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चीनी छात्रों के वीजा रद्द कर रहा अमेरिका, राष्ट्रीय सुरक्षा की वजह से लिया फैसला: शैक्षणिक संस्थानों को पढ़ाई के नाम पर जासूसों का अड्डा बना देता है चीन; नीदरलैंड्स, कनाडा और फिनलैंड भी जता चुके हैं चीनी जासूसों पर चिंता

                              अमेरिका में चीनी छात्रों के वीजा होंगे रद्द (फोटो साभार: China Daily)
अमेरिका को जासूसी का डर सता रहा है। इसके लिए अमेरिकी सरकार ने चीनी छात्रों के वीजा रद्द करने का फैसला किया है। गुरुवार (29 मार्च 2025) को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि जिन चीनी छात्रों का कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीसीपी) से कोई संबंध है या जो महत्वपूर्ण क्षेत्रों में पढ़ाई कर रहे हैं, उनके वीजा रद्द किए जाएँगे। इसके लिए विदेश मंत्रालय और होमलैंड सिक्योरिटी विभाग मिलकर काम करेंगे।

यह कदम ट्रम्प प्रशासन की राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने की कोशिशों का हिस्सा है, जिसमें चीन और हॉन्गकॉन्ग से आने वाले वीजा आवेदनों की कड़ी जाँच की जा रही है।

एक दिन पहले, रुबियो ने दुनिया भर में अमेरिकी दूतावासों को निर्देश दिया कि वे छात्र वीजा के लिए इंटरव्यू शेड्यूल करना बंद करें, क्योंकि सरकार विदेशी छात्रों के अमेरिकी शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश को सीमित करना चाहती है। अमेरिकी विश्वविद्यालयों में भारत के बाद सबसे ज्यादा चीनी छात्र पढ़ते हैं। 2023-24 में 2,70,000 से ज्यादा चीनी छात्र अमेरिका में थे, जो कुल विदेशी छात्रों का एक-चौथाई हिस्सा हैं।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने गुरुवार (29 मई 2025) को मीडिया से कहा कि वे अमेरिकी विश्वविद्यालयों में दाखिला लेने वाले विदेशी छात्रों की कड़ी जाँच करना चाहते हैं। उन्होंने कहा, “कुछ लोग बहुत कट्टरपंथी क्षेत्रों से आ रहे हैं और हम नहीं चाहते कि वे हमारे देश में परेशानी खड़ी करें। हार्वर्ड में करीब 31 प्रतिशत छात्र विदेशी हैं। ऐसे मामलों में 15% की कैपिंग होनी चाहिए।”

चीनी छात्रों के वीजा पर यह सख्ती अमेरिका में चीन के जासूसी नेटवर्क को तोड़ने की कोशिश है। चीन अपने प्रतिद्वंद्वी देशों में जासूसी के लिए मशहूर है और इसके लिए वह कंपनियों, विश्वविद्यालयों और सरकारी एजेंसियों में लोगों को निशाना बनाता है। जुलाई 2021 में चार चीनी नागरिकों पर अमेरिका में जासूसी का आरोप लगा, जो 2009 से 2018 तक 12 देशों को निशाना बनाने वाली वैश्विक जासूसी में शामिल थे।

अमेरिकी विश्वविद्यालयों में चीन का जासूसी नेटवर्क

चीन ने अमेरिका के शीर्ष विश्वविद्यालयों जैसे हार्वर्ड और स्टैनफोर्ड में जासूसी नेटवर्क बना रखा है। ये विश्वविद्यालय सीसीपी से भारी फंडिंग भी लेते हैं। चीनी सेना अपने जासूसों को छात्रों के रूप में भेजती है, जो विश्वविद्यालय की लैब से बौद्धिक संपदा और शोध दस्तावेज चुराकर चीन भेजते हैं।
साल 2020 में हार्वर्ड के प्रोफेसर लाइबर की गिरफ्तारी के बाद इस जासूसी नेटवर्क का पता चला। शोधकर्ता बनकर आए दो चीनी जासूसों पर भी विदेशी सरकार के एजेंट होने का आरोप लगा। इन जासूसों ने अपने रिसर्च के बारे में झूठ बोला और लैब से रिसर्च सैंपल चुराकर देश से बाहर भेजे।
अक्टूबर 2022 में अमेरिकी अधिकारियों ने तीन चीनी मंत्रालय ऑफ स्टेट सिक्योरिटी (एमएसएस) के अधिकारियों समेत चार चीनी नागरिकों पर जासूसी का आरोप लगाया। इनका नाम वांग लिन, बी होंगवेई, डोंग तिंग (उर्फ चेल्सी डोंग) और वांग कियांग था। इन्हें चीनी सरकार के लिए लोगों को भर्ती करने का काम सौंपा गया था। इसके लिए इन्होंने प्रोफेसरों, पूर्व कानून प्रवर्तन अधिकारियों और अन्य लोगों को निशाना बनाया ताकि संवेदनशील जानकारी हासिल की जा सके।
ये लोग चीन के ओशन यूनिवर्सिटी के एक कथित शैक्षणिक संस्थान इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल स्टडीज (आईआईएस) के नाम पर काम कर रहे थे और अमेरिकी विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों को संवेदनशील उपकरण और जानकारी हासिल करने के लिए निशाना बनाया।

नीदरलैंड्स, कनाडा और फिनलैंड भी जता चुके हैं चीनी जासूसों पर चिंता

साल 2021 में नीदरलैंड्स, कनाडा और फिनलैंड की जासूसी एजेंसियों ने चीनी जासूसी हमलों को लेकर चेतावनी दी। इन देशों ने सरकार, कंपनियों और विश्वविद्यालयों पर चीनी जासूसी के खतरे को उजागर किया। नीदरलैंड्स की खुफिया एजेंसियों ने कहा कि उनके शैक्षणिक संस्थानों पर चीन से साइबर हमले का खतरा है। इसके अलावा चीन अपने शोधकर्ताओं, पीएचडी उम्मीदवारों और छात्रों को जासूस के रूप में भेजता है।
फिनलैंड की एजेंसियों ने चीनी सरकार पर देश के महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे जैसे टेलीकॉम, एनर्जी, जल वितरण, हवाई अड्डों, सड़कों और बंदरगाहों पर कब्जा करने की कोशिश का आरोप लगाया। कनाडा की खुफिया एजेंसियों ने भी चीनी सरकार पर बायोफार्मास्युटिकल, हेल्थ, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग, समुद्री तकनीक और एयरोस्पेस जैसे क्षेत्रों को निशाना बनाने की चेतावनी दी।

इस्लाम के विरुद्ध स्वीडन उठा, बड़े नेताओं को खरीद जॉर्ज सोरोस कोशिश कर रहा पूरे यूरोप के इस्लामीकरण के लिए

सुभाष चन्द्र

स्वीडन की उप प्रधानमंत्री एब्बा बुश ने मुस्लिम समुदाय को सख्त संदेश देते हुए कहा है कि “शरिया कानून वाले इस्लाम के लिए स्वीडन में कोई जगह नहीं है। मुसलमान अपने जीवन में स्वीडिश मूल्यों को अपनाएं या फिर देश छोड़ दें। इस्लाम को स्वीडिश मूल्यों के अनुसार ढलना होगा। स्वीडन और यूरोप में बहुत से लोग इस्लाम का उसी तरह जैसे वे अधिनायकवादी राज्यों में करते हैं”।

एब्बा बुश ने आगे भी कहा कि “इस्लाम को हमारे मौलिक साझा मूल्यों के अनुकूल होना चाहिए, जो स्वीडन और यूरोप को यूरोप बनाते हैं, ये वही मूल्य हैं जो हमें एक दूसरे के साथ सहिष्णुता, शांति और स्वतंत्रता में रहने में सक्षम बनाते हैं, कुछ मूल्य वैकल्पिक नहीं होते”। 

एब्बा बुश के समर्थक बयान की तारीफ कर कह रहे हैं कि उनका रुख स्वीडिश सांस्कृतिक मूल्यों को संरक्षित करने के लिए महत्वपूर्ण है। उनके विरोधी (लगता है सेकुलर हैं) कह रहे हैं कि वे इस्लामोफोबिया को बढ़ा रही हैं। वो मुसलमानों को कलंकित कर उन्हें अलग थलग कर देंगी। स्वीडन इसी वर्ष मार्च में NATO में शामिल हुआ है।

 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
पूरा यूरोप और ब्रिटेन मुस्लिम शरणार्थियों से भरा पड़ा है और ये सब शरणार्थी इस्लामिक देशों से आये हैं जिन्हें 56 इस्लामिक देश कभी अपने यहाँ शरण नहीं देते और आज ये शरणार्थी ब्रिटेन और कई यूरोपीय देशों में समस्या बन चुके हैं। स्वीडन में हाल ही में शरणार्थी प्रवासियों की संख्या बढ़ी है और जाहिर एब्बा बुश की चिंता का कारण यही है। स्वीडन के वर्तमान आबादी करीब एक करोड़ 70 लाख है जिसमें 1,88,000 मुस्लिम हैं और सबसे ज्यादा 20% मुस्लिम स्वीडन के शहर Maimo में रहते हैं।

पिछले कुछ समय में स्वीडन, डेनमार्क, बुल्गारिया, ब्रिटेन, नॉर्वे, जर्मनी (बर्लिन) और फ्रांस में मुस्लिमों ने जम कर दंगे किए और करोड़ों की संपत्ति को आग लगा दी। एक ही तरह से दंगे किए जाते रहे हैं, यूरोप के अलावा म्यांमार, दिल्ली, हल्द्वानी,श्रीलंका, थाईलैंड और बांग्लादेश में भी दंगे किए गए।

ये सभी यूरोपीय देश और ब्रिटेन जहां दंगे हुए NATO के सदस्य हैं और इन देशों में दंगे करने वाले मुस्लिमों को कोई इस्लामिक देश कंट्रोल नहीं करना चाहता जबकि कई इस्लामिक देशों से उन्हें  पूरी मदद पहुंचती है। किसी इस्लामिक देश में इतनी हिम्मत नहीं कि मुस्लिम समुदाय के लिए इनमे से किसी देश पर हमला कर दे क्योंकि सब NATO मेंबर हैं। 

कुछ समय पहले नीदरलैंड के Geert Wilders ने भी अपने मुल्क में मुस्लिमों पर सख्त टिप्पणियां करते हुए मस्जिदों को बैन करने की भी बात कही थी। इटली की Giorgia Meloni ने भी नई मस्जिदों पर पाबंदी लगाई थी और यहां तक कहा था मस्जिदों में जो कुछ भी होता है सरकार को बताना पड़ेगा।

जर्मनी और ब्रिटेन को भी अब कुछ समझ आ रहा है जहां मस्जिदों पर निगरानी की जा रही है और बंद किया जा रहा है क्योंकि वहां आतंकी गतिविधियों के सबूत मिले। सबसे बड़ा रहस्य तो हंगरी के प्रधानमंत्री Viktor Orban ने खोला है कि George Soros की योजना पूरे यूरोप का इस्लामीकरण करने की है जिसके लिए उसने यूरोपीय देशों के कुछ बड़े नेताओं को खरीद लिया है। 

अभी अमेरिका इस्लाम के खतरों से परिचित होते हुए भी ध्यान नहीं दे रहा लेकिन कल वहां भी वही होगा जो आज यूरोपीय देशों में हो रहा है। 

किसी समाज में Integrate (एकीकृत) होकर रहना इस्लाम में संभव नहीं है क्योंकि उनके लिए किसी भी देश के संविधान और कानून से ऊपर शरिया है। चीन ने जो मुस्लिमों का इलाज किया है उस पर कोई इस्लामिक देश नहीं बोलता और लगता है एक दिन पूरे विश्व को चीन का फार्मूला अपनाना पड़ेगा। 

नीदरलैंड में फिलिस्तीन समर्थकों पर बुलडोजर वाली कार्रवाई: एम्स्टर्डम यूनिवर्सिटी में घुस पुलिस ने 125 को पकड़ा, US-यूरोप में भी सख्ती

एम्स्टर्डम यूनिवर्सिटी में फिलिस्तीन समर्थक प्रदर्शन खत्म (फोटो साभार : Time)
नीदरलैंड्स की एम्स्टर्डम यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की जगह फिलिस्तीन के समर्थन में चल रहे प्रदर्शन को पुलिस ने तितर-बितर कर दिया है। एम्स्टर्डम पुलिस ने यूनिवर्सिटी कैंपस में प्रदर्शन कर रहे 125 से ज्यादा फिलिस्तीन समर्थकों को गिरफ्तार भी कर लिया है। फिलिस्तीन के समर्थन में प्रदर्शन कर रहे कथित छात्रों ने यूनिवर्सिटी कैंपस में कैंप लगा लिए थे, जिसे पुलिस ने उखाड़ फेंका है।

टाइम मैगजीन की रिपोर्ट के मुताबिक, मंगलवार (7 मई 2024) के तड़के ही एम्स्टर्डम पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को यूनिवर्सिटी कैंपस से हटाने की मुहिम छेड़ी और सभी प्रदर्शनकारियों को टेंट खाली करके जाने के लिए कहा, लेकिन प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की बात नहीं मानी, जिसके बाद पुलिस ने बल प्रयोग करते हुए सभी टेंटों को हटा दिया और 125 से अधिक प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार कर लिया।

एम्स्टर्डम पुलिस ने इस कार्रवाई की सूचना एक्स पर भी साझा की है, जिसमें बताया गया है कि 125 फिलिस्तीन समर्थकों को पुलिस ने गिरफ्तार करते हुए हिरासत में ले लिया है।

नीदरलैंड्स के राष्ट्रीय न्यूज चैनल ने घटनास्थल की तस्वीरें प्रसारित की है। इन वीडियो में पुलिस को बैरिकेड्स को गिराते दिखाया जा रहा है, जिसमें पुलिस ने भारी मशीनों का इस्तेमाल करते हुए अस्थाई निर्माणों को ध्वस्त कर दिया। इस दौरान पुलिस वालों ने लाठियों का भी जमकर इस्तेमाल किया। पुलिस वालों ने फिलिस्तीन समर्थक प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया और तंबुओं को उखाड़ फेंका।

फिलिस्तीन के समर्थन में अमेरिका और यूरोप के कई देशों की यूनिवर्सिटीज में प्रदर्शन हो रहे थे। अमेरिका में प्रदर्शन उग्र भी हो रहा था, जिसके बाद प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए कई फिलिस्तीन समर्थक प्रदर्शनकारियों के खिलाफ न सिर्फ कार्रवाई की, बल्कि यूनिवर्सिटीज ने प्रदर्शन में शामिल छात्रों को यूनिवर्सिटी से भी निकाल दिया है। ये प्रदर्शनकारी 7 अक्टूबर 2023 को हमास के इजरायल पर हुए हमले के बाद इजरायल की जवाबी कार्रवाई का विरोध कर रहे थे।

नीदरलैंड : नुपूर शर्मा के ‘हमदर्द’ गीर्ट वाइल्डर्स के प्रधानमंत्री बनने की प्रबल संभावनाएं

नुपुर शर्मा का समर्थन कर चुके गीर्ट वाइल्डर्स के नीदरलैंड के पीएम बनने के आसार (फोटो साभार: Britannica/ABP)
यूरोपीय देश नीदरलैंड के चुनाव नतीजों ने बीजेपी की पूर्व प्रवक्ता नुपुर शर्मा (Nupur Sharma) को चर्चा में ला दिया है। वजह हैं गीर्ट वाइल्डर्स (Geert Wilders)। वाइल्डर्स की पहचान एक ऐसे नेता के तौर पर है जो इस्लामी कट्टरपंथ के खिलाफ मुखर हैं।

बीते साल जब ‘ऑल्ट न्यूज’ के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर ने नूपुर शर्मा को टारगेट किया था, तब वाइल्डर्स ने बीजेपी की इस पूर्व नेता का समर्थन किया था। जुबैर के उकसावे के बाद से नुपुर शर्मा को जिहादी हत्या की धमकी दे रहे हैं। वे सार्वजनिक जीवन से दूर रहने को मजबूर हैं।

हालिया चुनावों के बाद गीर्ट वाइल्डर्स के नीदरलैंड के प्रधानमंत्री बनने के आसार हैं। दक्षिणपंथी वाइल्डर्स की पार्टी को एग्जिट पोल में सर्वाधिक सीट मिलती दिख रही है। 22 नवम्बर 2023 को नीदरलैंड के आम चुनावों के लिए सामने आए एग्जिट पोल में यह स्पष्ट हो गया है कि वाइल्डर्स की कंजर्वेटिव पार्टी फॉर फ्रीडम (PVV) सर्वाधिक 35 सीटें जीतने की ओर है। उनकी पार्टी नीदरलैंड में इस्लाम के प्रसार के विरुद्ध रही है। ऐसे में इन नतीजों का पूरे यूरोप पर प्रभाव पड़ने की संभावना है।

PVV नीदरलैंड में मस्जिदों, कुरान और हिजाब पर प्रतिबंध लगाने की माँग करती रही है। अब 150 सीटों वाली नीदरलैंड की संसद में यह सबसे अधिक सीटों वाला दल बनने की और अग्रसर है। उनकी पार्टी को यूरोप के अन्य दक्षिणपंथी नेताओं और पार्टियों की तरफ से बधाई मिल रही है।

PVV सरकार बनाने में सबसे आगे होगी। सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी। उसे 35 सीटें मिल सकती हैं। यह 2021 के मुकाबले दोगुनी है। हालाँकि, स्पष्ट बहुमत ना होने के कारण उसे अन्य पार्टियों के साथ गठबंधन करना होगा। लेकिन इस बात की पूरी संभावना है कि गठबंधन का नेतृत्व करते हुए गीर्ट वाइल्डर्स प्रधानमंत्री बनेंगे। इस पूरी प्रक्रिया में अभी 8-10 महीने का समय लगने की संभावना है।

कौन हैं गीर्ट वाइल्डर्स?

गीर्ट वाइल्डर्स एक दक्षिणपंथी डच नेता हैं। वह अपने इस्लाम विरोधी रुख के लिए जाने जाते हैं। वह वर्ष 2004 के बाद से लगातार पुलिस सुरक्षा में रहते हैं। उनके एक बार मोरक्को के लोगों को कूड़ा बोलने पर काफी विवाद हुआ था।
वाइल्डर्स पिछले ढाई दशकों से नीदरलैंड की राजनीति में सक्रिय हैं, वह 1998 के बाद से डच संसद में हैं। उनका ताल्लुक एक सामान्य माध्यम वर्गीय परिवार से है। वह 1981 से 1983 के बीच इजरायल में भी रहे हैं। इस दौरान उन्होंने मध्य एशियाई देशों की यात्रा की, जिस दौरान उनके इस्लाम विरोधी विचार बने।
वाइल्डर्स को अवैध प्रवासियों के प्रति उनके कठोर रवैए और डच हितों को सबसे आगे रखने के लिए जाना जाता है। उन्होंने जुलाई 2022 में भाजपा की पूर्व प्रवक्ता नुपुर शर्मा और बांग्लादेशियों का मुद्दा भी डच संसद में उठाया था। उन्होंने अक्टूबर 2022 में भी नुपुर शर्मा के समर्थन में ट्वीट किया था।
गीर्ट वाइल्डर्स ने हिन्दुओं से सहिष्णुता छोड़ने का अपील भी की थी।
डच सांसद ने भारत में हिंदुओं पर हमले की घटनाओं का भी जिक्र किया था। उन्होंने नूपुर शर्मा का समर्थन करने पर इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा एक हिंदू दर्जी (कन्हैया लाल) का सिर कलम करने की घटना पर भी प्रकाश डाला था।
बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा पर भी वे सवाल उठा चुके हैं। उन्होंने विदेश मंत्रालय से बांग्लादेश में हिंदू घरों, पूजा स्थलों और दुकानों में आग लगानी वाली घटना पर विचार करने को कहा था। मालूम हो कि 15 जुलाई 2022 को बांग्लादेश में लोहागारा के सहपारा इलाके में कट्टरपंथी मुस्लिमों की भीड़ ने हिन्दुओं के एक मंदिर, किराने की दुकान और कई घरों को तोड़ दिया था।