि जिस अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात वह दिनभर करते हुए हिन्दू धर्म को कोसते हैं, उसे यदि किसी और मत के लिए प्रयोग कर लिया तो वह जीवन से ही कहीं आजाद न हो जाएँ।

क्रान्ति का अर्थ केवल हिन्दू धर्म को कोसा जाना न हो कर रह जाए, यह सुनिश्चित करना होगा और हिन्दू धर्म से घृणा करने वाले लोग अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी केवल हिन्दुओं तक ही सीमित न करें, यह आवाज बार-बार उठानी होगी।