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लोकमाता अहिल्याबाई के सम्मान में मोदी ने 300 रुपए का सिक्का किया जारी, नारी शक्ति का जमकर बखान: ऑपरेशन सिंदूर पर बोले- बहादुर महिला सिपाहियों ने की देश की रक्षा

                              भोपाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फोटो साभार: X_NarendraModi)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने लोकमाता देवी अहिल्याबाई महिला सशक्तिकरण महासम्मेलन में हिस्सा लिया, जो जंबूरी मैदान में आयोजित हुआ। जंबूरी मैदान में जनसभा को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने लोकमाता देवी अहिल्याबाई होलकर को याद किया।

मोदी ने कहा, “लोकमाता अहिल्याबाई का नाम सुनते ही मन में श्रद्धा का भाव उमड़ पड़ता है। उनके महान व्यक्तित्व के बारे में बोलने के लिए शब्द कम पड़ जाते हैं। 250-300 साल पहले, जब देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा था, तब उन्होंने न सिर्फ अपने राज्य को समृद्ध किया, बल्कि देश की संस्कृति और परंपराओं को भी बचाया।”

पीएम ने बताया कि अहिल्याबाई ने काशी विश्वनाथ मंदिर सहित देश के कई मंदिरों और तीर्थ स्थलों का पुनर्निर्माण करवाया। उन्होंने कहा, “यह मेरा सौभाग्य है कि जिस काशी में लोकमाता ने इतने विकास कार्य किए, वहाँ मुझे भी सेवा का मौका मिला। आज अगर आप काशी विश्वनाथ मंदिर जाएँगे, तो वहाँ आपको अहिल्याबाई की मूर्ति भी दिखेगी।”

प्रधानमंत्री ने इस मौके पर लोकमाता अहिल्याबाई को समर्पित एक स्मारक डाक टिकट और 300 रुपये का विशेष सिक्का भी जारी किया। इस सिक्के पर अहिल्याबाई होलकर का चित्र अंकित है। साथ ही उन्होंने आदिवासी, लोक और पारंपरिक कलाओं में योगदान देने वाली महिला कलाकारों को राष्ट्रीय देवी अहिल्याबाई पुरस्कार से सम्मानित किया।

ऑपरेशन सिंदूर को बताया भारत की बहादुरी का प्रतीक

 मोदी ने अपने भाषण में ऑपरेशन सिंदूर की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा, “पहलगाम में आतंकियों ने न सिर्फ भारतीयों का खून बहाया, बल्कि हमारी संस्कृति और समाज को बाँटने की कोशिश की। लेकिन ऑपरेशन सिंदूर भारत के इतिहास का सबसे बड़ा और सफल ऑपरेशन है। हमारी सेना ने उन आतंकी ठिकानों को मिट्टी में मिला दिया, जहाँ पाकिस्तानी फौज ने सोचा भी नहीं था।”
उन्होंने जोर देकर कहा, “अब भारत का हर नागरिक कह रहा है कि अगर तुम गोली चलाओगे, तो गोली का जवाब गोले से दिया जाएगा।” पीएम ने सिंदूर को नारी शक्ति और भारत की बहादुरी का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा, “हमारी संस्कृति में सिंदूर का विशेष महत्व है। हनुमान जी इसे लगाते हैं, शक्ति पूजा में इसका इस्तेमाल होता है। आज ऑपरेशन सिंदूर के जरिए यह भारत की ताकत का प्रतीक बन गया है।”
मोदी ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान महिला शक्ति की अप्रतिम बहादुरी का भी बखान किया। उन्होंने बताया कि पाकिस्तानी फौज की भारी गोलाबारी के बीच भी बीएसएफ की बहादुर महिला सिपाहियों ने देश की रक्षा की।
पीएम मोदी ने कहा, “स्कूल से लेकर युद्ध के मैदान तक…. आज देश अपनी बेटियों के शौर्य पर अभूतपूर्व भरोसा कर रहा है। नक्सलियों के खिलाफ ऑपरेशन हों या फिर सीमापार का आतंक हो… आज हमारी बेटियाँ भारत की सुरक्षा की ढाल बन रही हैं।”

महिला सशक्तिकरण पर सरकार का जोर 

मोदी ने अपने भाषण में महिला सशक्तिकरण पर खास जोर दिया। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार ने तीन करोड़ बहनों को लखपति दीदी बनाने का संकल्प लिया है, जिसमें से डेढ़ करोड़ से ज्यादा बहनें इस लक्ष्य को हासिल कर चुकी हैं। उन्होंने बताया कि गाँवों में बैंक सखियां और बीमा सखियाँ लोगों को बैंकिंग और बीमा की सुविधाओं से जोड़ रही हैं।

उन्होंने कहा, “आज हमारी बहनें और बेटियाँ हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। पहले नई टेक्नोलॉजी से महिलाओं को दूर रखा जाता था, लेकिन अब स्थिति बदल गई है। हमारी सरकार महिलाओं को टेक्नोलॉजी में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। आज महिलाएँ वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर और पायलट बन रही हैं।”

पीएम ने ‘नमो ड्रोन दीदी’ अभियान का जिक्र करते हुए कहा कि इससे गाँव की महिलाओं को नई पहचान और कमाई का जरिया मिल रहा है। उन्होंने चंद्रयान-3 मिशन का उदाहरण देते हुए बताया कि इसमें 100 से ज्यादा महिला वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने अहम भूमिका निभाई।

लोकमाता अहिल्याबाई के मूल्यों पर चल रही सरकार

पीएम ने कहा कि उनकी सरकार लोकमाता अहिल्याबाई के मूल्यों पर चल रही है। उन्होंने बताया कि अहिल्याबाई ने गवर्नेंस का ऐसा मॉडल अपनाया, जिसमें गरीबों और वंचितों को प्राथमिकता दी गई। उन्होंने खेती को बढ़ावा देने के लिए नहरों का जाल बिछाया और कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित किया। पीएम ने कहा, “आज हमारी सरकार भी ‘नागरिक देवो भवः’ के मंत्र के साथ काम कर रही है। हमारी हर योजना में महिलाएँ केंद्र में हैं।”

उन्होंने बताया कि उनकी सरकार ने लाखों महिलाओं को पहली बार अपने घर का मालिक बनाया है। साथ ही, स्टार्टअप और स्पेस मिशनों में भी महिलाएं अहम योगदान दे रही हैं।

मुख्यमंत्री मोहन यादव का बयान

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा, “प्रधानमंत्री का यह दौरा लोकमाता अहिल्याबाई को समर्पित है। हम उनके दिखाए रास्ते पर चलकर महिला सशक्तिकरण के संकल्प को पूरा कर रहे हैं। पीएम मोदी जिस तरह से काम कर रहे हैं, वह अहिल्याबाई के आदर्शों को जीवंत कर रहा है।”

महिलाओं ने संभाली आयोजन की कमान 

इस आयोजन की एक और खास बात थी कि इसकी पूरी जिम्मेदारी महिलाओं ने संभाली। दतिया से भोपाल तक पीएम के विमान को महिला पायलट ने उड़ाया। इंदौर में मेट्रो की पहली ट्रिप में सिर्फ महिलाएँ सवार थीं। भोपाल में सुरक्षा, मंच संचालन और अन्य सभी काम महिलाओं ने बखूबी निभाए।

इस कार्यक्रम में हजारों की संख्या में महिलाएँ, बहनें और बेटियाँ शामिल हुईं, जिन्होंने पीएम मोदी का जोरदार स्वागत किया। भोपाल की सड़कों पर पीएम का भव्य रोड शो हुआ, जिसमें सिंदूरी रंग की साड़ियों में सजी महिलाओं ने उनका अभिवादन किया। इस दौरान पूरे शहर में तिरंगे लहराए और ऑपरेशन सिंदूर से जुड़े पोस्टर लगे दिखे।

प्रधानमंत्री के भोपाल पहुँचते ही एक शानदार रोड शो शुरू हुआ। उनके साथ मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव भी मौजूद थे। सड़कों के दोनों ओर खड़ी भीड़ ने तालियों और नारों के साथ पीएम का स्वागत किया। खास बात यह थी कि इस रोड शो में 15,000 से ज्यादा महिलाओं ने सिंदूर रंग की साड़ियाँ पहनकर पीएम का स्वागत किया। यह स्वागत ऑपरेशन सिंदूर के प्रति आभार जताने का एक अनोखा तरीका था। पूरे शहर में ऑपरेशन सिंदूर से जुड़े पोस्टर लगाए गए थे, जो भारत की बहादुरी और महिला शक्ति का प्रतीक बने।

रोड शो का समापन जंबूरी मैदान में हुआ, जहाँ पीएम ने विशाल जनसभा को संबोधित किया। इस आयोजन की सबसे खास बात यह थी कि इसकी पूरी जिम्मेदारी महिलाओं ने सँभाली। सुरक्षा से लेकर मंच संचालन, साइट मैनेजमेंट और हेलीपैड तक हर काम महिला अधिकारियों और कर्मचारियों ने बखूबी निभाया। यह नजारा महिला सशक्तिकरण का एक जीता-जागता उदाहरण था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भोपाल दौरा न सिर्फ एक राजनैतिक आयोजन था, बल्कि यह महिला सशक्तिकरण और भारत की ताकत का एक मजबूत संदेश भी था। ऑपरेशन सिंदूर की सफलता और लोकमाता अहिल्याबाई के योगदान को याद करते हुए पीएम ने देश की महिलाओं को प्रेरित किया। भोपाल की सड़कों पर लहराते तिरंगे और सिंदूरी रंग में सजी महिलाओं ने इस आयोजन को ऐतिहासिक बना दिया। यह दौरा नारी शक्ति और भारत की एकता का प्रतीक बनकर उभरा।

मध्य प्रदेश : जेलों में बंद महिला कैदियों की सुविधाओं में वृद्धि : हर महीने मिलेगा हेयर रिमूवर क्रीम, सप्ताह में एक बार शैंपू, खाने के साथ सलाद


मध्य प्रदेश की विभिन्न जेलों में बंद महिला कैदियों को नए साल से मिलने वाली सुविधाओं में बढ़ोतरी होने जा रही है। 1 जनवरी 2025 से उन्हें हर माह हेयर रिमूवल क्रीम और सप्ताह में एक बार शैम्पू दिया जाएगा। इस बदलाव के पीछे की मंशा साफ़-सफाई को बढ़ावा देने की है। इसके अलावा सभी कैदियों को खाने में सलाद भी मिलेगा। उनके चाय, दूध, तेल और दाल की मात्रा भी बढ़ाई जाएगी।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, मध्य प्रदेश के जेल मैन्युअल में कई बदलाव किए गए हैं। ये परिवर्तन एमपी करेक्शनल सर्विसेज एंड प्रिज़न्स एक्ट 2024 के तहत हुए हैं। नियमों में यह बदलाव 2024 की गाँधी जयंती यानी 2 अक्टूबर को होना था। तब कुछ जरूरी चीजें छूट गई थीं। साफ़-सफाई और सेहत के अलावा कोशिश इस बात की भी जारी है कि जेलों में कैदियों की भीड़ को कम किया जाए।

36,000 कैदियों की कुल क्षमता वाले मध्य प्रदेश की जेलों में फिलहाल 43,000 कैदी बंद हैं। इनमें महिलाओं की संख्या लगभग 1,900 है। नए नियमों के अनुसार जेलों में सुरक्षा आदि के लिए तकनीकी सिस्टम को और बेहतर और प्रशासनिक कामों को डिजिटल बनाया जाएगा। जेलों में तैनात कर्मचारियों और अधिकारियों को कैदियों से अच्छे व्यवहार की भी ट्रेनिंग दी जाएगी।

सभी सेन्ट्रल व जिला जेलों के साथ ‘करेक्शनल इंस्टीट्यूशन’ शब्द भी जोड़ा जाएगा, जिसे हिंदी में ‘सुधार स्थल’ कहा जाता है। जेलरों को समय-समय पर जेल की तलाशी और छापेमारी के निर्देश दिए गए हैं। हाईरिस्क वाले कैदियों के पास एडवांस जैमर लगेंगे। वहीं, कैदियों की इलाज के लिए अस्पतालों की संख्या में बढ़ोतरी की जाएगी।

सऊदी अरब : महिलाएँ आजाद, जो चाहें सो पहने, क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का आदेश

सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान अल सऊद (MBS) का एक बयान वायरल हो रहा है। इसमें कथित तौर पर दावा किया गया है कि मुहम्मद बिन सलमान ने महिलाओं के कपड़ों चुनने की आजादी का समर्थन किया है। उनका बयान ”केवल महिलाएँ ही तय कर सकती हैं कि उन्हें क्या कपड़े पहनना है।” के तौर पर प्रचारित हो रहा है।

कई सोशल मीडिया यूजर्स ने क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और मिस यूनिवर्स में भाग ले रही सऊदी अरब की पहली महिला रूमी अलकाहतानी की तस्वीरों के साथ यह बयान पोस्ट किया है। इन पोस्ट में लिखा गया है “MBS ने घोषणा की है कि अब से, सऊदी अरब में महिलाएँ पुरुषों की इजाजत के बिना अपनी पसंद के कपड़े पहन सकती हैं।”

ऐसा ही पोस्ट करने वाले ‘डॉ मालौफ’ नाम के एक यूजर की पोस्ट पर लोगों ने ‘कम्युनिटी नोट्स’ का इस्तेमाल किया। इसमें इस पोस्ट का खंडन करते हुए बताया गया कि असल में मोहम्मद बिन सलमान क्या कह रहे थे। नोट के अनुसार, मोहम्मद बिन सलमान ने ऐसी कोई बात नहीं की है। मोहम्मद बिन सलमान ने केवल इतना कहा कि इस्लामी कानून काले अबाया या काले हिजाब को जरूरी नहीं मानते। लेकिन उन्होंने यह नहीं कहा कि महिलाएँ जो चाहें पहन सकती हैं।

नोट में कहा गया, “इसकी शुरुआत इस तरह से होती है कि शरिया के कानून बहुत साफ हैं और इसमें लिखा है कि महिलाएँ पुरुषों की तरह सभ्य, सम्मानजनक कपड़े पहनें। हालाँकि, इसमें अलग से काले अबाया या काले सिर स्कार्फ का उल्लेख नहीं है।”

एक अन्य सोशल मीडिया यूजर की पोस्ट पर भी ‘कम्युनिटी नोट्स’ लगे गए, इसने भी यही दावा किया था। इसमें लिखा गया, “क्राउन प्रिंस ने 2018 में यह बात कही थी, उनका कहना है कि महिलाओं को इस्लाम में बताए गए कपड़ों की बड़ी रेंज में से कुछ भी पहनने का अधिकार है। इसमें पोस्ट में दिखाने जाने वाले दूसरे या मॉडर्न कपड़ों का कोई लेनादेना नहीं है।”

असल में जो बात 2024 में वायरल हो रही है वह उन्होंने अमेरिकी नेटवर्क CBS न्यूज़ के साथ उनके 2018 में कही थी। उनके बयान को अब गलत तरीके से समझा जा रहा है, क्योंकि जब उन्होंने महिलाओं के खुद के कपड़े चुनने के बारे में बात की, तो उन्होंने पुरुषों की अनुमति के बिना कुछ भी पहनने की बात को लेकर कुछ नहीं कहा।

मुहम्मद बिन सलमान का असल बयान था, “शरिया के कानूनों में कानून बहुत साफ कि महिलाएँ पुरुषों की तरह सभ्य, सम्मानजनक कपड़े पहनें। हालाँकि, इसमें अलग से काले अबाया या काले सिर को ढंकने के बारे में नहीं लागू होता। यह पूरी तरह से महिलाओं की इच्छा है कि वह किस प्रकार का सभ्य और सम्मानजनक कपड़े पहनना पसंद करती हैं।”

यह बयान पत्रकार नोरा ओ’डॉनेल द्वारा के सवाल के जवाब में था। उन्होंने पूछा था, “आपने कहा है कि आप ‘सऊदी अरब को वापस उसी जगह ले जा रहे हैं, जो हम पहले था। यानी एक उदारवादी इस्लामी देश, इसका क्या मतलब है।”

मुहम्मद बिन सलमान ने इस पर कहा था, “हमारे यहाँ कट्टरपंथी हैं जो महिलाओं और पुरुषों के बीच घुलने-मिलने पर रोक लगाते हैं और एक पुरुष और एक महिला के बीच अकेले और ऑफिस में उनके साथ होने के बीच अंतर नहीं कर पा रहे। इनमें से कई के विचार पैगंबर और खलीफाओं के समय के जीवन के खिलाफ हैं।”

सऊदी अरब में ही इस्लाम के दो सबसे पवित्र शहर, मक्का और मदीना हैं। सख्त सामाजिक और धार्मिक नियंत्रण लंबे समय से सऊदी अरब के समाज का हिस्सा रहा है जो अरब प्रायद्वीप का सबसे बड़ा देश है। सऊदी अरब ने हाल ही में महिलाओं को कार चलाने की अनुमति दी है सिनेमाघर खोल रहा है म्यूजिक शो आयोजित कर रहा है।

सनातन धर्म में महिला कभी उपेक्षित नहीं रही


प्राचीन काल से भारत देश में परम ज्ञानवान नारियां होती रही है नारी कभी भी सनातन धर्म में उपेक्षित नहीं रही। लेकिन आज हमारे कुर्सी के भूखे नेता धार्मिक पुस्तकों को समझे बिना नारी की उपेक्षा करते रहते हैं। जिसे उनका अल्पज्ञान अथवा पदभ्रष्ट की संज्ञा दी जा सकती है, क्योकि सतयुग से लेकर आज कलयुग तक ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं रही। लेकिन उनका जो दुःखदायी अंत हुआ, उससे अगर कोई शिक्षा भी नहीं ले, ऐसे असभ्यों के लिए यही कहा जा सकता है "अंधे के आगे रोना अपने नैन खोना"। प्रस्तुत है उनमें से कुछ की झलक

वैदिक नारियां:
देवमाता अदिति
देवमाता अदिति चारों वेदों की प्रकांड विदुषि थी। ये दक्ष प्रजापति की कन्या एवं महर्षि कश्यप की पत्नी थीं। इन्होंने अपने पुत्र इंद्र को वेदों एवं शास्त्रों की इतनी अच्छी शिक्षा दी कि उस ज्ञान की तुलना किसी से संभव नहीं थी, यही कारण है कि इंद्र अपने ज्ञान के बल पर तीनों लोकों का अधिपति बना। इंद्र का माता के नाम पर एक नाम आदितेय पडा। अदिति को अजर-अमर माना जाता है।
देवसम्राज्ञी शची
देवसम्राज्ञी शची इंद्र की पत्नी थीं, वे वेदों की प्रकांड विद्वान थी। ऋग्वेद के कई सूक्तों पर शची ने अनुसंधान किया। शचीदेवी पतिव्रता स्त्रियों में श्रेष्ठ मानी जाती हैं। शची को इंद्राणी भी कहा जाता है। ये विदुषी के साथ-साथ महान नीतिवान भी थी। इन्होंने अपने पति द्वारा खोया गया सम्राज्य एवं पद प्रतिष्ठा ज्ञान के बल पर ही दोबारा प्राप्त की थी।
सती शतरूपा
सती शतरूपा स्वायम्भुव मनु की पत्नी थीं। वे चारों वेदों की प्रकांड विदुषी थी। जल प्रलय के बाद मनु और शतरूपा से ही दोबारा सृष्टि का आरंभ हुआ। ये योगशास्त्र की भी प्रकाड विद्वान और साधक थी।
शाकल्य देवी
शाकल्य देवी महाराज अश्वपति की पत्नी थी। एक बार अश्वपति महाराज ने ऋषियों से कहा कि मैं राष्ट्र में कन्याओं का भी निर्वाचन चाहता हूं। देश में ऐसी कौन महान वेदों की विदुषी है जो देवकन्याओं को वेदों की शिक्षा प्रदान करे।
ऋषियों ने बताया कि आपकी पत्नी से बढ़कर वेदों की विदुषी और कोई नहीं है। तो राजा ने अपनी पत्नी शाकल्य देवी को वनवास दे दिया, ताकि वे वनों में रहकर कन्याओं के गुरुकुल स्थापित करें, आश्रम बनाएं और उसमें देश की कन्याएं शिक्षा पाएं। उन्होंने ऐसा ही किया। शाकल्य देवी ऐसी पहली विदुषी हैं, जिन्होंने कन्याओं के लिए शिक्षणालय स्थापित किए थे।
सन्ध्या
सन्ध्या वेदों की प्रकांड विद्वान थी। इन्होंने महर्षि मेधातिथि को शास्त्रार्थ में पराजित किया। वे यज्ञ को संपन्न कराने वाली पहली महिला पुरोहित थी। उन्हीं के नाम पर प्रातः संध्या और सायं सन्ध्या का नामकरण हुआ।
विदुषी अरून्धती
विदुषी अरून्धती ब्रहर्षि वशिष्ठ जी की धर्मपत्नी थी। ये भी वेदों की प्रकांड विद्वान थी। अपने ज्ञान के बल पर ही ये एकमात्र ऐसी विदुषी हैं, जिन्होंने सप्तर्षि मंडल में ऋषि पत्नी के रूप में गौरवशाली स्थान पाया। महर्षि मेधातिथि के यज्ञ में ये बचपन से ही भाग लेती थीं और यज्ञ के बाद वेदों की बातों पर तर्क-वितर्क किया करती थी।
ब्रह्मवादिनी घोषा
घोषा काक्षीवान् की कन्या थी। इनको कोढ रोग हो गया था, लेकिन उसकी चिकित्सा के लिए इन्होंने वेद और आयुर्वेद का गहन अध्ययन किया और ये कोढी होते हुए भी विदुषी और ब्रह्मवादिनी बन गई। अश्विनकुमारों ने इनकी चिकित्सा की और ये अपने काल की विश्वसुंदरी भी बनी।
ब्रह्मवादिनी विश्ववारा
ब्रह्मवादिनी विश्ववारा वेदों पर अनुसंधान करने वाली महान विदुषी थी। ऋग्वेद के पांचवें मंडल के द्वितीय अनुवाक के अटठाइसवें सूक्त षड्ऋकों का सरल रूपांतरण इन्होंने ही किया था। अत्रि महर्षि के वंश मंे पैदा होने वली इस विदुषी ने वेदज्ञान के बल पर ऋषि पद प्राप्त किया था।
ब्रह्मवादिनी अपाला
ब्रह्मवादिनी अपाला भी अत्रि मुनि के वंश में ही उत्पन्न हुई थी। अपाला को भी कुष्ठ रोग हो गया था, जिसके कारण इनके पति ने इन्हें घर से निकाल दिया था। ये पिता के घर चली गई और आयुर्वेद पर अनुसंधान करने लगी। सोमरस की खोज इन्होंने ही की थी। इंद्र देव ने सोमरस इनसे प्राप्त कर इनके ठीक होने में चिकित्सीय सहायता की। आयुर्वेद चिकित्सा से ये विश्वसुंदरी बन गई और वेदों के अनुसंधान में संलग्न हो गई। ऋग्वेद के अष्टम मंडल के 91वें सूक्त की 1 से 7 तक ऋचाएं इन्होंने संकलित की, एवं उन पर गहन अनुसंधान किया।
तपती
विदुषी तपती आदित्य की पुत्री और सावित्री की छोटी बहन थी। देव, दैत्य, गांधर्व और नागलोक में उन दिनों उनसे अधिक सुंदरी कोई और नहीं थी। वे वेदों की भी प्रकांड विद्वान थी। उनके रूप और गुणों से प्रभावित होकर ही अयोध्या के महाराजा संवरण ने उनसे विवाह किया था। तपती ने अपने पुत्र कुरु को स्वयं वेदों की शिक्षा दी, जिनके नाम पर कुरूकुल प्रतिष्ठित हुआ।
ब्रह्मवादिनी वाक्
ब्रह्मवादिनी वाक् अभृण ऋषि की कन्या थी। ये प्रसिद्ध ब्रह्मज्ञानिनीं थीं। इन्होंने अन्न पर अनुसंधान किया और अपने युग में उन्नत खेती के लिए वेदों के आधार पर नए-नए बीजों को खेती के लिए किसानों को अनुसंधान से पैदा करके दिया।
ब्रह्मवादिनी रोमशा
ब्रह्मवादिनी रोमशा बृहस्पति की पुत्री और भावभव्य की धर्मपत्नी थी। इनके सारे शरीर में रोमावली थी, इससे इनके पति इन्हें नहीं चाहते थे। लेकिन इन्होंने ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया, ऐसी बातों का प्रचार किया, जिससे नारी शक्ति में बुद्धि का विकास होता हो, वेद और शास्त्रों की अनेक शाखाओं पर इन्होंने अनुसंधान किया।
ब्रह्मवादिनी गार्गी
ब्रह्मवादिनी गार्गी के पिता का नाम वचक्नु था, जिसके कारण इन्हें वाचक्नवी भी कहते हैं। गर्ग गोत्र में उत्पन्न होने के कारण इन्हें गार्गी कहा जाता है। ये वेद शास्त्रों की महान विद्वान थी। इन्होंने शास्त्रार्थ में अपने युग में महान विद्वान महिर्ष याज्ञवल्कय तक को हरा दिया था।
विदुषी मैत्रेयी
विदुषी मैत्रेयी महर्षि याज्ञवल्क्य की पत्नी थीं। इन्होंने पति के श्रीचरणों में बैठकर वेदों का गहन अध्ययन किया है। पति परमेश्वर की उपाधि इन्हीं के कारण जग में प्रसिद्ध हुई, क्योंकि इन्होंने पति से ज्ञान प्राप्त किया था और फिर उस ज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए कन्या गुरुकुल स्थापित किए।
विदुषी सुलभा
विदुषी सुलभा महाराज जनक के राज्य की परम विदुषी थी। इन्होंने शास्त्रार्थ में राजा जनक को हराया एवं स्त्री शिक्षा के लिए शिक्षणालय की स्थापना की।
विदुषी लोपामुद्रा
विदुषी लोपामुद्रा महिर्ष अगस्त्य की धर्मपत्नी थीं। ये विदर्भ देश के राजा की बेटी थी। राजकुल में जन्म लेकर भी ये सादा जीवन उच्च विचार की समर्थक थी, तभी तो इनके पति ने इन्हें कहा था तुष्टोअहमस्मि कल्याणि तव वृत्तेन शोभने, यानी कल्याणी तुम्हारे सदाचार से मैं तुम पर बहुत संतुष्ट हूं। ये इतनी महान विदुषी थी कि एक बार इन्होंने अपने आश्रम में राम, सीता एवं लक्ष्मण को ज्ञान की बहुत सी बातों की शिक्षा दी थी।
विदुषी उशिज
विदुषी उशिज, ममता के पुत्र दीर्घतमा ऋषि की धर्मपत्नी थी। महर्षि काक्षीवान इन्हीं के सुपुत्र थे। इनके दूसरे पुत्र दीर्घश्रवा महान ऋषि थे। वेदों की शिक्षा इन्होंने ही अपने पुत्रों को प्रदान की थी। ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 116 से 121 तक के मंत्र पर अनुसंधान किया।
विदुषी प्रातिथेयी
विदुषी प्रातिथेयी महर्षि दधिचि की धर्मपत्नी थी। ये विदर्भ देश के राजा की कन्या और लोपामुद्रा की बहिन थीं। इनका पुत्र पिप्पललाद बहुत बडा विद्वान हुआ है।
ममता
ममता दीर्घतमा ऋषि की माता थी। ये बहुत बडी विदुषी एवं ब्रह्मज्ञानसंपन्ना थीं।
विदुषी भामती
विदुषी भामती वाचस्पति मिश्र की पत्नी थी। ये वेदों की प्रकांड विद्वान थी और इनके पति भी। इनके बारे में एक कहानी प्रचलित है। संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान वाचस्पति मिश्र को विवाह हुए छत्तीस वर्ष गुजर गये थे, किन्तु वे यह भी नहीं जानते थे कि उनकी पत्नी कौन हैं? एक दिन वे ब्रह्मसूत्र के शंकर भाष्य पर टीका लिख रहे थे, किन्तु एक पंक्ति कुछ ढंग से नहीं लिखी जा रही थी। दीपक भी कुछ धुंधला हो चला, शायद ठीक तरह से दिख भी नहीं रहा था। उनकी पत्नी दीपक की लौ बढ़ा रही थी। इतने में वाचस्पति मिश्र की नजर उस पर पड़ी।
उन्होंने पूछा, ‘‘तुम कौन हो?’’
‘‘मैं आपकी पत्नी हूँ। आज से छत्तीस वर्ष पहले हमारा विवाह हुआ था।’’
‘‘तुम्हारे साथ मेरा विवाह हुआ। शास्त्रों का भाष्य करते-करते मैं तो यह बात भूल ही चुका था। छत्तीस वर्ष तुमने मौन रहकर मेरी सेवा की है। हे देवी! तुम्हारे त्याग व उपकार अनंत हैं। अपनी इच्छा बताओ?’’
‘‘स्वामी मेरी कोई इच्छा नहीं है। आपने मानव जाति के कल्याण के लिए अनेक शास्त्रों की टीकाएँ लिखी हैं। मैं आपकी सेवा से कृतकृत्य हूँ।’’
‘‘हे देवी! तुम्हारा नाम क्या है?’’
‘‘इस दासी को भामती कहते हैं स्वामी।’’
‘‘मैं शंकर भाष्य पर जो टीका लिख रहा हूँ, उसका नाम मैं भामती टीका रखूँगा।’’
और वे पिफर लिखने में व्यस्त हो गये।
विद्योत्तमा
ब्रह्मज्ञानी विदुषी विद्योत्तमा से परास्त होकर पण्डितों ने एक मूर्ख को मौनी गुरु बताकर संकेत से शास्त्रार्थ की चुनौती दी थी। पण्डितों ने दो अंगुली और मुक्का आदि के अलग अर्थ बताकर विद्योत्तमा को परास्त घोषित करके मूर्ख से विवाह करने को विवश कर दिया। विद्योत्तमा ने पति से उष्ट्र को उसट सुनकर उसे रात में ही घर से भगाकर दरवाजा बंद कर दिया।
‘‘अनावृतकपाटं द्वारं देहि।’’-कुछ वर्ष बाद एक घनघोर रात्रि में पति ने पुकारा।
विद्योत्तमा ने द्वार खोलकर कहा, ‘‘अस्ति कश्चित वाक् विशेषः।’’
पत्नी के उपरोक्त तीन शब्दों पर अस्ति से कुमार संभव महाकाव्य, कश्चित् से मेघदूत खण्डकाव्य और वाक्विशेषः से रघुवंश महाकाव्य की रचना पति महोदय ने कर डाली। इन तीनों कालजयी ग्रंथ के रचनाकार थे  विश्व के सर्वश्रेष्ठ संस्कृत साहित्यकार अमर महाकवि कालिदास।

आइसलैंड : प्रधानमंत्री हड़ताल पर, कामकाज किया बंद: लैंगिक समानता की माँग और घरेलू हिंसा के विरोध में आईं महिलाएँ

                                                                                                                                       साभार 
उत्तर-पश्चिम यूरोप का एक छोटा-सा देश है आइसलैंड। इस देश की जनसंख्या महज 3.80 लाख है। मंगलवार (24 अक्टूबर 2023) को इस देश में कामकाज ठप हो गया। दरअसल, हजारों औरतों के साथ देश की प्रधानमंत्री कैतरीना कोस्तोत्रई (Katrín Jakobsdóttir) भी हड़ताल पर चली गईं।

इस मुल्क की नारी शक्ति का ये विरोध यहाँ मर्दों और औरतों के वेतन में असमानता और लैंगिक हिंसा को लेकर था। कोस्तोत्रई दुनिया में हड़ताल पर जाने वाली किसी देश की पहली प्रधानमंत्री कही जा सकती हैं।

पीएम कोस्तोत्रई ने पहले ही आइसलैंड की मीडिया को बताया था कि ‘क्या आप इसे समानता कहते हैं?’ स्लोगन वाली हड़ताल के तहत काम पर नहीं जाने का प्लान बनाया था। इसके साथ ही मंगलवार को ‘वीमेन्स डे ऑफ’ के दिन देश की हजारों महिलाओं के साथ पीएम भी इस हड़ताल में शामिल हो गईं।

इसे लेकर पीएम कोस्तोत्रई ने कहा, “मैं इस दिन काम नहीं करूँगी और मुझे उम्मीद है कि सभी महिलाएँ (कैबिनेट में) भी ऐसा ही करेंगी। मैंने कल कैबिनेट की बैठक नहीं करने का फैसला किया है। आइसलैंड की संसद में केवल पुरुष मंत्री सवालों का जवाब देंगे। हम इस तरह से एकजुटता दिखाते हैं।”

हड़ताल के आयोजकों ने अभियान की आधिकारिक वेबसाइट पर कहा है, “24 अक्टूबर को आइसलैंड में आप्रवासी सहित सभी महिलाओं को भुगतान और अवैतनिक (घरेलू कामों सहित) दोनों तरह के काम बंद करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। पूरे दिन महिलाएँ समाज में अपने योगदान के अहमियत को दिखाने के लिए हड़ताल करेंगी।”

दरअसल, इस देश में स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रही महिलाओं को वेतन में असमानता को लेकर रोष है। इस वजह से महिलाओं ने ‘वीमेन्स डे ऑफ’ के दिन केवल बाहर का ही नहीं, बल्कि घर का काम भी नहीं किया। स्टाफ की कमी के कारण आइसलैंड के स्कूल-अस्पताल, ट्रांसपोर्ट आदि बुरी तरह प्रभावित रहे।

ये तब है, जब यह देश लैंगिक समानता के मामले में बीते 14 सालों से टॉप पर है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मुताबिक, वेतन सहित अन्य कारकों में आइसलैंड के मुकाबले अन्य किसी भी देश ने समानता हासिल नहीं की है। फोरम ने इस देश को 91.2 फीसदी का स्कोर दिया है। इस देश को ‘फैमिनिस्ट हेवन’ के नाम से भी जाना जाता है।

कोस्तोत्रई ने 19 अक्टूबर 2023 के एक ट्वीट में कहा था, “हमें लैंगिक वेतन के अंतर को कम करने और लैंगिक समानता तक पहुँचने के लिए महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने की जरूरत है। हमें ऐसी परिस्थितियों वाले समाज की जरूरत है, जहाँ बेहतरीन खुशहाली, माता-पिता की छुट्टी, डे-केयर और एक संस्कृति में बदलाव संभव हो।”

इस देश में ये पहली बार नहीं है, जब ‘वीमेन्स डे ऑफ’ मनाया गया। यहाँ ये दिन लगभग 50 साल पहले यानी 1975 में हुई पहली बार हड़ताल के बाद आया है। तब आइसलैंड की 90 फीसदी महिलाओं ने केवेनफ्री यानी वीमेन्स डे ऑफ के हिस्से के तौर पर काम करने से इनकार कर दिया था। इस हड़ताल के कारण आइसलैंड में अहम बदलाव हुए।

आइसलैंड में जो प्रमुख बदलाव हुए, उनमें दुनिया के किसी देश की पहली महिला राष्ट्रपति का चुनाव भी शामिल है। साल 1975 के बाद इस हड़ताल को 1985, 2005, 2010, 2016 और 2018 में दोहराया गया है। 1975 की हड़ताल में भाग लेने वालों में से कुछ ने इस हड़ताल को आयोजित करने में मदद की। उनका मानना है कि मकसद पूरा नहीं हुआ है।

इसे लेकर आइसलैंडिक फेडरेशन फॉर पब्लिक वर्कर्स के हड़ताल आयोजक फ़्रीजा ने कहा, “हम इस बात की तरफ ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं कि हमें समानता का स्वर्ग कहा जाता है, लेकिन अभी भी लैंगिक असमानताएँ हैं। कार्रवाई की तत्काल जरूरत है। स्वास्थ्य सेवाओं और बच्चों की देखभाल जैसी महिलाओँ के नेतृत्व वाले काम को अभी भी कम अहमियत दी जाती है और बहुत कम भुगतान किया जाता है।”

आइसलैंड के सांख्यिकी विभाग ने कहा है कि वहाँ कुछ नौकरियों में औरतें अभी भी अपने पुरुष सहकर्मियों के मुकाबले कम-से-कम 20 फीसदी कम कमाती हैं। वहीं आइसलैंड विश्वविद्यालय की एक स्टडी में खुलासा हुआ है कि यहाँ की 40 फीसदी औरतों को अपने जीवनकाल में लिंग-आधारित और यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है।

जहाँ माएँ अपनी संतान के लिए छठ/अहोई करें या पति के लिए करवा चौथ, उनके प्यार के बीच आने वाली तस्लीमा नसरीन कौन होती हैं?

                    जिस सनातन धर्म में कन्या पूजन होता है, वहाँ करवा चौथ को बदनाम करने की साजिश क्यों?
प्रत्येक वर्ष आश्विन महीने की पूर्णिमा के बाद चतुर्थी तिथि को ‘करवा चौथ’ का त्योहार मनाने की परंपरा भारत में रही है, खासकर पश्चिमी और उत्तर भारतीय महिलाओं में। कार्तिक के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाने वाला ये त्योहार फिल्मों और टीवी सीरियलों के माध्यम से देश-विदेश की महिलाओं में और लोकप्रिय हुआ। इस दिन महिलाएँ अपने पति की लंबी उम्र की सलामती के लिए उपवास रखती हैं और रात को चन्द्रमा के दर्शन के उपरांत पति के हाथों जल ग्रहण कर इसका समापन करती हैं।

भारतीय इतिहास में सामान्यतः ये परंपरा रही है कि पूर्व काल में पुरुष जीविकोपार्जन से लेकर युद्ध तक जैसे कार्यों के लिए दूर जाया करते थे और महीनों बाद लौटते थे। उनमें से कइयों के लौटने पर भी संशय रहता था। वो महिलाओं-बच्चों को सुरक्षित घर पर छोड़ जाते थे। ऐसे में ये महिलाएँ उनकी लंबी उम्र और सलामती के लिए इस तरह के उपवास करती थीं। ये परंपरा आज तक चली आ रही है। अब जैसा कि हिन्दू धर्म के हर त्योहार के साथ होता है, इसे भी बदनाम करने की साजिश चल निकली है।

ऐसा करने वालों में ताज़ा नाम जुड़ा है लेखिका तस्लीमा नसरीन का, जिन्हें इस्लाम के रूढ़िवाद पर पुस्तक लिखने के लिए बांग्लादेश ने निकाल बाहर किया और वो हिन्दुओं के देश भारत में शरण लेकर रहती हैं। लेकिन, इस्लामी कट्टरपंथियों का रोज निशाना बनने वाली तस्लीमा नसरीन खुद को न्यूट्रल दिखाने के लिए हिन्दू त्योहार पर निशाना साध रही हैं, बिना कुछ जाने-समझे। ये अलग बात है कि इसके बावजूद हिन्दू उन्हें देश से बाहर नहीं निकाल रहे और न ही उन्हें हत्या की धमकियाँ दे रहे।

लेकिन हाँ, सही भाषा में तथ्यों के साथ जवाब देने का अधिकार हमें हमारा संविधान और धर्म, दोनों देता है। दरअसल, बॉलीवुड अभिनेत्रियों ने करवा चौथ का त्योहार मनाते हुए तस्वीर साझा की थी। उसे ट्वीट करते हुए तस्लीमा नसरीन ने ट्विटर पर लिखा, “ये लोकप्रिय और अमीर महिलाएँ भारतीय उपमहाद्वीप के सभी वर्ग और जाति के लाखों महिलाओं एवं लड़कियों पर अपना प्रभाव डालती हैं, उस करवा चौथ त्योहार को मना कर, जो सबसे ज्यादा लोकप्रिय पितृसत्तात्मक रीति-रीवाज है।"

तस्लीमा नसरीन ने करवा चौथ त्योहार को पितृसत्ता का शीर्ष करार दिया। सबसे पहली बात तो ये कि पितृसत्ता में कोई बुराई नहीं है। पिता की सत्ता होनी चाहिए। पुरुष का शासन होना चाहिए, ठीक उसी तरह मातृसत्ता भी होनी चाहिए। माताओं का शासन भी होना चाहिए। दोनों एक-दूसरे के पूरक होते हैं, विरोधी नहीं। तभी हमारे यहाँ अर्धनारीश्वर का कॉन्सेप्ट है, जहाँ शिव-पार्वती मिल कर आधे-आधे स्त्री-पुरुष का रूप धारण करते हैं।

हिन्दू धर्म की बात से पहले कुछ सवाल। पितृसत्ता को चुनौती देने का अर्थ क्या है? किसी गर्भवती अभिनेत्री का नंगी होकर तस्वीर क्लिक कराना? या फिर किसी मॉडल का छोटे कपड़ों में मैगजीन के कवर पर आना? किसी महिला द्वारा खुलेआम सड़क पर पुरुषों को चाँटे मारना, या फिर झूठे दहेज़-बलात्कार के मामलों में फँसाना? जिस तरह रणवीर सिंह के न्यूड फोफोज का पितृसत्ता से कुछ लेना-देना नहीं है, उसी तरह महिलाओं का कम कपड़े पहनने का मातृसत्ता से कोई लेना-देना नहीं है। हाँ, ये व्यक्तिगत चॉइस का मामला हो सकता है, लेकिन इसका विरोध करना भी किसी का व्यक्तिगत चॉइस ही है।

फिर मातृसत्ता का उदाहरण क्या है? इसका उदाहरण है कि सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति के परम साहित्य वेदों की कई ऋचाएँ महिलाओं ने लिखीं। किस अन्य मजहब में ऐसा मिलता है? इसका उदाहरण है कि सती सावित्री ने यमराज के द्वार से अपने पति को वापस छीन लिया। इसका उदाहरण है कि सीता और द्रौपदी जैसी महिलाओं के अपमान करने वाले का पूरा वंश नाश हो गया। इसका उदाहरण है कि महारानी लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगनाओं ने मातृभूमि की रक्षा के लिए तलवार उठाया।

अब तस्लीमा नसरीन जवाब दें। नवरात्री के अवसर पर हिन्दू धर्म में कन्या पूजन का विधान है। इसके तहत कुँवारी लड़कियों को घर में आमंत्रित कर भोजन कराया जाता है और उनके पाँव धोए जाते हैं? जैसे कन्याओं के पाँव धोने में कुक भी बुरा नहीं है, वैसे ही पति की लंबी उम्र की कामना के लिए प्यार से उपवास भी बुरा नहीं। कन्याओं के पाँव धोकर उन्हें ये एहसास दिलाया जाता है कि वो मातृशक्ति हैं, उनका दर्जा सबसे ऊपर है और उनके लिए लोगों के मन में सर्वोच्च सम्मान की भावना होनी चाहिए।

इसी तरह हिन्दू धर्म में ‘सुमंगली पूजा’ भी होती है। दक्षिण भारत के ब्राह्मण परिवारों में ये लोकप्रिय है। घर की विवाहित महिलाओं को ‘सुमंगली’ कहा जाता है, अर्थात घर का मंगल करने वाली। इसके तहत 3, 5, 7 या 9 महिलाओं को बुला कर उन्हें सम्मानित किया जाता है, उनकी पूजा की जाती है। इसके तहत घर की दिवंगत महिलाओं की प्रार्थना की जाती है, ताकि उनका आशीर्वाद मिले। इसमें किन्हें भाग लेना है और किन्हें नहीं, इन्हें लेकर नियम-कानून पर भी उँगली उठाने वाले निशाना साध सकते हैं। लेकिन, हिन्दू धर्म में कई पर्व-त्योहारों में पुरुषों के लिए भी तमाम नियम-कानून हैं।

आध्यात्मिक मामलों पर लिखने वाले युवा लेखक अंशुल पांडेय ने भी तस्लीमा नसरीन को अच्छा जवाब दिया है। उन्होंने याद दिलाया है कि भारत में देवी की पूजा सिर्फ नवरात्रि या दीवाली पर ही नहीं होती है, प्रतिदिन की जाती है। माँ सरस्वती को विद्या की देवी कहा गया है और सारे छात्र-छात्राएँ उनकी पूजा करते हैं, क्या ये पितृसत्ता है? घर में लड़की का जन्म होने पर छठे दिन देवी की पूजा की जाती है। ऐसे अनेकों विधि-विधान हैं।

इस्लाम में महिलाओं की क्या इज्जत है, हम जानते हैं। हलाला के नाम पर उन्हें ससुर और देवर के साथ रात गुजारने को मजबूर किया जाता है। ईसाई मजहब में चर्चों में ही पादरियों द्वारा ननों के यौन शोषण की बातें सामने आती रहती हैं। जबकि सनातन में मातृ शक्ति को ही प्रकृति कहा गया है, समस्त शक्तियों का स्रोत बताया गया है। माएँ अपने संतान के लिए छठ करें या पति के लिए करवा चौथ, उनके प्यार के बीच आने वाले हम या तस्लीमा नसरीन कौन होती हैं?

अगर आप दुर्गा सप्तशती पढ़ेंगे तो पाएँगे कि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति ही आदिशक्ति से हुई है। जिस धर्म में कन्या पूजन होता है, वहाँ करवा चौथ पर उँगली नहीं उठाई जा सकती। यहाँ लड़कियाँ पूजित भी होती हैं, पूजा भी करती हैं। यहाँ Feminism और Patriarchy के लिए जगह नहीं है, अर्धनारीश्वर के लिए है। महिलाओं की सुरक्षा पुरुषों का कर्तव्य बताया गया है। इसीलिए तरह, महिलाएँ भी पुरुषों की सुरक्षा की कामना करती हैं। तभी रक्षा बंधन जैसे त्योहार अस्तित्व में हैं।

‘बिहारी बहन*&$… तुम सबके L@^$ काट के मुँह में खिला दूँगी’: महिला ने गार्ड्स को बकी गंदी-गंदी गालियाँ

                                          नोएडा में महिला ने सिक्योरिटी गार्ड्स को बकी गालियाँ
नोएडा की एक महिला का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें वो सिक्योरिटी गार्ड्स को गंदी-गंदी गालियाँ बकती हुई नजर आ रही है। महिला ने बिहारियों को लेकर भी अपशब्द का प्रयोग किया और कहा, “ये यहाँ जितने भी बिहारी हैं ना यहाँ, Behen*h&d इनको सँभालो।” थाना सेक्टर-126 में जेपी सोसाइटी की उक्त महिला को रविवार (21 अगस्त, 2022) को यूपी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।

बताया जा रहा है कि सिक्योरिटी गार्ड ने गेट खोलने में देरी की, जिसके बाद उक्त महिला भड़क गई और कार का शिक्षा नीचे कर के गंदी-गंदी गालियाँ बकने लगी। इतना ही नहीं, उसने गार्ड का कॉलर पकड़ कर भी उसे घसीटा और उस पर हाथ चलाया। महिला ने गार्ड को धक्का भी मारा। गार्ड और उसके साथियों ने महिला से लाख आग्रह किया, उसने गाली देना बंद नहीं किया। उसकी पहचान भाव्या रॉय के रूप में हुई है, जो पेशे से वकील है।

गिरफ़्तारी के बाद महिला खुद की ही गाड़ी से पुलिस थाना गई और इस दौरान वो खुद ही ड्राइव भी कर रही थी। आहत गार्ड ने अपने परिवार और बच्चों की दुहाई देते हुए कहा कि अब मैं ये नौकरी नहीं कर सकता, बहुत बेइज्जती हुई है। उसने कहा कि महिलाओं की इज्जत करने के बावजूद उसके साथ इस तरह का व्यवहार किया गया, वो भी एक पढ़ी-लिखी महिला द्वारा। लोगों ने ये भी बताया कि उस वक्त महिला शराब के नशे में थी।

वीडियो में महिला कहती है, “मैं तेरी $#ड फाड़ दूँगी। अबे भो%ड़ी के, तुम बहन%$द मेरी इज्जत करते हो? ये बोलेगा मेरे को माधर%$द? इसकी माँ की &त। तुमलोगों के टट्टे साले बड़े हो गए हैं, बहन%$द, तुम सबके लं%# काट के मुँह में खिला दूँगी भो%ड़ी के। This Shit Doesn’t Work. खाल खींच लूँगी इस माधर%$द की।” इस दौरान महिला ने अपनी जाँघ थपथपाते हुए हमला भी कर दिया। हालाँकि, इस दौरान गार्ड्स मिन्नतें करते रहें।

इस वीडियो के वायरल होने के बाद लोग इसे ‘अल्ट्रा फेमिनिज्म’ बताते हुए पूछ रहे हैं कि क्या इस महिला के घर पर भी बुलडोजर चलेगा? दीपिका नारायण भारद्वाज ने लिखा कि महिला सशक्तिकरण जब गलत हो जाता है तो ऐसा ही होता है। नीतू झा नामक पत्रकार ने पूछा कि महिलाएँ कब तक विक्टिम कार्ड खेलती रहेंगी? पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी ने कहा कि ये भी ऐसा ही व्यवहार कर रही है, जैसा श्रीकांत त्यागी ने किया था।