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जिस देश में सबसे ज्यादा मुस्लिम, उसने अपनी जमीन पर रोहिंग्या मुस्लिमों को उतरने नहीं दिया: लकड़ी की नाव में 140 थे सवार, बोले स्थानीय- ये जहाँ भी गए, वहाँ फैलाई अशांति; भारत में बेगैरत पार्टियां अपनी कुर्सी की खातिर उनको संरक्षण दे रहे हैं ; क्या यही संविधान कहता है?

  इडोनेशिया के तट से नवंबर 2023 में भी लौटाए गए थे रोहिंग्या, ये तस्वीर UN ने जारी की थी। (फाइल फोटो:         UNHCR/Amanda Jufrian)
भारत में मुस्लिम आबादी इसलिए नहीं बढ़ रही कि इनके द्वारा ज्यादा बच्चे पैदा किये जा रहे है, जबकि असली सच्चाई यह कि बढ़ती पाकिस्तान और बांग्लादेशी घुसपैठ और दूसरे रोहिंग्यों को देश की प्रतिष्ठा दांव पर लगा संविधान की दुहाई देने वालों द्वारा अपनी कुर्सी बचाने के लिए इनको संरक्षण देना। देश में CAA विरोध प्रदर्शन हुए, किसके लिए? कौन लोग शामिल थे इन प्रदर्शनों में? 90%रोहिंग्या, पाकिस्तानी और बांग्लादेशी घुसपैठियों का जमावड़ा था, जिन्हे बाकि 10% आयोजकों और उनके समर्थकों द्वारा सुरक्षा दी जा रही थी। इन प्रदर्शनों में फलों का आहार, बिरयानी आदि का बंटना और
 दूसरे, यह विरोध केवल मुस्लिम बहुल इलाकों में ही क्यों हुआ? यह ऐसा षड़यंत्र था जिसे आम हिन्दू नहीं समझ पाया। 

क्या हिन्दुओं ने इन पार्टियों से पूछने की हिम्मत की क्या विश्व के किसी भी मुस्लिम या गैर-मुस्लिम देश में घुसपैठियों को राजनीतिक संरक्षण दिया जाता है? लेकिन भारत में कुर्सी के भूखे नेता और उनकी पार्टियां संविधान की दुहाई देकर देश को घोर संकट में डाल रही है। इस कटु सच्चाई को हर हिन्दू को गंभीरता लेना होगा। सरकारों पर इन घुसपैठियों को बाहर धक्का देने के लिए दबाव बनाना पड़ेगा और भारतीय मुसलमानों को भी रोहिंग्यों के खिलाफ एकजुट होना पड़ेगा। हिन्दुओं के साथ रहने में उनको ज्यादा आराम है लेकिन रोहिंग्यों के रहने पर हिन्दुओं से कहीं ज्यादा इन रोहिंग्यों से होगी, ये नहीं सोंचे की आखिर हैं तो मुसलमान ही। अगर ऐसा होता कोई मुस्लिम देश इनको अपने देश में रखने में डरता नहीं।   

इंडोनेशिया के आचे प्रांत के तट पर 140 रोहिंग्या मुस्लिम घुसपैठियों का एक समूह पहुँचा, लेकिन स्थानीय मछुआरा समुदाय के लोगों ने उन्हें जमीन पर कदम रखने ही नहीं दिया। इस घटना की वजह से तनाव की स्थिति बनी, रोहिंग्या मुस्लिमों का यह समूह, जिनमें ज्यादातर महिलाएँ और बच्चे शामिल थे, मलेशिया की ओर बढ़ने की कोशिश कर रहा था। स्थानीय समुदाय ने सुरक्षा और शांति के नाम पर उनका विरोध किया और उन्हें नाव से उतरने नहीं दिया।

एपी की रिपोर्ट के मुताबिक, यह घटना इंडोनेशिया के उत्तरी प्रांत आचे के दक्षिणी हिस्से में लाबुहान हाजी के पास की है। 140 भूखे और थके हुए रोहिंग्या मुस्लिमों ने लकड़ी की नाव में सवार होकर बांग्लादेश के कॉक्स बाजार से लगभग दो हफ्ते की समुद्री यात्रा की थी। इस दौरान तीन लोगों की मौत हो गई थी। जब यह नाव आचे के तट से लगभग 0.60 किलोमीटर दूर पहुँची, तो स्थानीय मछुआरों और निवासियों ने उनका विरोध किया।

स्थानीय मछुआरा समुदाय के मुखिया मोहम्मद जबल ने साफ तौर पर कहा कि उनका समुदाय इन्हें उतरने की अनुमति इसलिए नहीं देगा क्योंकि पहले के अनुभवों के अनुसार, रोहिंग्या मुस्लिम जहाँ भी गए हैं, वहाँ स्थानीय लोगों के साथ संघर्ष और अशांति फैलाने की स्थिति उत्पन्न हुई है। जबल ने कहा, “हमने उन्हें खाना दिया, लेकिन हम यह नहीं चाहते कि यहाँ वही समस्या हो, जो अन्य स्थानों पर हुई है।”

अपने विरोध को जताने के लिए मछुआरों ने समुद्र के किनारे बड़ा बैनर लगाया है, जिसमें लिखा है, “साउथ आचे रीजेंसी के लोग इस क्षेत्र में रोहिंग्या शरणार्थियों के आगमन को अस्वीकार करते हैं।” स्थानीय लोगों का विरोध इसलिए भी है कि जहाँ-जहाँ रोहिंग्या मुस्लिम पहुँचे हैं, वहाँ संघर्ष और अशांति फैली है।

आचे पुलिस की रिपोर्ट के अनुसार, रोहिंग्या मुस्लिमों का यह समूह 9 अक्टूबर को बांग्लादेश के कॉक्स बाजार से रवाना हुआ था और उनका मूल लक्ष्य मलेशिया पहुँचना था। इस यात्रा के दौरान, नाव पर सवार कुछ यात्रियों ने कथित तौर पर दूसरे देशों में पहुँचने के लिए पैसे भी दिए थे। हालाँकि, जब नाव इंडोनेशिया पहुंची, तब तक नाव पर कुल 216 लोग सवार थे, जिनमें से 50 लोग इंडोनेशिया के रियाउ प्रांत में उतर चुके थे। स्थानीय निवासियों ने हालाँकि घुसपैठियों को खाना दिया और संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थी मामलों के उच्चायुक्त ने भी भोजन सामग्री प्रदान की, लेकिन उन्हें जमीन पर कदम रखने की अनुमति नहीं दी गई।

सरकारी अधिकारियों द्वारा 11 रोहिंग्या मुस्लिमों को अस्पताल में भर्ती कराया गया, क्योंकि उनकी तबियत बिगड़ चुकी थी। ये लोग लम्बी यात्रा के कारण कमजोर हो चुके थे, जिसमें अधिकतर महिलाएँ और बच्चे शामिल थे। हालाँकि, स्थानीय मछुआरों और पुलिस के विरोध के कारण बाकी घुसपैठियों को वापस नाव पर ही रहना पड़ा। आचे पुलिस ने मानव तस्करी के संदेह में तीन लोगों को गिरफ्तार किया है। यह आरोप लगाया जा रहा है कि इन तीनों ने रोहिंग्या मुस्लिमों से पैसा लेकर उन्हें दूसरे देशों में पहुँचाने का वादा किया था।

रोहिंग्या मुस्लिमों का म्यांमार से पलायन पिछले कुछ वर्षों से दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में एक संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। म्यांमार के सुरक्षा बलों द्वारा 2017 में किए गए क्रूर आतंकवाद विरोधी अभियानों के बाद, करीब 740,000 रोहिंग्या मुस्लिम म्यांमार से भागकर बांग्लादेश में शरण लिए हुए हैं। म्यांमार में रोहिंग्या मुस्लिमों को लंबे समय से व्यापक भेदभाव और अत्याचार का सामना करना पड़ा है, और वहाँ की सरकार ने उन्हें नागरिकता देने से भी इनकार कर दिया है।

इंडोनेशिया, थाईलैंड और मलेशिया जैसे अन्य देशों की तरह संयुक्त राष्ट्र के 1951 शरणार्थी सम्मेलन का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है, इसलिए इन्हें शरणार्थियों को स्वीकार करने की बाध्यता नहीं है। इंडोनेशिया की आबादी में 87% लोग मुस्लिम मजहब से हैं, लेकिन वो लगातार रोहिंग्या मुस्लिमों को वापस भेजता रहा है।

बीते साल नवंबर 2023 में 250 लोगों से भरी नाव को भी वापस समंदर में लौटा दिया गया था, जिसके बारे में बात में आशंकाएँ जताई कि गई वो नाव दुर्घटना का शिकार हो गई। वहीं, मार्च 2024 में भी इंडोनेशिया के अधिकारियों और स्थानीय मछुआरों ने आचे के तट पर एक नाव से 75 लोगों को बचाय था, क्योंकि वो विरोध प्रदर्शन की वजह से वो नाव तट पर नहीं आ सकी थी और दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी, उस घटना में नाव पलटने से 67 लोगों की मौत हो गई थी, जिनमें से कई महिलाएँ और बच्चे थे।

डीप स्टेट: क्या शासन परिवर्तन की अगली कड़ी इंडोनेशिया है? अब समय आ गया है कि भारत अपने हितों की रक्षा के लिए कदम उठाए, अन्यथा वह किसी और खेल का मोहरा बन जाएगा।

इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में हजारों इंडोनेशियाई लोगों ने गुरुवार (22 अगस्त) को देश के चुनाव कानूनों में प्रस्तावित बदलावों के विरोध में देश की संसद भवन पर धावा बोलने का प्रयास किया।

इंडोनेशिया की संसद में हजारों प्रदर्शनकारियों ने धावा बोल दिया, बाड़ें गिरा दीं और पुलिस के साथ झड़प की। यह विरोध प्रदर्शन एक विवादास्पद कानून परिवर्तन के विरोध में किया गया, जिसके तहत राष्ट्रपति जोकोवी के 29 वर्षीय बेटे केसांग को चुनाव लड़ने की अनुमति मिल सकती है।

प्रस्तावित कानून राज्यपालों के लिए न्यूनतम आयु 35 से घटाकर 30 कर देगा और नामांकन आवश्यकताओं को आसान बना देगा, जिससे "वंशवादी राजनीति" की आशंकाएँ बढ़ गई हैं। इस कदम से केसांग को आयु प्रतिबंधों को दरकिनार करने और मध्य जावा में एक क्षेत्रीय दौड़ में प्रवेश करने में मदद मिल सकती है।

प्रदर्शनकारियों ने पत्थर फेंके, जबकि सुरक्षा बलों ने आंसू गैस और पानी की बौछारों से जवाब दिया। देशभर में गुस्सा फैलने के कारण आगजनी की घटनाएं हुईं, जिसके कारण सांसदों को कोरम की कमी के कारण मतदान में देरी करनी पड़ी

“जोकोवी लोकतंत्र को नष्ट कर रहा है” के नारे लगाते हुए प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षा बलों का सामना किया, जिन्होंने पानी की बौछारों से जवाब दिया। एक शहर में, “लोकतंत्र यहाँ मर रहा है” लिखा हुआ बैनर लहराया गया और सड़कों पर आंसू गैस के गोले छोड़े गए।

लेकिन यह कानून सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को जारी रखने की अनुमति देगा, यह आयु कम करने की अनुमति देगा, विशेष व्यवहार की नहीं।

प्रदर्शनकारी क्यों कह रहे हैं कि लोकतंत्र खत्म हो गया है? जबकि वे उम्मीदवार को वोट न देने का विकल्प चुन सकते हैं?

डीप स्टेट की छाया

यद्यपि विरोध प्रदर्शन वास्तविक मुद्दे पर हो सकते हैं, जैसा कि बांग्लादेश में हुआ था, लेकिन यह भी संभव है कि पर्दे के पीछे की शक्तियां किसी गुप्त उद्देश्य से इसे चला रही हों।
यह विशेष रूप से चिंताजनक है कि इसमें वही पैटर्न अपनाया जा रहा है, जैसा श्रीलंका और बांग्लादेश में विरोध प्रदर्शनों में अपनाया गया था, जिसमें निर्वाचित सरकार को गिरा दिया गया था। कई विश्लेषकों का कहना है कि विरोध प्रदर्शनों में कथित तौर पर सीआईए की संलिप्तता थी।
विरोध वास्तविक मुद्दों पर है, लेकिन प्रदर्शनकारी अचानक लोकतंत्र के नाम पर अलोकतांत्रिक काम करने लगेंगे। वे मौजूदा सरकार को सत्ता छोड़ने की धमकी देते हैं, भले ही वह लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई हो। प्रदर्शनकारी संसद और फिर राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के घर या कार्यालय पर धावा बोलकर उन्हें सत्ता छोड़ने के लिए मजबूर कर देंगे।
जैसे ही इस अलोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से कोई नई सरकार बनेगी, अमेरिका सबसे पहले उसका समर्थन करेगा, भले ही वह खुद को लोकतंत्र का गढ़ बताता हो। यहां इंडोनेशियाई विरोध प्रदर्शनों में भी इसी तरह के पैटर्न हैं, जो सीआईए जैसे डीप स्टेट की संभावित भागीदारी के बारे में सवाल उठाते हैं।
              देख सकते हैं कि एकमात्र ऐसी जगह जहां कोई उथल-पुथल नहीं है, वह है अमेरिका। स्रोत: सीएफआर
आज इंडो-पैसिफिक अस्थिरता से घिरा हुआ है, और सभी भारतीय पड़ोसियों में राजनीतिक संकट है। हाल ही में क्षेत्रीय उथल-पुथल से केवल एक राष्ट्र को लाभ हुआ है, वह है अमेरिका। यह तर्कसंगत है कि कोई इस असंभावित संयोग के लाभार्थी को इंगित करने का प्रयास करता है और केवल एक राष्ट्र को लाभ होता है।
अजीब बात यह है कि सभी राजनीतिक अस्थिरता एक के बाद एक एक करके होती है। मानो किसी को ध्यान केंद्रित करने और चीजों पर नज़र रखने की ज़रूरत है ताकि चीजें नियंत्रण से बाहर न हो जाएँ। और आश्चर्य की बात यह है कि यह वे लोग हैं जो अपनी रणनीतिक स्वायत्तता चाहते हैं, न कि अमेरिकी नीति के अंध समर्थक।
घटनाओं की इस श्रृंखला ने भारत को अस्थिर पड़ोसियों से घेर लिया है। यह भारत को अपने पड़ोसियों के साथ अपनी आंतरिक स्थिति और सुरक्षा तथा अपने आर्थिक विकास पर ध्यान केंद्रित करने के लिए मजबूर करता है। इससे फिर से अमेरिका को लाभ होता है क्योंकि ऐसा लगता है कि वह नहीं चाहता कि कोई भी देश उससे आगे निकल जाए या उसके करीब भी आ जाए।
अगर इंडोनेशिया इन रणनीतियों का शिकार हो जाता है, तो इससे दक्षिण-पूर्व एशिया में और अधिक अस्थिरता पैदा हो सकती है। और इस तरह एक ऐसा डोमिनो प्रभाव पैदा हो सकता है जिससे क्षेत्र में और भी अधिक अशांति पैदा हो सकती है।

चीन

कोई यह सोच सकता है कि यदि चीन इसमें शामिल हो तो क्या होगा, लेकिन इसके विश्वसनीय कारण हैं कि चीन ऐसा कुछ क्यों नहीं करेगा।
एक तो इससे क्षेत्र में अस्थिरता पैदा होगी, दूसरी ओर नए बाजारों की तलाश कर रहे देश के लिए यह प्रतिकूल परिणाम देने वाला प्रतीत होता है।
दूसरा, चीन बांग्लादेश और म्यांमार की सेना जैसी अपनी अनुकूल सरकारों को क्यों गिराएगा? यहां तक ​​कि मौजूदा इंडोनेशियाई सरकार भी चीन की मित्र है।
हालांकि यह संभव है कि इसमें चीनी संलिप्तता हो, लेकिन इसके लाभ इससे कहीं अधिक हैं। और प्रदर्शनकारियों द्वारा अपनाई गई रणनीति मध्य पूर्व में सीआईए द्वारा अपनाई गई रणनीति से मिलती जुलती है।

इसका उद्देश्य

ऐसा लगता है कि इन कार्रवाइयों का लक्ष्य भारत को घेरना और चीन की पसंदीदा सरकारों को गिराना है। लेकिन इससे सभी लोकतांत्रिक सरकारें खतरे में पड़ गई हैं। क्योंकि अगर प्रदर्शनकारियों को प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति के घर पर धावा बोलना होता और उन्हें इस्तीफा देने के लिए मजबूर करना होता तो यह सब संभव था।
इससे अलोकतांत्रिक ताकतें सरकारों के खिलाफ इसका इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित होंगी। अगर सरकारें ऐसी स्थिति से बचना चाहती हैं तो वे सभी विरोध प्रदर्शनों पर नकेल कस देंगी। इससे सरकार को तानाशाही करने या सत्ता परिवर्तन का जोखिम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
यह हमें विश्व युद्ध जैसी स्थिति के और करीब ले जा रहा है, क्योंकि एक साधारण चिंगारी कभी न बुझने वाली आग को प्रज्वलित कर सकती है।

NEET पेपर लीक में अब पत्रकार जमालुद्दीन गिरफ्तार: स्कूल प्रिंसिपल एहसान उल हक से था लगातार संपर्क; विपक्ष की बढ़ती परेशानी

NEET पेपर लीक मामले में महामहिम के भाषण पर चर्चा होने से पहले विपक्ष द्वारा संसद में हंगामा करना एक बहुत गहरा षड़यंत्र है। विपक्ष की कोशिश है कि सरकार का इधर-उधर ध्यान भटकाकर दोषियों तक सरकार के हाथ न पहुँचने पाएं। जब तक राजनीतिक संरक्षण नहीं होगा पेपर लीक नहीं हो सकता। मोदी सरकार अच्छी तरह जानती है, इसीलिए सदन शुरू होने से पहले ही इस उलझन के सूत्रधारों तक कानून कदम बढ़ा रहा है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कड़े रुख ने विपक्ष की नींद हराम कर दी। अब उनके पास हंगामा करने के अलावा कोई और काम नहीं। सदन का नियम है कि पहले महामहिम के भाषण पर चर्चा और उसके बाद ान गतिविधियां। लेकिन विपक्ष अपनी हेकड़ी दिखा अपने अनुसार सदन चलाना जा रहा है, जो लोक/राज्य सभा नियम के विरुद्ध है।   

NEET पेपर लीक मामले में CBI की कार्रवाई जारी है। सीबीआई ने शुक्रवार (28 जून) की शाम को शुक्रवार (28 जून) को झारखंड के हजारीबाग से ओएसिस स्कूल के प्रिंसिपल एहसान उल हक, वाइस प्रिंसिपल इम्तियाज आलम और पत्रकार जमालुद्दीन को गिरफ्तार किया है। इसके पहले चार और आरोपित पकड़े गए हैं। सभी आरोपितों को CBI प्लेन से दिल्ली लाने की तैयारी में है।

जाँच के दौरान सीबीआई ने एहसान उल हक और इम्तियाज आलम के साथ-साथ हजारीबाग के दो पत्रकारों- मोहम्मद जमालुद्दीन और मोहम्मद सलाउद्दीन को भी ट्रैक किया था। इसमें एक पत्रकार जमालुद्दीन को सीबीआई ने गिरफ्तार कर लिया है। जमालुद्दीन झारखंड के एक हिंदी दैनिक अखबार से जुड़ा है। पेपर लीक मामले पर एहसान की जमालुद्दीन और सलाउद्दीन से लगातार बातचीत होती रहती थी।

सीबीआइ को जानकारी मिली कि नीट परीक्षा के तत्काल बाद एहसान उल हक विदेश घूमने गया था और करीब एक सप्ताह तक इंडोनेशिया के बाली में था। परीक्षा के पहले और बाद के उसके फोन डिटेल में बिहार से भी कनेक्शन मिला है। पेपर लीक कराने वाले गिरोह ने हजारीबाग में कई कोचिंग संचालकों से मोटी रकम लेकर प्रश्न पत्र उपलब्ध कराए थे। इनमें एक प्रोफेसर की भूमिका भी संदिग्ध है।

CBI और पुलिस के मुताबिक, 3 मई को NEET के प्रश्न पत्र कूरियर एजेंसी ब्लू डार्ट के हजारीबाग नूतन नगर सेंटर से बैंक ले जाने की बजाय पहले ओएसिस स्कूल लाए गए। इसके बाद यहाँ से बैंक भेजे गए थे। माना जाता है कि ओएसिस स्कूल में ही पेपर का पैकेट खोला गया था। ये सभी सरगना संजीव मुखिया से जुड़े बताए जा रहे हैं। मुखिया का गैंग पेपर के बॉक्स का सील तोड़ने में माहिर है।

ओएसिस स्कूल भी NEET परीक्षा का एक सेंटर था। इस सेंटर का प्रश्न पत्र और बुकलेट पटना में अधजला बरामद हुआ था। इस मामले का यह सबसे बड़ा सबूत है। इससे पहले 27 जून को सीबीआई ने पटना से मनीष प्रकाश और उसके दोस्त आशुतोष को गिरफ्तार किया था। उससे पहले दो अन्य आरोपित चिंटू और मुकेश को गिरफ्तार कर रिमांड पर लिया है।

NEET के अलावा, UGC-NET की परीक्षा भी इस ओएसिस स्कूल में आयोजित हुई थी। इसी स्कूल से ही यूजीसी-नेट के प्रश्नपत्र भी लीक होने का शक है। सीबीआई की टीम ने स्कूल के वाइस प्रिंसिपल सह सेंटर सुपरिंटेंडेंट इम्तियाज आलम का एक मोबाइल और लैपटॉप जब्त कर लिया है। इसके अलावा, जाँच एजेंसी ने अन्य कई सामानों को जब्त किया है।

पटना में 28 जून को CBI की टीम आरोपित चिंटू और मुकेश को लेकर उनके दोस्त रॉकी के घर पहुँची। बताया जा रहा है कि पटना के कंकड़बाग में रॉकी के घर से कई सबूत हाथ लगे हैं। चिंटू की देवघर में गिरफ्तारी के बाद रॉकी फरार हो गया था। CBI ने चिंटू, मुकेश, आशुतोष और मनीष के मोबाइल की जाँच की। ये सभी आरोपित 6 महीने से आपस में संपर्क में थे।

सीबीआई द्वारा गिरफ्तार मनीष प्रकाश ने अपने दोस्त आशुतोष से कहकर परीक्षार्थियों के लिए ‘लर्न एंड प्ले स्कूल’ को बुक कराया था। पटना के खेमनी चक स्थित लर्न एंड प्ले स्कूल में NEET का जला हुआ प्रश्न पत्र मिला था, जो इस घटना का प्रमुख सबूत है। इस पेपर पर दी गई जानकारी से पता चला था कि ये प्रश्न पत्र हजारीबाग के ओएसिस स्कूल के परीक्षा केंद्र से लीक हुआ था।

मनीष प्रकाश ने इस स्कूल में 20 से 25 NEET परीक्षार्थियों को रुकवाकर उन्हें प्रश्न पत्र दिया था और उन्हें आंसर शीट रटवाया था। कहा जा रहा है कि मनीष प्रकाश ने संजीव मुखिया के कहने पर परीक्षार्थियों के लिए इसका इंतजाम किया था। मनीष नालंदा का रहने वाला है। उसका परिवार पटना के बहादुरपुर थाना क्षेत्र के संदलपुर इलाके में रहता है। चिंटू संजीव मुखिया का रिश्तेदार है।

वहीं, बिहार पुलिस की EOU टीम से पेपर लीक जाँच की रिपोर्ट और सबूत हासिल करने के बाद अब CBI पेपर लीक के मुख्य आरोपित संजीव मुखिया को दबोचने की दिशा में काम कर रही है। संजीव मुखिया यूपी पुलिस सिपाही भर्ती परीक्षा पेपर लीक मामले के मुख्य आरोपित रवि अत्री भी संजीव मुखिया से जुड़ा है। इसके अलावा, कई परीक्षाओं के पेपर लीक से भी मुखिया जुड़ा हो सकता है।

अमेरिका, नाटो और EU के रूस को अलग थलग करने की साजिश का हिस्सा नहीं बने मोदी; रूस के एक सच्चे मित्र का कर्तव्य निभाया भारत ने

 सुभाष चन्द्र

स्विट्ज़रलैंड द्वारा अपने शहर बर्गेन्स्टाक में यूक्रेन में शांति स्थापना के लिए आयोजित शिखर सम्मेलन में NATO और EU समेत 80 देशों ने भाग लिया। लेकिन जो प्रताव यूक्रेन में शांति स्थापना के लिया लाया गया, उस पर भारत ने हस्ताक्षर करने से साफ़ मना कर दिया। इस सम्मेलन में रूस को निमंत्रण नहीं दिया गया और चीन ने इससे दूरी बनाई थी। 

दो दिनों की चर्चा के बाद शांति स्थापना के प्रस्ताव के अंतिम दस्तावेज़ में जो कुछ भी कहा गया उसमें क्षेत्रीय अखंडता के साथ ही (यूक्रेन की अखंडता) परमाणु सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और बन्दियों की अदलाबदली वाले बिंदु भी थे। ऐसा भी कहा गया है कि रूस को अपनी सेनाएं वापस ले जाने को कहा गया शिखर सम्मेलन में। अमेरिका और EU ने ऐसा जाल बिछाया था जिससे रूस पर स्वतः ही ऐसे प्रतिबंध लग जाएं जिससे उसका जीना ही कठिन हो जाए। ये 80 देश रूस से सभी संबंध विच्छेद करके उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग थलग करना चाहते थे।

लेखक 
चर्चित YouTuber 
लेकिन सही समय पर भारत ने शांति स्थापना के दस्तावेज में कुछ बिंदुओं को अस्पष्ट और गैर जरूरी कहते हुए पर हस्ताक्षर करने से मना करके रूस के प्रति अपनी सच्ची मित्रता निभाने का काम किया। भारत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “हम शांति स्थापना के विरुद्ध नहीं हैं और न ही युद्ध को आगे चलता देखना चाहते हैं लेकिन यह प्रस्ताव एक पक्षीय लगता है क्योंकि रूस को इस सम्मेलन में अपनी बात रखने के लिए अवसर ही नहीं दिया गया। भारत के साथ ही सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया, मैक्सिको, यूएई सहित 12 देशों ने भी हस्ताक्षर करने से मना कर दिया - पर्यवेक्षक के रूम में भाग लेने वाले ब्राजील ने भी हस्ताक्षर नहीं किए। 

भारत ने कहा - “भारत चाहता है कि किसी भी नतीजे पर पहुंचने से पहले रूस और यूक्रेन का एक साथ एक मंच पर होना जरूरी है ताकि दुनिया दोनों देशों की बात सुनकर अपनी राय या सहमति बनाए। रिपोर्ट की मानें तो रूस को इस समिट में नहीं बुलाया गया। यूक्रेन में शांति के लिए रखी गई शर्त पर भारत सहमत नहीं है”।

चार दिन पहले ही इटली में प्रधानमंत्री मोदी से यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की  भेंट करके बहुत प्रसन्न थे और उसे आशा रही होगी कि भारत स्विट्ज़रलैंड में उसका साथ देगा लेकिन हुआ इसके विपरीत। सभी देशों को मोदी सरकार ने खुला संदेश दे दिया कि रूस को एकतरफा फैसला करके उसे बर्बाद नहीं किया जा सकता।

भारत विश्व के देशों को यह सख्त संदेश देने में इसलिए भी सक्षम है क्योंकि भारत एक बहुत बड़ा वैश्विक बाजार है और किसी भी देश के लिए भारत की अनदेखी करना संभव नहीं है और यही सफल विदेश नीति है और कूटनीति भी।

UPA सरकार ने ब्रह्मोस मिसाइल के निर्यात को रोका, लीक हुई चिट्ठियों से खुलासा

UPA सरकार ने ब्रह्मोस मिसाइल के निर्यात की नहीं दी अनुमति
केंद्र में 2004 से लेकर 2014 तक UPA की सरकार थी। कॉन्ग्रेस इस गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी थी और डॉक्टर मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे, लेकिन सत्ता की बागडोर सोनिया गाँधी के हाथ में थी। UPA सरकार में कोयला और कॉमनववेल्थ से लेकर 2G और रेलवे में नौकरी तक, कई घोटाले हुए। वहीं मुंबई में 26/11 हमलों के बाद सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रही, कांग्रेस  पार्टी पाकिस्तान को क्लीन-चिट देते हुए हिन्दुओं को इसके लिए जिम्मेदार ठहराती रही।

अब UPA सरकार का नया कारनामा देश के सामने आया है। UPA सरकार ने जानबूझकर ब्रह्मोस मिसाइल के निर्यात से जुड़ी फाइलों को अटकाया। ब्रह्मोस की टीम का फिलीपींस दौरा रोक दिया गया था और इसके लिए राजनीतिक क्लियरेंस न होने की बात कही गई थी। कोई पॉलिसी न होने से असमंजस की स्थिति बनी रही, ब्रह्मोस के निर्यात में देरी हुई। ‘ABP News’ के पत्रकार आशीष सिंह ने कई पुराने पत्रों को जारी करते हुए ये खुलासा किया। इसके तार विदेश और रक्षा मंत्रालय तक जुड़े हुए हैं।

3 अलग-अलग देशों से संबंधित ये दस्तावेज हैं। असल में पिछले महीने ब्रह्मोस की पहली बार देश से बाहर डिलीवरी हुई, वो कई वर्षों पहले हो सकती थी अगर UPA सरकार लचर रवैया नहीं अपनाती। 17 अप्रैल, 2014 को विदेश मंत्रालय ने ब्रह्मोस के GM को पत्र लिखा था, तब टीम फिलीपींस जाने वाली थी। उन्होंने हिदायत दी गई कि बिना पॉलिटिकल क्लियरेंस के वो फिलीपींस न जाए। उस समय RK अग्निहोत्री ब्रह्मोस ऐरोस्पेस के CEO थे और उन्हें भी ये पत्र लिखा गया था।

इस पत्र में लिखा गया है कि सूचना मिली है कि ब्रह्मोस की टीम फिलीपींस जा रही है, लेकिन हमारे पास इसके पॉलिटिकल क्लियरेंस संबंधित कोई दस्तावेज नहीं हैं। साथ ही टीम को MEA से संपर्क करने को भी कहा गया है। एक अन्य पत्र इंडिया इंडोनेशिया जॉइंट डिफेंस कॉर्पोरेशन की बैठक को लेकर है, जो 17-18 जून, 2010 को हुई थी। इस दौरान इंडोनेशिया प्रतिनधिमंडल को नई दिल्ली में ब्रम्होस ऐरोस्पेस का दौरा भी करना था। हालाँकि, केंद्रीय रक्षा मंत्रालय ने सलाह दी कि इस दौरे को रद्द किया जाए।

कारण बताते हुए कहा गया कि ब्रह्मोस के निर्यात को लेकर अभी राजनीतिक स्तर पर कोई निर्णय नहीं लिया गया है। ये पत्र ब्रह्मोस ऐरोस्पेस के तत्कालीन CEO ए सिवाथनु पिल्लई को केंद्रीय रक्षा मंत्रालय के अधिकारी DK महापात्रा ने लिखा था। इस पत्र में लिखा गया था कि हम इंडोनेशिया को गलती से ये इंगित करा रहे हैं कि हम ब्रह्मोस मिसाइल के निर्यात को लेकर तैयार हैं। वहीं 9 मई, 2011 को भी एक पत्र भेजा गया है जिसमें कहा गया है कि केंद्रीय विदेश मंत्रालय चुनिंदा देशों को ब्रह्मोस मिसाइल निर्यात करने के पक्ष में है।

इस पत्र में कहा गया है कि ब्रह्मोस मिसाइल के उत्पादन और विक्रय को लेकर रूस के साथ हुए करार को इस तरह से लागू किया जाना चाहिए जो किसी भी पक्ष की सुरक्षा और सैन्य-राजनीतिक हितों को नुकसान नहीं पहुँचाता हो। इसमें राष्ट्रीय कानूनों का ध्यान रखने की भी सलाह दी गई थी। हालाँकि, अंत में इसमें भी आदेश दिया गया था कि मिसाइलों के निर्यात को लेकर जब तक निर्णय नहीं हो जाता तब तक ब्रह्मोस के निर्यात को लेकर कोई बातचीत न की जाए।

तत्कालीन केंद्रीय विदेश सचिव निरुपमा राव ने कहा था कि हम ब्रह्मोस के पक्ष में हैं, लेकिन इसके निर्यात के लिए हमारे पास कोई नीति नहीं है। इस पत्र में भी लिखा गया है कि MEA इसके लिए नीति बनाने की ज़रूरत पर जोर देती है। इसमें संयुक्त राष्ट्र के नियमों के पालन की बात से लेकर आतंकियों के हाथ में तकनीक जाने की आशंका भी जताई गई है, लेकिन इसका कोई निदान नहीं बताया गया है। सिर्फ निर्यात के लिए किसी भी बातचीत से मना किया गया है।

ब्रह्मोस मध्यम रेंज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है। इसे सबमैरीन, जहाज या फाइटर एयरक्राफ्ट से लॉन्च किया जा सकता है। इसके जमीन और जहाज से मार करने वाले वर्जन हैं। भारत के ब्रह्मपुत्र और रूस की नदी मॉस्क्वा नदी के संयुक्त नाम पर इसका नाम ब्रह्मोस रखा गया है। अब 1500 किलोमीटर रेंज तक के ब्रह्मोस मिसाइलों के उत्पादन की तैयारी है। इसकी पहली टेस्ट फायरिंग जून 2001 में हुई थी। सितंबर 2010 में सुपरसोनिक स्पीड में टेस्ट की जाने वाली ये पहले स्टीप डाइव मिसाइल बनी।

अप्रैल 2024 में भारत ने ब्रह्मोस की पहली सफल डिलीवरी पूरी की। भारत और फिलीपींस के बीच इसे लेकर 375 मिलियन डॉलर (3114 करोड़ रुपए) की डीप हुई थी। भारतीय वायुसेना के ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट से इसके पहले बैच की डिलीवरी पूरी की जा चुकी है। फिलीपींस अपनी सेना के आधुनिकीकरण की योजना के तहत ब्रह्मोस खरीद रहा है।4 खेप में ये मिसाइलें पहुँचाई गई हैं, हर खेप में 3 लॉन्चर और 290 किलोमीटर रेंज की 3 मिसाइलों के अलावा प्रत्येक लॉन्चर के लिए एक मोबाइल प्लेटफॉर्म दिया जाता है।

जहाँ 98% मुस्लिम, वहाँ रोहिंग्या घुसपैठियों के लिए कोई जगह नहीं: छात्रों का गुस्सा, कहा- इन्हें बाहर फेंको

रोहिंग्या घुसपैठियों का विरोध करते छात्र (चित्र साभार: Qantara.de)
भारत में कुर्सी के भूखे नेताओं और पार्टियों को विदेशों, विशेषकर इंडोनेशिया से कुछ सीखना चाहिए, जहाँ रोहिंग्यों को बाहर निकालने के लिए सरकार पर दबाव बनाया जा रहा है तो भारत में छद्दम देशहितैषी रोहिंग्यों का राशन कार्ड, आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र ऐसे बनवा रहे हैं, जैसे के इनके दामाद हैं। रोहिंग्या और अन्य घुसपैठियों का समर्थन करने वाले नेताओं और उनकी पार्टियों से पूछो कि "विश्व में एक ऐसा देश बताओ जहाँ घुसपैठियों को पालापोसा जाता हो?" भारत एक देश है कोई धर्मशाला नहीं। 

इंडोनेशिया के बांदा अचेह राज्य में अवैध रोहिंग्या मुस्लिम घुसपैठियों के खिलाफ लोगों का गुस्सा भड़क गया है। समुद्र के रास्ते नावों में भर-भर कर लगातार देश में घुसपैठ कर रहे रोहिंग्या मुस्लिमों के खिलाफ यहाँ के छात्र-छात्राओं ने एक बड़ा विरोध प्रदर्शन किया है। इस विरोध प्रदर्शन में विद्यार्थियों ने रोहिंग्याओं को देश से बाहर फेंकने की माँग की है।

इस मामले को लेकर सैकड़ों छात्र-छात्राओं ने 27 दिसम्बर 2023 को इंडोनेशिया के अचेह राज्य की राजधानी बंडा अचेह में स्थित एक सामुदायिक केंद्र की इमारत पर धावा बोल दिया। इस इमारत में म्यांमार और बांग्लादेश से घुसपैठ करके इंडोनेशिया में आए हुए हजारों रोहिंग्या मुस्लिम रह रहे थे। प्रदर्शन करने वाले इन विद्यार्थियों ने हरी जैकेट पहनी हुई थी।

छात्र-छात्राओं ने इन घुसपैठी रोहिंग्याओं के विरुद्ध नारे लगाए और उनसे देश छोड़ने के लिए कहा। इसके बाद गुस्साए छात्र-छात्राओं ने कुछ रोहिंग्या को दो ट्रक में भर कर एक अन्य जगह भी शिफ्ट कर दिया। इस विरोध प्रदर्शन का वीडियो अब वायरल हो रहा है। विरोध प्रदर्शन करने वालों में हिजाब पहनी हुई छात्राएँ भी शामिल थीं।

ये छात्र-छात्राएँ लगातार इंडोनेशिया में अवैध रोहिंग्या घुसपैठियों को लेकर आने वाली नावों का विरोध कर रहे हैं। अचेह राज्य में इन्होंने पिछले माह भी प्रदर्शन किया था। इनका कहना है कि संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थियों के लिए काम करने वाली एजेंसी उनके राष्ट्र के खिलाफ साजिश रच रही है।

रोहिंग्या घुसपैठियों की इंडोनेशिया में आवक बीते कुछ महीनों से बहुत तेजी से बढ़ी है। ये लोग नावों में भर-भर कर बांग्लादेश और म्यांमार से समुद्र के रास्ते इंडोनेशिया में घुसपैठ कर रहे हैं और वहाँ अवैध रूप से रह रहे हैं। स्थानीय जनता अब इन अवैध घुसपैठियों से त्रस्त हो चुकी है।

रोहिंग्या घुसपैठियों की बढ़ती संख्या के पीछे मानव तस्करों का भी हाथ माना जा रहा है। हाल ही में इंडोनेशिया के प्रधानमंत्री जोको विडोडो ने भी कहा था कि उनके देश में बढ़ती रोहिंग्या मुस्लिमों की संख्या के पीछे मानव तस्करी का हाथ है।

रोहिंग्या मुस्लिम मूल रूप से म्यांमार के हैं। ये म्यांमार की सरकार के खिलाफ लम्बे समय से लड़ाई लड़ रहे हैं। रोहिंग्या मुस्लिमों की आतंकी गतिविधियों की वजह से म्यांमार की सेना इनके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई कर रही है। इसके कारण ये म्यांमार छोड़कर बांग्लादेश, भारत और अन्य देशों को भाग रहे हैं।

जिस राज्य अचेह में ये प्रदर्शन हो रहे हैं, वहाँ की 98.5% जनता मुस्लिम है और रोहिंग्या भी मुस्लिम हैं। हालाँकि, यहाँ इस्लामी भाईचारा काम नहीं आ रहा है और यहाँ के समुद्री तट पर आने वाली घुसपैठी रोहिंग्याओं की नौकाओं को यहाँ के निवासी वापस भेज रहे हैं और यहाँ की जमीन पर उतरने पर मारने-पीटने की धमकी भी दे रहे हैं।

कुछ वर्षों पहले तक यहाँ भी घुसपैठी रोहिंग्या को शरण मिलती थी, लेकिन इनके आचरण के चलते अब इनके विरुद्ध यहाँ भी माहौल बन गया है। दरअसल, जिन रोहिंग्या मुस्लिमों को यहाँ शरण दी गई वे शरणार्थी कैम्प से भाग गए। कुछ ने स्थानीय लोगों के साथ बदतमीजी भी की।

इंडोनेशिया की सरकार ने भी इन रोहिंग्या घुसपैठियों की कोई मदद करने से इनकार कर दिया है। सरकार का कहना है कि ये घुसपैठिये इंडोनेशिया के लोगों की अच्छाई का फायदा उठा रहे हैं। प्रधानमंत्री विडोडो का कहना है कि उनकी दयालुता के आधार कुछ लोग पैसा बना रहे हैं।

जकार्ता पोस्ट ने संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (यूएनएचसीआर) की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि पिछले महीने के दौरान 1,200 से अधिक रोहिंग्या मुस्लिम ने आचेह प्रांत में प्रवेश किया।


हिजाब इंडोनेशिया में है ‘बैन’ ; यूनिफॉर्म का हिस्सा बनाने पर स्कूलों को मिलती है सज़ा

                                                                              प्रतीकात्मक चित्र साभार: Abdul Qodir/ AFP
कर्नाटक के मुस्लिमों की जिद है कि उनके घर की छात्राएँ बुर्का पहन कर स्कूल-कॉलेजों में जाएँ और शैक्षणिक संस्थान में यूनिफॉर्म के तय नियमों की धज्जियाँ उड़ाएँ। इसे इस्लाम में अनिवार्य बताते हुए कर्नाटक उच्च-न्यायालय में भी जिरह की जा रही है। लेकिन, इस दौरान वो ये भूल गए कि दुनिया के सबसे बड़े इस्लामी मुल्क इंडोनेशिया ने स्कूलों पर हिजाब को अनिवार्य बनाने से प्रतिबंधित कर रखा है। वहाँ नॉन-मुस्लिमों को हिजाब के लिए मजबूर किए जाने के बाद देश भर में विरोध प्रदर्शन हुए थे, जिसके बाद ये नियम बनाने पड़े।

इंडोनेशिया के 20 से अधिक प्रांतों में कई स्कूलों ने हिजाब को स्कूली छात्राओं के यूनिफॉर्म के तहत अनिवार्य बना रखा था। ये नियम न सिर्फ छात्राओं, बल्कि महिला शिक्षकों के लिए भी था। इंडोनेशिया में आधिकारिक रूप से 6 धर्मों को मान्यता प्राप्त है, लेकिन वहाँ की 86.7% जनसंख्या मुस्लिम है। अब वहाँ के स्कूल किसी मजहबी वस्त्र को यूनिफॉर्म का हिस्सा नहीं बना सकते। पश्चिमी सुमात्रा के एक स्कूल ने गैर-मुस्लिमों को भी हिजाब पहनने को कहा था, जिसके बाद ये विवाद शुरू हुआ था।

इनमें से एक लड़की के माता-पिता ने विरोध प्रदर्शन शुरू किया, जो पूरे मुल्क तक फ़ैल गया था। फिर फरवरी 2021 में वहाँ की सरकार के कड़े कदम उठाए। इंडोनेशिया के मजहबी मामलों के मंत्री याक़ूत चोलिल कौमास ने कहा था कि पश्चिमी सुमात्रा का मामला तो बस दिख रहा था, लेकिन ऐसे कई और मामले आए थे। उन्होंने कहा था कि मजहब के नाम पर किसी दूसरे व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन नहीं किया जा सकता। एक ईसाई लड़की को हिजाब पहनने के लिए मजबूर किए जाने के एक वीडियो के बाद वहाँ की सरकार ने इतना बड़ा निर्णय ले लिया था।

16 साल की लड़की का वीडियो वायरल होने के बाद इंडोनेशिया की सरकार ने सभी स्कूलों को एक महीने का समय दिया, हिजाब/बुर्का सम्बंधित नियमों को हटाने के लिए। नियम बनाया गया कि इसे न मानने वाले स्कूलों पर कार्रवाई होगी और जुर्माना लगेगा। मुल्क की सरकार ने माना कि ये व्यक्तिगत अधिकार है और स्कूल इस बारे में फैसला नहीं ले सकते। आज कर्नाटक में मुस्लिम लड़कियों को हिजाब में स्कूल में एंट्री न मिलने पर उनके पैरेंट्स शिक्षक-शिक्षिकाओं से झगड़ रहे हैं, उन पर चिल्ला रहे हैं।