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अलास्का से लौटकर रूस का ‘तोता’ बने ट्रंप ने जेलेंस्की को हड़काया - यूक्रेन को न क्रीमिया मिलेगा, न नाटो में जगह: नोबेल पुरस्कार का उतावलापन; क्या पाकिस्तान के साथ भी यही होने वाला है?

                                                                                                                          साभार: एबीसी न्यूज
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के साथ मुलाकात से पहले यूक्रेन-रूस युद्ध को लेकर उन्हें ही हड़का दिया है। ट्रंप ने कहा है कि जेलेंस्की, रूस के साथ इस युद्ध को तुरंत रोक सकते हैं। हाल ही में ट्रंप ने अलास्का में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ लंबी बैठक की थी।
ट्रम्प ने जिस तरह जेलेंस्की को हड़काया है यह अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान को भी चेतावनी है। भारत के प्रभुत्व के आगे पाकिस्तान कहीं नहीं टिक नहीं पाता। Operation Sindoor से भारत ने अमेरिका तो क्या दुनियां को बता दिया कि पाकिस्तान की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। इसलिए ट्रम्प तो क्या कोई देश ज्यादा पाकिस्तान को ज्यादा भाव नहीं देगा। क्योकि दुनिया ने देख लिया कि पाकिस्तान भारत विरुद्ध जहर फैला कर भारत विरोधियों को ब्लैकमेल कर भीख मांगता रहा है। 

ट्रंप-पुतिन की इस बैठक का कोई ठोस नतीजा तो नहीं निकला लेकिन ट्रंप ने बैठक के बाद यह लगभग साफ कर दिया था कि अब शांति स्थापित करने का जिम्मा जेलेंस्की का है। अब ट्रंप ने अपनी बात को और मुखरता के साथ दोहराया है। पुतिन के साथ बैठक को ट्रंप ने सार्थक बताया था।

ट्रंप ने क्या कहा?

ट्रंप ने जेंलेंस्की को हड़काते हुए अपने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ट्रूथ सोशल पर एक पोस्ट किया है। ट्रंप ने लिखा है, “यूक्रेन के राष्ट्रपति जेंलेंस्की चाहें तो रूस के साथ युद्ध तुरंत खत्म कर सकते हैं, या फिर वह लड़ाई जारी रख सकते हैं। याद कीजिए कि इसकी शुरुआत कैसे हुई थी।”

हालाँकि, ट्रंप ने अपने पोस्ट में साफ किया कि ना तो यूक्रेन को क्रीमिया वापस नहीं मिलेगा, जिसे 12 साल पहले बराक ओबामा के दौर में बिना गोली चले रूस ने हथिया लिया था और ना ही यूक्रेन को NATO में शामिल होने दिया जाएगा। ट्रंप ने लिखा कि कुछ चीजें कभी नहीं बदलती हैं।

रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने लगातार यूक्रेन के NATO में शामिल होने का विरोध किया है और मौजूदा रूस-यूक्रेन संघर्ष की बड़ी वजह भी यूक्रेन का NATO की सदस्यता लेने की पहल करना माना जाता है। जनवरी में ट्रंप के दोबारा अमेेरिकी राष्ट्रपति बनने से पहले NATO देशों ने यूक्रेन को सदस्यता दिए जाने पर सहमित व्यक्त कर दी थी।

वहीं, ट्रंप के साथ मुलाकात के लिए जेलेंस्की अमेरिका पहुँच गए हैं। उनका कहना है कि यूक्रेन अपनी अखंडता और संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करेगा। जेलेंस्की का कहना है कि वह युद्ध रोकने के लिए अपनी शर्तों पर ही तैयार होंगे।

इसके अलावा जेलेंस्की ने शांति समझौते के लिए ट्रंप की सुरक्षा की गारंटी देने की पेशकश की सराहना की है। वहीं, एक अमेरिकी प्रतिनिधि ने दावा किया कि पुतिन यूक्रेन के लिए संभावित नाटो जैसे सुरक्षा समझौते पर सहमत हो गए हैं।

जेलेंस्की समेत कई यूरोपीय नेताओं से मिलेंगे ट्रंप

रूस-यूक्रेन संघर्ष को समाप्त करने के लिए ट्रंप जेलेंस्की समेत कई यूरोपीय नेताओं से मुलाकात करेंगे। ट्रंप ने इस मुलाकात को लेकर कहा, “व्हाइट हाउस में एक बड़ा दिन होगा। इतने सारे यूरोपीय नेता एक साथ कभी नहीं आए। उनकी मेजबानी करना मेरे लिए सम्मान की बात है।”

NATO के महासचिव मार्क रूटे, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री सर कीर स्टारमर भी ट्रंप के साथ मुलाकात करेंगे। दावा किया गया है कि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी, जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज, फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब और यूरोपीय यूनियन की अध्यक्षा उर्सुला वॉन डेर लेयन भी बातचीत में शामिल होंगे।

इससे पहले जब व्हाइट हाउस में मुलाकात के दौरान ट्रंप, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और जेलेंस्की के बीच खूब बहसबाजी हुई थी।

हालाँकि, अब इस चर्चा को लेकर उम्मीद जताई जा रही है कि इससे रूस-यूक्रेन संघर्ष को लेकर कोई ठोस नतीजा सामने आ सकता है। नोबेल शांति पुरस्कार के लिए उतावले ट्रंप अब इस संघर्ष को खत्म करने के लिए किसी भी हद तक जाते दिख रहे हैं।

इस्लाम के विरुद्ध स्वीडन उठा, बड़े नेताओं को खरीद जॉर्ज सोरोस कोशिश कर रहा पूरे यूरोप के इस्लामीकरण के लिए

सुभाष चन्द्र

स्वीडन की उप प्रधानमंत्री एब्बा बुश ने मुस्लिम समुदाय को सख्त संदेश देते हुए कहा है कि “शरिया कानून वाले इस्लाम के लिए स्वीडन में कोई जगह नहीं है। मुसलमान अपने जीवन में स्वीडिश मूल्यों को अपनाएं या फिर देश छोड़ दें। इस्लाम को स्वीडिश मूल्यों के अनुसार ढलना होगा स्वीडन और यूरोप में बहुत से लोग इस्लाम का उसी तरह जैसे वे अधिनायकवादी राज्यों में करते हैं”

एब्बा बुश ने आगे भी कहा कि “इस्लाम को हमारे मौलिक साझा मूल्यों के अनुकूल होना चाहिए, जो स्वीडन और यूरोप को यूरोप बनाते हैं, ये वही मूल्य हैं जो हमें एक दूसरे के साथ सहिष्णुता, शांति और स्वतंत्रता में रहने में सक्षम बनाते हैं, कुछ मूल्य वैकल्पिक नहीं होते” 

एब्बा बुश के समर्थक बयान की तारीफ कर कह रहे हैं कि उनका रुख स्वीडिश सांस्कृतिक मूल्यों को संरक्षित करने के लिए महत्वपूर्ण है उनके विरोधी (लगता है सेकुलर हैं) कह रहे हैं कि वे इस्लामोफोबिया को बढ़ा रही हैं। वो मुसलमानों को कलंकित कर उन्हें अलग थलग कर देंगी स्वीडन इसी वर्ष मार्च में NATO में शामिल हुआ है

 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
पूरा यूरोप और ब्रिटेन मुस्लिम शरणार्थियों से भरा पड़ा है और ये सब शरणार्थी इस्लामिक देशों से आये हैं जिन्हें 56 इस्लामिक देश कभी अपने यहाँ शरण नहीं देते और आज ये शरणार्थी ब्रिटेन और कई यूरोपीय देशों में समस्या बन चुके हैं स्वीडन में हाल ही में शरणार्थी प्रवासियों की संख्या बढ़ी है और जाहिर एब्बा बुश की चिंता का कारण यही है स्वीडन के वर्तमान आबादी करीब एक करोड़ 70 लाख है जिसमें 1,88,000 मुस्लिम हैं और सबसे ज्यादा 20% मुस्लिम स्वीडन के शहर Maimo में रहते हैं

पिछले कुछ समय में स्वीडन, डेनमार्क, बुल्गारिया, ब्रिटेन, नॉर्वे, जर्मनी (बर्लिन) और फ्रांस में मुस्लिमों ने जम कर दंगे किए और करोड़ों की संपत्ति को आग लगा दी एक ही तरह से दंगे किए जाते रहे हैं, यूरोप के अलावा म्यांमार, दिल्ली, हल्द्वानी,श्रीलंका, थाईलैंड और बांग्लादेश में भी दंगे किए गए

ये सभी यूरोपीय देश और ब्रिटेन जहां दंगे हुए NATO के सदस्य हैं और इन देशों में दंगे करने वाले मुस्लिमों को कोई इस्लामिक देश कंट्रोल नहीं करना चाहता जबकि कई इस्लामिक देशों से उन्हें  पूरी मदद पहुंचती है किसी इस्लामिक देश में इतनी हिम्मत नहीं कि मुस्लिम समुदाय के लिए इनमे से किसी देश पर हमला कर दे क्योंकि सब NATO मेंबर हैं 

कुछ समय पहले नीदरलैंड के Geert Wilders ने भी अपने मुल्क में मुस्लिमों पर सख्त टिप्पणियां करते हुए मस्जिदों को बैन करने की भी बात कही थी इटली की Giorgia Meloni ने भी नई मस्जिदों पर पाबंदी लगाई थी और यहां तक कहा था मस्जिदों में जो कुछ भी होता है सरकार को बताना पड़ेगा

जर्मनी और ब्रिटेन को भी अब कुछ समझ आ रहा है जहां मस्जिदों पर निगरानी की जा रही है और बंद किया जा रहा है क्योंकि वहां आतंकी गतिविधियों के सबूत मिले सबसे बड़ा रहस्य तो हंगरी के प्रधानमंत्री Viktor Orban ने खोला है कि George Soros की योजना पूरे यूरोप का इस्लामीकरण करने की है जिसके लिए उसने यूरोपीय देशों के कुछ बड़े नेताओं को खरीद लिया है 

अभी अमेरिका इस्लाम के खतरों से परिचित होते हुए भी ध्यान नहीं दे रहा लेकिन कल वहां भी वही होगा जो आज यूरोपीय देशों में हो रहा है 

किसी समाज में Integrate (एकीकृत) होकर रहना इस्लाम में संभव नहीं है क्योंकि उनके लिए किसी भी देश के संविधान और कानून से ऊपर शरिया है चीन ने जो मुस्लिमों का इलाज किया है उस पर कोई इस्लामिक देश नहीं बोलता और लगता है एक दिन पूरे विश्व को चीन का फार्मूला अपनाना पड़ेगा 

तुर्की का NATO में रहने का क्या औचित्य है? उसे अब NATO से बाहर कर देना ही तर्कसंगत होगा

सुभाष चन्द्र 

तुर्की ने दो दिन पहले इज़रायल को धमकी दी है कि वह फिलिस्तीन के समर्थन में इजराइल में घुस कर हमला करेगा जैसे वह लीबिया और Nagorno-Karabakh में घुसा
था। इस पर इजराइल के विदेश मंत्री Israel Katz ने अपने सभी diplomats को निर्देश दिया है कि वे NATO सदस्यों से तुर्की की निंदा करने को कहें और तुर्की को NATO से बाहर करने की मांग की है

अब सवाल यह पैदा होता है कि आखिर तुर्की का NATO में रहने का क्या औचित्य है जब अमेरिका और यूरोप के अधिकांश देश हमास के मामले में इजराइल के साथ खड़े हैं तुर्की को 1951 में NATO में शामिल किया गया उसकी ही मांग पर तुर्की ने सोवियत संघ से मिलिट्री टकराव में बचाव के लिए NATO से सुरक्षा की गारंटी मांगी थी और तब मई, 1951 में CIA और US Military के गहन विचार के बाद तुर्की को NATO में शामिल किया गया था

अब सोवियत संघ 25 दिसंबर 1991 में ख़त्म होने के बाद तुर्की का NATO में शामिल होने का कारण समाप्त हो गया क्योंकि सोविएत संघ के बाद  उसमे से निकले सबसे देश रूस के साथ तुर्की के गहरे संबंध हैं और तुर्की के विकास के लिए रूस और तुर्की के बीच समझौते भी हो रखे हैं और रूस अमेरिका का दुश्मन देश है। 

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चर्चित YouTuber 
इसी तरह अमेरिका  के एक अन्य शत्रु देश चीन के साथ भी तुर्की के घनिष्ठ संबंध हैं संबंध तो तुर्की के अमेरिका के परम शत्रु देश उत्तरी कोरिया से भी हैं कल को रूस, चीन और उत्तर कोरिया अमेरिका पर हमला करते हैं तो तुर्की अमेरिका का साथ देने के लिए कदापि आगे नहीं आएगा और इसलिए तुर्की का NATO में रहना औचित्यहीन है 

NATO का article 5 कहता है कि किसी सदस्य देश पर आक्रमण सभी सदस्यों पर आक्रमण समझा जाएगा और सभी NATO देश पीड़ित देश का साथ देंगे लेकिन जहां तक मैंने पढ़ा है NATO का कोई Article यह नहीं कहता कि यदि कोई सदस्य देश किसी अन्य सदस्य देश या किसी और गैर NATO देश पर हमला करता है तो भी सभी NATO सदस्य देश उसका साथ देने के लिए बाध्य होंगे 

तुर्की का ईरान के साथ भी कोई सौहार्दपूर्ण संबंध नहीं है बल्कि इस्लामिक देशों पर अपना प्रभुत्व कायम करने का Proxy Conflict है और शायद इसलिए तुर्की अब इजराइल से पंगा लेना चाहता है क्योंकि ईरान के पोषित हमास के अलावा  हिज़्बुल्लाह और हूतियों को भी इज़राइल ने ठोका है और तुर्की इस बहाने ईरान का वर्चस्व इस युद्ध में ख़त्म करना चाहता है ईरान अमेरिका से सीधा टकराव से बचता है और तुर्की तो अमेरिका से उलझने की हिम्मत ही नहीं कर सकता

तुर्की इजरायल पर पहले हमला करने की धमकी दे रहा है और NATO के Article 5 को ध्यान में रख ही इजरायल तुर्की पर Self Defence में भी पहले हमला नहीं करेगा, हालांकि मुझे शंका है कि तुर्की इज़रायल संभावित युद्ध में NATO देश तुर्की का साथ देंगे और NATO में विभाजन हो सकता है

तुर्की भी इज़रायल में सोच समझ कर घुसेगा क्योंकि इजराइल को अमेरिकी कानून के अनुसार  अमेरिका का प्रमुख गैर NATO मित्र का दर्जा दिया गया है इसके अनुसार इजराइल जैसे मित्र देश defence और security cooperation के लिए विशेष लाभ के अधिकारी हैं इसलिए तुर्की ने यदि इजराइल में घुसने की कोशिश की तो बुरी बीतेंगी और यह कदम उसके लिए ट्रंप के आने के बाद तो बहुत भारी पड़ेगा अबकी बार ट्रंप के कार्यकाल में तुर्की NATO से बाहर हो सकता है और पूरा इस्लामिक विश्व पर खतरा पैदा होगा

अमेरिका, नाटो और EU के रूस को अलग थलग करने की साजिश का हिस्सा नहीं बने मोदी; रूस के एक सच्चे मित्र का कर्तव्य निभाया भारत ने

 सुभाष चन्द्र

स्विट्ज़रलैंड द्वारा अपने शहर बर्गेन्स्टाक में यूक्रेन में शांति स्थापना के लिए आयोजित शिखर सम्मेलन में NATO और EU समेत 80 देशों ने भाग लिया। लेकिन जो प्रताव यूक्रेन में शांति स्थापना के लिया लाया गया, उस पर भारत ने हस्ताक्षर करने से साफ़ मना कर दिया इस सम्मेलन में रूस को निमंत्रण नहीं दिया गया और चीन ने इससे दूरी बनाई थी। 

दो दिनों की चर्चा के बाद शांति स्थापना के प्रस्ताव के अंतिम दस्तावेज़ में जो कुछ भी कहा गया उसमें क्षेत्रीय अखंडता के साथ ही (यूक्रेन की अखंडता) परमाणु सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और बन्दियों की अदलाबदली वाले बिंदु भी थे ऐसा भी कहा गया है कि रूस को अपनी सेनाएं वापस ले जाने को कहा गया शिखर सम्मेलन में अमेरिका और EU ने ऐसा जाल बिछाया था जिससे रूस पर स्वतः ही ऐसे प्रतिबंध लग जाएं जिससे उसका जीना ही कठिन हो जाए ये 80 देश रूस से सभी संबंध विच्छेद करके उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग थलग करना चाहते थे

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लेकिन सही समय पर भारत ने शांति स्थापना के दस्तावेज में कुछ बिंदुओं को अस्पष्ट और गैर जरूरी कहते हुए पर हस्ताक्षर करने से मना करके रूस के प्रति अपनी सच्ची मित्रता निभाने का काम किया भारत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “हम शांति स्थापना के विरुद्ध नहीं हैं और न ही युद्ध को आगे चलता देखना चाहते हैं लेकिन यह प्रस्ताव एक पक्षीय लगता है क्योंकि रूस को इस सम्मेलन में अपनी बात रखने के लिए अवसर ही नहीं दिया गया भारत के साथ ही सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया, मैक्सिको, यूएई सहित 12 देशों ने भी हस्ताक्षर करने से मना कर दिया - पर्यवेक्षक के रूम में भाग लेने वाले ब्राजील ने भी हस्ताक्षर नहीं किए 

भारत ने कहा - “भारत चाहता है कि किसी भी नतीजे पर पहुंचने से पहले रूस और यूक्रेन का एक साथ एक मंच पर होना जरूरी है ताकि दुनिया दोनों देशों की बात सुनकर अपनी राय या सहमति बनाए रिपोर्ट की मानें तो रूस को इस समिट में नहीं बुलाया गया यूक्रेन में शांति के लिए रखी गई शर्त पर भारत सहमत नहीं है”

चार दिन पहले ही इटली में प्रधानमंत्री मोदी से यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की  भेंट करके बहुत प्रसन्न थे और उसे आशा रही होगी कि भारत स्विट्ज़रलैंड में उसका साथ देगा लेकिन हुआ इसके विपरीत सभी देशों को मोदी सरकार ने खुला संदेश दे दिया कि रूस को एकतरफा फैसला करके उसे बर्बाद नहीं किया जा सकता

भारत विश्व के देशों को यह सख्त संदेश देने में इसलिए भी सक्षम है क्योंकि भारत एक बहुत बड़ा वैश्विक बाजार है और किसी भी देश के लिए भारत की अनदेखी करना संभव नहीं है और यही सफल विदेश नीति है और कूटनीति भी

UNO का इज़रायल के खिलाफ पक्षपात निंदनीय है - बंधक छुड़ाने के लिए UN ने क्या किया ?

सुभाष चन्द्र

कल यदि The Kashmir Files की तरह The Israel Files फिल्म बना कर हमास की निर्दोष इज़रायली बच्चों और महिलाओं पर की गई बर्बरता दिखाई जाए तो उसे हमारे देश के “सेकुलर” ही नहीं दुनिया के बहुत लोग Propaganda फिल्म बता देंगे जैसे एक महीने पहले कुछ हुआ ही नहीं - आज वह हमास सुरंगों में घुसा हुआ जान बचा रहा है, अस्पतालों / शरणार्थी शिविरों में छुप कर उन्हें ढाल बना रहा है और जब इज़रायल उन्हें खदेड़ने के लिए हमला कर रहा है तो उसे बदनाम कर रहा है -

एक तरफ हमास ने युद्ध शुरू किया वहशी दरिंदों की तरह इज़रायल ने निर्दोष नागरिकों पर हमला करके तो दूसरी तरफ हिज़्बुल्लाह भी कूद पड़ा है जबकि लेबनान कह रहा है कि वह इज़रायल से युद्ध नहीं चाहता - इतना ही नहीं दूर बैठे यमन के हुती विद्रोही भी इज़रायल से लड़ने आगे आ रहे हैं जो पहले ही सऊदी अरब से उलझे हुए हैं - ऐसे में सऊदी अरब हूती का साथ देगा या इज़रायल के साथ रहेगा, यह भी सवाल है 

तुर्किये का NATO में क्या रोल है -कितने आतंकी लड़ेंगे इजराइल से

उधर वैसे तो नॉर्वे समेत कुछ NATO सदस्य इज़रायल का विरोध कर रहे हैं परंतु तुर्किये तो ईरान की तरह मौका मिलते ही युद्ध में कूदने को तैयार है - NATO देशों पर यदि कोई हमला होता है तो सभी सदस्य देश उस NATO सदस्य पर हमला करने वाले देश के खिलाफ युद्ध करते हैं - लेकिन यदि तुर्किये इज़रायल के साथ युद्ध में उलझता है तो क्या NATO देश इज़रायल से युद्ध करेंगे जबकि अमेरिका और यूरोप के अनेक NATO सदस्य  देश इज़रायल के साथ खड़े हैं - ऐसे में तुर्किये का NATO में क्या रोल है, यह समझ से परे है - 

The United Nations General Assembly has passed a resolution calling for an immediate humanitarian truce between Israel and Hamas and demanding aid access to Gaza - 

इस प्रस्ताव में भारत ने वोट नहीं किया और इसमें भारत ने कुछ गलत भी नही किया क्योंकि UNO युद्ध शुरू होने से ही इज़रायल के विरुद्ध पक्षपात कर रहा है - इस प्रस्ताव में एक तरह से इज़रायल को हमास के बराबर बता दिया गया जबकि युद्ध की स्तिथि हमास ने खड़ी की और उसकी बर्बरता की कड़े शब्दों में एक बार भी UN ने निंदा नहीं की -

किस Humanitarian Truce की बात कर रहा है UN जब हमास ने 240 निर्दोष नागरिकों को बंधक बनाया हुआ है - उन बंधकों को रिहा कराने के लिए UN ने क्या कदम उठाए हैं, कोई नहीं जानता जबकि उसकी मंशा केवल इज़रायल को कटघरे में खड़े करने की है -

एक बात निश्चित है कि जिस दिन इज़रायल बंधकों को रिहा कराने में सफल हो गया, उस दिन “हमास” को क़यामत झेलनी पड़ेगी क्योंकि फिर हर सुरंग में छिपे हमास के आतंकियों को मारने के लिए इज़रायल कुछ भी कर सकता है -

ये सुरंग बनाने का धंधा जो हमास ने शुरू किया है, उसके लिए भारत को भी पाकिस्तान की हरकतों पर ध्यान रखना होगा क्योंकि यह शरारत पाकिस्तान ने भी की हो सकती है -