RJ सायमा ने कहा इस्लाम में मर्जी चलती जबरदस्ती नहीं (साभार : X_@_sayema & Chatgpt) इस्लाम में इंसान की मर्जी की महत्वता है, जबरदस्ती की कोई जगह नहीं- मजहब की ये परिभाषा हाल में आरजे सायमा ने दी है। उन्होंने बड़ी चालाकी से हिजाब-बुर्का मुद्दे पर इस्लाम को डिफेंड किया है कि दुनियाभर में घटना कोई भी हो जाए, लेकिन बात मजहब की आलोचना पर न आए।
Islam is based on consent, not coercion. No one can forcibly make someone do anything! It’s, totally, the person’s choice. The choice to wear a hijab or not to wear one. And not just a hijab. Anything. No one is authorised to force them into wearing or removing. Period.
ये तरीका ऑस्ट्रेलिया आतंकी हमले के समय अरफा खानम शेरवानी ने भी अपनाया था। हालाँकि, उनकी स्ट्रैटेजी चली नहीं और उनके अपने ही समुदाय के लोग उनपर सवाल खड़ा करने लगे। सायमा के साथ भी यही हुआ है लेकिन वो आँख मूंदकर रखेंगी क्योंकि उन्हें नैरेटिव ये बनाना है कि जो लोग हिजाब पहनने को मजबूर कर रहे हैं वो अच्छे से इस्लाम को नहीं जानते।
दिलचस्प बात है कि सायमा जैसे बुद्धिजीवियों की हिजाब पर राय मौका, घटना और स्थान देखकर बदलती रहती है। जैसे भारत की बात आती है तो ये हिजाब पहनने को सीधा मजहबी अधिकार से जोड़ती हैं, शैक्षणिक संस्थानों में उसे पहने जाने की पैरवी करती हैं और किसी बाहर मुल्क में ये मुद्दा बनता है तो नारीवादी पक्ष निकल आता है, तब ये क्रांतिकारी भी बनती हैं, हिजाब को च्वाइस भी बताती हैं और इस्लाम को डिफेंड करने का लिबरल वर्जन भी खोजती हैं।
मगर, अफसोस उनका ये वर्जन जमीनी हकीकत और मीडिया में मौजूद तमाम उदाहरणों से बिलकुल निकलता है। बहुत पीछे जाने की जरूरत नहीं है। 2025 के दिसंबर माह में ही यूपी के शामली में एक मुस्लिम व्यक्ति ने अपनी बीवी और दो नाबालिग बेटियों की हत्या कर दी। कारण? तीनों बिना बुर्का पहने घर से बाहर निकल गई थीं। 2021 में असम से खबर आई थी एक महिला को दुकान से सिर्फ इसलिए बाहर निकाल दिया गया क्योंकि उसने जींस पहनी थी, बुर्का नहीं। 2022 में कर्नाटक से रिपोर्ट आई थी कि एक संगठित समूह मुस्लिम महिलाओं पर नजर रखने के लिए बनाया गया था, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी महिला सार्वजनिक स्थानों पर बिना हिजाब या बुर्का के न दिखें।
यह सब भारत की घटनाएँ हैं, किसी दूर-दराज के कट्टर इस्लामिक देश की नहीं। क्या इन पर कभी सायमा कि कोई प्रतिक्रिया या विरोध देखने को मिला? क्या ऐसी खबरों को सुनने के बाद कभी आरजे सायमा ये कहने गईं कि इस्लाम में तो मर्जी चलती है, जबरदस्ती नहीं।
इसी तरह विदेशों में महिलाओं के साथ हिजाब न पहनने पर क्या हुआ, इसके भी तमाम उदाहरण हैं। ईरान की महसा अमीनी याद है आपको? 22 साल की वह लड़की जिसे ‘ठीक से हिजाब न पहनने’ के आरोप में हिरासत में लिया गया और इतनी बेरहमी से पीटा गया कि उसकी मौत हो गई।
2014 में ईरान के इस्फाहान में महिलाओं पर तेजाब हमलों की घटनाएँ सामने आईं। जाँच में पता चला कि निशाना वे महिलाएँ थीं जो ‘ढंग से’ हिजाब या बुर्का नहीं पहन रही थीं। इसी तरह कनाडा की अक्सा परवेज, महज 16 साल की लड़की, जिसकी हत्या उसके अपने परिवार ने इसलिए कर दी क्योंकि वह खुद को ढककर बाहर नहीं जाती थी।
ये तो सिर्फ वे मामले हैं जो मीडिया में आ सके। कितनी घटनाएँ चार-दीवारी के भीतर दबा दी जाती होंगी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। आरजे सायमा क्या इन सभी मामलों में पीड़ित महिलाओं और बच्चियों को यह समझाने जाएँगी कि इस्लाम मर्जी का मजहब है, जबरदस्ती का नहीं? या फिर हमेशा की तरह यह कहकर पल्ला झाड़ लेंगी कि यह ‘असल इस्लाम’ नहीं है?
विडंबना यह है कि जिस इस्लाम की परिभाषा सायमा गढ़ती हैं, उसे बार-बार गलत उन्हीं लोगों ने साबित किया है जो इस मजहब को सबसे ज्यादा कट्टरता से मानते हैं। अगर आम लोगों को ‘नासमझ’ मान भी लिया जाए, तो उन मुल्ला-मौलानाओं की तकरीरों का क्या जवाब है, जिनकी बातें सुनकर समाज दिशा तय करता है?
खुले मंचों से बार-बार कहा जाता है कि कुरान में हिजाब का जिक्र है और लड़कियों को इसे पहनना ही चाहिए। कई बार तो ये भी बताया जाता है कि महिलाओं को आजादी देना ही गलत बात है। उनके स्कूल जाने से लेकर उनके खुले सर घूमने की चाह तक को इस्लाम के खिलाफ बता दिया जाता है। तब सवाल उठता है- क्या समस्या कुछ ‘भटके हुए लोगों’ की है, या फिर उस विचारधारा की, जिसे हर बार बचाने के लिए कभी आरफा को और कभी आरजे सायमा को नया नैरेटिव गढ़ना पड़ता है?
बुर्का/हिजाब विवाद मेरे हिसाब से कई दशक पुराना है। Organiser Weekly के तत्कालीन संपादक प्रो वी पी भाटिया अपना बहुचर्चित स्तम्भ Cabbages & Kings में पता नहीं कितनी बार लिखा कि "burqa is not islamic culture......even attractive and charming boys were asked to go in purdah..." लेकिन कभी किसी ने इसका खंडन नहीं किया। प्रो भाटिया के इस स्तम्भ को लगभग हर शिक्षित मुस्लिम बड़े शौक से पढ़ता था। टीवी परिचर्चाओं में मुस्लिम महिलाओं द्वारा मौलानाओं से यही सवाल पूछने पर बगलें झांकते नज़र आते हैं।
अगर बुर्का Islamic Culture है तो चीन में दाढ़ी और रोज़ा रखने तक पर पाबन्दी है। किसी भी कट्टरपंथी संस्था ने चीन दूतावास पर धरना या प्रदर्शन करने की हिम्मत की? इतना ही नहीं अब तो विदेशों में बैन लगना शुरू होने पर किसी की आवाज़ नहीं निकल रही। भारत में इसलिए सियापा करते है कि इन कट्टरपंथियों के आगे पाखंडी सेक्युलरिस्ट्स घुटने टेक चुके हैं। भारत में बुर्के और हिजाब को लेकर छिड़ी ताजा बहस ने एक बार फिर समाज के दोहरेपन को उजागर कर दिया है। एक तरफ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा एक महिला डॉक्टर का हिजाब हटाने पर बवाल मचा है, जहाँ पाकिस्तानी डॉन से लेकर देश के तमाम इस्लामी संगठन इसे ‘सम्मान’ की लड़ाई बताकर धमकी दे रहे हैं। लेकिन विडंबना देखिए, ठीक इसी समय उत्तर प्रदेश के शामली से एक रूहँकपा देने वाली खबर आती है, जहाँ एक शौहर ने अपनी बीवी और दो मासूम बच्चों को सिर्फ इसलिए मार डाला क्योंकि महिला बिना बुर्के के अपने मायके चली गई थी।
हैरानी की बात यह है कि नीतीश कुमार के मुद्दे पर आसमान सिर पर उठाने वाले कट्टरपंथी और ‘नारीवादी’ सुर, शामली की उस बेगुनाह माँ और बच्चों की मौत पर पूरी तरह खामोश हैं। यह दोहरा रवैया साफ करता है कि इस देश में मुस्लिम महिलाओं के ‘अधिकार’ क्या होंगे, यह वो खुद नहीं बल्कि कट्टरपंथी जमात तय करती है। जहाँ ईरान जैसे देशों में महिलाएँ हिजाब की बंदिशों से आजादी के लिए जान दे रही हैं, वहीं भारत में बेंगलुरु से लेकर पटना तक, उसी हिजाब को ‘अनिवार्यता’ बनाने के लिए छात्राओं को मोहरा बनाकर सड़कों पर उतारा जा रहा है।
चुनिंदा नारीवाद: जब ‘एजेंडा’ देखकर बदल जाती है संवेदना
भारत में बुर्का विवाद पर होने वाली चर्चा अक्सर ‘सुविधाजनक राजनीति’ की भेंट चढ़ जाती है। यहाँ खुद को नारीवादी (Feminist) और उदारवादी कहने वाले लोगों का एक ऐसा वर्ग है, जिसका रुख घटना के पात्रों को देखकर बदल जाता है। जब नीतीश कुमार जैसे नेता किसी महिला का हिजाब खींचते हैं, तो यही लोग इसे ‘अस्मिता’ और ‘सम्मान’ की लड़ाई बना देते हैं। बॉलीवुड हस्तियाँ वीडियो जारी कर इसे इस्लाम का अपमान बताती हैं और मुख्यमंत्री से इस्तीफे की माँग करती हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश के शामली जैसे मामले में ये ‘प्रगतिशील’ स्वर अचानक खामोश हो जाते हैं।
यह मौन बहुत खतरनाक है। यह दर्शाता है कि इन लोगों के लिए ‘महिला अधिकार’ केवल एक राजनीतिक हथियार है। जब कट्टरपंथ की वजह से किसी मुस्लिम महिला की जान जाती है, तो ये लोग इसे ‘मजहबी मामला’ कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं, लेकिन जब किसी गैर-मुस्लिम नेता से गलती होती है, तो इसे ‘सांप्रदायिक एजेंडा’ बना दिया जाता है। शामली की घटना, जहाँ शौहर फारुख ने अपनी बीवी ताहिरा और दो मासूम बेटियों की हत्या कर उन्हें सेफ्टी टैंक में दबा दिया क्योंकि बीवी बुर्का नहीं पहनी थी।
इसके साथ ही, बुर्के की आड़ में कट्टरपंथी सोच एक ऐसा समाज रच रही है जहाँ महिलाओं की पहचान केवल उनके पहनावे तक सीमित कर दी गई है। कट्टरपंथी तत्व बुर्के को ‘सुरक्षा’ का नाम देते हैं, लेकिन हकीकत में यह नियंत्रण का एक माध्यम है। बुर्के की आड़ में कई बार ऐसी आपराधिक घटनाओं को अंजाम दिया जाता है जहाँ अपराधी की पहचान करना नामुमकिन हो जाता है। चाहे वह मतदान केंद्रों पर फर्जी वोटिंग की कोशिश हो या संदिग्ध गतिविधियों में शामिल होना, बुर्का एक सुरक्षा कवच के बजाय एक ढाल की तरह इस्तेमाल होने लगा है। जब तक समाज इस कट्टरपंथी सोच और नारीवाद के दोहरे मापदंडों को नहीं पहचानेगा, तब तक नुसरत परवीन जैसी महिलाएँ राजनीति का मोहरा बनती रहेंगी और शामली जैसी महिलाएँ कट्टरपंथ की भेंट चढ़ती रहेंगी।
दुनिया में क्यों बढ़ रही है बुर्का बैन की माँग?
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बुर्का और नकाब को लेकर बहस तेज होती जा रही है। भारत में इसे कई बार महिला अधिकार और पसंद से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन कई विकसित देशों में इसे बिल्कुल अलग नजरिए से देखा जा रहा है। वहाँ बुर्का को महिलाओं पर दबाव का प्रतीक और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा माना जा रहा है। यही वजह है कि यूरोप और अन्य देशों में बुर्का बैन की माँग लगातार बढ़ रही है।
यूरोप में बुर्का पर रोक की लहर- यूरोप के कई देशों ने बीते कुछ सालों में बुर्का और नकाब पर सख्त कदम उठाए हैं। हाल ही में स्वीडन की उप प्रधानमंत्री एब्बा बुश ने सार्वजनिक जगहों पर बुर्का और नकाब पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की बात कही। उन्होंने साफ कहा कि यह महिलाओं के लिए एक तरह का उत्पीड़न है, जिसे सहन नहीं किया जाना चाहिए।
फ्रांस 2011 में ऐसा पहला देश बना, जिसने सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा ढकने वाले कपड़ों पर पूरी तरह रोक लगा दी। इसके बाद बेल्जियम, ऑस्ट्रिया, डेनमार्क और नीदरलैंड जैसे देशों ने भी इसी तरह के कानून बनाए। इन देशों का कहना है कि खुले समाज में लोगों को एक-दूसरे को पहचानने का अधिकार होना चाहिए।
बुर्का बैन के पीछे सबसे बड़ा कारण सुरक्षा को बताया गया। यूरोपीय देशों की सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि चेहरा ढकने से किसी व्यक्ति की पहचान करना मुश्किल हो जाता है। इससे अपराध और आतंकी गतिविधियों को छिपने का मौका मिल सकता है।
इसी वजह से चीन के शिंजियांग प्रांत और श्रीलंका जैसे देशों ने भी बम धमाकों और आतंकी हमलों के बाद सार्वजनिक जगहों पर लंबी दाढ़ी और बुर्का पहनने पर पाबंदी लगाई। सरकारों का कहना है कि सुरक्षा के मामले में कोई समझौता नहीं किया जा सकता।
यूरोप में बुर्का को केवल सुरक्षा का मुद्दा नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे लैंगिक असमानता से भी जोड़ा जा रहा है। कई देशों का तर्क है कि बुर्का महिलाओं को समाज से अलग-थलग कर देता है और उन्हें मुख्यधारा से दूर कर देता है।
यूरोपीय नेताओं का कहना है कि अगर कोई महिला समाज का हिस्सा बनना चाहती है, तो उसे पूरी तरह ढका हुआ नहीं रहना चाहिए। उनके अनुसार, चेहरा छिपाने से संवाद, पढ़ाई, नौकरी और सामाजिक मेल-जोल में रुकावट आती है।
पुर्तगाल की संसद ने हाल ही में बुर्का बैन से जुड़े एक बिल को मंजूरी दी है। इस कानून के तहत सार्वजनिक स्थानों पर नकाब पहनने पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है। दूसरे यूरोपीय देशों में भी इसी तरह के नियम लागू हैं, जहाँ बार-बार नियम तोड़ने पर जुर्माने के साथ सजा का प्रावधान है। इन देशों का साफ कहना है कि मजहब निजी मामला है, लेकिन सार्वजनिक जगहों पर नियम सभी के लिए एक जैसे होने चाहिए।
ऑस्ट्रेलिया में भी सांसद पॉलिन हैनसन संसद में बुर्का पहनकर पहुँचीं, ताकि यह दिखा सकें कि चेहरा ढककर किसी सार्वजनिक जगह पर जाना सुरक्षा के लिए कितना जोखिम भरा हो सकता है। उनका कहना है कि अगर आम लोग चेहरा ढककर हर जगह जा सकते हैं, तो सुरक्षा व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है। इस कदम पर उनकी आलोचना भी हुई, लेकिन मुद्दे को लेकर बहस भी हुई।
पश्चिमी देशों का मानना है कि खुले और आधुनिक समाज में पहचान छिपाने की परंपरा को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता। उनके लिए यह सिर्फ कपड़ों का मुद्दा नहीं, बल्कि समानता, सुरक्षा और सामाजिक मेल-जोल से जुड़ा सवाल है। यही वजह है कि दुनिया के कई हिस्सों में बुर्का बैन की माँग लगातार तेज होती जा रही है।
क्या वाकई इस्लाम में बुर्का या हिजाब अनिवार्य है?
बुर्का या हिजाब को लेकर दुनिया दो धड़ों में बँटी हुई है। कट्टरपंथी सोच इसे इस्लाम का अभिन्न हिस्सा और महिलाओं के लिए ‘अनिवार्य’ (Mandatory) बताती है, लेकिन यदि गहराई से कुरान और इस्लामी सामग्रियों का लिखित विश्लेषण करेंगे, तो तस्वीर कुछ अलग नजर आती है।
कुरान इस्लाम की बेवसाइट के ट्रू इस्लाम में जानकारी दी गई है। इसका टाइटल ‘बुर्का- इस्लामी या सांस्कृतिक?’। कुरान में ‘हिजाब’ शब्द का जिक्र सात बार आया है। लेकिन इसका इस्तेमाल महिलाओं के पहनावे या ड्रेस कोड के संदर्भ में नहीं किया गया है। वहाँ हिजाब का अर्थ एक ‘पर्दा’ या ‘अवरोध’ (Barrier) है, जो दो चीजों के बीच अलगाव पैदा करता है। कुरान की आयत 24:31 और 33:59 शालीनता (Modesty) की बात करती हैं। आयत 24:31 महिलाओं को अपना ‘सीना’ (जयब) ढकने का निर्देश देती है, न कि चेहरे या बालों को पूरी तरह ढँकने का।
बुर्का-हिजाब पर कुरान व इस्लामी इतिहास क्या कहता है?
इस्लामी विद्वानों का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि चेहरे को पूरी तरह ढकना (नकाब या बुर्का) एक मजहबी उर्फ यानि सांस्कृतिक परंपरा है, जो समय के साथ मजहबी रंग में रंग गई। यदि चेहरा ढकना अनिवार्य होता, तो कुरान की वह आयत बेमानी हो जाती जो पुरुषों को अपनी निगाहें नीची रखने और महिलाओं की ‘सुंदरता’ से आकर्षित न होने की सलाह देती है।
चेहरा ढका होने पर सुंदरता और आकर्षण का सवाल ही पैदा नहीं होता। आज के दौर में सऊदी अरब जैसे देशों में भी ‘अबाया’ (ढीला वस्त्र) अनिवार्य नहीं रहा, जबकि तालिबान शासित अफगानिस्तान में बुर्का न पहनना मौत को दावत देने जैसा है। यह विरोधाभास साबित करता है कि बुर्का पहनना मजहब से ज्यादा उस देश की सत्ता और वहां के कट्टरपंथियों की सनक पर निर्भर करता है।
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में संविधान हर नागरिक को अपनी पसंद के कपड़े पहनने और धर्म का पालन करने की आजादी देता है, लेकिन जब यह ‘पसंद’ दबाव में बदल जाती है, तो वह शोषण बन जाती है।
मजहब, अधिकार और असुरक्षा की त्रिवेणी
नीतीश कुमार का मामला हो या शामली का हत्याकांड, केंद्र में ‘बुर्का’ ही है। समस्या बुर्के के कपड़े में नहीं, बल्कि उसे पहनने या न पहनने के पीछे छिपे ‘दबाव’ में है। यदि कोई महिला अपनी स्वेच्छा से इसे पहनती है, तो वह उसका अधिकार है, लेकिन यदि इसे न पहनने पर उसे नौकरी छोड़ने पर मजबूर किया जाए या उसकी जान ले ली जाए, तो यह मजहब नहीं, बल्कि अपराध है।
भारत में इस मुद्दे पर हो रही चर्चा में सबसे बड़ी कमी ‘ईमानदारी’ की है। हम एक तरफ तो आधुनिक भारत का सपना देखते हैं, लेकिन दूसरी तरफ सात साल की बच्चियों को बुर्के में लपेटकर उनकी मानसिक आजादी को कुचलने वाली सोच पर चुप रहते हैं। पाकिस्तान के डॉन द्वारा दी गई धमकी यह बताती है कि यह मुद्दा केवल आस्था का नहीं बल्कि वर्चस्व का है। यदि हम दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना चाहते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि किसी भी महिला की पहचान उसकी योग्यता और उसके चेहरे से होनी चाहिए, न कि उस कपड़े के टुकड़े से जो उसे समाज से अलग करता है। अंततः, आजादी केवल कपड़े पहनने की नहीं, बल्कि बिना डरे जीने की होनी चाहिए।
कजाखस्तान में चेहरा ढकने पर रोक, सांस्कृतिक परंपरा को अपनाएगा देश (फोटो साभार: Caspian post) Organiser Weekly के संपादक प्रो वेद प्रकाश भाटिया(स्व) अपना बहुचर्चित कॉलम Cabbage & Kings लिखते जिसे विपक्षियों और मुस्लिमों द्वारा भी बहुत उत्सकता से पढ़ते थे। अपने इस कॉलम में लगभग हर सातवें/आठवें कॉलम में बुर्के के विरुद्ध लिखते थे कि "...burqa is not an islamic culture but during mughal rule but charming and attractive boys were asked to out in parda..." किसी भी मुस्लिम पाठक ने कभी इस बात का खंडन नहीं किया। लेकिन जिस तरह मुस्लिम देश बुर्का/हिजाब पर पाबन्दी लगा रहे हैं, भारत के इस्लाम और मुस्लिम देशों के इस्लाम पर सोंचने पर मजबूर करता है।
जिस तरह मुस्लिम मुल्कों में महिलाओं को छूट दी जा रही है विपरीत इसके भारत में मुस्लिम कट्टरपंथी मुसलमानों को रूढ़िवादी सोंच से बाहर क्यों नहीं आने दे रहे? जहां इस्लामिक देश अपनी महिलाओं को बुर्का/हिजाब से आजाद कर रहे है जबकि भारत में कट्टरपंथी बुर्का/हिजाब को लेकर उपद्रव करते रहते हैं।
मुस्लिम बहुल कजाखस्तान में चेहरा ढकने पर सरकार ने रोक लगा दी है। इस्लामी मुल्कों में औरतें अक्सर हिजाब/बुर्का से चेहरा ढकने का चलन रहा है। वैसे इस तरह की पाबंदी लगाने वाला कजाखस्तान पहला मुल्क नहीं है।
कजाखस्तान की आबादी करीब 2 करोड़ है, इनमें से 70 प्रतिशत लोग इस्लाम को मानने वाले हैं। चेहरा ढकने पर पाबंदी से जुड़े कानून पर राष्ट्रपति कासिम जोमार्ट टोकायेव ने 20 जून 2025 को हस्ताक्षर किए।
कानून के अनुसार, सार्वजनिक स्थान पर चेहरा ढकने पर पांबदी लगाई गई है। अब ऐसी किसी भी तरह के कपड़े नहीं पहने जाएँगे, जिससे चेहरे की पहचान नहीं की जा सके। हालाँकि, इसमें रियायत भी दी गई है। जहाँ मेडिकल कारणों और खराब मौसम में चेहरा ढकने पर रोक नहीं है। वहीं स्पोर्ट्स और सांस्कृतिक कार्यक्रम में पहने जाने वाले कपड़ों में चेहरा ढका जा सकता है।
कजाखस्तान ने चेहरा ढकने पर क्यों लगाई रोक ?
कजाखस्तान में अधिकतर मुस्लिम आबादी है, जो हिजाब पहनती है। खासकर महिलाएँ यहां चेहरा ढककर रहती हैं। लेकिन बावजूद इसके कजाखस्तान ने हिजाब और चेहरे ढकने वाले हर परिधान पर प्रतिबंध लगा दिया है। ऐसा इसीलिए क्योंकि कजाखस्तान अब अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाने में लगा है। देश अपनी संस्कृति को बढ़ावा देना चाहता है।
राष्ट्रपति टोकायेव ने भी कहा कि चेहरा ढकने पर प्रतिबंध लगाने से कजाखस्तान की असली सांस्कृतिक पहचान सामने आएगी। उन्होंने कहा, “चेहरा छुपाने वाले काले हिजाब पहनने के बजाय, देश के अपने परिधानों को महत्व दिया जाए। इससे देश अपनी खुद की संस्कृति को बढ़ावा देगा।”
स्कूल-कॉलेज में ‘हिजाब’ पर पहले ही बैन लगा चुका है कजाखस्तान
बता दें कि इससे पहले भी कजाखस्तान में हिजाब पर रोक लगाई जा चुकी है। लेकिन वह केवल स्कूल-कॉलेज में पढ़ रही छात्राओं के लिए प्रतिबंध लगाया गया था। साल 2023 में टोकायेव सरकार ने स्कूल-कॉलेज में हिजाब पहनने पर पाबंदी लगाई थी। इस पाबंदी का खूब विरोध किया गया था। यहाँ तक की इसके बाद 150 छात्राओं ने स्कूल आना बंद कर दिया था।
कजाखस्तान की 70 प्रतिशत आबादी मुस्लिम
कजाखस्तान में चेहरे ढकने पर प्रतिबंध खासकर मुस्लिम समुदाय को प्रभावित करेगा। मुस्लिम महिलाएँ हिजाब पहनती हैं, जिससे चेहरा ढका जाता है। ऐसे में प्रतिबंध का असर मुस्लिम आबादी पर अधिक पढ़ेगा। वैसे भी कजाखस्तान में कुल आबादी 2.03 करोड़ में से 70 प्रतिशत आबादी मुस्लिमों की है। बाकी दूसरे नंबर पर लोग ईसाई धर्म को मानते हैं।
कभी सोवियत संघ का हिस्सा था कजाखस्तान
कजाखस्तान एक समय पर सोवियत समाजवादी गणराज्यों का संघ (USSR) का हिस्सा रह चुका है। 1991 में कजाखस्तान इस संघ से अलग हुआ। संघ में रूस, यूक्रेन, बेलारूस, उज्बेकिस्तान समेत 16 देश शामिल थे। इन देशों में भी कुछ देशों ने हिजाब पर बैन लगाया है। ये सभी देश अपनी राष्ट्रीय परंपरा को बढ़ावा देने में लगे हुए हैं।
इन मुस्लिम देशों में भी हिजाब पर है प्रतिबंध
कजाखस्तान से पहले भी कई मुस्लिम देशों में हिजाब पर प्रतिबंध लगाया गया है। कई देशों में महिलाओं को आजादी से जीने के अधिकार के तौर पर, तो कहीं राष्ट्रीय पहचान का हवाला देते हुए हिजाब पर बैन लगाया है। इनमें अधिकतर सोवियत संघ से जुड़े देश शामिल हैं, जो अपनी संस्कृति को अपनाने में लगे हैं।
ताजिकिस्तान में 95 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम आबादी है। इसके बावजूद ताजिकिस्तान में साल 2024 में हिजाब को प्रतिबंधित करने के लिए कानून पास किया गया। इस कानून के तहत हिजाब पर बिक्री, उसे पहनना या उसे बढ़ावा देना भी अपराध होगा। कानून में हिजाब को ‘विदेशी संस्कृति’ भी बताया गया है। देश में हिजाब पहनने या बेचने पर 750 डॉलर (62,000 रूपए) से लेकर 3724 डॉलर (3.10 लाख रूपए) तक का जुर्माना लगाया गया है।
वहीं, कजाखस्तान के ही पड़ोसी मुल्क किर्गिस्तान में भी जनवरी 2025 में हिजाब या बुर्का पहनने पर पूरी तरह बैन लगा दिया है। देश ने निकाब को ‘समाज में एलियन’ का दर्जा दिया है। किर्गिस्तान में मुस्लिमों का कहना है कि इस नकाब से दुश्मनों को पहचान छिपाने में आसानी होती है।
इससे पहले सितंबर 2023 में इजिप्ट में स्कूल-कॉलेज में छात्राओं के निकाब पहनने पर रोक लगा दी थी। उज्बेकिस्तान में भी साल 2021 में स्कूल-कॉलेज में पढ़ने वाली छात्राओं को हिजाब पहनने से प्रतिबंधित कर दिया था।
मुस्लिम बहुल देशों के अलावा स्विट्जरलैंड, बेल्जियम, डेनमार्क, ऑस्ट्रिया, बुल्गेरिया, इटली, फ्रांस, रूस जैसे देशों में भी हिजाब पहनने और चेहरा ढकने पर पाबन्दी है।
प्रतीकात्मक चित्र दिल्ली हाईकोर्ट ने मुस्लिम महिला को बिना बुर्का पहनाए थाने ले जाने के मामले में दायर एक याचिका को खारिज कर दिया है। इस याचिका में किसी मुस्लिम महिला को बिना बुर्का के थाने ले जाने की कार्रवाई को संवेदनशील मामला बताते हुए पुलिस पर कार्रवाई के साथ भविष्य के लिए निर्देश देने की माँग की गई थी। याचिकाकर्ता रेशमा ने खुद को पर्दानशीं बताते हुए पुलिस पर खुद को बिना बुर्का के पकड़ कर ले जाने का आरोप लगाया था। मामला की सुनवाई शुक्रवार (1 मार्च 2024) को हुई।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यह मामला दिल्ली के थानाक्षेत्र चांदनी महल में पड़ने वाले रकाबगंज का है। यहाँ 2 लोगों ने खुद को पीड़ित बताते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई थी। शिकायत में उन्होंने 3 लोगों पर आरोप लगाया था। याचिकाकर्ता रेशमा इन तीनों आरोपितों की बहन हैं। बताया जा रहा है कि रेशमा ने बालकनी से सारा झगड़ा होते देखा था। दावा यह भी है कि जब रेशमा अपने भाइयों (जो मारपीट के आरोपित हैं) द्वारा 2 लोगों (जो मार खाए, पीड़ित हैं) को पीटते देख रही थीं, तब उन्होंने बुर्का नहीं पहना था।
रेशमा के वकील ने हाईकोर्ट में आरोप लगाया कि सुबह 3 बजे दिल्ली पुलिस उनकी मुवक्किल के घर में घुसी थी। याचिका में इस कार्रवाई के दौरान पुलिस पर अभद्रता करने के साथ रेशमा को घसीट कर थाने ले जाने की भी शिकायत की गई थी।
रेशमा का यह कहना था कि पुलिस पहले से जानती थी कि वह बुर्कानशीं महिला है लेकिन उन्हें पर्दा करने का भी टाइम नहीं दिया गया। याचिका में बुर्का को रेशमा ने अपनी व्यक्तिगत पसंद बताया था और पुलिस पर कार्रवाई की माँग की थी। इस दौरान भविष्य में भी पुलिस को बुर्का वाली महिलाओं के मामलों को संवेदनशील मान कर दिशा-निर्देश देने की माँग उठाई गई थी।
रेशमा के इन तमाम आरोपों पर पुलिस ने भी अपना पक्ष अदालत में रखा। तब पुलिस ने रेशमा द्वारा लगाए गए प्रताड़ना के तमाम आरोपों को गलत बताया था। पुलिस ने यह भी दावा किया था कि खुद रेशमा ने उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए बुलाया था। पुलिस के मुताबिक तब रेशमा को यह डर था कि कहीं वो लोग उन पर हमला न कर दें, जिन्हे रेशमा के 3 भाइयों ने मिल कर पीटा है। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं और उनके द्वारा पेश किए गए सबूतों पर गौर किया।
याचिका की सुनवाई के बाद दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांत शर्मा ने अपना फैसला सुनाया। जस्टिस शर्मा ने कहा कि पुलिस की जाँच में गोपनीयता जैसी बातों के लिए जगह नहीं हो सकती। अदालत ने सुरक्षा और न्याय को ही सबसे पहली प्राथमिकता बताते हुए कहा कि इन दोनों को सुनिश्चित करने के लिए पहचान आवश्यक होती है। अदालत ने कहा कि धार्मिक या व्यक्तिगत चॉइस के नाम पर प्राइवेसी का अधिकार मिल जाने से इसके दुरूपयोग की आशंका बढ़ेगी और जाँच में रुकावट खड़ी होगी।
अंत में अदालत ने रेशमा की याचिका ख़ारिज कर दी। रेशमा की तरफ से वकील एम सूफियान सिद्दीकी, आलिया, नियाजुद्दीन और राकेश भुंगरा ने बहस की जबकि दिल्ली पुलिस का पक्ष एडिशनल स्टैंडिंग काउंसिल रुपाली बंधोपाध्याय ने रखा था।
स्कूल में यूनिफॉर्म की जगह बुर्का-हिजाब? (प्रतीकात्मक तस्वीर) बिहार के शेखपुरा जिले के एक स्कूल में प्रधानाध्यापक को छात्राओं को हिजाब की जगह स्कूल ड्रेस में आने को कहना भारी पड़ गया। उनकी इस बात से नाराज मुस्लिम समुदाय के लोगों ने हिजाब न पहनने देने पर स्कूल में ही ताला लटकाने की धमकी दी। प्रधानाध्यापक को भी हत्या की धमकी दे डाली।
सरकार को छात्राओं की इस धमकी को गंभीरता लेना चाहिए। धमकी देने वाली छात्राओं को पुलिस हिरासत में लेकर, उन्हें उकसाने वाले कौन-कौन हैं? केवल बच्चा समझ कर हलके में लेकर नहीं छोड़ना चाहिए। इसके पीछे छुपे षड़यंत्र को बेनकाब करना होगा। दूसरे, BPL सुविधा लेने वालों के घर के बाहर BPLस्टीकर लगाने के साथ-साथ बैंक खाते की जाँच कर उनकी आर्थिक स्थिति की भी जाँच जरुरी है।
प्रधानाध्यापक सत्येंद्र चौधरी ने इस विद्यालय की कुछ छात्राओं को हिजाब पहनकर आने से मना किया था। उनकी इस बात पर खासा बवाल खड़ा हो गया। गुस्साए मुस्लिम समुदाय के लोग 29 नवंबर 2023 को विद्यालय में घुस आए। उन्होंने प्रधानाध्यापक चौधरी को जान से मारने की धमकी देने के साथ ही स्कूल बंद करने की चेतावनी दी।
इस पूरे मामले को लेकर प्रधानाध्यापक चौधरी का कहना है कि जब-जब छात्राओं को विद्यालय में बुर्का और हिजाब की जगह स्कूल ड्रेस पहनकर आने के लिए कहा जाता है, तब-तब मुस्लिम अभिभावक आकर धमकी देते हैं। दैनिक जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रधानाध्यापक सत्येंद्र कुमार चौधरी ने जिला शिक्षा पदाधिकारी तथा जिला पदाधिकारी को अलग-अलग पत्र लिखकर सुरक्षा की माँग की है।
शेखपुरा जिले के शेखोपुरसराय पंचायत के उत्क्रमित मध्य विद्यालय चरुआवां से संबंधित इस मामले को लेकर जिला शिक्षा पदाधिकारी (DEO) ओम प्रकाश सिंह ने बताया कि यह बेहद गंभीर मामला है और विद्यालय में नियमों के मुताबिक ड्रेस पहनकर आना जरूरी है। उन्होंने आगे कहा कि इस घटना के बारे में प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी को जाँच करके रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया है।
इस मामले पर ऑपइंडिया ने शनिवार (2 दिसंबर,2023) को जिला शिक्षा पदाधिकारी ओम प्रकाश सिंह से बात की। उन्होंने बताया कि इस मामले की जाँच को लेकर ब्लॉक शिक्षा अधिकारी रमेश प्रसाद को विद्यालय में दोनों पक्षों के साथ बैठक के लिए भेजा गया है। इसके बाद ही आगे की कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने यह भी बताया कि प्रधानाध्यापक सत्येंद्र कुमार का पत्र मिला है, उनकी सुरक्षा को लेकर प्रशासन से भी बात करेंगे।
इसे लेकर शिक्षक संघ ने भी प्रधानाध्यापक के जानमाल की सुरक्षा और सरकारी विद्यालयों में सरकारी व्यवस्था को सख्ती से लागू करने की माँग की है। जिस स्कूल में ये घटना हुई है, वो जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर की दूरी पर है।
इस स्कूल में मुस्लिम छात्र-छात्राओं की अच्छी खासी तादाद है। सरकारी योजना के तहत सभी को स्कूली ड्रेस के लिए पैसे मिलते हैं। छपी रिपोर्ट और प्रधानाध्यापक सत्येंद्र कुमार चौधरी के आरोप के अनुसार मुस्लिम छात्राएँ स्कूल ड्रेस की जगह हिजाब और बुर्का पहन स्कूल पहुँचती हैं।
गाँव के मुस्लिमों ने इसे अपने मजहब और दीन से जुड़ा मामला बताते हुए विद्यालय के प्रधानाध्यापक और शिक्षकों पर इसे जरूरत से अधिक तूल देने का आरोप जड़ा है। गाँव के पूर्व मुखिया और ग्रामीण मोहम्मद असलम ने विवाद बढ़ने के हालात में स्कूल में ताला लगाने की चेतावनी दी है।
मोहम्मद असलम का कहना है कि उनके बच्चे क्या पहनेंगे, यह तय करने वाला प्रधानाध्यापक कौन होता है? उसके अनुसार इस मामले को लेकर जिला शिक्षा पदाधिकारी से मुलाकात कर सारी स्थिति स्पष्ट कर दी गई है। उसने बताया कि वो जिला शिक्षा पदाधिकारी से यह भी कह चुका है कि हिजाब और बुर्का मुस्लिमों का निजी मामला है, इससे छेड़छाड़ न की जाए और न ही विवाद को गैरजरूरी तूल दिया जाए।
बुर्कानशीं महिला का वीडियो वायरल (चित्र साभार- Pixabay) सोशल मीडिया पर एक मुस्लिम महिला का वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो में एक बुर्कानशीं महिला बाकी मुस्लिम महिलाओं को सलाह दे रही है कि उनके शरीर के जिस भी हिस्से को कोई गैर-मुस्लिम छू दे उसे अच्छे से साफ़ करो। यह नसीहत मेहंदी और मेकअप किसी गैर-मुस्लिम व्यक्ति से करवाने के सवाल पर दी गई। इस वीडियो को @RightWingBoy_ नाम के हैंडल ने सोमवार (27 नवंबर, 2023) को शेयर किया है।
लगभग 17 सेकेंड के इस वीडियो में बड़े फ्रेम का चश्मा लगाए एक मुस्लिम लड़की माइक के आगे बैठी दिख रही है। महिला ने चेहरे को छोड़ कर अपने पूरे शरीर को काले लिबास से ढक रखा है। वीडियो की शुरुआत में महिला खुद से ही सवाल करती है कि क्या गैर मुस्लिम से मेहंदी, मेकअप या वैक्स करवा सकते हैं? बाद में वो अपने सवाल का खुद ही जवाब देने लगी। महिला ने शुरू में तो कहा, “आप ये तमाम अमल एक नॉन मुस्लिम से भी करा सकते हैं। इसमें कोई प्रॉब्लम नहीं है।” हालाँकि, अगली ही लाइन में उसने नसीहत देना शुरू कर दिया।
महिला ने वीडियो में 10 वें सेकेंड से आगे कहा, “लेकिन बाद में आपको उन तमाम एरिया या पार्ट्स को पाक करना होगा। जिस भी जगह को एक काफिर ने गीले हाथों से टच किया था।” यहाँ ये जानना जरूरी है कि काफिर गैर-मुस्लिमों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक अमानवीय शब्द है।
ऑपइंडिया की पड़ताल में यह सलाह देने वाली इस मुस्लिम महिला ने इस वीडियो के पूरे अंश को 19 नवंबर को इंस्टाग्राम हैंडल ‘शियाफिक’ पर शेयर किया था। वहीं खबर लिखे जाने तक इस वीडियो पर 3512 लाइक्स मिल चुके हैं। वीडियो को शेयर करने वाले इंस्टाग्राम चैनल ‘शियाफिक’ पर 638 से अधिक पोस्ट हैं। इसके 2.29 लाख फॉलोअर्स भी हैं। इस इंस्टाग्रम हैंडल के कई अन्य वीडियो में भी बुर्का पहने महिलाओं को गैर-मुस्लिमों के लिए भेदभाव वाली बातों को करते हुए सुना जा सकता है। साथ ही इस हैंडल को फॉलो करने वाले कई मुस्लिमों को इसकी विचारधारा का समर्थन करते भी देखा जा सकता है।
समाजवादी पार्टी का नेता मोहम्मद मुज़फ्फर बुर्का पहन कर भागते हुए गिरफ्तार (चित्र साभार- Z न्यूज़) उत्तर प्रदेश की प्रयागराज पुलिस ने समाजवादी पार्टी के नेता एवं ब्लॉक प्रमुख मोहम्मद मुज़फ्फर को गिरफ्तार कर लिया है। मोहम्मद मुज़फ्फर पर अलग-अलग जिलों में गोहत्या सहित 34 आपराधिक केस दर्ज हैं। शनिवार (14 अक्टूबर 2023) को गिरफ्तारी से बचने के लिए सपा नेता बुर्का पहनकर भाग रहा था। हालाँकि, पुलिस ने उसे दबोच लिया। मुजफ्फर पूरामुफ्ती थाने का हिस्ट्रीशीटर है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, शनिवार को पुलिस को सूचना मिली कि मोहम्मद मुज़फ्फर एक निकाह में शामिल होने जा रहा है। यह निकाह डॉक्टर शफकत की बेटी का था, जो कि प्रयागराज के बमरौली मोड़ के पास प्रयाग गार्डेन में हो रहा था। डॉक्टर शफकत आरोपित मोहम्मद मुज़फ्फर के दोस्त बताए जा रहे हैं। मुज़फ्फर को पुलिस के आने की पहले से ही भनक लग चुकी थी। उसने मौके से फरार होने के लिए बुर्का पहन लिया और भागने की फ़िराक में था। हालाँकि, पुलिस टीम ने मुज़फ्फर को पहचान लिया और उसे गिरफ्तार कर लिया।
मोहम्मद मुज़फ्फर को पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाने की खबर सुनकर उसके समर्थक बमरौली पुलिस चौकी पर जमा होने लगे। उन्होंने वहाँ हंगामा भी किया। मुज़फ्फर की बीवी ने भी हाईकोर्ट में अपने पति की गिरफ्तारी के बाद किसी अनहोनी की आशंका का प्रार्थना पत्र दे दिया। आख़िरकार रविवार (15 अक्टूबर 2023) को पुलिस ने मोहम्मद मुज़फ्फर को कोर्ट में पेश किया। यहाँ से उसे जेल भेज दिया गया है। मोहम्मद मुज़फ्फर फिलहाल प्रयागराज के ही कौड़िहार ब्लॉक का ब्लॉक प्रमुख है।
जिस केस में मोहम्मद मुज़फ्फर की गिरफ्तारी हुई है, वो 11 मई 2023 को प्रयागराज के ही थाना सोरांव में दर्ज हुआ था। यह केस खुद पुलिस द्वारा दर्ज करवाया गया था जिसमें पुलिस ने 16 गोवंश से लदी एक ट्रक सड़क के किनारे खराब हालत में बरामद की थी। इसमें से 8 गोवंश जीवित थे जबकि 8 की मौत हो गई थी। मृत गोवंश के शरीर पर खरोंच के निशान थे। पुलिस ने इस मामले में अज्ञात ट्रक मालिक के साथ 2 अन्य अज्ञात लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कर ली थी। यह FIR IPC 429 के साथ गोहत्या निवारण अधिनियम और पशु क्रूरता निवारण अधिनियम के तहत दर्ज हुई थी।
जाँच के दौरान पुलिस को इस मामले में मोहम्मद मुज़फ्फर की संलिप्तता मिली। तब से मुज़फ्फर फरार चल रहा था। आखिरकार रविवार को उसे गिरफ्तार कर लिया गया है। मुज़फ्फर पर प्रयागराज, चंदौली, वाराणसी, भदोही और कौशाम्बी आदि जिले मिला कर लगभग 34 केस दर्ज हैं। प्रशासन ने मुज़फ्फर की कई बेनामी सम्पत्तियों का भी पता लगाया है। नवम्बर 2022 में मोहम्मद मुज़फ्फर की 10 करोड़ की सम्पत्ति भी कुर्क की गई थी।
मंच पर फेंका हिजाब (वायरल वीडियो का स्क्रीन शॉट) ईरान में हिजाब पर जारी विवाद (Iran Hijab Controversy) के बीच एक महिला का वीडियो वायरल हो रहा है। महिला एक कार्यक्रम के दौरान गले से हिजाब उतारकर फेंकती नजर आ रही है। बताया जा रहा है कि गलत तरीके से हिजाब पहनने के कारण उस महिला को तेहरान नेशनल काउंसिल फॉर कंस्ट्रक्शन इंजीनियरिंग (Tehran National Council For Construction Engineering) की वार्षिक सभा से निकाल दिया गया था। घटना शुक्रवार (17 फरवरी, 2023) की है।
बताया जा रहा है कि ज़ेनब काज़ेमपुर (Zeynab Kazempour) नाम की महिला को तेहरान कंस्ट्रक्शन इंजीनियरिंग ऑर्गनाइजेशन की वार्षिक सभा के दौरान इसलिए निकाल दिया गया, क्योंकि निदेशक मंडल को उसके हिजाब पहनने का तरीका पसंद नहीं आया। निदेशक मंडल ने ज़ेनब को बोर्ड के सदस्य के रूप में मान्यता देने से इनकार कर दिया। इससे नाराज होकर ज़ेनब ने बीच सभा में हिजाब उतार कर फेंक दिया।
This is what bravery look like. Iran I woman removed from the #IRI National Council For Engineering for not wearing hijab properly just removed her headscarf on stage. She got applause for her act of civil disobedience. #IranRevoIution#MahsaAmini pic.twitter.com/dWMlIszStd
वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि हिजाब उतारने से पहले नाराज ज़ेनब लोगों के सामने छोटा-सा स्पीच दे रही हैं। ज़ेनब ने कहा, “मैं उस असेंबली को मान्यता नहीं देती, जहाँ उम्मीदवारों को हिजाब न पहनने के कारण बर्खास्त कर दिया जाता है।” उनकी बात खत्म होने से पहले ही उनका माइक बंद कर दिया गया।
मंच छोड़ने से पहले जिस तरह ज़ेनब ने हिजाब निकाल फेंका, उससे उपस्थित लोग ज़ेनब के समर्थन में तालियाँ बजा रहे थे। बता दें कि ईरान में लंबे समय से महिलाएँ हिजाब के खिलाफ प्रदर्शन कर रही हैं। इस विरोध प्रदर्शन की शुरुआत हिजाब को लेकर गिरफ्तार की गई 22 वर्षीय महसा अमीनी की पुलिस कस्टडी में मौत के बाद हुई थी।
देशभर में जारी विरोध के बाद ईरान की इस्लामी सरकार ने क्रूरता के लिए कुख्यात मोरालिटी पुलिस (Morality Police) को खत्म करने का फैसला लिया है। वहीं, हिजाब पहनने की अनिवार्यता को खत्म करने पर वहाँ की सरकार विचार कर रही है।
ड्रग तस्कर मियाँ-बीवी, अशरफ और साबदा उत्तराखंड की देहरादून पुलिस ने एक ड्रग तस्कर और उसकी बीवी को गिरफ्तार किया। आरोपित ड्रग तस्कर अशरफ ने अपनी बीवी साबदा को ड्रग तस्करी के धंधे में यह सोचकर लाया था कि बुर्के में होने के कारण पुलिस उस पर शक नहीं करेगी। पुलिस ने दोनों के पास से 51 लाख रुपए की ड्रग्स बरामद की।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, देहरादून पुलिस को सूचना मिली थी कि उत्तर प्रदेश से दो लोग ड्रग्स लेकर आ रहे हैं। सूचना देने वाले ने पुलिस को यह भी बताया था कि ड्रग्स लिए हुए व्यक्ति के साथ महिला भी है। सूचना के आधार पर देहरादून पुलिस नाकेबंदी कर जाँच कर रही थी।
इस दौरान, पुलिस ने एक सेंट्रो कार की जाँच की। इस कार में ही अशरफ और उसकी बीवी साबदा बैठे हुए थे। पुलिस ने पूछताछ करने के बाद जब उनकी तलाशी की तो उनके पास से 510 ग्राम ड्रग्स बरामद की। इस ड्रग्स की कीमत 51 लाख रुपए आँकी गई। दोनों आरोपित उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर निवासी हैं।
पुलिस पूछताछ में अशरफ ने बताया कि वह पेंंटर का काम करता है। उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में ही उसकी पहचान एक ड्रग तस्कर से हुई थी। अधिक पैसा कमाने की लालच में आकर उसने ड्रग तस्करी शुरू की थी। वह बरेली में कम कीमत पर ड्रग्स खरीदता था।
इसके बाद, अलग-अलग स्थानों में रहने वाले ड्रग पैडलर्स को ऊँची कीमत में बेंच देता था। गिरफ्तार आरोपित अशरफ के खिलाफ देहरादून के सहसपुर और प्रेमनगर में ड्रग तस्करी के मामले पहले भी दर्ज किए गए थे। वह पहले भी जेल जा चुका है। हालाँकि इसके बाद भी उसने यह काम नहीं छोड़ा था।
पूछताछ में आरोपित अशरफ ने पुलिस को बताया है कि वह ड्रग तस्करी में अपनी बीवी को साथ रखता था। लेकिन इससे पहले वह बीवी के साथ कभी गिरफ्तार नहीं हुआ था। इसलिए उसे इस बात का विश्वास हो गया था कि महिला के साथ होने के कारण पुलिस को उस पर शक नहीं होगा और वह बच जाएगा। फिलहाल, पुलिस ने अशरफ और उसकी बीवी साबदा के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है। आरोपितों के बयान के आधार पर पुलिस अन्य ड्रग तस्करों और पैडलर्स क ठिकानों पर छापेमारी कर रही है।
ईरान में हिजाब विरोधी प्रदर्शन (फोटो साभार: AP) ईरान में महसा अमिनी (Mehsa Amini) की हत्या के बाद उठे हिजाब विरोधी तूफान में अंतत: इस्लामी सरकार को झुकना पड़ा है। अपनी क्रूरता के लिए कुख्यात मोरालिटी पुलिस (Morality Police) को खत्म कर दिया है। वहीं, हिजाब पहनने की अनिवार्य को खत्म करने पर वहाँ की सरकार विचार कर रही है।
मोरालिटी पुलिस को खत्म करने को लेकर अटॉर्नी जनरल मोहम्मद जफर मोंटाज़ेरी ने कहा, “नैतिकता पुलिस का न्यायपालिका से कोई लेना-देना नहीं है।” अटॉर्नी जनरल यह जवाब तब दिया, जब उनसे इस विभाग को बंद करने को लेकर उनसे सवाल किया गया।
साल 2006 में तत्कालीन राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने हिजाब कल्चर को बढ़ावा देने के लिए इसकी स्थापना की थी। इसे गश्त-ए-इरशाद के नाम से जाना जाता था। यह पुलिस उन महिलाओं पर कड़ी निगाह रखती थी, जो हिजाब या इस्लामी कपड़े नहीं पहनती थी।
मोरल पुलिस की ईरान में क्रूरता की कई कहानियाँ हैं। महसा अमिनी की हत्या भी मोरल पुलिस की हिरासत में हुई थी। मोरल पुलिस ने महसा पर आरोप लगाया गया था उन्होंने सार्वजनिक जगह पर हिजाब को सही से नहीं पहना है। इसके बाद उन्हें सुधार के नाम पर हिरासत में ले लिया गया, जहाँ अत्यधिक पिटाई के कारण मौत हो गई।
हालाँकि, सिर्फ मोरालिटी पुलिस को ही खत्म कर देने से ईरान की महिलाएँ मानने को तैयार नहीं हैं। वे हिजाब और बुर्के की कठोरता से भी आजादी चाहती हैं। इसको लेकर उनका प्रदर्शन लगातार जारी है। ईरान की मुस्लिम महिलाओं को दुनिया भर से मिल रहे समर्थन के दबाव के बाद ईरान सरकार हिजाब की अनिवार्यता पर विचार कर रही है।
ईरान के अटॉर्नी जनरल मोहम्मद जफ़र मोंटेज़ेरी ने कहा कि हिजाब और बुर्के की अनिवार्यता को खत्म करने के लिए कानून में किसी बदलाव की ज़रूरत है या नहीं, इसको ध्यान में रखते हुए संसद और न्यायपालिका काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि एक-दो सप्ताह बाद इसके परिणाम देखने को मिलेंगे।
सन 1979 में मौलना खुमेनाई के नेतृत्व में ईरान में इस्लामी क्रांति हुई थी और राजशाही को उखाड़ फेंका गया था। इसके चार साल बाद यानी 1983 में महिलाओं के लिए बुर्का और हिजाब अनिवार्य कर दिया गया था। इसके बाद कट्टर इस्लामी कानून लगातार थोपे जा रहे हैं।
पूर्व सुधारवादी राष्ट्रपति मोहम्मद खातमी के रिश्तेदारों द्वारा गठित यूनियन ऑफ इस्लामिक ईरान पीपल पार्टी ने माँग की है कि अनिवार्य हिजाब कानून को रद्द किया जाए और इसके लिए जरूरी हुआ तो कानूनी बदलाव की जाए। वहीं, मुल्क के रूढ़ीवादी अभी भी इस्लामी रीतियों पर अड़े रहने की बात कर रहे हैं।
एक तरफ ईरान की सरकार कानून में बदलावों की बात करही है तो दूसरी तरफ हिजाब विरोधी प्रदर्शनों को कुचलने के लिए हर तरह का प्रयास कर रही है। बता दें कि महसा अमिनी की हत्या के बाद भड़के विरोध प्रदर्शनों में अब तक 450 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। इनमें महिलाएँ और बच्चे भी शामिल हैं। वहीं, प्रदर्शन करने के आरोप में ईरान इस्लामी सरकार कुछ नाबालिगों को फाँसी की सजा दे सकती है।
विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेने के लिए तीन नाबालिगों को दोषी ठहराया गया है। इन तीनों को राजधानी तेहरान में कई लोगों के साथ मिलकर एक पुलिस अधिकारी को जान से मारने का भी आरोप लगाया गया था। आरोप है कि ईरानी पैरामिलिट्री फोर्स के सदस्य को मारने के लिए चाकू, पत्थरों और बॉक्सिंग गलव्ज का इस्तेमाल किया गया।
दुनिया भर के मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि प्रदर्शनों में शामिल होने के कारण इन बच्चों को फाँसी की सजा देने के लिए ईरानी सरकार हथकंडे अपना रही है। नाबालिगों को फाँसी देने के मामले में ईरानी दुनिया में नंबर वन है। फिलहाल 200 नाबालिगों को गिरफ्तार किया जा चुका है और 300 नाबालिग सरकारी फायरिंग में घायल हुए हैं। इन प्रदर्शनों में अब तक 60 बच्चों की जान जा चुकी है, जिनमें 12 लड़कियाँ भी शामिल हैं।
ब्राजील में प्रदर्शन करते ईरानी (फोटो साभार: AP) ईरान में जैसे-जैसे इस्लामी का दमन बढ़ रहा है, वैसे-वैसे वहाँ की महिलाओं एवं लोगों का हिजाब के खिलाफ प्रदर्शन (Iran Anti-Hijab Protest) तेज होता जा रहा है। हिजाब जलाते-जलाते ईरान के लोग सर्वोच्च नेता और धार्मिक गुरु अयातुल्लाह अली खुमेनाई (Ayatollah Ali Khomeini) की तस्वीर जलाने लगे। उनका नारा ‘महिलाओं के अधिकार’ से आगे बढ़कर ‘मुल्ला भाग जाओ’।
देश भर में इंटरनेट सेवा बंद करने के बावजूद महिलाएँ बिना हिजाब के शनिवार (15 अक्टूबर 2022) को राजधानी तेहरान की सड़कों पर उमड़ पड़ीं। इस दौरान उन्होंने नारे लगाए, “Guns, tanks, fireworks; the mullahs must get lost” यानी बंदूक, टैंक या बम इस्तेमाल करो, लेकिन मुल्ला (खुमेनाई का इस्लामी शासन) को भागना पड़ेगा।
महिलाओं के तेहरान मार्च मार्च का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वहीं, तेहरान के पश्चिम में हमदान शहर में एक ऐतिहासिक गोल चक्कर के पास हजारों लोग इकट्ठा होकर नारे लगाए और सुरक्षा बलों को देख सीटियाँ बजाई एवं उन पर प्रोजेक्टाइल फेंके।
वहीं, कुर्दिस्तान प्रांत में महसा अमिनी के गृह नगर साकेज और पश्चिम अजरबैजान के महाबाद में दुकानदारों ने हड़ताल की। उधर खुमेनाई और उनकी सरकार ने ईरान में विरोध प्रदर्शन को भड़काने के लिए अमेरिका और इज़राइल सहित देश के दुश्मनों पर लगाया है।
उधर पुरस्कार विजेता ईरानी फिल्म निर्माता मनी हघीघी (Mani Haghighi) पर ईरान की सरकार ने प्रदर्शनकारियों को समर्थन देने के कारण प्रतिबंधित कर दिया है। हघीघी की फिल्म ‘नॉयर थ्रिलर सब्सट्रैक्शन’ प्रतिष्ठित लंदन फिल्म समारोह में 15 अक्टूबर 2022 को प्रदर्शित हुई।
प्रसिद्ध फिल्म निर्माता हघीघी 14 अक्टूबर 2022 से कलाकारों एवं एथलीटों वाली ईरानी हस्तियों की उस सूची में शामिल हो गए, जिन्हें प्रदर्शन का समर्थन करने के लिए गिरफ्तार किया गया है या उनकी ईरान में यात्रा पर प्रतिबंध लगाया गया है।
उन्होंने कहा, “शायद अधिकारियों ने सोचा था कि मुझे यहाँ रखकर वे मुझ पर कड़ी नज़र रख सकते हैं या फिर शायद मुझे धमकाने और मुझे चुप कराने के लिए ऐसा किया गया हो” उन्होंने कहा कि हिजाब विरोधी युवाओं का यह प्रदर्शन आने वाले दिनों में ईरान की ‘मुल्ला सरकार’ के लिए मुसीबतें बनने वाला है।
ईरान की पुलिस प्रदर्शनकारी महिलाओं को पकड़ कर उन्हें मानसिक अस्पतालों में भेज रही है। इसके साथ ही सरकार का दमन भी लगातार जारी है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अपने हालिया रिपोर्ट में कहा है कि सितंबर मध्य से शुरू हुए इस आंदोलन में 3 अक्टूबर तक 144 लोग मारे गए हैं, जिनमें 23 बच्चे भी शामिल हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि सुरक्षाबल जानबूझकर बच्चों एवं किशोरों का निशाना बना रहे हैं।
महसा अमीनी की हत्या के बाद से महिलाएँ सड़कों पर उतर कर विरोध कर रही हैं। वे हिजाब फेंककर, जलाकर और अपने बालों को काटकर हिजाब के लिए इस्लामी सरकार का विरोध कर रही हैं। प्रदर्शनकारियों ने ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खुमेनाई की तस्वीरें भी जलाईं। इन प्रदर्शनकारी महिलाओं को देश-दुनिया से भर से भारी समर्थन मिल रहा है।
भारत से भी ईरानी की महिलाओं को लगातार समर्थन मिल रहा है। बॉलीवुड एक्ट्रेस प्रियंका चोपड़ा और मंदाना करीमी ने हिजाब (Hijab) का विरोध किया है। वहीं, बॉलीवुड में काम करने वाली ईरानी अभिनेत्री एलनाज नोरौजी (Elnaaz Norouzi) ने हिजाब का विरोध करते हुए अपने कपड़े उतार दिए। इसका एक वीडियो उन्होंने इंस्टाग्राम पर भी शेयर किया।
13 सितंबर को हिजाब न पहनने की वजह से महसा अमीनी को मोरल पुलिस ने गिरफ्तार किया था। हिरासत में उसे इतना मारा गया कि वह कोमा में चली गई। तीन दिन बाद यानी 16 सितंबर को उसकी मौत हो गई। इसके बाद से ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शन शुरू हुए, जो कि सरकार की दमनकारी नीतियों के कारण हिंसक होते चले गए।
स्विट्जरलैंड में बुर्का पहनने पर जुर्माने का प्रस्ताव (फोटो साभार: AFP) एक तरफ भारत में शिक्षण संस्थाओं में हिजाब-बुर्का को पहनने या न पहनने को लेकर बहस जारी है, वहीं स्विट्जरलैंड में कट्टरवाद को रोकने के लिए बुर्के पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। अब स्विस सरकार ने बुर्का बैन का उल्लंघन करने पर 1,000 अमेरिकी डॉलर (82,000 रुपए) जुर्माना लगाने के एक प्रस्ताव का मसौदा संसद में मंजूरी के लिए भेजा है।
पिछले साल सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा ढँकने को लेकर देश में जनमत संग्रह कराया गया था। इसमें लोगों ने चेहरे ढँकने के खिलाफ वोट किया था। इस प्रस्ताव को उसी समूह द्वारा भेजा गया है, जिसने साल 2009 में देश में नई मीनारों के बनाने पर प्रतिबंध लगाया था। हालाँकि, इस प्रस्ताव में कहीं भी इस्लाम का जिक्र नहीं किया गया है।
हालाँकि, स्विस कैबिनेट द्वारा भेजे गए प्रस्ताव में सार्वजनिक जगहों पर चेहरे को ढँकने को लेकर कई तरह की छूट देने को भी शामिल किया गया है। प्रस्ताव में पूजा स्थलों, राजयनिक परिसरों और विमानों में चेहरे को ढँकने से छूट देने की बात कही गई है।
इसके अलावा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, जलवायु परिस्थितियों और स्थानीय रीति-रिवाजों से जुड़े मामलों को भी वैध रखा गया है। इसके साथ ही कलात्मक प्रदर्शन और विज्ञापनों के लिए चेहरे को ढँकने में छूट दी गई है।
इसका उद्देश्य हिंसक प्रदर्शनकारियों को मास्क पहनने से रोकना है। कैबिनेट ने अपने एक बयान में कहा, “चेहरे को ढँकने पर प्रतिबंध लगाने का उद्देश्य सार्वजनिक सुरक्षा और व्यवस्था को सुनिश्चित करना है। सजा देना प्राथमिकता नहीं है।”
वहीं, स्थानीय नेताओं, मीडिया और प्रचारकों ने इसे ‘बुर्का पर प्रतिबंध’ कहा है। संसद से मंजूरी के बाद इसे अपराध संहिता में शामिल कर लिया जाएगा और इसका उल्लंघन करने वालों पर 10,000 स्विक फ्रैंक (लगभग 82,000 रुपए) का जुर्माना लगाया जाएगा।
वहीं, बुर्के पर प्रतिबंध के समर्थकों का कहना है कि चेहरे को ढँकना कट्टरपंथ और राजनीतिक इस्लाम का प्रतीक है। बता दें कि स्विट्जरलैंड में मुस्लिमों की आबादी लगभग 5 प्रतिशत है और अधिकांश तुर्की, बोस्निया और कोसोवो मूल के हैं।
साल 2011 में पूरे चेहरे को सार्वजनिक रूप से ढँकने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। स्विट्जलैंड के अलावा डेनमार्क, ऑस्ट्रिया, नीदरलैंड, फ्रांस और बुल्गारिया में भी सार्वजनिक रूप से चेहरा ढँकने पर पूर्ण या आंशिक प्रतिबंध है।
तुर्की की राजधानी इस्तांबुल में ईरानी दूतावास के सामने प्रदर्शन (फोटो साभार- गेटी) जनता से बढ़कर तानाशाह और धार्मिक नेता नहीं होते। जनता जब चाहे इन्हें उखाड़कर फेंक सकती है। इस्लामी मुल्क ईरान (Iran) में भी कट्टरपंथी धार्मिक नेताओं के विरोध में वहाँ की महिलाएँ सड़कों पर उतर चुकी हैं और पूरे देश और दुनिया से उन्हें समर्थन मिल रहा है।
ईरान की इस्लामी सरकार की दमनकारी रवैए के बाद वहाँ का हिजाब विरोधी आंदोलन हिंसक हो गया है। वहीं, बलूचिस्तान में 15 साल की एक लड़की के साथ बलात्कार के बाद वहाँ की जनता हिंसक हो गई है। आरोप है कि पुलिस कमांडर ने अपने ऑफिस में ले जाकर इस लड़की का बलात्कार किया।
लोगों के साथ एक झड़प में ईरानी पुलिस ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ (IRGC) के सिस्तान एवं बलूचिस्तान के खुफिया प्रमुख अली मौसवी (Ali Mousavi) की मौत हो गई है। वहीं, सुरक्षाबलों की फायरिंग में कम से कम 36 लोगों के मारे जाने की खबर है।
सुन्नी समुदाय के बलूच लोगों का आरोप है कि 15 साल की इस लड़की के साथ चाबहार के पुलिस कमांडर कर्नल इब्राहिम कौचकजाई ने बलात्कार किया है। इसके बाद पुलिस इस मामले को दबाने में लगी हुई थी। पुलिस ने लड़की के परिजनों पर इसको लेकर चुप रहने का दबाव बनाया। इतना ही नहीं लड़की के 3 परिजनों को गिरफ्तार कर उनसे बलात्कार से इनकार वाले बयान देने का भी दबाव बनाया गया। इसके बाद लोग सड़कों पर उतर आए।
स्थानीय मीडिया के अनुसार, आंदोलनकारी जाहेदान शहर में प्रदर्शन कर रहे थे। इसी दौरान सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें रोकने की कोशिश की। इस दौरान सुरक्षाकर्मियों ने गोलियाँ चलाईं। इसके बाद आंदोलनकारियों की ओर से भी गोलियाँ चलाई गईं। इस झड़प में आंदोलनकारियों की गोली अली मौसवी को लगी। मौसवी को तुरंत अस्पताल पहुँचाया गया, लेकिन उनकी मौत हो गई।
मौसवी की मौत सरकार विरोधी लोगों में गुस्से का इजहार है। इसके पहले हिजाब विरोधी प्रदर्शनकारियों का एक वीडियो सामने आया था, जिसमें वे ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह अली खोमनई की मौत की माँग कर रहे थे। ओस्लो स्थित ईरान मानवाधिकार संगठन का कहना है कि विरोध शुरू होने के बाद से सुरक्षाबलों ने कम-से-कम 83 लोगों को मार दिया है।
वहीं, हिजाब विरोधी प्रदर्शनकारियों के साथ संघर्ष में कई सुरक्षाबलों की भी मौत हुई है, लेकिन मारे गए सुरक्षाबलों में अली मौसवी सबसे उच्च रैंक के अधिकारी हैं। बता दें कि बलूचिस्तान ईरान और पाकिस्तान में एक ऐसा क्षेत्र हैं, जहाँ बलूच संप्रदाय के लोग रहते हैं। शिया बहुल ईरान में सुन्नी बलूचों के साथ अक्सर हिंसा की खबरें आती हैं।
पिछले साल भी इलाके के खराब हालात को लेकर यहाँ प्रदर्शन करने वाले लोगों पर ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ की पुलिस ने गोलियाँ चलाई थीं, जिसमें कई लोगों की मौत हो गई थी। बलूच ईरान और पाकिस्तान से बलूचिस्तान की माँग करते हुए सशस्त्र विद्रोह चलाते हैं। इसमें वे आतंकी संगठन अल-कायदा का भी सहयोग ले रहे हैं।
ईरान में हिजाब विरोधी हिंसा मध्य सितंबर उस समय भड़क उठी, जब महसा अमिनी (Mahsa Amini) नाम की एक युवती अपने भाई के साथ जा रही थी और हिजाब ढंग से नहीं पहने के कारण पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। उसे थाने में ले जाकर इतना पीटा गया कि वह कोमा में चली गई और बाद में उसकी मौत हो गई।
इसके बाद ईरान में हिजाब जलाकर महिलाओं ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। इन प्रदर्शनों में ईरान पुलिस ने गोली मारकर कई महिला प्रदर्शनकारियों की हत्या कर दी। हालाँकि, पुलिस के दमन के बाद यह आंदोलन और विस्तृत और हिंसक होता जा रहा है। ईरानी महिलाओं के समर्थन में दुनिया भर में प्रदर्शन हो रहे हैं।
मुज़फ्फरनगर में राष्ट्रगीत के दौरान बैठी रहीं मुस्लिम पार्षद उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर में नगरपालिका की बैठक में मुस्लिम पार्षदों पर राष्ट्रीय गीत के अपमान के आरोप लगे हैं। वीडियो में देखा जा सकता है कि जब ‘वन्दे मातरम्’ बजाय जा रहा है, तब सभी पार्षद राष्ट्रगीत के सम्मान में खड़े हैं लेकिन 4 बुर्कानशीं मुस्लिम महिलाएँ बैठी हुई हैं। सोशल मीडिया पर भी लोगों ने इसे राष्ट्रगीत का अपमान करार दिया। बैठक में केंद्रीय पशुपालन, डेयरी एवं मत्स्य पालन विभाग मंत्री संजीव बालियान भी मौजूद थे।
संजीव बालियान मुज़फ्फरनगर के स्थानीय सांसद भी हैं। नगरपालिका बोर्ड की बैठक में मुस्लिम महिला पार्षदों द्वारा राष्ट्रगीत के अपमान का मामला तूल पकड़ रहा है। शनिवार (18 जून, 2022) को दोपहर में नगरपालिका सभागार में हुई बैठक में उत्तर प्रदेश सरकार वोकेशनल एजुकेशन एवं स्किल डेवलपमेंट मंत्री कपिलदेव अग्रवाल भी मौजूद थे, जो मुज़फ्फरनगर नगरपालिका के अध्यक्ष भी रहे हैं। कई वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में ऐसा हुआ।
"मुस्लिम महिलाओं ने किया राष्ट्रगीत वंदे मातरम का अपमान"
मुजफ्फरनगर नगर पालिका की बोर्ड बैठक में केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान व यूपी मंत्री संजीव बालियान के सामने हुआ अपमान हुआ राष्ट्रगीत का अपमान pic.twitter.com/gyRTbHStEr
5 महिला है , पांचों का मेडिकल कंडीशन एक जैसा राष्ट्रगीत को भी उतना सम्मान दिया जाता है, सोच बदलो
— manojsharma45kol@gmail.com (@manojsharma45k1) June 19, 2022
मुसलमान की औरत ने कोई अपमान नहीं किया,उनकी जो मर्जी आए वह वह करेगी हिंदू सिर्फ देखेगा और ट्विटर फेसबुक पर कॉमेंट करेगा सरकार मौन धारण किये रहेगी, सोचो उन लोगों की हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी की हमारे बारे जिसको जो सोचना है सोचे ,उनका एजेंडा साफ है दिक्कत तो सेकुलर हिन्दू से है
इनको ने देश से प्रेम है ना ही देश के संविधान को मानना है ना ही राष्ट्रीय गीत का सम्मान करना है मुज़फ्फरनगर नगर पालिका की बैठक की तस्वीर देखिए pic.twitter.com/uUln5jkbVC
जिस बैठक में शहर के विकास के लिए 196 करोड़ रुपए का प्रस्ताव पास हुआ, उसमें महिला मुस्लिम सभासदों के अलावा पूरा सदन राष्ट्रगीत ‘वन्दे मातरम्’ के सम्मान में खड़ा हुआ। सदन के लोग भी इस हरकत से नाराज़ दिखे। कार्यवाही शुरू होने से पहले राष्ट्रगीत बजाया गया था। केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान ने सभी को राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के सम्मान की सलाह दी। पार्षदों ने इस पर चर्चा भी की। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि जब महिला ही राष्ट्रीय गीत का अपमान करेगी तो समाज को कैसे मजबूत करेगी?
राष्ट्रगीत को भी राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान दर्जा देने का माला अदालत में चल रहा है और मई 2022 के अंतिम हफ्ते में दिल्ली उच्च-न्यायालय ने इस सम्बन्ध में केंद्र सरकार की राय भी माँगी थी।
भाजपा नेता और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने इस सम्बन्ध में जनहित याचिका (PIL) दाखिल की है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रगीत को लेकर कोई दिशानिर्देश न होने के कारण असभ्य रूप से इसका इस्तेमाल हो रहा है और फिल्मों-पार्टियों में भी इसका अपमान किया जा रहा है।
उन्होंने अपनी याचिका में कहा था कि 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के सभापति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि ‘वंदे मातरम’ गीत ने भारतीय स्वतंत्रता के संघर्ष में एक ऐतिहासिक भूमिका निभाई थी और इसे ‘जन-गण-मन’ के साथ समान रूप से सम्मानित किया जाएगा। उन्होंने कहा सभी संस्थानों में दोनों को समान रूप से बजाने की माँग की है।
राष्ट्रगीत को भी राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान दर्जा देने का माला अदालत में चल रहा है और मई 2022 के अंतिम हफ्ते में दिल्ली उच्च-न्यायालय ने इस सम्बन्ध में केंद्र सरकार की राय भी माँगी थी। भाजपा नेता और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने इस सम्बन्ध में जनहित याचिका (PIL) दाखिल की है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रगीत को लेकर कोई दिशानिर्देश न होने के कारण असभ्य रूप से इसका इस्तेमाल हो रहा है और फिल्मों-पार्टियों में भी इसका अपमान किया जा रहा है।
इफ्तिखार अहमद जावेद, मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष (फोटो साभार: इंडिया टुडे/ट्विटर)
कर्नाटक हिजाब विवाद को उत्तर प्रदेश मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष इफ्तिखार अहमद जावेद ने 12 अप्रैल 2022 को मुस्लिम मौलवियों की साजिश करार दिया। उन्होंने कहा कि ये विवाद मुस्लिमों के गलत नेतृत्व के कारण उपजा था। मौलवियों ने महिलाओं को अपने काबू में रखने और उन्हें मुस्लिम पितृसत्ता में छोटा महसूस कराने के लिए जानबूझकर हिजाब विवाद को जन्म दिया।
जावेद ने आरोप लगाया कि मौलवियों ने तीन तलाक, कई महिलाओं से निकाह या हिजाब विवाद को जन्म देकर मुस्लिम महिलाओं की आजादी को कुचलने की कोशिश की। मुस्लिमों में सबसे बड़ी दिक्कत नेतृत्व की है। मौलवियों को शांति बिल्कुल भी पसंद नहीं। उन्होंने आगे कहा, “वे हमेशा चाहते हैं कि कुछ मुद्दे विवाद पैदा करें।”
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, मदरसा बोर्ड के चीफ ने कहा, “हिजाब में एक बहुत ही स्पष्ट अवधारणा है। महिलाएँ इसे घर, मस्जिदों, मजारों, शादियों और बाजारों में पहनने की हकदार हैं। लेकिन वो हिजाब को सेना में, केबिन क्रू के तौर पर, पुलिस फोर्स में, डॉक्टरों के रूप में, वकीलों के रूप में और यहाँ तक कि इसे स्कूल पहनकर जाने का दावा नहीं कर सकती हैं। हिजाब ये सब काम करने के लिए नहीं है। मुस्लिम महिलाओं को मुख्यधारा से बाहर रखने के लिए जानबूझकर हिजाब का इस्तेमाल किया गया।”
इससे पहले इफ्तिखार अहमद जावेद ने बीते 25 मार्च 2022 को प्रदेश के सभी मदरसों में राष्ट्रगान को अनिवार्य कर दिया था। उन्होंने कहा था, “राष्ट्रगान विभिन्न स्कूलों में गाया जाता है और हम मदरसा के छात्रों में भी देशभक्ति की भावना जगाना चाहते हैं, ताकि वे हमारे इतिहास और संस्कृति को जान सकें।”
हिजाब विवाद
पीयू कॉलेज का यह मामला सबसे पहले 2 जनवरी 2022 को सामने आया था, जब 6 मुस्लिम छात्राएँ क्लासरूम के भीतर हिजाब पहनने पर अड़ गई थीं। कॉलेज के प्रिंसिपल रूद्र गौड़ा ने कहा था कि छात्राएँ कॉलेज परिसर में हिजाब पहन सकती हैं, लेकिन क्लासरूम में इसकी इजाजत नहीं है। प्रिंसिपल के मुताबिक, कक्षा में एकरूपता बनाए रखने के लिए ऐसा किया गया है।
हालाँकि, उसके बाद से हालात लगातार बिगड़ते चले गए। हिजाब विवाद को बढ़ाने में प्रतिबंधित कट्टर इस्लामिक संगठन पीएफआई और उसकी स्कूल शाखा सीएफआई का नाम भी सामने आया था। बाद में हिजाब विवाद कर्नाटक हाई कोर्ट की दहलीज पर पहुँचा, जहाँ कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि हिजाब इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है। सभी को स्कूलों में यूनिफॉर्म कोड का पालन करना होगा।
सोहिल हुसैन मोर (साभार: न्यूज 18 गुजराती) गुजरात के राजकोट में सोहिल हुसैन मोर (Sohil Hussain Mor) नामक वकील के ख़िलाफ़ दो अलग एफआईआर हुई हैं। सोहिल पर आरोप है कि उसने न केवल अपने सोसायटी में रहने वाले हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत किया बल्कि मारपीट भी की और साथ में पुलिस वाले को उसका काम करने से भी रोका। घटना रविवार (20 फरवरी 2022) की है जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी नगर आवास के पास शाम के समय हंगामा हुआ।
सोहिल हुसैन ने कथिततौर पर वॉट्सऐप ग्रुप में छत्रपति शिवाजी महाराज के ऊपर आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया था। ग्रुप की सदस्य ज्योति सोढा ने जब इस मुद्दे पर आवाज उठाई और मोर को कॉल करके अपनी नाराजगी व्यक्त करने की कोशिश की तो मोर ने उन्हें कहा, “ये देश पाकिस्तान बन गया है और तुम लोगों को देश छोड़कर चला जाना चाहिए।”
રાજકોટમાં ધાર્મિક લાગણી દૂભાઈ તેવી શિવાજી મહારાજ વિરોધી ટિપ્પણી કરતા વિવાદ સર્જાયો.સોહિલ મોર નામના વ્યકિતએ પોસ્ટ મુકી હતી,શિવાજી મહારાજની જયંતિને લઇ મુકી હતી પોસ્ટ pic.twitter.com/BMBBDvvjNH
यह हरियाणा के जज साहब ने अपनी कुर्सी पर रहते हुए प्रवचन दिए और इस बात को 2 साल हो चुके हैं यह जो पूरे देश में हो रहा है उसके बाद भी जो लोग रेत सर में देकर बैठे हैं और सोच रहे हैं सब राजनीति के लिए हो रहा है तो वह जरा एक बार केरल के मल्लापुरम , हरियाणा के मेवात में रह कर देखें pic.twitter.com/sOulrkBEwo
इसका कोई धार्मिक आधार नहीं है इस्लामिक आक्रांताओं के द्वारा डरा कर हिन्दुओं के उपर थोपा गया एक वाक्य हे जिसको गुलाम नेताओं के द्वारा समय-समय पर तुष्टीकरण के लिए उपयोग किया जाता है।
न्यूज 18 गुजराती द्वारा साझा की गई ऑडियो रिकॉर्डिंग में मोर ने महिला से गु्स्से में कहा कि ऐसे पोस्ट आते ही रहेंगे। वह बोला, “ये नया पाकिस्तान बन गया है। यहाँ सब मुस्लिम हैं। हिंदुओं को यहाँ से चले जाना चाहिए।” जब महिला ने हैरानी से पूछा कि आखिर वो ऐसी बातें क्यों कर रहा है तो मोर ने फिर कहा, “जो है वो है। यहाँ से अब जाओ।”
सोसायटी के एक शख्स ने मीडिया से बातचीत में बताया कि इस प्रकार की बयानबाजी उस शख्स की ओर से आई है जो कि कोई जाहिल नहीं बल्कि पढ़ा-लिखा वकील है। चश्मदीदों ने कहा, “वो हमेशा हमारे साथ नॉर्मल रहता था। लेकिन कुछ समय से उसने कट्टरपंथियों वाले शब्द प्रयोग करने शुरू कर दिए और अपनी वेषभूषा भी बदल दी। उसने भगवान के फोटो फ्रेम और भगवान गणेश की प्रतिमा को तोड़ने का काम भी किया था।”
चश्मदीद ने बताया कि भगवान गणेश की हर मूर्ति को तोरण से सोहिल ने तोड़ने का काम किया है। सोसायटी के हिंदुओं को शक है कि हुसैन के ऐसे कट्टर विचारों के पीछे कोई बड़ा रैकेट हो सकता है। चश्मदीद बताते हैं, “जैसे किशन भरवड के मामले में पाकिस्तान का नाम सामने आया है…। ये कह रहा है कि ये पूरी सोसायटी को पाकिस्तान में बदल देगा और हिंदुओं को यहाँ से जाना चाहिए। तुम मुझे कब तक रोक पाओगे। मुझे सपोर्ट करने वाली बड़ी फौज है।”
रिपोर्ट के अनुसार, मोर ने अपनी वॉट्सऐप डीपी पर भी I Support hijab लगा रखा है। सोढा रविवार को जब मोर से बात करने गईं तो मोर नाराज हो गया और उन्हें चाकू से मारने की धमकी। इसके बाद हंगामा मचाया गया और भगवान गणेश की मूर्ति भी तोड़ दी। जल्द से जल्द इस संबंध में पुलिस को सूचित किया गया। पुलिस कॉन्सटेबल ने इस बीच मामला सुलझाने का प्रयास किया मगर मोर बीच में आया और उन्हें भी पीटा। फरवरी 20 को विभिन्न धाराओं मे कॉन्सटेबल डंगार पर मामला दर्ज हुआ और सोमवार को उसकी गिरफ्तारी हुई।