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कंगाली से जूझते बांग्लादेश को ‘काले धन’ का सहारा, विदेश में जमा 21.8 लाख करोड़ रूपए पर नजर: बर्बादी की कगार पर कपड़ा उद्योग

                    कर्ज में डूबा बांग्लादेश विदेशों से अपनी 230 अरब डॉलर की संपत्ति वापस लाने में जुटा
पाकिस्तान की कंगाली के बाद बांग्लादेश भी उसी स्थिति में लगभग पहुँच चुका है। मुस्लिम कट्टरपंथियों ने सोंचा था कि शेख हसीना को हटाकर बांग्लादेश को ऊँचे स्तर पर ले जाएंगे। कमांड मुहम्मद यूनुस के हाथों में देकर हिन्दुओं पर जानलेवा हमले कर कट्टरपंथी बड़े सुरमा भोपाली बन रहे थे। हसीना की कमाई पर उछल-कूद हो रही थी, लेकिन चुनाव के बाद नई सरकार बनने पर मालूम हुआ कि बांग्लादेश बदहाली में पहुँच चुका है। और उस बदहाली से निकलने के लिए देश को किसी अनुभवी प्रशासक की जरुरत है। और जिस तरह यूनुस की छत्रसाया में कट्टरपंथी उपद्रव का नंगा नाच कर रहे थे और अवाम भी कट्टरपंथियों की उँगलियों पर नाच रहे थे तभी राजनीतिक पंडितो को आशंका थी कि बहुत जल्द बांग्लादेश कंगाली की ओर जा रहा है। 

कट्टरपंथियों का कुछ नहीं गया उन्होंने तो हिन्दुओं पर हमले करवाकर अपनी तिजोरियां भर ली, मुल्क को बदहाल कर दिया जिसका अंजाम अवाम को भुगतना पड़ रहा है, अभी और भुगतेगी। आखिर तख्ता पलट कर मुल्क को क्या मिला? जिस कौम ने बांग्लादेश निर्माता शेख मुजीबुर्रहमान को नहीं बक्शा मुजीब की बेटी को क्यों बख्शेंगे। मुजीब के स्टेचू को तोड़ने में बड़ा फक्र महसूस कर रहे थे। पहले सरकारी सम्पत्तियों को खूब नुकसान पहुँचाया और फिर हसीना के देश छोड़ने के बाद हिन्दुओं पर जानलेवा हमले। उपद्रव में शामिल लोगों को क्या मिला? आखिर किस वजह से तख्ता पलट किया?         

बांग्लादेश की तारिक रहमान सरकार पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के 15 साल के शासनकाल के दौरान कथित तौर पर देश से बाहर भेजी गई 230 अरब डॉलर से अधिक की संपत्ति वापस लाने की कोशिशें तेज कर रही है। इससे पहले मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने कहा था कि बांग्लादेश से 234 अरब डॉलर से ज्यादा की रकम ‘चोरी‘ की गई थी। सरकार ने यह भी कहा था कि इस धन की वापसी में मदद करना ब्रिटेन की ‘नैतिक जिम्मेदारी’ है।

लेकिन अब मौजूदा सरकार इस 230 अरब डॉलर की राशि को वापस लाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। वहीं पश्चिम एशिया में चल रहे संकट के कारण बांग्लादेश की आर्थिक चुनौतियाँ और बढ़ गई हैं। मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने यह भी कहा था कि शेख हसीना के शासन के अंतिम वर्षों में हर साल लगभग 16 अरब डॉलर बांग्लादेश से बाहर भेजे जा रहे थे।

रिपोर्ट्स के अनुसार, नई सरकार ने विदेशों में भेजी गई संपत्तियों को वापस लाने के प्रयास और तेज कर दिए हैं। तारिक रहमान सरकार इस मामले में अंतरराष्ट्रीय सहयोग हासिल करने की कोशिश कर रही है और बड़े उद्योगपतियों व शेख हसीना के शासनकाल से जुड़े लोगों के खिलाफ कानूनी मामले भी दर्ज कर रही है।

हालाँकि, सरकार इस धन को वापस लाने के लिए बेहद उत्सुक है, लेकिन उसे इस बात का भी एहसास है कि यह काम आसान नहीं है। बांग्लादेश के पास विदेशों में छिपाई गई संपत्तियों का पता लगाने और उनसे जुड़े जटिल कानूनी मामलों को संभालने का पर्याप्त अनुभव नहीं है। यह काम भूसे के ढेर में सुई ढूँढने जैसा माना जा रहा है।

बांग्लादेशी अधिकारियों का कहना है कि अगर कोई बड़ी रकम वापस मिलती भी है तो इसमें कई साल, बल्कि दशकों तक लग सकते हैं। वहीं, शेख हसीना के सत्ता से हटने और देश छोड़ने के बाद से बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था भी काफी कमजोर हो गई है।

बांग्लादेश सरकार के अधिकारी खुद मानते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है। हाल की रिपोर्ट्स के अनुसार, बांग्लादेश का बैंकिंग क्षेत्र लगभग ढहने की स्थिति में पहुँच गया है। बैंकों को खराब कर्ज (NPL) कुल ऋण का करीब 30 से 35 प्रतिशत तक पहुँच गए हैं, जो दुनिया में सबसे अधिक स्तरों में से एक है। कई बैंक आर्थिक रूप से इतने कमजोर (Insolvent) हो गए हैं कि वे अपने दम पर चलने की स्थिति में नहीं हैं। कुछ बैंकों को दूसरे बैंकों में मिलाना (Merge) पड़ा है।

वहीं बांग्लादेश का विदेश मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserve), जो 2021 में शेख हसीना सरकार के दौरान लगभग 48 अरब डॉलर तक पहुँच गया था, 2024 तक घटकर 20 अऱब डॉलर के स्तर पर आ गया। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसके पीछे खराब प्रबंधन और वित्तीय गड़बड़ियाँ भी एक बड़ा कारण है।

इसके अलावा वित्त वर्ष 2024-25 में बांग्लादेश की GDP वृद्धि दर घटकर 3.49 प्रतिशत रह गई। हालाँकि, 2025-26 के वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था के 4.6 से 4.9 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान लगाया जा रहा है।

इसके अलावा वित्त वर्ष 2024-25 में बांग्लादेश की GDP वृद्धि दर घटकर 3.49 प्रतिशत रह गई। हालाँकि, 2025-26 के वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था के 4.6 से 4.9 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान लगाया जा रहा है।

ईरान के खिलाफ अमेरका और इजरायल के युद्ध से पैदा हुए ऊर्जा संकट का भी बांग्लादेश पर गंभीर असर पड़ा है। बांग्लादेश अपनी तेल और ईंधन की जरूरतों का लगभग 95 प्रतिशत आयात करता है, इसीलिए बढ़ती ऊर्जा कीमतों ने उसकी अर्थव्यवस्था पर बड़ा दबाव डाला है। बांग्लादेश के वित्त मंत्री आमिर खोसरो महमूद चौधरी ने हाल ही में कहा कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में रुकावट और ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी के कारण पिछले तीन महीनों में देश के खजाने को लगभग 4 अरब डॉलर का ‘नुकसान’ हुआ है।

आर्थिक दबाव बढ़ने के कारण बांग्लादेश को अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से 3 अरब डॉलर का कर्ज माँगना पड़ा है। इसके लिए देश के IMF, विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक (ADB) जैसे संस्थानों से सहायता की माँग की है। यह कदम तब उठाया गया जब चालू वित्त वर्ष में देश का राजकोषीय घाटा बढ़कर अनुमानित 3.6 प्रतिशत तक पहुँच गया।

इस बीच वित्त मंत्री महमूद चौधरी ने कहा कि BNP के नेतृत्व वाली सरकार उन संपत्तियों को वापस लाने के प्रयास और तेज कर रही है, जिन्हें वह ‘लूटी गई संपत्ति’ बताती आई है। उन्होंने कहा, “इस समय जब देश गंभीर वित्तीय समस्याओं का सामना कर रहा है, तब जितनी भी रकम वापस मिल सके, वह हमारे लिए मददगार साबित होगी।”

इस साल अप्रैल में प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने बांग्लादेश की संसद को बताया कि विदेशों में भेजी गई संपत्तियों को वापस लेने के प्रयास और मजबूत किए जा रहे हैं। इसके लिए संबंधित देशों के साथ जानकारी साझा करने, संपत्तियों की पहचान करने और कानूनी सहयोग बढ़ाने पर काम किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि विदेशों में जमा या भेजी गई अवैध संपत्तियों को वापस लाना उनकी सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक है।

बांग्लादेश उन संपत्तियों का पता लगाने की कोशिश कर रहा है जो ब्रिटेन, अमेरिका, UAE और सिंगापुर सहित कई देशों में मौजूद हैं। इसके लिए नए केंद्रीय बैंक गवर्नर मोहम्मद मुस्ताकुर रहमान की अगुवाई में एक विशेष टास्क फोर्स भी बनाई गई है, जिसका काम विदेशों में मौजूद बांग्लादेसी धन का पता लगाना और उसे वापस लाना है।

वित्त मंत्री आमिर खोसरो महमूद चौधरी ने कहा कि वित्तीय गड़बड़ियों के कारण कई बैंकों की वित्तीय स्थिति बेहद खराब हो गई है। उनके अनुसार, कुछ बैंकों की बैलेंस शीट ‘शून्य या घाटे’ में पहुँच गई, जिसके चलते सरकार को उनमें फिर से पूँजी डालनी पड़ी। चौधरी ने कहा, “शेख हसीना से जुड़े कारोबारी और राजनेता लगभग 234 अरब डॉलर देश से बाहर ले गए, जिससे बैंकिंग क्षेत्र गंभीर संकट में आ गया।”

इसी कारण जून 2026 में रहमान सरकार को बैंकिंग क्षेत्र को संभालने और उसे फिर से मजबूत बनाने के लिए 3.2 अरब डॉलर का आपातकालीन सहायता पैकेज देने का फैसला करना पड़ा।

महँगाई भी बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था के लिए लगातार एक बड़ी समस्या बनी हुई है। नए केंद्रीय बैंक गवर्नर द्वारा कई महीनों तक सख्त मौद्रित नीतियाँ अपनाने के बावजूद महँगाई दर 8 प्रतिशत से ऊपर बनी हुई है, जो दक्षिण एशिया में सबसे अधिक मानी जा रही है। मई 2026 तक बांग्लादे की महँगाई दर 9.42 प्रतिशत दर्ज की गई, जो अप्रैल 2026 में 9.04 प्रतिशत थी। इसका मतलब है कि एक महीने में महँगाई और बढ़ गई, जिससे लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों का खर्च भी बढ़ता जा रहा है।

ईरान युद्ध से पहले, उसके दौरान और उसके बाद भी बांग्लादेश में आम लोगों के लिए भोजन, ईंधन, किराया और अन्य जरूरी सेवाओं की कीमतें लगातार बढ़ती रहीं। देश अभी कोविड-19 महामारी के असर से पूरी तरह उबर भी नहीं पाया था कि राजनीतिक अस्थिरता ने उसकी मुश्किलें और बढ़ा दीं।

बांग्लादेश में गरीबी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। देश की कुल गरीबी दर 27.9 प्रतिशत है, जबकि 9.3 प्रतिशत लोग सबसे ज्यादा गरीबी में जीवन बिता रहे हैं। इसका मतलब है कि देश की एक चौथाई से भी अधिक आबादी राष्ट्रीय गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही है।

इसके अलावा कई ऐसे परिवार जो पहले गरीबी रेखा से ‘थोड़ा ऊपर’ थे, अब बढ़ती महँगाई के कारण फिर से गरीबी की ओर बढ़ रहे हैं। उनकी आय कीमतों में हो रही बढ़ोतरी के साथ तालमेल नहीं बैठा पा रही है।

सरकारी कर्ज भी बांग्लादेश के लिए चिंता का विषय बन गया है। देश पर कुल सार्वजनिक कर्ज 22 लाख करोड़ टका से अधिक हो चुका है, जो उसकी GDP का लगभग 40 से 42 प्रतिशत है। इस महीने बांग्लादेशी मीडिया की रिपोर्ट्स में कहा गया कि अगर सरकार अगले वित्त वर्ष में कोई नया कर्ज भी नहीं लेती, जो कि संभव नहीं माना जा रहा, “तब भी उसे पहले से लिए गए कर्ज के मूलधन और ब्याज की अदायगी के लिए लगभग 4.35 ट्रिलियन टका खर्च करने पड़ेंगे।”

पिछले दो वर्षों में राजनीति में उथल-पुथल के कारण बांग्लादेश में निवेश में बड़ी गिरावट आई है। नई सरकार विदेशी निवेश आकर्षित करने की कोशिश कर रही है, लेकिन देश में समय-समय पर होने वाली सांप्रदायिक हिंसा और अशांति के कारण निवेशकों का भरोसा पूरी तरह बन पा रहा है। इसलिए कई निवेशक नया पैसा लगाने या नई परियोजनाएँ शुरू करने से बच रहे हैं।

बांग्लादेश के कपड़ा उद्योग की, जो कभी उसकी अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत माना जाता था, आज मुश्किल दौर में गुजर रहा है। करीब 23 अरब डॉलर कीमत वाला यह उद्योग तैयार रेडीमेड गारमेंट्स के क्षेत्र को धागा और अन्य सामग्री उपलब्ध कराता है। रेडीमेड गारमेंट्स क्षेत्र बांग्लादेश की कुल निर्यात आय का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा देता है। लेकिन राजनीतिक अस्थिरता और भारत के साथ बढ़े तनाव ने इस उद्योग की समस्याओं को और बढ़ा दिया है।

वहीं, भारत यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ व्यापारिक समझौते करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जिससे भारतीय कपड़ा और परिधान उद्योग को बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है। अमेरिका पहले से ही भारतीय कपड़ा उत्पादों का सबसे बड़ा बाजार है, जहाँ हर साल लगभग 10.5 से 11 अरब डॉलर के उत्पाद निर्यात किए जाते हैं।

फरवरी 2025 में मोदी सरकार ने कपड़ा मंत्रालय का बजट बढ़ाकर 5,272 करोड़ रुपए कर दिया, जो पिछले वित्त वर्ष के 4,417 करोड़ रुपए से अधिक था। माना गया कि यह कदम उन कंपनियों को आकर्षित करने के लिए उठाया गया, जो बांग्लादेश से अपना कारोबार दूसरी जगह ले जाना चाहती थीं। इससे बांग्लादेश की आर्थिक मुश्किलें और बढ़ गईं।

मई 2025 में भारत ने बांग्लादेशी सामानों पर कुछ बंदरगाह प्रतिबंध लगाए। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह कदम मुहम्मद यूनुस के भारत के प्रति सख्त रुख के ‘जवाब’ में उठाया गया था। इन प्रतिबंधों से बांग्लादेश को 77 करोड़ डॉलर से अधिक का नुकसान होने का अनुमान है।

हालाँकि शेख हसीना के शासनकाल में भी बांग्लादेश कोई आदर्श आर्थिक मॉडल नहीं था, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि 2022 से 2025 के बीच देश ने कई क्षेत्रों में पीछे की ओर कदम बढ़ाए हैं। इसका मतलब है कि गरीबी कम करने और आर्थिक सुधार के क्षेत्र में हुई कई वर्षों की प्रगति कमजोर पड़ती दिखाई दी।

साफ हो गया है कि आज बांग्लादेश गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। इसी कारण सरकार विदेशों में भेजी गई 230 अरब डॉलर की संपत्तियों को वापस लाने की कोशिश कर रही है।

दिलचस्प बात यह है कि यही बांग्लादेश कभी भारत के कुछ उदारवादी टिप्पणीकारों द्वारा एक सफल आर्थिक मॉडल के रूप में पेश किया जाता था। उनका कहना था कि आकार में छोटा होने के बावजूद आर्थिक विकास के मामले में ‘बांग्लादेश भारत से आगे’ निकल रहा है। जर्मनी में रहने वाले यूट्यूबर ध्रुव राठी, मोदी विरोधी राजनीतिक दलों और कुछ वामपंथी मीडिया संस्थानों ने भी समय-समय पर ऐसे दावे किए।

कुछ भारतीय उदारवादी टिप्पणीकार और राजनीतिक समूह ‘बांग्लादेश चमत्कार’ की कहानी को बढ़ावा देते रहे, ताकि मोदी सरकार की आलोचना की जा सके। लेकिन वे भारत और बांग्लादेश की अर्थव्यवस्थाओं, आबादी और राजनीतिक परिस्थितियों के बड़े अंतर को नजरअंदाज करते रहे। जहाँ बांग्लादेश की GDP लगभग 450 अरब डॉलर है, वहीं भारत की अर्थव्यवस्था करीब 4 ट्रिलियन डॉलर की है, जो उससे 8-9 गुना बड़ी है।

यह सच है कि भारत ने पहले अपने कपड़ा उद्योग की पूरी क्षमता का उपयोग नहीं किया था और इस क्षेत्र में बांग्लादेश को बढ़त हासिल थी। लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था बहुत बड़ी और विविध है, इसलिए अब वह इस क्षेत्र में भी तेजी से अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है।

कुछ भारतीय उदारवादी यह भी कहते रहे हैं कि प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income) के मामले में बांग्लादेश भारत से थोड़ा आगे है। उनके अनुसार बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति आय 2,911 डॉलर है, जबकि भारत की 2,812 डॉलर। वे इसे भारत के लिए चिंता का विषय बताते हैं। हालांकि आलोचकों का कहना है कि यह अंतर कई बार मुद्रा विनिमय दरों और बांग्लादेश की निर्यात-आधारित अर्थव्यवस्था के कारण दिखाई देता है।

केवल कुछ चुनिंदा आँकड़ों को देखने के बजाए पूरी तस्वीर पर ध्यान देना चाहिए। भारत की अर्थव्यवस्था आकार, संपत्ति और विविधता के मामले में बांग्लादेश से कहीं बड़ी है। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, जबकि बांग्लादेश चावल, बिजली और अन्य जरूरी वस्तुओं के लिए काफी हद तक भारत पर निर्भर है।

लेकिन मोदी सरकार और भाजपा का विरोध करने वाले राजनीतिक और वैचारिक कारणों से भारत की उपलब्धियों को कम करके दिखाते हैं। पहले भी इन्होंने यह तर्क दिया था कि ‘तालिबान शासित अफगानिस्तान की मुद्रा भी भारतीय रुपए से मजबूत है’, जिसे उन्होंने भ्रामक तुलना बताया है।

जय श्रीराम के नारों से गूंज उठा बांग्लादेश; प्रभु श्रीराम की फोटो पर जूते मारने वालो को गिरफ्तार करो; सभी 64 ज़िलों में बनेगा राम मन्दिर

                   राम चित्र अपमान पर ढाका में हिंदुओं का विरोध प्रदर्शन। (फोटो साभार - दिनाजपुर टीवी)
आज भारत के अधिकांश राज्यों में भगवा लहराने का देश पर इतना असर नहीं पड़ा जितना बंगाल में लहराने से पड़ना शुरू हुआ है। बंगाल चुनाव सिर्फ चुनाव नहीं था सनातन का शंखनाद था। बंगाल मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी यदि मुस्तैदी से सनातन विरोधियों पर कार्यवाही करते रहेंगे, बंगाल को घुसपैठ मुक्त करने से इसकी गूंज भारत ही नहीं विश्व में होगी। भारत में आज़ादी की चिंगारी बंगाल से निकली थी। ब्रिटिश सरकार महात्मा गाँधी या कांग्रेस से डरकर नहीं बल्कि बंगाली नेताजी सुभाष चंद्र बोस से डरकर गयी थी। हाथ कंगन को आरसी क्या पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या। बंगाल चुनाव के बाद से सनातन विरोधियों की पार्टियां धराशाही हो रही है। दफ्तर में छंटनी का कानून है last come first go शायद यही कानून सनातन विरोधी पार्टियों पर भी अपने आप लागु हो चूका है। 

टीवी पर होनी वाली परिचर्चाओं में मुस्लिम कट्टरपंथी और इनकी समर्थक पार्टियां जब घिर रही होती है तो मुद्दे से भटकाते संविधान की दुहाई देते नज़र आते हैं। अयोध्या राममन्दिर में 200 करोड़ रूपए के घोटाले को जिस तरह उछाला जा रहा है इसके पीछे हिन्दुओं को राममन्दिर से दूर करने का बहुत गहरा षड़यंत्र है। प्रभु श्रीराम द्वारा सच्चाई सामने आने पर हिन्दुओं को बाँटने वाले चाहे वह मीडिया हो या राम विरोधी पार्टियां सब चारों खाने चित होंगे। अगर बंगाल में शुभेंदु अधिकारी शंखनाद कर रहे है तो उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी पीछे नहीं रहने वाले।  

बांग्लादेश की राजधानी ढाका शुक्रवार (19 जून) को जय श्री राम के नारों से गूँज उठी। भगवान राम के अपमान के विरुद्ध सैकड़ों की संख्या में सड़क पर उतरकर हिंदुओं ने प्रदर्शन किया। मसाल जुलूस निकालते हुए इस्लामी कट्टरपंथियों पर कार्रवाई के लिए बांग्लादेश की सरकार को 72 घंटे का अल्टीमेटम दिया है। साथ ही कहा है कि देश के सभी 64 जिलों में एक-एक राम मंदिर का निर्माण किया जाएगा।

प्रदर्शनकारी ढाका के शाहबाग चौराहे पर इकट्ठा हुए थे। वहाँ उन्होंने बांग्लादेश सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और न्याय की माँग की। हिंदुओं ने सरकार को दोषियों को पकड़ने के लिए 72 घंटे का अल्टीमेटम दिया है। उन्होंने साफ कहा कि अगर तय समय में कार्रवाई नहीं हुई, तो वे रविवार (21 जून) को धार्मिक मामलों के मंत्रालय को ज्ञापन सौंपेंगे।

64 जिलों में आंदोलन की चेतावनी

मशाल जुलूस में शामिल हिंदुओं ने चेतावनी दी है कि यदि आरोपित गिरफ्तार नहीं हुए, तो आंदोलन पूरे देश में फैलेगा। बांग्लादेश के सभी 64 जिलों में उग्र प्रदर्शन किए जाएँगे। शनिवार (20 जून) को ‘बांग्लादेश पूजा उद्जापन परिषद’ ने भी देशव्यापी विरोध का ऐलान किया है। हिंदुओं का कहना है कि वे हर जिले में भगवान राम का मंदिर बनाकर रहेंगे।

जगह-जगह हुआ विरोध प्रदर्शन

शुक्रवार (19 जून) सुबह भी ढाका में अलग-अलग जगहों पर विरोध प्रदर्शन हुए। हिंदू महाजोत के दो गुटों ने नेशनल प्रेस क्लब और ढाका रिपोर्टर्स यूनिटी में कार्यक्रम किए। प्रेस क्लब के सामने एक बड़ा मानव बंधन बनाया गया। प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री से मिलने और रैलियाँ निकालने की भी योजना बनाई है। उनकी माँग है कि दोषियों को कड़ी सजा दी जाए।
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बांग्लादेश : भगवान राम के पोस्टर पर मारे जूते-चप्पल, जुमे की नमाज के बाद इस्लामी कट्टरपंथियों ने
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बांग्लादेश : भगवान राम के पोस्टर पर मारे जूते-चप्पल, जुमे की नमाज के बाद इस्लामी कट्टरपंथियों ने
भारत में घुसपैठियों को अपना दामाद बनाकर पालने वाले नेताओं और उनकी पार्टियों में लेशमात्र भी शर्म है सभी को एकजुट ह... 

पूरा मामला

रिपोर्ट्स के मुताबिक, रंगपुर डिवीजन के गाइबांधा जिले में भगवान राम का मंदिर और 81 फीट ऊँची प्रतिमा बनाई जा रही थी। कुछ कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों ने इस निर्माण को रुकवा दिया। आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान भगवान राम की तस्वीर वाले बैनर पर चप्पलें मारी गईं। इसका Video वायरल हुआ। इस घटना से हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाओं को गहरी ठेस पहुँची है।

बांग्लादेश : भगवान राम के पोस्टर पर मारे जूते-चप्पल, जुमे की नमाज के बाद इस्लामी कट्टरपंथियों ने दिखाई हिंदू घृणा: Video वायरल


भारत में घुसपैठियों को अपना दामाद बनाकर पालने वाले नेताओं और उनकी पार्टियों में लेशमात्र भी शर्म है सभी को एकजुट होकर बांग्लादेश में भगवान श्रीराम के पोस्टरों पर जूते-चप्पल मारे जाने का विरोध ही नहीं जहाँ-जहाँ अपनी कुर्सी की खातिर इन्हे छुपाकर रखे हो भारत और राज्य सरकारों को जानकारी देकर देश से बाहर धक्का दो। अन्यथा जनता इन पार्टियों को चुनावों में बंगाल से भी बुरी तरह हराकर सत्ता से बाहर करे।     

बांग्लादेश के रंगपुर डिवीजन में भगवान राम की निर्माणाधीन प्रतिमा को लेकर इस्लामी कट्टरपंथियों का बवाल लगातार जारी है। अब सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियोज सामने आएँ हैं, जिसमें भगवान राम के पोस्टर पर जिहादी जूते-चप्पल मारते दिख रहे हैं।

जानकारी के मुताबिक, गाईबांधा में जुमे की नमाज के बाद कुछ इस्लामी समूहों ने सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया और राम प्रतिमा निर्माण का विरोध जताया। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि प्रदर्शन के दौरान भगवान राम की तस्वीर वाले बैनरों के साथ अपमानजनक व्यवहार किया गया और उन पर जूते-चप्पल मारे गए।

बांग्लादेश के रंगपुर डिवीजन में भगवान राम की निर्माणाधीन प्रतिमा को लेकर इस्लामी कट्टरपंथियों की ओर से विरोध और उसे तोड़ने की धमकियाँ दिए जाने के कुछ दिनों बाद हिंदू मंदिर समिति को प्रतिमा का निर्माण कार्य रोकना पड़ा है।

एक बयान में मंदिर समिति के एक सदस्य ने मीडिया को बताया, “हम आपके हित में, राष्ट्र और समाज के हित में भगवान राम की मूर्ति का निर्माण कार्य रोक रहे हैं। सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने के लिए हम यह कार्य रोक रहे हैं। भविष्य में, यदि हमें आवश्यकता महसूस हुई, तो हम आपको बुलाएँगे, सभी हितधारकों के सुझाव लेंगे और कार्य पुनः आरंभ करेंगे।”

बंगाल में बीजेपी सरकार बनने से बांग्लादेश क्यों परेशान? क्यों बाड़बंदी से डरा बांग्लादेश?

बंगाल में BJP सरकार बनने के बाद बौखलाया बांग्लादेश, डर के मारे दे रहा भड़काऊ बयान (प्रतीकात्मक फोटो साभार: AI-ChatGPT)

पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार बनते ही पड़ोसी देश बांग्लादेश में बौखलाहट साफ नजर आ रही है। कहीं बंगाल की नई सरकार के खिलाफ सड़कों पर प्रदर्शन शुरू हो गए हैं, तो कहीं कट्टरपंथी मौलाना राज्य के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी को खुलेआम जान से मारने की धमकी दे रहे हैं। ना केवल कट्टरपंथी मौलाना बल्कि बांग्लादेश की सरकार में अहम पदों पर बैठे लोग भी इससे बौखलाहट में हैं।

इसके पीछे वजह केवल सरकार बदलना और एक पार्टी की जगह दूसरी पार्टी का आना नहीं है बल्कि उस पूरी वैचारिकी का बदलाव है जो इस सत्ता परिवर्तन से बंगाल में होने जा रहा है। भारत की खुली सीमा बांग्लादेश घुसपैठियों के लिए एक प्रवेश द्वार की तरह काम कर रही थी। ममता बनर्जी ने इसे बंद करने का विरोध कर रहीं थी लेकिन अब हालात बदल गए हैं। शुभेंदु अधिकारी ने बाड़बंदी को प्राथमिकता दी है और यही नकेल कट्टरपंथियों की बेचैनी को बढ़ाती जा रही है।

शुभेंदु सरकार का BSF को बाड़बंदी को दी जमीन, ममता सरकार ने अटकाकर रखी

बंगाल में सत्ता संभालते ही मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने अपने पहले ही कैबिनेट फैसलों में भारत-बांग्लादेश सीमा की सुरक्षा को सबसे बड़ी प्राथमिकता दी। नई सरकार ने फैसला लिया कि भारत-बांग्लादेश सीमा पर जिन इलाकों में अब तक बाड़बंदी नहीं हो सकी थी, वहाँ के लिए जरूरी जमीन 45 दिनों के भीतर BSF को सौंप दी जाएगी।

शुभेंदु अधिकारी ने साफ कहा कि उनकी सरकार सीमा सुरक्षा को लेकर कोई समझौता नहीं करेगी। राज्य सरकार के इस फैसले से सीमा पर बाड़बंदी पूरी होने के बाद डेमोग्राफी बदलने की साजिश के तहत घुसपैठ, मवेशियों की तस्करी और गैरकानूनी नेटवर्क पर रोक लगेगी।

तब जमीन ममता बनर्जी की TMC सरकार के कार्यकाल में अटका हुआ था। यह मामला कलकत्ता हाई कोर्ट तक पहुँचा था, तब हाई कोर्ट ने तत्कालीन ममता सरकार को फटकारा BSF को तय जमीन न देने के लिए फटकारा था और सरकार के अधिकारी पर ₹25 हजार का जुर्माना भी लगाया था।

बाड़बंदी के फैसले से बांग्लादेश में बेचैनी, तारिक रहमान के एडवाइजर का बयान

शुभेंदु सरकार के इस फैसले से बांग्लादेश में बेचैनी बढ़ गई। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के विदेशी मामलों के सलाहकार (एडवाइजर) हुमायूं कबीर ने इस फैसले पर कहा कि बांग्लादेश को ‘काँटेदार तार’ से डराया नहीं जा सकता। इसके साथ ही बांग्लादेश बॉर्डर गार्ड (BGB) को अलर्ट पर रखे जाने की भी खबर सामने आई है।

यानी जिस फैसले को पश्चिम बंगाल की नई BJP सरकार सीमा सुरक्षा और राष्ट्रीय हित से जोड़कर देख रही है, उसी फैसले ने बांग्लादेश में राजनीतिक और कट्टरपंथी हलकों की बेचैनी बढ़ा दी है।

बांग्लादेश में विरोध प्रदर्शन और कट्टरपंथियों के भड़काऊ बयान

बंगाल में BJP सरकार बनने के बाद बांग्लादेश के इस्लामी कट्टरपंथियों के बीच भी खलबली मची है। ये कट्टरपंथी सड़कों पर उतरकर बंगाल की नई सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। वहीं कई मौलाना भी खुलकर बंगाल की BJP सरकार और हिंदुओं के खिलाफ जहर उगलते दिखाई दे रहे हैं।

एक वायरल वीडियो में बांग्लादेश के कट्टरपंथी संगठन ‘इंसाफ कायमकारी छात्र श्रमिक जनता’ से जुड़े मौलाना ने हिंदू घृणा में कहा, “अगर भारत के 40 करोड़ मुस्लिम गुस्से में आ गए तो हिंदू नहीं बचेंगे।” उसने पाकिस्तान की मदद से भारत पर हमला करने और ‘तीन घंटे में कब्जा’ करने जैसे बयान भी दिए। वीडियो में उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का नाम लेकर धमकी दी।

शुभेंदु अधिकारी को बॉर्डर पर गाड़ने की धमकी

एक और वीडियो सामने आया, जिसमें एक मुस्लिम व्यक्ति बंगाल के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी को सीमा पर दफन करने की धमकी जारी कर रहा है। यह वीडियो ‘द इंकलाब’ नाम से फेसबुक पेज से प्रसारित किया जा रहा है। हालाँकि, पुलिस इस वीडियो की पुष्टि के लिए जाँच कर रही है।

उधर, बांग्लादेश का मौलाना इनायतुल्लाह अब्बासी कहता है कि अगर बंगाल में मुस्लिम सुरक्षित नहीं है, तो बांग्लादेश में भी हिंदुओं को सुरक्षित नहीं रहने दिया जाएगा। वह बांग्लादेश की तारिक रहमान सरकार को भारत के साथ व्यापारिक संबंध तोड़ने की चेतावनी देने के लिए भड़का रहा है।

बंगाल में ‘पोरिबर्तन’ की जमीनी हकीकत, सीमापार के गोरख धंधे होंगे अब बंद

पश्चिम बंगाल में BJP की बढ़ती राजनीतिक ताकत और चुनावी सफलता के बाद बांग्लादेश की बौखलाहट साफ दिख रही है। बंगाल की करीब 2200 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा बांग्लादेश से लगती है और इसका एक हिस्सा खुला हुआ था। वर्षों से यह इलाका अवैध घुसपैठ, पशु तस्करी, नकली नोटों के नेटवर्क तथा कट्टरपंथी गतिविधियों का हब बना हुआ था।

पश्चिम बंगाल में तुष्टिकरण की राजनीति के कारण सीमा सुरक्षा को लेकर ममता बनर्जी की सरकार में कठोर कदम नहीं उठाए गए। वोट बैंक की राजनीति के चलते अवैध घुसपैठियों को संरक्षण मिलता रहा और धीरे-धीरे कई सीमावर्ती जिलों की जनसांख्यिकी तक प्रभावित हुई। यहाँ तक बातें सामने आईं कि बांग्लादेश की और से किए अवैध कामों को तुष्टिकरण की राजनीति में डूबी सरकार की ‘ममता’ मिली हुई थी।

अवलोकन करें:-

बंगाल : मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी को बॉर्डर पर दफन करने की धमकी, बांग्लादेश का मौलाना बोला- मु

अब जैसे-जैसे बीजेपी का प्रभाव बढ़ रहा है तो वैसे-वैसे उन तत्वों में घबराहट दिख रही है जो सीमा पार से चलने वाले अवैध कारोबार और राजनीतिक संरक्षण पर निर्भर थे। बांग्लादेश के कट्टरपंथी संगठनों और वहाँ के मजहबी नेताओं और सरकारी अधिकारियों की प्रतिक्रियाओं को इसे से जोड़कर देखे जाने की जरूरत है। उन्हें डर है कि यदि बंगाल में सख्त प्रशासनिक व्यवस्था लागू होती है तो अब तक जिन अवैध गतिविधियों को संरक्षण मिला हुआ था उन पर अंकुश लग सकता है।

बांग्लादेश : कट्टरपंथ फैलाते-फैलाते यूनुस ने भर ली जेब, एक साल में 1.61 करोड़ टका बढ़ी संपत्ति: बीवी भी हुईं मालामाल


मुस्लिम कट्टरपंथियों के इशारे पर नाचने वाले उपद्रवियों को आंखें खोलनी चाहिए। उन्हें मिलती गोली, जेल या फिर जिस्मानी चोट, जबकि उनके आका अपनी तिजोरियां भर रहे हैं। पाकिस्तान और बांग्लादेश इसकी मिसाल है। ये हाल सभी जगह है। दंगों में मरता आम नागरिक है किसी कट्टरपंथी और उनके आकाओं के घर के परिंदे तक कुछ नहीं होता। मरती जनता ही है चाहे वह उपद्रवी ही क्यों न हो।   

बांग्लादेश चुनाव से दो दिन पहले मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के सलाहकारों की संपत्ति का ब्योरा जारी किया गया है। कैबिनेट डिवीजन ने इसे मंगलवार को जारी किया। इस ब्योरा के अनुसार 30 जून तक अंतरिम सरकार के प्रमुख सलाहाकार मोहम्मद यूनुस की कुल संपत्ति 15 करोड़, 62 लाख, 44 हजार और 65 टका है।

बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस की संपत्ति में पिछले एक साल के दौरान बड़ी बढ़ोतरी हुई है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, जून 2024 में मोहम्मद यूनुस की कुल संपत्ति 14.01 करोड़ टका थी, जो जून 2025 तक बढ़कर 15.62 करोड़ टका हो गई है।

यानी महज एक साल में उनकी दौलत करीब 1.61 करोड़ टका बढ़ गई। दिलचस्प बात यह है कि देश का नेतृत्व कर रहे यूनुस पूरी तरह कर्ज मुक्त हैं। यूनुस की कमाई में यह उछाल मुख्य रूप से बैंक बचत, फिक्स्ड डिपॉजिट (FD), निवेश योजनाओं और विरासत में मिले शेयरों की वजह से आया है।

मोहम्मद यूनुस की वित्तीय संपत्ति अब 14.76 करोड़ टका है, जबकि विदेशों में मौजूद उनकी संपत्ति भी बढ़कर लगभग 64.73 लाख टका हो गई है। साथ ही, उनकी बीवी अफरोजी यूनुस की संपत्ति भी 2.11 करोड़ से बढ़कर 2.27 करोड़ टका हो गई है। बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद नेताओं की संपत्ति सार्वजनिक करने की बढ़ती माँग के बीच ये आँकड़े सामने आए हैं।

एक साल पहले यह 14 करोड़, 13 लाख, 96 हजार और 73 टका थी. यानी, एक साल में मोहम्मद यूनुस की संपत्ति में 1 करोड़, 61 लाख, 4 हजार 392 टका की बढ़ोतरी हुई।

उन्होंने कहा कि सेविंग्स सर्टिफिकेट को कैश कराने, सेविंग्स या टर्म डिपॉजिट में बढ़ोतरी, विरासत में मिले शेयर वगैरह की वजह से कुल संपत्ति बढ़ी।

जानें यूनुस की पत्नी के पास कितनी संपत्ति

चीफ एडवाइजर की पत्नी अफरोजी यूनुस की कुल संपत्ति एक करोड़, 27 लाख, 63 हजार और 360 टका है। यह पिछले साल दो करोड़, 11 लाख, 77 हजार, 278 टका था. इस तरह से उनकी संपत्ति में 84 लाख, 13 हजार और 914 टका की कमी आई है।

प्रथम आलो की रिपोर्ट के अनुसार इनकम टैक्स एक्ट के मुताबिक, संपत्ति किसी टैक्सपेयर के मालिकाना हक वाली अचल, चल, फाइनेंशियल और कैपिटल संपत्ति का जोड़ है।

भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई का किया था वादा

उन्होंने अपने भाषण में यह भी बताया कि राज्य लेवल पर भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए संविधान के आर्टिकल 77 में किए गए वादे के मुताबिक एक ओम्बड्समैन नियुक्त करने के लिए एक ऑर्डिनेंस बनाया जाएगा।
उस साल 1 अक्टूबर को, अंतरिम सरकार के एडवाइजर और बराबर हैसियत वाले लोगों की इनकम और संपत्ति के खुलासे की पॉलिसी, 2024 जारी की गई थी।
पॉलिसी में कहा गया है कि अंतरिम सरकार के एडवाइजर और बराबर हैसियत वाले लोग, जो सरकार या रिपब्लिक की सेवा में काम कर रहे हैं, हर साल इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करने की आखिरी तारीख के 15 वर्किंग डेज के अंदर कैबिनेट डिवीजन के जरिए चीफ एडवाइजर को अपनी इनकम और संपत्ति जमा करेंगे।
अगर पत्नी या पति की अलग इनकम है, तो वह भी जमा करनी होगी। चीफ एडवाइजर इस बयान को अपनी समझ के हिसाब से पब्लिश करेंगे।

संपत्ति के ब्योरा नहीं देने पर आलोचना

लेकिन इसे अब तक पब्लिश न करने पर आलोचना भी हुई थी। इस बारे में चीफ एडवाइजर के प्रेस सेक्रेटरी शफीकुल आलम ने सोमवार को कहा था कि अंतरिम सरकार के सलाहकारों के एसेट स्टेटमेंट एक-दो दिन में पब्लिश कर दिए जाएंगे।
5 अगस्त, 2024 को हिंसक छात्र आंदोलन के बाद अवामी लीग सरकार गिरने के बाद, 8 अगस्त को प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी थी।

‘हिंदू संगठन शेख हसीना के पालतू कुत्ते’: युनूस के एडवाइजर शफीकुल आलम ने उगला जहर

                                                              शेख हसीना और मोहम्मद युनूस
बांग्लादेश में हिंदुओं पर इस्लामी कट्टरपंथियों का अत्याचार बढ़ रहा है और उसे सरकारी संरक्षण प्राप्त है यह बात किसी से अब छिपी नहीं है। हिंदुओं और अल्पसंख्यकों के खिलाफ बांग्लादेश की सरकार में नफरत किस कदर हावी हो गई है उसका अंदाजा यूनुस के चीफ एडवाइजर और प्रेस सेक्रेटरी शफीकुल आलम के बयान से लगाया जा सकता है। शफीकुल आलम ने एक इंटरव्यू में हिंदू संगठनों की तुलना पालतू कुत्तों से की है।

शफीकुल आलम ने दैनिक भास्कर से बातचीत में ‘भारत-बांग्लादेश’ के रिश्तों को लेकर कहा है कि भारत को बांग्लादेश को भूटान नहीं समझना चाहिए। आलम ने कहा, “हसीना के दौर में खुलेआम चुनाव में धांधली हुई। इसके बावजूद किसने हसीना का समर्थन किया, लोग ये सब समझते हैं। मुझे लगता है कि यूनुस, शेख हसीना की वापसी चाहते हैं। वे वहाँ रहकर बांग्लादेश में लोगों को भड़का रही हैं।”

कट्टरंपथी उस्मान हादी की हत्या को लेकर आलम ने कहा कि उस्मान को अवामी लीग (शेख हसीना की पार्टी) के समर्थकों ने मारा है। आलम ने कहा, “हमारी रिपोर्ट्स बताती हैं कि अवामी लीग के सीनियर लीडर ने हादी को मरवाने के लिए फंडिंग की है।” बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले को लेकर भी आलम ने खुलेआम झूठ बोला है। आलम का दावा है कि कम्युनल और हेट क्राइम के मामले में पिछले एक साल में सिर्फ एक ही हत्या हुई है, जिसमें दीपू चंद्र दास का मामला है। उसके मुताबिक, अवामी लीग हर हिंदू की हत्या को धार्मिक हिंसा में हुई मौत बता रही है।

वहीं, जब आलम से सवाल किया गया कि ‘हिंदू अल्पसंख्यक कम्युनिटी’ अपराध बढ़ने का डेटा जारी किया है। इस पर आलम ने कहा कि ऐसे संगठनों के नेता अवामी लीग से मिले हुए हैं। आलम ने कहा, “डेटा में से कोई भी घटना कम्युनल किलिंग की नहीं है। ज्यादातर मामले लूटपाट, आपसी रंजिश के हैं। बांग्लादेश हिंदू, बुद्ध, क्रिश्चियन परिषद नाम के संगठन और लोग हसीना के पालतू कुत्तों की तरह के हैं।”

क्रिकेट पर नासिर हुसैन की भारत से नफरत आई सामने, पाकिस्तान-बांग्लादेश के समर्थन में कर रही बैटिंग: ‘उम्माह’ के लिए BCCI-ICC को कोस रहा पूर्व ‘ब्रिटिश’ कैप्टन

                                            क्रिकेटर नासिर हुसैन (साभार-x@sarkarstix )
पूर्व क्रिकेटर नासिर हुसैन का बयान क्रिकेट को जोड़ने के बजाय उसे और बाँटता हुआ दिख रहा है। ICC और BCCI पर सवाल उठाना एक बात है, लेकिन बहिष्कार और अव्यवस्था को पसंद करना क्रिकेट की भावना के खिलाफ है। नासिर हुसैन ने पाकिस्तान के 15 फरवरी को भारत के खिलाफ T20 वर्ल्ड कप मैच का बॉयकॉट करने के फैसले को सही कहा है, उसे वर्ल्ड क्रिकेट में ‘फेयरनेस’ के तौर पर पेश किया जा रहा है।

स्काई स्पोर्ट्स पॉडकास्ट के दौरान हुसैन ने सवाल किया कि अगर भारत ने सरकारी पाबंदियों या सुरक्षा चिंताओं का हवाला देकर कहीं खेलने से मना कर दिया होता, तो क्या ICC इतना ही सख्त रवैया अपनाता। उन्होंने टॉप बॉडी पर असरदार बोर्ड के आगे झुकने का आरोप लगाया, साथ ही बांग्लादेश और पाकिस्तान की ‘अपनी बात पर अड़े रहने’ की तारीफ की।

यह सब बयान बीसीसीआई और भारत को कटघड़े में खड़े करने के लिए थे, जबकि विवाद की जड़ में बांग्लादेश और पाकिस्तान का फैसला था।

हुसैन ने बांग्लादेश की भारत में नहीं खेलने के फैसले की तुलना चैंपियंस ट्रॉफी के दौरान भारत के पाकिस्तान जाने से मना करने से कर दी। इससे भी उनकी मंशा समझ में आती है।

सबसे पहले, बात करते हैं बहस की अहम वजह बांग्लादेश की। बांग्लादेश को BCCI की मर्जी से T20 वर्ल्ड कप से बाहर नहीं किया गया था। ICC ने अपने सदस्यों की मीटिंग बुलाई थी। चौदह बोर्ड ने बांग्लादेश को शामिल करने के खिलाफ वोट किया। सिर्फ बांग्लादेश और पाकिस्तान की क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने इसका समर्थन किया।

यह भारत का दबाव नहीं था, बल्कि यह दुनिया के ज़्यादातर क्रिकेट खेलने वाले देशों का बांग्लादेश को यह बताना था कि आप किसी ग्लोबल टूर्नामेंट से एक महीने पहले शेड्यूल और कॉन्ट्रैक्ट इस तरह नहीं तोड़ सकते। यह उम्मीद नहीं कर सकते कि बाकी सब इस गड़बड़ी को झेल लेंगे।

बांग्लादेश को अचानक भारत दौरे के दौरान सुरक्षा सताने लगी

जब KKR ने आम लोगों के विरोध को देखते हुए बांग्लादेशी बॉलर मुस्तफिजुर रहमान को अपनी टीम से बाहर निकाल दिया और उसका IPL कॉन्ट्रैक्ट खत्म कर दिया गया। इसके बाद बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड को अचानक भारत दौरे को लेकर ‘सिक्योरिटी की चिंता’ होने लगी। पहले ऐसा कोई डर नहीं था। टीम पहले भी भारत दौरे पर आ चुकी थी। कैलेंडर काफी पहले से पता था। घबराहट तभी सामने आई जब एक फ्रेंचाइजी का फैसला उन्हें पसंद नहीं आया।

नासिर हुसैन ने केकेआर के फैसले को बीसीसीआई का फैसला मान लिया। BCCI आईपीएल की KKR जैसी फ्रेंचाइजी नहीं चलाता। लीग ऑर्गनाइजर प्राइवेट मालिकों को खास खिलाड़ियों को साइन करने या बनाए रखने के लिए मजबूर नहीं करते हैं, और न ही कर सकते हैं। फ्रेंचाइजी क्रिकेट का पूरा कमर्शियल लॉजिक यही है। अगर इन्वेस्टर्स को बताया जाए कि उन्हें किसे खरीदना है, तो मॉडल खत्म हो जाएगा। कोई भी सीरियस भारतीय बोली लगाने वाला ऐसी लीग में पैसा नहीं लगाएगा जहाँ खिलाड़ियों की पसंद नेशनैलिटी कोटा या पॉलिटिकल प्रेशर से तय होती हो। इसकी जानकारी तो नासिर हुसैन को होगी ही।

अगर बांग्लादेश को लगता कि उसके साथ गलत बर्ताव हो रहा है, तो उसके पास कई ऑप्शन थे, IPL से बात करना, अपने खिलाड़ियों को हिस्सा लेने से रोकना, या बोर्ड के जरिए बातचीत करना। इसके बजाय उसने टूर्नामेंट से कुछ हफ़्ते पहले ही ‘सिक्योरिटी की चिंताएँ’ खड़ी कर दीं, जिससे बहुत ज़्यादा दिक्कतें पैदा हो गईं।

ICC ने उसी तरह जवाब दिया जैसा कोई भी रेगुलेटर देता, उन नियमों और टाइमलाइन को लागू करके जिन पर सब पहले ही राज़ी हो चुके थे और स्कॉर्टलैंड को बांग्लादेश की जगह मौका देकर ये बता दिया कि सबकुछ ठीक है।

हुसैन ने सबसे बड़ी गलती बांग्लादेश के आखिरी मिनट में हटने की तुलना भारत के 2025 चैंपियंस ट्रॉफी के लिए पाकिस्तान जाने से मना करने से करके की हैं। वह लोगों को यह नहीं बताते हैं कि भारत ने ICC और PCB दोनों को महीनों पहले ही बता दी थी। वह अपने पॉडकास्ट के दौरान ये नहीं कहते कि भारत में आतंकवाद फैलाने के पीछे पाकिस्तान का हाथ रहा है। भारत ने इसलिए पाकिस्तान में जाने से इनकार किया था।

अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुआ आतंकी हमला इसका जीता जागता सबूत है। पाकिस्तानी आतंकवादियों ने भारतीय टूरिस्ट को गैर-मुस्लिम बताकर उन पर गोलियाँ चलाईं। ये घटना चैंपियंस ट्रॉफी खत्म होने के कुछ हफ़्ते बाद हुआ था। यह कोई पुराना इतिहास या एब्स्ट्रैक्ट जियोपॉलिटिक्स नहीं है।

इसके बावजूद, भारत ने एशिया कप में पाकिस्तान के खिलाफ अपने मैच खेले। BCCI आसानी से टूर्नामेंट से हट सकता था, लेकिन उसने पूरी तरह से एसोसिएट देशों के कमर्शियल फायदे के लिए खेला। बदले में उसे क्या मिला? पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड का एक सिरफिरा चीफ, जो ट्रॉफी लेकर भाग गया। भारतीय खिलाड़ियों ने पाकिस्तानी खिलाड़ियों से हाथ नहीं मिलाया था और टीम ने पाकिस्तान के किसी सियासी व्यक्ति से ट्रॉफी लेने से मना कर दिया। भारतीय खिलाड़ी चाहते थे कि उन्हें कोई दूसरा व्यक्ति ट्रॉफी दे, लेकिन पीसीबी चीफ अड़े रहे। नतीजा महीनों तक ट्रॉफी पाकिस्तान में पड़ा रहा।

बांग्लादेश को भारत से बॉर्डर पार से आतंक का सामना नहीं करना पड़ता। पाकिस्तान भारत में आतंकियों को भेजता है, हथियार भेजता है और अब नशे का अवैध कारोबार भी करता है। ऐसे में यह दिखाना कि ये एक जैसे हालात हैं, बेईमानी है।

क्या नासिर हुसैन को कई महीनों पहले सुरक्षा कारणों से भारत द्वारा पाकिस्तान में नहीं खेलने और आखिरी मिनट में पॉलिटिकल गुस्से की वजह से बांग्लादेश का टी20 से बाहर जाने के बीच का फर्क नहीं पता।

फिर भावनाओं और भावुकता के क्षण आते हैं। वे कहते हैं, “किसी समय, किसी को कहना चाहिए, बहुत हो गई यह पॉलिटिक्स, क्या हम वापस क्रिकेट खेलना शुरू कर सकते हैं?”

यह PCB नहीं था, जिसने सबके सामने ऐलान किया था कि पाकिस्तान 15 फरवरी को भारत के साथ नहीं खेलेगा। यह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ थे, जिन्होंने भारत के साथ मैच नहीं खेलने की बात कही। जब कोई सरकार का मुखिया खेल का बॉयकॉट करने का ऐलान करता है, तो राजनीति उन्हें नहीं दिखाई देती है।

बल्कि BCCI को ही खेल का राजनीतिकरण करने का आरोप लगा रहे नासिर हुसैन की सोच एकतरफा नजर आती है।

नासिर हुसैन ने खुलकर कहा, ‘मुझे अच्छा लगता है कि बांग्लादेश अपने खिलाड़ियों के लिए डटा रहा। मुझे यह भी पसंद है कि पाकिस्तान ने बांग्लादेश का समर्थन किया।’ यह सोच क्रिकेट भावना के विरुद्ध है। कोई क्रिकेटर वैश्विक आयोजन के बहिष्कार की तारीफ कैसे कर सकता है?

पूर्व क्रिकेटर नासिर हुसैन ने कहा, ‘सबको बस एक ही चीज चाहिए, निरंतरता। बांग्लादेश, पाकिस्तान और भारत के साथ एक जैसा व्यवहार होना चाहिए।’ उन्होंने यह भी जोड़ा, ‘पावर के साथ जिम्मेदारी आती है।’ लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि अनुबंध तोड़ना, मैच न खेलना और अंतिम समय पर टूर्नामेंट में अमूक मैच नहीं खेलने का ऐलान करना किस तरह जिम्मेदारी है?

ICC पर यह आरोप लगाना कि यह BCCI का ही एक एक्सटेंशन है, पूरी सच्चाई से नजर फेरना है। फाइनेंशियल सच्चाई को नजरअंदाज करना है। दरअसल ICC के सबसे बड़े रेवेन्यू ड्राइवर इंडिया-सेंट्रिक ब्रॉडकास्ट डील हैं, खासकर इंडिया-पाकिस्तान मैच। उस पैसे का एक बड़ा हिस्सा एसोसिएट और छोटे बोर्ड को रीडिस्ट्रिब्यूट किया जाता है।

जब पाकिस्तान मैचों का बॉयकॉट करता है या बांग्लादेश शेड्यूल बिगाड़ देता है, तो यह ‘इंडिया को नुकसान’ नहीं पहुँचा रहा है, यह उसी पूल को छोटा कर रहा है जो ग्लोबल क्रिकेट के कमज़ोर सदस्यों को सपोर्ट करता है। ठीक इसीलिए यह आइडिया कि ICC को लगातार कॉन्ट्रैक्ट तोड़ने में शामिल होना चाहिए, बेतुका है। नियम किसी वजह से होते हैं। अगर आप हारते हैं, तो आपको पैसे देने पड़ते हैं। अगर आप एग्रीमेंट तोड़ते हैं, तो आपको नतीजे भुगतने पड़ते हैं। यह ‘BCCI कंट्रोल’ नहीं है, यह बेसिक गवर्नेंस है।

अगर पाकिस्तान को लगता है कि उसके पास इस सिस्टम के बाहर जिंदा रहने के लिए आर्थिक ताकत है, तो वह कोशिश करने के लिए आज़ाद है। वह एक पैरेलल बॉडी बना सकता है और दूसरों को भी इसमें शामिल होने के लिए मना सकता है। इसे मौजूदा स्ट्रक्चर को नुकसान पहुँचाने और खुद को पीड़ित दिखाने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए।

वर्ल्ड कप 2023, जब हुसैन की इंग्लिश टीम ने नहीं खेला था मैच

पूर्व क्रिकेटर नासिर हुसैन यह भी भूल गए कि उनके नेतृत्व में इंग्लैंड टीम ने राजनीतिक वजहों से जिम्बाब्वे में खेलने से मना कर दिया था। हालाँकि इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात हुसैन का अपना इतिहास है। 2003 के वर्ल्ड कप में, हुसैन की लीडरशिप वाली इंग्लैंड टीम ने जिम्बाब्वे के साथ खेलने से मना कर दिया था, क्योंकि वहाँ रॉबर्ट मुगाबे के शासन का विरोध हो रहा था। वहाँ इंग्लैंड की टीम को कोई सुरक्षा खतरा नहीं था। हुसैन ने उस फैसले का सपोर्ट किया।

उन्होंने ECB पर एक छोटे बोर्ड को धमकाने का आरोप नहीं लगाया। उन्होंने ICC की निरंतरता पर कुछ नहीं कहा। उन्होंने यह शिकायत नहीं की कि क्रिकेट का राजनीतिकरण किया जा रहा है। इसके विपरीत उन्होंने बाद में कहा कि उन्हें अपने इस रवैये पर ‘गर्व’ है।

2009: हुसैन तब कहाँ थे, जब इंग्लैंड ने ज़िम्बाब्वे को वीजा देने से मना कर दिया

साल 2009 में जिम्बाब्वे को T20 वर्ल्ड कप से आसानी से बाहर कर दिया गया और उसकी जगह स्कॉटलैंड को शामिल कर लिया गया, जिसे ICC ने “विन-विन” सॉल्यूशन कहा। इंग्लैंड ने जिम्बाब्वे के खिलाड़ियों को वीजा देने से मना कर दिया। फिर से, हुसैन ने ताकतवर बोर्ड्स के छोटी टीमों को कुचलने के बारे में कोई बात नहीं कही। ज़िम्मेदारी के बारे में कोई लेक्चर नहीं दिया। जिम्बाब्वे क्रिकेट को ‘कमजोर’ करने पर कोई आँसू नहीं बहाए। साफ़ है, खेल में पॉलिटिक्स तब ठीक है जब इंग्लैंड ऐसा करता है, लेकिन जब भारत नियमों का पालन करने पर जोर देता है, तो यह बहुत बुरा लगता है।

दरअसल हुसैन ने जो बातें कही वह ‘निरंतरता’ के बारे में नहीं है। यह पावर में बदलाव के बारे में है। वर्ल्ड क्रिकेट में सेंटर ऑफ़ ग्रेविटी अब लॉर्ड्स या ECB नहीं है। यह BCCI है। यह सच्चाई एंग्लो कमेंट्री के एक खास हिस्से को परेशान करती है, जो तब पूरी तरह से सहज था जब ‘सिद्धांत’ इंग्लिश हितों के साथ जुड़े होते थे और जब वे नहीं होते थे तो काफ़ी लचीला था।

क्रिकेट कभी भी पॉलिटिकल वैक्यूम में नहीं रहा। 2003 में भी नहीं था। 2009 में भी नहीं था। आज भी नहीं है। फ़र्क यह है कि अब, भारत से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह दूसरे बोर्ड के पॉलिटिकल नाटकों का खर्च चुपचाप उठाए। ICC को अपने कॉन्ट्रैक्ट लागू करने चाहिए। BCCI को अपने हितों की रक्षा करनी चाहिए। और पाकिस्तान और बांग्लादेश को यह तय करना चाहिए कि वे नियमों पर आधारित सिस्टम का हिस्सा बनना चाहते हैं या नहीं।

जहाँ तक ​​नासिर हुसैन की बात है, तो ‘कंसिस्टेंसी’ के लिए उनका अचानक आया जुनून ज़्यादा असरदार होगा अगर वे इसे अपने रिकॉर्ड पर लागू करें। जब इंग्लैंड ने ज़िम्बाब्वे का बॉयकॉट किया, तो पॉलिटिक्स और खेल टकराए थे। जब पाकिस्तान अपनी सरकार के कहने पर भारत के साथ खेलने का बॉयकॉट करता है, तो अचानक उनकी भाषा बदल जाती है और सारा दोष BCCI पर डालते हैं कि है इसने क्रिकेट को खराब कर दिया है। यह सिद्धांत नहीं है, यह क्रिकेट पर कंट्रोल खोने का गुस्सा है।

अमेरिका का दोगलापन: ‘डेमोक्रेसी’ के नाम पर गिराई सरकारें, तानाशाहों को किया मजबूत


शनिवार (3 जनवरी) की सुबह, काराकास की नींद रात के आसमान में फाइटर जेट्स के उड़ने की आवाज़ से खुली। सुबह तक यह साफ हो चुका था कि वेनेज़ुएला एक जाने-पहचाने अमेरिकी ड्रामे का नया मंच बन चुका है। यहाँ अमेरिकी सेना की टुकड़ी को ‘डेमोक्रेसी वापस लाने’ के एक मिशन पर लगाया गया था।

US के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कन्फर्म किया कि अमेरिकी सेना ने वेनेज़ुएला में कई हमले किए हैं और प्रेसिडेंट निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को पकड़कर यूनाइटेड स्टेट्स ले गए हैं। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर ऑपरेशन की घोषणा की, और इसे ‘नारकोटिक टेररिज्म’ कहे जाने वाले सिस्टम के खिलाफ अभियान बताया।

                                                                  (साभार- ट्रंप/ ट्रूथ सोशल)

इसके तुरंत बाद, US अटॉर्नी जनरल पामेला बोंडी ने बताया कि मादुरो और फ्लोरेस पर न्यूयॉर्क में नार्को-टेररिज्म की साजिश में शामिल होने से लेकर लोकतंत्र को खत्म करने जैसे आरोप लगाए गए थे।

ट्रंप ने मादुरो सरकार पर प्रवासियों को US के दक्षिणी बॉर्डर की ओर धकेलने, जेलों और मेंटल इंस्टीट्यूशन को खाली करने और ड्रग कार्टेल और आतंकवादी ग्रुप्स के साथ मिलकर काम करने का आरोप लगाया। ट्रंप के मुताबिक, वेनेजुएला अमेरिका में कोकेन लाने का एक बड़ा रास्ता बन गया है, जहाँ कैरिबियन और पैसिफिक के रास्ते नशीले पदार्थों की तस्करी होती है।

यह वजह जानी-पहचानी लग रही थी क्योंकि पहले भी अमेरिका ऐसे आरोप लगाकर कई देशों के साथ ऐसा व्यवहार कर चुका है। कई सालों से अमेरिका अपने विरोधी देशों और उनकी सरकारों पर मानवाधिकार उल्लंघन करने, लोगों पर जुल्म करने और दुनिया की सुरक्षा के लिए खतरा बताता रहा है।

वेनेज़ुएला के मामले में सितंबर 2025 में ट्रंप प्रशासन ने कई नावों पर हमला किया था और उसमें ड्रग्स होने की बात कही थी। यह एक संकेत था, जो अमेरिका ने दुनिया को दिया था।

हालाँकि मादुरो ने हमेशा ऐसे आरोपों से इनकार किया और उन्हें वेनेजुएला के बड़े तेल भंडार को कंट्रोल के लिए एक कवर बताया। हमलों से कुछ दिन पहले मादुरो ने प्रवासियों और ड्रग ट्रैफिकिंग पर US के साथ सहयोग की पेशकश की थी। लेकिन अमेरिका ने मादुरो के सामने देश छोड़ने की शर्त रख दी थी। इससे मादुरो उखड़ गए। इस पर अमेरिका ने मादुरो पर ‘गंभीर’ नहीं होने का आरोप लगाया।

इसका खामियाजा वेनेजुएला को उठाना पड़ा। अमेरिकी जेट बिना कॉन्ग्रेस की मंजूरी के उड़ गई। इसपर अमेरिका में भी सवाल किए जा रहे हैं। यूएन को बताना तो दूर की बात है।

वेनेज़ुएला में जो हुआ वह एक ऐसे पैटर्न से मेल खाता है, जिसे दुनिया ने पहले भी कई बार देखा है। डेमोक्रेसी, सिक्योरिटी और नैतिक जिम्मेदारी में लिपटा हुआ एक शासन बदलने का ऑपरेशन।

डेमोक्रेसी बहाल करने के नाम पर शासन बदलना

वेनेज़ुएला में US का दखल यूँ ही नहीं हुआ। यह दुनिया भर में अमेरिका की लीडरशिप में हुए तख्तापलट का एक और उदाहरण है। वियतनाम से लेकर इराक तक, अफगानिस्तान से लेकर सीरिया तक अमेरिका ने बार-बार मिलिट्री एक्शन को ‘खराब राज’ हटाने और उनकी जगह ‘डेमोक्रेटिक सिस्टम’ लाने के तौर पर इस्तेमाल किया। इसकी वजह से दुनिया में अस्थिरता का दौर आया और व्यापक हिंसा हुई।

2001 के आखिर में US के समर्थन वाली सेना काबुल में घुसी और कुछ ही हफ्तों में तालिबान सरकार को गिरा दिया। हामिद करजई को अमेरिकी समर्थन मिला और उन्हें अफगानिस्तान का लीडर बनाया गया। उस वक्त तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने सेंट्रल एशिया में डेमोक्रेसी की जड़ें जमने की बात कही। दो दशक बाद, US सैनिक वापस चले गए और तालिबान लगभग रातों-रात सत्ता में वापस आ गया। अमेरिका की बनाई सरकार गिर गई। इससे पता चलता है कि वह हमेशा से कितनी खोखली और परजीवी थी।

इराक ने भी ऐसा ही रास्ता अपनाया गया। 2003 में US सैनिकों ने सद्दाम हुसैन को सत्ता से बाहर कर दिया। इराक को मिडिल ईस्ट में लोकतंत्र का अगुआ करार दिया। लेकिन इराक के सिक्योरिटी सिस्टम को खत्म करने से लाखों हथियारबंद लोग बेरोजगार हो गए। देश बगावत, सांप्रदायिक हिंसा और सिविल वॉर में डूब गया। ईरान के सपोर्ट वाले मिलिशिया का असर बढ़ा, और इस अफ़रा-तफ़री से आखिरकार इस्लामिक स्टेट बना, जिसने इलाके के सिक्योरिटी माहौल को इस तरह से बदल दिया जो आज भी उसे परेशान करता है।

सीरिया, लीबिया और पहले वियतनाम एक ही कहानी के अलग-अलग रूप हैं। US नैतिकता की दुहाई देते हुए मौजूदा सरकार को सत्ता से बाहर करता है। सिस्टम खत्म कर देता है और टूटे-फूटे समाज को पीछे छोड़ जाता है। जानकार इस पैटर्न को विदेशियों द्वारा थोपा गया शासन परिवर्तन कहते हैं।

पिछले 120 सालों में यूनाइटेड स्टेट्स ने करीब 35 देशों के नेताओं को सत्ता से जबरदस्ती बाहर किया है। ये आंकड़ा पूरी दुनिया में हुए ऐसे सभी दखलदांजी का लगभग एक-तिहाई है। चिंता की बात यह है कि इनमें से लगभग एक-तिहाई देशों में शासन परिवर्तनों के बाद एक दशक के अंदर सिविल वॉर हुआ।

यहाँ तक ​​कि ट्रंप, जिन्होंने अमेरिका में अपनी राजनीति ही दुनिया के युद्ध बंद करने के नाम पर शुरू की, वे भी इस परंपरा से बाहर नहीं निकल पा रहे। हालाँकि उन्होंने बार-बार इराक हमले की निंदा की है और नियोकंज़र्वेटिव विदेश नीति की आलोचना की है, उनका वेनेजुएला दखल उनके ‘शांतिदूत’ होने के अपने दावों से मेल नहीं खाता।

बांग्लादेश: बिना बम के US ने बदली सरकार

जहाँ वेनेज़ुएला में फाइटर जेट और मिसाइलें देखी गईं, वहीं बांग्लादेश में अमेरिकी दखल अलग तरीके से हुआ। बांग्लादेश में सैनिक नहीं भेजे गए, बल्कि पॉलिटिकल प्रेशर, इंटेलिजेंस नेटवर्क और सड़क पर विरोध प्रदर्शनों के जरिए लोकतांत्रिक सरकार को हटाया गया।

एक किताब, इंशाअल्लाह बांग्लादेश: द स्टोरी ऑफ़ एन अनफिनिश्ड रेवोल्यूशन के मुताबिक, शेख हसीना के पूर्व होम मिनिस्टर असदुज्जमां खान कमाल ने CIA पर उन्हें सत्ता से हटाने की साज़िश रचने का आरोप लगाया है। उन्होंने इन घटनाओं को ‘CIA की एक परफेक्ट साज़िश’ बताया।

                                                                (फोटो- Hindu e shop)

कमाल ने दावा किया कि देश के आर्मी चीफ जनरल वाकर-उज़-ज़मान इस साज़िश के सेंटर में थे। हैरानी की बात यह है कि उन्होंने कहा कि बांग्लादेश की टॉप इंटेलिजेंस एजेंसियों ने भी हसीना को चेतावनी नहीं दी, जिससे लगता है कि सीनियर अधिकारियों की मिलीभगत रही होगी। कमाल के मुताबिक, वाकर ने आर्मी चीफ का पद संभालने के कुछ ही हफ़्तों बाद 5 अगस्त, 2024 को हसीना को देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया, यह एक ऐसा पद था जिस पर हसीना ने खुद उन्हें अपॉइंट किया था।

हसीना के गिरने से पहले हुए विरोध प्रदर्शनों को इंटरनेशनल लेवल पर तथाकथित जेन जी लीड और डेमोक्रेटिक बताया गया, लेकिन कमाल ने कहा कि जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टर इस्लामी ग्रुप, जो पहले से बँटे हुए थे, पहली बार विदेशी इंटेलिजेंस नेटवर्क के सपोर्ट से एक हो गए। उन्होंने आगे दावा किया कि पाकिस्तान की ISI ने इसमें अहम भूमिका निभाई। इस दौरान विदेश में ट्रेंड आतंकवादी प्रदर्शनकारियों के साथ मिल गए और पुलिस पर हमला किया।
कमाल ने तर्क दिया कि इसका मोटिवेशन स्ट्रेटेजिक था। उन्होंने कहा कि अमेरिका एक ही समय में साउथ एशिया में बहुत सारे मजबूत लीडर नहीं चाहता। भारत में नरेंद्र मोदी और चीन में शी जिनपिंग के होने से, हसीना का इंडिपेंडेंट रुख उनके लिए असुविधाजनक हो गया। एक और मुख्य वजह बंगाल की खाड़ी में सेंट मार्टिन आइलैंड था, जो अमेरिका चाहता था। हिन्द महासागर में जियोपॉलिटिक्स के लिए ये बहुत जरूरी है।
हसीना ने खुद सार्वजनिक तौर पर कहा था कि US ने उन पर सत्ता में बने रहने के बदले आइलैंड का एक्सेस माँगा था। उन्होंने इसे बांग्लादेश की संप्रभुता का उल्लंघन बताते हुए मना कर दिया। शेख हसीना को हटाए जाने के बाद इकॉनमिस्ट मुहम्मद यूनुस को सत्ता की जिम्मेदारी सौंपी गई, जो अमेरिका के करीबी थे।

तानाशाह के दोस्त, लोकतंत्र के दुश्मन

अमेरिका ने ‘डेमोक्रेसी’ के नाम पर कई देशों और उसके राष्ट्राध्यक्षों को बर्बाद किया। वहीं दूसरी ओर तानाशाही सरकारों के साथ उसके करीबी रिश्ते रहे, बशर्ते वे US के लिए फायदेमंद हों। सऊदी अरब इसका सबसे अच्छा उदाहरण है।
सऊदी में कोई चुनाव नहीं होता, कोई पॉलिटिकल पार्टी नहीं है और कोई राजनीतिक आजादी नहीं है। फिर भी अमेरिका उसे एक अहम साथी मानता है।
हाल ही में, US ने सऊदी अरब को $1.4 बिलियन की सैन्य साजोसामान की बिक्री को मंज़ूरी दी। इसमें उसकी आर्मी को ट्रेनिंग देने के लिए करोड़ों डॉलर शामिल हैं। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के व्हाइट हाउस दौरे के नतीजे में F-35 फाइटर जेट की बिक्री और एक स्ट्रेटेजिक डिफेंस एग्रीमेंट को मंजूरी मिली। इस व्यापार से US और सऊदी अरब के रिश्ते और ‘मधुर’ हुए।
यह वही सऊदी लीडरशिप है, जिसे मानवाधिकार के उल्लंघन, यमन में युद्ध और पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या पर दुनिया भर में गुस्से का सामना करना पड़ा है। फिर भी, ऐसा नहीं लगता कि इनमें से कोई भी बात रियाद को अमेरिकी सपोर्ट के लिए अयोग्य ठहराती है।
सऊदी अरब के अलावा, US के मिडिल ईस्ट, अफ्रीका और एशिया में दूसरे तानाशाही देशों के साथ मजबूत रिश्ते हैं। मिस्र, जहाँ मिलिट्री तख्तापलट के बाद प्रेसिडेंट अब्देल फत्ताह अल-सिसी का राज है, को US से अरबों की मिलिट्री मदद मिलती है।
यूनाइटेड अरब अमीरात, जहाँ पूरी तरह से राजशाही है, US का एक और करीबी पार्टनर है। इन रिश्तों को शायद ही कभी डेमोक्रेसी के लिए समस्या के तौर पर देखा जाता है। इसके बजाय, उन्हें ‘स्टेबिलिटी’, ‘सिक्योरिटी,’ और ‘रीजनल बैलेंस’ के तौर पर देखा जाता है।
जब ये सरकारें विरोध को दबाती हैं या विरोधियों को जेल में डालती हैं, तब भी अमेरिका चुप रहता है।

अमेरिका का दोगलापन

वेनेजुएला, अफगानिस्तान, इराक, बांग्लादेश के साथ और तानाशाही सरकारों के साथ अमेरिका के रिश्ते, उसके दोहरे चरित्र को उजागर करते हैं। डेमोक्रेसी का इस्तेमाल चुनिंदा तरीके से किया जाता है, दुश्मनों के खिलाफ हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है और दोस्तों के साथ डील करते समय नजरअंदाज कर दिया जाता है।
जो सरकारें US के असर का विरोध करती हैं, उन्हें क्रिमिनल, गैर-कानूनी या खतरनाक करार दिया जाता है। जो लोग बात मानते हैं, भले ही वे बिना चुनाव के राज करें या तानाशाही रवैया अपनाएँ, उन्हें ‘इनाम’ दिया जाता है।
इस पैटर्न को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है। सरकार बदलना डेमोक्रेसी के बारे में नहीं है, यह कंट्रोल के बारे में है। यह तेल, मिलिट्री बेस, शिपिंग रूट और जियोपॉलिटिकल फायदे के बारे में है। लैटिन अमेरिका से लेकर साउथ एशिया तक, यूनाइटेड स्टेट्स ने बार-बार दिखाया है कि उसका कमिटमेंट डेमोक्रेटिक वैल्यूज़ के लिए नहीं, बल्कि स्ट्रेटेजिक फायदे के लिए है।

हिंदुओं पर अत्याचार के 1000+ मामलों के साथ UN में एक्टिविस्ट ने खोला बांग्लादेश सरकार का काला चिट्ठा

बांग्लादेश में हिंदुओं के उत्पीड़न पर UNCHR में बताया गया है
5 अगस्त 2024 वह दिन था जब बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना को बिना किसी औपचारिकता के सत्ता से हटा दिया गया। यही दिन हिंदुओं और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और गरिमा के अंत का प्रतीक भी बन गया क्योंकि इस्लामी भीड़ ने हिंदुओं को चुन‑चुनकर मारने, लूटने और बलात्कार करने के लिए निशाना बनाना शुरू कर दिया। साथ ही उनके मंदिरों और मूर्तियों को तोड़ा‑फोड़ा और अपवित्र किया गया।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग (UNHRC) द्वारा आयोजित ‘फोरम ऑन माइनॉरिटी इश्यूज’ के 18वें सत्र में बोलते हुए बांग्लादेशी हिंदू अधिकार कार्यकर्ता दिपन मित्रा ने इस्लामियों द्वारा बांग्लादेशी हिंदुओं पर किए गए अत्याचारों की घटनाओं को उजागर किया।

28 नवंबर को आयोजित इस सम्मेलन में अपने भाषण के दौरान, ब्यूरो ऑफ ह्यूमन राइट्स एंड जस्टिस (BHRJ) के अध्यक्ष दिपन मित्रा ने कहा कि 1971 में बांग्लादेश की आजादी के बाद से ही हिंदू, बौद्ध, ईसाई और आदिवासी अल्पसंख्यक समुदाय लगातार राज्य और समाजिक स्तरों पर भेदभाव का सामना करते रहे हैं।

हालाँकि अब स्थिति ने ‘भयावह रूप’ ले लिया है। उन्होंने यह भी कहा कि अल्पसंख्यक हिंदू, बौद्ध, ईसाई और आदिवासी समुदायों के ‘जातीय सफाए’ की एक व्यवस्थित प्रक्रिया चल रही है।

हजारों हिंदुओं की हत्या, महिलाओं का रेप और जबरन धर्मांतरण

 बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हो रहे इस्लामी अपराधों को उजागर करते हुए दिपन मित्रा ने बताया कि पिछले एक वर्ष में 183 से अधिक हिंदुओं की हत्या की गई है। 219 हिंदू महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ है।

हजारों हिंदू घरों और व्यवसायों पर हमले हुए, उन्हें तोड़ा‑फोड़ा गया और आग के हवाले कर दिया गया। इसके अलावा, हिंदू और बौद्ध समुदाय की 78 लड़कियों का जबरन इस्लाम में धर्मांतरण कराया गया।

उन्होंने कहा कि ईशनिंदा के आरोप लगाकर हिंदुओं पर हमले, हिंदू मठों और मंदिरों पर कब्जा और हिंदू व्यापारियों से वसूली बांग्लादेश में रोजमर्रा की घटनाएँ बन चुकी हैं। उन्होंने कहा, “ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब हिंदुओं की संपत्ति जब्त न की जाए, घरों पर हमला न हो, तोड़फोड़ और आगजनी न की जाए।”

अगस्त 2024 में ऑपइंडिया ने कई मामलों पर रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिनमें मुस्लिम भीड़ ने हिंदू मंदिरों और घरों पर हमले किए थे। उस समय, अल जजीरा, न्यूयॉर्क टाइम्स और DW जैसे वामपंथी मीडिया संस्थानों ने हिंदुओं के खिलाफ हो रही हिंसा को ‘राजनीतिक बदला’ बताकर कमतर दिखाने की कोशिश की थी, यह कहते हुए कि हिंदू समुदाय ने अवामी लीग का समर्थन किया था।

हालाँकि वास्तविकता यह है कि कुछ घटनाओं में भीड़ ने अवामी लीग के हिंदू नेताओं को निशाना बनाया, लेकिन हमले केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता या बदले तक सीमित नहीं थे। हिंदू मंदिरों पर नाटोर, ढाका के धामराई, पाटुआखाली के कलापारा, शरियतपुर और फरीदपुर में हमले हुए।

जेसोर, नोआखाली, मेहरपुर, चांदपुर और खुलना में हिंदू घरों को निशाना बनाया गया। दिनाजपुर में 40 हिंदू दुकानों को तोड़ा‑फोड़ा गया। ये घटनाएँ तब सामने आईं जब 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना को भारत भागने पर मजबूर होना पड़ा।

इसके बाद से जब से मोहम्मद यूनुस ने गैर‑निर्वाचित अंतरिम सरकार के सलाहकार के रूप में पदभार संभाला है, हिंदुओं पर नफरत, उत्पीड़न, हत्या, बलात्कार और लूट के मामले लगातार बढ़ते गए हैं। इस्लामवादी समूह पहले से कहीं अधिक साहस के साथ हिंदुओं को निशाना बना रहे हैं।

बांग्लादेश में हिंदुओं को जबरन नौकरियों से हटाया जा रहा

सम्मेलन में दिपन मित्रा ने यह भी बताया कि हिंदू अधिकारियों और शिक्षकों को व्यवस्थित रूप से नौकरी से हटाने का अभियान चल रहा है। उन्होंने कहा, “चुनाव आयोग के सचिव अशोक कुमार देबनाथ, प्राथमिक शिक्षा विभाग के अतिरिक्त महानिदेशक उत्तम कुमार दास, प्रेस काउंसिल के सचिव श्यामल चंद्र कर्मकार, कोलकाता स्थित उप‑राजदूतावास के प्रेस सचिव रंजन सेन और कनाडा स्थित उच्चायोग की काउंसलर अपर्णा रानी पाल को पद से हटा दिया गया है।”

BHRJ अध्यक्ष ने आगे कहा कि पिछले एक वर्ष में 176 हिंदू शिक्षकों को स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से इस्तीफा देने या हटाए जाने पर मजबूर किया गया। उन्होंने कहा, “इसके अलावा, 100 से अधिक हिंदू पुलिस अधिकारियों को बर्खास्त किया गया, जिनमें कृष्णपद रॉय भी शामिल हैं। 2024 में राजशाही सरदा पुलिस अकादमी में चुने गए 252 सब‑इंस्पेक्टरों में से 99 हिंदू, 2 बौद्ध और 1 ईसाई को हटा दिया गया।”

उन्होंने बताया कि मोहम्मद युनुस की सरकार में गृह मंत्रालय ने पुलिस प्रमुख बहारुल आलम को निर्देश दिया है कि किसी भी हिंदू को पुलिस में नियुक्त न किया जाए। भेदभाव अर्धसैनिक बलों तक भी पहुँच गया है। 2025 में बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) में 693 लोगों की भर्ती हुई, लेकिन उनमें एक भी अल्पसंख्यक नहीं था।

हिंदू डॉक्टरों को भी अस्पतालों के महत्वपूर्ण पदों से हटाया जा रहा है। यहाँ तक कि प्रसिद्ध डॉक्टर समंतलाल सेन पर झूठा हत्या का मामला दर्ज किया गया। उन्होंने कहा, “यहाँ तक कि बांग्लादेश के प्रसिद्ध डॉक्टर समंतालाल सेन को भी झूठे मर्डर केस में फँसा दिया गया है।”

पिछले वर्ष ऑपइंडिया ने रिपोर्ट किया था कि इस्लामी समूहों ने हिंदू बुद्धिजीवियों और पेशेवरों को परेशान कर नौकरी छोड़ने पर मजबूर किया। कई लोगों को सिर्फ अपनी धार्मिक पहचान के कारण बांग्लादेश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। सिर्फ अगस्त 2024 में ही 60 हिंदू शिक्षक, प्रोफेसर और सरकारी अधिकारी इस्तीफा देने पर मजबूर हुए।

समय के साथ स्थिति और भी खराब होती गई। अक्टूबर में हिंदू पत्रकार लिटन कुमार चौधरी पर सिटाकुंडा में भीड़ ने हमला किया। उस पर असद बहिनी के ग्रुप के लोगों ने हमला किया था। मुस्लिम हमलावरों ने लिटन कुमार चौधरी को ‘अवामी लीग एजेंट’ कहकर बदनाम किया और उन पर ‘फेक न्यूज फैलाने’ का आरोप लगाया।

इस वर्ष जुलाई में, बांग्लादेश के चिटगाँग विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले मुस्लिम छात्रों ने एक हिंदू प्रोफेसर डॉ. कुशल बरन चक्रवर्ती को परेशान किया और उनकी पदोन्नति रोक दी। छात्र पहले से योजना बनाकर कार्यालय भवन के बाहर इकट्ठा हुए और हंगामा शुरू कर दिया।

इनमें से कई छात्र इस्लामी छात्र शिबिर (ICS) के सदस्य थे, जो बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी का छात्र संगठन है। बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लगातार दबाई जा रही है। नास्तिकों, लेखकों और ब्लॉगर्स की हत्या की जा रही है या उन्हें देश छोड़ने पर मजबूर किया जा रहा है।

ब्यूरो ऑफ ह्यूमन राइट्स एंड जस्टिस (BHRJ) के अध्यक्ष ने आगे कहा कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का कोई अधिकार नहीं है। संगीत, नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को रोकने के लिए दबाव डाला जा रहा है और सभी प्रकार की सांस्कृतिक गतिविधियों को बंद कराया जा रहा है।

नवंबर में यह रिपोर्ट किया गया कि मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने प्राथमिक विद्यालयों में संगीत और शारीरिक शिक्षा के सहायक शिक्षकों के पदों को खत्म कर दिया। यूनुस शासन का यह फैसला साफ तौर पर मुस्लिमों को खुश करने का प्रयास था, क्योंकि बांग्लादेश में कट्टरपंथी इस्लामी संगठन लंबे समय से संगीत शिक्षकों की जगह इस्लामी स्कॉलर्स की भर्ती की माँग कर रहे थे।

ब्यूरो ऑफ ह्यूमन राइट्स एंड जस्टिस (BHRJ) के विश्लेषण के अनुसार, 2013 से अब तक बांग्लादेश में कई धर्मनिरपेक्ष नास्तिकों, लेखकों, ब्लॉगर्स और प्रकाशकों की आतंकवादियों द्वारा हत्या की गई है या वे गंभीर रूप से घायल हुए हैं।

2023 से अब तक कम से कम 12 स्वतंत्र विचारकों और ब्लॉगर्स की हत्या की गई है। सैकड़ों धर्मनिरपेक्ष नास्तिक, लेखक और ब्लॉगर्स अपनी जान बचाने के लिए देश छोड़कर विदेश भागने पर मजबूर हुए हैं।

यूनुस जमात-ए-इस्लामी के साथ मिलकर बांग्लादेश को इस्लामी देश बनाना चाहते हैं, भारत ही आखिरी उम्मीद”- ऑपइंडिया से बोले BHRJ अध्यक्ष

ऑपइंडिया से बातचीत में दिपन मित्रा ने कहा कि बांग्लादेश में हिंदुओं की स्थिति दिन‑प्रतिदिन खराब होती जा रही है। उनके अनुसार, यूनुस सरकार के तहत हिंदू ‘सबसे अधिक असुरक्षित’ स्थिति में हैं।

उन्होंने बताया कि पिछले एक वर्ष में एक भी हिंदू को किसी महत्वपूर्ण सरकारी पद पर नियुक्त नहीं किया गया। मित्रा ने कहा कि इस्लामवादी हिंदुओं और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों को उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर निशाना बना रहे हैं, जबकि मोहम्मद यूनुस बार‑बार भारत और भारतीय मीडिया को दोष देते हैं और हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों को ‘प्रोपेगेंडा’ और ‘बढ़ा‑चढ़ाकर पेश करने’ की बात कहकर खारिज करते हैं।

उन्होंने कहा, “यूनुस पूरी तरह इस्लामवादी समूहों के साथ मिलकर हिंदुओं को निशाना बना रहा है। मुझे नहीं लगता कि वह अगले साल चुनाव होने देगा और अगर होने भी दिए, तो वह सुनिश्चित करेगा कि जमात‑ए‑इस्लामी और उसके सहयोगी सत्ता में आएँ। उसका लक्ष्य बांग्लादेश को एक इस्लामी देश बनाना है।”

यूनुस के इस्लामी एजेंडे पर आगे कहते हुए मित्रा ने ऑपइंडिया को बताया कि शेख हसीना की अवामी लीग को अगले चुनावों से प्रतिबंधित करने के बाद, अंतरिम सरकार का सलाहकार अब बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) को भी सत्ता की दौड़ से बाहर करने की कोशिश कर रहा है।

गौरतलब है कि यूनुस के कार्यकाल में प्रतिबंधित, भारत‑विरोधी और इस्लामवादी संगठन जमात‑ए‑इस्लामी को फिर से वैध कर दिया गया, इस्लामवादी नेताओं को जेल से रिहा किया गया, जबकि अवामी लीग के नेताओं पर कार्रवाई और तेज कर दी गई।

दिपन मित्रा ने यह भी कहा कि यूनुस ने बीमार पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया के बेटे और BNP के कार्यकारी अध्यक्ष तारीक रहमान को अपनी माँ से मिलने के लिए बांग्लादेश आने की अनुमति नहीं दी।

रहमान वर्तमान में ब्रिटेन में रहते हैं। मित्रा के अनुसार, यूनुस शासन केवल दिखावे के लिए उनकी वापसी की बात करता है, लेकिन असल में उनकी वापसी को कभी संभव नहीं होने देता।

मित्रा ने भारतीय सरकार से अपील की कि वह यूनुस शासन पर दबाव बनाए और हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करे, बजाय इसके कि वह इस्लामवादियों के साथ खड़ा हो या जवाबदेही से बचता रहे। उन्होंने कहा कि बांग्लादेशी हिंदुओं के लिए अब भारत और भारतीय सरकार ही अंतिम आशा हैं।

उन्होंने कहा, “भारत हमारी आखिरी उम्मीद है। भारत चुप नहीं रह सकता। बहुत देर होने से पहले भारत को बांग्लादेशी हिंदुओं की स्थिति पर ध्यान देना चाहिए। इस्लामवादी या तो सभी हिंदुओं को मारना चाहते हैं या उन्हें धर्मांतरित करना चाहते हैं। अफगानिस्तान कभी हिंदू था, पाकिस्तान में हिंदू आज भी जीवित रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और अब बांग्लादेश भी उसी दिशा में जा रहा है। भारत को बांग्लादेशी हिंदुओं को बचाने के लिए पहल करनी ही होगी।”

चिन्मय कृष्णा दास को फर्जी मामले में जेल भेजा गया

UNHCR फोरम में दिपन मित्रा ने चिन्मय कृष्ण दास के मामले को विशेष रूप से उठाया। चिन्मय कृष्ण दास एक ISKCON भिक्षु हैं, बांग्लादेश के सनातन जागरण मंच के प्रवक्ता हैं और चिटगाँग स्थित पुंडरीक धाम के प्रमुख भी हैं।

उन्हें संदिग्ध और मनगढ़ंत ‘राजद्रोह’ के आरोपों में गिरफ्तार किया गया था। जबकि असलियत यह है कि उन्हें इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि वे हिंदू अधिकारों की वकालत कर रहे थे और देश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठा रहे थे। मित्रा ने फोरम का ध्यान हिंदुओं और अन्य गैर‑मुस्लिम समुदायों के धार्मिक स्थलों पर हो रहे हमलों की ओर भी आकर्षित किया।

उन्होंने कहा, “एक निर्दोष ISKCON भिक्षु, चिन्मय कृष्ण दास प्रभु, को बिना किसी आरोप के एक साल से जेल में रखा गया है। उनका एकमात्र ‘अपराध’ यह था कि उन्होंने अल्पसंख्यक हिंदुओं और बौद्धों पर हो रहे अत्याचारों का विरोध किया। बांग्लादेश में गैर‑मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं बची है। पिछले एक वर्ष में सैकड़ों मठों और धार्मिक स्थलों पर हमले हुए हैं, उन्हें तोड़ा‑फोड़ा गया है और आग के हवाले किया गया है। 23 जनवरी को वर्ल्ड सूफी ऑर्गनाइजेशन ने नेशनल प्रेस क्लब में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बताया कि अगस्त 2024 से अब तक कम से कम 99 धार्मिक स्थलों पर हमले हुए हैं।”

दिपन मित्रा ने चिन्मय कृष्ण दास प्रभु की तत्काल और बिना शर्त रिहाई की माँग की। उन्होंने यह भी जोर देकर कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब चुप नहीं रह सकता। दुनिया को आगे आकर बांग्लादेश में हिंदू, बौद्ध, ईसाई और आदिवासी अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए आवाज़ उठानी होगी और उनके सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक अधिकारों की रक्षा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।

नवंबर में, मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने बांग्लादेश के प्रसिद्ध बाउल गायक अबुल सरकार को गिरफ्तार कर लिया। उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने एक संगीत प्रस्तुति के दौरान इस्लाम और अल्लाह के खिलाफ ‘ईशनिंदा’ वाले बयान दिए।

यह गिरफ्तारी मुफ़्ती मोहम्मद अब्दुल्ला की शिकायत पर हुई। गिरफ्तारी के बाद, अबुल सरकार को ‘तौहीदी जनता’ और ‘आलिम‑उलमा’ जैसे संगठनों से जुड़े उग्र मुस्लिम भीड़ों ने अदालत परिसर के बाहर घेर लिया। माणिकगंज की सड़कों पर ‘एकটা দুইটা বাউল ধর, ধইরা ধইরা জবাই কর’ (एक‑एक बाउल को पकड़ो और मार डालो) जैसे नारे गूंजते रहे।

एक अन्य घटना बांग्लादेश में बढ़ती इस्लामी कट्टरता और असहिष्णुता को दर्शाती है। कट्टरपंथी इस्लामवादी समूहों ने 19वीं सदी के महान सूफी‑संत और लोककवि फकीर लालन शाह के सम्मानित समाधि‑स्थल को ध्वस्त करने की सार्वजनिक धमकी दी। लालन शाह की समन्वयवादी (syncretic) दर्शनशैली लंबे समय से इस क्षेत्र में सांस्कृतिक सद्भाव का प्रतीक रही है।

बांग्लादेश में बढ़ता ‘आतंकवाद’

बांग्लादेश में बढ़ती कट्टरता और उग्रवाद पर भी हिंदू अधिकार कार्यकर्ता ने आगे बात की। उन्होंने बताया कि 5 अगस्त 2024 को बांग्लादेश की विभिन्न जेलों से सैकड़ों उग्रवादी और अपराधी फरार हो गए थे। उन्होंने कहा, भागे हुए कैदियों में से 70 आतंकियों के साथ 700 अपराधियों को अब तक गिरफ्तार नहीं किए जा सका है।

पहाड़ी जनजातियों को मिटाने के एजेंडे पर काम कर रहे इस्लामवादी

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि इस्लामी जिहादी और बांग्लादेशी सेना मिलकर आदिवासी समुदायों को उनकी पैतृक भूमि से बेदखल करने की कोशिश कर रहे हैं। दिपन मित्रा ने एक विशेष घटना का उल्लेख किया, जिसमें बंगाली मुस्लिम बसने वालों और सेना ने खागड़चारी और रंगामाटी में पहाड़ी जनजातियों पर हिंसक हमला किया।

उन्होंने कहा, “इस बर्बर हमले में 8 आदिवासी लोगों की हत्या कर दी गई और 100 से अधिक घायल हुए। सभी पहाड़ी जनजातियों से थे।” उन्होंने आगे बताया कि दीघिनाला में 175 दुकानें और रंगामाटी में कम से कम 200 छोटे‑बड़े व्यवसाय क्षतिग्रस्त हुए।

इस्लामवादियों ने रंगामाटी स्थित चिटगाँग हिल ट्रैक्ट्स रीजनल काउंसिल के कार्यालय पर भी हमला किया और 9 कारों और 1 मोटरसाइकिल को आग लगा दी। इसके अलावा, इस्लामवादियों ने बौद्ध धार्मिक संस्था मैत्री विहार में तोड़फोड़ और लूटपाट की।