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मुस्लिम कट्टरपंथियों का दोगलापन : नीतीश पर सियापा, शामली पर सन्नाटा क्यों?

बुर्का/हिजाब विवाद मेरे हिसाब से कई दशक पुराना है। Organiser Weekly के तत्कालीन संपादक प्रो वी पी भाटिया अपना बहुचर्चित स्तम्भ Cabbages & Kings में पता नहीं कितनी बार लिखा कि "burqa is not islamic culture......even attractive and charming boys were asked to go in purdah..." लेकिन कभी किसी ने इसका खंडन नहीं किया। प्रो भाटिया के इस स्तम्भ को लगभग हर शिक्षित मुस्लिम बड़े शौक से पढ़ता था। टीवी परिचर्चाओं में मुस्लिम महिलाओं द्वारा मौलानाओं से यही सवाल पूछने पर बगलें झांकते नज़र आते हैं।    
अगर बुर्का Islamic Culture है तो चीन में दाढ़ी और रोज़ा रखने तक पर पाबन्दी है। किसी भी कट्टरपंथी संस्था ने चीन दूतावास पर धरना या प्रदर्शन करने की हिम्मत की? इतना ही नहीं अब तो विदेशों में बैन लगना शुरू होने पर किसी की आवाज़ नहीं निकल रही। भारत में इसलिए सियापा करते है कि इन कट्टरपंथियों के आगे पाखंडी सेक्युलरिस्ट्स घुटने टेक चुके हैं।   
भारत में बुर्के और हिजाब को लेकर छिड़ी ताजा बहस ने एक बार फिर समाज के दोहरेपन को उजागर कर दिया है। एक तरफ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा एक महिला डॉक्टर का हिजाब हटाने पर बवाल मचा है, जहाँ पाकिस्तानी डॉन से लेकर देश के तमाम इस्लामी संगठन इसे ‘सम्मान’ की लड़ाई बताकर धमकी दे रहे हैं। लेकिन विडंबना देखिए, ठीक इसी समय उत्तर प्रदेश के शामली से एक रूहँकपा देने वाली खबर आती है, जहाँ एक शौहर ने अपनी बीवी और दो मासूम बच्चों को सिर्फ इसलिए मार डाला क्योंकि महिला बिना बुर्के के अपने मायके चली गई थी।

हैरानी की बात यह है कि नीतीश कुमार के मुद्दे पर आसमान सिर पर उठाने वाले कट्टरपंथी और ‘नारीवादी’ सुर, शामली की उस बेगुनाह माँ और बच्चों की मौत पर पूरी तरह खामोश हैं। यह दोहरा रवैया साफ करता है कि इस देश में मुस्लिम महिलाओं के ‘अधिकार’ क्या होंगे, यह वो खुद नहीं बल्कि कट्टरपंथी जमात तय करती है। जहाँ ईरान जैसे देशों में महिलाएँ हिजाब की बंदिशों से आजादी के लिए जान दे रही हैं, वहीं भारत में बेंगलुरु से लेकर पटना तक, उसी हिजाब को ‘अनिवार्यता’ बनाने के लिए छात्राओं को मोहरा बनाकर सड़कों पर उतारा जा रहा है।

चुनिंदा नारीवाद: जब ‘एजेंडा’ देखकर बदल जाती है संवेदना

भारत में बुर्का विवाद पर होने वाली चर्चा अक्सर ‘सुविधाजनक राजनीति’ की भेंट चढ़ जाती है। यहाँ खुद को नारीवादी (Feminist) और उदारवादी कहने वाले लोगों का एक ऐसा वर्ग है, जिसका रुख घटना के पात्रों को देखकर बदल जाता है। जब नीतीश कुमार जैसे नेता किसी महिला का हिजाब खींचते हैं, तो यही लोग इसे ‘अस्मिता’ और ‘सम्मान’ की लड़ाई बना देते हैं। बॉलीवुड हस्तियाँ वीडियो जारी कर इसे इस्लाम का अपमान बताती हैं और मुख्यमंत्री से इस्तीफे की माँग करती हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश के शामली जैसे मामले में ये ‘प्रगतिशील’ स्वर अचानक खामोश हो जाते हैं।

यह मौन बहुत खतरनाक है। यह दर्शाता है कि इन लोगों के लिए ‘महिला अधिकार’ केवल एक राजनीतिक हथियार है। जब कट्टरपंथ की वजह से किसी मुस्लिम महिला की जान जाती है, तो ये लोग इसे ‘मजहबी मामला’ कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं, लेकिन जब किसी गैर-मुस्लिम नेता से गलती होती है, तो इसे ‘सांप्रदायिक एजेंडा’ बना दिया जाता है। शामली की घटना, जहाँ शौहर फारुख ने अपनी बीवी ताहिरा और दो मासूम बेटियों की हत्या कर उन्हें सेफ्टी टैंक में दबा दिया क्योंकि बीवी बुर्का नहीं पहनी थी।

इसके साथ ही, बुर्के की आड़ में कट्टरपंथी सोच एक ऐसा समाज रच रही है जहाँ महिलाओं की पहचान केवल उनके पहनावे तक सीमित कर दी गई है। कट्टरपंथी तत्व बुर्के को ‘सुरक्षा’ का नाम देते हैं, लेकिन हकीकत में यह नियंत्रण का एक माध्यम है। बुर्के की आड़ में कई बार ऐसी आपराधिक घटनाओं को अंजाम दिया जाता है जहाँ अपराधी की पहचान करना नामुमकिन हो जाता है। चाहे वह मतदान केंद्रों पर फर्जी वोटिंग की कोशिश हो या संदिग्ध गतिविधियों में शामिल होना, बुर्का एक सुरक्षा कवच के बजाय एक ढाल की तरह इस्तेमाल होने लगा है। जब तक समाज इस कट्टरपंथी सोच और नारीवाद के दोहरे मापदंडों को नहीं पहचानेगा, तब तक नुसरत परवीन जैसी महिलाएँ राजनीति का मोहरा बनती रहेंगी और शामली जैसी महिलाएँ कट्टरपंथ की भेंट चढ़ती रहेंगी।

दुनिया में क्यों बढ़ रही है बुर्का बैन की माँग?

 दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बुर्का और नकाब को लेकर बहस तेज होती जा रही है। भारत में इसे कई बार महिला अधिकार और पसंद से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन कई विकसित देशों में इसे बिल्कुल अलग नजरिए से देखा जा रहा है। वहाँ बुर्का को महिलाओं पर दबाव का प्रतीक और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा माना जा रहा है। यही वजह है कि यूरोप और अन्य देशों में बुर्का बैन की माँग लगातार बढ़ रही है।

यूरोप में बुर्का पर रोक की लहर- यूरोप के कई देशों ने बीते कुछ सालों में बुर्का और नकाब पर सख्त कदम उठाए हैं। हाल ही में स्वीडन की उप प्रधानमंत्री एब्बा बुश ने सार्वजनिक जगहों पर बुर्का और नकाब पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की बात कही। उन्होंने साफ कहा कि यह महिलाओं के लिए एक तरह का उत्पीड़न है, जिसे सहन नहीं किया जाना चाहिए।

फ्रांस 2011 में ऐसा पहला देश बना, जिसने सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा ढकने वाले कपड़ों पर पूरी तरह रोक लगा दी। इसके बाद बेल्जियम, ऑस्ट्रिया, डेनमार्क और नीदरलैंड जैसे देशों ने भी इसी तरह के कानून बनाए। इन देशों का कहना है कि खुले समाज में लोगों को एक-दूसरे को पहचानने का अधिकार होना चाहिए।

बुर्का बैन के पीछे सबसे बड़ा कारण सुरक्षा को बताया गया। यूरोपीय देशों की सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि चेहरा ढकने से किसी व्यक्ति की पहचान करना मुश्किल हो जाता है। इससे अपराध और आतंकी गतिविधियों को छिपने का मौका मिल सकता है।

इसी वजह से चीन के शिंजियांग प्रांत और श्रीलंका जैसे देशों ने भी बम धमाकों और आतंकी हमलों के बाद सार्वजनिक जगहों पर लंबी दाढ़ी और बुर्का पहनने पर पाबंदी लगाई। सरकारों का कहना है कि सुरक्षा के मामले में कोई समझौता नहीं किया जा सकता।

यूरोप में बुर्का को केवल सुरक्षा का मुद्दा नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे लैंगिक असमानता से भी जोड़ा जा रहा है। कई देशों का तर्क है कि बुर्का महिलाओं को समाज से अलग-थलग कर देता है और उन्हें मुख्यधारा से दूर कर देता है।

यूरोपीय नेताओं का कहना है कि अगर कोई महिला समाज का हिस्सा बनना चाहती है, तो उसे पूरी तरह ढका हुआ नहीं रहना चाहिए। उनके अनुसार, चेहरा छिपाने से संवाद, पढ़ाई, नौकरी और सामाजिक मेल-जोल में रुकावट आती है।

पुर्तगाल की संसद ने हाल ही में बुर्का बैन से जुड़े एक बिल को मंजूरी दी है। इस कानून के तहत सार्वजनिक स्थानों पर नकाब पहनने पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है। दूसरे यूरोपीय देशों में भी इसी तरह के नियम लागू हैं, जहाँ बार-बार नियम तोड़ने पर जुर्माने के साथ सजा का प्रावधान है। इन देशों का साफ कहना है कि मजहब निजी मामला है, लेकिन सार्वजनिक जगहों पर नियम सभी के लिए एक जैसे होने चाहिए।

ऑस्ट्रेलिया में भी सांसद पॉलिन हैनसन संसद में बुर्का पहनकर पहुँचीं, ताकि यह दिखा सकें कि चेहरा ढककर किसी सार्वजनिक जगह पर जाना सुरक्षा के लिए कितना जोखिम भरा हो सकता है। उनका कहना है कि अगर आम लोग चेहरा ढककर हर जगह जा सकते हैं, तो सुरक्षा व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है। इस कदम पर उनकी आलोचना भी हुई, लेकिन मुद्दे को लेकर बहस भी हुई।

पश्चिमी देशों का मानना है कि खुले और आधुनिक समाज में पहचान छिपाने की परंपरा को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता। उनके लिए यह सिर्फ कपड़ों का मुद्दा नहीं, बल्कि समानता, सुरक्षा और सामाजिक मेल-जोल से जुड़ा सवाल है। यही वजह है कि दुनिया के कई हिस्सों में बुर्का बैन की माँग लगातार तेज होती जा रही है।

क्या वाकई इस्लाम में बुर्का या हिजाब अनिवार्य है?

बुर्का या हिजाब को लेकर दुनिया दो धड़ों में बँटी हुई है। कट्टरपंथी सोच इसे इस्लाम का अभिन्न हिस्सा और महिलाओं के लिए ‘अनिवार्य’ (Mandatory) बताती है, लेकिन यदि गहराई से कुरान और इस्लामी सामग्रियों का लिखित विश्लेषण करेंगे, तो तस्वीर कुछ अलग नजर आती है।

कुरान इस्लाम की बेवसाइट के ट्रू इस्लाम में जानकारी दी गई है। इसका टाइटल ‘बुर्का- इस्लामी या सांस्कृतिक?’। कुरान में ‘हिजाब’ शब्द का जिक्र सात बार आया है। लेकिन इसका इस्तेमाल महिलाओं के पहनावे या ड्रेस कोड के संदर्भ में नहीं किया गया है। वहाँ हिजाब का अर्थ एक ‘पर्दा’ या ‘अवरोध’ (Barrier) है, जो दो चीजों के बीच अलगाव पैदा करता है। कुरान की आयत 24:31 और 33:59 शालीनता (Modesty) की बात करती हैं। आयत 24:31 महिलाओं को अपना ‘सीना’ (जयब) ढकने का निर्देश देती है, न कि चेहरे या बालों को पूरी तरह ढँकने का।

                                      बुर्का-हिजाब पर कुरान व इस्लामी इतिहास क्या कहता है?

इस्लामी विद्वानों का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि चेहरे को पूरी तरह ढकना (नकाब या बुर्का) एक मजहबी उर्फ यानि सांस्कृतिक परंपरा है, जो समय के साथ मजहबी रंग में रंग गई। यदि चेहरा ढकना अनिवार्य होता, तो कुरान की वह आयत बेमानी हो जाती जो पुरुषों को अपनी निगाहें नीची रखने और महिलाओं की ‘सुंदरता’ से आकर्षित न होने की सलाह देती है।

चेहरा ढका होने पर सुंदरता और आकर्षण का सवाल ही पैदा नहीं होता। आज के दौर में सऊदी अरब जैसे देशों में भी ‘अबाया’ (ढीला वस्त्र) अनिवार्य नहीं रहा, जबकि तालिबान शासित अफगानिस्तान में बुर्का न पहनना मौत को दावत देने जैसा है। यह विरोधाभास साबित करता है कि बुर्का पहनना मजहब से ज्यादा उस देश की सत्ता और वहां के कट्टरपंथियों की सनक पर निर्भर करता है।

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में संविधान हर नागरिक को अपनी पसंद के कपड़े पहनने और धर्म का पालन करने की आजादी देता है, लेकिन जब यह ‘पसंद’ दबाव में बदल जाती है, तो वह शोषण बन जाती है।

मजहब, अधिकार और असुरक्षा की त्रिवेणी

नीतीश कुमार का मामला हो या शामली का हत्याकांड, केंद्र में ‘बुर्का’ ही है। समस्या बुर्के के कपड़े में नहीं, बल्कि उसे पहनने या न पहनने के पीछे छिपे ‘दबाव’ में है। यदि कोई महिला अपनी स्वेच्छा से इसे पहनती है, तो वह उसका अधिकार है, लेकिन यदि इसे न पहनने पर उसे नौकरी छोड़ने पर मजबूर किया जाए या उसकी जान ले ली जाए, तो यह मजहब नहीं, बल्कि अपराध है।

भारत में इस मुद्दे पर हो रही चर्चा में सबसे बड़ी कमी ‘ईमानदारी’ की है। हम एक तरफ तो आधुनिक भारत का सपना देखते हैं, लेकिन दूसरी तरफ सात साल की बच्चियों को बुर्के में लपेटकर उनकी मानसिक आजादी को कुचलने वाली सोच पर चुप रहते हैं। पाकिस्तान के डॉन द्वारा दी गई धमकी यह बताती है कि यह मुद्दा केवल आस्था का नहीं बल्कि वर्चस्व का है। यदि हम दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना चाहते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि किसी भी महिला की पहचान उसकी योग्यता और उसके चेहरे से होनी चाहिए, न कि उस कपड़े के टुकड़े से जो उसे समाज से अलग करता है। अंततः, आजादी केवल कपड़े पहनने की नहीं, बल्कि बिना डरे जीने की होनी चाहिए।

शास्त्री जी के बाद मोदी ने डाला पाकिस्तानी sleeper cells पर जाल ; कैराना का नोमान इलाही निकला ISI का जासूस, 4 बार जा चुका पाकिस्तान: ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को दे रहा था अहम सूचनाएँ

                                  पाकिस्तानी जासूस नोमान (फोटो साभार - अमर उजाला)
जिस तरह 1965 इंडो-पाक के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री सरकार भारत में बैठे पाकिस्तानी sleeper cells को पकड़ रही थी ठीक शास्त्री जी के मार्ग पर मोदी सरकार चल रही है। देश में बैठे ये स्लीपर सेल आतंकवादियों और घुसपैठियों से ज्यादा खतरनाक हैं। अगर ताशकंत से शास्त्री जी का मृतक शरीर की बजाए जीवित आ गए होते देश के कई धुरन्धर जेलों में होते। देश की स्थिति आज जैसी नहीं होती। शायद उनकी रहस्यमयी मौत का यही कारण हो। यह देश का दुर्भाग्य है कि अपनी कुर्सी की खातिर छद्दम देशप्रेमी नेता और उनकी पार्टियां घुसपैठियों और 
sleeper cells को संरक्षण दे रही है। और जनता ऐसे लोगो को अपना नेता मानती है।   

उत्तर प्रदेश के शामली जिले के कैराना से एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जहाँ बेगमपुरा मोहल्ले का नोमान इलाही पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के लिए जासूसी करते पकड़ा गया। नोमान पहले बेरोजगार था और अपने अब्बू के साथ पासपोर्ट और दस्तावेज बनवाने का काम करता था। अब्बू की मौत के बाद उसने यह धंधा संभाला, लेकिन लालच में आकर ISI के जासूसी नेटवर्क से जुड़ गया।

जाँच एजेंसियों के अनुसार, नोमान पासपोर्ट सेवा केंद्र की आड़ में उन लोगों के दस्तावेज तैयार करता था, जो सऊदी अरब, पाकिस्तान या अन्य देशों में जाने की योजना बनाते थे। नोमान के घर से आठ संदिग्ध पासपोर्ट बरामद हुए हैं।

पासपोर्ट सेवा केंद्र से जुड़कर दस्तावेजों को बनवाने के दौरान ही नोमान ISI एजेंट इकबाल काना के संपर्क में आया और देश की गोपनीय जानकारी पाकिस्तान भेजने लगा। नोमान चार बार पाकिस्तान जा चुका है, जहाँ उसने ISI हैंडलरों से मुलाकात की। उसकी बुआ और मौसी पाकिस्तान में रहती हैं, जिसका बहाना बनाकर वह वहाँ जाता रहा। हाल ही में हरियाणा पुलिस ने उसे पानीपत से गिरफ्तार किया, जहाँ वह चार महीने से अपनी बहन के घर रहकर फैक्ट्री में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी कर रहा था।

पूछताछ में नोमान ने खुलासा किया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ISI सक्रिय थी और वह भारतीय सेना की गतिविधियों की जानकारी मोबाइल और सोशल मीडिया के जरिए भेजता था। उसके घर से आठ संदिग्ध पासपोर्ट बरामद हुए हैं। जाँच में पता चला कि वह जन सुविधा केंद्र के जरिए फर्जी दस्तावेज भी बनवाता था। उसकी गिरफ्तारी के बाद जाँच यूपी, हरियाणा, दिल्ली, देहरादून और पानीपत तक फैल गई है।

जाँच एजेंसियों का मानना है कि यह अकेले नोमान का मामला नहीं, बल्कि एक बड़ा जासूसी नेटवर्क है, जिसमें कैराना, शामली और अन्य क्षेत्रों के युवक शामिल हो सकते हैं। यह नेटवर्क फेरीवालों, प्राइवेट नौकरी करने वालों और दस्तावेज सेवाओं से जुड़े लोगों के जरिए चल रहा है। नोमान को यूपी पुलिस को सौंप दिया गया है और उसके सभी संपर्कों की जाँच जारी है।

वाह Times of India इमराना का घाव दिखा, उसकी देश में आग लगाने की मानसिकता नहीं; अगर मुज़फ्फरनगर दंगे की सही रिपोर्टिंग की होती, तब घाव नहीं, दोषी दिखाई देती

                 जावेद को इमराना बेगम ने दिया था टाइम बम का ऑर्डर, हिन्दुओं से लेना चाहती थी बदला
मुजफ्फरनगर में बैठकर टाइम बोतल बम बनाने वाले जावेद की गिरफ्तारी के बाद पुलिस को जिस इमराना की तलाश थी, वो इमराना उत्तर प्रदेश एसटीएफ द्वारा पकड़ ली गई है। शनिवार (17 फरवरी 2024) की शाम को पुलिस ने उसे उसके घर से गिरफ्तार किया और अब उससे पूछताछ जारी है। एसटीएफ के बाद दिल्ली की आईबी की टीम भी इमराना से पूछताछ करेगी।

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, अभी तक की पड़ताल में सामने आया है कि इमराना 15 साल पहले तक भट्टी पर मजदूरी का काम करती थी आज उसके पास कई मकान और प्लाट हैं। साथ ही वो महंगी गाड़ियों में भी घूमती है।

पुलिस एक ओर पता लगा रही है कि उसके पास इतना पैसा कहाँ से आया। वहीं दूसरी ओर ये ज्ञात हुआ है कि उसने बम इसलिए बनवाए थे कि ताकि जब लोकसभा चुनाव से पहले सीएए लागू करने की घोषणा हो, तब वह उन बमों का इस्तेमाल कर सके। बताया जा रहा है कि इमराना ने ऐसा ऑर्डर दिल्ली के किसी शख्स के कहने पर दिया था। ये शख्स कौन है इसके बारे में आगे जानकारी आएगी।

उत्तर प्रदेश पुलिस की एसटीएफ इमराना की गिरफ्तारी के बाद अब उसके नेटवर्क के बारे में सूचना जुटा रही है। पता लगाया जा रहा है कि इमराना के पीछे किन संगठनों का हाथ है, उनकी मंशा क्या है। इसके अलावा ये भी मालूम हुआ है कि इमराना और जावेद एक दूसरे के संपर्क में कैसे आए।

लोग उसे इमराना बाबा के नाम से भी जानते थे क्योंकि वो काला जादू वगैरह का काम भी करती थी। जावेद की गिरफ्तारी के बाद से ही एसटीएफ और पुलिस इमराना की तलाश कर रही थी। उसके बारे में पता चला है कि शामली जिले की रहने वाली है, लेकिन मुजफ्फरनगर के मुस्लिम बहुल खालापार इलाके में रहती थी। जावेद की गिरफ्तारी के बाद जब जाँच एजेंसी ने उसके घर रेड मारी थी, तो वो पहले ही फरार हो गई थी।

अब इमराना की बेटी रूकसार ने बताया कि उन्होंने अपनी अम्मी को पुलिस को सौंप दिया है। वहीं पुलिस ने कहा कि बताया कि इमराना से गहनता के साथ पूछताछ की जाएगी। इसके बाद ही कुछ कहा जा सकेगा। जावेद ने इसी इमराना के कहने पर टाइम बोतल बम तैयार किए थे। इन बमों को बनाने के लिए उसने गन पाउडर-999, लोहे की छोटी गोलियाँ, रुई, पीओपी आदि का इस्तेमाल किया। उसने डॉक्टरों से ग्लूकोज की बोतलें और साइकिल की दुकानों से आयरन की गोलियाँ और घड़ी की दुकानों से घड़ी की मशीनें खरीदी थीं।

भारत की मीडिया की एक विशेषता है, जब भी किसी आतंकी के बारे में कुछ खबर आती है तो उसके ‘मानवीय पक्ष’ को ज़रूर खँगाला जाता है। बड़े से बड़े आतंकवादी को व्हाइटवॉश करने की कला भारत की मीडिया के पास है। ‘The Quint’ के लिए अलकायदा का संस्थापक ओसामा बिन लादेन ‘एक अच्छा पिता और पति’ बन जाता है, तो वहीं बरखा दत्त के लिए कश्मीर के आतंकी बुरहान वानी ‘प्रधानाध्यापक का बेटा’ हो जाता है। हर आतंकी के इस पक्ष को बेचने की कला भारत की मीडिया के पास है।

जिस मुज़फ्फरनगर दंगे ने इमराना को घाव दिया, Times of India ने अगर उस दंगे की निष्पक्ष रिपोर्टिंग की होती, तब शायद ToI को पता लगता कि दंगा भी करो और निर्दोष बनते फिरो, खाला जी का बाड़ा नहीं। ये victim card का धंधा पुराना हो गया है, भारत ही नहीं अब विश्व भी, विशेषकर मुस्लिम देश, इन दंगाइयों की मानसिकता समझ चुका है। उस समय एक हिन्दी पाक्षिक को सम्पादित करते देखिए(पृष्ठ) क्या प्रकाशित किया था। 

उत्तर प्रदेश में होते दंगों की होती जाँच पर मुख्यमंत्री योगी से मुज़फ्फरनगर दंगे की फाइल खोलने पर लेखों में लिखा। किसके इशारे पर हुआ था मुज़फ्फरनगर दंगा? कहाँ से आयी थी AK47, पिस्तौल, छुरे-चाकू, गरारियाँ? किसने धार्मिक स्थलों में असला जमा किया था और किसके कहने पर? तब किसी बीजेपी की नहीं बल्कि अखिलेश यादव की सरकार थी। लेकिन सरकार आज़म खान के इशारे पर चलती थी। मौका है इमराना केस के चलते योगी सरकार उस फाइल को खोल दे। आज़म खान की मुश्किलों तो बढ़ेंगी ही, लेकिन अखिलेश यादव भी बच नहीं पाएंगे। मुलायम सिंह परिवार अपनी सुरक्षित सीटों से जीत पायेगा, कहना मुश्किल है। 

उस दंगे में मुलायम सिंह ने किस मुस्लिम पुलिस अधिकारी की पीठ थप-थपाई थी और क्यों? इस बात का उल्लेख "मुज़फ्फरनगर दंगा-एक सच" चर्चा में मुस्लिम नेता शाहबुद्दीन गौरी ने अपने भाषण में किया था। जो शब्द उस मुस्लिम अधिकारी ने बोले थे, अगर किसी हिन्दू पुलिस कर्मी ने ही बोल दिए होते, Times of India जैसे कितने मीडिया उस हिन्दू पुलिस कर्मी को निलंबित करवा दिए होते। आज जितने भी मीडिया आज हिन्दुत्व के पक्ष में बोल रहे है, किसी ने उस दंगे की सच्चाई सामने लाने का साहस नहीं किया? आज तो बड़े आराम और मजे कह दिया जाता है गोदी-मीडिया, उस समय किसी ने नहीं कहा मुलायम/कांग्रेस मीडिया।    

वैसे ये ट्रेंड नया नहीं है। जैसा हमने फिल्मों में देखा है कि कैसे कोई पुलिस अधिकारी किसी बड़े आतंकी के पीछे लगा रहता है, आतंकी एक के बाद एक वारदातों को अंजाम देता चला जाता है, फिर उसके इतिहास को सामने लाया जाता है कि आखिर वो आतंकी कैसे बना, इसके लिए सरकार या हिन्दू समाज को दोषी ठहरा दिया जाता है और उन्हें पश्चाताप से भरने की कोशिश की जाती है, फिर वो पुलिस अधिकारी भी ये कहानी सुन कर रोता है – इस तरह आतंकी के व्हाइटवॉश की प्रक्रिया पूरी होती है।

ताज़ा मामला उत्तर प्रदेश का है और इस बार किसी आतंकी के ‘दर्द’ को दिखाने का बीड़ा देश के सबसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में से एक ‘टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI)’ ने उठाया है। हुआ यूँ कि मुजफ्फरनगर पुलिस ने इमराना बेगम नाम की एक 60 वर्षीय महिला को गिरफ्तार किया। गिरफ़्तारी का कारण – वो पूरे शहर को दहलाना चाहती थी और इसके लिए उसने जावेद नामक एक शख्स के पास कई टाइम बम भी रखे हुए थे। उसने बड़ी मात्रा में टाइम बम का ऑर्डर दिया था। आइए, बताते हैं कि मामला क्या है।

मुजफ्फरनगर: इमराना बेगम ने ऑर्डर किया टाइम बम

इमराना बेगम को रविवार (18 फरवरी, 2024) को गिरफ्तार किया गया था। इमराना बेगम शामली की रहने वाली है। उसने जावेद नामक शख्स को टाइम बम बनाने का टास्क दिया था। जावेद ने यूट्यूब पर वीडियो देख-देख कर टाइम बम बनाना सीखा और फिर उसने कई बम बना डाले। बम के साथ टाइमर भी उसने बनाया था। लेकिन, गुरुवार (15 फरवरी, 2024) को मजफ्फरनगर की काली नदी के पास से उत्तर प्रदेश STF (स्पेशल टास्क फ़ोर्स) को उसे दबोचने में कामयाबी मिली।
जावेद इमराना के किसी परिचित का बेटा था और इमराना को पता था कि वो विस्फोटक बना सकता है। जावेद पहले भी ये काम कर चुका था। इमराना का कहना है वो भविष्य में अगर कोई दंगा हो तो अपनी सुरक्षा के लिए ये सब कर रही थी। IED बनाने के लिए उसने जावेद को 10,000 रुपए एडवांस में दिए थे। डिलीवरी के समय 40,000 रुपए और भुगतान करने का वादा किया गया था। हालाँकि, डिलीवरी के दौरान ही वो पकड़ा गया।
इमराना बेगम को IPC की धारा 286 और विस्फोटक अधिनियम की धारा 4/5 के तहत जेल भेज दिया गया है। आगे की पूछताछ के लिए उसे पुलिस की हिरासत में लिया जाएगा। क्योंकि, टाइम बम बनाने के पीछे क्या मकसद था इस संबंध में उसने जो कुछ भी बताया है उसकी पुष्टि करनी आवश्यक है। जावेद और उसका बेटा जरीफ पटाखा बनाने का काम करते थे। उसने 10 बम का ऑर्डर दिया था, लेकिन 5 ही बन सके थे। एक दशक पहले भी इमराना ने बम बनाने का ऑर्डर दिया था।

TOI को दिखा इमराना का ‘घाव’
                                                      TOI को दिखा इमराना का ‘घाव’

अब इस घटना पर ‘टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI)’ की खबर का शीर्षक देखिए, ‘2013 के दंगों से आहत 60 वर्षीय महिला ने टाइम बम का ऑर्डर दिया, गिरफ्तार’। TOI ने अपने शीर्षक में ये बताना ज़रूरी समझा कि उक्त महिला ‘घाव से पीड़ित’ है और वो ‘घाव’ है 2013 के दंगों का। महिला का कहना है कि उन दंगों में उसका घर जला दिया गया था और इसीलिए वो अपनी सुरक्षा के लिए ये बम बनवा रही थी। जबकि मीडिया रिपोर्ट्स में ये भी बताया गया है कि वो हिन्दुओं से बदला लेना चाहती थी।
जावेद के कुछ रिश्तेदार नेपाल में भी रहते हैं, ऐसे में आतंकनिरोधी दस्ता (ATS) भी इस मामले की जाँच कर रहा है। इसके तार कहाँ से जुड़ेंगे, अभी जाँच में सामने आएगा। लेकिन, मीडिया एक बार फिर से अपने धंधे की विशेषता दिखाने में लग गया है। कहने का तात्पर्य ये है – ‘हिन्दुओं ने महिला का घर जलाया, इसीलिए पीड़ित महिला अपनी सुरक्षा के लिए टाइम बम बनवा रही थी।’ क्या टाइम बम आत्मरक्षा का हथियार है? IED जैसे खतरनाक विस्फोटक का आत्मरक्षा के लिए इस्तेमाल किए जाने का कोई उदाहरण है अपने पास?
खासकर के इस खतरनाक विस्फोटक का इस्तेमाल कर के 10 टाइम बम बनाने का ऑर्डर देना, ये तो कहीं से भी आत्मरक्षा के लिए किया गया काम नहीं लगता। जाँच में चीजें सामने आएँगी, लेकिन अभी तो ऐसा ही लगता है कि इमराना बेगम हिन्दुओं से बदला लेना चाहती थी, खुन्नस पाले बैठी थी। हल्द्वानी में हमने देखा कि कैसे मुस्लिमों के छतों से पत्थर चले, पत्थरबाजों में बच्चों से लेकर महिलाएँ तक शामिल थीं। जाँच तो इसकी भी होनी चाहिए कि मुजफ्फरनगर दंगों में इमराना बेगम की क्या भूमिका थी, कहीं उसका घर लॉन्चपैड तो नहीं था?

मुजफ्फरनगर दंगों में क्या हुआ था

अगस्त-सितंबर 2013 में हुए मुजफ्फरनगर के दंगों से उत्तर प्रदेश में हालात ऐसे बिगड़े थे कि भारतीय सेना को तैनात करना पड़ा था। तब राज्य में अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे, समाजवादी पार्टी की सरकार थी। इस घटना में अधिकतर जाट हिन्दू समाज के लोग ही पीड़ित थे। कवाल गाँव में मुस्लिमों द्वारा जाट लड़कियों से छेड़खानी के बाद ही ये मामला शुरू हुआ था। ममेरे भाइयों सचिन और गौरव की हत्या के साथ दंगे भड़के थे, इसमें हिन्दू समाज का क्या दोष था?
क्या आपको पता है कि जहाँ सचिन के शरीर पर पोस्टमॉर्टम के दौरान 17 और गौरव के शरीर पर 15 गहरे घाव मिले थे? उनकी हत्या निर्मम तरीके से की गई थी। गोली या धारदार हथियारों का इस्तेमाल नहीं किया गया था, बल्कि लाठी-डंडों से पीटा गया था, सिर और मुँह को पत्थरों से कुचला गया था और सरिये से मार-मार कर मौत के घाट उतार दिया गया था। जाहिर है, फिर दो पक्ष दंगों में भिड़ते हैं तो क्षति हर तरफ से होती है। मुजफ्फरनगर हो, मेवात हो, या हल्द्वानी हो – हर जगह हमने इस्लामी भीड़ को समान पैटर्न पर काम करते देखा है।
90 के दशक में कश्मीरी पंडितों के साथ जो हुआ, उसके बाद उनमें से एक भी आतंकी क्यों नहीं बना? उनकी महिलाओं से बलात्कार हुआ, निर्मम हत्याएँ हुईं और पलायन के बाद वो अपने ही देश में शरणार्थी बन गए, लेकिन उनके पास से टाइम बम क्यों नहीं मिलते? मीडिया आखिर हर आतंकी, पत्थरबाज, बमबाज या अपराधी को व्हाइटवॉश करने के लिए कहानियाँ लेकर क्यों आता है? क्या इसका मकसद होता है कि लोगों में उसके प्रति सहानुभूति पैदा की जाए।