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मध्य प्रदेश : मस्जिद की खुदाई में निकली भगवान राम और माँ सीता की मूर्ति, हिंदू पूजा करने पहुँचे: सागर का मामला, पुरात्व विभाग जाँच में जुटा

     मध्य प्रदेश में मस्जिद की खुदाई में मिली राम-सीता की मूर्तियाँ (साभार : livehindustan & Dainikbhaskar)
आज मुस्लिम कट्टरपंथियों और इनको समर्थन देने वाले नेताओं और उनकी पार्टियों ने "सेकुलरिज्म और गंगा-जमुनी तहजीब" जैसे पाखंडी और गुमराह करने वालों नारों से देश को पागल बना बारूद के ढेर पर बैठा दिया है। इनमें कोई माई का लाल बताए कि किस मुस्लिम मुल्क में सेकुलरिज्म है? भारत में जब तक हिन्दू बहुसंख्यक है ये पाखंडी "सेकुलरिज्म" है, खुदा न खास्ता अगर भारत गजवा-ए-हिन्द बन गया इन्ही नेताओं और उनकी पार्टियों द्वारा "सेकुलरिज्म" बोलने पर मुस्लिम कट्टरपंथियों की प्रताड़ना झेलनी पड़ेगी और सिर पर हाथ रखकर रोयेंगे। देशहित में सरकार को इन पाखंडी और जनता को भ्रमित करने वाले नारों पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए। 

दूसरे, मथुरा, काशी और अन्य स्थानों पर खुदाई का विरोध क्यों किया जाता है अयोध्या के बाद अब उसका जीवित उदाहरण मध्य प्रदेश है। जहां मस्जिद की चार दीवारी बनाए जाने के लिए हो रही खुदाई में पुरुषोत्तम श्रीराम और सीता माता की मूर्ति निकली। मध्य प्रदेश को चाहिए कि मस्जिद के पूरे परिसर की खुदाई करवाए।             

मध्य प्रदेश के सागर जिले के पापेड़ गाँव में मस्जिद की चारदीवारी के लिए चल रही खुदाई के दौरान जमीन के नीचे से भगवान राम की कुछ मूर्तियाँ मिली हैं। मूर्तियाँ मिलते ही गाँव में खबर आग की तरह फैल गई। हिंदू समाज के लोग बड़ी संख्या में मौके पर पहुँचे और मूर्तियों की पूजा शुरू कर दी, साथ ही मंदिर बनाने की माँग करने लगे।

इससे हिंदू और मुस्लिम, दोनों समुदायों के बीच तनाव की स्थिति बन गई। हालात संभालने के लिए पुलिस और प्रशासन के अधिकारी मौके पर पहुँचे और फिलहाल निर्माण कार्य रुकवा दिया गया है। प्रशासन ने मूर्तियों की जाँच के लिए पुरातत्व विभाग को बुलाया है।

मस्जिद की खुदाई में मिलीं प्राचीन मूर्तियाँ

जानकारी के अनुसार, यह घटना सागर जिले की बंडा तहसील के पापेड़ गाँव की है। गाँव में बनी एक मस्जिद के परिसर में चारदीवारी बनाने के लिए खुदाई का काम चल रहा था। इसी खुदाई के दौरान जमीन के अंदर से भगवान राम और माता सीता की कुछ प्राचीन मूर्तियाँ मिली हैं। इनमें से कुछ मूर्तियाँ खंडित भी हैं। मजदूरों ने जब मूर्तियाँ मिलने की जानकारी गाँव वालों को दी, तो यह खबर तुरंत पूरे गाँव में फैल गई।

हिंदू संगठनों ने की पूजा और की मंदिर की माँग

मूर्तियाँ मिलने की सूचना मिलते ही हिंदू संगठनों और गाँव के लोग बड़ी संख्या में मौके पर पहुँच गए। उन्होंने वहाँ मिली मूर्तियों की पूजा-अर्चना शुरू कर दी। हिंदू संगठनों ने तो भगवान राम का अभिषेक करके, वहीं एक चबूतरा बनाकर मूर्तियों को स्थापित भी कर दिया। हिंदू संगठनों की माँग है कि इस जगह पर मंदिर बनाया जाए। उनका दावा है कि पहले यहाँ एक मंदिर था, जिसे तोड़कर मस्जिद बना दी गई थी।

दो समुदायों के आमने-सामने आने से बढ़ा तनाव

मंदिर बनाने की माँग को लेकर हिंदू और मुस्लिम, दोनों समुदायों के लोग आमने-सामने आ गए। इससे गाँव में माहौल तनावपूर्ण हो गया। मुस्लिम पक्ष के ग्रामीणों का कहना है कि यह जमीन करीब 200 साल पहले मस्जिद को दी गई थी। उनका यह भी कहना है कि मूर्तियाँ मस्जिद परिसर में नहीं मिली हैं, बल्कि पास में पत्थरों की खखरी (ढेर) से मिली हैं, जिन्हें बाद में परिसर में रखा गया है। दोनों पक्षों की बातों से गाँव में तनाव की स्थिति पैदा हो गई।

प्रशासन ने रुकवाया निर्माण, होगी पुरातत्व विभाग की जाँच

तनावपूर्ण स्थिति को देखते हुए तुरंत पुलिस और प्रशासन की टीम मौके पर पहुँची। अधिकारियों ने दोनों पक्षों को समझा-बुझाकर माहौल को शांत कराया। बंडा एसडीएम नवीन ठाकुर ने बताया कि फिलहाल मौके पर चल रहे निर्माण कार्य को रुकवा दिया गया है।
उन्होंने साफ किया कि यह जमीन मस्जिद के स्वामित्व की है, लेकिन जाँच पूरी होने तक कोई निर्माण नहीं होगा। मूर्तियों को पुलिस की निगरानी में रखा जाएगा और उनकी जाँच पुरातत्व विभाग से कराई जाएगी। जाँच के बाद ही यह पता चल पाएगा कि ये मूर्तियाँ कितनी पुरानी हैं और किसकी हैं।

उत्तर प्रदेश : संभल में जहाँ मिली 3 मंजिला बावड़ी, वह कभी हिंदू बहुल इलाका था: रानी की पोती आई सामने, बताया- हमारा बचपन यहीं बीता, बदायूँ के अनेजा ने प्लॉट काट मुस्लिमों को बेच दिए

राजकुमारी शिप्रा और रानी की बावड़ी (साभार: भास्कर)
उत्तर प्रदेश स्थित संभल जिले के चंदौसी क्षेत्र में राजस्व विभाग ने एक प्राचीन बावड़ी को भी खोज निकाला है। इसे ‘रानी की बावड़ी’ कहा जा रहा है। इसकी साफ-सफाई का काम जोर-शोर से जारी है। चंदौसी नगरपालिका की सफाई एवं खाद्य निरीक्षक प्रियंका सिंह का कहना है कि यहाँ खुदाई मैन्युअली की जा रही है। 40-50 मजदूर काम कर रहे हैं।

प्रियंका सिंह का कहना है कि ये बावड़ी है और इसकी खुदाई में किसी प्रकार की हानि ना हो इसलिए मशीनों का प्रयोग नहीं किया जा रहा है। खुदाई का ये काम चंदौसी के लक्ष्मणगंज इलाके में हो रहा है। साल 1857 तक ये क्षेत्र हिन्दू बहुल हुआ करता था। हालाँकि, हिंदुओं के पलायन के बाद इस बावड़ी पर कब्जा कर लिया गया और उसे भर दिया गया।

दरअसल, इस जगह की खुदाई की माँग को लेकर संभल के जिलाधिकारी को एक प्रार्थना पत्र मिला था। प्रार्थना पत्र में लक्ष्मणगंज के अंदर बिलारी की रानी की प्रचीन बावड़ी होने का दावा किया गया था। इसी शिकायत का संज्ञान लेकर राजस्व विभाग की टीम लक्ष्मणगंज पहुँची थी। बस्ती के बीच में एक जगह चिन्हित कर के खुदाई शुरू हुई। कुछ ही देर बाद जमीन के नीचे प्राचीन इमारतें मिलनी शुरू हो गईं। 

रामपुर से सटे सहसपुर-बिलारी राजपरिवार द्वारा इसे बनवाया गया था। रानी की बावड़ी की खुदाई के बाद से यहाँ तीन मंजिला बावड़ी मिली है। वहीं, यहाँ रानी रहीं सुरेंद्र बाला की पोती राजकुमारी शिप्रा बाला ने बताया कि यह इलाका पहले हिंदू बहुल था। बाद में इस राजपरिवार के कई हिस्सेदार होने के बाद यहाँ की जमीनों को बदायूँ के अनेजा को बेच दिया। अनेजा ने इसकी प्लॉटिंग करके मुस्लिमों के बेच दिया।

राजकुमारी शिप्रा ने बताया, “यह दादी सुरेंद्र बाला और बाबा जगदीश कुमार की संपत्ति है। उनके बेटे लल्ला बाबू विष्णु कुमार की पाँच बेटियों में मैं सबसे छोटी हूँ। यहाँ हमारा पुश्तैनी फार्म हाउस था। फार्म हाउस में गन्ने की खेती हुआ करती थी। हम लोगों के लिए यहाँ एक कुआँ भी था। हम लोग यहाँ मम्मी-पापा के साथ पिकनिक मनाते थे। हमारा बचपन यहीं बीता है। यहाँ पर कोठी से जुड़ा हुआ लक्ष्मणगंज है।”

शिप्रा बाला का कहना है कि कोई भाई नहीं था। बकौल राजकुमारी, “अकेला आदमी अपनी संपत्ति पर ध्यान नहीं दे पाता है। इसके कारण लोग उसकी जमीन हथियाना शुरू कर देते हैं।” यही हाल परिवार से जुड़ी जमीनों का भी यही हुआ। ये मामला सहसपुर राजपरिवार से जुड़ा हुआ है। 1857 के सिपाही विद्रोह के समय सहसपुर की रानी अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में इसे छावनी के तौर पर इस्तेमाल करती थीं।

स्थानीय लोगों के अनुसार, यह बावड़ी बिलारी के राजा के नाना (सहसपुर के राजा) के समय की है। इसमें एक कूप और 4 कमरे हैं। बावड़ी के अंदर का दृश्य मंदिर जैसा दिखाई देता है। इसके अंदर एक सुरंग भी है। लगभग 150 साल पुरानी इस बावड़ी का प्रयोग पानी जमा करने और सैनिकों के आराम करने के लिए किया जाता था। इसके सिर्फ 150 मीटर दूर इलाके का सबसे प्रसिद्ध क्षेमनाथ तीर्थ मंदिर भी है।

यह बावड़ी करीब 10-12 मीटर लंबी और 28 फीट गहरी बताई जा रही है। संभल के डीएम राजेंद्र पैंसिया ने बताया कि इस बावड़ी में नीचे के दो मंजिल मार्बल के हैं और सबसे ऊपर का मंजिल ईंटों का बना है। उन्होंने बताया कि यह 400 वर्गमीटर क्षेत्र में फैला है। वर्तमान में 210 वर्गमीटर ही है और बाकी हिस्सों पर कब्जा किया गया है। जिलाधिकारी ने बताया कि जल्द ही उन्हें भी खाली करा लिया जाएगा।

उत्तर प्रदेश : जिस संभल में हिंदुओं को बना दिया अल्पसंख्यक, वहाँ की जमीन उगल रही इतिहास: मंदिर-प्राचीन कुओं के बाद मिली ‘रानी की बावड़ी’, दफन थी प्राचीन इमारत-सुरंग

       संभल के लक्ष्मण गंज में खुदाई के दौरान मिली हिन्दू धर्म से जुडी एतिहासिक धरोहरें (चित्र साभार- आज तक)
उत्तर प्रदेश के संभल जिले में बंद पड़े मंदिरों के अलावा खुदाई के दौरान एक अन्य ऐतिहासिक धरोहर निकल कर सामने आई है। इसी जिले के चंदौसी क्षेत्र में राजस्व विभाग ने एक प्राचीन बावड़ी को भी खोज निकाला है। काफी बड़ी संरचना वाली इस बावड़ी को मिट्टी से दफन कर दिया गया था। फ़िलहाल प्रशासन द्वारा खुदाई का काम जारी है। माना जा रहा है कि अभी यहाँ पर सुरंग भी मिल सकती है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक खुदाई का ये काम चंदौसी के लक्ष्मणगंज इलाके में हो रहा है। साल 1857 तक ये क्षेत्र हिन्दू बहुल हुआ करता था। यहाँ सैनी बहुतायत हुआ करते थे। वर्तमान में यह जगह मुस्लिम बहुल हो चुकी है। इस जगह की खुदाई की माँग को लेकर संभल के जिलाधिकारी को एक प्रार्थना पत्र मिला था। प्रार्थना पत्र में लक्ष्मणगंज के अंदर रानी बिलारी की प्रचीन बावड़ी होने का दावा किया गया था। इसी शिकायत का संज्ञान लेकर राजस्व विभाग की टीम लक्ष्मण गंज पहुँची थी।

बस्ती के बीच में एक जगह चिन्हित कर के खुदाई शुरू हुई। कुछ ही देर बाद जमीन के नीचे प्राचीन इमारतें मिलनी शुरू हो गईं। मीडिया से बात करते हुए राजस्व विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि नीचे 2 मंजिला इमारत दबी हुई है। यहाँ मौजूद बावड़ी और विशाल कुआँ सरकारी अभिलेखों में भी दर्ज है। बावड़ी की गहराई लगभग 250 फ़ीट बताई जा रही है। प्रशासन के पास नक्शा भी मौजूद है। आगे की खुदाई नक्शे के आधार पर की जाएगी। खुदाई का काम अभी भी जारी है। इसके विजुअल सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं।

इस बीच भारतीय पुरातत्व विभाग (ASI) की टीम संभल पहुँच कर काम पर लग गई है। टीम ने यहाँ कल्कि मंदिर से अपनी जाँच पड़ताल शुरू की। इसके अलावा ASI 5 अलग-अलग जगहों पर भी सर्वे के लिए पहुँची। इन जगहों में 5 तीर्थ और 19 कुएँ शामिल हैं। इन कुओं में कल्कि मंदिर में मौजूद अति प्राचीन कृष्ण कूप भी शामिल है। शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए ASI के इस दौरे को हर संभव गुप्त ही रखने की कोशिश की गई थी।

संभल में दंगों का पुराना इतिहास रहा है। इन्हीं दंगों के बल पर संभल नगरपालिका क्षेत्र से धीरे-धीरे हिंदुओं को मिटाया गया। देश की स्वतंत्रता के समय संभल नगरपालिका क्षेत्र में हिंदुओं की आबादी 45 प्रतिशत थी जो आज घटकर 15-20% रह गई है। उस समय मुस्लिम 55% थे। आज वे बढ़कर 80-85 प्रतिशत हो गए हैं।

दिल्ली : पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ का पता लगाने में जुटेगी ASI, पुराने किले की 6वीं बार होगी खुदाई: रिपोर्ट में दावा- 2500 साल पुराने मिल चुके हैं अवशेष

                                        दिल्ली स्थित पुराना किला (साभार: गाँव कनेक्शन)
कहा जाता है कि भारत की राजधानी दिल्ली ही वह जगह है, जहाँ महाभारत कालीन इंद्रप्रस्थ स्थित था। इसके साक्ष्य जुटाने के लिए समय-समय पर प्रयास होते रहे हैं। अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इंद्रप्रस्थ को खोज निकालने के लिए अंतिम प्रयास के तहत खुदाई का काम शुरू करने जा रहा है। यह खुदाई दिल्ली के पुराना किला में किया जाएगा। इसे पांडवों का किला माना जाता है।

पुराना किला की इससे पहले भी खुदाई हो चुकी है। 15 अगस्त 1947 में देश की आजादी के बाद से इस किले की पाँच बार खुदाई हो चुकी है। यह छठी बार खुदाई होगी। पिछली खुदाई में यहाँ से भगवान विष्‍णु, गणेश और लक्ष्‍मी की मूर्तियों के साथ-साथ मौर्यकाल से लेकर विभिन्न कालों के अवशेष मिल चुके हैं। यहाँ मिले अवशेष लगभग 2500 वर्ष तक पुराने हैं।

 दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, अंतिम प्रयास के तहत इस किले की खुदाई अगले महीने से शुरू हो सकती है। भारत सरकार के सुझाव के बाद इस बार खुदाई में अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किए जाने की उम्मीद है। नवीनतम तकनीक के तहत उत्खनन से पहले ASI लिडार सर्वेक्षण की योजना बना रहा है। इसके माध्यम से जमीन के अंदर दबे अवशेषों के बारे में पता लगाया जाता है।

इसकी जिम्मेदारी ASI के वरिष्ठ अधिकारी वसंत स्वर्णकार के हाथ में दी गई है। वे पुराना किला की तीन बार खुदाई करा चुके हैं। पहले हाे चुकी खोदाई में काफी कुछ मिला है। हालाँकि, इससे पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ पुराना किला में थी, इसकी स्पष्ट सबूत नहीं मिले हैं। शास्त्रों के तहत दी जानकारी के बारे में पुराना किला ही वह स्थान है, जहाँ पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ होने की बात प्रतीत होती है।

कहा जाता है कि पांडवों ने ईसा पूर्व 1400 वर्ष सबसे पहले दिल्ली को अपनी राजधानी इन्द्रप्रस्थ के रूप में बसाया था। ASI के अधिकारिक रेकॉर्ड के अनुसार, शेरशाह सूरी (1538-45) ने दीनपनाह नगर में तोड़फोड़ पुराना किला बनाने का काम शुरू किया था, लेकिन वह बनवा नहीं पाया। इसे मुगल हुमायूँ मुगल ने पूरा करवाया। उस दौरान यह किला यमुना नदी के किनारे था।

साल 1954-55 में पहली बार यहाँ पर खुदाई ASI के पूर्व महानिदेशक प्रोफेसर बीबी लाल की देखरेख में कराई गई थी। इसके बाद यह खुदाई 1969-1973 में कराई गई। इसके 41 साल बाद 2013-14 में, फिर 2017-2018 में और आखिर में 2022-23 में यहाँ खुदाई हुई। हर बार की खुदाई में यहाँ कई प्रकार के अवशेष मिले हैं। यह व्यापार का केंद्र भी रहा है। इसके भी अवशेष मिले हैं।

अब तक खुदाई में यहाँ टेराकोटा के खिलौने और भूरे रंग के चित्रित मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े मिले। ये बर्तन ईसा से 1000 वर्ष पूर्व के हैं। ऐसे प्रमाण वाले बर्तन महाभारत से संबंधित अनेक स्थलों पर पाए जा चुके हैं। इनका काल 1000 ईसा पूर्व निर्धारित किया गया था। इसके अलावा 2500 वर्ष पुराने अवशेषों में चूड़ी, सिक्के, राजमुद्रा, पानी निकासी के लिए नालियाँ समेत कई चीजें मिली हैं।

हालाँकि, अब तक की खुदाई में यहाँ कोई स्ट्रक्चर नहीं मिला है। लेकिन साल 2023 में हुई खुदाई में यहाँ से मौर्य काल, शुंग काल, कुषाण काल, गुप्त गुप्त, राजपूत काल, सल्तनत काल और फिर मुगल काल के अवशेष मिलते रहे हैं। इनमें मौर्यकालीन कुआँ मिला है, जो करीब 2,000 साल पुराना पुराना बताया जाता है। गुप्त काल के घरों की निशानी भी यहाँ मिली।

पांडवों की इस राजधानी का पता लगाने के लिए पुराना किला के अलावा, अन्य कई जगहों पर खुदाई हो चुकी है। हालाँकि, साल 1955 में पुराने किले के दक्षिण-पूर्वी भाग में हुई खुदाई में मिट्टी के पात्रों के टुकड़े पाए गए जो कि महाभारत काल की वस्तुओं से मेल खाते हैं। हालाँकि, ASI अभी भी एक मजबूत प्रमाण की तलाश कर रही है, जिसको लेकर बार-बार खुदाई कराई जा रही है।

दिल्ली के लालकोट और किला राय पिथौरागढ़ किले की साल 1957-58 में, लालकोट किले की 1958-60 में, मकदूम साहेब दरगाह की साल 1973-74 में, सीरी फोर्ट की साल 1976-77 में, सीरी फोर्ट दीवार की 2003 में, लाल काेट और अनंगताल किले की 1992 से 95 में, सलीमगढ़ किला की साल 2007-8 में और तुगलकाबाद किला की साल 2000-2005 में खुदाई हो चुकी है।

उत्तर प्रदेश : 13 साल की पूजा ठाकुर के सपने में आते थे भगवान कृष्ण, बताई हुई मजार के पास हुई खुदाई तो मिली प्राचीन मूर्ति

                                    पूजा ठाकुर और साथ में मिली हुई प्राचीन प्रतिमा (साभार: जागरण)
उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर के एक गाँव में चमत्कार की एक अद्भुत घटना सामने आई है। इस गाँव की 13 साल की एक लड़की को सपने में भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन हुए। उसने अपने परिजनों को बताया कि एक जगह पर भगवान की मूर्ति दबी हुई है। जब परिजनों ने उस जगह पर खुदाई की तो भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा बरामद हुई। इस घटना के बाद लड़की की हर तरफ चर्चा हो रही है।

दरअसल, जिले के निगोही थाना क्षेत्र अंतर्गत आने वाले सफोरा गाँव के विनोद सिंह की 13 साल की एक बेटी है। उसका नाम पूजा ठाकुर है। पूजा ने परिजनों को बताया कि उसके सपने में भगवान श्रीकृष्‍ण आए और उन्होंने बताया कि गाँव की नहर के पास एक दरगाह के करीब मूर्ति जमीन में है। हालाँकि, परिजनों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। इसके बाद पूजा ने 10 दिनों तक खाना-पीना छोड़ दिया।

आखिरकार परिजनों को पूजा की बात माननी ही पड़ी। पूजा की बात पर विश्वास करके उसके पिता विनोद सिंह अन्य ग्रामीणों के साथ दरगाह के पास पहुँच गए। पूजा भी साथ थी। उसने त्रिशूल से उस जगह के पास लाइन खींची, जहाँ सपने में उसने मूर्ति देखी थी। यह जगह दरगाह से 30 मीटर दूर है। वहाँ पर पूजा-अर्चना करने के बाद खोदाई शुरू की गई। इस दौरान गाँव के अन्य लोग भी इकट्ठा हो गए।

सूचना पर दरगाह के केयर टेकर मोहम्मद आमिर उर्फ गुड्डू मियाँ भी पहुँच गए। आमिर ने इसका विरोध शुरू कर दिया। बहुत देर तक दोनों पक्षों में नोक-झोंक होती रही। इस दौरान खोदाई का काम चलता रहा। लगभग 3 फीट खोदाई करने पर 1 फीट की एक प्राचीन मूर्ति मिली। विनोद सिंह उस मूर्ति को स्थापित करने के लिए अपने साथ लेकर चले गए। सोशल मीडिया पर इसका वीडियो भी सामने आया है।

उन्होंने दरगाह से लगभग 2.5 किलोमीटर दूर पर अपने खेत में स्थापित कर दिया। इसके बाद लोगों ने मूर्ति की पूजा-पाठ शुरू कर दी। स्थानीय लोग सपना देखने वाली किशोरी को भी देवी मानकर उसकी पूजा कर रहे हैं। फिलहाल श्रीकृष्ण की प्राचीन मूर्ति और देवी रूपी किशोरी को देखने के लिए गांव में श्रद्धालु दूर-दूर से पहुँच रहे हैं। शनिवार (17 फरवरी 2024) को वहाँ भंडारे का भी आयोजन किया।

पूजा ठाकुर का कहना है कि वह पिछले एक साल से सपना देख रही है कि गाँव से एक किलोमीटर दूर खेत में भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति गड़ी हुई है। कक्षा 8 में पढ़ने वाली पूजा ने अपने परिवार वालों को बताया कि वो मूर्ति के जमीन में दबे होने का सपना देख रही है और भगवान कृष्ण उसे अपने पास बुला रहे हैं। इस बात पर परिवार वालों ने उसका मजाक बनाया और बात को टाल दिया।

अब मूर्ति निकलने के बाद लोग इसे चमत्कार मान रहे हैं। वहीं, दूसरे-दूसरे जिलों के लोग भी मूर्ति और पूजा को देखने के लिए आ रहे हैं। वहीं, सुरक्षा को देखते हुए पुलिस बल को भी तैनात कर दिया गया है। उप जिलाधिकारी अंजलि गंगवार का कहना है कि क्षेत्र में प्रतिमा निकलने की जानकारी मिली है। राजस्व टीम को मौके पर भेजकर प्रतिमा के पुरातत्व महत्व का परीक्षण कराया जाएगा।

एसएस कॉलेज के इतिहास विभाग के अध्यक्ष विकास खुराना का कहना है कि ताम्र निर्मित यह प्रतिमा गुप्त काल की लग रही है। सातवीं शताब्दी के दौरान इस तरह की मूर्तियाँ मिली थीं। उन्होंने कहा कि पुरातत्व जाँच में सब स्पष्ट हो जाएगा। परिजनों का कहना है कि पूजा का भगवान कृष्ण में अपार श्रद्धा है। वह पूजा-पाठ के बाद ही अन्न-जल ग्रहण करती है और उसके बाद स्कूल जाती है।