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अमेरिका का दोगलापन: ‘डेमोक्रेसी’ के नाम पर गिराई सरकारें, तानाशाहों को किया मजबूत


शनिवार (3 जनवरी) की सुबह, काराकास की नींद रात के आसमान में फाइटर जेट्स के उड़ने की आवाज़ से खुली। सुबह तक यह साफ हो चुका था कि वेनेज़ुएला एक जाने-पहचाने अमेरिकी ड्रामे का नया मंच बन चुका है। यहाँ अमेरिकी सेना की टुकड़ी को ‘डेमोक्रेसी वापस लाने’ के एक मिशन पर लगाया गया था।

US के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कन्फर्म किया कि अमेरिकी सेना ने वेनेज़ुएला में कई हमले किए हैं और प्रेसिडेंट निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को पकड़कर यूनाइटेड स्टेट्स ले गए हैं। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर ऑपरेशन की घोषणा की, और इसे ‘नारकोटिक टेररिज्म’ कहे जाने वाले सिस्टम के खिलाफ अभियान बताया।

                                                                  (साभार- ट्रंप/ ट्रूथ सोशल)

इसके तुरंत बाद, US अटॉर्नी जनरल पामेला बोंडी ने बताया कि मादुरो और फ्लोरेस पर न्यूयॉर्क में नार्को-टेररिज्म की साजिश में शामिल होने से लेकर लोकतंत्र को खत्म करने जैसे आरोप लगाए गए थे।

ट्रंप ने मादुरो सरकार पर प्रवासियों को US के दक्षिणी बॉर्डर की ओर धकेलने, जेलों और मेंटल इंस्टीट्यूशन को खाली करने और ड्रग कार्टेल और आतंकवादी ग्रुप्स के साथ मिलकर काम करने का आरोप लगाया। ट्रंप के मुताबिक, वेनेजुएला अमेरिका में कोकेन लाने का एक बड़ा रास्ता बन गया है, जहाँ कैरिबियन और पैसिफिक के रास्ते नशीले पदार्थों की तस्करी होती है।

यह वजह जानी-पहचानी लग रही थी क्योंकि पहले भी अमेरिका ऐसे आरोप लगाकर कई देशों के साथ ऐसा व्यवहार कर चुका है। कई सालों से अमेरिका अपने विरोधी देशों और उनकी सरकारों पर मानवाधिकार उल्लंघन करने, लोगों पर जुल्म करने और दुनिया की सुरक्षा के लिए खतरा बताता रहा है।

वेनेज़ुएला के मामले में सितंबर 2025 में ट्रंप प्रशासन ने कई नावों पर हमला किया था और उसमें ड्रग्स होने की बात कही थी। यह एक संकेत था, जो अमेरिका ने दुनिया को दिया था।

हालाँकि मादुरो ने हमेशा ऐसे आरोपों से इनकार किया और उन्हें वेनेजुएला के बड़े तेल भंडार को कंट्रोल के लिए एक कवर बताया। हमलों से कुछ दिन पहले मादुरो ने प्रवासियों और ड्रग ट्रैफिकिंग पर US के साथ सहयोग की पेशकश की थी। लेकिन अमेरिका ने मादुरो के सामने देश छोड़ने की शर्त रख दी थी। इससे मादुरो उखड़ गए। इस पर अमेरिका ने मादुरो पर ‘गंभीर’ नहीं होने का आरोप लगाया।

इसका खामियाजा वेनेजुएला को उठाना पड़ा। अमेरिकी जेट बिना कॉन्ग्रेस की मंजूरी के उड़ गई। इसपर अमेरिका में भी सवाल किए जा रहे हैं। यूएन को बताना तो दूर की बात है।

वेनेज़ुएला में जो हुआ वह एक ऐसे पैटर्न से मेल खाता है, जिसे दुनिया ने पहले भी कई बार देखा है। डेमोक्रेसी, सिक्योरिटी और नैतिक जिम्मेदारी में लिपटा हुआ एक शासन बदलने का ऑपरेशन।

डेमोक्रेसी बहाल करने के नाम पर शासन बदलना

वेनेज़ुएला में US का दखल यूँ ही नहीं हुआ। यह दुनिया भर में अमेरिका की लीडरशिप में हुए तख्तापलट का एक और उदाहरण है। वियतनाम से लेकर इराक तक, अफगानिस्तान से लेकर सीरिया तक अमेरिका ने बार-बार मिलिट्री एक्शन को ‘खराब राज’ हटाने और उनकी जगह ‘डेमोक्रेटिक सिस्टम’ लाने के तौर पर इस्तेमाल किया। इसकी वजह से दुनिया में अस्थिरता का दौर आया और व्यापक हिंसा हुई।

2001 के आखिर में US के समर्थन वाली सेना काबुल में घुसी और कुछ ही हफ्तों में तालिबान सरकार को गिरा दिया। हामिद करजई को अमेरिकी समर्थन मिला और उन्हें अफगानिस्तान का लीडर बनाया गया। उस वक्त तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने सेंट्रल एशिया में डेमोक्रेसी की जड़ें जमने की बात कही। दो दशक बाद, US सैनिक वापस चले गए और तालिबान लगभग रातों-रात सत्ता में वापस आ गया। अमेरिका की बनाई सरकार गिर गई। इससे पता चलता है कि वह हमेशा से कितनी खोखली और परजीवी थी।

इराक ने भी ऐसा ही रास्ता अपनाया गया। 2003 में US सैनिकों ने सद्दाम हुसैन को सत्ता से बाहर कर दिया। इराक को मिडिल ईस्ट में लोकतंत्र का अगुआ करार दिया। लेकिन इराक के सिक्योरिटी सिस्टम को खत्म करने से लाखों हथियारबंद लोग बेरोजगार हो गए। देश बगावत, सांप्रदायिक हिंसा और सिविल वॉर में डूब गया। ईरान के सपोर्ट वाले मिलिशिया का असर बढ़ा, और इस अफ़रा-तफ़री से आखिरकार इस्लामिक स्टेट बना, जिसने इलाके के सिक्योरिटी माहौल को इस तरह से बदल दिया जो आज भी उसे परेशान करता है।

सीरिया, लीबिया और पहले वियतनाम एक ही कहानी के अलग-अलग रूप हैं। US नैतिकता की दुहाई देते हुए मौजूदा सरकार को सत्ता से बाहर करता है। सिस्टम खत्म कर देता है और टूटे-फूटे समाज को पीछे छोड़ जाता है। जानकार इस पैटर्न को विदेशियों द्वारा थोपा गया शासन परिवर्तन कहते हैं।

पिछले 120 सालों में यूनाइटेड स्टेट्स ने करीब 35 देशों के नेताओं को सत्ता से जबरदस्ती बाहर किया है। ये आंकड़ा पूरी दुनिया में हुए ऐसे सभी दखलदांजी का लगभग एक-तिहाई है। चिंता की बात यह है कि इनमें से लगभग एक-तिहाई देशों में शासन परिवर्तनों के बाद एक दशक के अंदर सिविल वॉर हुआ।

यहाँ तक ​​कि ट्रंप, जिन्होंने अमेरिका में अपनी राजनीति ही दुनिया के युद्ध बंद करने के नाम पर शुरू की, वे भी इस परंपरा से बाहर नहीं निकल पा रहे। हालाँकि उन्होंने बार-बार इराक हमले की निंदा की है और नियोकंज़र्वेटिव विदेश नीति की आलोचना की है, उनका वेनेजुएला दखल उनके ‘शांतिदूत’ होने के अपने दावों से मेल नहीं खाता।

बांग्लादेश: बिना बम के US ने बदली सरकार

जहाँ वेनेज़ुएला में फाइटर जेट और मिसाइलें देखी गईं, वहीं बांग्लादेश में अमेरिकी दखल अलग तरीके से हुआ। बांग्लादेश में सैनिक नहीं भेजे गए, बल्कि पॉलिटिकल प्रेशर, इंटेलिजेंस नेटवर्क और सड़क पर विरोध प्रदर्शनों के जरिए लोकतांत्रिक सरकार को हटाया गया।

एक किताब, इंशाअल्लाह बांग्लादेश: द स्टोरी ऑफ़ एन अनफिनिश्ड रेवोल्यूशन के मुताबिक, शेख हसीना के पूर्व होम मिनिस्टर असदुज्जमां खान कमाल ने CIA पर उन्हें सत्ता से हटाने की साज़िश रचने का आरोप लगाया है। उन्होंने इन घटनाओं को ‘CIA की एक परफेक्ट साज़िश’ बताया।

                                                                (फोटो- Hindu e shop)

कमाल ने दावा किया कि देश के आर्मी चीफ जनरल वाकर-उज़-ज़मान इस साज़िश के सेंटर में थे। हैरानी की बात यह है कि उन्होंने कहा कि बांग्लादेश की टॉप इंटेलिजेंस एजेंसियों ने भी हसीना को चेतावनी नहीं दी, जिससे लगता है कि सीनियर अधिकारियों की मिलीभगत रही होगी। कमाल के मुताबिक, वाकर ने आर्मी चीफ का पद संभालने के कुछ ही हफ़्तों बाद 5 अगस्त, 2024 को हसीना को देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया, यह एक ऐसा पद था जिस पर हसीना ने खुद उन्हें अपॉइंट किया था।

हसीना के गिरने से पहले हुए विरोध प्रदर्शनों को इंटरनेशनल लेवल पर तथाकथित जेन जी लीड और डेमोक्रेटिक बताया गया, लेकिन कमाल ने कहा कि जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टर इस्लामी ग्रुप, जो पहले से बँटे हुए थे, पहली बार विदेशी इंटेलिजेंस नेटवर्क के सपोर्ट से एक हो गए। उन्होंने आगे दावा किया कि पाकिस्तान की ISI ने इसमें अहम भूमिका निभाई। इस दौरान विदेश में ट्रेंड आतंकवादी प्रदर्शनकारियों के साथ मिल गए और पुलिस पर हमला किया।
कमाल ने तर्क दिया कि इसका मोटिवेशन स्ट्रेटेजिक था। उन्होंने कहा कि अमेरिका एक ही समय में साउथ एशिया में बहुत सारे मजबूत लीडर नहीं चाहता। भारत में नरेंद्र मोदी और चीन में शी जिनपिंग के होने से, हसीना का इंडिपेंडेंट रुख उनके लिए असुविधाजनक हो गया। एक और मुख्य वजह बंगाल की खाड़ी में सेंट मार्टिन आइलैंड था, जो अमेरिका चाहता था। हिन्द महासागर में जियोपॉलिटिक्स के लिए ये बहुत जरूरी है।
हसीना ने खुद सार्वजनिक तौर पर कहा था कि US ने उन पर सत्ता में बने रहने के बदले आइलैंड का एक्सेस माँगा था। उन्होंने इसे बांग्लादेश की संप्रभुता का उल्लंघन बताते हुए मना कर दिया। शेख हसीना को हटाए जाने के बाद इकॉनमिस्ट मुहम्मद यूनुस को सत्ता की जिम्मेदारी सौंपी गई, जो अमेरिका के करीबी थे।

तानाशाह के दोस्त, लोकतंत्र के दुश्मन

अमेरिका ने ‘डेमोक्रेसी’ के नाम पर कई देशों और उसके राष्ट्राध्यक्षों को बर्बाद किया। वहीं दूसरी ओर तानाशाही सरकारों के साथ उसके करीबी रिश्ते रहे, बशर्ते वे US के लिए फायदेमंद हों। सऊदी अरब इसका सबसे अच्छा उदाहरण है।
सऊदी में कोई चुनाव नहीं होता, कोई पॉलिटिकल पार्टी नहीं है और कोई राजनीतिक आजादी नहीं है। फिर भी अमेरिका उसे एक अहम साथी मानता है।
हाल ही में, US ने सऊदी अरब को $1.4 बिलियन की सैन्य साजोसामान की बिक्री को मंज़ूरी दी। इसमें उसकी आर्मी को ट्रेनिंग देने के लिए करोड़ों डॉलर शामिल हैं। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के व्हाइट हाउस दौरे के नतीजे में F-35 फाइटर जेट की बिक्री और एक स्ट्रेटेजिक डिफेंस एग्रीमेंट को मंजूरी मिली। इस व्यापार से US और सऊदी अरब के रिश्ते और ‘मधुर’ हुए।
यह वही सऊदी लीडरशिप है, जिसे मानवाधिकार के उल्लंघन, यमन में युद्ध और पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या पर दुनिया भर में गुस्से का सामना करना पड़ा है। फिर भी, ऐसा नहीं लगता कि इनमें से कोई भी बात रियाद को अमेरिकी सपोर्ट के लिए अयोग्य ठहराती है।
सऊदी अरब के अलावा, US के मिडिल ईस्ट, अफ्रीका और एशिया में दूसरे तानाशाही देशों के साथ मजबूत रिश्ते हैं। मिस्र, जहाँ मिलिट्री तख्तापलट के बाद प्रेसिडेंट अब्देल फत्ताह अल-सिसी का राज है, को US से अरबों की मिलिट्री मदद मिलती है।
यूनाइटेड अरब अमीरात, जहाँ पूरी तरह से राजशाही है, US का एक और करीबी पार्टनर है। इन रिश्तों को शायद ही कभी डेमोक्रेसी के लिए समस्या के तौर पर देखा जाता है। इसके बजाय, उन्हें ‘स्टेबिलिटी’, ‘सिक्योरिटी,’ और ‘रीजनल बैलेंस’ के तौर पर देखा जाता है।
जब ये सरकारें विरोध को दबाती हैं या विरोधियों को जेल में डालती हैं, तब भी अमेरिका चुप रहता है।

अमेरिका का दोगलापन

वेनेजुएला, अफगानिस्तान, इराक, बांग्लादेश के साथ और तानाशाही सरकारों के साथ अमेरिका के रिश्ते, उसके दोहरे चरित्र को उजागर करते हैं। डेमोक्रेसी का इस्तेमाल चुनिंदा तरीके से किया जाता है, दुश्मनों के खिलाफ हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है और दोस्तों के साथ डील करते समय नजरअंदाज कर दिया जाता है।
जो सरकारें US के असर का विरोध करती हैं, उन्हें क्रिमिनल, गैर-कानूनी या खतरनाक करार दिया जाता है। जो लोग बात मानते हैं, भले ही वे बिना चुनाव के राज करें या तानाशाही रवैया अपनाएँ, उन्हें ‘इनाम’ दिया जाता है।
इस पैटर्न को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है। सरकार बदलना डेमोक्रेसी के बारे में नहीं है, यह कंट्रोल के बारे में है। यह तेल, मिलिट्री बेस, शिपिंग रूट और जियोपॉलिटिकल फायदे के बारे में है। लैटिन अमेरिका से लेकर साउथ एशिया तक, यूनाइटेड स्टेट्स ने बार-बार दिखाया है कि उसका कमिटमेंट डेमोक्रेटिक वैल्यूज़ के लिए नहीं, बल्कि स्ट्रेटेजिक फायदे के लिए है।

बलूचिस्तान में ‘अमेरिकी खुदाई’ का बनाया जा रहा रास्ता, सोना निकालने वाली कनाडाई कंपनी ने G7 देशों से माँगे 29050 करोड़ रूपए: सऊदी अरब ने फंडिंग से कर दिया है इनकार

                                                                                                                   साभार - एक्सप्रेस ट्रिब्यून
बलूचिस्तान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में है। इस बार कारण है इसके प्राकृतिक संसाधनों को लेकर बढ़ती वैश्विक दिलचस्पी। कनाडा की कंपनी बैरिक माइनिंग ने विवादित रेको दिक तांबा-सोना परियोजना के लिए 3.5 अरब डॉलर (29,050 करोड़ रुपए) की फंडिंग की माँग की है।

सऊदी अरब ने इस परियोजना में निवेश से इनकार कर दिया है। अब कंपनी अमेरिकी नेतृत्व में G7 फाइनेंसिंग पैकेज तैयार कर रही है, जिससे 2028 तक खदान से उत्पादन शुरू होने की उम्मीद है।

बैरिक माइनिंग के सीईओ मार्क ब्रिस्टो के अनुसार, अमेरिकी सरकार, एशियाई विकास बैंक, अंतर्राष्ट्रीय वित्त निगम (IFC), अमेरिकी अंतर्राष्ट्रीय विकास वित्त निगम, कनाडा, जापान और जर्मनी के वित्तीय संस्थान इस परियोजना में गहरी रुचि दिखा रहे हैं।

उन्होंने फाइनेंशियल टाइम्स को बताया कि अमेरिका के समर्थन से पाकिस्तान को कॉपर कॉन्सन्ट्रेट (तांबे का कच्चा रूप) तक पहुँच मिलेगी, हालाँकि इसके लिए अभी और प्रोसेसिंग की आवश्यकता है। यह परियोजना न केवल पाकिस्तान के आर्थिक भविष्य के लिए अहम मानी जा रही है, बल्कि यह भी दिखाती है कि कैसे वैश्विक ताकतें बलूचिस्तान जैसे संवेदनशील क्षेत्र में संसाधनों को लेकर सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

बलूचिस्तान की सबसे बड़ी खनिज परियोजना

रेको दिक खदान को दुनिया की सबसे बड़ी और अब तक अविकसित तांबा-सोना परियोजनाओं में से एक माना जाता है। अनुमान है कि अगले 37 वर्षों के खनन काल में यह परियोजना लगभग 70 अरब डॉलर (5.81 लाख करोड़ रुपए) का फ्री कैश फ्लो (Free Cash Flow) और करीब 90 अरब डॉलर (7.47 लाख करोड़ रुपए) का कुल ऑपरेटिंग कैश फ्लो (Operating Cash Flow) उत्पन्न कर सकती है।
इस महत्वाकांक्षी परियोजना की मालिकाना हिस्सेदारी तीन पक्षों के बीच साझा है। जिसमें कनाडा की बैरिक गोल्ड कंपनी, पाकिस्तान की संघीय सरकार और बलूचिस्तान की प्रांतीय सरकार शामिल है।
इसकी फंडिंग के लिए कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से बातचीत चल रही है। इस साल की शुरुआत में टिम क्रिब ने बताया था कि रेको दिक परियोजना को अंतरराष्ट्रीय विकास संघ (IDA) और अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम (IFC) से लगभग 650 मिलियन डॉलर (5,395 करोड़ रुपए) की सहायता मिलने की उम्मीद है।

वहीं, अमेरिकी निर्यात-आयात बैंक (US EXIM Bank) से 500 मिलियन से 1 अरब डॉलर (4,150 करोड़ रुपए से 8,300 करोड़ रुपए) तक की फंडिंग की संभावना जताई गई है। इसके अलावा, परियोजना जापान बैंक फॉर इंटरनेशनल को ऑपरेशन, एक्सपोर्ट डेवलपमेंट कनाडा और एशियाई विकास बैंक जैसे अन्य वित्तीय संगठनों से भी 500 मिलियन डॉलर (4,150 करोड़ रुपए) की अतिरिक्त राशि जुटाने का प्रयास कर रही है।

यह परियोजना पाकिस्तान के आर्थिक विकास के लिए एक बड़ा अवसर मानी जा रही है और इसमें वैश्विक स्तर पर बढ़ती दिलचस्पी बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों की अहमियत को भी दिखाती है।

भारत के साथ टैरिफ युद्ध के बीच ट्रंप के करीब आने की कोशिश कर रहा पाक

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर रूस से तेल खरीदने को लेकर टैरिफ वॉर छेड़ दिया है। इससे भारत-अमेरिका के बीच तनाव बढ़ गया है। इसी दौरान पाकिस्तान ने अमेरिका और ट्रंप से नजदीकियाँ बढ़ा ली हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और असली ताकत रखने वाले सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर ने ट्रंप की खुलकर चमचागिरी की है, जिससे अमेरिका से उनके रिश्ते मजबूत हुए हैं।

पाकिस्तानी फौज समर्थित सरकार ने कई बार ट्रंप को इस ‘दावे’ के लिए धन्यवाद दिया है कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्षविराम (सीजफायर) समझौते में कोई भूमिका निभाई। हालाँकि, असलियत यह है कि भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान को सैन्य रूप से करारी हार दी थी। यह ऑपरेशन पाकिस्तान-प्रायोजित पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद किया गया था, जिसमें 26 लोग मारे गए थे।

इस शर्मनाक हार के बाद पाकिस्तान ने खुद भारत से संघर्षविराम की अपील की थी, जिसे भारत ने रणनीतिक रूप से मान लिया। इसके बाद से पाकिस्तान की फौज के प्रमुख असीम मुनीर दो बार अमेरिका का दौरा कर चुके हैं।

पाकिस्तान की खुशामदी नीति से प्रभावित होकर ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में बलूचिस्तान की आज़ादी के लिए लड़ रही बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) और उसकी मजीद ब्रिगेड को ‘विदेशी आतंकी संगठन’ घोषित कर दिया है। इससे बलूच स्वतंत्रता सेनानियों को अब अमेरिका की नजर में आतंकवादी बताया गया है।

बलूचिस्तान में पाकिस्तान का विरोध

बलूचिस्तान, जो पाकिस्तान का सबसे उपेक्षित और शोषित प्रांत माना जाता है, लंबे समय से प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और स्थानीय लोगों के दमन का शिकार रहा है। बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) ने वर्षों से पाकिस्तानी फौज, चीनी कर्मियों और चीन की उन परियोजनाओं पर हमले किए हैं, जो बलूच संसाधनों का दोहन करती हैं।
बलूच समुदाय का आरोप है कि पाकिस्तान और चीन मिलकर उनके खनिज और ऊर्जा संसाधनों का फायदा उठा रहे हैं, लेकिन स्थानीय लोगों को उसका कोई लाभ नहीं मिलता। इस बीच, अमेरिका की भूमिका भी इस क्षेत्र में तेजी से बढ़ रही है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल ही में पाकिस्तान के कथित विशाल तेल भंडार को संयुक्त रूप से विकसित करने के लिए एक नया व्यापार समझौता पेश किया था। यह ऐलान उस समय हुआ जब अमेरिका ने भारत से आयात होने वाले सामान पर भारी टैरिफ और दंडात्मक शुल्क लगाने की घोषणा की थी।
ट्रम्प ने यहाँ तक कह दिया कि एक दिन पाकिस्तान भारत को तेल बेच सकता है। इसी दौरान अमेरिका ने BLA को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया, जो ट्रम्प के पाकिस्तान समर्थक रुख और बलूचिस्तान के खनिज संसाधनों में बढ़ती अमेरिकी दिलचस्पी को और भी संदिग्ध बना देता है। बलूच स्वतंत्रता सेनानियों ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के तहत ग्वादर बंदरगाह में चीनी प्रभाव का लगातार विरोध किया है।
अब कनाडा की कंपनी बैरिक माइनिंग रेको डिक तांबा-सोना परियोजना के लिए 3.5 अरब डॉलर की फंडिंग जुटाने में लगी है, जिसमें अमेरिकी संस्थानों की भी भागीदारी है। इससे यह साफ झलकता है कि पाकिस्तानी सेना बलूचिस्तान के बहुमूल्य संसाधनों को डॉलर के बदले विदेशी कंपनियों को सौंप रही है, जबकि बलूच जनता दमन और हिंसा का शिकार बनी हुई है।
इतिहास गवाह है कि बलूचिस्तान से मिलने वाली गैस और बिजली हमेशा पंजाब और पाकिस्तान के अन्य प्रांतों को दी जाती रही है, जबकि बलूच लोग खुद मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। अब विदेशी कंपनियाँ, जिनमें अमेरिकी समर्थन वाली कंपनियाँ भी शामिल हैं, बलूचिस्तान के खनिजों से अरबों का मुनाफा कमाएँगी। यह स्थिति इस ओर इशारा करती है कि बलूचिस्तान आने वाले समय में अमेरिका के लिए एक नया तेल युद्ध स्थल बन सकता है।


‘ऑपरेशन सिंदूर’ से घबराए पाकिस्तान ने सऊदी अरब से लगाई थी गुहार, ‘भाईजान’ से सीजफायर के लिए रोए थे डिप्टी PM: लाइव TV पर किया खुलासा; क्या पाकिस्तान ने इस्लाम को ATM बनाया हुआ है? ईरान की जासूसी करने ड्रोन भेजने पर पाकिस्तान ने कितने में किससे सौदा किया है?

इशाक डार (बाएँ) ने स्वीकार किया है कि उन्होंने सऊदी अरब से मदद माँगी थी (साभार: India Today & Dawn)
भारत में जिन लोगों का पाकिस्तान के लिए दिल धड़कता है उन्हें समझना होगा कि क्या पाकिस्तान इस्लाम को ATM की तरह इस्तेमाल कर सबको पागल बनाए हुए है? पाकिस्तान कंगाल नहीं है, सभी इस्लामिक मुल्क जानते है कि पाकिस्तान की आर्मी और सियासतखोर इस्लाम के नाम पर चंदा लेकर विदेशों में अपना आशियाना बना रखे हैं। भारत द्वारा पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों पर हो रहे हमलों पर अमेरिका, चीन और तुर्की आदि को छोड़ कोई मुस्लिम देश पाकिस्तान के साथ कहीं दूर तक नज़र नहीं आया। इन पाकिस्तान के हमदर्दों को सोंचना चाहिए।  

यह कोई आरोप नहीं, कटु सच्चाई है, "हाथ कंगन को आरसी क्या पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या", अभी पाकिस्तान आर्मी मुख्य असीम मुनीर अमेरिका में है, क्यों? अमेरिकन राष्ट्रपति White House में बैठाकर खाना खिलाने की आड़ में क्या सौदा हो रहा है? अमेरिका को मालूम है कि पाकिस्तान को आर्मी चलाती है कोई सियासत पार्टी नहीं। इतना ही नहीं चर्चा है कि जून 19 को ईरान की जासूसी करने गए पाकिस्तानी ड्रोन को ईरान ने मार गिराया।      

‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भारत के हमलों से डरा-सहमा पाकिस्तान सिर्फ अमेरिका ही नहीं बल्कि सऊदी अरब के पास भी पहुँचा था। उसने सऊदी अरब से भारत के हमले रुकवाने और सीजफायर को कहा था। यह खुलासा पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने लाइव टीवी पर किया है।

इशाक डार ने यह खुलासा पाकिस्तान के जियो टीवी पर किया है। उन्होंने पत्रकार हामिद मीर के शो कैपिटल टॉक में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सऊदी अरब के शाही परिवार के एक राजकुमार से हुई बातचीत का जिक्र किया है। इसकी एक क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल है।

इशाक डार इसमें कहते हैं, “भारत ने 6-7 मई, 2025 की रात को शोरकोट एयरबेस और नूर खान एयरबेस पर हमला कर दिया। इसके 45 मिनट के भीतर मुझे सऊदी के राजकुमार फैसल बिन सलमान का फोन आया।”

आगे इशाक डार ने बताया, “उन्होंने मुझसे कहा कि भाईजान मुझे पता चला है कि आपकी बात रुबियो (अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो) से हुई है लेकिन क्या मैं जयशंकर (भारतीय विदेश मंत्री) से बात कर सकता हूँ कि आप लोग अपनी कार्रवाई रोकने को तैयार हो।”

इशाक डार ने कहा, “मैंने कहा कि जी भाईजान बिलकुल हम कुछ नहीं करेंगे आप उन्हें यह सन्देश पहुँचा सकते हैं। इसके 20-25 मिनट बाद फिर उन्होंने मुझे फोन किया कि मैंने जयशंकर साहब को यह बात कह दी है।”

इशाक डार ने इस दौरान कहा कि सऊदी चाहें तो भारत और पाकिस्तान के बीच कथित सीजफायर का क्रेडिट ले सकते हैं। ऑपरेशन सिंदूर के बाद ऐसा पहली बार हुआ है कि पाकिस्तान ने सऊदी अरब से इस मामले में मदद माँगने का खुलासा किया है।

साथ ही पाकिस्तान ने पहली बार यह बात स्वीकारी है कि उसके पंजाब में स्थित एयरबेस नूर खान और एयरबेस शोरकोट पर भारत ने बड़े हमले किए थे। पाकिस्तान ने इससे भारत की कार्रवाई पर मुहर लगा दी है और अब तक आई सैटेलाईट इमेज से निकली जानकारी भी स्वीकार कर ली है।

पाकिस्तान पर ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हुआ हमला कितना ताकतवर था, इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि उसका रहीम यार खान एयरबेस अभी तक नहीं चालू हो पाया है। पाकिस्तान ने इसे एक बार फिर 4 जुलाई, 2025 तक बंद करने का फैसला लिया है।

गौरतलब है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने सिंध स्थित रहीम यार खान एयरबेस पर बड़े हमले किए थे और इस हमले में पाकिस्तान के एक स्क्वाड्रन लीडर समेत 4 वायुसेना कर्मी मारे गए थे। भारत का रहीम यार खान पर हमला इतना जबरदस्त था कि इसके रनवे पर बड़ा गड्ढा भी बन गया था।

भारत ने 22 अप्रैल, 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के जवाब में 7 मई की रात को पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) में 9 आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया था। इसके बाद पाकिस्तान ने भारतीय शहरों निशाना बनाने का प्रयास किया था लेकिन भारत ने तब तक उसके एयरबेस उड़ाने चालू कर दिए थे।

अमेरिकी मुस्लिमों जिहाद छेड़ो, ‘कचरा’ साफ करो : कौन है ‘किल लिस्ट’ जारी करने वाला अलकायदा आतंकी आतिफ अवलाकी? भारत, रूस और इजराइल तो कमर कसे हुए है, देखो अमेरिका आतंकवाद के विरुद्ध कब शंखनाद करता है?

                                           जेडी वेंस, डोनाल्ड ट्रंप, एलन मस्क (फोटो साभार: NYT)
इतिहास लिखा नहीं जाता दोहराया जाता है, इस कटु सच्चाई को कोई झुठला नहीं सकता। अभी कुछ ही दिन पहले बौखलाहट में पाकिस्तान बोल गया कि सोवियत संघ(Soviet Union) को तोड़ने जिस आतंकवाद के लिए पाकिस्तान से मदद ली थी। आज वही आतंकवाद अमेरिका को आग में झोंक रहा है। भारत आतंकवाद के विरुद्ध पाकिस्तान के विरुद्ध लड़ाई लड़ रहा है उसके बावजूद IMF द्वारा पाकिस्तान को अनुदान दिए जाने का विरोध नहीं किया। ट्रम्प साहब आतंकवाद आतंकवाद ही होता है। मालूम है कि पाकिस्तान आतंकवाद की फैक्ट्री है फिर भी अप्रत्यक्ष समर्थन दिया। अब आतंकवाद के विरुद्ध भारत की तरह आतंकवाद पर हमला बोलोगे या नहीं? यह अमेरिका की अग्नि-परीक्षा की घडी है। देखो अमेरिका आतंकवाद के विरुद्ध कब शंखनाद करता है?

       

यमन बेस्ड आतंकी संगठन अल-कायदा इन द अरेबियन पेनिनसुला (AQAP) के सरगना साद बिन आतिफ अल-अवलाकी ने एक 34 मिनट का वीडियो जारी किया है। इस वीडियो में उसने अमेरिका में रहने वाले मुस्लिमों से जिहाद छेड़ने और वहाँ के बड़े-बड़े लोगों जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस और टेस्ला कंपनी के मालिक एलन मस्क की हत्या करने की खुलेआम अपील की है। इस वीडियो का नाम है “इंसाइटिंग द बिलीवर्स”। इसे AQAP के समर्थक ऑनलाइन प्रोपेगेंडा का हथियार बनाकर सर्कुलेट कर रहे हैं।

साद ने इस वीडियो में कहा कि अमेरिका इजरायल और हमास के बीच चल रही जंग में इजरायल का साथ दे रहा है और इसके लिए उसका बदला लेना जरूरी है। उसने अमेरिका में रहने वाले करीब 45 लाख मुस्लिमों से कहा, “तुम्हें किसी से सलाह लेने की जरूरत नहीं, बस बदला लो! बदला लो! उन काफिर अमेरिकियों को मारो।” उसने ट्रंप, वेंस, विदेश मंत्री मार्को रुबियो, रक्षा मंत्री पीट हेग्सेथ और एलन मस्क को ‘धरती का कचरा’ और ‘सबसे बड़े अपराधी’ बताया। उसने इन नेताओं, उनके परिवारों और व्हाइट हाउस से जुड़े लोगों को निशाना बनाने की बात कही।

साद ने गाजा में जारी जंग का जिक्र करते हुए कहा कि वहाँ मुस्लिमों पर हो रहे जुल्मों के बाद अब कोई सीमा नहीं बची। उसने कहा, “गाजा में हमारे लोगों के साथ जो हो रहा है, उसका बदला लेना जरूरी है।” उसने यहूदियों के खिलाफ भी हिंसा भड़काने की कोशिश की और कहा, “यहूदियों के लिए कोई सुरक्षित जगह नहीं छोड़नी चाहिए, जैसे उन्होंने फलस्तीनियों के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी।” उसने गाजा में अस्पतालों पर हो रही बमबारी का हवाला दिया और मुस्लिमों से बदला लेने की अपील की।

इसके साथ ही साद ने हाल के कुछ हमलों की तारीफ भी की। उसने जुलाई 2024 में ट्रंप पर हमले की कोशिश और मई 2025 में वाशिंगटन डीसी में इजरायली दूतावास के कर्मचारियों पर हुए हमले का जिक्र किया। उसने इन हमलों को सही ठहराया और कहा कि ऐसे और हमले होने चाहिए।

साद ने सिर्फ लोगों पर हमले की बात नहीं की, बल्कि उसने अमेरिकी अर्थव्यवस्था और सरकार को भी नुकसान पहुँचाने की बात कही। उसने हैकर्स से कहा कि वो अमेरिका और खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाओं को निशाना बनाएँ। उसने माइक्रोसॉफ्ट और एलन मस्क की कंपनियों जैसे टेस्ला को भी ‘वैध निशाना’ बताया। उसने AQAP की पत्रिका ‘इंस्पायर’ का जिक्र करते हुए लोगों को बम बनाने की तकनीक सीखने की सलाह दी, ताकि वो हमले कर सकें।

ये वीडियो ऐसे समय में आया है, जब AQAP को पिछले कुछ सालों में काफी कमजोर माना जा रहा है। अमेरिका के ड्रोन हमलों और संगठन के अंदर आपसी झगड़ों की वजह से इसकी ताकत कम हुई है। फिर भी संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, AQAP के पास अभी भी 3,000 से 4,000 सदस्य हैं। अमेरिका ने AQAP को विदेशी आतंकी संगठन घोषित किया हुआ है। ये संगठन 2009 में यमन और सऊदी अरब के अल-कायदा ग्रुपों के गठजोड़ (विलय) के बाद बना था।

विशेषज्ञों का मानता है कि साद गाजा का मुद्दा उठाकर यमन के हूती विद्रोहियों की बढ़ती लोकप्रियता को चुनौती देना चाहता है। हूती विद्रोही भी इजरायल के खिलाफ हमले कर रहे हैं, और साद को लगता है कि हूतियों की लोकप्रियता से AQAP की अहमियत कम हो रही है। जानकारों का मानना है कि ये वीडियो AQAP की तरफ से अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने की कोशिश है।

साद बिन आतिफ अल-अवलाकी कौन है?

साद बिन आतिफ अल-अवलाकी यमन के शबवा प्रांत के अल-शुबाह इलाके की अल-अवालिक जनजाति से है। वो 2024 में AQAP का नेता बना, जब संगठन का पुराना सरगना खालिद अल-बतरफी मर गया। इससे पहले साद AQAP की शूरा परिषद का हिस्सा था और हमलों की योजना बनाने में शामिल था। वो अनवर अल-अवलाकी का रिश्तेदार है, जो एक कुख्यात आतंकी था और 2011 में अमेरिकी ड्रोन हमले में मारा गया था। अमेरिका ने साद पर 60 लाख डॉलर का इनाम रखा है, क्योंकि उसने पहले भी अमेरिका और उसके सहयोगी देशों पर हमले की बात कही थी।

साद का जन्म यमन में हुआ था और वो अल-कायदा की विचारधारा को फैलाने में हमेशा सक्रिय रहा है। 2023 में भी वो एक वीडियो में दिखा था, जिसमें उसने यमन की दक्षिणी जनजातियों से संयुक्त अरब अमीरात और दक्षिणी परिषद के खिलाफ लड़ने को कहा था। उसका संगठन अपने खर्चे चलाने के लिए बैंक लूट, हथियार तस्करी और फिरौती जैसे अपराध करता है।

क्या पाकिस्तान का समर्थन करने पर अमेरिकी राष्ट्रपति को मुस्लिम बनने का मिला न्योता?: मिस्र के मौलाना का Video वायरल, कहा- अल्लाह को समर्पित हो जाओ ट्रंप

         अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (बाएँ), मिस्र मौलना अल-अदावी (बाएँ) (साभार: Britannica/RT_com)
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को इस्लाम मजहब कबूल करने का न्यौता मिला है। मिस्र के मौलाना अल-अदावी ने वीडियो में ट्रंप के लिए संदेश भेजा। वीडियो में मौलाना कहते हैं, ‘अल्लाह के आगे समर्पण करो और मोक्ष पाओ।’ अब यह वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है। नेटिजन्स डोनाल्ड ट्रंप को नया मुस्लिम नाम दे रहे हैं।

वीडियो में अल-अदावी ने डोनाल्ड ट्रंप के नाम संदेश जारी कर उन्हें ‘महान अमेरिकी’ बताया। उन्होंने कहा, “अल्लाह के प्रति समर्पित हो जाओ और तुम्हें मुक्ति मिलेगी। इस्लाम स्वीकार करो और अल्लाह तुम्हें दोगुना ईनाम देगा। अच्छे कर्म करो, अल्लाह पर भरोसा रखो, क्योंकि अल्लाह एक है और उसका कोई साझीदार नहीं है।”

 मौलाना ने कहा कि अल्लाह ने ही ट्रंप को साम्राज्य दिया है और वही है जो इसे उनसे छीन सकता है। कहा, राष्ट्र या राष्टपति पद से धोखा मत खाओ, क्योंकि जो लोग तुमसे पहले आए थे वे मर चुके हैं। जॉनसन कहाँ है? निक्सन कहाँ है? कैनेडी कहाँ है?” अल-अदावी ने चेतावनी दी कि एक दिन ट्रंप को उनके कर्मों का फल मिलेगा, इसीलिए उन्हें अल्लाह की राह पर चलना चाहिए।

मौलाना ने ट्रंप से कहा है कि उन्हें अपने देश लौटकर लोगों को बताना कि अल्लाह के अलावा कोई नहीं है। वो कहता है, “इस्लाम को अपनाओ और मुक्ति पाओ। अल्लाह तुम्हें दोगुना इनाम देगा। मुसलमानों द्वारा तुम्हें दिए जाने वाले सबसे महान उपहार के साथ अपने देश लौटो। इस गवाही के साथ कि अल्लाह के अलावा कोई नहीं है, और यह कि मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं।”

यह वीडियो डोनाल्ड ट्रंप के हाल में किए गए खाड़ी दौरे के बाद सामने आया है। पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति सऊदी अरब, कतर और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) पहुँचे थे। राष्ट्रपति बनने का बाद यह उनका पहला विदेशी दौरान था। इसके लिए उन्होंने सबसे पहले कुछ मुस्लिम बहुल देशों को चुना।

ट्रंप के इस विदेशी दौरे के कई वीडियो सामने आए हैं, जिसमें डोनाल्ड ट्रंप का जोरदार स्वागत किया जा रहा है। UAE पहुँचे ट्रंप के स्वागत की एक वीडियो काफी वायरल हुई, जिसमें सफेद कपड़े पहने महिलाएँ अपने बालों को हिला रही हैं। यह सऊदी अरब का सांस्कृतिक नृत्य है, जिसे अनोखा स्वागत बताया गया। वहीं, इस वीडियो को लेकर ट्रंप को ट्रोल भी किया गया।

सऊदी अरब के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति कतर पहुँचे थे, जहाँ कतर के अमीर ने उन्हें खुद दोहा एयरपोर्ट पर रिसीव किया। ट्रंप का स्वागत पारंपरिक ऊँटों और उनके रेड साइबर ट्रक के साथ किया गया, जो काफी चर्चा में रहा। इस दौरान ट्रंप की दिलचस्पी अरब संस्कृति में काफी अधिक दिखाई दी।

ट्रंप के अरब देशों में दौरे के बाद सोशल मीडिया पर कुछ लोग ट्रंप को मुस्लिम समर्थक होने का दावा कर रहे हैं। इसी दौरे के बाद मिस्र के मौलाना अल-अदावी ने ट्रंप को इस्लाम मजहब कबूल करने का न्यौता देने वाली वीडियो वायरल हुई।

वीडियो को रूस की मीडिया संस्था रशिया टाइम्स के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट किया गया है। इसके बाद से यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है। हालाँकि यह साफ नहीं है कि यह वीडियो कब का है और किस मामले में बनाया गया है। लेकिन वीडियो में मौलाना राष्ट्रपति को इस्लाम अपनाने का आग्रह कर रहे हैं।

                   रूस की मीडिया रशियन टाइम्स द्वारा जारी की गई पोस्ट का कैप्शन (साभार: @RT_com)

वीडियो में ट्रंप की शपथ ग्रहण समारोह की एक क्लिप भी जोड़ी गई है, जिसमें वे प्रार्थना सभा में मुस्लिम अजान को ध्यान से सुनते दिखाई दे रहे हैं। इसका अर्थ माना जा रहा है कि ट्रंप इस्लाम से काफी प्रभावित हैं। वहीं, वीडियो पर काफी नेटिजंस चुटकी भी लेते नजर आ रहे हैं।

कुछ इस्लामी ने डोनाल्ड ट्रंप को मुस्लिम नाम भी दे दिया है। ट्रंप को दाऊद याह्या अल-ट्रंफी, डोनालडुद्दीन अब्दुल-बिन-ट्रंपुद्दीन-अमेरिकास्तानी, अबु मुहम्मद डोन-अल-उद्दीन ज़कारिया, मुफ्ती अल शेख अल ट्रंप जैसे मुस्लिम नाम रखने का सुझाव दिया जा रहा है। एक यूजर ने ट्रंप की मुस्लिम टोपी पहने फोटो भी शेयर की है।

मुस्लिम मुल्कों सऊदी-UAE में क़ैद हैं सबसे अधिक भारतीय: वो 12 देश जहाँ भारत के 10000+ नागरिक जेल

                               सऊदी-UAE में सबसे अधिक भारतीय क़ैदी (फोटो साभार: द सियासत डेली)
दुनिया में सबसे ज्यादा सजायाफ्ता और विचाराधीन भारतीय कैदी सऊदी अरब और UAE में हैं। इन दोनों मुस्लिम देशों में 2000 से ज्यादा भारत के लोग कैद हैं। दूसरे खाड़ी देशों की बात करें तो बहरीन, कुवैत और कतर में बड़ी संख्या में भारतीय कैद हैं। इसके अलावा नेपाल में 1317, मलेशिया में 338 और चीन में 173 भारतीय अलग अलग जेलों में बंद हैं। कुल मिलाकर दुनियाभर में 10,152 भारतीय 86 देशों में कैद हैं। इनमें सऊदी अरब, यूएई, कुवैत, कतर, नेपाल, चीन जैसे 12 देश अहम हैं जहाँ कुल भारतीय कैदियों में से क़रीब तीन-चौथाई कैद हैं।

2 साल में 10 कैदी आए स्वदेश

इसका खुलासा विदेश मंत्रालय ने संसद की एक समिति के सामने किया है। कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर की अगुवाई वाली संसदीय स्थाई समिति ने अपनी छठी रिपोर्ट में ये जानकारी दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, 12 देशों में से 9 देशों के साथ कैदियों के लिए प्रत्यर्पण संधि है, फिर भी पिछले 2 सालों में यानी 2023 से मार्च 2025 तक सिर्फ 10 कैदियों को ही स्वदेश लाया जा सका है। इनमें ईरान और यूके से 3-3, रूस और कंबोडिया से 2-2 कैदी शामिल हैं।

31 देशों से कैदियों के ट्रांसफर का समझौता

विदेश मंत्रालय ने समिति को बताया है कि 31 देशों के साथ भारत का कैदियों के प्रत्यर्पण को लेकर द्विपक्षीय समझौता है। इनमें सऊदी अरब, यूएई, क़तर, ईरान, इजरायल, ऑस्ट्रेलिया, बहरीन, बांग्लादेश, बोस्निया, ब्राजील, बुलगारिया, कंबोडिया, मालदीव्स, फ्रांस, दक्षिण कोरिया, सोमालिया, कज़ाकिस्तान, उज़बेकिस्तान, एजिप्ट, हॉगकॉग, यूके वियतनाम, श्रीलंका, थाईलैंड शामिल हैं। लेकिन, प्रक्रिया में वक्त लगता है क्योंकि TSP समझौते के तहत मेजबान देश और मूल देश के बीच सहमति जरूरी है।
रिपोर्ट के मुताबिक, विदेश मंत्रालय ने कहा है, “भारत ने सजायाफ्ता व्यक्तियों के स्थानांतरण पर दो बहुपक्षीय सम्मेलनों पर भी हस्ताक्षर किए हैं। इसका अर्थ है कि इंटर-अमेरिकन सम्मेलन और सजायाफ्ता व्यक्तियों के स्थानांतरण पर यूरोप परिषद सम्मेलन के आधार पर सदस्य राज्यों और अन्य देशों के सजायाफ्ता व्यक्ति अपनी सजा की शेष अवधि पूरी करने के लिए अपने मूल देशों में स्थानांतरण की माँग कर सकते हैं।”

कैदियों को दी जा रही निःशुल्क कानूनी सहायता

रिपोर्ट में कहा गया है, “भारतीय कैदियों को वापस लाने में मिल रहा ‘कम सक्सेस रेट’ के कारण हमें इन प्रयासों की समीक्षा करनी होगी।” हालाँकि, मंत्रालय ने जानकारी दी है कि कई विचाराधीन कैदियों की मदद भारतीय काउंसलर कर रहे हैं। कैदियों को जरूरत पड़ने पर कानूनी सहायता भी उपलब्ध कराई जाती है। इसके लिए कैदियों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता।
विदेशी जेलों में बंद कैदियों की बड़ी संख्या को ध्यान में रखते हुए, समिति ने कहा कि वह चाहती है कि सरकार समझौतों और सम्मेलनों को लागू करने में आ रहीं बाधाओं का अध्ययन करे और यदि जरूरी हो, तो कैदियों के सुगम प्रत्यर्पण की सुविधा के लिए मौजूदा समझौतों में संशोधन करे या नए समझौते बनाए। पैनल ने कैदियों को स्थानांतरित करने की प्रक्रिया को आसान बनाने और विदेशी जेलों में भारतीय नागरिकों के साथ अच्छा व्यवहार हो इसके लिए उन देशों के साथ ‘कूटनीतिक प्रयास’ करने पर जोर दिया।
रिपोर्ट में अवैध तरीके से रह रहे भारतीय नागरिकों को अमेरिका द्वारा निकाले जाने का भी उल्लेख किया गया है। समिति का कहना है कि अमेरिका से लौटे इन भारतीयों को फिर से बसाने की जिम्मेदारी उन राज्य सरकारों की है जहाँ से ये लोग आते हैं। 

सऊदी अरब : मुस्लिम कट्टरपंथियों का 'सर तन से जुदा' गैंग मक्का पर खामोश क्यों? समतल कर दिया पैगंबर मुहम्मद की अम्मी-अब्बू का कब्र, बीवी खदीजा का घर बना डाला शौचालय, वो मस्जिद भी बंद… जहाँ पढ़ते थे नमाज: मक्का, मदीना पर वहाबी इस्लाम की पकड़

             काबा के आसपास का निर्माण कार्य (फोटो साभार: Islamic Heritage Research Foundation)
भारत में शेर बनने वाले मुस्लिम कट्टरपंथी और उनका 'सर तन से जुदा' गैंग सऊदी अरब में भीखी बिल्ली बने हुए, किसी की आवाज़ तक नहीं निकल रही, मानो उनके घरों में जबरदस्त मातम हो गया हो। अयोध्या, काशी, मथुरा और अन्य हिन्दुओं के धार्मिक स्थलों पर उपद्रव मचाकर हिन्दुओं को ही गलत साबित करने वाले सऊदी अरब में मजहबी स्थलों और कब्रों को तोड़े जाने पर क्यों नहीं बोल रहे? भारत में ये भीगी बिल्लियां इसलिए शेर होती हैं क्योकि यहाँ कुर्सी के भूखे नेता और उनकी पार्टियां इनकी नाजायज मांग को भी उचित बताकर सेकुलरिज्म का रोना रोकर इनकी वोट खरीदते हैं। इतना ही नहीं, सारे मुस्लिम देश भी चुप्पी साधे हुए हैं। 
इस्लाम मजहब के सबसे पाक जगहों मक्का और मदीना सऊदी अरब का हिस्सा है। सऊदी अरब में हर साल लाखों लोग हज यात्रा के लिए पहुँचते हैं। आम तौर पर इस्लाम में मूर्ति पूजा की मनाही है, लेकिन जितनी कट्टरता से वहाबी और सऊद घराना मूर्तिपूजा से नफरत करता है, उतना शायद ही कोई करता हो। सऊदी अरब में कई ऐसे इस्लामिक केंद्र रहे थे, जो मूर्ति पूजा को बढ़ावा दे सकते थे, सऊदी अरब की सरकार और वहाबियों ने उन्हें जब से ही तबाह कर दिया या फिर उनके इस्तेमाल के तरीके को ही बदल दिया।

इससे पहले कि हम इस बात पर को बताएँ कि ‘मूर्ति पूजा’ का दमन करने के लिए किस तरह से ऐतिहासिक ढाँचों को बर्बाद किया जा रहा है, उससे पहले ये जानना जरूरी है कि वहाबी कौन हैं और सऊद घराने का अस्तित्व किस बात से जुड़ा है।

वहाबी सुन्नी इस्लाम का सबसे रूढ़िवादी शाखा है। इस्लाम की इस कट्टरपंथी शाखा को वहाबिज्म कहा जाता है, जिसकी स्थापना 18वीं शताब्दी में मुहम्मद इब्न अब्द अल-वहाब ने की थी। वहाबी पैगंबर मुहम्मद द्वारा प्रचलित और प्रचारित इस्लाम के “शुद्ध” रूप की ओर ‘वापस लौटने’ का प्रयास करते हैं। वहाबीवाद सख्त एकेश्वरवाद पर जोर देता है और मूर्ति पूजा जैसी प्रथाओं का कड़ा विरोध करता है क्योंकि यह उसे शिर्क ‘पाप’ बताता है। यही नहीं, वहाबी तो संतों/सूफियों और इस्लाम से जुड़े प्रतीकों को भी मानने से इन्कार करता है। यानी वहाबियों के हिसाब से दरगाहों पर जाकर अपने पुरखों को भी याद करना ‘शिर्क’ है।

इस्लाम की कट्टर वहाबी शाखा की शुरुआत करने वाले मुहम्मद इब्न अब्द अल-वहाब ने दिरियाह में पनाह ली थी, जो आज के दिनों में रियाद शहर के बाहरी इलाके में स्थित छोटा सा शहर नखलिस्तान कहा जाता है। दिरियाह पर अल सऊद के सरदार मुहम्मद इब्न सऊद का शासन था। सऊद ने न सिर्फ वहाब को हिजाज़ (इसी में मक्का-मदीना आते थे) से बाहर निकाले जाने के बाद उसे रहने की जगह दी, बल्कि उसके साथ साल 1744 में एक समझौता भी किया। इस “वहाबी-सऊदी समझौते” के तहत पहले सऊदी राज्य की स्थापना हुई, जिसमें मुहम्मद इब्न सऊद को अमीर की पदवी मिली, जबकि वहाब को “इमाम” की उपाधि दी गई।

ये समझौता मजबूत रहे, इसके लिए इब्न सऊद के सबसे बड़े बेटे ने अल-वहाब की बेटी से निकाह किया और इसके बाद अल सईद ने सार्वजनिक रूप से वहाबिज्म को स्वीकार कर लिया। वहाब के इस कट्टरपंथी इस्लाम ने मजहबी सुधारों का तीखा विरोध किया और सूफी कार्यक्रमों, संतों की इबारत पर रोक लगा दी। यही नहीं, नजद के बाहर जब सऊद ने जीत दर्ज की, तो उसके नेतृत्व में शिया मस्जिदों को ध्वस्त कर दिया गया। यही नहीं, शियाओं को अलग दिखाने के लिए उन्हें ‘रफीदा’ (अस्वीकार करने वालों) का अपमानजनक टैग दिया, जो आज भी जारी है। पाकिस्तान जैसे कट्टरपंथी देश में शियाओं को काफिर मान कर उनका दमन किया जाता है।

वहाबी विचारधारा के कट्टरपंथी विचारों की नवजह से सऊदी अरब के कई ऐतिहासिक स्मारकों को व्यवस्थित तरीके से बर्बाद कर दिया गया। वहाबियों का मानना था कि ऐसी ऐतिहासिक जगहों को बचाने से मूर्ति पूजा को बढ़ावा मिलेगा और लोग प्रतीकों को मानने लगेंगे, जोकि इस्लाम के खिलाफ है। ऐसे में उन्होंने कई ऐतिहासिक और धार्मिक ढाँचों को नष्ट कर दिया। इसके साथ ही किसी भी तरह की इबादत और मजहबी यात्रा पर बैन लगा दिया गया, जिसमें अल्लाह के अलावा किसी को भी मानने की बात हो।

कर्बला में हुसैन इब्न अली की कब्र को किया तबाह

साल 1802 में सऊद बिन अब्दुल-अजीज की अगुवाई में वहाबियों की सेना ने कर्बला शहर पर हमला किया। कर्बला उस समय तुर्की के ऑटोमन साम्राज्य में आता था। कर्बला आज भी शिया मुस्लिमों के लिए पाक शहर है, लेकिन दिरिया पर हमले के दौरान अब्दुल अजीज की अगुवाई वाली सेना ने हुसैन इब्न अली की कब्र को नष्ट कर दिया, हजारों शिया मुस्लिमों को मार डाला और शहर को लूट लिया। वहाबियों ने मुहर्रम के महीने से ठीक पहले दो से पाँच हजार से अधिक शियाओं का नरसंहार किया।
हालाँकि मौजूदा समय में कर्बला इराक में है, लेकिन शियाओं के इस पवित्र स्थल पर वहाबी-सऊदी हमले से वहाबियों की कट्टरपंथी मानसिकता को एक्सपोज कर दिया। वहाबी लोग शफ़ाअत (शफ़ाअत) जैसे कर्मकांडों को शिर्क (बहुदेववाद/मूर्तिपूजा) के संकेत मानते हैं। शफ़ाअत का मतलब है, मुस्लिम संत (सूफियों) के ज़रिए अल्लाह से प्रार्थना करना, कब्रों पर इमारतें (दरगाह) बनाना, तीर्थयात्रा (ज़ियाराह) और तवस्सुल (अल्लाह के नजदीक जाने के लिए की जाने वाली इबारत), जिसका वहाबी कड़ा विरोध करते हैं।
कर्बला को तबाह करने के महज 4 साल के भीतर ही साल 1806 तक वहाबियों ने मदीना शहर पर कब्ज़ा कर लिया और उन इमारतों को बड़े पैमाने पर नष्ट कर दिया, जिनसे उन्हें डर था कि वे मूर्तिपूजा को बढ़ावा देंगी। वहाबी ताकतों ने जन्नत-अल-बाकी कब्रिस्तान के अंदर और बाहर सभी गुंबदों और ढाँचों को नष्ट कर दिया। यह कोई साधारण कब्रिस्तान नहीं था, बल्कि मदीना के हिजाज़ में पहला इस्लामी कब्रिस्तान था। उन्होंने इस्लामी महत्व की अन्य इमारतों के अलावा फातिमा अल-ज़हरा की मस्जिद, अल-मनरतैन की मस्जिद और क़ुब्बत अल-थानाया को भी नष्ट कर दिया।
                                     अल बाक़ी कब्रिस्तान की एक ताज़ा तस्वीर (स्रोत: अल अरबिया)
साल 1816 में दिरिया के अमीर अब्दुल्लाह बिन मुहम्मद बिन सऊद के खिलाफ़ ओटोमन सेना का नेतृत्व करने वाले मिस्र के वली मुहम्मद अली पाशा के बेटे तुसुन पाशा की मौत हो जाने के बाद साल 1818 में सुल्तान महमूद द्वितीय के नेतृत्व में ओटोमन खिलाफत ने वहाबियों को कुचलने का फैसला किया। इसी क्रम में तुसुन पाशा के बेटे इब्राहिम पाशा ने दिरिया में सेना का नेतृत्व किया और वहाबियों को बुरी तरह से हराकर मक्का-मदीना पर फिर से कब्जा कर लिया। इसके साथ ही सऊद की पहली सल्तनत यानी राज खत्म हो गया। सऊद कबीले की हार और वहाबियों की हार के बाद ओटोमन साम्राज्य ने फिर से मस्जिदों को बनवाया। ओटोमन साम्राज्य ने पैगंबर मुहम्मद की बेटी फातिमा अल-ज़हरा, ज़ैनुल ‘अबिदीन (‘अली बिन अल-हुसैन), मुहम्मद इब्न ‘अली अल-बाकिर और जाफ़र अल-सादिक की कब्रों पर गुंबद का निर्माण भी कराया।
ओटोमन साम्राज्य द्वारा इन मस्जिदों, दरगाहों के फिर से निर्माण का सिलसिला लंबे समय तक नहीं चल पाया, क्योंकि प्रथम विश्व युद्ध में हार के बाद सऊद कबीला फिर से उभरा और उसने साल 1924 में फिर से मक्का और मदीना पर कब्ज़ा कर लिया। वहाबी-सऊद ने जन्नत उल बक़ी कब्रिस्तान पर फिर से हमला बोलकर कब्रों, मस्जिदों, गुंबदों और अन्य ढाँचों को तबाह कर दिया। 25 अप्रैल 1925 को राजा इब्न सऊद की अनुमति से वहाबी ताकतों ने मकबरों, गुंबदों और कब्रों को नष्ट कर दिया। यहाँ नष्ट की गई कब्रों में पैगंबर मुहम्मद की अम्मी अमीना, अब्बू अब्दुल्ला इब्न अब्दुल-मुत्तलिब और प्रमुख इमामों के अलावा परिवार के अन्य सदस्यों की कब्रें भी शामिल थीं।
                              जन्नत-उल-बकी कब्रिस्तान की एक पुरानी तस्वीर स्रोत: Cities from Salt
आज भी वहाबी मौलवी ऐसे कई ऐतिहासिक विरासत से जुड़ी जगहों को बर्बाद करने को उचित ठहराते हैं कि जो लोग मर गए, उनकी इबादत से अल्लाह की इबादत में खलल पड़ती है।

मक्का-मदीना के विकास और विस्तार की आड़ में कई प्राचीन संरचनाओं को किया गया तबाह

उल्लेखनीय है कि सऊदी अरब ने ग्रैंड मस्जिद में ज्यादा लोगों के आने के लिए 4 प्रमुख विस्तार परियोजनाएँ शुरू की। किंग अब्दुल अजीज ने साल 1955 में ऐसा पहला प्रोजेक्ट शुरू किया, जिसमें नए फ्लोर्स का निर्माण, नया बड़ा आँगन, बिजली की रोशनी और पंखे लगाए जाने थे। ऐसा दूसरा प्रोजेक्ट साल 1988 में किंग फहद ने शुरू किया, जिसमें ग्रैंड मस्जिद के पूर्वी और पश्चिम किनारों पर नए पंखे लगाने, मीनारों के निर्माण, एक्सेलेटर और एसी सिस्टम लगाने जैसी सुविधाएँ बनाई गई।
साल 2008 में किंग अब्दुल्ला इब्न अब्दुलअजीज के नेतृत्व वाली सऊदी सरकार ने ग्रैंड मस्जिद के विस्तार को मंजूरी दी, जिसमें इसके उत्तर और उत्तर-पश्चिम में 3,200,000 वर्ग फीट भूमि का अधिग्रहण शामिल था। 2011 में किंग अब्दुल्ला की सरकार ने घोषणा की कि 21 बिलियन डॉलर की लागत वाली “किंग अब्दुल्ला विस्तार परियोजना” के तहत मीनारों सहित कई नई संरचनाएँ खड़ी की जाएंगी और 2.5 मिलियन हज तीर्थयात्रियों की जगह के लिए परिक्रमा (मताफ़) क्षेत्र का विस्तार किया जाएगा। इसके बाद से मक्का-मदीना के कई ऐतिहासिक स्थलों को बर्बाद कर दिया गया।
मक्का-मदीना में जो चीजें नष्ट की गई, उसमें ऑटोमन साम्राज्य द्वारा बनवाया गया महत्वपूर्ण वास्तुशिल्प पोर्टिको भी शामिल है। इसे 17वीं शताब्दी में बनाया गया था, जो अपने शानदार मेहराबों और खंबों के लिए मशहूर थी। ऑटोमन पोर्टिको को तोड़े जाने की वजह से साल 2013 में तुर्की में काफी विरोध हुआ। यही नहीं, अब्बासियों को बनाए गए ग्रैंड मस्जिद के कुछ अहम हिस्सों को भी इस दौरान नष्ट कर दिया गया।
                                                 ऑटोमन पोर्टिको (स्रोत: सीएनएन)
रिपोर्ट्स के मुताबिक, साल 1985 से अब तक 98% ऐतिहासिक और इस्लामी विरासत स्थलों को ध्वस्त कर दिया गया है। आलोचकों का आरोप है कि सऊदी सरकार इतिहास को “मिटाना” चाहती है। ऐसी ही एक खास विरासत, जो पैगंबर मुहम्मद के चाचू हमजा का घर था, उसे होटल बनाने के लिए तोड़ दिया गया।
यही नहीं, वहाबियों और सऊद की जोड़ी ने पैगम्बर मुहम्मद की बीवी खदीजा का घर भी तोड़ दिया गया। खदीजा के घर की जगह पर एक दशक पहले 1400 सार्वजनिक शौचालय बना दिए गए। ब्रिटिश इतिहासकार जियाउद्दीन सरदार ने अपनी किताब मक्का: द सेक्रेड सिटी में भी इसकी पुष्टि की है।
सरदार ने लिखा, “यह परिसर अल-अयाद किले के ऊपर बना था, जिसे 1781 में बनाया गया था और अब यह मक्का को हमलावरों से बचाने का अपना काम नहीं कर सकता। ग्रैंड मस्जिद कॉम्प्लेक्स के दूसरे छोर पर, जैसा कि इसे अब कहा जाता है, पैगम्बर मुहम्मद की पहली पत्नी खदीजा का घर शौचालयों के एक ब्लॉक में बदल दिया गया है। रॉयल मक्का क्लॉक टॉवर पवित्र मस्जिद के ऊपर मँडराती एकमात्र इमारत नहीं है। यहाँ रैफल्स मक्का पैलेस है, जो एक लग्जरी होटल है, जहाँ चौबीसों घंटे बटलर सेवा उपलब्ध है। इसके अलावा मक्का हिल्टन भी है, जो पैगम्बर के सबसे करीबी साथी और पहले खलीफा अबू बकर के घर के ऊपर बना है। यहाँ इंटरकॉन्टिनेंटल मक्का जैसे कई ढाँचे हैं। इस ब्लॉक में कई अन्य पाँच सितारा होटल और ऊँचे-ऊँचे अपार्टमेंट ब्लॉक हैं।”
उन्होंने आगे लिखा है, “अगले दशक के दौरान पवित्र मस्जिद के नीचे की ओर 130 स्काईस्क्रैपर (बहुमंजिली इमारतें) बनाए जाएँगे, ताकी इसमें 5 मिलियन लोग यानी 50 लाख हज यात्री एक साथ आ सकें। इतिहास को तबाह करने के लिए सऊदी अरब ऑटोमन-जमाने के निर्माण को ध्वस्त कर रहा है, खासकर वो हिस्सा, जो सबसे पुराना है। 1553 से 1629 तक ओटोमन सुल्तानों – सुल्तान सुलेमान, सुल्तान सलीम I, सुल्तान मुराद III और सुल्तान मुराद IV और उनके उत्तराधिकारियों ने जो शानदार मस्जिद बनवाए, उन सबको तोड़ दिया जाएगा और एक मल्टीस्टोरी बिल्डिंग का निर्माण किया जाएगा।”
सरदार ने आगे लिखा है, “पैगंबर के साथियों के नाम जिन खंबों पर लगे हैं, उन्हें भी ध्वस्त कर दिया जाएगा। वास्तव में पुरानी मस्जिद को पूरी तरह से बुलडोजर से ध्वस्त कर दिया जाएगा। इतिहास इस्लाम के दूसरे खलीफा उमर इब्न जुबैर से शुरू होता है, जिन्होंने काबा के पुनर्निर्माण के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया था, और अब्बासी खलीफाओं तक, जिन्होंने मौजूदा मस्जिद बनाई थी। वो सबकुछ तोड़ दिया जाएगा। उसकी जगह पर 12 फ्लोर की नई बिल्डिंग बनाई जाएगी, ताकी हज पर आने वाले लोग ‘शैतानों को पत्थर मार’ सकें। ऐसा लगता है कि कुछ ही समय में पैगंबर मोहम्मद के घर को भी ढहा दिया जाएगा, जो भव्य रॉयल पैलेस के सामने है। उसे जमींदोज कर कार पार्किंग की जगह पर बदल दिया जाएगा।”
जियाउद्दीन सरदार की पुस्तक मक्का: द सेक्रेड जियाउद्दीन सरदार की पुस्तक मक्का: द सेक्रेड सिटी का पेजसिटी का पेज
इसी कड़ी में 13 अगस्त 2002 को मदीना में मस्जिद-ए-नबवी से चार किलोमीटर दूर स्थित पैगंबर मुहम्मद के वारिसों में नौंवें नंबर पर आने वाले सैयद इमाम अल-उरैदी इब्न जाफर अल-सादिक की 1,200 साल पुरानी मस्जिद और मकबरे को धमाके से उड़ा दिया गया और पूरी तरह से तबाह कर दिया गया।
यही नहीं, साल 2003 में एक ऐतिहासिक ओटोमन अज्याद किला जो कभी मक्का को हमलों से बचाता था और 200 साल से भी ज़्यादा पुराना था, उसे ध्वस्त कर दिया गया। इसकी जगह पर 601 मीटर ऊँचा मक्का रॉयल होटल क्लॉक टॉवर बना दिया गया। यह क्लॉक टॉवर ‘बिन लादेन ग्रुप’ ने बनाया है, जिसमें पाँच मंज़िला शॉपिंग मॉल, लग्जरी होटल, पार्किंग आदि शामिल हैं।
                                                              अज्याद किला (स्रोत: विकिपीडिया)
तुर्की ने अज्याद के किले को बचाने के लिए यूनेस्को से हस्तक्षेप की माँग की थी, लेकिन यूनेस्को ने इस मामले में कुछ भी नहीं किया। यही नहीं, मक्का-मदीना में सड़कों को बनाने के लिए कई पहाड़ों को भी काट दिया गया। साल 2013 में मदीना के उत्तर में उहुद पहाड़ी में दरार को कंक्रीट से भर दिया गया था। रिपोर्ट्स कहती हैं कि 625 ई. में कुरैश के खिलाफ उहुद की लड़ाई में घायल होने के बाद पैगंबर मुहम्मद को वहाँ ले जाया गया था। इतना ही नहीं, आज हिल्टन होटल जिस जगह पर है, उस जगह पर इस्लाम के पहले खलीफा अबू बकर का घर हुआ करता था, उस जगह को भी समतल किया जा चुका है।
                                             मदीना में हिल्टन होटल (स्रोत: हिल्टन की वेबसाइट)
इस्लामिक हेरिटेज रिसर्च फाउंडेशन के संस्थापक, इतिहासकार और पूर्व कार्यकारी निदेशक डॉ. इरफान अल-अलावी ने एक अनुमान के तौर पर बताया है कि विकास कार्यों की आड़ में सऊदी सरकार ने पिछले कुछ सालों में 300 से ज्यादा इस्लामिक ऐतिहासिक विरासत के ढाँचों को नष्ट कर दिया है।
टाइम मैगज़ीन की 2014 की रिपोर्ट में बताया गया, “मदीना में छह छोटी मस्जिदें, जहाँ माना जाता है कि मुहम्मद ने नमाज़ पढ़ी थी, बंद कर दी गई हैं। इस्लाम के पहले खलीफ़ा अबू बकर की सातवीं मस्जिद को एटीएम बनाने के लिए ढहा दिया गया है।” यही नहीं, पैगंबर मुहम्मद की बेटी और उनके चार “सबसे खास साथियों” बनाए गए मशहूर “सात मस्जिदों” में से पाँच को ध्वस्त कर दिया गया है। इसमें मस्जिद अबू बक्र, मस्जिद सलमान अल-फारसी, मस्जिद उमर इब्न अल-खत्ताब, मस्जिद सय्यदा फातिमा बिन्त रसूलिल्लाह, और मस्जिद अली इब्न अबी तालिब शामिल हैं, जो अब मौजूद नहीं है।
दिलचस्प बात यह है कि 75 साल से भी ज़्यादा पहले काबा के पास पैगंबर मुहम्मद की जन्मस्थली को ‘जानवरों के बाजार’ में बदल दिया गया। मौजूदा समय में सुक अल-लैल स्ट्रीट पर स्थित उनके जन्मस्थान को सऊदी सरकार ‘मक्का अल मुकर्रमाह लाइब्रेरी’ नाम की लाइब्रेरी में बदल चुकी है।

सऊदी सरकार द्वारा विरासत स्थलों को ध्वस्त किये जाने पर यूनेस्को की चुप्पी

सऊदी अरब में छह यूनेस्को विरासत स्थल हैं: मक्का और मदीना का एंट्री गेट, दिरियाह में अत-तुरैफ़ जिला, हेल क्षेत्र की रॉक आर्ट, अल-हिज्र पुरातत्व स्थल (मदैन सालेह), अल अहसा ओएसिस और हिमा सांस्कृतिक क्षेत्र। बता दें कि संयुक्त राष्ट्र यूनेस्को के माध्यम से दुनिया भर के शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक विरासत स्थलों के संरक्षण की वकालत करता रहा है, लेकिन सऊदी अरब में वो पूरी तरह से विफल रहा है।

अफ़गानिस्तान में बामियान बुद्ध प्रतिमाओं का विनाश तथा तालिबान और वहाबी मानसिकता में समानताएं

बता दें कि मार्च 2001 में अफ़गानिस्तान की तालिबान सरकार ने बामियान बुद्ध की दो विशाल मूर्तियों को ध्वस्त कर दिया, जो छठी शताब्दी में बामियान घाटी में बनाई गई थी। तालिबान नेता मुल्ला मोहम्मद उमर ने बामियान बुद्ध को ईशनिंदा और इस्लामी सिद्धांतों के खिलाफ घोषित करते हुए उन्हें उड़ाने का हुक्म दिया था। इसकी वजह ये है कि सुन्नी मुस्लिम देवबंदी (हन्फी) समुदाय और तालिबान मूर्तियों को हराम मानता है। इन्हें पूरी दुनिया के विरोध के बावजूद बम लगाकर उड़ा दिया गया।
तालिबान का ऐसा (बामियान को नष्ट करना) करना वहाबी (सलाफी) चरमपंथी विचारधारा से जोड़ता है, जो इस्लाम की शुद्धतावादी स्वरूप को मानता है।
ठीक इसी तरह से, सऊदी अरब भी ऐतिहासिक रूप से इस्लामी विरासत स्थलों को संरक्षित करने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं रखता है। उसका मानना ​​है कि ऐसी जगहें मूर्ति पूजा या शिर्क को बढ़ावा दे सकते हैं। हालाँकि भारतीय सूफियों ने इस साल मई में सऊदी अरब सरकार से मदीना में नष्ट हो चुके जन्नत अल-बकी कब्रिस्तान को फिर से बनाने की अपील की थी, जिसके लिए अजमेर के मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में एक बैठक का भी आयोजन किया गया था। इसमें कोई चौंकने वाली बात नहीं कि सऊदी अरब को इनकी अपील से कोई फर्क नहीं पड़ा, जोकि पड़ना भी नहीं था।

सऊदी अरब : महिलाएँ आजाद, जो चाहें सो पहने, क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का आदेश

सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान अल सऊद (MBS) का एक बयान वायरल हो रहा है। इसमें कथित तौर पर दावा किया गया है कि मुहम्मद बिन सलमान ने महिलाओं के कपड़ों चुनने की आजादी का समर्थन किया है। उनका बयान ”केवल महिलाएँ ही तय कर सकती हैं कि उन्हें क्या कपड़े पहनना है।” के तौर पर प्रचारित हो रहा है।

कई सोशल मीडिया यूजर्स ने क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और मिस यूनिवर्स में भाग ले रही सऊदी अरब की पहली महिला रूमी अलकाहतानी की तस्वीरों के साथ यह बयान पोस्ट किया है। इन पोस्ट में लिखा गया है “MBS ने घोषणा की है कि अब से, सऊदी अरब में महिलाएँ पुरुषों की इजाजत के बिना अपनी पसंद के कपड़े पहन सकती हैं।”

ऐसा ही पोस्ट करने वाले ‘डॉ मालौफ’ नाम के एक यूजर की पोस्ट पर लोगों ने ‘कम्युनिटी नोट्स’ का इस्तेमाल किया। इसमें इस पोस्ट का खंडन करते हुए बताया गया कि असल में मोहम्मद बिन सलमान क्या कह रहे थे। नोट के अनुसार, मोहम्मद बिन सलमान ने ऐसी कोई बात नहीं की है। मोहम्मद बिन सलमान ने केवल इतना कहा कि इस्लामी कानून काले अबाया या काले हिजाब को जरूरी नहीं मानते। लेकिन उन्होंने यह नहीं कहा कि महिलाएँ जो चाहें पहन सकती हैं।

नोट में कहा गया, “इसकी शुरुआत इस तरह से होती है कि शरिया के कानून बहुत साफ हैं और इसमें लिखा है कि महिलाएँ पुरुषों की तरह सभ्य, सम्मानजनक कपड़े पहनें। हालाँकि, इसमें अलग से काले अबाया या काले सिर स्कार्फ का उल्लेख नहीं है।”

एक अन्य सोशल मीडिया यूजर की पोस्ट पर भी ‘कम्युनिटी नोट्स’ लगे गए, इसने भी यही दावा किया था। इसमें लिखा गया, “क्राउन प्रिंस ने 2018 में यह बात कही थी, उनका कहना है कि महिलाओं को इस्लाम में बताए गए कपड़ों की बड़ी रेंज में से कुछ भी पहनने का अधिकार है। इसमें पोस्ट में दिखाने जाने वाले दूसरे या मॉडर्न कपड़ों का कोई लेनादेना नहीं है।”

असल में जो बात 2024 में वायरल हो रही है वह उन्होंने अमेरिकी नेटवर्क CBS न्यूज़ के साथ उनके 2018 में कही थी। उनके बयान को अब गलत तरीके से समझा जा रहा है, क्योंकि जब उन्होंने महिलाओं के खुद के कपड़े चुनने के बारे में बात की, तो उन्होंने पुरुषों की अनुमति के बिना कुछ भी पहनने की बात को लेकर कुछ नहीं कहा।

मुहम्मद बिन सलमान का असल बयान था, “शरिया के कानूनों में कानून बहुत साफ कि महिलाएँ पुरुषों की तरह सभ्य, सम्मानजनक कपड़े पहनें। हालाँकि, इसमें अलग से काले अबाया या काले सिर को ढंकने के बारे में नहीं लागू होता। यह पूरी तरह से महिलाओं की इच्छा है कि वह किस प्रकार का सभ्य और सम्मानजनक कपड़े पहनना पसंद करती हैं।”

यह बयान पत्रकार नोरा ओ’डॉनेल द्वारा के सवाल के जवाब में था। उन्होंने पूछा था, “आपने कहा है कि आप ‘सऊदी अरब को वापस उसी जगह ले जा रहे हैं, जो हम पहले था। यानी एक उदारवादी इस्लामी देश, इसका क्या मतलब है।”

मुहम्मद बिन सलमान ने इस पर कहा था, “हमारे यहाँ कट्टरपंथी हैं जो महिलाओं और पुरुषों के बीच घुलने-मिलने पर रोक लगाते हैं और एक पुरुष और एक महिला के बीच अकेले और ऑफिस में उनके साथ होने के बीच अंतर नहीं कर पा रहे। इनमें से कई के विचार पैगंबर और खलीफाओं के समय के जीवन के खिलाफ हैं।”

सऊदी अरब में ही इस्लाम के दो सबसे पवित्र शहर, मक्का और मदीना हैं। सख्त सामाजिक और धार्मिक नियंत्रण लंबे समय से सऊदी अरब के समाज का हिस्सा रहा है जो अरब प्रायद्वीप का सबसे बड़ा देश है। सऊदी अरब ने हाल ही में महिलाओं को कार चलाने की अनुमति दी है सिनेमाघर खोल रहा है म्यूजिक शो आयोजित कर रहा है।

अमेरिका, नाटो और EU के रूस को अलग थलग करने की साजिश का हिस्सा नहीं बने मोदी; रूस के एक सच्चे मित्र का कर्तव्य निभाया भारत ने

 सुभाष चन्द्र

स्विट्ज़रलैंड द्वारा अपने शहर बर्गेन्स्टाक में यूक्रेन में शांति स्थापना के लिए आयोजित शिखर सम्मेलन में NATO और EU समेत 80 देशों ने भाग लिया। लेकिन जो प्रताव यूक्रेन में शांति स्थापना के लिया लाया गया, उस पर भारत ने हस्ताक्षर करने से साफ़ मना कर दिया। इस सम्मेलन में रूस को निमंत्रण नहीं दिया गया और चीन ने इससे दूरी बनाई थी। 

दो दिनों की चर्चा के बाद शांति स्थापना के प्रस्ताव के अंतिम दस्तावेज़ में जो कुछ भी कहा गया उसमें क्षेत्रीय अखंडता के साथ ही (यूक्रेन की अखंडता) परमाणु सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और बन्दियों की अदलाबदली वाले बिंदु भी थे। ऐसा भी कहा गया है कि रूस को अपनी सेनाएं वापस ले जाने को कहा गया शिखर सम्मेलन में। अमेरिका और EU ने ऐसा जाल बिछाया था जिससे रूस पर स्वतः ही ऐसे प्रतिबंध लग जाएं जिससे उसका जीना ही कठिन हो जाए। ये 80 देश रूस से सभी संबंध विच्छेद करके उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग थलग करना चाहते थे।

लेखक 
चर्चित YouTuber 
लेकिन सही समय पर भारत ने शांति स्थापना के दस्तावेज में कुछ बिंदुओं को अस्पष्ट और गैर जरूरी कहते हुए पर हस्ताक्षर करने से मना करके रूस के प्रति अपनी सच्ची मित्रता निभाने का काम किया। भारत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “हम शांति स्थापना के विरुद्ध नहीं हैं और न ही युद्ध को आगे चलता देखना चाहते हैं लेकिन यह प्रस्ताव एक पक्षीय लगता है क्योंकि रूस को इस सम्मेलन में अपनी बात रखने के लिए अवसर ही नहीं दिया गया। भारत के साथ ही सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया, मैक्सिको, यूएई सहित 12 देशों ने भी हस्ताक्षर करने से मना कर दिया - पर्यवेक्षक के रूम में भाग लेने वाले ब्राजील ने भी हस्ताक्षर नहीं किए। 

भारत ने कहा - “भारत चाहता है कि किसी भी नतीजे पर पहुंचने से पहले रूस और यूक्रेन का एक साथ एक मंच पर होना जरूरी है ताकि दुनिया दोनों देशों की बात सुनकर अपनी राय या सहमति बनाए। रिपोर्ट की मानें तो रूस को इस समिट में नहीं बुलाया गया। यूक्रेन में शांति के लिए रखी गई शर्त पर भारत सहमत नहीं है”।

चार दिन पहले ही इटली में प्रधानमंत्री मोदी से यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की  भेंट करके बहुत प्रसन्न थे और उसे आशा रही होगी कि भारत स्विट्ज़रलैंड में उसका साथ देगा लेकिन हुआ इसके विपरीत। सभी देशों को मोदी सरकार ने खुला संदेश दे दिया कि रूस को एकतरफा फैसला करके उसे बर्बाद नहीं किया जा सकता।

भारत विश्व के देशों को यह सख्त संदेश देने में इसलिए भी सक्षम है क्योंकि भारत एक बहुत बड़ा वैश्विक बाजार है और किसी भी देश के लिए भारत की अनदेखी करना संभव नहीं है और यही सफल विदेश नीति है और कूटनीति भी।

गर्मी के प्रकोप में काबा भी लपेटे में; मक्का की ग्रैंड मस्जिद में 51.8 डिग्री तापमान; 577 से अधिक की मौत, कई लापता ; मुर्दा घरो में जगह नहीं

दुनिया के सबसे बड़े मजहबी यात्रा यानी हज यात्रा पर सऊदी अरब पहुँचे 577 जायरीनों की अब तक मौत हो चुकी है। इस साल मरने वालों की संख्या सबसे बड़ी है। सबसे ज्यादा मौतें मिस्र से पहुँचे जायरीनों की हुई, जिनकी संख्या 323 तक पहुँच गई है। यही नहीं, अब तक कई जायरीनों के लापता होने की भी खबरें आ रही हैं, जिन्हें ढूँढने के लिए विदेशी सरकारें सऊदी प्रशासन के साथ मिलकर काम कर रही हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हज के लिए मक्का पहुँचे 550 से अधिक तीर्थयात्रियों की मौत की खबर सामने आ रही है। मरने वालों में कम से कम 323 मिस्र के थे। इनमें से अधिकांश की मौत गर्मी से होने वाली बीमारियों के कारण हुई है। सऊदी अरब के दो राजनयिकों ने न्यूज एजेंसी एएफपी को इसकी जानकारी दी है। इनमें से एक ने कहा कि मिस्र के जितने भी तीर्थयात्रियों की मौत हुई है, उनमें से अधिकांश ने भीषण गर्मी के कारण दम तोड़ा। हालाँकि, एक की मौत भगदड़ के दौरान घायल होने के कारण हुई है। राजनयिकों ने कहा कि मरने वालों में कम से कम 60 जॉर्डन के नागरिक भी शामिल हैं। इसके साथ ही मरने वालों की कुल संख्या 577 हो गई है। बता दें, पिछले साल मक्का में 240 लोगों की मौत हुई थी।

सऊदी रायनयिक ने बताया कि मिस्र के अलावा अन्य देशों के मरने वाले लोगों की मौत का कारण गर्मी है, जबकि कुछ अन्य लोग भगदड़ के कारण मरे हैं। उन्होंने बताया कि मक्का के सबसे बड़े शवगृह में से एक अल-मुआइसिम शवगृह पूरी तरह भर गया है। यहाँ 550 शव रखे हैं। मिस्र के विदेश मंत्रालय ने कहा कि हज के दौरान कुछ मिस्रवासी लापता हो गए हैं, जिनकी खोज के लिए काहिरा सऊदी अधिकारियों के साथ सहयोग कर रहा है।

सऊदी अरब में इस साल पहुँचे 1.8 मिलियन लोग, हर तरफ बदइंतजामी

इस साल, हज यात्रा पर 1.8 मिलियन लोग यानी 18 लाख लोग पहुँचे हैं। इसमें से 16 लाख लोग विदेशी हैं। इस बीच, सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, जो सऊदी अरब का बताया जा रहा है। इस वीडियो को शेयर किया है पत्रकार मोहम्मद ताहा ने। इस वीडियो को बनाने वाला व्यक्ति सड़क पर पड़े हुए शवों को दिखाता है और दावा करता है कि घंटों तक कोई एंबुलेंस नहीं आई। इस वीडियो में कई शव सड़कों के किनारे डिवाइडर और फुटपाथ पर रखे देखे जा सकते हैं। यही नहीं, व्यक्ति वीडियो बनाते समय कई शवों को पास से भी दिखाता है और बताता है कि बस, ट्रेन, टैक्सी जैसी कोई भी सुविधा नहीं है और लोग मर रहे हैं, लेकिन सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा।
मोहम्मद ताहा ने वीडियो को पोस्ट करते हुए एक्स पर लिखा, “इस वीडियो में कई हज यात्रियों के कई शव देखे जा सकते हैं। क्या सऊदी शासन को जवाब देह ठहराया जाएगा? वे इस इस्लामी पर्यटन को बढ़ावा देते हैं और इससे अरबों कमाते हैं। लेकिन अभी तक, मैंने इस पर मीडिया में ज़्यादा कवरेज नहीं देखी है!”
मिस्र की 61 वर्षीय तीर्थयात्री अजा हामिद ब्राहिम ने समचार एजेंसी एएफपी को बताया कि उन्होंने सड़क के किनारे पड़ी हुई लाशें देखीं। ऐसा लग रहा था कि जैसे कयामत का दिन आ गया है। बड़ी संख्या में मौतों और उसके बाद शवों को लेकर हो रही बदइंतजामी को लेकर सोशल मीडिया पर लोग सऊदी अरब की आलोचना कर रहे हैं।

काबा में 51 डिग्री सेल्सियस तापमान 

सऊदी मौसम सेवा के अनुसार, सोमवार (17 जून 2024) को मक्का की ग्रैंड मस्जिद में तापमान 51.8 डिग्री सेल्सियस पहुँच गया। इस जगह पर तीर्थयात्री काबा की परिक्रमा करते हैं। ग्रैंड मस्जिद के पास स्थित मीना में तापमान 46 डिग्री सेल्सियस था। इस जगह पर हज यात्रियों ने तीन कंक्रीट की दीवारों पर शैतान को पत्थर मारने की रस्म अदा की। यहाँ गर्मी और भीड़ ने स्थिति को विकट बना दिया था।