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स्वीडन : ‘मस्जिदों को कर दो ध्वस्त, इस्लाम से लड़ने का यही उपाय’: घुसपैठियों पर भी बरसे जिम्मी अकेस्सन, सत्ताधारी नेता

                                   एक टूटी मस्जिद और जिम्मी अक्केसन (चित्र साभार: India TV & SVT)
स्वीडन के दक्षिणपंथी नेता जिम्मी अकेस्सन ने कहा है कि पुलिस को उन मस्जिदों में खोज अभियान चलाना चाहिए और उन मस्जिदों को ध्वस्त कर देना चाहिए जहाँ लोकतंत्र विरोधी बातें की जा रही है। उनके इस बयान का देश के प्रधानमंत्री उल्फ़ क्रिस्टरसन ने विरोध किया है।

जिम्मी अकेस्सन का कहना है कि मस्जिदों को तोड़ना और उनमें खोज अभियान के जरिए ही बढ़ते इस्लामीकरण से लड़ा जा सकता है। जिम्मी अकेस्सन का कहना है कि नई मस्जिदों को बनाने की अनुमति बिल्कुल भी नहीं दी जानी चाहिए। उनका यह भी कहना है कि देश में बाहर से आने वाले अवैध घुसपैठियों को मस्जिदें बनाने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए।

अकेस्सन ने कहा, “हमारे लिए यह आवश्यक है कि हम न मस्जिदों को तोड़ना और सीज करना चालू करें जहाँ से सर्वाधिक लोकतंत्र-विरोधी, स्वीडन-विरोधी, सेमेटिक विरोधी, होमोफोबिक-विरोधी और स्वीडिश समाज विरोधी प्रोपेगंडा निकलता है।”

जिम्मी अकेस्सन स्वीडन की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी स्वीडन डेमोक्रेट के नेता हैं। वह सरकार के साथ गठबंधन में भी शामिल हैं। उनकी पार्टी के पास स्वीडन की संसद रिक्स्दाग में 72 सीटें हैं। उनके बयान का स्वीडन के प्रधानमंत्री उल्फ़ क्रिस्टरसन ने विरोध किया है।

प्रधानमंत्री उल्फ़ क्रिस्टरसन ने कहा है कि अकेस्सन का ‘असम्माननीय’ है। उल्फ़ क्रिस्टरसन ने कहा है कि स्वीडन के अंदर हम इबादतगाहों को गिराते नहीं हैं। उन्होंने कहा कि जो अकेस्सन ने कहा है वह स्वीडिश मूल्यों का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। उन्होंने कहा है कि हमें कट्टरपंथ से लड़ना चाहिए लेकिन लोकतांत्रिक फ्रेमवर्क में रहकर लड़ना चाहिए।

प्रधानमंत्री अकेस्सन ने इस बात पर भी चिंता जताई है कि ये हमारे NATO में शामिल होने के मौके भी कम करता है। गौरतलब है कि स्वीडन NATO में शामिल होना चाहता है लेकिन तुर्की उसे समर्थन नहीं दे रहा है। तुर्की का कहना है कि स्वीडन में इस्लामोफोबिया बढ़ रहा है इसलिए हम उसका समर्थन नहीं करेंगे। स्वीडन में इससे पहले कुरान जलाने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं।

नीदरलैंड : नुपूर शर्मा के ‘हमदर्द’ गीर्ट वाइल्डर्स के प्रधानमंत्री बनने की प्रबल संभावनाएं

नुपुर शर्मा का समर्थन कर चुके गीर्ट वाइल्डर्स के नीदरलैंड के पीएम बनने के आसार (फोटो साभार: Britannica/ABP)
यूरोपीय देश नीदरलैंड के चुनाव नतीजों ने बीजेपी की पूर्व प्रवक्ता नुपुर शर्मा (Nupur Sharma) को चर्चा में ला दिया है। वजह हैं गीर्ट वाइल्डर्स (Geert Wilders)। वाइल्डर्स की पहचान एक ऐसे नेता के तौर पर है जो इस्लामी कट्टरपंथ के खिलाफ मुखर हैं।

बीते साल जब ‘ऑल्ट न्यूज’ के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर ने नूपुर शर्मा को टारगेट किया था, तब वाइल्डर्स ने बीजेपी की इस पूर्व नेता का समर्थन किया था। जुबैर के उकसावे के बाद से नुपुर शर्मा को जिहादी हत्या की धमकी दे रहे हैं। वे सार्वजनिक जीवन से दूर रहने को मजबूर हैं।

हालिया चुनावों के बाद गीर्ट वाइल्डर्स के नीदरलैंड के प्रधानमंत्री बनने के आसार हैं। दक्षिणपंथी वाइल्डर्स की पार्टी को एग्जिट पोल में सर्वाधिक सीट मिलती दिख रही है। 22 नवम्बर 2023 को नीदरलैंड के आम चुनावों के लिए सामने आए एग्जिट पोल में यह स्पष्ट हो गया है कि वाइल्डर्स की कंजर्वेटिव पार्टी फॉर फ्रीडम (PVV) सर्वाधिक 35 सीटें जीतने की ओर है। उनकी पार्टी नीदरलैंड में इस्लाम के प्रसार के विरुद्ध रही है। ऐसे में इन नतीजों का पूरे यूरोप पर प्रभाव पड़ने की संभावना है।

PVV नीदरलैंड में मस्जिदों, कुरान और हिजाब पर प्रतिबंध लगाने की माँग करती रही है। अब 150 सीटों वाली नीदरलैंड की संसद में यह सबसे अधिक सीटों वाला दल बनने की और अग्रसर है। उनकी पार्टी को यूरोप के अन्य दक्षिणपंथी नेताओं और पार्टियों की तरफ से बधाई मिल रही है।

PVV सरकार बनाने में सबसे आगे होगी। सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी। उसे 35 सीटें मिल सकती हैं। यह 2021 के मुकाबले दोगुनी है। हालाँकि, स्पष्ट बहुमत ना होने के कारण उसे अन्य पार्टियों के साथ गठबंधन करना होगा। लेकिन इस बात की पूरी संभावना है कि गठबंधन का नेतृत्व करते हुए गीर्ट वाइल्डर्स प्रधानमंत्री बनेंगे। इस पूरी प्रक्रिया में अभी 8-10 महीने का समय लगने की संभावना है।

कौन हैं गीर्ट वाइल्डर्स?

गीर्ट वाइल्डर्स एक दक्षिणपंथी डच नेता हैं। वह अपने इस्लाम विरोधी रुख के लिए जाने जाते हैं। वह वर्ष 2004 के बाद से लगातार पुलिस सुरक्षा में रहते हैं। उनके एक बार मोरक्को के लोगों को कूड़ा बोलने पर काफी विवाद हुआ था।
वाइल्डर्स पिछले ढाई दशकों से नीदरलैंड की राजनीति में सक्रिय हैं, वह 1998 के बाद से डच संसद में हैं। उनका ताल्लुक एक सामान्य माध्यम वर्गीय परिवार से है। वह 1981 से 1983 के बीच इजरायल में भी रहे हैं। इस दौरान उन्होंने मध्य एशियाई देशों की यात्रा की, जिस दौरान उनके इस्लाम विरोधी विचार बने।
वाइल्डर्स को अवैध प्रवासियों के प्रति उनके कठोर रवैए और डच हितों को सबसे आगे रखने के लिए जाना जाता है। उन्होंने जुलाई 2022 में भाजपा की पूर्व प्रवक्ता नुपुर शर्मा और बांग्लादेशियों का मुद्दा भी डच संसद में उठाया था। उन्होंने अक्टूबर 2022 में भी नुपुर शर्मा के समर्थन में ट्वीट किया था।
गीर्ट वाइल्डर्स ने हिन्दुओं से सहिष्णुता छोड़ने का अपील भी की थी।
डच सांसद ने भारत में हिंदुओं पर हमले की घटनाओं का भी जिक्र किया था। उन्होंने नूपुर शर्मा का समर्थन करने पर इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा एक हिंदू दर्जी (कन्हैया लाल) का सिर कलम करने की घटना पर भी प्रकाश डाला था।
बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा पर भी वे सवाल उठा चुके हैं। उन्होंने विदेश मंत्रालय से बांग्लादेश में हिंदू घरों, पूजा स्थलों और दुकानों में आग लगानी वाली घटना पर विचार करने को कहा था। मालूम हो कि 15 जुलाई 2022 को बांग्लादेश में लोहागारा के सहपारा इलाके में कट्टरपंथी मुस्लिमों की भीड़ ने हिन्दुओं के एक मंदिर, किराने की दुकान और कई घरों को तोड़ दिया था।

स्पेन : कट्टरपंथ फैला रहे 14 पाकिस्तानियों को पुलिस ने पकड़ा, जिहादी नेटवर्क का खुलासा; धर्म परिवर्तन का रैकेट

                                                                                                                           प्रतीकात्मक: NYT
स्पेन पुलिस ने आतंक पर कार्रवाई करते हुए 14 पाकिस्तानियों को गिरफ्तार किया है। इन सभी को हमास के हमले से बढ़ाई गई सतर्कता के बाद गिरफ्तार किया गया है। आरोप है कि यह सभी स्पेन में एक बड़ा जिहादी नेटवर्क चला रहे थे।

जानकारी के अनुसार, यह सभी पाकिस्तानी आतंकी तहरीक-ए-लब्बैक से जुड़े हुए हैं। यह पार्टी पाकिस्तान में पूर्णतः शरिया लागू करने की माँग करती रहती है। इस पार्टी ने बीते कुछ समय में कई बड़े हिंसक प्रदर्शन भी किए हैं।

जानकारी के मुताबिक, ये सारे पाकिस्तानी स्पेन के राज्य कैटालूनिया, वालेंसिया, लोग्रोनो और विटोरिया जैसे राज्यों में रह रहे थे। यह जानकारी सामने आई है कि इन सभी आतंकियों ने एक ऐसा नेटवर्क तैयार किया है जिससे कट्टरपंथी विचारधारा का प्रसार किया जाता था। यह लोग ऐसा मैटेरियल प्रसारित करते थे जिससे अन्य लोगों को कट्टरपंथी बनाया जा सके।

अब इन्हें कोर्ट में पेश किया जाएगा, अभी इनसे पूछताछ चल रही है। हमास के हमले के बाद स्पेन समेत तमाम यूरोपियन देशों में आतंकी खतरे को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की जा रही है और जिहादियों पर कार्रवाई हो रही है। स्पेन के सबसे बड़े अखबार यूरो वीकली ने बताया है कि यह पाकिस्तानी धर्म परिवर्तन का रैकेट भी चला रहे थे।

पिछले महीने स्पेन की पुलिस ने कार्रवाई करके 4 संदिग्धों को पकड़ा था। इसमें से एक ऐसा शख्स सामने आया था जो कई ऐसे ही नेटवर्क को चला रहा था। इस आतंकी ने अपना नाम खलीफा रखा हुआ था। गिरफ्तार किए लोगों में एक दम्पति भी था जो कि इसी माध्यम से मिले थे।

एक जानकारी के अनुसार, स्पेन में लगभग 1 लाख पाकिस्तानी रहते हैं। इनमें से आधे से ज्यादा कैतालूनिया राज्य में रहते हैं। इनमें से अधिकतर वो लोग हैं जो रोजगार की तलाश में पाकिस्तान पहुँचे हैं। इनमें से बड़ी संख्या पाकिस्तानियों की भी है जो अवैध रूप से यूरोप पहुँचे है। बीते कुछ वर्षों में स्पेन में पाकिस्तानियों के प्रति लोगों में संदेह की भावना बढ़ी है।

आइसलैंड : प्रधानमंत्री हड़ताल पर, कामकाज किया बंद: लैंगिक समानता की माँग और घरेलू हिंसा के विरोध में आईं महिलाएँ

                                                                                                                                       साभार 
उत्तर-पश्चिम यूरोप का एक छोटा-सा देश है आइसलैंड। इस देश की जनसंख्या महज 3.80 लाख है। मंगलवार (24 अक्टूबर 2023) को इस देश में कामकाज ठप हो गया। दरअसल, हजारों औरतों के साथ देश की प्रधानमंत्री कैतरीना कोस्तोत्रई (Katrín Jakobsdóttir) भी हड़ताल पर चली गईं।

इस मुल्क की नारी शक्ति का ये विरोध यहाँ मर्दों और औरतों के वेतन में असमानता और लैंगिक हिंसा को लेकर था। कोस्तोत्रई दुनिया में हड़ताल पर जाने वाली किसी देश की पहली प्रधानमंत्री कही जा सकती हैं।

पीएम कोस्तोत्रई ने पहले ही आइसलैंड की मीडिया को बताया था कि ‘क्या आप इसे समानता कहते हैं?’ स्लोगन वाली हड़ताल के तहत काम पर नहीं जाने का प्लान बनाया था। इसके साथ ही मंगलवार को ‘वीमेन्स डे ऑफ’ के दिन देश की हजारों महिलाओं के साथ पीएम भी इस हड़ताल में शामिल हो गईं।

इसे लेकर पीएम कोस्तोत्रई ने कहा, “मैं इस दिन काम नहीं करूँगी और मुझे उम्मीद है कि सभी महिलाएँ (कैबिनेट में) भी ऐसा ही करेंगी। मैंने कल कैबिनेट की बैठक नहीं करने का फैसला किया है। आइसलैंड की संसद में केवल पुरुष मंत्री सवालों का जवाब देंगे। हम इस तरह से एकजुटता दिखाते हैं।”

हड़ताल के आयोजकों ने अभियान की आधिकारिक वेबसाइट पर कहा है, “24 अक्टूबर को आइसलैंड में आप्रवासी सहित सभी महिलाओं को भुगतान और अवैतनिक (घरेलू कामों सहित) दोनों तरह के काम बंद करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। पूरे दिन महिलाएँ समाज में अपने योगदान के अहमियत को दिखाने के लिए हड़ताल करेंगी।”

दरअसल, इस देश में स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रही महिलाओं को वेतन में असमानता को लेकर रोष है। इस वजह से महिलाओं ने ‘वीमेन्स डे ऑफ’ के दिन केवल बाहर का ही नहीं, बल्कि घर का काम भी नहीं किया। स्टाफ की कमी के कारण आइसलैंड के स्कूल-अस्पताल, ट्रांसपोर्ट आदि बुरी तरह प्रभावित रहे।

ये तब है, जब यह देश लैंगिक समानता के मामले में बीते 14 सालों से टॉप पर है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मुताबिक, वेतन सहित अन्य कारकों में आइसलैंड के मुकाबले अन्य किसी भी देश ने समानता हासिल नहीं की है। फोरम ने इस देश को 91.2 फीसदी का स्कोर दिया है। इस देश को ‘फैमिनिस्ट हेवन’ के नाम से भी जाना जाता है।

कोस्तोत्रई ने 19 अक्टूबर 2023 के एक ट्वीट में कहा था, “हमें लैंगिक वेतन के अंतर को कम करने और लैंगिक समानता तक पहुँचने के लिए महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने की जरूरत है। हमें ऐसी परिस्थितियों वाले समाज की जरूरत है, जहाँ बेहतरीन खुशहाली, माता-पिता की छुट्टी, डे-केयर और एक संस्कृति में बदलाव संभव हो।”

इस देश में ये पहली बार नहीं है, जब ‘वीमेन्स डे ऑफ’ मनाया गया। यहाँ ये दिन लगभग 50 साल पहले यानी 1975 में हुई पहली बार हड़ताल के बाद आया है। तब आइसलैंड की 90 फीसदी महिलाओं ने केवेनफ्री यानी वीमेन्स डे ऑफ के हिस्से के तौर पर काम करने से इनकार कर दिया था। इस हड़ताल के कारण आइसलैंड में अहम बदलाव हुए।

आइसलैंड में जो प्रमुख बदलाव हुए, उनमें दुनिया के किसी देश की पहली महिला राष्ट्रपति का चुनाव भी शामिल है। साल 1975 के बाद इस हड़ताल को 1985, 2005, 2010, 2016 और 2018 में दोहराया गया है। 1975 की हड़ताल में भाग लेने वालों में से कुछ ने इस हड़ताल को आयोजित करने में मदद की। उनका मानना है कि मकसद पूरा नहीं हुआ है।

इसे लेकर आइसलैंडिक फेडरेशन फॉर पब्लिक वर्कर्स के हड़ताल आयोजक फ़्रीजा ने कहा, “हम इस बात की तरफ ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं कि हमें समानता का स्वर्ग कहा जाता है, लेकिन अभी भी लैंगिक असमानताएँ हैं। कार्रवाई की तत्काल जरूरत है। स्वास्थ्य सेवाओं और बच्चों की देखभाल जैसी महिलाओँ के नेतृत्व वाले काम को अभी भी कम अहमियत दी जाती है और बहुत कम भुगतान किया जाता है।”

आइसलैंड के सांख्यिकी विभाग ने कहा है कि वहाँ कुछ नौकरियों में औरतें अभी भी अपने पुरुष सहकर्मियों के मुकाबले कम-से-कम 20 फीसदी कम कमाती हैं। वहीं आइसलैंड विश्वविद्यालय की एक स्टडी में खुलासा हुआ है कि यहाँ की 40 फीसदी औरतों को अपने जीवनकाल में लिंग-आधारित और यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है।

स्वीडन : अब 50 साल की महिला ने माँगी कुरान जलाने की इजाजत, इजरायली दूतावास के बाहर बाइबिल और टोरा जलाने के लिए भी आवेदन

स्वीडन में स्टॉकहोम की मस्जिद के सामने बकरीद पर कुरान जलाने के एक सप्ताह बाद फिर से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर प्रदर्शन की अनुमति माँगी गई है। कथित फ्री-स्पीच कार्यकर्ताओं ने यहूदियों की धार्मिक पुस्तक टोरा और ईसाइयों की धार्मिक पुस्तक बाइबिल को भी  जलाने की अनुमति के लिए पुलिस के समक्ष तीन आवेदन दिए हैं।

स्थानीय पुलिस ने बुधवार (5 जुलाई 2023) को स्वीडन के सरकारी ब्रॉडकास्टर को बताया कि उसे 30 साल के एक व्यक्ति ने 15 जुलाई को स्टॉकहोम में इज़राइल के दूतावास के बाहर यहूदी और ईसाई धर्मग्रंथों को जलाने का आवेदन प्राप्त हुआ था। यह प्रदर्शन ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की प्रतीकात्मक सभा’ के रूप में आयोजित करने के बारे में बताया गया।

पुलिस ने बताया कि स्टॉकहोम में कुरान को ‘जल्दी-से-जल्दी’ जलाने का एक और अनुरोध 50 वर्ष की एक महिला द्वारा किया गया है। पुलिस का कहना है कि उसने किसी भी अनुरोध को तुरंत खारिज नहीं किया। पुलिस का कहना है कि प्रत्येक आवेदन की व्यक्तिगत आधार पर समीक्षा की जाती है।

स्वीडन में इज़राइल के राजदूत ज़िव नेवो कुलमन ने इस पर अनुरोध पर निराशा व्यक्त किया है। उन्होंने ट्वीट किया, “मैं स्वीडन में और अधिक पुस्तकों को जलाने की आशंका से स्तब्ध और भयभीत हूँ। चाहे वह कुरान हो, टोरा हो या कोई अन्य पवित्र पुस्तक हो। यह स्पष्ट रूप से घृणा का कार्य है, जिसे रोका जाना चाहिए।”

स्वीडन के स्टॉकहोम शहर की सबसे बड़ी मस्जिद के बाहर कुरान जलाया गया था। प्रदर्शन इराकी मूल का था। उसने प्रदर्शन के लिए पुलिस से इजाजत माँगी थी, लेकिन पुलिस ने इजाजत नहीं दी। इसके बाद वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला देते कोर्ट से इजाजत माँगी गई और कोर्ट ने इसकी इजाजत दे दी।

इस घटना के बाद इस्लामी दुनिया में बवाल हो गया और इस्लामी मुल्कों ने इसकी निंदा की। 57 देशों का इस्लामी संगठन (OIC) इस मामले पर जल्दी ही बैठक करने वाला है। वहीं, पाकिस्तान ने इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में उठाया है।

बेल्जियम : होटल, नाइट क्लब और कैफे में बदल रहे चर्च

                                                             चर्च बन रहे होटल
यूरोप के बेल्जियम में कई चर्चों को अब होटल, कैफे और नाइट क्लब में तब्दील किया जा रहा है। वहाँ एक सैकर्ड हर्ट चर्च है जिसके एक कोने में खड़े होकर कभी बेल्जियम के लोग आकर अपने गुनाह कबूलते थे, अब वही जगह है जब कैफे में बदल गई है। इसी तरह फ्रांसिस्कन चर्च को एक लक्सरी होटल में तब्दील किया जा चुका है। यहाँ म्यूजिक स्टार स्ट्रोमे ने अपनी शादी के बाद रात बिताई थी।

बेल्जियम में ईसाई धर्म के ज्यादातर लोग रहते हैं। एक समय में वहाँ 83% लोग ईसाई थे जिनकी वजह से बेल्जियम के 300 कस्बों में कई चर्च, कैथ्रेडल और चैपल बनाए गए। लेकिन अब समय के साथ यहाँ धर्म का अनुसरण करने वालों की संख्या कम हुई और खुद को ईसाई बताने वाले केवल 55% लोग बचे। इनमें भी 10% ऐसे हैं जो रेगुलर चर्च जाते हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक धर्म को लेकर खत्म होती आस्था के कारण बहुत कम लोग लगातार चर्च जाते हैं। ऐसे में चर्चों का रखरखाव काफी मुश्किल हो गया था। इसी कारण इन इमारतों को किसी और कार्य में लाते हुए होटल सुपरमार्केट आदि बना दिया गया। अब कुछ लोग ऐसे हैं जो ऐसे बदलाव के विरोध कर रहे हैं।

मेयर समबार्ट जो खुद चर्चों को विभिन्न रूप देने में लगे हैं वो भी कहते हैं कि होटल में आकर लोग सोते हैं, सेक्स भी करते हैं तो क्या ये कहना ठीक है कि चर्च को होटल बना लिया जाए? ऐसे बदलावों पर एंटवर्प के बिशप भी नाराज हैं। उनका कहना है कि अतीत में वापसी संभव नहीं लग रही। पवित्र स्थलों को कपड़ों की दुकान से लेकर नाइट क्लबों में बदला जा रहा है।

इनमें से एक चर्च आज बेल्जियम का मशहूर चर्च बन चुका है। उसका नाम मार्टिन पैटरशॉफ होटल है। इस होटल की इमारत पहले चर्च थी जिसे बाद में होटल बनाया गया। इसकी खिड़कियों को बाहर देखने पर ऐसा लगता है जैसे किसी म्यूजियम को देखा जा रहा हो। लोग इसकी बनावट और सुंदरता देखकर हार्ट ऑफ मेकेलन भी कहते हैं।

स्वीडन : फाड़ी और जलाई जाएगी कुरान, वो भी मस्जिद के सामने: कोर्ट और पुलिस ने दे दी है अनुमति

स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में मस्जिद के सामने कुरान जलाई जाएगी। वहाँ की पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को इसकी अनुमति भी प्रदान कर दी है। स्वीडिश पुलिस ने इस संबंध में जानकारी दी है कि मुस्लिमों के फेस्टिवल ईद-अल-अज़हा की शुरुआत के दिन बुधवार (28 जून, 2023) को प्रदर्शनकारियों ने मस्जिद के सामने कुरान जलाने के लिए अनुमति माँगी थी। पुलिस ने अनुमति प्रदान करते हुए अपने आदेश में लिखा है कि सुरक्षा को लेकर वैसे खतरे नहीं हैं कि इस माँग को नकार दिया जाए।

पुलिस ने मौजूदा कानूनों के हिसाब से फैसला लिए जाने की बात कही है। इससे पहले पुलिस ने कुरान जलाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था, लेकिन 2 सप्ताह पहले अदालत ने फटकार लगाते हुए पुलिस को अपना आदेश बदलने के लिए कहा। उस समय पुलिस ने सुरक्षा से जुड़े खतरों का हवाला दिया था। इससे पहले स्वीडन में तुर्की के दूतावास के बाहर कुरान जलाया गया था, जिसके बाद कई हफ़्तों तक दंगे थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे।

कई इस्लामी मुल्कों में स्वीडन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते हुए वहाँ के उत्पादों के बहिष्कार की बात की गई। साथ ही NATO में स्वीडन की एंट्री को भी बाधित कर दिया गया। तुर्की ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्वीडन को रोकने का काम किया और कहा कि उसने कुर्द विद्रोहियों पर कार्रवाई नहीं की है। तुर्की कुर्द लड़ाकों को आतंकवादी मानता है। स्वीडन ने इसके बाद कुरान जलाने की दो माँगों को निरस्त किया – जहाँ एक माँग एक व्यक्ति ने की थी, वहीं एक संगठन भी ऐसा करना चाहता था।

इस साल फरवरी में ही तुर्की के साथ-साथ इराक के दूतावास के बाहर भी कुरान जलाने की माँग की गई थी। लेकिन, जून के मध्य में अदालत ने पुलिस के आदेश को नकारते हुए कहा कि सुरक्षा का कोई खतरा नहीं है। 37 वर्षीय सालवन मोमिका का कहना है कि स्टॉकहोम की बड़ी मस्जिद के सामने न सिर्फ कुरान को फाड़ा जाएगा, बल्कि इसे जलाया भी जाएगा। मस्जिद के पास सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है और सुरक्षा बलों की कई कारण वहाँ पर हैं।

स्वीडन के कई राजनेताओं ने कुरान जलाए जाने का विरोध किया, लेकिन साथ ही ये भी कहा कि यहाँ लोगों के पास अपनी अभिव्यक्ति के प्रदर्शन का अधिकार है। स्वीडन उत्तरी यूरोप में स्थित एक देश है, जो स्कैन्डिनेवियाई प्रायद्वीप में स्थित है। इसकी सीमाएँ नॉर्वे, फ़िनलैंड और डेनमार्क से लगती हैं। 1.1 करोड़ की जनसंख्या वाले इस देश के 52% लोग ‘चर्च ऑफ स्वीडन’ में आस्था रखते हैं। वहीं 8% जनसंख्या मुस्लिम है।

भारत ही नहीं फ्रांस भी सार्वजनिक जगहों पर मुस्लिमों के नमाज पढ़ने से है परेशान, जनता के अलावा 100 फ्रांसीसी नेता कर चुके हैं विरोध

          खुले में नमाज अदा कर रहे थे मुस्लिमों का फ्रांस के नेताओं ने राष्ट्रगान गाकर किया था विरोध (साभार: AFP)
भारत के अलावा दुनिया में और भी कई देश हैं, जहाँ मस्जिद होने के बावजूद मुस्लिमों द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर नमाज पढ़ने के कारण माहौल खराब हो रहा है। ऐसे ही देशों में एक देश फ्रांस है। फ्रांस में वर्ष 2017 में सडकों पर नमाज पढ़ने को लेकर वहाँ के लोगों में मुस्लिमों के प्रति काफी रोष फैल गया था। उस समय लगभग 100 फ्रांसीसी नेताओं ने इसके विरोध में पेरिस में फ्रांस का राष्ट्रगान गाकर सार्वजनिक स्थानों पर नमाज पढ़ने वाले मुस्लिमों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, उस दौरान नेताओं ने फ्रांस के ध्वज वाले कपड़े पहनकर राष्ट्रगान गाते हुए पेरिस के क्लिची की सड़क पर लगभग 200 नमाजियों को नमाज पढ़ने से रोकने का प्रयास किया था। इसको लेकर दोनों समूहों में काफी विवाद भी हुआ था। पुलिस के हस्तक्षेप के बावजूद दोनों समूहों के बीच विवाद इतना बढ़ था गया कि मामला हाथापाई तक पहुँच गया था।

फ्रांस के लोगों का कहना था कि वहाँ सार्वजनिक स्थानों पर नमाज की अनुमति नहीं है। वहीं, मुस्लिमों का कहना था कि उनके पास इसके अलावा और कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि टाउन हॉल ने मार्च में उनके नमाज पढ़ने के लिए दिए गए कमरे को वापस ले लिया था। फ्रांस में लगभग पाँच मिलियन यानी 50 लाख मुसलमान रहते हैं, जो पश्चिमी यूरोप में सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाला देश है।

पेरिस रीजनल काउंसिल के अध्यक्ष वैलेरी पेक्रेस ने नमाजियों का विरोध करते हुए कहा था, “सार्वजनिक स्थान पर इस तरह कब्जा नहीं किया जा सकता।” उन्होंने मध्य-दक्षिणपंथी रिपब्लिकन (centre-right Republicans) और यूडीआई पार्टियों (UDI parties) के पार्षदों और सांसदों के साथ मिलकर शुक्रवार को जुमे की नमाज अता करने वालों का विरोध किया था।

क्लिची (Clichy) के दक्षिणपंथी महापौर रेमी मुज़्यू ने आंतरिक सुरक्षा विभाग से सड़कों पर खुलेआम नमाज पढ़ने पर प्रतिबंध लगाने का आह्वान किया था। उन्होंने कहा था, “मैं अपने शहर में सभी की शांति और स्वतंत्रता के लिए जिम्मेदार हूँ।”

अब्देल कादेर नाम के एक नमाजी ने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया था कि हर शुक्रवार को जुमे की नमाज अता करने बेहतर स्थान चाहता है। सड़कों पर रहने का उन लोगों को कोई शौक नहीं है। उसने बताया कि वह विरोध प्रदर्शन के दौरान फ्रांसीसी नेताओं के राष्ट्रगान गाने से बेहद नाराज था। अब्देलकादर ने कहा था कि वे फ्रांस का राष्ट्रगान (Marseillaise) गा रहे थे, हमें उकसा रहे थे, जबकि मुस्लिम भी फ्रांस के ही लोग हैं। सोशल मीडिया पर नवंबर 2017 में इस घटना के कई वीडियो भी सामने आए थे।

ऐसी खबरें थीं कि मुस्लिम लोग मेयर द्वारा मस्जिद को बंद करने के विरोध में नमाज पढ़ने के लिए सड़कों का इस्तेमाल कर रहे थे। इसके तहत हर दिन ​कम-से-कम 5,000 मुस्लिम सड़कों पर नमाज पढ़ने के लिए आते थे। हालाँकि, अधिकारियों ने मुस्लिम समुदाय के लिए एक नई मस्जिद बनवाई थी, लेकिन यह 1.5 किमी दूर थी। नमाजियों का कहना था कि इतनी दूर जाना उनके लिए मुश्किल है। दरअसल, हर शुक्रवार को सड़कों पर नमाज पढ़ने का एक उद्देश्य यह भी था कि क्लिची के सेंटर में एक नई मस्जिद खोलने के लिए अधिकारियों पर दबाव बनाया जा सके।

हनीमून पर गए डॉक्टर ने होटल के कमरे में बीवी का किया खतना: जर्मनी में ऐसी 68000 पीड़िताएँ

                                                                                                                                प्रतीकात्मक 
जर्मनी में एक डॉक्टर ने सामान्य कैंची से हनीमून के दौरान ही अपनी पत्नी का खतना कर डाला। एक आँकड़ा कहना है कि जर्मनी में ऐसी 68,000 पीड़िताएँ हैं, जिनके जननांगों का खतना कर दिया गया। ताज़ा घटना हेल्मश्टेट शहर से आई है, जहाँ जहाँ आरोपित डॉक्टर पर जोर-जबरदस्ती करने और मारपीट का मुकदमा दर्ज किया गया है। आरोप है कि होटल के कमरे में ही डॉक्टर ने ये ‘सर्जरी’ कर डाली। अनस्थीसिया तक का इस्तेमाल भी नहीं किया गया।

इससे महिला को असहनीय पीड़ा का सामना करना पड़ा और काफी खून भी बह गया। उस समय 31 वर्षीय महिला को डॉक्टर पति ने ये कह कर इसके लिए राज़ी किया था कि अगर उसने बात नहीं मानी तो वो तलाक दे देगा। इसके बाद उसे समाज से बहिष्कृत करने की धमकी भी दी गई थी। दोनों मुस्लिम समुदाय से हैं। जर्मनी में किसी महिला का खतना कराने पर 1 वर्ष तक की सज़ा का प्रावधान है। इसे ‘फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (FGM)’ कहा जाता है, जिसके खिलाफ ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO)’ भी अभियान चलाता रहा है।

वॉल्टर्स के मुताबिक महिला इस सर्जरी के लिए इसलिए राजी हुई क्योंकि उसे तलाक की धमकी दी गई थी, जिसका अर्थ उसके लिए सामाजिक बहिष्कार होता। यहां आज भी होता है महिलाओं का खतना अधिकारियों के मुताबिक ये दोनों पति-पत्नी जर्मन हैं लेकिन उनका संबंध अन्य संस्कृतियों से है। जब महिला ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई तो अधिकारियों ने जांच शुरू की। वैसे कोर्ट के एक प्रवक्ता ने बताया है कि औपचारिक तौर पर आरोप दर्ज करने को लेकर फिलहाल कोई फैसला नहीं किया गया। आरोपी डॉक्टर ने इस मामले पर फिलहाल कोई टिप्पणी नहीं की है।

कड़वी हकीकत है महिला खतना दुनियाभर में कई संस्कृतियों में महिला खतना की परंपरा है। हालांकि कई सरकारें इस परंपरा को खत्म करने के लिए कानूनी और अन्य तरीके आजमा रही हैं। जर्मनी में अगर कोई महिला खतने का दोषी पाया जाता है तो उसे कम से कम एक साल की जेल हो सकती है। फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (एफजीएम) या आसान भाषा में कहें तो महिला खतना पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोक के बावजूद दुनिया के कई देशों में यह एक हकीकत है।

एक आँकड़े की मानें तो दुनिया भर में 30 करोड़ महिलाओं का खतना हुआ है और अफ्रीका में तो हर साल 30 लाख लड़कियों पर खतना का खतरा मँडराता रहता है। यूरोप में प्रवासी समस्या को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। बाहर से आने वाले मुस्लिम प्रवासी समाज में इस तरह की विसंगतियाँ देखने को मिल रही हैं। खतना के दौरान आम तौर पर क्लिटोरिस समेत महिला के जननांग के बाहरी हिस्से को आंशिक या पूरी तरह हटाया जाता है, या फिर जननांगों को सिल दिया जाता है।

मुख्यतः शिशु अवस्था से लेकर 15 वर्ष तक की उम्र तक लड़कियों का खतना कर दिया जाता है। लड़कों के मामले में तो ये आँकड़े कई गुना ज्यादा हैं। साधारण ब्लेड या किसी औजार का इस्तेमाल कर के ऐसा किया जाता है। आजकल मेडिकल स्टाफ की मदद भी ली जाती है। मुस्लिम समाज के कई हिस्सों में माना जाता है कि महिलाओं की कामेच्छा को नियंत्रण में रखने के लिए खतना आवश्यक है। इससे दर्द, पेशाब में संक्रमण, बाँझपन या मासिक धर्म से जुड़ी समस्याएँ हो सकती हैं।

2012 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने महिला खतने को खत्म करने के लिए एक प्रस्ताव स्वीकार किया था। जर्मन मीडिया एजेंसी DW के अनुसार, देश में 15,000 लड़कियाँ ऐसी हैं जिनका खतना कराए जाने की आशंका है। 2017 के मुकाबले खतना के आँकड़े में 44% की वृद्धि को प्रवासियों के बड़ी संख्या में आने को कारण बताया जा रहा है। जर्मनी की परिवार कल्याण मंत्री फ़्रांजिसका जिफ्फी ने कहा कि ये मानवाधिकार का उल्लंघन है और एक महिला के अधिकारों का हनन है।

क्या होता है महिला खतना?
महिला खतना कई तरह का होता है। लेकिन इसमें आम तौर पर क्लिटोरिस समेत महिला के जननांग के बाहरी हिस्से को आंशिक या पूरी तरह हटाया जाता है। कई जगह योनी को सिल भी दिया जाता है। लड़कियों का खतना शिशु अवस्था से लेकर 15 साल तक की उम्र के बीच होता है। आम तौर पर परिवार की महिलाएं ही इस काम को अंजाम देती हैं। साधारण ब्लेड या किसी खास धारदार औजार के जरिए खतना किया जाता है। हालांकि मिस्र और इंडोनेशिया जैसे देशों में अब मेडिकल स्टाफ के जरिए महिलाओं का खतना कराने का चलन बढ़ा है। महिला खतने का चलन मुस्लिम और ईसाई समुदायों के अलावा कुछ स्थानीय धार्मिक समुदायों में भी है। आम तौर पर लोग समझते हैं कि धर्म के मुताबिक यह खतना जरूरी है लेकिन कुरान या बाइबिल में ऐसा कोई जिक्र नहीं है। माना जाता है कि महिला की यौन इच्छा को नियंत्रित करने के लिए उसका खतना किया जाता है। लेकिन इसके लिए धर्म, परंपरा या फिर साफ सफाई जैसे कई और कारण भी गिनाए जाते हैं।

बहुत से लोग मानते हैं कि खतने के जरिए महिलाएं पवित्र होती हैं, इससे समुदाय में उनका मान बढ़ता है और ज्यादा कामेच्छा नहीं जगती। जो लड़कियां खतना नहीं करातीं, उन्हें समुदाय से बहिष्कृत कर दिया जाता है। क्या हैं समस्याएं? महिला खतने के कारण लंबे समय तक रहने वाला दर्द, मासिक धर्म से जुड़ी समस्याएं, पेशाब का संक्रमण और बांझपन जैसी समस्याएं हो सकती हैं। कई लड़कियों की ज्यादा खून बहने से मौत भी हो जाती है। खतने के कारण उस महिला को मां बनने के समय बहुत सी जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है। इसके कारण कई तरह की मानसिक समस्याएं और अवसाद भी हो सकता है। बहुत सारे अफ्रीकी देशों में महिला खतने पर प्रतिबंध है। लेकिन अकसर इस कानून को सख्ती से लागू नहीं किया जाता है। वहीं माली, सिएरा लियोन और सूडान जैसे देशों में यह कानूनी है। महिला खतने से कई अंतरराष्ट्रीय संधियों का उल्लंघन होता है। 2012 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने महिला खतने को खत्म करने के लिए एक प्रस्ताव स्वीकार किया था।

‘कंपनियों को हिजाब बैन करने का पूरा अधिकार’: सुप्रीम कोर्ट, यूरोप

                                                                                             प्रतीकात्मक  यूरोपियन यूनियन की सुप्रीम कोर्ट ‘यूरोपियन कोर्ट ऑफ जस्टिस (ECJ)’ ने सभी वहाँ कार्यरत कंपनियों को इसकी स्वतंत्रता दी है कि वो वर्कप्लेस पर हिजाब को प्रतिबंधित कर सकते हैं। इन कंपनियों को अब छूट है कि वो किसी भी प्रकार के राजनीतिक, मजहबी या फिर मनोवैज्ञानिक प्रतीक को पहन कर ऑफिस आने से कर्मचारियों को रोक सकते हैं। 15 जुलाई, 2021 को यूरोप की शीर्ष अदालत ने ये फैसला सुनाया।

अदालत ने कहा कि कंपनियाँ अपनी सोच के हिसाब से सामाजिक संघर्षों को रोकने के लिए या फिर ग्राहकों के समक्ष खुद को निष्पक्ष प्रदर्शित करने के लिए इस तरह के फैसले ले सकती है। साथ ही यूरोप के देशों से कहा है कि वो अपने-अपने कानून के हिसाब से ‘धार्मिक आज़ादी’ की व्याख्या कर इस फैसले को लागू कर सकते हैं। 2017 में इन कंपनियों को कर्मचारियों के लिए एक न्यूट्रल ड्रेस कोड तय करने की छूट दी गई थी।

आर्गेनाइजर साप्ताहिक के तत्कालीन संपादक प्रो वेद प्रकाश भाटिया(स्व) ने कई बार अपने स्तम्भ Cabbages & Kings में बुर्के के विषय में लिखा कि यह इस्लामिक प्रथा नहीं। बल्कि खूबसूरत महिलाओं को मर्दों की गन्दी निगाह से बचाने के लिए हिन्दू महिलाओं के घूँघट की तर्ज पर शुरू किया गया। 

हालाँकि, कई इस्लामी प्रतिनिधियों एवं मुस्लिम एक्टिविस्ट्स ने इस फैसले का विरोध किया था। उन्होंने अब भी ECJ के फैसले का विरोध किया है। उनका कहना है कि इस फैसले से मुस्लिम महिलाओं पर बुरा असर पड़ेगा, जो हिजाब पहन कर काम पर जाती हैं। जर्मनी की दो महिलाओं को ऑफिस में हिजाब पहनने से रोक दिया गया था, जिसके बाद वो कोर्ट पहुँची थीं। इनमें से एक शिक्षक हैं और एक बैंक में बतौर कैशियर कार्यरत हैं।

 ECJ ने स्पष्ट किया कि इन दोनों महिलाओं को वर्कप्लेस पर कंपनी द्वारा हिजाब पहनने से रोकना किसी प्रकार के भेदभाव की श्रेणी में नहीं आता है। कोर्ट ने कहा कि ये सभी मजहबों के मानने वालों पर बिना किसी भेदभाव के लागू है, भले किसी मजहब में इसे अनिवार्य ही क्यों न माना गया हो। हालाँकि, कोर्ट ने ये भी कहा कि विवरण देकर किसी एक खास प्रकार के स्कार्फ़ को ही बैन करने से लोगों को ऐसा लग सकता है कि उनके साथ भेदभाव हो रहा है, इसीलिए ये शायद ठीक न हो।

साथ ही कंपनियों को सलाह दी गई कि वो प्रतिबंध से पहले इसका पुष्ट कारण बता दिया करें। अदालत ने कहा कि खासकर शैक्षिक संस्थानों में ये ज़रूरी है, क्योंकि कई अभिभावक नहीं चाहते हैं कि उनके बच्चे किसी मजहबी परिवेश में पढ़ें। कंपनियों को ये साबित करना होगा कि प्रतिबंध लगाने के पीछे उनकी क्या ज़रूरत है। साथ ही वो अपने-अपने देशों के राष्ट्रीय प्रावधानों को ध्यान में रख कर ऐसा कर सकते हैं।

‘ओपन सोसाइटी जस्टिस इनिशिएटिव (OSJI)’ ने इसका विरोध करते हुए कहा है कि इससे मुस्लिम अल्पसंख्यक महिलाओं को नुकसान हो सकता है। संगठन ने कहा कि खास तरह के कपड़ों को प्रतिबंधित करना और ऐसे कानून बनाना हमेशा से इस्लामोफोबिया का हिस्सा रहा है। साथ ही दावा किया कि हिजाब पहनने से किसी को कोई हानि नहीं होती है। साथ ही उसने इसे हेट क्राइम व भेदभाव बढ़ाने वाला करार दिया।