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'हिंदुओं के धैर्य को कमजोरी न समझें'; ‘मेरे धर्म का अपमान न करें’: पवन कल्याण, आंध्र प्रदेश के डिप्टी मुख्यमंत्री ने फर्जी सेकुलरों को दिखाया आईना

                          पवन कल्याण और के. अन्नामलाई (फोटो साभार- एक्स/@PawanKalyan )
जब आंध्र प्रदेश में नई सरकार द्वारा शपथ लेने के बाद मंच पर उपस्थित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पवन कल्याण के लिए कहा था "ये पवन नहीं तूफान है"। वास्तव में देश को आज ऐसे ही तूफानी नेताओं की जरुरत है जो हिन्दू धर्म का चोला ओढे कालनेमि हिन्दू बन सनातन का अपमान कर अपनी रोटियां सेंकते हैं। योगी, हिमंत सरमा और पवन जैसे और तूफानी नेता राजनीति में आने चाहिए जो सियासतखोरों को उनकी औकात दिखा सके। वैसे तेलंगाना में भी ऐसा ही तूफान टी राजा सिंह भी है। 

भारत विरोधी विदेशियों की कठपुतली बनकर हमारा विपक्ष देश को अंधकार में ले जाने का असफल प्रयास कर रहा है। जो नेता और उनकी पार्टियां अपनी बुद्धि और विवेक से राजनीति करने की बजाए सियासत का गन्दा और घिनौना खेल खेलकर जनता को गुमराह कर रहे हैं, ऐसे लोगों को एक भी वोट नहीं देना चाहिए। और वह समय भी अब ज्यादा दूर नहीं जब इनके परिवार वाले ही इनको आईना दिखाएंगे।      

आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण ने रविवार (22 जून 2025) को मदुरै में फर्जी सेकुलरों पर तीखा हमला किया। हिंदू मुन्नानी द्वारा आयोजित ‘मुरुगा भक्तरगल मानदु’ कार्यक्रम में बोलते हुए पवन कल्याण ने कहा कि ये लोग ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ की आड़ में हिंदू देवी-देवताओं और आस्थाओं को जानबूझकर निशाना बना रहे हैं।

मुख्य रूप से तमिल भाषा में दिए गए अपने भाषण में पवन कल्याण ने खुद को ‘कट्टर हिंदू’ बताया और कहा कि उन्हें अपने धर्म के लिए वही सम्मान चाहिए जो दूसरों को मिलता है।

पवन कल्याण ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता का मतलब सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए, लेकिन आज इसे केवल हिंदू धर्म को छोड़कर बाकी सभी की रक्षा के रूप में पेश किया जा रहा है।

भाजपा नेता के.अन्नामलाई और AIADMK के प्रतिनिधियों समेत कई बड़े नेता और बड़ी संख्या में भक्त इस कार्यक्रम में मौजूद थे। पवन कल्याण ने चेतावनी दी कि अगर इस तरह की चीजों से हिंदू धर्म की जड़ों को नुकसान पहुँच रहा है।

पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता और अभिव्यक्ति की आजादी जैसे शब्द कुछ लोगों के लिए सुविधाजनक हथियार बन गए हैं।

उन्होंने कहा कि आजकल अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर हिंदू देवताओं को बार-बार निशाना बनाया जा रहा है, जो एक गंभीर समस्या है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर यह चलन नहीं रुका, तो हमारे धर्म और आस्था को बचा पाना मुश्किल हो जाएगा।

पवन कल्याण ने यह भी साफ किया कि वह कट्टरपंथी नहीं हैं, बल्कि एक प्रतिबद्ध हिंदू हैं। उन्होंने कहा कि वह ईसाई और इस्लाम धर्म का भी सम्मान करते हैं और बस यही चाहते हैं कि उनके विश्वास का भी सम्मान किया जाए। उन्होंने भारत की ताकत को धर्म (या धार्मिक मूल्यों) में बताया और कहा कि तमिलनाडु में हिंदू सम्मेलनों पर उठाए जा रहे सवाल बहुत खतरनाक हैं और इससे समाज में बेवजह का विभाजन पैदा हो रहा है।

आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण ने मदुरै में हिंदू मुन्नानी द्वारा आयोजित कार्यक्रम में बोलते हुए धर्मनिरपेक्षता के दोहरे मापदंडों पर तीखी आलोचना की। उन्होंने कहा, “ईसाई को ईसाई और मुसलमान को मुसलमान होने की आजादी है, लेकिन जब कोई हिंदू अपने धर्म की बात करता है, तो उसे सांप्रदायिक कह दिया जाता है। यही नकली धर्मनिरपेक्षता है।”

पवन कल्याण ने कहा कि हिंदुओं के धैर्य को उसकी कमजोरी न समझा जाए। उन्होंने कहा, “अगर आप मेरी आस्था का सम्मान नहीं कर सकते, तो कम से कम उसका अपमान भी न करें।” पारंपरिक मुरुगन भक्त की पोशाक में आए कल्याण ने कंद षष्ठी कवचम् जैसे पवित्र भजनों का मजाक उड़ाने पर दुख जताया और इसे गलत बताया। उन्होंने सभी से एकजुट होकर धर्म की रक्षा करने का आग्रह किया और विश्वास जताया कि बदलाव जरूर आएगा।

इस कार्यक्रम में भाजपा नेता के. अन्नामलाई ने कहा कि यह सम्मेलन राजनीतिक नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य सवाल उठाना और अधिकारों की माँग करना है। उन्होंने कहा, “हम किसी के दुश्मन नहीं हैं, हम बस अपने धर्म के लिए न्याय चाहते हैं।” कार्यक्रम का समापन कंद षष्ठी कवचम् के सामूहिक पाठ के साथ हुआ, जिससे इसकी भक्ति भावना और सांस्कृतिक एकता का संदेश सामने आया।

उत्तर प्रदेश : जिस संभल में हिंदुओं को बना दिया अल्पसंख्यक, वहाँ की जमीन उगल रही इतिहास: मंदिर-प्राचीन कुओं के बाद मिली ‘रानी की बावड़ी’, दफन थी प्राचीन इमारत-सुरंग

       संभल के लक्ष्मण गंज में खुदाई के दौरान मिली हिन्दू धर्म से जुडी एतिहासिक धरोहरें (चित्र साभार- आज तक)
उत्तर प्रदेश के संभल जिले में बंद पड़े मंदिरों के अलावा खुदाई के दौरान एक अन्य ऐतिहासिक धरोहर निकल कर सामने आई है। इसी जिले के चंदौसी क्षेत्र में राजस्व विभाग ने एक प्राचीन बावड़ी को भी खोज निकाला है। काफी बड़ी संरचना वाली इस बावड़ी को मिट्टी से दफन कर दिया गया था। फ़िलहाल प्रशासन द्वारा खुदाई का काम जारी है। माना जा रहा है कि अभी यहाँ पर सुरंग भी मिल सकती है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक खुदाई का ये काम चंदौसी के लक्ष्मणगंज इलाके में हो रहा है। साल 1857 तक ये क्षेत्र हिन्दू बहुल हुआ करता था। यहाँ सैनी बहुतायत हुआ करते थे। वर्तमान में यह जगह मुस्लिम बहुल हो चुकी है। इस जगह की खुदाई की माँग को लेकर संभल के जिलाधिकारी को एक प्रार्थना पत्र मिला था। प्रार्थना पत्र में लक्ष्मणगंज के अंदर रानी बिलारी की प्रचीन बावड़ी होने का दावा किया गया था। इसी शिकायत का संज्ञान लेकर राजस्व विभाग की टीम लक्ष्मण गंज पहुँची थी।

बस्ती के बीच में एक जगह चिन्हित कर के खुदाई शुरू हुई। कुछ ही देर बाद जमीन के नीचे प्राचीन इमारतें मिलनी शुरू हो गईं। मीडिया से बात करते हुए राजस्व विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि नीचे 2 मंजिला इमारत दबी हुई है। यहाँ मौजूद बावड़ी और विशाल कुआँ सरकारी अभिलेखों में भी दर्ज है। बावड़ी की गहराई लगभग 250 फ़ीट बताई जा रही है। प्रशासन के पास नक्शा भी मौजूद है। आगे की खुदाई नक्शे के आधार पर की जाएगी। खुदाई का काम अभी भी जारी है। इसके विजुअल सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं।

इस बीच भारतीय पुरातत्व विभाग (ASI) की टीम संभल पहुँच कर काम पर लग गई है। टीम ने यहाँ कल्कि मंदिर से अपनी जाँच पड़ताल शुरू की। इसके अलावा ASI 5 अलग-अलग जगहों पर भी सर्वे के लिए पहुँची। इन जगहों में 5 तीर्थ और 19 कुएँ शामिल हैं। इन कुओं में कल्कि मंदिर में मौजूद अति प्राचीन कृष्ण कूप भी शामिल है। शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए ASI के इस दौरे को हर संभव गुप्त ही रखने की कोशिश की गई थी।

संभल में दंगों का पुराना इतिहास रहा है। इन्हीं दंगों के बल पर संभल नगरपालिका क्षेत्र से धीरे-धीरे हिंदुओं को मिटाया गया। देश की स्वतंत्रता के समय संभल नगरपालिका क्षेत्र में हिंदुओं की आबादी 45 प्रतिशत थी जो आज घटकर 15-20% रह गई है। उस समय मुस्लिम 55% थे। आज वे बढ़कर 80-85 प्रतिशत हो गए हैं।

जहाँ माएँ अपनी संतान के लिए छठ/अहोई करें या पति के लिए करवा चौथ, उनके प्यार के बीच आने वाली तस्लीमा नसरीन कौन होती हैं?

                    जिस सनातन धर्म में कन्या पूजन होता है, वहाँ करवा चौथ को बदनाम करने की साजिश क्यों?
प्रत्येक वर्ष आश्विन महीने की पूर्णिमा के बाद चतुर्थी तिथि को ‘करवा चौथ’ का त्योहार मनाने की परंपरा भारत में रही है, खासकर पश्चिमी और उत्तर भारतीय महिलाओं में। कार्तिक के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाने वाला ये त्योहार फिल्मों और टीवी सीरियलों के माध्यम से देश-विदेश की महिलाओं में और लोकप्रिय हुआ। इस दिन महिलाएँ अपने पति की लंबी उम्र की सलामती के लिए उपवास रखती हैं और रात को चन्द्रमा के दर्शन के उपरांत पति के हाथों जल ग्रहण कर इसका समापन करती हैं।

भारतीय इतिहास में सामान्यतः ये परंपरा रही है कि पूर्व काल में पुरुष जीविकोपार्जन से लेकर युद्ध तक जैसे कार्यों के लिए दूर जाया करते थे और महीनों बाद लौटते थे। उनमें से कइयों के लौटने पर भी संशय रहता था। वो महिलाओं-बच्चों को सुरक्षित घर पर छोड़ जाते थे। ऐसे में ये महिलाएँ उनकी लंबी उम्र और सलामती के लिए इस तरह के उपवास करती थीं। ये परंपरा आज तक चली आ रही है। अब जैसा कि हिन्दू धर्म के हर त्योहार के साथ होता है, इसे भी बदनाम करने की साजिश चल निकली है।

ऐसा करने वालों में ताज़ा नाम जुड़ा है लेखिका तस्लीमा नसरीन का, जिन्हें इस्लाम के रूढ़िवाद पर पुस्तक लिखने के लिए बांग्लादेश ने निकाल बाहर किया और वो हिन्दुओं के देश भारत में शरण लेकर रहती हैं। लेकिन, इस्लामी कट्टरपंथियों का रोज निशाना बनने वाली तस्लीमा नसरीन खुद को न्यूट्रल दिखाने के लिए हिन्दू त्योहार पर निशाना साध रही हैं, बिना कुछ जाने-समझे। ये अलग बात है कि इसके बावजूद हिन्दू उन्हें देश से बाहर नहीं निकाल रहे और न ही उन्हें हत्या की धमकियाँ दे रहे।

लेकिन हाँ, सही भाषा में तथ्यों के साथ जवाब देने का अधिकार हमें हमारा संविधान और धर्म, दोनों देता है। दरअसल, बॉलीवुड अभिनेत्रियों ने करवा चौथ का त्योहार मनाते हुए तस्वीर साझा की थी। उसे ट्वीट करते हुए तस्लीमा नसरीन ने ट्विटर पर लिखा, “ये लोकप्रिय और अमीर महिलाएँ भारतीय उपमहाद्वीप के सभी वर्ग और जाति के लाखों महिलाओं एवं लड़कियों पर अपना प्रभाव डालती हैं, उस करवा चौथ त्योहार को मना कर, जो सबसे ज्यादा लोकप्रिय पितृसत्तात्मक रीति-रीवाज है।"

तस्लीमा नसरीन ने करवा चौथ त्योहार को पितृसत्ता का शीर्ष करार दिया। सबसे पहली बात तो ये कि पितृसत्ता में कोई बुराई नहीं है। पिता की सत्ता होनी चाहिए। पुरुष का शासन होना चाहिए, ठीक उसी तरह मातृसत्ता भी होनी चाहिए। माताओं का शासन भी होना चाहिए। दोनों एक-दूसरे के पूरक होते हैं, विरोधी नहीं। तभी हमारे यहाँ अर्धनारीश्वर का कॉन्सेप्ट है, जहाँ शिव-पार्वती मिल कर आधे-आधे स्त्री-पुरुष का रूप धारण करते हैं।

हिन्दू धर्म की बात से पहले कुछ सवाल। पितृसत्ता को चुनौती देने का अर्थ क्या है? किसी गर्भवती अभिनेत्री का नंगी होकर तस्वीर क्लिक कराना? या फिर किसी मॉडल का छोटे कपड़ों में मैगजीन के कवर पर आना? किसी महिला द्वारा खुलेआम सड़क पर पुरुषों को चाँटे मारना, या फिर झूठे दहेज़-बलात्कार के मामलों में फँसाना? जिस तरह रणवीर सिंह के न्यूड फोफोज का पितृसत्ता से कुछ लेना-देना नहीं है, उसी तरह महिलाओं का कम कपड़े पहनने का मातृसत्ता से कोई लेना-देना नहीं है। हाँ, ये व्यक्तिगत चॉइस का मामला हो सकता है, लेकिन इसका विरोध करना भी किसी का व्यक्तिगत चॉइस ही है।

फिर मातृसत्ता का उदाहरण क्या है? इसका उदाहरण है कि सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति के परम साहित्य वेदों की कई ऋचाएँ महिलाओं ने लिखीं। किस अन्य मजहब में ऐसा मिलता है? इसका उदाहरण है कि सती सावित्री ने यमराज के द्वार से अपने पति को वापस छीन लिया। इसका उदाहरण है कि सीता और द्रौपदी जैसी महिलाओं के अपमान करने वाले का पूरा वंश नाश हो गया। इसका उदाहरण है कि महारानी लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगनाओं ने मातृभूमि की रक्षा के लिए तलवार उठाया।

अब तस्लीमा नसरीन जवाब दें। नवरात्री के अवसर पर हिन्दू धर्म में कन्या पूजन का विधान है। इसके तहत कुँवारी लड़कियों को घर में आमंत्रित कर भोजन कराया जाता है और उनके पाँव धोए जाते हैं? जैसे कन्याओं के पाँव धोने में कुक भी बुरा नहीं है, वैसे ही पति की लंबी उम्र की कामना के लिए प्यार से उपवास भी बुरा नहीं। कन्याओं के पाँव धोकर उन्हें ये एहसास दिलाया जाता है कि वो मातृशक्ति हैं, उनका दर्जा सबसे ऊपर है और उनके लिए लोगों के मन में सर्वोच्च सम्मान की भावना होनी चाहिए।

इसी तरह हिन्दू धर्म में ‘सुमंगली पूजा’ भी होती है। दक्षिण भारत के ब्राह्मण परिवारों में ये लोकप्रिय है। घर की विवाहित महिलाओं को ‘सुमंगली’ कहा जाता है, अर्थात घर का मंगल करने वाली। इसके तहत 3, 5, 7 या 9 महिलाओं को बुला कर उन्हें सम्मानित किया जाता है, उनकी पूजा की जाती है। इसके तहत घर की दिवंगत महिलाओं की प्रार्थना की जाती है, ताकि उनका आशीर्वाद मिले। इसमें किन्हें भाग लेना है और किन्हें नहीं, इन्हें लेकर नियम-कानून पर भी उँगली उठाने वाले निशाना साध सकते हैं। लेकिन, हिन्दू धर्म में कई पर्व-त्योहारों में पुरुषों के लिए भी तमाम नियम-कानून हैं।

आध्यात्मिक मामलों पर लिखने वाले युवा लेखक अंशुल पांडेय ने भी तस्लीमा नसरीन को अच्छा जवाब दिया है। उन्होंने याद दिलाया है कि भारत में देवी की पूजा सिर्फ नवरात्रि या दीवाली पर ही नहीं होती है, प्रतिदिन की जाती है। माँ सरस्वती को विद्या की देवी कहा गया है और सारे छात्र-छात्राएँ उनकी पूजा करते हैं, क्या ये पितृसत्ता है? घर में लड़की का जन्म होने पर छठे दिन देवी की पूजा की जाती है। ऐसे अनेकों विधि-विधान हैं।

इस्लाम में महिलाओं की क्या इज्जत है, हम जानते हैं। हलाला के नाम पर उन्हें ससुर और देवर के साथ रात गुजारने को मजबूर किया जाता है। ईसाई मजहब में चर्चों में ही पादरियों द्वारा ननों के यौन शोषण की बातें सामने आती रहती हैं। जबकि सनातन में मातृ शक्ति को ही प्रकृति कहा गया है, समस्त शक्तियों का स्रोत बताया गया है। माएँ अपने संतान के लिए छठ करें या पति के लिए करवा चौथ, उनके प्यार के बीच आने वाले हम या तस्लीमा नसरीन कौन होती हैं?

अगर आप दुर्गा सप्तशती पढ़ेंगे तो पाएँगे कि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति ही आदिशक्ति से हुई है। जिस धर्म में कन्या पूजन होता है, वहाँ करवा चौथ पर उँगली नहीं उठाई जा सकती। यहाँ लड़कियाँ पूजित भी होती हैं, पूजा भी करती हैं। यहाँ Feminism और Patriarchy के लिए जगह नहीं है, अर्धनारीश्वर के लिए है। महिलाओं की सुरक्षा पुरुषों का कर्तव्य बताया गया है। इसीलिए तरह, महिलाएँ भी पुरुषों की सुरक्षा की कामना करती हैं। तभी रक्षा बंधन जैसे त्योहार अस्तित्व में हैं।