Showing posts with label law. Show all posts
Showing posts with label law. Show all posts

हिंदू संत को बांग्लादेश ने क्यों किया गिरफ्तार, क्या बदले की कार्रवाई कर रही मोहम्मद यूनुस सरकार

                             पुलिस की गिरफ्त में चिन्मय कृष्ण दास (फोटो साभार: @deepscribble)
बांग्लादेश में हिन्दू संत चिन्मय कृष्ण दास को सोमवार (25 नवम्बर, 2024) को गिरफ्तार कर लिया गया था। उन्हें मंगलवार को भी जमानत नहीं दी गई। बांग्लादेश की पुलिस ने हिन्दुओं पर इस्लामी कट्टरपंथियों के उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने वाले चिन्मय दास को कथित देशद्रोह के मामले में गिरफ्तार किया है। वर्तमान में वह जेल में हैं। उनकी रिहाई के लिए हिन्दुओं ने प्रदर्शन किया तो उन पर भी पुलिस ने हमला किया और इस्लामी कट्टरपंथियों ने भी उन्हें निशाना बनाया।

चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी के बाद युनुस सरकार पर सवाल उठ रहे हैं। बांग्लादेश के कानून के जानकार कह रहे हैं कि चिन्मय कृष्ण दास के मामले में सही प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ है। कुछ का कहना है कि जिस आधार पर चिन्मय दास पर कार्रवाई हुई है, वैसे ही कार्रवाई बाकी पर होने लगे तो हजारों लोग देशद्रोह के दोषी हो जाएँगे। 

किस मामले में गिरफ्तार हुए चिन्मय कृष्ण दास?

 25 अक्टूबर, 2024 को बांग्लादेश के चटगाँव में हिन्दुओं ने एक रैली आयोजित की। इस रैली का नेतृत्व चिन्मय कृष्ण दास कर रहे थे। यह रैली चटगाँव में ऐतिहासिक लाल दीघी मैदान में आयोजित की गई थी। इसमें हजारों हिन्दू शामिल हुए थे। चटगाँव में यह रैली हिंदुओं पर इस्लामी कट्टरपंथियों के हमलों के विरोध में आयोजित की गई थी।

इस रैली के दौरान हिन्दुओं ने भगवा झंडे लहराए और सरकार से कार्रवाई की माँग की। चटगाँव में हुई इस रैली के कारण इस्लामी कट्टरपंथी बिदक गए। उन्होंने इस रैली में एक जगह पर एक भगवा झंडा, बांग्लादेश के झंडे से ऊँचा लहराता हुआ देख लिया।

इसी के आधार पर फिरोज खान नाम के एक शख्स ने चटगाँव में ही चिन्मय कृष्ण दास समेत 19 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज करवाई। फिरोज खान ने आरोप लगाया कि बांग्लादेश का झंडा नीचे करके लहराया जा रहा था जो इसका अपमान है और यह देशद्रोह का कार्य है। फिरोज ने आरोप लगाया कि इससे चिन्मय कृष्ण दास देश में अशांति लाना चाहते हैं।

इसके बाद चिन्मय कृष्ण दास को गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें चटगाँव की अदालत में पेश किया गया। यहाँ मजिस्ट्रेट काजी नजरुल इस्लाम ने उन्हें देशद्रोह का आरोपित मानते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया और जेल भेज दिया।

क्या कहता है कानून?

यह बात सही है कि बांग्लादेश के कानून के अनुसार, राष्ट्रीय झंडे से ऊपर कोई झंडा नहीं फहराया जा सकता। बांग्लादेश झंडा कानून, 1972 के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति ऐसा करता पाया जाता है तो उसे 1 साल तक की सजा या फिर 5000 टका का जुर्माना हो सकता है। उस पर कोर्ट दोनों भी लगा सकती है।
इसके अलावा झंडे का अपमान करने पर बांग्लादेश की दंड संहिता की धारा 124 भी लग सकती है। इसका संबंध देशद्रोह से है। यदि झंडे के अपमान में या साबित होता है कि उस व्यक्ति ने देशद्रोह भी किया है, तो उसे आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है। उस पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

वकीलों ने क्या बताया?

ढाका ट्रिब्यून की एक खबर के अनुसार, बांग्लादेश के बड़े वकीलों ने कहा कि यदि किसी ने झंडे का अपमान किया भी है, तो इससे यह नहीं सिद्ध होता कि वह देशद्रोही है। उन्होंने बताया कि अगर ऐसा होता तो जिन फैन्स ने अपनी फेवरेट टीम का झंडा, बांग्लादेश के झंडे से ऊपर फुटबॉल मैच के दौरान दिखाया, वह भी देशद्रोह के आरोपित बन जाते।
वकीलों ने बताया कि अगर किसी को लगता है कि किसी दूसरे व्यक्ति के झंडा फहराने के कारण उसकी देशभक्ति की भावना आहत हुई है तो वह मामला दर्ज करवा सकता है। ऐसी स्थिति में पहले कोर्ट मामले की जाँच करेगा और तय करेगा कि देशद्रोह का आरोप बनता भी है या नहीं।
चिन्मय कृष्ण दास के मामले में उन्हें बिना कोई राहत दिए हुए और मामले की जाँच किए बगैर ही देशद्रोही करार दिया जा रहा है। उन्हें कानूनी सहायता भी नहीं मिल रही है। बांग्लादेश के बड़े वकील ZI खान पन्ना ने बताया कि अगर किसी पर धारा 121 और 124 के आधार पर देशद्रोह का मामला दर्ज करना है तो इसके लिए पहले गृह मंत्रालय से अनुमति लेनी पड़ती है।
पन्ना ने इस बात पर हैरानी जताई है कि एक पुलिस थाने ने अपने ही मन से यह मामला दायर कर दिया। उन्होंने यूनुस सरकार पर नाराजगी जताते हुए कहा कि कल को अगर मोहम्मद यूनुस सत्ता से बाहर होंगे तो उन पर भी ऐसे ही देशद्रोह का मुकदमा लादा जाएगा। उन्होंने इस मामले में पूर्वाग्रह की बात कही है। 

क्या चिन्मय कृष्ण दास के साथ हो रहा भेदभाव?

चिन्मय कृष्ण दास बांग्लादेश में शेख हसीना के तख्तापलट के बाद से हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। वह बांग्लादेश में हिन्दू अधिकारों के लिए बोलने वाला एक बड़ा नाम बन कर उभरे हैं। उनकी धार्मिक पृष्ठभूमि के कारण उनको समर्थन भी अच्छा-ख़ासा है।
जिस दिन उन्हें यूनुस सरकार ने गिरफ्तार किया, तब भी वह ढाका से चटगाँव हिन्दुओं के लिए ही प्रदर्शन में जा रहे थे। इससे पहले कि वह चटगाँव पहुँचते, उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद उन्हें जमानत भी नहीं दी गई। चिन्मय कृष्ण दास के समर्थकों पर भी लाठी-डंडे चले।
मोहम्मद यूनुस की सरकार आने के बाद बांग्लादेश के न्यायालय एक के बाद एक मामले मसे देश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया को बरी करते जा रहे हैं। उनके अलावा देश भर में कई ऐसे मौलाना हैं जो भड़काऊ बयानबाजी करते हैं, उन पर कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। यूनुस सरकार ने सत्ता में आते ही अल कायदा से जुड़े आतंकी संगठन के एक आतंकी को छोड़ दिया था।
ऐसे में शांति और सद्भाव का सन्देश देने वाले हिन्दू संत चिन्मय कृष्ण दास को गिरफ्तार करना और फिर उन्हें जमानत नहीं दिए जाने का कारण सिर्फ इस्लामी कट्टरपंथी सोच को ही माना जा सकता है। बांग्लादेश की सरकार में शामिल दो एडवाइजर ISKCON को प्रतिबंधित करने की माँग कर चुके हैं। यह कथित छात्र नेता हैं।


ईरान : ‘Morality Police’ को ख़त्म किया, हट सकता है हिजाब-बुर्का वाला कानून भी

                                                  ईरान में हिजाब विरोधी प्रदर्शन (फोटो साभार: AP)
ईरान में महसा अमिनी (Mehsa Amini) की हत्या के बाद उठे हिजाब विरोधी तूफान में अंतत: इस्लामी सरकार को झुकना पड़ा है। अपनी क्रूरता के लिए कुख्यात मोरालिटी पुलिस (Morality Police) को खत्म कर दिया है। वहीं, हिजाब पहनने की अनिवार्य को खत्म करने पर वहाँ की सरकार विचार कर रही है।

मोरालिटी पुलिस को खत्म करने को लेकर अटॉर्नी जनरल मोहम्मद जफर मोंटाज़ेरी ने कहा, “नैतिकता पुलिस का न्यायपालिका से कोई लेना-देना नहीं है।” अटॉर्नी जनरल यह जवाब तब दिया, जब उनसे इस विभाग को बंद करने को लेकर उनसे सवाल किया गया।

साल 2006 में तत्कालीन राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद ने हिजाब कल्चर को बढ़ावा देने के लिए इसकी स्थापना की थी। इसे गश्त-ए-इरशाद के नाम से जाना जाता था। यह पुलिस उन महिलाओं पर कड़ी निगाह रखती थी, जो हिजाब या इस्लामी कपड़े नहीं पहनती थी।

मोरल पुलिस की ईरान में क्रूरता की कई कहानियाँ हैं। महसा अमिनी की हत्या भी मोरल पुलिस की हिरासत में हुई थी। मोरल पुलिस ने महसा पर आरोप लगाया गया था उन्होंने सार्वजनिक जगह पर हिजाब को सही से नहीं पहना है। इसके बाद उन्हें सुधार के नाम पर हिरासत में ले लिया गया, जहाँ अत्यधिक पिटाई के कारण मौत हो गई।

हालाँकि, सिर्फ मोरालिटी पुलिस को ही खत्म कर देने से ईरान की महिलाएँ मानने को तैयार नहीं हैं। वे हिजाब और बुर्के की कठोरता से भी आजादी चाहती हैं। इसको लेकर उनका प्रदर्शन लगातार जारी है। ईरान की मुस्लिम महिलाओं को दुनिया भर से मिल रहे समर्थन के दबाव के बाद ईरान सरकार हिजाब की अनिवार्यता पर विचार कर रही है।

ईरान के अटॉर्नी जनरल मोहम्मद जफ़र मोंटेज़ेरी ने कहा कि हिजाब और बुर्के की अनिवार्यता को खत्म करने के लिए कानून में किसी बदलाव की ज़रूरत है या नहीं, इसको ध्यान में रखते हुए संसद और न्यायपालिका काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि एक-दो सप्ताह बाद इसके परिणाम देखने को मिलेंगे।

सन 1979 में मौलना खुमेनाई के नेतृत्व में ईरान में इस्लामी क्रांति हुई थी और राजशाही को उखाड़ फेंका गया था। इसके चार साल बाद यानी 1983 में महिलाओं के लिए बुर्का और हिजाब अनिवार्य कर दिया गया था। इसके बाद कट्टर इस्लामी कानून लगातार थोपे जा रहे हैं।

पूर्व सुधारवादी राष्ट्रपति मोहम्मद खातमी के रिश्तेदारों द्वारा गठित यूनियन ऑफ इस्लामिक ईरान पीपल पार्टी ने माँग की है कि अनिवार्य हिजाब कानून को रद्द किया जाए और इसके लिए जरूरी हुआ तो कानूनी बदलाव की जाए। वहीं, मुल्क के रूढ़ीवादी अभी भी इस्लामी रीतियों पर अड़े रहने की बात कर रहे हैं।

एक तरफ ईरान की सरकार कानून में बदलावों की बात करही है तो दूसरी तरफ हिजाब विरोधी प्रदर्शनों को कुचलने के लिए हर तरह का प्रयास कर रही है। बता दें कि महसा अमिनी की हत्या के बाद भड़के विरोध प्रदर्शनों में अब तक 450 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। इनमें महिलाएँ और बच्चे भी शामिल हैं। वहीं, प्रदर्शन करने के आरोप में ईरान इस्लामी सरकार कुछ नाबालिगों को फाँसी की सजा दे सकती है।

विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेने के लिए तीन नाबालिगों को दोषी ठहराया गया है। इन तीनों को राजधानी तेहरान में कई लोगों के साथ मिलकर एक पुलिस अधिकारी को जान से मारने का भी आरोप लगाया गया था। आरोप है कि ईरानी पैरामिलिट्री फोर्स के सदस्य को मारने के लिए चाकू, पत्थरों और बॉक्सिंग गलव्ज का इस्तेमाल किया गया।

दुनिया भर के मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि प्रदर्शनों में शामिल होने के कारण इन बच्चों को फाँसी की सजा देने के लिए ईरानी सरकार हथकंडे अपना रही है। नाबालिगों को फाँसी देने के मामले में ईरानी दुनिया में नंबर वन है। फिलहाल 200 नाबालिगों को गिरफ्तार किया जा चुका है और 300 नाबालिग सरकारी फायरिंग में घायल हुए हैं। इन प्रदर्शनों में अब तक 60 बच्चों की जान जा चुकी है, जिनमें 12 लड़कियाँ भी शामिल हैं।