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राहुल गांधी की ओछी मानसिकता और बदजुबानी से शर्मसार हुआ देश

नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 13 अगस्त 2026 को ‘रचनात्मक कांग्रेस राष्ट्रीय सम्मेलन’ के मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ जिस अमर्यादित और आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया, उसने संसदीय लोकतंत्र की गरिमा को गंभीर आघात पहुंचाया है। संवैधानिक इतिहास में शायद ही किसी नेता प्रतिपक्ष ने देश के प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र के प्रति ऐसी निम्नस्तरीय भाषा का प्रयोग किया हो। सेना के शौर्य पर बेबुनियाद सवाल खड़े करना और लगातार झूठ फैलाकर सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश करना उनकी हताशा और मानसिक दिवालियापन को उजागर करता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी लगातार ‘बिलो द बेल्ट’ हमले कर भाजपा कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ने का एक मनोवैज्ञानिक खेल खेल रहे हैं। इस नैरेटिव की राजनीति का जवाब देने के लिए अब हर झूठ का तथ्यपरक और unapologetic तरीके से पर्दाफाश करना जरूरी हो गया है।

इटली की प्रधानमंत्री पर भद्दी टिप्पणी और महिला सम्मान पर हमला

राहुल गांधी ने सम्मेलन के दौरान इटली की महिला प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को लेकर अत्यंत अशोभनीय, फूहड़ और द्विअर्थी टिप्पणी की। मंच पर कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित को गले लगाने के बाद यह कहना कि “मैं अभी उस स्तर तक नहीं पहुंचा हूं”, एक संप्रभु लोकतांत्रिक देश की महिला राष्ट्राध्यक्ष का सरेआम अपमान है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों और कूटनीति जैसे गंभीर विषय को इस तरह सड़क छाप और ओछे स्तर पर घसीटना उनकी महिला-विरोधी और विकृत मानसिकता को साफ तौर पर उजागर करता है। यह केवल एक विदेशी नेता का नहीं, बल्कि सार्वजनिक विमर्श में महिलाओं के प्रति कांग्रेस की सोच का शर्मनाक प्रदर्शन है। इस तरह के कुकृत्य से पूरे देश का सिर शर्म से झुक जाता है और यह साबित होता है कि उनमें एक जिम्मेदार राजनेता जैसी कोई गरिमा नहीं बची है।

इटली दूतावास की कड़ी आपत्ति: राहुल गांधी की ओछी बयानबाजी से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत शर्मसार

राहुल गांधी की अमर्यादित और फूहड़ राजनीति का खामियाजा अब देश को वैश्विक कूटनीतिक मोर्चे पर भुगतना पड़ रहा है। नई दिल्ली स्थित इटली के दूतावास ने नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी पर की गई अशोभनीय टिप्पणी पर आधिकारिक बयान जारी कर कड़ी निंदा और गहरी आपत्ति दर्ज कराई है। दूतावास ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि लोकतांत्रिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन भारत की आंतरिक राजनीति में इटली की लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित प्रधानमंत्री का उपहास उड़ाना और उनका अपमान करना कतई स्वीकार्य नहीं है। दूतावास ने याद दिलाया कि भारत और इटली के संबंध आपसी सम्मान और गरिमा पर आधारित हैं। राहुल गांधी के इस गैर-जिम्मेदाराना आचरण ने एक मित्र राष्ट्र के साथ भारत के द्विपक्षीय संबंधों में असहज स्थिति पैदा कर दी है। नेता प्रतिपक्ष जैसे संवैधानिक पद पर बैठकर वैश्विक मंचों पर भारत की साख को बट्टा लगाना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश को शर्मसार करना उनकी अदूरदर्शी और विनाशकारी मानसिकता को पूरी तरह उजागर करता है।

 राष्ट्रगान के दौरान घूमना और हाथ मिलाना: देश के सर्वोच्च सम्मान की अवहेलना

सम्मेलन से सामने आया एक वीडियो कांग्रेस नेतृत्व की राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति संवेदनहीनता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। जब सभागार में राष्ट्रगान बज रहा था, उस समय सावधान की मुद्रा में खड़े होकर सम्मान देने के बजाय राहुल गांधी मंच पर इधर-उधर टहलते और नेताओं से हाथ मिलाते दिखाई दिए। राष्ट्रगान देश की आन, बान और शान का प्रतीक है तथा हर भारतीय नागरिक का यह संवैधानिक दायित्व है कि वह इसके सम्मान में खड़ा हो। इसके बावजूद नेता प्रतिपक्ष के पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा ऐसा गैर-जिम्मेदाराना और अपमानजनक आचरण उनके देश-विरोधी रवैये और राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति घोर अनादर को साबित करता है।
‘घटिया स्टैंडअप कॉमेडी’: सोशल मीडिया पर फूटा जनता का आक्रोश
सोशल मीडिया पर आम जनता और प्रबुद्ध वर्ग ने राहुल गांधी के इस आचरण को ‘सड़क छाप व्यवहार’ और ‘सस्ती स्टैंडअप कॉमेडी’ करार देते हुए भारी रोष व्यक्त किया है। यूजर्स का कहना है कि उम्र के इस पड़ाव पर पहुंचकर भी वे गंभीर नीतिगत और राष्ट्रीय विमर्श करने के बजाय बचकानी और फूहड़ हरकतों में व्यस्त रहते हैं। राजनीतिक आलोचकों ने सवाल उठाया कि जो नेता गंभीर संवैधानिक मंचों पर मसखरे जैसा व्यवहार करता हो, वह देश का नेतृत्व करने का दावा कैसे कर सकता है। जनता यह साफ देख रही है कि वे नेता प्रतिपक्ष की गरिमा को पूरी तरह खो चुके हैं और सिर्फ अपनी हताशा मिटाने के लिए स्तरहीन हरकतें कर रहे हैं।
गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ असंसदीय भाषा का प्रयोग
राहुल गांधी ने देश के गृह मंत्री अमित शाह के लिए ‘तड़ीपार’ और ‘भाग गया’ जैसे अपमानजनक और असंसदीय शब्दों का प्रयोग कर राजनीतिक मर्यादा की सीमाएं लांघ दीं। एक संवैधानिक पद पर बैठे नेता द्वारा देश की आंतरिक सुरक्षा संभालने वाले गृह मंत्री के खिलाफ ऐसी सड़क छाप शब्दावली का प्रयोग करना यह दर्शाता है कि कांग्रेस नेतृत्व बुनियादी राजनीतिक शालीनता खो चुका है। जब कांग्रेस के पास सरकार की नीतियों और विकास कार्यों का कोई ठोस जवाब नहीं होता, तो वे इसी तरह के घटिया व्यक्तिगत हमलों पर उतर आते हैं। देश की जनता ऐसे स्तरहीन और अमर्यादित बयानों को भली-भांति देख और समझ रही है।
‘सोने नहीं देंगे, पागल कर देंगे’: राजनीतिक विमर्श में खुलेआम धमकियां
राहुल गांधी ने खुले मंच से अराजक और धमकी भरे लहजे में कहा कि जब तक प्रधानमंत्री और गृह मंत्री इस्तीफा नहीं देंगे, तब तक वे उन्हें सोने नहीं देंगे और “पागल कर देंगे”। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता द्वारा प्रचंड बहुमत से चुनी गई सरकार के खिलाफ इस तरह की हिंसक और अशालीन भाषा का इस्तेमाल किसी जिम्मेदार विपक्ष का काम नहीं हो सकता। यह बयान उनकी गहरी कुंठा और राजनीतिक हताशा को दर्शाता है, जिसमें वे लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान करने के बजाय अराजकता फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। इस प्रकार की भाषा यह साबित करती है कि वे लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों से कितने दूर जा चुके हैं।
पुलिस और मीडिया के नाम पर झूठी और मनगढ़ंत कहानियां
राहुल गांधी ने अपने संबोधन में एक और काल्पनिक कहानी गढ़ते हुए दावा किया कि प्रधानमंत्री आवास के सामने धरने के दौरान एक पुलिसकर्मी ने उनके कान में आकर सरकार विरोधी बात कही थी। इतना ही नहीं, उन्होंने मीडियाकर्मियों के नाम पर भी सहानुभूति बटोरने के लिए यह मनगढ़ंत नैरेटिव पेश किया कि वे मजबूरी में काम कर रहे हैं। बिना किसी प्रमाण या तथ्य के देश के कर्तव्यनिष्ठ सुरक्षा बलों और पत्रकारों के नाम पर इस प्रकार की झूठी कहानियां सुनाना उनकी पुरानी कार्यशैली का हिस्सा है। जनता के बीच भ्रम फैलाने और अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए वे लगातार ऐसे झूठे प्रपंचों का सहारा लेते हैं।
लोकतांत्रिक व्यवस्था और विरोधियों को ‘जोकर्स का झुंड’ बताना
राहुल गांधी ने देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं और अपने वैचारिक विरोधियों को ‘बंच ऑफ जोकर्स’ और ‘क्लाउन्स’ कहकर अपनी संकीर्ण मानसिकता का परिचय दिया। भारतीय संस्कृति, प्राचीन दर्शन और राष्ट्रीय मूल्यों की रक्षा करने वाले संगठनों पर इस तरह की ओछी टिप्पणी करना यह साबित करता है कि वे भारत की वास्तविक आत्मा और जमीनी हकीकत से पूरी तरह कटे हुए हैं। जो व्यक्ति करोड़ों भारतीयों की आस्था और विचारधारा का सम्मान नहीं कर सकता, वह पूरे देश का प्रतिनिधित्व करने का दावा कैसे कर सकता है। उनका यह बयान उनके भीतर भरे वैचारिक अहंकार और असहिष्णुता को स्पष्ट रूप से उजागर करता है।
अमेरिका-ईरान संकट पर हास्यास्पद दावा और विदेश नीति का अल्पज्ञान
विदेश नीति पर अपनी समझ का प्रदर्शन करते हुए राहुल गांधी ने दावा किया कि अमेरिका-ईरान तनाव के समय यदि इंदिरा गांधी होतीं तो दोनों देशों की दोस्ती करा देतीं, लेकिन पाकिस्तान यह मौका ले गया। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के अत्यंत संवेदनशील और जटिल मामलों पर इस तरह का अपरिपक्व और बेतुका विश्लेषण उनके विदेश नीति संबंधी अल्पज्ञान को उजागर करता है। वे यह भूल जाते हैं कि आज मोदी सरकार के सशक्त नेतृत्व में भारत वैश्विक स्तर पर शांति और कूटनीति का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। जमीनी हकीकत को समझे बिना केवल अपने परिवार का महिमामंडन करने के लिए ऐसे हास्यास्पद दावे करना उनकी राजनीतिक नासमझी को दिखाता है।
गलवान और अरुणाचल पर सेना के पराक्रम पर फिर उठाए झूठे सवाल
राहुल गांधी ने एक बार फिर चीन सीमा, गलवान और अरुणाचल प्रदेश में सेना की पेट्रोलिंग को लेकर सरासर झूठे, भ्रामक और देश-विरोधी दावे किए हैं। सीमा पर मुस्तैद भारतीय सेना के अदम्य साहस, पराक्रम और सुरक्षा के पुख्ता इंतजामों को नकारते हुए सरकार पर खबरें दबाने का मनगढ़ंत आरोप लगाना सीधे तौर पर वीर जवानों के शौर्य का अपमान है। जब पूरी दुनिया ने देखा कि कैसे भारतीय सेना ने चीनी सैनिकों को मुंहतोड़ जवाब देकर पीछे धकेला, तब राहुल गांधी द्वारा इस तरह का झूठा प्रलाप करना सीधे-सीधे दुश्मन देश के नैरेटिव को मजबूत करने का काम करता है। अपनी ओछी राजनीति चमकाने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर लगातार झूठ फैलाना और सेना के मनोबल पर प्रहार करना कांग्रेस की पुरानी देश-विरोधी रणनीति बन चुकी है।
संसद से कांग्रेस के मंच तक कुंठा और अराजकता 
संसद के सत्र को उद्दंडता, उच्छृंखलता और सनक के बल पर पूरी तरह बाधित करने के बाद कांग्रेस के औपचारिक मंच से राहुल गांधी द्वारा प्रयुक्त असभ्य शब्दावली उनके भीतर पनप रही कुंठा की पराकाष्ठा को उजागर करती है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती बन चुके राहुल गांधी जिस तरह देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ अभद्र भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, वह उनके मानसिक भटकाव का स्पष्ट प्रमाण है। सम्मेलन के मंच पर दो चेहरों की जुगलबंदी ने कांग्रेस की असलियत को पूरी तरह बेनकाब कर दिया। एक तरफ संदीप दीक्षित, जिन्होंने भारतीय थल सेना प्रमुख को ‘सड़क छाप गुंडा’ कहकर पूरे सैन्य बल का अपमान किया था, और दूसरी तरफ राहुल गांधी, जो जेएनयू जाकर ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ के देश-विरोधी नारे लगाने वालों के समर्थन में खड़े हुए थे। सेना का अपमान करने वाले और अलगाववादी सोच की ढाल बनने वाले ये दोनों नेता मिलकर आज मां भारती के सपूत प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ अभद्र प्रलाप कर रहे हैं। देश की प्रबुद्ध जनता को यह भली-भांति समझना होगा कि यह केवल एक कुंठित और ईर्ष्या से ग्रस्त नेता की बचकानी हरकत है या फिर सीमा पार से जुड़े किसी सुनियोजित और गहरे राष्ट्र-विरोधी षड्यंत्र का खतरनाक हिस्सा।
नेहरू के ब्लंडर्स पर चुप्पी और मोदी सरकार की कूटनीतिक सफलताओं पर हमला
विदेश नीति पर भाजपा को घेरने का प्रयास करने वाले राहुल गांधी अपने परदादा पंडित जवाहरलाल नेहरू के ऐतिहासिक ब्लंडर्स को पूरी तरह भूल जाते हैं। नेहरू के 17 वर्षों के विदेश मंत्री कार्यकाल में भारत ने 38,000 वर्ग किलोमीटर का अक्साई चिन गंवाया, कश्मीर का अंतरराष्ट्रीयकरण कर नासूर बनाया और पाकिस्तान के पक्ष में एकतरफा सिंधु जल समझौता किया। इसके विपरीत, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मजबूत नेतृत्व में भारत ने अनुच्छेद 370 को समाप्त किया, सीमावर्ती इंफ्रास्ट्रक्चर को अभूतपूर्व मजबूती दी और दुनिया भर में भारत का मान बढ़ाया। अपने पुरखों की ऐतिहासिक गलतियों पर पर्दा डालकर मोदी सरकार की सफलताओं पर उंगली उठाना राहुल गांधी के खोखलेपन को साबित करता है।
गले मिलने की कूटनीति पर राहुल का दोहरा मापदंड: इंदिरा और प्रियंका का इतिहास
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वैश्विक नेताओं के साथ आत्मीय और कूटनीतिक शिष्टाचार का उपहास उड़ाने वाले राहुल गांधी को अपने ही परिवार का इतिहास देखना चाहिए। इतिहास साक्षी है कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने क्यूबा के नेता फिदेल कास्त्रो से आत्मीयता से मुलाकात की थी और उनकी बहन प्रियंका गांधी भी सार्वजनिक मंचों पर वरिष्ठ नेताओं से इसी तरह मिलती रही हैं। जब उनके परिवार के सदस्य ऐसा करते हैं तो वह कूटनीति कहलाती है, लेकिन जब प्रधानमंत्री मोदी देश के हितों को साधने के लिए वैश्विक नेताओं से आत्मीय संबंध बनाते हैं, तो कांग्रेस को इसमें राजनीति दिखने लगती है। यह दोहरा रवैया उनके पाखंड को बेनकाब करता है।
राहुल गांधी भूल गए राजीव गांधी का दौर: आतंकवाद के जनक जिया उल हक को लगाया था गले
विदेश नीति पर ज्ञान देने वाले राहुल गांधी को शायद अपने पिता और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के दौर का इतिहास याद नहीं है। अस्सी के दशक में जब पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद कश्मीर को लहूलुहान कर रहा था, कश्मीरी पंडितों का नरसंहार हो रहा था और वहां के सैन्य तानाशाह जनरल जिया उल हक ने खुलेआम अंतरराष्ट्रीय मीडिया के सामने स्वीकार किया था कि वे कश्मीर में जेकेएलएफ को ट्रेनिंग और हथियार देकर आतंकवाद फैला रहे हैं, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कोई कठोर कदम नहीं उठाया। इसके विपरीत, तत्कालीन थल सेना प्रमुख जनरल के. सुंदर जी के नेतृत्व में भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन ब्रासटैक्स’ के तहत सीमा पर ऐतिहासिक सैन्य जमावड़ा किया, जिसका उद्देश्य पाकिस्तान को कड़ा सबक सिखाकर सीमा पार आतंकवाद को हमेशा के लिए समाप्त करना और रणनीतिक बढ़त बनाना था। भारतीय सेना के इस अप्रत्याशित पराक्रम से घबराकर जनरल जिया उल हक अचानक ‘क्रिकेट डिप्लोमेसी’ के बहाने भारत पहुंचे। देश के स्वाभिमान को ताक पर रखते हुए राजीव गांधी ने सोनिया गांधी के साथ दिल्ली एयरपोर्ट पर उस तानाशाह का भव्य स्वागत किया, उसे गले लगाया और जयपुर में साथ बैठकर मैच देखा। इसके तुरंत बाद भारतीय सेना को अपनी चौकियों से वापस बैरकों में लौटने का आदेश दे दिया गया, जिससे सेना के मनोबल को भारी आघात पहुंचा और पाकिस्तान के हौसले बुलंद हुए। ऐसे शर्मनाक कूटनीतिक इतिहास को दबाकर आज मोदी सरकार की मजबूत और स्वाभिमानी विदेश नीति पर सवाल उठाना राहुल गांधी के खोखलेपन को ही दर्शाता है।  
कपड़ों के रंग से कूटनीति की व्याख्या: राहुल गांधी का हास्यास्पद ‘लीडरशिप लेसन’
‘रचनात्मक कांग्रेस’ के मंच से नेतृत्व और विदेश नीति पर लंबा भाषण देने वाले राहुल गांधी ने अपनी दादी इंदिरा गांधी के अमेरिका दौरे का एक बेतुका किस्सा सुनाकर खुद को हास्य का पात्र बना लिया। उन्होंने दावा किया कि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन की पत्नी नैन्सी रीगन ने जानबूझकर इंदिरा गांधी की साड़ी के रंग से मिलती-जुलती ड्रेस पहनी थी, जिससे इंदिरा जी नाराज हो गईं कि अमेरिकी उन्हें ‘कलर मैचिंग’ के जरिए अपने पाले में करने की कोशिश कर रहे हैं। राहुल गांधी ने मंच पर ठहाके लगवाते हुए इसे कूटनीतिक ‘लीडरशिप’ का बड़ा पाठ बताया। जबकि ऐतिहासिक तथ्यों और तस्वीरों से साफ है कि दोनों के परिधानों के रंगों में कोई मेल ही नहीं था। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, भू-राजनीतिक समीकरणों और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर विषयों को कपड़ों के रंग और बचकाने घरेलू किस्सों तक सीमित कर देना नेता प्रतिपक्ष के सतही बौद्धिक स्तर को उजागर करता है। विश्व के राष्ट्राध्यक्षों के कूटनीतिक शिष्टाचार को ‘समझौता’ और ‘कलर मैचिंग’ जैसी फूहड़ व्याख्याओं में बांधना यह साबित करता है कि राहुल गांधी के पास नेतृत्व की न तो कोई ठोस समझ है और न ही कोई दृष्टि।
अभिव्यक्ति की आजादी पर पाखंड: दिल्ली में ढोंग, राज्यों में दमन
राहुल गांधी ने दिल्ली के मंच से यह दावा किया कि वे आरएसएस की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करेंगे, जबकि ठीक उसी दिन कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने सार्वजनिक स्थानों पर संघ और अन्य संगठनों की गतिविधियों को रोकने वाला बिल पेश कर दिया। आपातकाल थोपने वाली और प्रेस की आजादी पर ताला लगाने का इतिहास रखने वाली कांग्रेस पार्टी का अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर यह पाखंड देश के सामने पूरी तरह बेनकाब हो चुका है। कांग्रेस शासित राज्यों में सोशल मीडिया क्रिएटर्स और आलोचकों पर लगातार मुकदमे दर्ज कर उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है। राहुल गांधी का दोहरा चेहरा यह साफ करता है कि वे केवल भाषणों में लोकतंत्र की बात करते हैं, हकीकत में नहीं।
आरएसएस के इतिहास पर कांग्रेस का अचानक यू-टर्न
दशकों तक जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कांग्रेस पार्टी ने हर मंच से बदनाम किया, चरमपंथी बताया और अनर्गल आरोप लगाए, आज राहुल गांधी अचानक दावा कर रहे हैं कि संघ मूल रूप से सुनारों और छोटे व्यापारियों का संगठन था। बिना किसी ऐतिहासिक प्रमाण के अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार अपने ही दशकों पुराने स्टैंड से पूरी तरह पलट जाना कांग्रेस की वैचारिक कंगाली को दर्शाता है। जनता यह सवाल पूछ रही है कि क्या कांग्रेस इतने सालों से संघ के बारे में झूठ बोल रही थी या आज राहुल गांधी नया भ्रम फैला रहे हैं। यह यू-टर्न उनकी दिशाहीन राजनीति का सबसे बड़ा सबूत है।
खुद के कार्यक्रम का सही नाम तक नहीं ले पाए राहुल गांधी
अपनी पार्टी द्वारा आयोजित राष्ट्रीय स्तर के सम्मेलन में मुख्य वक्ता के रूप में पहुंचे राहुल गांधी मंच से अपने ही कार्यक्रम का नाम ठीक से उच्चारित नहीं कर सके। वे पूरे भाषण के दौरान ‘रचनात्मक’ शब्द का सही उच्चारण न करते हुए उसे बार-बार ‘रचनातक’ बोलते रहे, जिससे मंच पर मौजूद नेता भी असहज नजर आए। जो व्यक्ति अपनी ही पार्टी के कार्यक्रम के शीर्षक और विषय के प्रति सजग नहीं है, वह देश की जटिल समस्याओं और नीतियों को कैसे समझ सकता है। यह छोटी सी घटना भी उनकी गंभीरता और बुनियादी समझ की भारी कमी को दर्शाने के लिए काफी है।
51 कार्टन बॉक्स और नेहरू के गुप्त पन्नों पर रहस्यमयी चुप्पी
विदेश नीति पर भाजपा को घेरने की कोशिश करने वाले राहुल गांधी इस बात का कोई जवाब नहीं देते कि पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू के 51 कार्टन बॉक्स पत्रों पर अब तक पर्दा क्यों पड़ा हुआ है। कांग्रेस का प्रथम परिवार इन ऐतिहासिक दस्तावेजों को सार्वजनिक करने से क्यों बचता रहा है, जिनमें एडविना माउंटबेटन और नेहरू के बीच हुए संवाद भी शामिल हैं। अपनी पार्टी और परिवार के संदेहास्पद इतिहास को छिपाकर मोदी सरकार की पारदर्शी नीतियों पर लांछन लगाना कांग्रेस के पाखंड का सबसे बड़ा प्रमाण है।
नेहरू की ‘गले पड़ने’ वाली कूटनीति और सेना की उपेक्षा: जब चीन ने हड़प ली थी देश की जमीन
कूटनीति और गले मिलने के शिष्टाचार पर ज्ञान देने वाले राहुल गांधी को अपने नाना पंडित जवाहरलाल नेहरू के दौर की आत्मघाती नीतियों का स्मरण करना चाहिए। 1957 में जब तिब्बत पर अवैध कब्जा करने के बाद चीनी प्रीमियर चाऊ एन लाई भारत आया, तब नेहरू ने प्रोटोकॉल और सामरिक संवेदनशीलता को दरकिनार कर जबरन उन्हें गले लगाया था। ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के खोखले नारों के बीच चाऊ एन लाई को देश की संवेदनशील ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों का दौरा तक करवाया गया, जहां सैन्य हथियारों और गोला-बारूद के उत्पादन की जगह कपड़े और मोजे बनाने की शांतिवादी नीतियां दिखाई गईं। देश की रक्षा तैयारियों और सेना की इस उपेक्षा को भांपकर ही चीन ने भारत के खिलाफ आक्रामकता की योजना बनाई, जिसका दुष्परिणाम 1962 में अक्साई चिन और हजारों वर्ग किलोमीटर भारतीय भूभाग गंवाने के रूप में सामने आया। इसके बावजूद उस समय संसद में यह तर्क देकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की गई कि उस जमीन पर ‘घास का एक तिनका भी नहीं उगता’, जिस पर तत्कालीन सांसद महावीर त्यागी ने तीखा प्रतिवाद किया था। अपने पुरखों की इन ऐतिहासिक रणनीतिक भूलों पर पर्दा डालकर आज मोदी सरकार की मजबूत रक्षा और कूटनीतिक नीति पर सवाल उठाना राहुल गांधी के दोहरे चरित्र और अज्ञान को ही उजागर करता है।
कॉरपोरेट और पूंजीपतियों के नाम पर बेबुनियाद भ्रम फैलाने की पुरानी आदत
राहुल गांधी जब भी नीतिगत मुद्दों पर घिरते हैं, तो वे बिना किसी तथ्य के उद्योगपतियों और कॉरपोरेट घरानों के नाम पर अनर्गल आरोप लगाना शुरू कर देते हैं। सम्मेलन के दौरान भी उन्होंने देश के आर्थिक विकास में योगदान देने वाले उद्यमों पर बेबुनियाद हमले किए और आरोप लगाया कि सरकार का पूरा ढांचा केवल चंद लोगों से लाभ लेने के लिए काम कर रहा है। देश के औद्योगिकीकरण और विकास यात्रा को बदनाम कर भ्रम की राजनीति फैलाना कांग्रेस की नकारात्मक सोच को दिखाता है।
कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ने का साइकोलॉजिकल वार: नैरेटिव युद्ध की चुनौती
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी द्वारा लगातार शीर्ष नेतृत्व पर व्यक्तिगत और अमर्यादित हमले करना एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। वे ‘बिलो द बेल्ट’ हमलों के जरिए भाजपा कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ना चाहते हैं, ताकि बार-बार बोले गए झूठ को सच के रूप में स्थापित किया जा सके। इस परसेप्शन और नैरेटिव की राजनीति का मुकाबला करने के लिए भाजपा को भी आक्रामक, संगठित और पूरी मजबूती के साथ इन झूठे प्रचारों की हवा निकालनी होगी।
खोखले दावे बनाम मोदी सरकार का ठोस जमीनी रिकॉर्ड
राहुल गांधी विदेश नीति, मेक इन इंडिया, किसान कल्याण, आंतरिक सुरक्षा और सीमा प्रबंधन जैसे तमाम गंभीर विषयों पर केवल मनगढ़ंत आरोप लगाते हैं, जिनका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता। जबकि तथ्य और जमीनी आंकड़े यह गवाही देते हैं कि मोदी सरकार के कार्यकाल में भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना, रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता आई और सीमावर्ती ढांचा पहले से कहीं अधिक मजबूत हुआ। राहुल गांधी के झूठे नारों और राजनीतिक ड्रामे के सामने मोदी सरकार का ठोस रिपोर्ट कार्ड और विकास के कार्य पूरी मजबूती से खड़े हैं।
विजनविहीन राजनीति: सिर्फ मोदी-विरोध के सहारे टिकने की नाकाम कोशिश
राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि राहुल गांधी के पास देश के भविष्य, युवाओं के रोजगार और आर्थिक प्रगति के लिए कोई सकारात्मक विजन या ठोस कार्ययोजना नहीं है। वे अपनी पूरी राजनीतिक ऊर्जा और समय केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ अपशब्द कहने, व्यक्तिगत आक्षेप लगाने और सस्ती बयानबाजी करने में नष्ट कर रहे हैं। लोकतंत्र में जनता एक सकारात्मक और जिम्मेदार विकल्प चुनती है, न कि केवल निराधार विरोध और गाली-गलौज करने वाले नेतृत्व को। जब तक वे इस नकारात्मक राजनीति से बाहर नहीं निकलेंगे, तब तक वे देश के लिए केवल एक राजनीतिक बोझ बने रहेंगे।
संसदीय मर्यादा और संवैधानिक आचरण का लगातार हनन
नेता प्रतिपक्ष का पद एक अत्यंत गरिमामयी और महत्वपूर्ण संवैधानिक दायित्व होता है, जिसमें सरकार की नीतियों की आलोचना तर्कों, तथ्यों और संसदीय मर्यादा के दायरे में रहकर की जाती है। लेकिन राहुल गांधी लगातार संसद के भीतर और बाहर सार्वजनिक मंचों पर अभद्र, अमर्यादित और अलोकतांत्रिक भाषा का प्रयोग कर लोकतांत्रिक संवाद के स्तर को गिराने का काम कर रहे हैं। नीतिगत बहस करने के बजाय व्यक्तिगत हमलों पर उतरना यह साबित करता है कि वे इस संवैधानिक पद की गंभीरता और महत्व को समझने में पूरी तरह असफल रहे हैं।
विदेशी मंचों पर भारत की छवि को नुकसान पहुंचाने का षड्यंत्र
राहुल गांधी का यह गैर-जिम्मेदाराना आचरण सिर्फ देश की सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वे विदेशी दौरों और वैश्विक मंचों पर भी भारत की आंतरिक लोकतांत्रिक व्यवस्था, न्यायपालिका और चुनाव प्रणाली पर बेबुनियाद सवाल उठाते रहे हैं। अपने संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों को साधने के लिए देश की वैश्विक प्रतिष्ठा, संप्रभुता और कूटनीतिक साख को दांव पर लगाना अत्यंत निंदनीय और अक्षम्य है। देश की जनता भली-भांति देख रही है कि कैसे सत्ता की चाह में वे राष्ट्रीय हितों से समझौता करने से भी पीछे नहीं हटते।
नकारात्मकता और अमर्यादित भाषा कभी नहीं बन सकती राष्ट्रीय विकल्प
राहुल गांधी के हालिया बयानों और आचरण ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वे नेता प्रतिपक्ष जैसे उच्च संवैधानिक पद की गरिमा और उत्तरदायित्व को निभाने में पूरी तरह असमर्थ हैं। किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र में विपक्ष का काम नीतियों की तथ्यपरक समीक्षा करना और जनता के समक्ष एक सकारात्मक, ठोस और सशक्त वैकल्पिक विजन प्रस्तुत करना होता है। इसके विपरीत, राहुल गांधी का पूरा राजनीतिक अस्तित्व सिर्फ व्यक्तिगत द्वेष, अपशब्दों, विदेशी नेताओं पर भद्दी टिप्पणियों और राष्ट्रीय सुरक्षा पर झूठ फैलाने तक सीमित होकर रह गया है।
लगातार झूठ बोलकर और देश की संस्थाओं पर आक्षेप लगाकर कोई भी नेता जनविश्वास हासिल नहीं कर सकता। भारतीय लोकतंत्र परिपक्व है और देश की जनता भली-भांति जानती है कि फूहड़ स्टैंडअप कॉमेडी, देश-विरोधी नैरेटिव और गटर-स्तरीय राजनीति के बल पर 140 करोड़ भारतीयों के भविष्य का नेतृत्व नहीं किया जा सकता। राहुल गांधी जब तक इस स्तरहीन नकारात्मकता से बाहर निकलकर राष्ट्रहित की राजनीति नहीं करेंगे, तब तक वे भारतीय राजनीति में केवल एक अप्रासंगिक और गैर-जिम्मेदार चेहरे के रूप में ही देखे जाएंगे।

स्पेन में घुसे हजारों अफ्रीकी घुसपैठियों को संभालने के लिए सेना तैनात, SC का आदेश बना ढाल: 6 साल पहले कैसे तबाही की कगार पर पहुँचा था यूरोप, भारत में भी घुसपैठियों के पास कानूनी ढाल

                                     स्पेन पहुँचे हजारो मोरक्को के घुसपैठिए (फोटो साभार-x@foxnews)

यूरोप एक बार फिर अवैध शरणार्थियों के नाम से काँप रहा है। दरअसल अफ्रीकी देश मोरक्को से बड़ी संख्या में अवैध शरणार्थी स्पेन में घुस गए हैं। ये लोग समुद्र तैर कर या जमीनी बॉर्डर के जरिए अवैध तरीके से स्पेन में घुस रहे हैं। सेउटा में घुसने से माइग्रेंट स्पेन के इलाके और आगे चलकर EU के इलाके में आ सकते हैं, जहाँ वे शरण माँग सकते हैं।

इन शरणार्थियों ने 8 साल पहले सीरिया संकट की याद ताजा कर दी है, जब यूरोप में बड़े पैमाने पर कट्टरपंथी शरणार्थी के तौर पर आए थे। स्पेन, फ्रांस, स्वीडन, जर्मनी समेत कई देशों में इनकी संख्या इतनी बढ़ गई कि प्रशासनिक व्यवस्था चरमराने लगी। इसकी याद दिलाते हुए इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी ने शरणार्थियों के नए दौर पर चिंता जाहिर की है और कहा है कि वे स्पेन के साथ शेंगेन समझौता रद्द कर सकते हैं।

क्या है मामला

सेउटा मोरक्को के उत्तरी तट पर स्पेन के कंट्रोल वाला एक छोटा सा इलाका है। इससे सटे मेलिला एन्क्लेव में अफ्रीका और यूरोपियन यूनियन का जमीनी बॉर्डर है। सेउटा में हजारों शरणार्थी ब्रेकवॉटर के आस-पास तैरकर या बॉर्डर की बाड़ तोड़कर घुस गए हैं, जिससे छोटा-सा यूरोपियन देश स्पेन पर काफी दबाव बढ़ गया है। यहाँ तक कि स्पेन को सेना और ज्यादा पुलिस बल तैनात करनी पड़ी है।

अवैध तरीके से घुस आए बेलगाम शरणार्थियों के चलते बवाल मच गया है। यहाँ बड़ा मानवीय और सुरक्षा संकट पैदा हो गया है। दरअसल अचानक हजारों शरणार्थी सीमा पार कर घुसने लगे। फॉक्स न्यूज के मुताबिक, हजारों शरणार्थी मोरक्को की सीमा पार कर स्पेन के शहर सेउटा में दाखिल हुए। नए जत्थे में 1500 से ज्यादा शरणार्थी हैं, जो समुद्र के रास्ते शहर में दाखिल हो रहे हैं। सेउटा के प्रशासनिक अधिकारी जुआन जीसस विवास के मुताबिक, पिछले हफ्ते भर से शरणार्थियों का आना काफी बढ़ गया है और संसाधनों की कमी हो रही है।

स्पेन में घुस रहे शरणार्थियों का वीडियो भी सामने आया है। सैकड़ों लोग इन्फ्लेटेबल ट्यूब और दूसरे फ्लोटेशन डिवाइस का इस्तेमाल करके ब्रेकवाटर के आसपास तैरते हुए दिखे। हजारों लोग जमीनी सीमा के गेट से घुसते दिखाई दिए। इससे घबरा कर सीमा पर तैनात सुरक्षाकर्मी घबरा कर भाग गए।

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, स्पेन के सरकारी ब्रॉडकास्टर TVE ने अंदाजा लगाया है कि करीब 3000 लोग इस इलाके में घुसे हैं। समुद्र पार करते वक्त 9 शरणार्थियों की लाश भी पुलिस ने बरामद की है। इन शरणार्थियों में ज्यादातर मोरक्को के नागरिक हैं। दरअसल यूरोप में जमीन से घुसने का एकमात्र रास्ता मोरक्को और स्पेन की सीमा है। यहाँ तक कि सबसे आसान समुद्री रास्ता भी स्पेन तक ही जाता है। इसलिए 2021 के बाद 30 जुलाई 2026 को सबसे ज्यादा शरणार्थी स्पेन में घुस आए हैं। इसके साथ ही लगातार इनके आने का सिलसिला जारी है।

स्थानीय प्रशासन ने केन्द्र को आर्मी तैनात करने और नेशनल इमरजैंसी घोषित करने की माँग की है। स्पेन में आर्मी की हलचल तेज है। बख्तरबंद गाड़ियाँ घूमने लगी हैं। हालाँकि आपातकाल की घोषणा नहीं की गई है।

क्या कहा मेलोनी ने

स्पेन में बॉर्डर पर बवाल के बाद इटली भी सचेत हो गया है। अवैध शरणार्थियों के आने पर इटली ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी ने कहा कि वह ‘कड़े उपायों’ पर विचार कर रही हैं। उन्होंने स्पेन के साथ शेंगेन समझौते (Schengen Agreement) को अस्थायी रूप से निलंबित करने की चेतावनी दी है।

यूरोपीय देशों के बीच सीमा खुला रखने से जुडा शेंगेन समझौता इसके सदस्य देशों के बीच 1985 में हुई थी। जिसके तहत सदस्य देशों ने अपनी आपसी सीमाओं पर नियंत्रण समाप्त कर दिया है यानी इटली ने अपनी सीमा सील करने की चेतावनी दी है।

मेलोनी ने X पर लिखा, “सेउटा से आ रही तस्वीरें चौंकाने वाली हैं और एक बार फिर दिखाती हैं कि बिना कंट्रोल के अवैध घुसपैठ यूरोप के बॉर्डर की सिक्योरिटी के लिए एक बड़ा खतरा है।”

उन्होंने कहा कि इटली इस पर विचार कर रहा है कि वह स्पेन के साथ शेंगेन एरिया को सस्पेंड कर दिया जाए। हालाँकि मेलोनी ने यह नहीं बताया कि ऐसा कैसे किया जाएगा।

स्पेन के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आई शरणार्थियों की बाढ़

शरणार्थियों को लगता है कि यहाँ पहुँचने पर स्पेन के मुख्य भाग में एंट्री हो जाएगी और फिर यूरोपीय यूनियन के देशों तक पहुँचना आसान हो जाएगा।

स्पेन का मानना है कि मोरक्को और दूसरे अफ्रीकी देशों से जो शरणार्थी आ रहे हैं, उसके पीछे तस्करी करने वाले नेटवर्क का हाथ है। हाल ही में स्पेन के सुप्रीम कोर्ट ने बिना सही प्रक्रिया के समुद्र के रास्ते सेउटा में आने वाले शरणार्थियों को तुरंत वापस लौटने पर रोक लगा दी थी। स्पेन के सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मोरक्को के रास्ते सेउटा-मेलिला आने वाले शरणार्थियों को पकड़े जाने पर बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के सीधा मोरक्को नहीं भेजा जा सकता है। इससे तस्करी करने वाले नेटवर्क को बढ़ावा मिला है।

शरणार्थी सेउटा पहुँचने से पहले मोरक्को के शहर फनीडेक में इकट्ठा हो रहे हैं। मोरक्को के सुरक्षा बल इन पर काबू पाने की कोशिश कर रहे हैं और इन पर पानी की बौछारें की जा रही हैं, लेकिन ये टस से मस नहीं हो रहे।

स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज और गृह मंत्री फर्नांडो ग्रांडे-मार्लास्का के शुक्रवार को सेउटा जाकर लोकल अधिकारियों और सुरक्षा कर्मियों से मुलाकात की है। साथ ही मोरक्को के साथ कोऑर्डिनेट कर जो लोग अवैध तरीके से आए हैं, उन्हें वापस भेजने को लेकर वार्ता करेंगे।

2011-21 के बीच सेउटा में घुस आए थे शरणार्थी

स्पेन के साथ डिप्लोमैटिक विवाद के बीच मई 2021 में मोरक्को ने सीमा पर ढील दे दी थी, जिससे मात्र दो दिनों में हजारों लोग सेउटा घुस आए थे। इन अवैध शरणार्थियों में कई नाबालिग शामिल थे। नई शरणार्थियों की घुसपैठ से स्पेन और मोरक्को के रिश्तों पर असर पड़ने की आशंका है। हालाँकि अभी तक दोनों देशों ने सहयोग करने की बात कही है।

साल 2011 में शुरू हुए सीरियाई गृहयुद्ध और आईएसआईएस के आतंक से बचने के लिए लाखों सीरियाई यूरोपीय यूनियन के देशों में शरणार्थी बन कर आए। इनके यूरोप पहुँचने के कई मार्ग थे, जिनमें मोरक्को से होते हुए स्पेन तक पहुँचना भी एक था। उस वक्त भी इनलोगों ने समुद्री और जमीनी रास्ते को वैसे ही चुना था, जैसा अभी हो रहा है।

यहाँ से यूरोप के दूसरे देशों में ये पहुँचे। जर्मनी, स्वीडन, ऑस्ट्रिया, नीदरलैंड जैसे अमीर यूरोपीय देशों ने इनके लिए अपनी ‘मानवीयता’ दिखाई। इनलोगों को शरण दी गई। इसके बाद 2015 में यूरोप का प्रवासी संकट भी आया और यूरोप के ज्यादातर देशों में कट्टरपंथियों की जमात बढ़ गई। हालात ये है कि इंग्लैंड, फ्राँस, जर्मनी समेत सारे देश अब क्राइम काफी बढ़ गया है। इस्लामी ग्रूमिंग गैंग लगातार स्थानीय नाबालिग लड़कियों को अपना निशाना बना रहे हैं। रेप, लूट-पाट, नशे की तस्करी जैसे क्राइम से निपटना स्थानीय सुरक्षा बलों के लिए मुश्किल हो रहा है।

अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल ही में घुसपैठियों को लेकर कहा है कि अफ्रीका और दुनिया के दूसरे हिस्सों से आने वाले घुसपैठिए यूरोपीय देशों और यूके के लिए खतरा हैं। ये लोग यूरोप की पहचान और संस्कृति को नष्ट कर रहे हैं। उन्होंने इसको लेकर यूरोपीय नेताओं की आलोचना भी की थी कि उन्होंने नरमी बरती और कड़े कदम नहीं उठाए।

यूरोप की इस समस्या से भारत भी दो चार होता रहा है। यहाँ अवैध घुसपैठियों की वजह से दशकों से कई दिक्कतें पेश आ रही हैं। असम से पश्चिम बंगाल तक बांग्लादेशी घुसपैठियों से सिर्फ आबादी ही नहीं बढ़ी है, बल्कि सीमावर्ती इलाकों में जबरदस्त तरीके से डेमोग्राफी भी बदली है।

संसद में विदेश मामलों की स्थाई समिति ने बांग्लादेश से भारत में होने वाली अवैध घुसपैठ पर चिंता जताते हुए इस पर ज्वाइंट वर्किंग ग्रुप तैयार करने की बात कही है। ताकि बांग्लादेशी घुसपैठियों की राष्ट्रीयता की पुष्टि होने और उनके प्रत्यर्पण पर निगरानी रखने में आसानी हो। समिति के मुताबिक, अभी 2369 संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों की राष्ट्रीयता की पुष्टि के मामले बांग्लादेश सरकार के पास लंबित हैं।

ये तो उन नागरिकों की बात है, जिनके मामले सामने आए हैं। लेकिन भारत में ऐसे अवैध घुसपैठियों के मामले अक्सर सामने आते हैं, जिनका पता सालों बाद चलता है। इनके वजह से भारत के संसाधनों पर असर पड़ता है और रोजगार प्रभावित होते हैं। चुनाव में ये लोग पार्टियों के वोट बैंक बन जाते हैं और उनके पास भारत के वोटर कार्ड से लेकर आधार कार्ड तक पहुँच जाता है। ये लोग रोजगार पर बहुत ज्यादा दबाव डालते हैं। चुनावों में इसका असर भी दिखता है।

न सिर्फ राजनीतिक-सामाजिक तौर पर बल्कि आर्थिक तौर पर भी इससे देश कमजोर होता है। घुसपैठियों के खिलाफ अभियान चलाने के दौरान कई बार मानवाधिकार की बात की जाती है। सुप्रीम कोर्ट तक में कई ऐसे मामले दर्ज हैं। कोर्ट ने घुसपैठियों को लेकर कहा है कि उनके पास कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

लेकिन स्थानीय स्तर पर मिलने वाले फर्जी दस्तावेज और कानूनों की कुछ सीमाएं उन्हें अनौपचारिक सुरक्षा प्रदान करती हैं। स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार और मिलीभगत से आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर आईडी जैसे कागजात बन जाने के कारण पुलिस या प्रशासन के लिए तुरंत पहचान करना मुश्किल होता है। अगर पहचान हो भी गई तो कोर्ट में मामला लंबित रहता है। बड़े बड़े वकील से लेकर पूरा लिबरल इकोसिस्टम उन्हें बचाने में लग जाता है।

‘मेरे साथ फोटो के लिए गिड़गिड़ाईं मेलोनी’: अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के बयान पर तमतमाईं इटली की प्रधानमंत्री ने दिया करारा जवाब

                                       डोनाल्ड ट्रंप और जॉर्जिया मेलोनी (फोटो साभार: ChatGPT)
इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच जुबानी जंग छिड़ गई है। ट्रंप ने हाल ही में दावा किया था कि फ्रांस में हुए जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान मेलोनी ने उनके साथ तस्वीर खिंचवाने के लिए ‘मिन्नतें’ की थीं। ट्रंप ने यह भी कहा था कि उन्होंने मेलोनी के साथ फोटो सिर्फ इसलिए खिंचवाई क्योंकि उन्हें उन पर तरस आ गया था।

 ट्रंप के इस बयान पर मेलोनी ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि ट्रंप के दावे पूरी तरह मनगढ़ंत हैं और उन्हें यह सुनकर हैरानी हुई। मेलोनी ने कहा, “डोनाल्ड ट्रंप की बातें पूरी तरह झूठी हैं। मैं सचमुच हैरान हूँ। मुझे समझ नहीं आता कि अमेरिका के राष्ट्रपति अपने सहयोगी देशों के साथ ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं।”

दरअसल, ट्रंप ने इटली के टीवी चैनल La7 को दिए एक इंटरव्यू में दावा किया था कि मेलोनी उनके साथ फोटो खिंचवाने के लिए बेहद लालायित थीं। उन्होंने कहा था कि मेलोनी उनसे बात करके भी खुश होंगी क्योंकि उन्हें उनसे बात करने की कोई जरूरत नहीं थी। ट्रंप ने यहाँ तक कह दिया कि मेलोनी फोटो के लिए उनसे बार-बार आग्रह कर रही थीं।

हालाँकि जी-7 सम्मेलन के दौरान दोनों नेताओं की बातचीत के वीडियो सामने आए हैं, जिनमें वे काफी देर तक चर्चा करते दिखाई दे रहे हैं। इसी बीच मेलोनी ने ट्रंप पर निशाना साधते हुए कहा कि वह अपने सहयोगियों के प्रति तो सख्त रवैया दिखाते हैं लेकिन पश्चिमी देशों और अमेरिका के विरोधियों के प्रति उतनी कठोरता नहीं दिखाते।

मेलोनी ने अपने जवाब में कहा, “एक बात उन्हें याद रखनी चाहिए, न मैं और न ही इटली कभी किसी के सामने गिड़गिड़ाता है।” विवाद बढ़ने के बाद इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो तजानी ने 21 और 22 जून को प्रस्तावित अपनी अमेरिका यात्रा रद्द कर दी। उन्होंने कहा कि ट्रंप की टिप्पणियां गंभीर और अपमानजनक हैं तथा उन्होंने पूरे इटली का अपमान किया है।

क्या जॉर्जिया मेलोनी को डेट कर रहे एलन मस्क? क्यों कहा- ये जितनी बाहर से सुंदर, उससे कहीं अधिक भीतर से…

        फोटो पर दोनों के डेटिंग करने की बात कही गई (फोटो साभार: X/@SawyerMerritt/@iam_smx)
इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी की हाल ही में अमेरिकी कारोबारी एलन मस्क ने काफी प्रशंसा की। इटली की प्रधानमंत्री की प्रशंसा एलन मस्क ने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र के एक कार्यक्रम में की। इसका एक वीडियो भी जॉर्जिया मेलोनी ने अपने एक्स (पहले ट्विटर) पर पोस्ट किया।

इस वीडियो में एलन मस्क मस्क, मेलोनी के इटली में किए गए कामों और उससे आए परिणामों को बताते हैं। इसके बाद मस्क ने यह भी कहा कि मेलोनी जितनी बाहर से सुंदर हैं, उससे ज्यादा अंदर से सुंदर हैं। दोनों की एक तस्वीर भी सोशल मीडिया पर वायरल हुई।

इस तस्वीर में दोनों एक डिनर में एक साथ बैठे हैं और एक दूसरे की तरफ देख रहे हैं। यह फोटो सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गई। इस तस्वीर के बाद लोगों ने इस बात को लेकर चर्चा की क्या एलन मस्क और जॉर्जिया मेलोनी एक-दूसरे को डेट कर रहे हैं।

एलन मस्क ने डेटिंग के इस सवाल का खुद ही जवाब दे दिया है। उन्होंने डेटिंग के कयास को लेकर एक्स पर की गई एक पोस्ट के जवाब में साफ किया कि वह डेट नहीं कर रहे। उन्होंने लिखा, “हम डेट नहीं कर रहे हैं।” उनका यह जवाब भी अब वायरल है। यह ऐसा पहला मौका नहीं है जब जॉर्जिया मेलोनी चर्चाओं में बनी हुई हैं, इससे पहले भी वह कई बार कई मामलों को लेकर इंटरनेट पर छाई रही है।

जॉर्जिया मेलोनी

जॉर्जिया मेलोनी का जन्म 15 जनवरी 1977 को हुआ। प्रधानमंत्री बनने से पहले वह एक इतालवी पत्रकार और पॉलिटिशियन थीं। सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी के समर्थकों ने एक आंदोलन शुरू किया था। इसे इटालियन सोशल मूवमेंट नाम दिया गया था। 15 साल की उम्र में मेलोनी ने इसके यूथ विंग में काम किया। मेलोनी के पिता अकाउंटेंट थे। रोम में जन्मीं मेलोनी अंग्रेजी, स्पेनिश और फ्रेंच बोलती हैं। उनकी एक बेटी है, जिसका जन्म 2006 में हुआ।

इटली की पहली दक्षिणपंथी प्रधानमंत्री

जॉर्जिया मेलोनी साल 2008 में 31 साल की उम्र में इटली की सबसे युवा मंत्री बनी थीं। वहीं साल 2012 में उन्होंने ब्रदर्स ऑफ इटली पार्टी की स्थापना की। इसके बाद 2021 में मेलोनी की किताब आई ‘आइ एम जॉर्जिया’, जिसमें उनके विजन और विचारों पर खूब बात हुई है। 
जॉर्जिया मेलोनी के बारें में एक तथ्य ये भी है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद इटली में ये पहली बार हुआ है जब राइट विंग कि कोई नेता प्रधानमंत्री की गद्दी पर बैठी हों। ब्रदर्स ऑफ इटली पार्टी की नेता मेलोनी ने प्रधानमंत्री बनने से पहले ही मुस्लिम अप्रवासियों को शरण देने का खुलकर विरोध किया था और इसके साथ ही समलैंगिकों (LGBT) का भी उन्होंने जमकर विरोध किया था।

कट्टरपंथी इस्लाम, आतंकवाद और समलैंगिकता की मुखर विरोधी 

25 सितंबर, 2022 को अपनी जीत के बाद से ही मेलोनी समर्थक जहाँ खुश हैं वहीं उनके आलोचक उनकी दक्षिणपंथी ब्रदर्स ऑफ़ इटली पार्टी के उदय के बाद से ही लगातार हमले कर रहे हैं। मेलोनी जिन मुद्दों पर चुनाव जीतकर आईं थीं, उन्होंने प्रधानमंत्री बनते ही स्पष्ट कर दिया है कि वह एलजीबीटी लॉबी, जेंडर आइडियोलॉजी और कट्टरपंथी इस्लाम का विरोध करती हैं, इसके साथ अपने ऊपर लगाए जा रहे आरोप की वह नव-फासीवादी हैं, उन्होंने साफ़ मना कर दिया था।

इस्लाम के विरुद्ध स्वीडन उठा, बड़े नेताओं को खरीद जॉर्ज सोरोस कोशिश कर रहा पूरे यूरोप के इस्लामीकरण के लिए

सुभाष चन्द्र

स्वीडन की उप प्रधानमंत्री एब्बा बुश ने मुस्लिम समुदाय को सख्त संदेश देते हुए कहा है कि “शरिया कानून वाले इस्लाम के लिए स्वीडन में कोई जगह नहीं है। मुसलमान अपने जीवन में स्वीडिश मूल्यों को अपनाएं या फिर देश छोड़ दें। इस्लाम को स्वीडिश मूल्यों के अनुसार ढलना होगा। स्वीडन और यूरोप में बहुत से लोग इस्लाम का उसी तरह जैसे वे अधिनायकवादी राज्यों में करते हैं”।

एब्बा बुश ने आगे भी कहा कि “इस्लाम को हमारे मौलिक साझा मूल्यों के अनुकूल होना चाहिए, जो स्वीडन और यूरोप को यूरोप बनाते हैं, ये वही मूल्य हैं जो हमें एक दूसरे के साथ सहिष्णुता, शांति और स्वतंत्रता में रहने में सक्षम बनाते हैं, कुछ मूल्य वैकल्पिक नहीं होते”। 

एब्बा बुश के समर्थक बयान की तारीफ कर कह रहे हैं कि उनका रुख स्वीडिश सांस्कृतिक मूल्यों को संरक्षित करने के लिए महत्वपूर्ण है। उनके विरोधी (लगता है सेकुलर हैं) कह रहे हैं कि वे इस्लामोफोबिया को बढ़ा रही हैं। वो मुसलमानों को कलंकित कर उन्हें अलग थलग कर देंगी। स्वीडन इसी वर्ष मार्च में NATO में शामिल हुआ है।

 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
पूरा यूरोप और ब्रिटेन मुस्लिम शरणार्थियों से भरा पड़ा है और ये सब शरणार्थी इस्लामिक देशों से आये हैं जिन्हें 56 इस्लामिक देश कभी अपने यहाँ शरण नहीं देते और आज ये शरणार्थी ब्रिटेन और कई यूरोपीय देशों में समस्या बन चुके हैं। स्वीडन में हाल ही में शरणार्थी प्रवासियों की संख्या बढ़ी है और जाहिर एब्बा बुश की चिंता का कारण यही है। स्वीडन के वर्तमान आबादी करीब एक करोड़ 70 लाख है जिसमें 1,88,000 मुस्लिम हैं और सबसे ज्यादा 20% मुस्लिम स्वीडन के शहर Maimo में रहते हैं।

पिछले कुछ समय में स्वीडन, डेनमार्क, बुल्गारिया, ब्रिटेन, नॉर्वे, जर्मनी (बर्लिन) और फ्रांस में मुस्लिमों ने जम कर दंगे किए और करोड़ों की संपत्ति को आग लगा दी। एक ही तरह से दंगे किए जाते रहे हैं, यूरोप के अलावा म्यांमार, दिल्ली, हल्द्वानी,श्रीलंका, थाईलैंड और बांग्लादेश में भी दंगे किए गए।

ये सभी यूरोपीय देश और ब्रिटेन जहां दंगे हुए NATO के सदस्य हैं और इन देशों में दंगे करने वाले मुस्लिमों को कोई इस्लामिक देश कंट्रोल नहीं करना चाहता जबकि कई इस्लामिक देशों से उन्हें  पूरी मदद पहुंचती है। किसी इस्लामिक देश में इतनी हिम्मत नहीं कि मुस्लिम समुदाय के लिए इनमे से किसी देश पर हमला कर दे क्योंकि सब NATO मेंबर हैं। 

कुछ समय पहले नीदरलैंड के Geert Wilders ने भी अपने मुल्क में मुस्लिमों पर सख्त टिप्पणियां करते हुए मस्जिदों को बैन करने की भी बात कही थी। इटली की Giorgia Meloni ने भी नई मस्जिदों पर पाबंदी लगाई थी और यहां तक कहा था मस्जिदों में जो कुछ भी होता है सरकार को बताना पड़ेगा।

जर्मनी और ब्रिटेन को भी अब कुछ समझ आ रहा है जहां मस्जिदों पर निगरानी की जा रही है और बंद किया जा रहा है क्योंकि वहां आतंकी गतिविधियों के सबूत मिले। सबसे बड़ा रहस्य तो हंगरी के प्रधानमंत्री Viktor Orban ने खोला है कि George Soros की योजना पूरे यूरोप का इस्लामीकरण करने की है जिसके लिए उसने यूरोपीय देशों के कुछ बड़े नेताओं को खरीद लिया है। 

अभी अमेरिका इस्लाम के खतरों से परिचित होते हुए भी ध्यान नहीं दे रहा लेकिन कल वहां भी वही होगा जो आज यूरोपीय देशों में हो रहा है। 

किसी समाज में Integrate (एकीकृत) होकर रहना इस्लाम में संभव नहीं है क्योंकि उनके लिए किसी भी देश के संविधान और कानून से ऊपर शरिया है। चीन ने जो मुस्लिमों का इलाज किया है उस पर कोई इस्लामिक देश नहीं बोलता और लगता है एक दिन पूरे विश्व को चीन का फार्मूला अपनाना पड़ेगा। 

देश में अब आएगा भूचाल : इटली ने भारत को सौंपे अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले से जुड़े दस्तावेज!


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव के दौरान 4 जून के बाद 6 महीने के भीतर देश में बहुत बड़ा भूचाल आने की बात कही थी। उस वक्त लोगों की समझ में भले ही बात नहीं आई हो लेकिन अब जो खबर आ रही है उससे भूचाल आना तय है। जानकारी के मुताबिक, इटली ने अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर घोटाले पर अपनी अदालत के फैसले की विस्तृत रिपोर्ट, जो कि 225 पृष्ठों की है, के साथ ही घोटाले से संबंधित दस्तावेज भारत के साथ साझा किया है। ये वे दस्तावेज हैं जिससे इस घोटाले से जुड़े भारत के कई हाई प्रोफाइल बिचौलियों से लेकर राजनेताओं तक को सजा हो सकती है या यूं कहें कि जो लोग अभी सबूत के अभाव में खुले घूम रहे हैं वे जेल जा सकते हैं। दस्तावेज में एक पूर्व प्रधानमंत्री और एक राजनीतिक परिवार का नाम आने की बात भी कही जा रही है। अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलीकॉप्टर घोटाले में भारत के कई नेताओं से लेकर बिचौलियों को 600 करोड़ रुपये से अधिक की रिश्वत मिली थी।

मोदी के इटली दौरे से कांग्रेस क्यों नाराज

पीएम मोदी हाल ही में जी-7 शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए इटली गए थे। वहां जिस गर्मजोशी से उनका स्वागत किया गया, वो देश के विपक्षी दलों के नेताओं को रास नहीं आया। विशेष रूप से कांग्रेस पार्टी पीएम मोदी के इस दौरे से कुछ ज्यादा ही परेशान दिखी। तभी तो उसने पीएम मोदी की इटली यात्रा के उद्देश्य पर ही सवाल खड़ा कर दिया। इतना ही नहीं कांग्रेस ने मजाक तक उड़ाया और कहा कि प्रधानमंत्री तो केवल फोटो खिंचाने के लिए इटली गए। दरअसल अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले को लेकर कांग्रेस का यह डर उसकी खीज के रूप में बाहर आ रहा है। अब जब भारत सरकार को दस्तावेज हाथ लग गया है तो ऐसे भ्रष्ट नेताओं और नौकरशाहों की पेशानी पर बल आना स्वाभाविक ही है।  

देश की राजनीति में भूचाल आने वाला हैः पीएम मोदी

लोकसभा चुनाव 2024 के मद्देनजर प्रधानमंत्री मोदी ने 29 मई को पश्चिम बंगाल के मथुरापुर में चुनावी रैली में कहा कि 4 जून के बाद अगले 6 महीनों में देश की राजनीति में बड़ा भूचाल आने वाला है। परिवारवादी पार्टियां अपने आप बिखर जाएगी।

इटली ने भारत को सौंपे डॉक्यूमेंट

इटली की सरकार ने अगस्ता वेस्टलैंड घोटाला से जुड़े अपने यहां के कोर्ट केस और सबूतों से संबंधित कुछ दस्तावेज भारत को सौंपे हैं। इससे यहां भी अगस्ता वेस्टलैंड घोटाला की जांच में तेजी आ सकती है। बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने तो ट्वीट कर ये दावा भी किया है कि इसी वजह से कांग्रेस ने पीएम नरेंद्र मोदी की हाल की इटली यात्रा पर सवाल उठाए थे।

यूपीए सरकार के दबाव में इटली ने दबा लिया था दस्तावेज

6 मई 2014 को नरेंद्र मोदी जब पहली बार भारत के प्रधानमंत्री बने, उसके लगभग 8 महीने पहले, इटली की एक अदालत ने भारत से जुड़े सबसे बड़े अगस्ता वेस्टलैंड रिश्वत घोटालों में एक हाई प्रोफाइल कंपनी के सीईओ, एक इतालवी रक्षा कंपनी के अध्यक्ष और दो बिचौलियों सहित चार लोगों को दोषी ठहराते हुए एक फैसला सुनाया था। लेकिन, इस मामले में वहां की अदालत में दर्ज अभियुक्तों के पूरे बयान, अपीलों का पूरा लेखा-जोखा और अदालत के अंतिम फैसले को 2013 में भारत के दबाव में तत्कालीन इतालवी सरकार द्वारा कभी भी सार्वजनिक नहीं किया गया था, क्योंकि इससे भारत के राजनीतिक और नौकरशाही प्रतिष्ठानों में भूचाल आ सकता था।

यूपीए-2 के दौरान सत्ता में बैठे लोगों के लिए खतरे की घंटी

इटली के द्वारा भारत को सौंपे गए सीलबंद इतालवी दस्तावेजों में रक्षा घोटाले में रिश्वत पाने वालों के नाम भी हैं। इससे यूपीए-2 के दौरान सत्ता में बैठे लोगों के लिए खतरे की घंटी बजना तय है। यह सबसे बड़े रक्षा घोटालों में से एक है जो एक दशक तक दबा रहा और अब इसके ऊपर से पर्दा उठना तय नजर आ रहा है।

दस्तावेज में भारत के पूर्व पीएम और राजनीतिक परिवार का नाम

इतालवी अदालत का फैसला भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और भारत के प्रमुख राजनीतिक परिवार के मुखिया में से एक की भूमिका को उजागर करता है। 225 पेज के फैसले में रिश्वत कांड का पूरा खुलासा किया गया है और इसमें सबूत के तौर पर हाथ से लिखे नोट भी हैं। ओरसी और अन्य ने कबूल किया है कि कैसे उन्होंने भारतीय राजनेताओं को रिश्वत दी और सौदे के लिए कड़ी पैरवी की। अन्य बातों के अलावा, फैसले में एक प्रमुख राजनीतिक दल के महासचिव और भारत के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के खिलाफ सबूतों का हवाला दिया गया है। सूत्रों ने बताया कि भारत के एक बड़े राजनेता और एक राजनीतिक परिवार के मुखिया का नाम इतालवी अदालत के फैसले के पेज 193 और 204 पर 4 बार, 2-2 बार उल्लेखित है।


रिश्वत की रकम बांटने के लिए हस्तलिखित नोट

सूत्रों का कहना है कि इतालवी अदालत के फैसले के पेज 9 पर एक बिचौलिए क्रिश्चियन मिशेल जेम्स (भारत की हिरासत में एक ब्रिटिश नागरिक) का हस्तलिखित नोट हैश्के को चिपकाया गया है कि रिश्वत के 30 मिलियन यूरो (करीब 268 करोड़ रुपये) के कुल कमीशन को कैसे वितरित किया जाए। नोट में रक्षा सचिव, डीजी एक्विजिशन, रक्षा मंत्रालय के संयुक्त सचिव सहित यूपीए युग के नौकरशाहों के बीच रिश्वत के पैसे का विस्तृत विवरण दिया गया है। इतालवी अदालत के फैसले से पता चलता है कि वायु सेना के अधिकारियों को 6 मिलियन यूरो (53 करोड़ रुपये)और नौकरशाहों को 8.4 मिलियन यूरो (करीब 75 करोड़ रुपये) का भुगतान किया गया था।

भारतीय राजनेताओं को लगभग 14 से 16 मिलियन यूरो का भुगतान

इतावली अदालत के फैसले में उद्धृत दस्तावेजों में कहा गया है कि भारतीय राजनेताओं को लगभग 14 से 16 मिलियन यूरो (करीब 140 करोड़ रुपये) का भुगतान किया गया था, जिसमें ‘एपी’ अक्षर वाले एक राजनीतिक सचिव भी शामिल थे। फैसले के पेज नंबर 163 और 164 पर भारत के पूर्व प्रधानमंत्री का नाम बताया गया और बताया गया कि कैसे ओरसी ने सौदे के लिए उनके साथ पैरवी की। इतालवी अदालत के फैसले में पेज नंबर 163 पर ओरसी का एक नोट लगाया गया है, जो जेल से तत्कालीन इतालवी नौकरशाहों और प्रधानमंत्री मारियो मोंटी और राजदूत पास्क्वेले टेरासिआनो के साथ तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री से बात करने के लिए पैरवी कर रहे थे।

अप्रैल 2019 में ईडी ने सोनिया गांधी की करीबी अहमद पटेल का नाम लिया

अप्रैल 2019 में, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने अगस्ता वेस्टलैंड आरोपपत्र में कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी के करीबी विश्वासपात्र और लंबे समय तक राजनीतिक सचिव अहमद पटेल (एपी) का नाम लिया था। आरोप पत्र के ठीक एक दिन बाद, पीएम मोदी ने उत्तराखंड के देहरादून में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए कांग्रेस नेताओं पर करोड़ों रुपये के वीवीआईपी हेलीकॉप्टर घोटाले में शामिल होने का आरोप लगाया था। पीएम मोदी ने कहा था “हेलीकॉप्टर घोटाले के दलालों ने जिन लोगों को घूस देने की बात कही है उसमें एक ‘एपी’ है, दूसरा ‘फैम’ है। इसी चार्जशीट में कहा गया है कि ‘एपी’ का मतलब है ‘अहमद पटेल’ और ‘फैम’ का” मतलब है ‘परिवार।’

क्रिश्चियन मिचेल ने रिहाई की मांग की

अगस्ता वैस्टलैंड हेलिकॉप्टर केस के आरोपी क्रिश्चियन मिचेल ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई है। मिचेल ने खुद की जल्द रिहाई की मांग की है। ब्रिटिश नागरिक मिचेल ने कहा कि मैं 5 साल 3 महीने से जेल में हूं। मुझे भी जीने और आजादी का हक है। अगर मैं दोषी पाया जाता तो पांच साल की सजा ही होती। मिचेल की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में कल (18 मार्च को) सुनवाई है। मिचेल ने ये भी कहा कि अभी तक मामले की जांच पूरी नहीं हुई है। यही नहीं, ट्रायल भी शुरू नहीं हुआ। लिहाजा न्यायिक हिरासत ‘अवैध’ है। मिचेल को 2017 को दुबई से प्रत्यर्पित करके लाया गया था।

अगस्ता वेस्टलैंड घोटाला क्या है

मामला यूपीए-2 के दौरान VVIP हेलिकॉप्‍टर की खरीद से जुड़ा है। ये हेलिकॉप्‍टर्स प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति और रक्षा मंत्री जैसे अतिविशिष्ट लोगों के आवागमन के लिए इस्तेमाल होने के उद्देश्य से खरीदे गए। भारत ने 12 अगस्‍ता वेस्‍टलैंड हेलिकॉप्‍टर्स खरीदने के लिए 3,700+ करोड़ रुपये का सौदा किया था। आरोप है कि सौदा कंपनी के पक्ष में हो, इसके लिए ‘बिचौलियों’ को घूस दी गई जिनमें राजनेता और अधिकारी भी शामिल थे। आरोप है क‍ि कई नियमों से छेड़छाड़ कर कंपनी का रास्‍ता साफ किया गया। सीबीआई सौदे को अगस्ता वेस्टलैंड के पक्ष में करने की खातिर दिए गए रुपयों के लेनदेन की जांच कर रही है।

अगस्‍ता वेस्‍टलैंड VVIP चॉपर घोटाला 

अगस्त 1999 :

अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान VVIPs के लिए भारतीय वायुसेना के MI-8 हेलिकॉप्टर्स का इस्तेमाल होता था। इन हेलिकॉप्टर्स की तकनीक पुरानी हो चुकी थी, इसलिए वायुसेना ने MI-8 चॉपर बदलने का सुझाव दिया।

मार्च 2002 :

नए हेलिकॉप्टर खरीदने के लिए दुनियाभर की कंपनियों को बोली लगाने के लिए आमंत्रित किया गया। उस समय 4 वेंडर्स ने इस टेंडर में रुचि दिखाई। इसमें यूरोकॉप्टर EC-225 सबसे आगे नजर आ रहा था, क्योंकि यह 6000 मीटर की ऊंचाई तक उड़ सकता था।

नवंबर-दिसंबर 2003 :

तत्‍कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बृजेश मिश्रा ने ‘सिंगल वेंडर’ से बचने के लिए रक्षा मंत्रालय और वायुसेना को अपनी तकनीकी शर्तों में बदलाव करने के लिए कहा। इस दौरान इस डील पर ज्‍यादा उत्साह से काम नहीं हुआ और 2004 में अटल सरकार चली गई। डॉ. मनमोहन सिंह नए प्रधानमंत्री बने।

मार्च 2005 :

UPA-1 सरकार ने नए हेलिकॉप्टर खरीदने की कवायद शुरू की। ज्‍यादा दावेदारों से बोली लगवाने के लिए नए हेलिकॉप्टर्स की तकनीकी शर्तों में बदलाव किया गया। 2005 में ही मनमोहन सरकार ने इस डील में इंटीग्रिटी क्लॉज़ डाला, जिसके मुताबिक अगर किसी डिफेंड डील में कोई दलाल शामिल पाया गया, तो डील रद्द कर दी जाएगी। इसी शर्त की वजह से बाद में अगस्‍ता वेस्टलैंड डील विवाद की वजह बन गई। इस दौरान प्रणब मुखर्जी रक्षामंत्री और एसपी त्यागी वायुसेना प्रमुख थे।

सितंबर 2006 :

12 VVIP चॉपर खरीदने के लिए नया टेंडर जारी हुआ, जिसके लिए तीन कंपनियों- AW-101 (ब्रिटेन), S-92 (अमेरिका) और Mi-172 (रूस) ने आवेदन किया। रूसी कंपनी का आवेदन शुरुआती दौर में ही खारिज हो गया। अक्टूबर 2006 से मार्च 2007 के बीच एके एंटनी रक्षामंत्री बन गए और त्यागी वायुसेना प्रमुख के पद से रिटायर हो गए।

2008 :

वायुसेना ने टेंडर में आवेदन करने वाली कंपनी के चॉपर्स का फील्ड ट्रायल लिया। फिर वायुसेना ने ही अमेरिकी कंपनी सिकोर्सिकी एयरक्राफ्ट के S-92 के बजाय ब्रिटिश कंपनी अगस्‍ता वेस्टलैंड के AW-101 हेलिकॉप्टर को तरजीह दी।

फरवरी 2010 :

UPA-2 सरकार के दौरान प्रणब मुखर्जी के वित्तमंत्री रहते कैबिनेट कमिटी 12 हेलिकॉप्टर खरीदने के प्रस्ताव को मंजूरी देती है। इसका ठेका तब 556 मिलियन यूरो यानी करीब 3,546 करोड़ रुपए में अगस्‍ता वेस्टलैंड को दिया गया। अगस्‍ता वेस्टलैंड का हेडक्वॉर्टर ब्रिटेन में है, जबकि इसकी पैरंट कंपनी फिनमैकेनिका का हेडक्वॉर्टर इटली में है।

फरवरी 2012 :

इटली की जांच एजेंसियों ने इस डील में दलाली की बात कही। इटली की एजेंसियों के मुताबिक फिनमैकेनिका ने यह ठेका हासिल करने के लिए भारत के कुछ नेताओं और वायुसेना के कुछ अधिकारियों को 360 करोड़ रुपए की रिश्वत दी। इटली की एजेंसियों ने इस डील में तीन दलालों- क्रिश्चियन मिशेल, गुइदो हाश्के और कार्लो गेरोसा के शामिल होने की बात कही। ये आरोप लगते-लगते भारत को 12 में से 3 AW-101 मिल चुके थे, लेकिन इनका इस्तेमाल नहीं हो सका था।

फरवरी 2013 :

इटली की कोर्ट में यह डील घिर गई और फिनमैकेनिका के CEO ओरसी और अगस्‍ता वेस्टलैंड के चीफ ब्रूनो स्पैग्नोलिनी को इटली में गिरफ्तार कर लिया गया। इधर भारत में UPA-2 सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से घिर गई। रक्षा मंत्रालय ने अगस्‍ता वेस्टलैंड को होने वाले सभी भुगतान रोक दिए।

मार्च 2013 :

भारत में इस डील की जांच CBI को सौंप दी गई। CBI ने पूर्व वायुसेना प्रमुख एसपी त्यागी, उनके तीन भाइयों, ओरसी और स्पैग्नोलिनी समेत नौ लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया। हालांकि, इस समय तक इस डील में किसी नेता या अधिकारी का नाम सामने नहीं आया था।

इटली की कोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान भारत के कई नेताओं के नाम इस डील में आए। आरोप लगा कि ये नेता डील के लिए ली-दी गई रिश्वतबाज़ी में शामिल थे। कोर्ट में जो डॉक्युमेंट्स पेश किए गए, उनमें एक नाम सिग्नोरा गांधी भी है। सियासी गलियारों में माना गया कि यह नाम सोनिया गांधी के लिए इस्तेमाल किया गया है। सोनिया गांधी के अलावा इस डील में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह, अहमद पटेल, प्रणब मुखर्जी, वीरप्पा मोइली, केएम नारायणन और ऑस्कर फर्नांडिस का भी नाम आया।

अप्रैल 2013 :

रक्षामंत्री एके एंटनी ने लोकसभा में एक सवाल के जवाब में कहा कि अगस्‍ता वेस्टलैंड को भारतीय सेनाओं को हथियार बेचने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। उनके मुताबिक नौसेना के लिए खरीदे जाने वाले हल्के हेलिकॉप्टर्स के टेंडर भी अगस्‍ता वेस्टलैंड कंपनी ने भरे हैं। ये टेंडर अगस्त 2012 में जारी किए गए थे। एंटनी के मुताबिक अगस्‍ता वेस्टलैंड ने इंडियन नेवी के लिए 56 यूटिलिटी हेलिकॉप्टर के टेंडर तब भरे थे, जब CBI ने VVIP हेलिकॉप्टर डील की जांच शुरू नहीं की थी।

अक्टूबर 2013 :

रक्षा मंत्रालय ने अगस्‍ता वेस्टलैंड को आखिरी कारण बताओ नोटिस जारी किया, जिसमें कंपनी से पूछा गया कि लिकॉप्टर सौदे के तहत किए गए ईमानदारी बरतने का वादा तोड़ने के आरोप में क्यों नहीं पूरा सौदा रद्द कर दिया जाए?

जनवरी 2014 :

लोकसभा चुनाव से कुछ वक्त पहले ही UPA-2 सरकार ने अगस्‍ता वेस्टलैंड के साथ यह डील रद्द कर दी। जो पेमेंट पहले ही किया जा चुका था, उसे कवर करने के लिए अगस्‍ता वेस्टलैंड द्वारा दाखिल की गई अडवांस बैंक गैरंटी को भुनाया गया। रक्षा मंत्रालय ने बताया कि सौदा करने के साथ इसकी सभी शर्तों को पूरा करने की गारंटी देने के लिए कंपनी ने 1,700 करोड़ रुपए की बैंक गैरंटी दी थी। यह पैसा भारत और इंटरनेशनल बैंकों में जमा था। रक्षा मंत्रालय ने डील के लिए 30% रकम अडवांस जमा की थी।

घोटाले के बाद

फरवरी 2014 :

अगस्‍ता वेस्टलैंड को भारतीय कोस्ट गार्ड के लिए हेलिकॉप्टर्स के टेंडर से बाहर कर दिया गया। मीडियम भार वाले 14 हेलिकॉप्टर्स का यह सौदा करीब 1,000 करोड़ रुपए का था, जिसके लिए अगस्‍ता वेस्टलैंड ने अपना EC-725 हेलिकॉप्टर पेश किया था।

जून 2014 :

CBI ने इस डील में रिश्वत के आरोप की जांच के सिलसिले में पश्चिम बंगाल के तत्कालीन गवर्नर एमके नारायणन से बतौर गवाह पूछताछ की। नारायणन उस ग्रुप में शामिल थे, जिसने हेलिकॉप्टर खरीदने से पहले टेंडर प्रॉसेस देखा था। नारायणन 2005 में उस मीटिंग में भी शामिल थे, जिसमें हेलिकॉप्टर की टेक्निकल शर्तों में बड़े बदलावों की इजाज़त दी गई।

अक्टूबर 2014 :

इटली की निचली अदालत ने ओरसी और स्पैग्नोलिनी को हेराफेरी के लिए दो साल की सजा सुनाई और उन पर भ्रष्टाचार के आरोप माफ कर दिए।

फरवरी 2016 :

‘दि टेलिग्राफ’ में छपी खबर के मुताबिक क्रिश्चियन मिशेल ने आरोप लगाया कि सितंबर 2015 में न्यू यॉर्क में आयोजित संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान पीएम मोदी ने इटली के प्रधानमंत्री मैटेयो रेंजी के साथ मुलाकात में नौसैनिकों को रिहा करने के बदले गांधी परिवार के खिलाफ अगस्‍ता वेस्टलैंड मामले में सबूत मांगे थे। विदेश मंत्रालय ने इस आरोप को बकवास बताया।

अप्रैल 2016 :

इटली मिलान कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलट दिया और अगस्‍ता वेस्टलैंड और फिनमैकेनिका के प्रमुखों को भ्रष्टाचार का दोषी मानती है। मिलान कोर्ट ने ओरसी को साढ़े चार साल और स्पैग्नोलिनी को चार साल का सज़ा सुनाती है। इधर भारत की पिछली UPA-2 सरकार ने इटली के प्रॉसिक्यूटर्स को पर्याप्त सबूत और अहम दस्तावेज नहीं दिए। पूर्व वायुसेना प्रमुख एसपी त्यागी को भी भ्रष्टाचार का दोषी पाया गया।

जून 2016 :

प्रवर्तन निदेशालय ने इस मामले में एक नई चार्जशीट दायर की, जो ब्रिटिश नागरिक और कथित बिचौलिए क्रिश्चियन मिशेल जेम्स और उसके कुछ भारतीय सहयोगियों की भूमिका से संबंधित थी। इसमें ED ने आरोप लगाया कि मिशेल ने अगस्‍ता वेस्टलैंड से 225 करोड़ रुपए हासिल किए थे, जो असल में रिश्वत थी।

दिसंबर 2016 :

राजस्थान की भाजपा सरकार सिर्फ अगस्‍ता वेस्टलैंड से हेलिकॉप्टर खरीदने का टेंडर देकर विवादों में आ गई। इस सरकार की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के लिए हेलिकॉप्टर खरीदने के मकसद से 21 नवंबर को एक टेंडर जारी किया गया, जिसमें कहा गया कि सरकार केवल अगस्‍ता वेस्टलैंड का AW 169 हेलिकॉप्टर चाहती है। इसी बीच पूर्व रक्षामंत्री एके एंटनी ने सोनिया गांधी का बचाव करते हुए कहा कि इस डील में सोनिया गांधी की कोई भूमिका नहीं है।